विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३५)

७०) अनाप्त विरोधी – अविश्वास योग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

स्वयं के लिये कुछ न चाहकर श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की श्रीरामानुज स्वामीजी पर असीम श्रद्धा

अनाप्त (अविश्वासी व्यक्ति / पहलू जो किसी के लिये प्रतिकुल न हो)। इस भाग में जिन विषयों पर चर्चा हुई है वहीं तत्त्वों पर प्रकाश डालेंगे। अनुवादक टिप्पणी: यह भाग असल में इसके पूर्व भाग की ही अगली कड़ी है। जीवात्मा के आध्यात्मिक प्राकृतिक उन्नति के प्रतिकूल विषयों पर चर्चा करेंगे।

  • उपायान्तर (कर्म, ज्ञान भक्ति योग आदि साधनों से भगवान का नित्य कैंकर्य प्राप्त करना) में विश्वास करना जो प्रपत्ति (सम्पूर्ण शरणागति) के विरूद्ध है, यह बाधा है। आलवार समझाते हैं और स्वयं भी भगवान की सम्पूर्ण शरणागति का अभ्यास करते हैं, जो भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। अलग अलग कार्य जैसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, आदि स्व प्रयत्न वाले कार्य हैं जो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत है क्योंकि जीवात्मा स्वयं को भगवान का नित्य सेवक मानता है। इस तरह ऐसे उपायान्तरों में विश्वास रखना जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य / आलवारों ने यह सुनिश्चित किया है कि भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति ही उनके प्रति नित्य कैंकर्य का एक मात्र साधन है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के दूसरे प्रकरण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस सिद्धान्त को समझाते हैं। इस सूत्र में वे पहले समझाते हैं कि हम उपायान्तर का त्याग अपने अज्ञान और पात्रता के कारण नहीं अपितु इसलिए करते है क्यूंकि उपायान्तर भगवान के प्रति सम्पूर्ण शरणागति के प्रतिकूल है। अगले सूत्र में वे इस सिद्धान्त को और विस्तार से समझाते हैं। १२७वें सूत्र में स्वयं से प्रश्न करते हैं कि “क्यों वेदान्त इन तत्त्वों को उपाय ऐसे दर्शाता है?”। वें स्वयं इसका उत्तर भी देते हैं कि जैसे किसी बीमार को बीमारी के समय (माँ प्रेम से) उसके पसन्द के प्रसाद की वस्तु में दवा मिला कर देते हैं। यहाँ शास्त्र जो जीवात्मा का एक माँ की तरह ध्यान रखता है, उपायान्तर में भगवान (जो वास्तविक दवा हैं) रूपी दवा मिलाता है (उपायनतार स्व प्रयत्न पर आधारित हैं और अपने स्वभाव के कारण स्व प्रयत्न में लिप्त होना जीवात्मा को प्रिय हैं, जो अनेक वर्षों से इस संसार में हैं)। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ओर सुन्दर और स्पष्टता से समझाते हैं कि जिस तरह दवा ही बिमारी को ठीक करती है न की प्रसाद की अधिकता, उसी तरह भगवान ही वास्तव में संसार बन्धन से छूटने के उपाय है और उपायान्तर कभी भी सच्चा उपाय नहीं हो सकते है। वे आगे समझाते हैं कि जब भोजन पदार्थों में मिलाई गई दवा से बीमारी का उपचार किया जाता है तब उससे ठीक होने में अधीक समय लगता है। उसी तरह कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि योगों से जीवात्मा को इस संसार के बन्धन से बाहर निकलने के लिये अधीक समय लगता है। परन्तु भगवान से सीधे सम्बन्ध करना वैसे ही है जैसे बिमारी को ठीक करने हेतु दवाई को सीधे पाना – इसका परिणाम तुरन्त होता है। आगे के सूत्रों में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई आश्चर्य चकित करनेवाले अर्थ समझाते हैं – अपने आचार्य से इन विषयों से कालक्षेप सुनना चाहिये।
  • यह जानते हुये की अपने से प्रतिकूल लोगों से दोस्ती नही रखनी चाहिए, इस सोच में रहना की ऐसे लोगों के साथ मिलने से हमारी क्या दशा होगी, यह बाधा है। हमें यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि अपने से प्रतिकूल स्वभाव वालों से हमें अपने सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ प्रतिकूल स्वभाव वालों से मतलब है वे जो देवतान्तर, संसार में लगे हैं और जो निरन्तर भगवद, भागवत, आचार्य अपचार में लगे हुये रहते हैं। क्योंकि ऐसे जनों के संगत में रहने से वे हमारे विचारों को भी अपने विचारो की तरह ढालने की कोशिश करते हैं।
  • सांसारिक सुख के प्रति लगाव, जो हमारे अन्तिम लक्ष्य में रुकावट है – यह बाधा है। कोई भी वस्तु जो भगवान के नित्य कैंकर्य के विरुद्ध हो और जिससे स्वयं को आनन्द प्राप्त होता है उसे प्रयोजनान्तर कहते हैं। ऐसे कार्यों को हमें त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारे लिये भगवान के परमपदधाम में भगवान की नित्य सेवा ही, जो भगवान को आनंददायी है, हमारा अन्तिम लक्ष्य है। अन्य लक्ष्य जैसे सांसारिक सुख, देवताओं कि सेवा, सांसारिक जनों कि सेवा, कैवल्यम – स्व-आनन्द, स्व-आनन्द के लिये भगवान कि सेवा करना, घमण्ड से भगवान कि सेवा करना, आदि, सभी जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के लिये प्रतिकूल हैं और इसलिये इनका त्याग करना चाहिये।
  • श्रीमन्नारायण भगवान ही एक मात्र विश्वसनीय और पूजनीय भगवान हैं, इस सिद्धान्त के विरुद्ध देवतान्तरों में विश्वास रखना, यह बाधा है। श्रीवैष्णवों के लिये श्रीमन्नारायण ही एक मात्र पूजनीय भगवान हैं इस सिद्धान्त को समझना और उसका पालन करना बहुत मुख्य है। देवतान्तर का भजन और पूजन हमारे उपरोक्त सिद्धान्त के विपरीत है, इसलिए उसका त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमन्नारायण भगवान स्वयं सबसे श्रेष्ठ हैं जिन्होंने कई देवताओं को इस संसार को चलाने के लिये और उन लोगो के लिए बनाया जो तामसीक और राजसीक को पूजा करने वाले हैं जिससे वे लोग भी धीरे धीरे आध्यात्मिकता को ग्रहण कर सके, नही तो नास्तिकता बड़ जायेगी। परन्तु भगवान के पवित्र भक्त जो सत्वगुण वाले हैं उनके लिये भगवान श्रीमन्नारायण हीं एक मात्र पूजनीय हैं। वैष्णव होना का अर्थ है श्रीमन्नारायण में सम्पूर्ण विश्वास रखना और उनकी हीं पूजा करना।
  • द्वय महामन्त्र के तत्त्वों में समझाये गए मन्त्रों के जो विपरीत हों उन मंत्रों में विश्वास रखना यह बाधा है। श्रीवैष्णवों को द्वय महामन्त्र को निरन्तर बोलना और ध्यान करना चाहिये क्योंकि इसमें मिठास और गूढ़ार्थ हैं। अपने संबन्धित गुणों के कारण, द्वय महामंत्र के प्रकाशन द्वारा यहाँ रहस्य त्रय (तिरुमंत्र- अष्टाक्षर, द्वय महामंत्र, गीता चरम मंत्र) को दर्शाया गया है। अत: श्रीवैष्णवों को रहस्य त्रय का निरन्तर पालन करना चाहिये। देवतान्तरों से सम्बंधित मंत्रों को पूरी तरह त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी तिरुमन्त्र की विशेषताओं को समझाते हैं। वे पहले समझाते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण से सम्बन्धित दो मन्त्र है – व्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान की सार्वभौमिकता को समझाते है) और अव्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान के अन्य गुणों को अलग अलग रूपों से समझाते हैं)। स्वामीजी विशेषत: समझाते है कि व्यापक मन्त्र (नारायण, वासुदेव, विष्णु) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विष्णु गायत्री में इसे दर्शाया गया है। वें आगे कहते है कि क्योंकि विष्णु गायत्री नारायण मन्त्र से प्रारम्भ होता है इसलिये विष्णु के मंत्रों में यह सबसे श्रेष्ठ है। आगे वे कहते है कि नारायण मन्त्र सम्पूर्ण मन्त्र है जो सभी आवश्यक अर्थों को बताता है जो दूसरे मंत्रों में नही है। यहाँ आवश्यक अर्थ से आशय है अर्थ पञ्चक (पाँच तत्त्व / स्वरूप – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, उपेय और विरोधी)। वे आगे और समझाते है कि नारायण मन्त्र वेद, ऋषी, आलवारों और आचार्यों को प्रिय है। द्वय महामन्त्र नारायण मन्त्र का विस्तृत रूप है और चरम श्लोक इस तत्त्व को और आगे समझाता है। इसलिये मुमुक्षु (जिन्हें मोक्ष और परमपद में भगवान श्रीमन्नारायण की चाह है) के लिये रहस्य त्रय ही केन्द्र है।
  • हमारा अन्तिम लक्ष्य एकमात्र भगवतप्राप्ति है, जिससे स्वयं भगवान ही आनंदित होते हो इसके विपरीत दैहिक व भौतिक सुख की ओर लगाव रखना, यह बाधा है। भोग्यम – वह जिससे कोई आनंदित हो। जीवात्मा जो भगवद/ भागवतों का कैंकर्य करते हैं जिससे भगवान आनंदित होते है। जब भगवान में यह आनन्द देखते है जीवात्मा भी प्रफुल्लित होता है। दूसरे सभी सांसारिक सुख जीवात्मा की वास्तविक दशा में बाधक हैं। अनुवादक टिप्पणी: पेरुमाल तिरुमोली में श्रीकुलशेखर स्वामीजी घोषणा करते है कि “पड़ियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – यहाँ आलवार प्रार्थना करते हैं कि उन्हें श्रीवेंकटेश भगवान के मंदिर के गर्भ गृह की सीढ़ी (थली) बनाये जिस से वे भगवान श्रीवेंकटेश की भव्य मुस्कुराहट का दर्शन भी कर सकें। सीढ़ी (थली) एक अचित की तरह है (जिसे ज्ञान नही है) लेकिन चूंकि वह भगवान के आनन्द को देख सकते है और प्रत्युत्तर में वे भी आनंदित होते हैं। क्योंकि प्रत्युत्तर में आनंदित होना ज्ञान की दशा है यह श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय का उच्चत्तम सिद्धान्त दर्शाता है। अर्थात हमें मालिक के अधीन रहना चाहिये की शुद्ध विचार हो फिर भी हमें भगवान के आनन्द का प्रत्युत्तर जरूर देना चाहिये ताकि उससे भगवान को और अधिक आनन्द प्राप्त हो। यह एक भोले भाले छोटे बच्चे की अवस्था की तरह है जो कि पूर्णत: अपने पिता के वश में हैं फिर भी पिता जब अपने पुत्र को खुशी देता है तब बच्चा भी पिता के आनन्द का प्रत्युत्तर देता है और इससे पिता को अपार आनन्द मिलता है। अत: भगवान प्रारम्भ में खुशी का अनुभव करते हैं और जीवात्मा बाद में अनुभव करता हैं – वह भी सिर्फ भगवान के आनन्द के लिये करते हैं।
  • भंध शास्त्र (सांसारिक, धन, वैभव, आदि का साहित्य पढ़ना) पर ध्यान केन्द्रित करना जो मोक्ष शास्त्र (मोक्ष सम्बन्धित साहित्य) के विपरीत है यह बाधा है। मोक्ष शास्त्र भगवान के प्रति नित्य कैंकर्य करने कि राह दिखाते हैं। भंध शास्त्र हमें इंद्रिय सुख के लिये बारम्बार इस संसार में जन्म लेने के लिये अग्रसर करते हैं। हमें मोक्ष शास्त्र पर केन्द्रित होना चाहिये और भंध शास्त्र पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
  • स्वयं के दैहिक पक्ष में रूचि रखना जो अपने अन्तिम लक्ष्य आचार्य सेवा के विपरीत है, यह बाधा है। चरम कैंकर्य – चरम पर्व निष्ठा – अन्तिम सेवा “अपने आचार्य ही सबकुछ है और ऐसे आचार्य की सेवा करना” की तरह है। उपदेश रत्नमाला के ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” – आचार्य को शिष्य के सच्चे स्वभाव पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और शिष्य को अपने आचार्य के शरीर और शारिरीक आवश्यकता की ओर ध्यान पूर्ण भक्ति के साथ केन्द्रित करना चाहिये। जैसे आचार्य कि नित्य सांसारिक जरूरत (जैसे प्रसाद, वस्त्र, तिरुमाली, आदि) की पूर्ती शिष्य का कर्तव्य है और शिष्य को चाहिये कि वह स्वयं सांसारिक आवश्यकता को छोड़ आचार्य कि ओर लगाव रखें। केवल स्वयं की आवश्यकता में निरत रहना – इसे त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: उपदेश रत्नमाला में श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की गूढ बातों का सार है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा समझाये गये इन सिद्धान्तों के सार को बहुत ही सुन्दर तरीके से बहुत ही सरल तमिल पाशुरों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आचार्य और उनकी सेवा कैंकर्य विषय पर ही श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी ने पूरा ध्यान केन्द्रित किया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे अच्छी तरह से समझाते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३४)

६९) आप्त विरोधी – विश्वासयोग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आप्त का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति / पहलू या हित चाहनेवाला। सामान्यत: वह जो बिना कुछ चाहे दूसरों का हित चाहता है उसे आप्त कहते है – मित्रों में उत्तम। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुमोगूर भगवान की तिरुमोगूर आत्तन ऐसे जय जयकार करते हैं। आप्त का तमिल शब्द आत्तन है। अनुवादक टिप्पणी: इस भाग में उन विषयों पर चर्चा हुई है जो प्रपन्नों के लिये अच्छा है – इसमें शामिल है किसी के स्वभाव को अच्छी तरह समझना, भगवद, भागवत, आचार्य, आदि के महत्त्व को समझना।

  • भगवान और भागवतों में जिनकी प्रीति हो उनकी उपेक्षा करना बाधा है। जो भी भगवद और भागवतों में लगा है उन्हें अपना हित चिन्तक समझना चाहिये और उनके प्रति अच्छी तरह व्यवहार करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण स्वयं भगवद्गीता के ७.१९ में समझाते हैं “बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपध्यते। वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥” – कई जन्मों के पश्चात जो सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है वह मेरे शरण में आता है। ऐसे व्यक्ति जो वसुदेव को ही सबकुछ (उपाय, उपेय, आदि) मानते हैं वो महान व्यक्ति है और बड़ी दुर्लभता से मिलते हैं। उसी तरह स्वयं भगवान वैष्णवों के आठ विशेष गुणों को समझाते हैं। उसमें वैष्णवों का पहला गुण है “मद भक्त जन वात्सल्य” – भगवान के भक्तों के प्रति लगाव रखना। वह भी “वात्सल्य” शब्द का यहाँ प्रयोग भगवान ने किया है। वात्सल्य अर्थात माता सा प्यार / सहनशीलता – जैसे एक माता अपने बच्चों में कितना भी दोष हो उसे प्यार करेगी उसी तरह एक वैष्णव को अन्य वैष्णव में कितना भी दोष या कमी हो उनके दोषों को अनदेखा करके उनमें प्रेम भाव रखना चाहिये। अत: इन २ प्रमाणों से हम वैष्णवों के सेवा के महत्त्व को समझ सकते है जो भगवद और भागवतों में लगे हुए हैं। यह भी समझना चाहिये कि वैष्णवों कि ओर ध्यान न देना उनके प्रति सम्मान न देने के बराबर है।
  • जो भगवान और भागवतों के प्रति लगाव नहीं करते हैं उनके प्रति बहुत प्यार करना या दिखाना बाधा है। यह पिछले विषय से जुड़ा है। हमें उनके प्रति लगाव नहीं दिखाना चाहिये जो अपने कार्य और बाह्य स्वरूप से संसारी हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवैष्णवों की दिनचर्या को समझाते हैं। कई विषयों में एक इस प्रकार हैं “अहंकार अर्थ कामंगल मूनरूम अनुकूलर पक्कलीले अनाधरत्तैयूम, प्रतिकूलर पक्कलीले प्रावण्यत्तैयुम, उपेक्षिक्कुमवर्गल पक्कलीले अपेक्षइयूम पिरप्पिक्कुम”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिए एक बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं। तीन विषयों की यहाँ चर्चा हुई है। एक एक कर हम देखेंगे। १) श्रीवैष्णव अनुकूल (हितकारी) हैं – वे हमारे स्वामी हैं। जब हम उन्हें देखते हैं हमें उनके प्रति आदर सम्मान होना चाहिये और उसी क्षण सम्मान सहित वहाँ खड़े होना चाहिये। परन्तु अहंकार (स्वयं को स्वतन्त्र मानना) हमें उनकी ओर दुर्लक्ष्य कर देता है। क्योंकि अहंकार स्वयं को उच्च मानता है और अन्यों को सम्मान देने से रोकता हैं। २) सांसारिक जन प्रतिकूल (कृपाहीन) होते हैं। अर्थतम का अर्थ सांसारिक धन है। जब हम धन की इच्छा की ओर बढ़ते हैं तब हम धन प्राप्ति के लिये किसी की भी कितनी भी प्रशंसा कर सकते हैं। अत: यह सांसारिक धन, वैभव, आदि की इच्छा हमें प्रतिकूल जनों का मान सम्मान और उनके प्रति लगाव कराता है। ३) कामुक स्त्री सामान्यता उपेक्षिक्कुमवर (जो हमारी इच्छाओं की कभी भी परवाह नहीं करती हैं) होती हैं। अपेक्षा यानी इच्छा। जब किसी में कामुकता बढ़ती है तब यद्यपि वह स्त्री उस पुरुष की परवाह नहीं करती है और सार्वजनिक रूप में उसका अपमान भी करती है तब भी वह कामी पुरुष उसके पीछे जाने में लज्जा नही करता। अत: हमें इन ३ गड्ढो में गिरने से बचना चाहिये।
  • स्वकीया स्वीकार निष्ठा (स्व कोशिश पर विश्वास) होना बाधा है। जब हम कुछ अनुसरण करते हैं तब यह विचार कर अनुसरण करना कि “यह मेरा है, मैं इसे मेरे स्व कोशिश से अनुसरण कर रहा हूँ” से बचना चाहिये। क्योंकि भगवान ही सभी के मालिक हैं, हमें सब कुछ भगवद प्रसाद (भगवान की कृपा), आचार्य प्रसाद (आचार्य कृपा) मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति के दो प्रकार को समझाया गया है – स्वगत प्रपत्ति और परगत प्रपत्ति। स्वगत प्रपत्ति यानि स्वयं के प्रभाव की कोशिश से शरण होना। परगत प्रपत्ति यानि भगवान की कृपा से शरण होना। इन दोनों में से हमारे पूर्वाचार्यों ने परगत शरणागति को महत्त्व दिया है जो भगवान हीं रक्षक हैं और वे ही अपनी कृपा से हमें उपर उठाते हैं। जीवात्मा को भगवान के शरण होना चाहिये क्योंकि जीवात्मा का स्वाभाविक स्थान है भगवान के शरण होना।
  • स्व प्रयोजन प्रवृत्ति (स्वयं की इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश) में लिप्त होना बाधा है। स्वयं के सन्तोष के लिये हमें केंद्रित नहीं होना चाहिये और हमें दूसरों को उपर उठाने और उनके अच्छे के लिये कार्य करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कहा गया हैं “विचित्र देह संपत्तिर ईश्वराय निवेदितम, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुता” जब जीवात्मा एक सूक्ष्म स्थिति में होता है जैसे एक पदार्थ बिना इन्द्रिय/शरीर और सांसारिक आनन्द में नहीं लग सकता या वह स्वतन्त्रता की कोशिश करता है, तब भगवान के चरण कमलों की ओर अग्रसर होने के लिये कृपालू सर्वेश्वर, उस जीवात्मा पर इन्द्रिय/शरीर से कृपा करते हैं। इंद्रियाँ या शरीर का उपयोग में शारीरिक आनन्द के लिये भगवान के पास जाने के बजाय उद्धार के लिये जीवात्मा को भगवान के पास जाना चाहिये जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में कहा है “अन्नाल नि तंत आक्कैयीन वली उलल्वेन” अर्थात एक व्यक्ति जिसे एक बेड़ा दिया गया नदी के उस पार जाने के लिये, परन्तु नदी के जल के प्रवाह के कारण समुद्र में गिर जाता है, उसीप्रकार जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठने के लिये वही इंद्रियाँ या शरीर दिये गये थे वह इस संसार के लिये ही अधिक प्रयोग करता है। रामानुज नूत्तन्दादि में श्रीतिरुवरंगत्तु अमुधनार (श्रीरंगामृत स्वामीजी) इस तत्त्व को ६७वें पाशूर में समझाते है “मायवन् तन्नै वणंगवैत्त करणमिवै” – भगवान ने जीवात्मा को यह शरीर उनकी पूजा करने हेतु दिये है। सभी के लिये भागवतों की सेवा करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसलिये हमें इस जन्म का सही उद्देश्य पता होना चाहिये और उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिये।
  • केवल शेषत्त्व ज्ञान होना और पारतंत्रय का ज्ञान न होना बाधा है। आत्मा का स्वभाव दो चरणों में है: शेषत्त्वम – अपने स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु तत्पर रहना; पारतंत्रियम – स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करना। भगवान की सच्ची इच्छाओं को पूर्ण करना केवल अपने स्वामी की सेवा के लिये इंतजार करने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझना चाहिये यहाँ हम श्रीभरतजी को स्मरण कर सकते हैं जिन्होंने १४वर्ष तक भगवान राम की अनुपस्थिति में अयोध्या का राज्य संभाला। हालाँकि वे पहले श्रीराम के साथ वन में जाना चाहते थे।
  • स्वयं आनंदित होना और दूसरों को आनंद न देना बाधा है। भोग्यम – जो आनंदित है, भोक्ता – जो आनंदित होता है। श्रीवैष्णवों को स्वयं को भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु समझना चाहिये। यह समझना आवश्यक है कि हमारे स्वयं का अस्तित्व केवल भगवान के आनंद के लिये ही होना चाहिये। ऐसी समझ होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। हम भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु हैं फिर भी स्वयं को उपभोक्ता समझना विपरीत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के २१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं “शेषत्व भोक्थृतवंगल पोलन्रे पारतंत्रीय भोग्यतैगल”– पारतंत्रियम और भोग्यत्व दोनों शेषत्त्व और भोक्तृवंगल से भी उच्च हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यहाँ बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि शेषत्त्व सोने की ईंट (कीमती है फिर भी उसका रूप बदल कर काम में ले सकते हैं) जैसी है और पारतंत्रियम  सोने की आभूषण कि तरह है जिसे उसी रूप में कार्य में लेना है। यह बहुत गहरा तत्त्व है और इसे आचार्य कालक्षेप के जरिये समझना चाहिये।
  • यह मानना कि हमें जो आनन्द प्राप्त हुआ वह स्वयं से प्राप्त होता है, बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा करते हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते  चिरप्पु” – भगवान अपने मुखोल्लास के लिये मुझे अपना लेवे यही उत्तम है। हमारा शेषत्व और पारतंत्रय दोनों केवल भगवान के मुख के आनन्द के लिये हीं उत्पन्न होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी इसे पेरुमाल तिरुमोझी में समझाते हैं “पडियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – मैं आपकी सन्निधी के प्रवेश द्वार में सीढी बनूँ (जैसे अचित जिसे ज्ञान नही है) और सुख के परस्पर होना (क्योंकि चित जिसे ज्ञान है) जब मैं आपके होठों पर मुस्कान देखता हूँ। (अनुवादक टिप्पणी: यह हमारे सत सम्प्रदाय का सर्वोत्तम तत्त्व है जिसे “अचित्वत पारतंत्रियम” कहते है – अचित जैसे भगवान के पूर्ण शरण होना फिर जब भगवान के द्वारा खुशी प्रगट की जाती है तब जीवात्मा भी खुश होता है)। यह तत्त्व (स्वयं के सुख को मिटाने का) द्वय महामन्त्र के दूसरे भाग “नम:” में समझाया है। स्तोत्र रत्न में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी इसी तत्त्व को समझाते है “कदाप्रहर्षयिष्यामि” – भगवान के सुख के लिये तड़प। जब जीवात्मा भगवान के सुख का परस्पर आदान प्रदान करता है तब भगवान खुश हो जाते हैं। हमारे कैंकर्य का एक मात्र उद्देश है उनकी खुशी। इसके विपरित कार्य करना बाधा है।
  • जीवात्मा का सच्चा स्वभाव भगवान के आनन्द के लिये होना है और जो मूलभूत गुण है वह भी केवल भगवान के ही आनन्द पर केन्द्रित है यह न जानना बाधा है। जीवात्मा का सच्चा प्रबन्ध भगवान के आनन्द के लिये होना है – भगवान की सम्पत्ति बनना। मूलभूत तत्त्व भगवान का सच्चा दास बनकर रहना है। ऐसे जनों के लिये जिन्हे यह अहसास हो गया है कि दासता स्वभावत: ऐसी सेवा कैंकर्य, पूर्ण अधीनता, आदि बताने से होती हैं। जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते चिरप्पु” हमें निरन्तर भगवान के आनन्द के लिये सेवा करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे इसमें कहा गया हैं कि “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” –दासता के सच्चे लक्षण को कम से कम छोटे कैंकर्य (धार्मिक सेवा) द्वारा अनवरत किया जाता हैं।
  • आचार्य जो हमें वे तत्त्व बताते हैं जिसका हमें ज्ञान नहीं है उसको भगवान न मानना बाधा है। जैसे श्रीसहस्रगीति में कहा गया हैं “अरियाधन अरिवीत्त अत्ता” – नित्य सम्बंधित जिन्होंने भगवद विषयम में अज्ञात अनुभव प्रगट किया हैं, भगवान प्रथमाचार्य हैं। हमारे आचार्य को हमें भगवान का मनुष्य रूप मानना चाहिये। ऐसे आचार्य पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कृपया अंतिमोपाय निष्ठा पर लेख पढिये जिसमें आचार्य स्वयं को भगवान मानते हैं।
  • अपने आचार्य जो अन्तिम उपाय और उपेय हैं पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें सूत्र में समझाते हैं कि “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – मोक्ष के लिये आचार्य की शरण होना ही अन्तिम उपाय है। यहाँ यह समझना चाहिये कि हमें उस स्थिति में होना चाहिये जहाँ आचार्य माने कि उनका शिष्य रहे जैसे “यह मेरा प्रिय शिष्य हैं”। ४४६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं “आचार्यनैयुम थान पररूम पर्रु अहंकार गर्भमोपाधि कालन कोणडु मोधिरमी मिडुमा पोले – आचार्य का अनुसरण करते समय भी अगर वह स्वगत शरणागति (स्व परिश्रम से आचार्य का अनुसरण करना) हैं तो भी वह जीवात्मा के स्वभाव के प्रतिकूल है क्योंकि अभिमान या स्वतन्त्र स्वभाव के कारण ऐसा अनुसरण है। यह तो केवल आचार्य ही जो शिष्य पर कृपा करता हैं (शिष्य को निरन्तर ऐसा ही सोचना चाहिये)। अगर शिष्य की ओर से अभिमान से यह कार्य किया गया हो तो वह सोने कि अंगूठी बनाकर उसे काल (यम – मृत्यु को नियंत्रण करनेवाला) से स्वीकार करना जैसे होगा।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-35.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३३)

६८) जाति विरोधीजाति/वर्ण (जन्म में बाधाएं)

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी की सेवा करते हुए जो श्रीवरदराज भगवान की  त्याग मण्डप (काञ्चीपुरम) में सेवा करते थे।

आजकल जाति को ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और क्षुद्र से जोड़ा जाता हैं। परन्तु हमें यह समझना चाहिये कि यह सत्य नहीं है। असल में जाति को देव, मनुष्य, त्रियाक (जानवर जो क्षितिज के समानन्तर बढ़ते हैं) और पेड़ (स्थावर) का जन्म अथवा शरीर सम्बन्ध से जोडकर देखना चहिये। जाति का सम्बन्ध शरीर से है न की आत्मा से। त्रियाक का अर्थ जानवर/पक्षी है – उप वर्ग में आते है वह जो उड सकते हैं, जो चल सकते हैं, जो रेंग सकते हैं, जो जल में रह सकते हैं, जो धरती पर रह सकते हैं, जो वन में रह सकते हैं, जो शहर में रह सकते हैं, आदि। स्थावर में सम्मिलित हैं पेड़, पौधे, झाड़ी, छोटे पेड़, कीट भक्षी, आदि। भगवद गीता में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि सभी ४ वर्ण मैंने ही रचे हैं और उन्हें उनके कार्य और गुणों के आधार पर अलग किया गया है। विषय जो यहाँ चर्चा किया जायेगा वह बहुत गोपनीय और आंतरिक है। हम उसे सरलता से पेश करने का प्रयत्न करेंगे। रहस्यत्रय ग्रन्थ जैसे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र, आदि में जो समझाया गया है उन्हीं पहलू की हम यहाँ चर्चा करेंगे। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शब्दों का स्मरण कर सकते है “आर वचन भुतणत्तिन आळ् पोरुलेल्लाम अरिवार? आर अतु चोल नेरिल अनुट्टिप्पार?” – वह जो श्रीवचन भूषण के अर्थों को पूरी तरह समझ सकता है? वह जो उपदेश का पालन कर सकता है? इसी को ध्यान में रख कर अब हम आगे इस विषय पर प्रकाश डालेंगे।

अनुवादक टिप्पणी: जाति के कई भिन्न भिन्न अर्थ हैं। सामान्यता यह अलग अलग प्रजातियों के सम्बन्ध में है – देव, मनुष्य, त्रियाक, स्थावर। परन्तु इसके अतिरिक्त जाति को वर्ण से भी जोड़ा जाता है। कुल मिलाकर जाति को शरीर और जन्म से जोड़ा जाता है। उदाहरण के तौर पर द्विज अर्थात एक ही जन्म में दो बार जन्म लेना (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) – इसका अर्थ है सभी क्षुद्र वर्ण में जन्म लेते हैं पर उपनयन संस्कार होने के पश्चात द्विज हो जाते हैं। उपनयन संस्कार के पश्चात सभी द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) वेद अध्ययन से ब्रह्म ज्ञान के योग्य हो जाते हैं। अक्रमत: (एकाएक) कोई ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य नहीं होता है। सामान्यता सभी अपने अपने पूर्व कर्मानुसार उस वर्ण के किसी परिवार में जन्म प्राप्त करते हैं। इसलिये अगर कोई ब्राह्मण परिवार में जन्म लेता है तो उन्हें ब्राह्मण बनने का एक अवसर प्राप्त होता है। एक बार वह ब्राहमण बन जाते है तो उन्हें उन तत्वों पर रहना चाहिये। उन्हें एक आचार्य से वेदों का अध्ययन करना और आचार्य से जो सीखे उन्हें वेदों के तत्वों के आधार पर कार्य करना चाहिये। इस तरह कोई अपना ब्राहमणत्व विद्यमान रख सकता है। उसी तरह सभी वर्ण के जन वर्णाश्रम धर्मानुसार अपना कार्य करते हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय हैं और समाज के सही कार्य को सभी की उन्नती के लिये स्थापित करते है। सभी वर्ण के मुख्य कार्य हैं:

  • एक ब्राह्मण के लिये ६ कार्य पहचाने गये हैं। वेदों का अध्ययन, वेदों को सीखाना, स्वयं के लिये यज्ञ करना, अन्यों के लिये यज्ञ करना, दान करना, परिग्रह करना (दान स्वीकार करना)।
  • क्षत्रीय के लिये वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें शस्त्र उठाना, लोगों की रक्षा करना और देश का सही शासन करना, आदि कार्य।
  • वैश्य के लिये भी वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें खेती करना, गायों को चराना, व्यापार आदि करना है।
  • क्षुद्र केवल ऊपर लिखे तीनों वर्णों को उनके कार्य में मदद करते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित “आचार्य हृदय” के ३१वें चूर्णिकै के अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार के व्याख्या में उपर बताये हुए तत्वों को समझाया गया है।

“आचार्य हृदय” के ३३वें चूर्णिकै में नायनार द्विज जन्म की दूसरे जन्म से बड़ी सुन्दरता से तुलना करते है – अर्थात वह जो पञ्चसंस्कार से श्रीवैष्णव बनता है। जैसे शरीर का दूसरा जन्म वैदिक कर्म करने से निरत होता है वैसे हीं पञ्चसंस्कार आत्मा का दूसरा जन्म भगवद और भागवतों की सेवा से निरत होता है। यद्यपि आत्मा नित्य है परन्तु तिरुमन्त्र का अर्थ सीखने से जीवात्मा को अपने सच्चे स्वभाव का ज्ञान हो जाता है जो भगवान श्रीमन्नारायण की नित्य सेवा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस चूर्णिकै की व्याख्या को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं गायत्री मन्त्र (सभी मंत्रों की माता) से जीवात्मा ब्राह्मण कहलाता है और तिरुमन्त्र (सभी गायत्री मन्त्र की माता) जीवात्मा को श्रीवैष्णव बनाता है। ब्राह्मण को कर्म निष्ठ (जो सिर्फ कर्म पर आधारित है) और वैष्णव को दास्यभूत (जो सेवा कैंकर्य पर केन्द्रित है) कहते हैं। बाद में नायनार स्वामिजी कर्म निष्ठा और दास्यभूत में कई अन्तर बताते है।

३७वें चूर्णिकै में भी नायनार स्वामीजी यह समझाते है कि किसी का ब्राहमणत्व उसके वेद अध्यन, उसके अर्थ को समझने और वेदों में बताये गये तत्व के पालन करने से स्थापित होता है उसी तरह किसी का वैष्णवत्व एक आचार्य से दिव्य प्रबन्ध सीखना, उसके अर्थों को आचार्य से समझना और उसके तत्वों का अपने जीवन में पालन करने से स्थापित होता है।

इस भाग में वैष्णव या प्रपन्न (जो श्रीमन्नारायण को समर्पित हो) के महत्व और उनके जो मुख्य गुण है उन्हैं विस्तार से समझाया गया है।

  • भगवान ही रक्षक हैं इस पर पूर्ण विश्वास न होना जो तीनों प्रपन्नों अज्ञर (अज्ञानी), ज्ञानाधिकार (जो शिक्षीत हो) और भक्ति परवसर (जो भक्ति में डुबा हो) के लिये आवश्यक है, बाधा है। प्रपन्न अर्थात जो भगवान के शरण हो और जो उन्हें ही उपाय मानता हो। सभी ३ प्रकार के प्रपन्नों को विश्वास होना चाहिये और इसी विश्वास को जाति धर्म कहते है। विश्वास का अर्थ है भगवान पर पूर्ण भरोसा होना जिनके हम शरण हुए है वे ही हमारी रक्षा करेंगे और उद्धार करेंगे। इन तीन प्रपन्नों के विषय में थोड़ा अधीक व्याख्या इस प्रकार है (अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों प्रपन्नों को सुन्दरता पूर्वक ४१वें सूत्र में समझाते है। हम अपने पूर्वाचार्यों के दया गुण को समझकर बढ़ाई कर सकते हैं जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४३वें सूत्र में स्वयं को अज्ञर कहते है – हालाँकि वे बहुत शिक्षित विद्वान हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सुन्दरता से समझाते हैं कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अपने नैच्यानुसंधान द्वारा अपने आप को इस श्रेणी में शामिल करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या इस सूत्र के लिये बड़ी स्फूर्तिदायक और समझने में आसान है)।
    • अज्ञ अर्थात वह जिसे थोड़ा भी स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि का ज्ञान न हो। हम स्वयं इसके लिये एक अच्छे उदाहरण है। ये वह हैं जिन्होंने अज्ञान और अयोग्यता के कारण स्व प्रयत्न (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, जिन्हें शास्त्र में भगवान से मिलने की प्रक्रिया माना है) का त्याग कर दिया है।
    • ज्ञानाधिकार का अर्थ है वह जो इन सभी अर्थात स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि तत्वों में स्पष्ट हो और जो दूसरों को यह समझा सके। वह जो ज्ञान और अनुष्ठान से पूर्ण हो। हमारे पूर्वाचार्य इसके अच्छे उदाहरण है। वे पूर्ण ज्ञानी थे और स्वप्रयत्न के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम थे, परंतु यह जानकार कि स्वप्रयत्न और जीवात्मा का दास्य स्वभाव एक दूसरे से विपरित है उन्होंने स्वप्रयत्न का त्याग कर पूर्णत: भगवान की शरण हो गये।
    • भक्ति परवसर अर्थात वह जो भगवान के नामस्मरण को पूर्ण निष्ठा से करने मात्र से पिघल जाते हैं। आल्वार इसके लिये सही उदाहरण हैं। हालाँकि आल्वारों पर भगवान की निर्हेतुक कृपा है, भगवान के प्रति अति प्रेम और भक्ति के कारण ही वे स्वाभाविकता से स्वप्रयत्न कर नहीं पाते थे। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं “कलैवाय थुंबम कलैयातोलिवाय कलैकण मट्रिलेन” – आप मेरी विपत्ती दूर करो या नहीं मैं तो आपके शरण में हूँ – आपको मेरी रक्षा करनी ही है। वे आगे कहते है “उन्नालल्लाल यावरालुम ओंरुम कुरै वेण्देन .. उन थाल पिडित्ते सेलक्काणे” – मुझे दूसरों से आप के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहिये – मैं सर्वथा आपके चरण कमलों पर निर्भर रहूँगा।
  • मनुष्य धर्म के विपरित बर्ताव करना बाधा है। मनुष्य की विशेष योग्यता है कृत्य अकृत्य विवेक (इसका ज्ञान होना कि क्या करना है और क्या नहीं करना है)। इस आधार पर मनुष्य जीवन का उपयोग करना चाहिये। शास्त्र कहता है इधम कुरु (यह करो यह आपके लिये लाभप्रद है) और इधम माकार्षी: (यह मत करो यह हानिकारक है)। हमें इसे समझकर अपने जीवन में इसका पालन करने की कोशिश करनी चाहिये। सभ्यता और मानवता अर्थात यह सोचना कि “सभी को शान्ती और खुशी से रहना चाहिये” – ऐसा सच्चा हृदय सभी के पास होना चाहिये। इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये। इसके विपरित बर्ताव करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव गुणों को देखने से पूर्व हमें मनुष्य के सभी के प्रति सामान्य स्वभाव को जानना चाहिये। शिक्षित / सभ्य आचरण का अर्थ तत्वों और सम्मान के आधार पर जीवन व्यतित करना। और यह भी कहा गया है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन सभी जीवमात्र के लिये सामान्य है। सभी कीड़े, बिल्ली, कुत्ते, मानव जनों के लिये यह ४ तत्व किसी न किसी रूप में अस्तिव में रहते हैं। इस जीवन के जन्म मरण के चक्र से छुटकारा पाना मनुष्य में विशेष सामार्थ्य है। जिसे शास्त्रानुसार एक आचार्य द्वारा समझा जा सकता है। भगवान जीवात्मा को रचते समय कृपा कर शरीर और इन्द्रियाँ दिये हैं। वे इस शास्त्र को ब्रह्मा, ऋषि और आल्वारों के द्वारा बताते हैं। इन्द्रियों का प्रयोग कर मनुष्य इन तत्वों को समझकर और इस शरीर को कैंकर्य में लगा सकता है। अगर यह कर सकते है तो जीवात्मा का अध्यात्मिक कल्याण होगा। अगर नहीं कर सका तो उसे जो यह कृपा कर मानव शरीर प्राप्त हुआ है वह व्यर्थ हो जायेगा।
  • स्वयं को उपर उठाने के लिये स्व प्रयत्न करना बाधा है। प्रारम्भ में प्रपन्न धर्म की चर्चा हुई है। एक प्रपन्न को भगवान के पूर्ण शरण होना चाहिये और कभी भी स्वप्रयत्न नहीं करना चाहिये। यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव शेषत्व और पारतंत्रय के विपरित है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान पर पूर्ण निर्भर अर्थात किसी भी कीमत पर स्वप्रयत्न का त्याग करना। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें निरर्थक बैठकर कुछ भी कार्य नहीं करना है। इसका अर्थ है हमें कैंकर्य में लगना चाहिये परन्तु इसे कैंकर्य समझकर करना नाकि इसके बदले में कुछ प्राप्त होगा।
  • प्रपत्ति करने के पूर्व ही यह मांगना कि मैं पवित्र हो जाऊँ, यह बाधा है। भगवान को पूर्ण शरण के रूप में स्वीकार करने के लिये प्रपत्ति एक मानसिक स्थिति है। इसे कोई विशेष स्थान, समय, परिस्थिति, आदि की जरूरत नहीं है और इसे ऐसे ही अनुसरण किया जा सकता है। जब द्रौपदी मानहीन होने के खतरे में थी तो उसने पुकारा “हा कृष्णा! रक्षमाम शरणागताम” (कृष्ण! इस शरण में आये हुये आत्मा की रक्षा करों) पूरी तरह पूर्ण विश्वास से अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर – हालाँकि वह रजस्वला थी – फिर भी भगवान कृष्ण द्वारा उसकी रक्षा हुई। उसी तरह जब विभीषण भगवान श्रीराम के शरण में आये तब उसने स्नान भी नहीं किया था हालाँकि वह समुन्द्र के उपर ही था – उसने आकाश से ही भगवान की शरण ली। जब कोई पवित्र या अपवित्र हो तो वह उसी परिस्थिति में भगवान के शरण हो सकता है। प्रपत्ति प्राप्त करने के पूर्व किसी को भी अपनी स्थिति को बदलने की आवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में प्रपत्ति के विषय पर विस्तार से चर्चा की गयी है। ३०वें सूत्र में इसी तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस विषय को सुन्दरता से स्पष्ट करते है। यह समझने की कोई बात नहीं है कि प्रपत्ति करने के पूर्व स्वयं को पवित्र करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई यह आश्चर्य कर सकता है कि कोई प्रपत्ति करने के पूर्व पवित्र होने की जरूरत क्यों नहीं है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं और समझाते हैं कि द्रौपदी और अर्जुन (पहले के सूत्र में अर्जुन को शरणागति के पवित्र सिद्धान्तों के विषय में समझाया गया है कि इस मध्य में जो बहुत नीच व दीन हैं जिन्होंने देखा है कि स्वयं भगवान कृष्ण अर्जुन की सहायता कर रहे हैं फिर भी वे धर्मयुद्ध के विपरीत हैं।) को देख कोई यह सोच भी सकता है कि “मैं अपवित्र हो सकता हूँ ताकि मैं प्रपत्ति करने के लिये शिक्षित हो जाऊँ”। परन्तु इसकी जरूरत नहीं है और इसे करना भी नहीं चाहिये। बुनियादी तौर पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते हैं कि जानबूझ कर भी किसी भी परिस्थिति में हमें निषिद्ध कार्यों में नहीं लगना चाहिये। अगले सूत्र में इससे सम्बंधित श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी लंका जाने के लिये एक सुन्दर प्रमाण को दर्शाते हैं। जब श्रीराम स्वयं समुन्द्र की शरण होते है तब वें पहले स्नान करते हैं। श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी समझाते है कि भगवान श्रीराम के लिये स्नान करना स्वाभाविक है – यह प्रपत्ति का एक अंग नहीं है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि प्रपत्ति स्वतन्त्र उपाय है जो किसी की प्रार्थना पर निर्भर नहीं होती है।
  • नित्य कर्मानुष्ठान का त्याग करना जो भगवान के सेवक के लिये स्वाभाविक है बाधा है। नित्य कर्म का पालन करना यह आम नियम है। इसे भगवद आज्ञा कैंकर्य के रूप में देखा जाना चाहिये। हमें अपने नित्य कर्म (जैसे संध्या वंधन, आदि) का त्याग करने का कोई अधिकार नहीं है। इस विषय पर बहुत चर्चा हो चुकी है। इस पर ध्यान करो और स्पष्ट रहो। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ८२वें सूत्र में कहा गया है कि “तिरुक्कण्णमंगै आण्डान स्व व्यापारत्तै विट्टान” – तिरुक्कण्णमंगै आण्डान अपना सभी व्यक्तिगत कार्य का त्याग कर दिये। वे पूर्ण विश्वास के उपर स्थित थे और इसलिये स्व प्रयत्न का त्याग कर दिये। उपदेश रत्नमाला के ५५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “एल्लार्कुमण्डाददन्नो अदु” – श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्वों का बहुत कम जन पालन कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आण्डान अपनी स्व प्रयत्न के सभी कार्यों का त्याग कर पूर्णत: कैंकर्य में लग गये। नित्य कर्मानुष्ठान के तहत जब तक भगवद कैंकर्य में कोई रुकावट नहीं है उसे न चूके करना चाहिये। परन्तु जब हम भगवद कैंकर्य में लगे हुए होते है तब नित्य कर्मानुष्ठान को उस समय के लिये छोड़ सकते हैं। आचार्य हृदय के ३१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है “…अत्ताणिच चेवकत्तिल पोधुवानधु नलुवुम” – जब भगवद / भागवतों की विशेष सेवा करते हैं तब सामान्य नियम का त्याग कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते है कि हमारे पूर्वाचार्य बिना चूके नित्य कर्मानुष्ठान करते थे इन सांसारिक जनों के प्रति दया रखकर जो वैदिक को देख पथभ्रष्ट हो जाते और वैदिक अनुष्ठान का त्याग कर देते है।
  • उन व्यक्ति के संग में रहना जो नित्य कर्मानुष्ठान नहीं करते है बाधा है। श्रीवैष्णव सन्यासी को भी शिखा, यज्ञोपवित, आदि को रखकर नित्य कर्मानुष्ठान करना चाहिये। यह कहा जाता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी १२० वर्ष की आयु में भी संध्या वंधन के समय खड़े होकर अर्ज्ञ देते थे। अनुवादक टिप्पणी: अगर यह नियम सन्यासी के लिये है तो अन्य जैसे गृहस्थ, ब्राह्मण, आदि का क्या कहना – उन्हें भी अपने अपने कर्मानुष्ठान करना चाहिये। जब हम ऐसे जनों के संग में रहते हैं जो कर्मानुष्ठान नहीं करते हैं तो हम भी उनके जैसे हो जाते हैं। इसलिये यह कहा जाता है कि ऐसे संगत से बचना चाहिये।
  • यह न जानना कि तिरुमन्त्र में फिर से जन्म लेना उत्तम जन्म है, बाधा है। तिरुमन्त्र में जन्म का अर्थ है ज्ञान जन्म – स्वयं के सच्चे स्वभाव का पवित्र ज्ञान को प्राप्त करना। तिरुमाला में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी, श्रीवेदांती स्वामीजी से कहते है कि “तिरुमंत्रत्तिले पिरंतु ध्वयत्तिले वलर्न्तु ध्वयैक निष्ठरावीर” – हमें तिरुमन्त्र में जन्म लेना चाहिये, द्वय महामन्त्र में बड़ा होना चाहिये और केवल द्वयम में हीं पूर्ण निष्ठा होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवेदांती स्वामीजी सन्यासाश्रम को स्वीकार करते है और अपने आचार्य श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के साथ रहने हेतु श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते है तब वे राह में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी से भेंट करते है। उस समय श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी पर ग़ुस्सा कर कहते है कि आप गृहस्थ रहकर भी द्वय महामन्त्र में विश्वास रख, अपने आचार्य की सेवा कर सकते थे। हम नायनार के आचार्य हृदय के ३३वें चूर्णिकै में ज्ञान जन्म विषय के प्रारम्भ में इसे देख चुके है।
  • यह न जानना कि अन्य मंत्रों में जन्म लेने से हमारे स्वरूप की बहुत बड़ी हानी होगी। यह बाधा है। पिछले तथ्य में तिरुमन्त्र द्वारा दीक्षा को समझाया गया है – इसमें द्वय महामन्त्र और चरम श्लोक भी आते हैं क्योंकि वें तिरुमन्त्र के विस्तार / व्याख्या है। यहाँ अन्य मन्त्र का अर्थ है देवतान्तर के मन्त्र। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी में शुरू में हीं श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अन्य मंत्रों पर तिरुमन्त्र की स्तुति को समझाते है। पहले वे तीन मुख्य मन्त्र की महिमा को समझाते हैं – तिरुमन्त्र (अष्टाक्षरी), वासुदेव मन्त्र (तिरु द्वादक्षारी) और विष्णु मन्त्र (सदाक्षरी)। इन तीनों में तिरुमन्त्र को अधिक उच्च समझते है क्योंकि कि वे अर्थ-पञ्चक के स्वभाव को समझाते है – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, लक्ष्य और विरोधी को मूल तरिके से समझाते है। क्योंकि तिरुमन्त्र अन्य मन्त्र के मुक़ाबले अर्थ-पञ्चक को अधिक स्पष्टता से समझाता है इसलिये वह सर्वश्रेष्ठ है।
  • कोयिलिल वालुम वैष्णवन” – वह जो सेवा करता है, श्रीरंगम में रहता है और यह उसके लिये मुख्य पहचान है। यह न जानना बाधा है। यह श्रीरंगनाथ भगवान का श्रीरामानुज स्वामीजी को आदेश है – “यावच्चरिरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” – इस संसार में अपने बचे हुए समय को श्रीरंगम में खुशी से बिताओं। क्योंकि यह सभी के लिये सम्भव नहीं है इसलिये इसमें सभी दिव्य देशों को शामिल करना चाहिये। वैष्णव का यहाँ अर्थ है वह जो द्वय महामन्त्र की ओर स्पष्ट है। खरा अर्थात स्पष्ट ज्ञान होना और जो सीखा है उसको अभ्यास में लाना। श्रीवैष्णवों का आचरण इस तरह होना चाहिये कि हमारी पहिचान “परम सात्विक, परम प्रामाणिकर (आधिकारिक)”, आदि ऐसे होनी चाहिये। कृपया तिरुमालै के ३८वें पाशुर को देखिये – “…काम्बरत्तलै शिरैत्तुन कडैत्तलै इरुन्दु वालुम शोम्बरै उगत्ति…”। अनुवादक टिप्पणी: तिरुमालै के ३८वें पाशुर की स्तुति श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै स्वामीजी इस तरह करते है “विस्तारपूर्वक द्वय महामन्त्र कि व्याख्या”। विशेषकर पाशुर के इस भाग में स्वयं को उपायान्तर से पूरी तरह अलग करना दर्शाया है। स्वयं के केश (बाल) देना अर्थात अहंकार का त्याग करना क्योंकि पुराने जमाने में जब किसी को नीचा दिखाना होता तो उसके केश काट देते थे। उसी तरह हमें स्व प्रयत्न का पूर्ण त्याग कर अपनी रक्षा के लिये भगवान की शरणागति करनी चाहिये। ऐसे व्यक्ति को “चोम्बर” (आलसी) ऐसा समझाया गया है। परन्तु किसी को “वालुम चोम्बर” (हर्षित आलसी व्यक्ति) भी होना चाहिये – वह जो स्वयं के सच्चे स्वभाव को जान सकता है, भगवद/भागवतों के कैंकर्य में निरत होता है और उसके कारण आनन्द से रहता है। ऐसे जन भगवान को नित्यसुरियों के समान प्रिय है।
  • पहिचान / नाम / प्रतिष्ठा की प्राप्ति अपने गाँव / जाति / परिवार, आदि के कारण पाता है वह व्यर्थ है। यह न जानना बाधा है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ७८वें सूत्र में इसे समझाया गया है – “ग्रामलकुलाधिगलाल वरुम पेर अनर्त्त हेतु”। ग्राम अर्थात गाँव। कुल अर्थात जाति / परिवार। क्योंकि ऐसी आदत घमण्ड की ओर ले जाता है (उदाहरण कि तौर पर: “मैंने ऐसे दिव्य देश में जन्म लिया है” या “मैंने ऐसे महान आचार्य पुरुष परिवार में जन्म लिया है”) और अन्त में यह हमारे नम्र श्रीवैष्णव होने के स्वभाव को लुप्त करता है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीपाञ्चरत्न से अपने वाख्या के समर्थन में एक प्रमाण देते है। “एकांति व्यपथेश्तव्यो नैव ग्रामकुलाधिभि: विष्णुना व्यपथेश्तव्यो तस्य सर्वम स एव हि” – जो भगवान के पूर्ण शरण हो गया हो उसकी पहचान उसके जन्मस्थान या परिवार से नहीं होती है जहाँ उसने जन्म लिया है। उसकी पहिचान भगवान से सम्बन्ध से होता है। ऐसे भक्तों के लिये स्वयं भगवान ही उसके जन्मस्थान, परिवार, आदि हैं।
  • प्रपन्न जन कूटसत्तर परांकुश, आदि है। यह न जानना बाधा है। कूटस्त्त सामान्यतया एक परिवार रूपी पेड़ में सबसे पहिले व्यक्ति के लिये उपयोग करते है। आचार्य हृदय के ३६वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है कि “विप्रर्क्कु गोत्र शरण सूत्र कुठस्तर पराशर पाराशर्य बोधायनाधिगल; प्रपन्न जन कुठस्तर परांकुश परकाल यतिवराधिगल” – ब्राह्मणों के लिये उनके मुख्य पूर्वज (उनके गोत्र, सरणा (वेद का एक भाग जिसे उन्हें पढ़ना है), सूत्र (शास्त्र का एक अंग जो कर्मानुष्ठान को दिशा निर्देश करता है)) ऋषियों जैसे पराशर, व्यास, बोधायन को मान सकते है; श्रीवैष्णवों के लिये जिन्होंने शरणागति के राह को चुना है उनके लिये श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी ही मुख्य पूर्वज है। वैदिक कर्मानुष्ठान को करते समय हमें प्रणाम, अभिवादन, आदि करना पढ़ता है। परन्तु प्रपन्नों के लिये उन्हें कभी भी आल्वरों और आचार्य के सम्बन्ध से पहचान बताना है क्योंकि यह वे है जिन्होंने जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को बताया है जो कि भगवद और भागवतों के दास बनकर उनके शरण होते हैं।
  • ऋषिगण जो अभी तक संसार में पारिवारिक जीवन में लगे है और जो श्रीवैष्णव होकर भी अपने पूर्वज के दिये हुए अब तक पत्ते खाते है। यह न मानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के ५८ से ६२ चूर्णिकै में ऋषि और श्रीशठकोप स्वामीजी के मध्य के अन्तर को बड़ी सुन्दरता से दर्शाया गया है। चूर्णिकै ५८ – ऋषि वे हैं जो ध्यान, योग, आदि में लगे हुए रहते हैं और स्वयं को स्वपरिश्रम से एक उच्च स्थिति में ले जाते हैं। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी पर स्वयं भगवान ने निर्हेतुक कृपा किये है और भगवान के गुणों का ज्ञान होने के कारण वे उनके प्रति प्रेम और भक्ति से पूर्ण हो गये। चूर्णिकै ५९ – ऋषि बहुत बड़े ज्ञानी थे फिर भी संसार लगाव उनमें था (कई उदाहरण है जहाँ बड़े साधु सांसारिक चाह के कारण पकड़े गये है और अन्त में उस परिस्थिति से बाहर आते और फिर पकड़े जाते)। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी सांसारिक चाह से पूरी तरह पृथक थे। चूर्णिकै ६० – उच्च जीवन के रहन सहन के कारण ऋषि वन में रहकर कच्चे फल, सब्जी, पत्ते, जल और कभी कभी हवा भी पाते है। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी निरन्तर भगवान कृष्ण का स्मरण करते रहे – वे स्वयं श्रीसहस्रगीति में कहते है “उण्णुम सोरु परुगुम निर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन” – मेरा प्रसाद, जल, ताम्बूल सभी कृष्ण हीं है। चूर्णिकै ६१ – अपने पुत्र के बिछड़ने से जो दुख होता है (व्यासजी को बड़ा दुख हुआ जब उनका पुत्र सुखा उन्हें अकेला छोड़ चला गया) वह दुख श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान से बिछड़ने से महसूस करते है। चूर्णिकै ६२ – हालाँकि ऋषि बहुत समझदार होते हैं परन्तु कभी कभी फलान्तर, साधनान्तर और देवतान्तर के प्रति अपना लगाव प्रगट कर देते है। परन्तु आल्वार पूरी तरह भगवान के प्रति अपने कैंकर्य की ओर निरत थे। केवल भगवान ही उपाय और उपेय और केवल भगवान की अर्चा विग्रह हीं पूजनीय हैं। ऋषि और आल्वार के इस भेद के कारण ही प्रपन्नों के लिये अपने पूर्वज ही आल्वार और आचार्य हैं इसे स्वीकार करना चाहिये।
  • श्रीसहस्रगीति को पूरे ध्यान से न पढ़ना और उसमें बताये हुए तत्वों का पालन न करना जो हमें एक सच्चा श्रीवैष्णव बनाता है, बाधा है। आचार्य हृदय के ३७ चूर्णिकै में अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार यह समझाते है कि “अध्ययन ज्ञान अनुष्ठानंगलाले ब्राह्मणयमागिराप्पोले चंदनगलायिरमुम अरियक कट्रु वल्लारानाल वैष्णवत्व सिद्धि” – जैसे एक ब्राह्मण का ब्राह्मणत्त्व वेदों के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है वैसे ही एक वैष्णव की वैष्णवता श्रीसहस्रगीति के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है। यहाँ अरिया का अर्थ है एक आचार्य से श्रीसहस्रगीति का अध्ययन करना; कर्रु का अर्थ एक आचार्य से भगवद विषय कालक्षेप का अध्ययन करना; वल्लार का अर्थ है वह जो अपने स्वयं के जीवन में सीखे हुए तत्वों को अपने जीवन में उतारना। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियककट्रु वल्लार वैट्टणवर आल्कदल ज्ञालत्तुल्ले” – जिसने श्रीसहस्रगीति का अर्थानुसन्धान किया है और जो इसको अपने जीवन में उतारता है वही इस संसार में वैष्णव माना गया है।
  • यह न जानना कि किसी का वर्ण जो घमण्ड की ओर ले जा सकता है और भागवत अपचार कराता है। इसका त्याग न करना बाधा है। कोई भी वर्ण का क्यों न हो एक वैष्णव अर्थात वह भगवद और भागवतों के कैंकर्य में निरत होना चाहिये। एक उच्च वर्ण में जन्म लेने का घमण्ड होना भागवत अपचार कराता है और इसलिये इस बर्ताव का त्याग करना चाहिये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुमला गये तब श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी (जो उनके मामाजी और आचार्य थे) स्वयं बाहर आकर उनका स्वागत किये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने पूछा किसी ओर को क्यों न भेजा तो उत्तर दिये कि “जब मैंने देखा तो मुझसे हीन और कोई नहीं दिखा” – यह उनकी नम्रता थी। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” के २०७ से २१७वें सूत्र में इस विषय पर चर्चा विस्तार से हो गयी है। शास्त्र में सामान्यता वेदाध्यन जो भगवद विषय पर केन्द्रित है ब्राह्मण वर्ण  को उत्कृष्ठ माना गया है। परन्तु केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेना और इसका पालन करने से भी घमण्ड आ सकता है। इसलिये श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह स्थापित किये कि “जन्म जो घमण्ड का कारण हो” वह निकृष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य होने से उपायान्तर (अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति, आदि) में भी लगा सकते है ताकि वे वेदाध्यन करे। अत: में वों घोषित करते हैं कि “जन्म जो नम्रता प्रदान करता है और उपायान्तर से दूर रखता है वही उत्कृष्ठ जन्म है”। आचार्य हृदय के ८५ चूर्णीकै में अजगिया मणवाल पेरुमाल नायनार इस तत्व को विस्तार से समझाते हैं। यह बड़ा पेचिदा पहलू है – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या को कालक्षेप की तरह एक आचार्य के सन्निधी में उसका गूढ़ार्थ समझने हेतु सुनना चाहिये।
  • यह न जानना कि वर्णाश्रम प्रथा जिससे उपायान्तर में आसानी से कार्य रत हो सकते हैं और अपने आप को शिष्ट या नम्र मानता है (प्राकृतिक नम्रता के बदले) नीचता है बाधा है। श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है “नैच्यम जन्म सिद्धम” – नम्रता एक स्वाभाविक गुण है। जीवात्मा स्वाभाविकता से ही नित्य भगवान का सेवक है। हम किसी भी वर्ण में क्यों न हो हममें स्वाभाविक नम्रता होनी चाहिये उसे कल्पना नहीं करना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी भी कहते हैं “नीर नुमधु एनरिवै वेर मुधल माय्त्तु” – हमें पूरी तरह अपना अहंकार और ममकार का त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में यह समझाया गया है कि क्षुद्र वर्ण के लिये नम्रता जो सच्ची भक्ति के लिये आवश्यक है वह उनमे स्वाभाविक गुण है और इसी कारण से वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं है, उपायान्तर में कोई सम्बन्ध नहीं है – इसलिये वैष्णव बनने के लिये वें अधिक योग्य है। अन्य वर्ण में यह सम्भव नहीं है। हमें घमण्ड का त्याग कर भगवान और भागवतों का नम्र दास बनना चाहिये।
  • यह न जानना कि जन्म जो हमें पूर्ण उपायान्तर से दूर कर देता है और स्वाभाविक नम्रता प्रदान करता है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है हमें स्वाभाविक नम्रता की चाहना करना चाहिये और भगवान की शरण होना चाहिये – केवल ऐसे व्यक्ति श्रीवैष्णव बनने के योग्य है।
  • यह न जानना कि छोटे जनों के दोष बड़े लोगों के पवित्र दृष्टि से पराजित हो जाते है, बाधा है। जब महान श्रीवैष्णव किसी की ओर करुणा से देखते है तब उस मनुष्य के सभी दोष मिट जाते है। जब एक श्रीवैष्णव का लड़का पथभ्रष्ट होकर जाता है और लौटने पर पवित्र हो जाता है तो उसके पिताजी पूंछते है कि “क्या तुम्हें श्रीकुरेश स्वामीजी ने देखा और यह कृपा किये?” – पवित्र श्रीवैष्णवों की ऐसी योग्यता है जो सभी दोष और अशुभ को मिटा देते है।
  • अहंकार, आदि दोषों को निकाले बिना पवित्र श्रीवैष्णवों के संग में रहना और उन्हें पीड़ा पहुँचाना बाधा है।
  • दिव्य रत्न जैसे श्रीवैष्णवों पर शंका करना और उनकी योग्यता पर सन्देह करना बाधा है। वर्ण की पहचान किये बिना पवित्र श्रीवैष्णवों को दिव्य रत्न कहते है। हमें कभी भी उन पर सन्देह नहीं करना चाहिये नाही दूसरों को पवित्र करने की उनकी योग्यता पर सन्देह करना चाहिये। हम यहाँ स्मरण कर सकते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं स्नान के पश्चात श्रीदाशरथी स्वामीजी के कन्धो को पकड़ते थे जो बाह्मण नहीं थे। इसलिये उनकी पवित्रता पर कोई शंका नहीं है।
  • यह न मानना कि ऐसे महान ज्ञानी हमारे आचार्य से भी अच्छे और भगवान से भी बड़े है, बाधा है। एक बार जिसे भगवद विषय में विश्वास हो गया हो चाहे वह किसी वर्ण, परिवार, आदि का क्यों न हो – उसे एक बार हमारे आचार्य के बराबर सम्मानित किया जाना चाहिये। वे भगवान से भी बड़े है। पेरिय तिरुमोळि में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “निन तिरुवेट्टेलुत्तुम कट्रु यानुट्रतु उन्नडियार्क्कु अडिमै” – तिरुमन्त्र सीखने के पश्चात मैंने यह समझा है कि मैं आपके दासों का दास हूँ। सामान्यतय भागवतों को भगवान से भी अदिक पूजना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी “नेदुमारकदिमल” पादिगम में यह स्थापित करते है कि भागवत जन हीं उनके स्वामी है और “पयिलुम चुडरोलि” पादिगम में यह प्रमाणित करते है कि भागवत जन उनके कैंकर्य के पदार्थ है। आगे कहते है “पयिलुम चुडरोलि मुर्त्तियैप पंगयक कण्णनै पयिल इनिय नम पारकडल चेरन्ध परमनै पयिलुम तिरुवुदैयार यवरेलुम अवर कण्डीर्पयिलुम पिरप्पिदै थोरु एम्मै आलुम परमरे” – वह जो भी हो अगर वह दीप्तिमान भगवान जिनके कमल नयन हो और जो क्षीरसागर में विराजमान हो उनकी पूजा करता हो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से मुझे नियन्त्रण में रख सकता है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २२२वें सूत्र से आचार्य साम्यम के तत्व और भगवान से भी बड़ा को समझाया गया है। यहाँ वह समझाते है कि आचार्य स्वयं शिष्य को दिशानिर्देश करते है कि अन्य श्रीवैष्णव को स्वयं आचार्य जैसे अच्छा मानने के लिये, सभी शिष्यों को आचार्य के समान मानना। आगे कहते हैं श्रीवैष्णव भगवान से उच्च है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इन पहलू को अपने व्याख्या में स्थापित कर समझाते है। वह कहते है जीवात्मा को भगवान कभी कभी उसके कर्म के आधार पर इस संसार में रखते है परंतु श्रीवैष्णवों को अपने निर्हेतुक दया कृपा से मोक्ष ही प्रदान करते है। जब जीवात्मा भगवान के शरण आते हैं तो भगवान अम्माजी के पुरुषाकार से ही स्वीकार करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव उनके निकट आते ही उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। भगवान जो दिव्य देशों में अर्चा रूप में विराजमान हैं जहाँ वे किसी से वार्ता नहीं करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव दूसरों के स्वभाव अनुसार उनसे उचित कैंकर्य करवाते है। इसलिये भगवान से भी अदिक स्तुति श्रीवैष्णवों की होती है।
  • वैष्णव होकर देवतान्तर में थोड़ा भी लगना बाधा है। देवतान्तर सम्बन्ध वैष्णवों के लिये दाग है। यह केवल वैष्णवता को नष्ट करेगा। इसलिये इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इससे सम्बंधित हम कई घटनायें देख चुके है। एक बार श्रीरंगनाथ भगवान की सवारी के समय ज़ोर वर्षा हो रही थी और उन्हें एक मण्डप में ले जाया गया जो कि तिरुवानैक्कावल शिवजी का मन्दिर था। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी अन्दर नहीं गये और कहा कि “भगवान स्वतन्त्र हैं वे कही भी जा सकते हैं परन्तु हम उनके सेवक हैं इसलिये हम देवतान्तर के मन्दिर में नहीं जा सकते है”। श्रीधनुर्दास स्वामीजी के भतीजे जो पक्के श्रीवैष्णव थे उन्हें धोखे से जैन मन्दिर में ले जाया गया जो विष्णु का मन्दिर जैसे दिखता था। जब उन्हें यह पता चला तो दोनों मूर्छित हो गये और जब श्रीधनुर्दास स्वामीजी की चरण रज उनके माथे पे लगायी गई तब उन्हें होश आया। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को एक बार अनुमान हुआ कि उनका अवैष्णव से सम्पर्क हुआ तो उनकी माता की सलाह से उन्होंने एक ब्राह्मण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर स्वयं को पवित्र किया। ऐसी कई घटनायें हैं जहाँ हमारे पूर्वाचार्य देवतान्तर सम्बन्ध से बचे हैं।
  • अन्य के जन्म के प्रथा का पालन कर स्वयं के सम्प्रदाय के विश्वास को खोना बाधा है। जब कोई वैष्णव बनता है तो दूसरे धर्मों की ओर लगाव का त्याग करना चाहिये। उदाहरण के तौर पर भस्म, आदि लगाना हमारा वैष्णव सम्प्रदाय के प्रति आस्था को कम करता है। अनुवादक टिप्पणी: इसे स्वधर्म पालन करने का एक पहलू ऐसे भी देखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक श्रीवैष्णव अगर वह ब्राह्मण है तो उसे अपने नियमानुसार रहना चाहिये नाकि एक क्षत्रीय या वैश्य के नियमानुसार रहना चाहिये। हम जिस किसी भी वर्ण में रहे उस वर्ण में रहकर भी श्रीवैष्णवता का पालन कर स्पष्ट रूप से नम्रता, पूजा, सेवा, आदि से रह सकते है। हमें वर्ण बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि शास्त्र का यह अपमान कर केवल गड़बड़ी होगी। हमारे पूर्वाचार्य भी केवल वैष्णवता और वर्णाश्रम धर्म को महत्त्व देने को कहे है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/08/virodhi-pariharangal-34.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३२)

६७) आश्रम विरोधी – अपने आश्रम में बाधाएं (जीवन का स्तर)

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आश्रम अर्थात जीवन का स्तर। वैदिक सम्प्रदाय में जीवन के ४ स्तर पहचाने गये है – ब्रह्मचर्य (उपनयन के पश्चात और विवाह से पूर्व), गृहस्थ (गृहस्थाश्रम – विवाहित जीवन), वानप्रस्थ (स्त्री के साथ वन में अलग से जीवन व्यतित करना) और सन्यास (जिसे तुरियाश्रम, उत्तमाश्रम भी कहते है – तपस्वी – अकेले रहना)। किसी आश्रम में रहने के लिये हर आश्रम के अलग अलग नियम और दिशा निर्देश है। सभी को अपने आश्रम के दिशा निर्देश को सीखना और बिना चूके पालन करना है। उस आश्रम के दिशा निर्देश के विपरित रहना बाधा है। विषय की लम्बाई को देखते हुए हर आश्रम के दिशा निर्देश को नहीं बताया गया है।

अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्रानुसार मनुष्य के जीवन को चार स्तर में बाँटा गया है।

पहला स्तर है ब्रह्मचर्य (विध्यार्थी / अविवाहित जीवन)। जब एक लड़का यज्ञोपवित संस्कार और ब्रह्मोपदेश (अपने आचार्य से पवित्र मन्त्र प्राप्त करना) प्राप्त करता है तब से प्रारम्भ होता है। हम आगे वर्ण के विषय में चर्चा करेंगे। केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य वर्णवाले ही यज्ञोपवित और ब्रह्मोपदेश प्राप्त करते हैं। वर्णानुसार यज्ञोपवित को इस आयु में ही प्राप्त करते हैं (ब्राह्मण – ८ वर्ष, क्षत्रीय – ११ वर्ष और वैश्य – १२ वर्ष; उम्र की गणना माँ का गर्भ धारण के समय से होती है)। एक बार ब्रह्मोपदेश प्राप्त हो जाने पर वह बालक वेद और उससे जुड़े विषयों को गुरुकुल में आचार्य के सन्निधी में शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। सामान्यत: वह बालक आचार्य के साथ उनके तिरुमाली- गुरुकुल में रहता है। वह लम्बे समय तक वहाँ शिक्षा प्राप्त करता है और मूल ग्रन्थ और वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण, स्मृति, आदि की अर्थ सहित शिक्षा प्राप्त करता है। क्षत्रीय बालक धनुर विद्या कि शिक्षा प्राप्त करता है – लड़ाई और शस्त्र का विज्ञान। शिक्षा प्राप्ति के समय विध्यार्थी को अपने शिक्षक के शारीरिक जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है। विध्यार्थी जंगल जाकर लकड़ी इकट्ठा कर लाएंगे, भोजन के लिये भिक्षा भी मांगेंगे, आदि। जो भी दान प्राप्त होता है उसे शिक्षक को दिया जाता है और शिक्षक उसे विध्यार्थी को सही तरीके से प्रयोग करने को कहता है। विध्यार्थी भी गुरु की अच्छे से सेवा करते हैं। ब्रह्मचार्य का एक और अर्थ है ब्रह्म विध्या पर केंद्रित होना और एक साधारण और अलग से जीवन व्यतीत करना। आनन्द और खुशी के लिये कोई स्थान नहीं है जैसे सुगंधित द्रव्य लगाना, ताम्बूल पाना, आदि। जीवन के इस स्तर पर अगर सही शिक्षा प्राप्त हो तो वह पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित होगा और आध्यात्मिक जीवन की ओर सही रवैया रहेगा।

फिर जब वह गुरुकुल से बाहर आता है तो वह युवा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य हो जाता है। गृहस्थाश्रम विवाहित जीवन है। जब कोई वैदिक विवाह के बन्धन में बंध जाता है तो वह अपनी स्त्री की रक्षा करने कि प्रतिज्ञा करता है। वह यह भी वचन लेता है कि उससे जो संतान जन्म लेगी उसे भी सही वैदिक धर्म में शिक्षा प्रदान करायेगा। भागवत में ऋषभ देव (भगवान के एक अवतार) कहते हैं हमें देव, पति, आचार्य और पिता का स्थान तभी ग्रहण करना चाहिये जब हम स्वयं पर निर्भर जनों को मोक्ष की राह पर ले जाने के लिये सक्षम हो। गृहस्थ का मुख्य कर्तव्य ब्रह्मचारी और सन्यासी का ध्यान रखना हैं। गृहस्थाश्रम जनों को चाहिये कि वे अनपेक्षित अतिथि का बड़े आदर से स्वागत कर उनका ध्यान रखें। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी गृहस्थाश्रम में सही तरीके से रहनेवाले कि “नल्ल कोट्पट्टुलगन्गल् ……….नल्ल पथत्ताल मनै वाल्वार कोण्ड पेण्डिर् मक्कले” ऐसे स्तुति करते है। यह पदिगम “नेदुमार्कदिमै” भागवतों के प्रति कैंकर्य के महत्त्व और स्तुति को स्थापित करता है। इस पदिगम के अन्त में श्रीशठकोप स्वामीजी यह कहते हैं कि जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों की सेवा पर केन्द्रित है उनका गृहस्थाश्रम जीवन बहुत सुन्दर होगा जो ऐसे कैंकर्य पर केन्द्रित होगा वह इस संसार में भी एक सुन्दर जीवन व्यतीत करेगा। यहाँ श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से एक मुख्य तत्त्व को समझाते है – वे कहते हैं आदर्श परिवार का अर्थ है जब पति श्रीवैष्णवों की सेवा करना चाहता है तो उसकी पत्नी और बच्चे भी उसी के विचार पर चलेंगे और सेवा भी करेंगे नाकि स्वार्थी बन बैठेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी शेल्व नम्बी के जीवन की एक घटना को उदाहरण के तौर पर दर्शाते हैं। सेल्व नम्बी जिनकी श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी बहुत प्रशंसा किये है हमारे पूर्वाचार्यों ने भी अपने व्याख्यानों में उन्हें एक आदर्श गृहस्थ कहा है। एक बार जब वे बाहर गये हुये थे तो कुछ श्रीवैष्णव उनके तिरुमाली में पधारे जिनका उनकी पत्नी ने स्वागत किया। परन्तु उसे जब पता चला कि उनके प्रसाद हेतु उसके पास चावल नहीं है तो उसने अगले साल की खेती के लिये जो धान (इसे बहुमूल्य माना जाता है क्योंकि अगले साल की जीविका उस पर ही निर्भर है) बचा के रखा था उस धान से चावल निकालकर उन अतिथि के लिये प्रसाद बनाती है। जब सेल्व नम्बी लौटकर आते है तो धान के विषय में पत्नी से पूछते है। वह कहती है “मैंने अभी धान को बो दिया है जिसका फल श्रीवैकुण्ठ में प्राप्त होगा” अर्थात “मैंने उसे श्रीवैष्णवों को दे दिया है और यही उच्च कैंकर्य है”। यह सुनकर सेल्व नम्भी अत्यन्त आनंदित होते है – ऐसा सेल्व नम्बी और उनकी पत्नी का समर्पण भाव था। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी तोण्डनूर, एच्चान, आदि का उदाहरण देते हैं कि कैसे वे गृहस्थ जीवन भक्तों का कैंकर्य करते हुए निर्वाह करते हैं।

अगला आश्रम है वानप्रस्थम (दम्पति का वन में अलग अलग रहना)। एक अवस्था के पश्चात (५० वर्ष के बाद) दम्पति अपनी दिनचर्या से सन्यास लेकर वन की ओर प्रस्थान कर वहाँ निवास करते हैं। यह क्यों जरूरी हैं? क्योंकि जब यहीं कार्य अपने बच्चों, सम्बन्धियों के संग निरन्तर करते रहेंगे तो हम इसके आदि हो जाते हैं और भगवान की ओर अपना ध्यान कम कर देते है। जीवन का एक बहुमूल्य पहलू है भगवान के विषय में निरन्तर ध्यान करना। अपनी जरूरतों को कम से कम करना और अलग-अलग साधारण ढंग से जीवन निर्वाह करने से यह कार्य आसान हो जाता है। इस स्तर पर एक साधारण तिरुमाली में निवास करता है, साधारण प्रसाद बनाता है जो भी वन में उपलब्ध हो, कम से कम वस्त्र हो और पूरे समय भगवान का ध्यान करना। ऋषी मुनि जो वन में है उनकी सेवा का अवसर भी प्राप्त होता है। परन्तु श्रीवैष्णवों का जीवन पहले ही से साधारण है जो अर्चावतार भगवान और भागवतों के कैंकर्य मे लगा हुआ है और जिनको भगवान की स्तुति सुनने का बहुत अवसर प्राप्त होता है इसलिये उन्हें वानप्रस्थम आश्रम अलग से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

अन्तिम आश्रम है सन्यासाश्रम। इस अवस्था में मनुष्य अपने सभी लगावों का त्याग कर सन्यासी हो जाता है। सन्यासाश्रम अर्थात धन, परिवार, सम्बन्धी, आदि का त्याग कर पूर्णत: भगवद विषय में समय व्यतीत करना। श्रीवैष्णव सन्यासी को परमहंस परिवारजाक आचार्य से जाना जाता है। परमहंस का अर्थ बहुत बुद्धीमान जैसे हंस जो जल को दूध से (सार को असार) अलग करता है। और हंस को दलदल / किचड़ में आसानी से रहने की आदत है लेकिन उससे प्रभावित नहीं होते हैं – उसी तरह सन्यासी जो इस सांसारिक दुनिया में रहता है उसे सांसारिक सुख से कुछ भी फरक नहीं पड़ता है। ब्रह्मचर्य में जैसे ब्रह्म विध्या के निर्देशानुसार और सांसारिक सुख को सही तरीके से पालन करना चाहिये। परिवारजाक आचार्य का अर्थ है वह जो निरंतर भ्रमण करता है और सभी को उच्च ज्ञान प्रदान करता है। वे न केवल उपदेश देते हैं अपितु वे उच्च तत्त्वों के उदाहरण हैं। और श्रीवैष्णव सन्यासी के पास त्रीदण्ड, कमण्डल, शिखा, यज्ञोपवित, आदि होता है। श्रीयादव प्रकाशाचार्य अन्त में श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना गुरु मानकर और उनसे सन्यासाश्रम ग्रहण कर एक नूतन नाम गोविन्दाचार्य पाते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य को निर्देश देते हैं कि सन्यासाश्रम के तत्त्वों पर शास्त्र के आधार पर एक लेख तैयार करें और जिसका परिणाम है “यति धर्म समुच्चयम”। हालाकि सन्यासी एक स्थान पर ३ दिन से अधिक नहीं रह सकते हैं परन्तु श्रीवैष्णव सन्यासी एक मठ (दिव्य देश के मन्दिर से जुड़े) में रहते है और उच्च तत्त्वों को सिखाते है। फिर भी कई सन्यासी भ्रमण कर उच्च ज्ञान का प्रसार प्रचार करते है।

हमने आश्रम रीति को थोडा देखा है। जहाँ आश्रम पद्धत्ती पुरुषों के लिये है महिलाओं की जीवन शैली भी पुरुषों के आश्रम अनुसार बदलती रहती है। सामान्यता स्त्री का पालन पोषण उसके विवाह तक उसके पिता करते है तत् पश्चात उसका पति करता है। पति के वैकुंठवास होने के पश्चात उसके बच्चे करते है। यही वैदिक धर्म है। स्त्री का पालन पोषण बहुत अच्छे से होता है और वह समाज और तिरुमाली में एक अहम भूमिका निभाती है। सामान्यता वह यह सुन्दर तत्व अपने पिता और पति से आसानी से सीख लेती है। वह अपने बच्चो को कम उम्र में ही सांच देती है और भविष्य के लिये तैयार कर देती है। एक पत्नी जैसे अपने पति के कैंकर्य में मदद करती है। चाहे वह तिरुवाराधन हो या अतिथि सत्कार हो वह पति के कैंकर्य में शामील होती है। सामान्यतया एक निर्मल वातावरण में वे दोनों शास्त्र के ज्ञान और समझ को आसानी से विकसित कर सकते हैं। धर्म शास्त्र में यह कहा गया है कि अगर हमारे आचरण, अनुष्ठान, आदि में कुछ भी शंका हो तो एक बुजुर्ग औरत से ही पूंछकर उसे स्पष्ट कर लेना चाहिये – ऐसे वैदिक परिवारों में औरतों का स्थान था। श्रीकुरेश स्वामीजी की धर्मपत्नी आण्डाल, पिल्लै उरंग विल्ली धासर की धर्मपत्नी पोण्णाचियार, श्रीकोंगिलाचान की धर्मपत्नी कोंगिल पिराट्टी, आदि कुछ जाने माने श्रीवैष्णव हैं जिनकी ज्ञान, अनुष्ठान और कैंकर्य के लिये उनकी बढ़ाई हुई है। ऐसे कई उदाहरण हैं। इस परिचय के साथ इस अंश को देखेंगे।

यह मानना कि मैं एक आश्राम से हूँ और यह न मानना कि मैं केवल भगवान का सेवक हूँ,  बाधा है। कोई किसी भी आश्रम से क्यों न हो परन्तु जीवात्मा का स्वरूप शेषत्व और पारतंत्रय है। “दास भूता स्वस्थस सर्वे” सामान्य प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा अप्रधान / दासत्त्व /भगवान के सेवक है। यह सेवा नित्य और शाश्वत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार सुन्दरता से कैंकर्य के महत्त्व को सामान्य कर्मानुष्ठान से दर्शाते है। ३१वें चूर्णिकै में कहते “जात्याश्रम दीक्शैकलिल भेदिक्कुम धर्मंगलपोले अत्ताणिच चेवगत्तिल पोधुवानतु नलुवुम” – जैसे धर्म के कुछ पहलू को छोड़ देते है उनके वर्ण, आश्राम, संकल्प के आधार पर जब कोई भगवान और भागवतों की एकान्तिक कैंकर्य कर रहा हो तो इस कैंकर्य के समय सामान्य वर्णाश्रम, धर्म अनुष्ठान का त्याग किया जा सकता है। इस चूर्णिकै के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या बहुत सुन्दर है। वह बड़ी सुन्दरता से वर्ण, आश्रम और दीक्षा को समझाते है और फिर यह समझाते है की एक सच्चे ज्ञान प्राप्त करनेवाले मनुष्य के लिये कैसे सामान्य धर्म अनुष्ठान तुच्छ हो जाता है। अन्त में वह इस तरह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य अभी तक अपने वर्ण/आश्रम अनुष्ठान का बड़े दया से पालन किये हैं। इसलिये हमे यह समझना चाहिये कि जब हम कैंकर्य में हो तो कर्मानुष्ठान का त्याग कर सकते हैं या कुछ समय पश्चात कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी यथार्थ में इसे बताये है – एक बार संध्या के समय जब वे नम्पेरुमाल का कैंकर्य कर रहे थे तो किसी ने उन्हें यह स्मरण कराया कि संध्यावंदन का समय हो गया है तो उन्होंने कहा कि हम अभी कैंकर्य में हैं तो उस पल की चिन्ता करने कि जरूरत नहीं है।

  • उत्तमाश्रम (सन्यासी) में होने का घमण्ड करना बाधा है। जब कोई सन्यासी बन जाता है तो कई जन उसके चरणों में आकर उसकी पूजा और स्तुति “यति”, “जीयर स्वामी”, आदि कहकर करते है, क्योंकि सन्यासी कठोर जीवन बिताते हैं। परन्तु सन्यासी को स्तुति सुनकर घमण्ड नहीं करना चाहिये – उन्हें यह निरन्तर सोचना चाहिये कि वह भगवान और भागवतों के सेवक हैं और उसके अनुसार रहना चाहिये।
  • अवैष्णव आश्रमी (सन्यासी) स्वपच से भी हीन होता है। यह न जानना बाधा है। स्वपच अर्थात जो कुत्ते को पकाकर खाता है। आश्रमी यहाँ सन्यासी को कहते हैं। क्योंकि अवैष्णव आश्रमी शिखा, यज्ञोपवित, नित्यकर्म जैसे संध्यावन्धन, आदि का त्याग कर देते हैं और मुख्य बात वे भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वोंत्तम नहीं मानते इसलिये उन्हें हीन समझना चाहिये। ऐसे अवैष्णव सन्यासी को पाखण्डी कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार भागवतों की महिमा बड़े विस्तार से समझाते है। वो उन जनों का उपहास भी करते है जो की अपने वर्ण और आश्रम पर केन्द्रीत होते हैं न कि वर्णाश्रम के धर्म के तत्त्वों को समझने की ओर जो भगवान श्रीमन्नारायण के पूजा की ओर है। ८६ चूर्णिकै में वे समझाते है वह वर्ण, आश्रम, ज्ञान और अनुष्ठान जो भगवान पर केन्द्रीत न हो वह निरर्थक है। सन्यासी जिसमें भक्ति न हो वह स्वपच से भी नीचा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी पहलू को बड़े सुन्दरता से शास्त्र के प्रमाण सहित समझाते हैं। वे कहते हैं “श्वपचोपि महिपाल विष्णुभक्तो ध्विजातिक: विष्णु भक्ति विहिनस्तु यतिच्च स्वपचाधम” – जब एक स्वपच पूर्णत: भगवान विष्णु की पूजा करता है तो उसे ब्राह्मण और सन्यासी से भी बड़ा समझना चाहिये। अगर वह भगवान विष्णु की पूजा नहीं करता है तो वह स्वपच से भी गिरा हुआ है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने २१७ सूत्र में इसी तत्त्व को समझाया है।
  • अपने स्वयं के आश्रम में सेवा कैंकर्य भाव नहीं होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये वे जो भी कर्म करते हैं वह कैंकर्य का एक हिस्सा हो जाता है। मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१वें सूत्र में यह समझाते हैं कि “कर्मम कैंकर्यत्थिले पुगुम” – प्रपन्नों द्वारा शास्त्रानुसार जो भी कार्य किया जाता है उसे भगवान की सेवा ही समझी जाती है। इसलिये हमारे कर्म को सेवा भाव से ही करना चाहिये।
  • अन्य के आश्रम को विपरीत आदर देना बाधा है। हाथ, पैर, आदि धोने के लिये जल सभी श्रीवैष्णवों को देना चाहिये। परन्तु चन्दन का लेप, पुष्प, ताम्बूल, सुपारी, आदि ब्रह्मचारी और सन्यासियों को निवेदन नहीं करना चाहिये। इसके जैसे अन्य कई तत्त्व भी हैं जिन्हे अपने अपने आश्रम के सम्बन्ध में समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र ३०३ और ३०४ में भगवद अपचार के विषय में विस्तार से समझाते है। एक ऐसा अपचार वहाँ पहचाना गया हैं “वर्णाश्रम विपरीतमान उपचारम”– अन्य को सम्मान करते समय वह कार्य को वर्णाश्रम धर्म के विपरित है। क्योंकि वर्णाश्रम शास्त्र द्वारा स्थापित किया गया है और जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय है, हमें इसमें दिये हुए दिशा निर्देशानुसार चलना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिये कुछ सुन्दर उदाहरण देते हैं – क्षुद्र का वेद मन्त्र का उच्चारण करना अन्यों के सम्मान के लिये (जो केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य हीं उच्चारण कर सकते है), सन्यासी का ताम्बूल, सुपारी, आदि का अर्पण करना, आदि कर्म। इसलिये हमें बड़ी सावधानी से उस कार्य से बचना चाहिये जो हमारे वर्ण और आश्रम के लिये वर्जित है।
  • उच्च तत्त्वों को समझने के पश्चात भी अगर कोई सामान्य धर्म का त्याग करने से डरता है तो यह बाधा है। इसे हम पहले ही विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। एक बार हम जीवात्मा के सच्चे स्वभाव जैसे नित्य दास इसको समझलें तब कैंकर्य कर्मानुष्ठान से भी उच्च हो जाता है।
  • अपने आश्रम के विपरीत कार्य करना बाधा है। हमें इससे बचना चाहिये। उदाहरण के तौर पर यह कहा गया है कि सन्यासी को अग्नि से दूर रहना चाहिये और इसलिये वे होम, यज्ञ, आदि को करने से अयोग्य हो जाते है। वे भोजन भी नहीं बना सकते हैं क्योंकि उसमें अग्नि लगती है। वे पान, ताम्बूल भी भगवान (स्वयं के अर्चाविग्रह) के तिरुवाराधन के समय अर्पण नहीं कर सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सभी आश्रम में कई बंधन है – ब्रह्मचारी और सन्यासी को कठोर जीवन बिताना चाहिये। ब्रह्मचारीयों को ज्ञान प्राप्त करने में और आचार्य सेवा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। गृहस्थ को भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य, सन्यासीयों कि सेवा, आदि पर केन्द्रीत होना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। सन्यासी को दिव्य ज्ञान का प्रचार सभी के लिये करना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये। सभी भागवतों को किसी भी आश्रम से क्यों न हो भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य में निरत होना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये।
  • ऐसे बाधाओं का त्याग न करना जो अपने आश्रम के विपरित हो बाधा है।
  • सन्यासी होने के कारण स्वयं को महान मानना और आचार्य कैंकर्य करने में शर्म करना बाधा है। श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होने पर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की सेवा किये जो एक गृहस्थ थे। उसी तरह श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल जीयर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की सेवा किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (सन्यास ग्रहण करने से पूर्व) कि सेवा किये। ये घटनायें हमें दिखाती हैं कि शिष्य का आचार्य की जो किसी भी आश्रम में हो सेवा करने का महत्त्व। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होकर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की बड़े आदर पूर्वक पूजा किये। एक बार जब वे अपने आचार्य की पालकी सेवा कर रहे थे तब उन्होंने कहा कि अगर यह त्रीदण्ड मेरे आचार्य की सेवा के मध्य में आता है तो मैं उसे तोड़ कर फेंक दूँगा। श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव था और उनके प्रति छोटे से छोटा कैंकर्य भी किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बनकर उनकी सेवा किये। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि शिष्य अगर सन्यासी हो तो भी उन्हैं अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये यद्यपि आचार्य गृहस्थ हो।
  • हमें अपने आश्रम के लक्ष्य को सीखना और समझना चाहिये और अपने आश्रम की सीमा में रहकर आचरण करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ११

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

१०१) पिरिविल् गुणानुसन्धानम् पण्णि दरिक्कलाम् । अवन् सन्निदियिल् अवनैयोऴिय अरैक्षणमुम् मुकम् मारियिरुक्कुमतुक्कु मेर्पट्ट मुडिविल्लै

              सीता पिराट्टि श्रीरामचन्द्र और आण्डाळ् नाच्चियार् श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए

भगवद्विप्रलम्भ भाव मे, हमे भगवान् के दिव्य कल्याण गुणों का चिन्तन और अनुसन्धान करना चाहिये । परन्तु उनके समक्ष यानि उनके सङ्ग मे, हम अपने नेत्र और उन पर केन्द्रित विचारों को क्षण भर भी अलग नही कर सकते है । उनकी उपस्थिति मे अन्य वस्तु पर विचार करने का नीचाति नीच कार्य और कुछ भी नही है ।

अनुवादक की टिप्पणि — सीता पिराट्टि ने अशोक वन मे स्वयं का निर्वाह मात्र केवल भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य कल्याण गुणों का आश्रय लेकर इन गुणों का चिन्तन और अनुसन्धान किया । इस संसार मे रहते हुए आऴ्वारों ने भी भगवान् के दिव्य कल्याण गुणों का आश्रय लिया और विभिन्न दिव्यदेश सेवाओं मे सम्लग्न थे । परन्तु भगवती श्री आण्डाल देवी इन सभी से अलग थी । आण्डाल देवी प्रश्न करती है कि – मात्र गुणानुसन्धान से मै स्वयं की यह विप्रलम्भ भावोत्पन्न दुःख को कैसे दूर करूँ ? यह प्रश्न उस स्थिति से उत्पन्न हुआ है जब इनका विप्रलम्भ भाव इनको बहुत दुःख देने लगा । यही भाव भगवती श्री नाच्चियार तिरुमोळि ८.३ पद मे कहती हैं – गोविन्दन् गुणम् पाडि आविकात्तिरुप्पेने । देखिये क्या भाव है । इसी लिये तो वह सबसे अलग श्रेणि मे थी । जब भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन हो, हम स्वतः भगवान् के अतिरिक्त कुछ और भी नही देख सकते है । विष्णुसूक्त मे कहा गया है यथा – “सदा पश्यन्ति सूर्यः ” । अर्थात् नित्यसूरिगण सदैव भगवान् का ही दर्शन करते है । अमलनादिपिरान दिव्यप्रबन्ध मे तिरुप्पाणाळ्वार कहते हैं – “एन् अमुदिनैक् कण्ड कण्गळ् मत्तोन्रिनैक् काणावे” अर्थात् मेरे इन उभय नेत्रों को अमृत रूपी श्रीरङ्गनाथ का स्वरूप के अतिरिक्त कुछ और दर्शन ही नही करना है ।

१०२) तन्तामयरियाविट्टाल् आप्तर्वायिले केट्टरियवेणुम्

भगवद्रामानुजाचार्य और शिष्य वृन्द – आदर्श आचार्य और आदर्श शिष्य

जब जीव स्वस्वरूप ज्ञान से अनभिज्ञ रहता है तो ज्ञानराशिस्वरूप आचार्य से यह ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ।

अनुवादक की टिप्पणि — जीवात्मा भगवान् का नित्य दास है । वह प्राप्त जड़ शरीर से भिन्न है । जब तक वह इस ज्ञान को यथारूप मे नही समझता है उसको तुरन्त आचार्य का उपागम प्राप्त करना चाहिए । आप्त का अर्थ है विश्वसनीय स्त्रोत । एक आचार्य जो अटूट आध्यात्मिक परम्परा जो भगवान् से प्रारम्भ होता है मे आते हैं वह अत्यन्त विश्वसनीय स्त्रोत हैं क्यों कि वह पूर्णतया शास्त्र पर निर्भर हैं और स्वयं भी आत्म-सिध्द हैं अतः दूसरों को यह सारभूततत्त्व समझाने के योग्य हैं । भगवान् श्री कृष्ण भगवद्गीता ४.३४ मे कहते हैं – तद्विद्धि प्रणिपातेन परि प्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः – अर्थात् उस व्यक्तित्व का सान्निध्य प्राप्त करो जो जिसने सत्य का दर्शन किया है, उसकी सेवा करो और भजो मन से । ऐसा गुरु जो स्वरूपसिद्ध तुम्हे यथार्थ ज्ञान प्रदान कर सकते है क्योंकि उन्होने सत्या का दर्शन किया है ।

१०३) आर्तनुक्कन्रो पलप्राप्तियुळ्ळतु

नम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामी) – जल्द भगवद्धाम पहुँचना चाहते थे

आर्त वह है जो इस भौतिक जगत मे स्वयं के निर्वाह को कठिन मानकर दुःखी होता है मानो जैसे अग्नी के कुण्ड मे बैठा हो । ऐसे भगवद्भक्त जो भगवान् पर पूर्णतया निर्भर है और इस शरीर और भौतिक जगत् से मुक्त होना चाहते है, मोक्ष प्राप्ति उनके लिये निश्चित है ।

अनुवादक की टिप्पणि — हमारे सत्साम्प्रदाय मे पूर्वाचार्य कहते हैं – दो प्रकार के प्रपन्न भक्त होते हैं यथा – 1) आर्त प्रपन्न (वह प्रपन्नात्मा जो एक और क्षण इस भौतिक जगत् मे नही रहना चाहता है) और तृप्त प्रपन्न (वह जो भगवद्-भागवत कैङ्कर्य करते हुए कुछ और समय तक इस भौतिक जगत् मे निर्वाह कर सकता है) । इन दोनों मे आर्त प्रपन्न को उच्चश्रेणि का माना गया है और उनकि मानसिक परिस्थिति समझाया गया है यथा – एक और क्षण इस अनित्य संसार मे नही रहने की इच्छा मानो जैसे अग्नी मे खडे हो । इस संसार की अग्नी उनको दहने लगी और असहनीय पीडा का अनुभव होने लगता है । वह शीघ्र इस संसार से मुक्त होकर परमपद मे पूर्णरूपेण भगवद्-कैङ्कर्य करना चाहते हैं । श्रीशठकोप स्वामी जी और अन्य आऴ्वार आर्तप्रपन्न की श्रेणि के अनन्य भक्त शिरोमणि हैं जैसे हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं । श्रीशठकोप स्वामी प्रथम पासुर मे ही स्वयं की आर्तता को दर्शाते हुए कहते हैं – इस दास से और प्रतीक्षा नही होगी । मै और एक क्षण इस संसार मे रहने मे असक्षम हूँ ।

१०४) पुरुषकारम् मुन्नागत् तनपक्कल् पुगुन्तार्क्कुत्तन् तिरुवुळ्ळमिरन्गुम्

भगवती सीता देवी काकासुर को  भगवान् श्रीरामचन्द्र के प्रकोप से बचाते हुए

जब हम भगवान् का सान्निध्य भगवती (पिराट्टि) के पुरुषकार से प्राप्त करते हैं, भगवान् कृपा कर रक्षा करते हैं ।

अनुवादक टिप्पणि : पुरुषकार शब्द का क्या अर्थ है ? पुरुषकार का अर्थ इस प्रकार से है – वह कार्य जिसके माध्यम से नेक मनुष्य स्व-वचनबद्धता और स्वयं के विशेष गुणों को न्यायसङ्गत सिद्ध करता है । यहां पुरुषकार शब्द श्रीमहालक्ष्मी की ओर इंगित है जो भगवद्-विमुख एवं दुराचारी पापी जीवों को भगवान् के चरणों का सन्मार्ग मे लाने की विशेष भूमिका का कार्य निभाती हैं और इन जीवों के लिये भगवान् से विशेष प्रार्थना करती हैं ताकी भगवान् इन जीवों को अपना सके । ऐसे जीवों को स्व-चरणों का आश्रय देकर भगवान् मे कृपा, दया, वात्सल्येत्यादि गुण प्रकाशित होते हैं । कदापि इसका यह अर्थ नही की भगवान् मे ये गुण अलब्ध है परन्तु श्रीमहालक्ष्मी के विशेष अनुनय से भगवान् मे ये गुण स्वतः प्रकाशित होते हैं । श्रीमहालक्ष्मी का यह अनुरोधाभिनय है । जब हम भगवान् का सान्निध्य इस अनुरोध माध्यम से नहीं जाएंगे या प्राप्त नही करेंगे, (तो) जीवों के प्रति तटस्थ-स्वभाव भगवान् का होना और जीवों के कर्मााधार पर उन जीवों को यथोचित दण्ड देना का गुण प्रकाशित हो सकता है क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र हैं । इसी लिए कहते कि भगवान् का सान्निध्य (को) भगवती श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से ही प्राप्त करना है । पिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि मे इस विषय को लोकमान्य उदाहरण से समझाते हैं ।

१०५) संसारि मुक्तनानाल् अवनुडैय लीलोबकारणमुम् बोगोपकरणमुम् सममाय्त् तोट्ट्रक्कडवतु । आकान्तरमाण स्मृतियिल्लैये । तदीयत्वाकारत्ताले नित्य विभूतियोडोक्कत् तोट्टृमत्तनै

जब एक संसारि जीव (वह जीवात्मा जो भवसागर मे बद्ध है) मुक्त (भवसागर से मुक्ति पाकर परमपद पहुँचता है) होता है तो ऐसे मुक्त जीवों को भवसागर (लीला-विभूति) और भगवद्धाम (नित्य-विभूति) सदृश्य है । चूंकि मुक्तात्मा के विचार अब और कर्म-बद्ध नही है, अतः वह परलोक और इहलोक मे भेद नही करता क्योंकि यह दोनों ही भगवान् की सम्पत्ति है और पूर्णतया उनके अधीन मे है ।

अनुवादक की टिप्पणि : भगवान् सर्वव्यापी है । जब एक बद्ध जीवात्मा कर्म बन्धन से मुक्त होकर मुक्तात्मा होता है, वह भगवान् के सर्वव्यापकत्व को समझता है । यह ऐसी अवस्था है जब जीव समस्त वस्तुओं को स्वयं के अनुकूल मानता है । इसी कारणार्थ आऴ्वारों ने भगवान् के बहुरंगाभिव्यक्तित्व भौतिक जगत् का स्तवन किया है । श्रीशठकोप स्वामी इस बहुरंगाभिव्यक्तित्व भौतिक जगत् से स्तंभित है जिसका वैभव भगवान् ने स्वयं श्रीशठकोप स्वामी को तिरुवाय्मोऴि के ७.८  “माया वामने” पदिग (पासुर-दशक) मे दिखाया है । ” भगवान् का समस्त वस्तुओं मे सर्वव्यापकत्व, जीवात्माओं के लिए सदैव अनुकूल है ” इस भाव का अर्थ स्वयं पिळ्ळै लोकाचार्य ने यथा युक्त रीति से तत्त्वत्रय के चित-प्रकरण मे समझाया है और यथारूप समझने के लिए श्रीवरवरमुनि की व्याख्या अत्यन्त लाभ कारी है । श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी स्वयं उदाहरण देकर कहते हैं – जैसे एक राजा के सु्न्दर राज भवन और विकराल कारागृह होते है परन्तु राज कुमार के लिए दोनों ही उसकी संपत्ति है । यथाभाव मे मुक्तात्माओं (या आऴ्वार जो इन मुक्तात्माओं के सदृश्य है या उनसे बेहतर है जब वह बद्धजीव थे) के लिए भगवत्संपत्ति (लीला और नित्य) विभूति दोनो ही सुखदायक है । यह भी तिरुवाय्मोऴि के ६.३.१ की व्याख्या मे समझाया गया है ।

१०६) स्वरूपम् विसतमानाल् नान् एन्नवुमाय् अडियेन् एन्नवुमाय्क काणिरुप्पतु

जब जीवात्मा का स्वस्वरूप ज्ञान यथार्थ भाव मे समझ जाए, तब ‘मै अर्थात् जीवात्मा’ शरीर नही अपितु आत्मा है और “मै भगवान् का नित्य दास हूँ” भाव दृढ़ता से स्थापित होता है ।

अनुवादक की टिप्पणि : तिरुवाय्मोऴि ८.८ – “कङ्गळ् शिवन्दु …” दशक मे, भगवान् जीवात्मा के स्वरूप तत्व को प्रकाशित करते हैं । इस दशक के प्रथम और द्वितीय पासुर मे, भगवान् प्रथमतः स्वस्वरूप और स्वयं की महत्ता दर्शाते हैं । तदनन्तर पासुरों मे, भगवान् , जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप और महत्ता को प्रकाशित करते है । इस दशक के द्वितीय पासुर मे, श्रीशठकोप स्वामी कहते हैं – “अडियेन्‌ उळ्ळान् उडल् उळ्ळान् …” अर्थात् आप (भगवान्) जीवात्मा (अडियेन्‌ – यह दास) के अन्तर निवासी (अन्तर्यामी अर्थात् जो जीवात्मा मे परमात्मा स्वरूप मे विराजमान) है । श्रीशठकोप स्वामी विशेषतः यहाँ “एन् (अहम् वा मै)” शब्द का प्रयोग न कर “अडियेन्‌” शब्द का प्रयोग कर यह स्थापित करते हैं कि मुख्यतः जीवात्मा परमात्मा का नित्य दास है । अन्ततोगत्वा यह जीवात्मा शरीर से भिन्न है क्यों कि श्रीशठकोप स्वामी तुरन्त कहते हैं “उडल् उळ्ळान्” अर्थात् परमात्मा स्वरूप भगवान् मेरे अंदर विराजमान हैं ।

१०७) अभिमत विषयत्तै पिरिन्ताल् काण्डतेल्लाम् अतुवाय्त्तोत्तुम्

      श्रीसीता माता की खोज़ मे भगवान् श्रीराम
जब हम अपने प्रिय या प्रियतमा से विछिन्न या विलग होते हैं, तो वह सब उस व्यक्ति की तरह दिखेगा।
अनुवादक की टिप्पणि :

श्रीशठकोप स्वामी तिरुवाय्मोऴि ७.५.२ पासुर मे भगवान् श्रीरामचन्द्र के असंख्य एवं अपरिमित गुणों का वर्णन करते हैं । कर्म से बन्धित एक जीवात्मा की तुलना मे भगवान् श्रीरामचन्द्र को अनेक दुःखों को भोगना पड़ा जैसे उनकी प्रियतमा श्री सीता मैया से वियोग अर्थात् श्रीसीता मैया का राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण । श्रीमद्रामायण मे श्रीवाल्मीकि भगवान् कहते हैं जब श्रीसीता मैया का राक्षसराज रावण के द्वारा अपहरण होने के बाद, भगवान् श्रीरामचन्द्र अधोमुख होकर प्रियतमा श्रीसीता मैया को ढूँढना प्रारंभ करते हैं । इस विरह दशा के संभ्रम मे भगवान् श्रीरामचन्द्र को हर दृष्टिकोण, हर वस्तु मे श्रीसीता मैया ही दिखने लगी । ठीक इसी प्रकार इस दशक गाथा मे विप्रलंभ भाव मे पूरित श्रीशठकोप स्वामी को सर्वत्र और सर्व वस्तु भगवान् के संबंधित दृग्गोचर हुई । इस उक्त वाक्य की पुष्ठि श्रीशठकोप स्वामी के तिरुवाय्मोऴि ४.४ मण्णै इरुन्दु तुऴावि पदिग (दशक) मे दृग्गोचर है । इस विषय की और अधिक पुष्ठि और स्पष्टीकरण श्रीवरवरमुनि स्वामी तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि ३४वें पासुर मे करते हैं

यथा

मन्नुलगिल् मुन्कलन्दु माल्पिरिगयैयाल्
मारन् पेण्णिलमयैयाय्क्कादल् पित्तेरि
एन्निदिल् मुन् पोलि मुदलान पोरुलै अवनाय्निनैन्दु
मेल्विऴुन्दान् मयल्दनिन् वीरु

अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् श्रीशठकोप स्वामी को दिव्य मानसिक अनुभव का सर्वप्रथम देते है । तदनन्तर श्रीशठकोप स्वामी को अनुभूति प्रदानकर भगवान् अन्तर्धान हो गए । भगवान् के अन्तर्धान होने से श्रीशठकोप स्वामी के मानस मे प्रगट विप्रलंभ भाव से उनको और अत्यन्त कष्ट हुआ । तत्पश्चात् अपरिमित भगवद्-प्रेम के प्रभाव प्रवाह से श्रीशठकोप स्वामी एक गोपकन्या (पराङ्कुशनायकी) का मानसिक रूप धारण कर भगवान् से तुल्य वस्तुओं को देखकर उनको स्वयं भगवान् मानने लगे और पुनः इन तुल्य वस्तुओं को देखकर अपरिहार्य भावावेश से संभ्रांत हुए ।

१०८) शेषियोरुवनानाल् शेषवस्तुक्कळेल्लाम् ओरुमिडरायिरुक्कुमिरे । ओरुवनक्कुप् पलवडिमै उण्डानै तङ्गळिल् एल्लार्गळुमोत्तिरुप्पर्गळिरे कृत सङ्गेदिगळाय् ।

पूर्वाचार्यों ने एक दूसरे से केवल भगवान् के विभिन्न माधुर्य लीलाओं की चर्चा से अपना समय बिताया है

भगवान् ही सभी चेतनाचेतनों के परम स्वामी एवं सर्वशेषी है । उनके सभी भक्तों का मनोभाव एक जैसा होता है । जब इस जगत् के किसी भी क्षेत्र का राजा है, उनके एक स्थिति वाले सेवकगण एक दूसरे से अपने राजा के वैभव चर्चा मे अपना समय व्यतीत करते हैं ।

अनुवादक की टिप्पणि :  इसी तरह भगवद्भक्त भगवद्-चर्चा मे अपना समय व्यतीत करते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता १०.९ श्लोक मे अपने भक्तों के स्वभाव और दिव्य कार्यों का वर्णन करते हुए कहते हैं

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ।

निरंतर मुझ में मन लगाने वाले और मुझ में ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं ।

१०९) तन्नैयोऴिन्त वस्तुक्कळेल्लावत्तुक्कुम् कोटि विकारत्तैप् पण्णि अविकृतनायिरुप्पान् ओरुवनिरे ईश्वरन्

आरावमुदन् (तिरुक्कुदन्तै – कुम्भकोणम) और श्रीशठकोप स्वामी (आऴ्वार्-तिरुनगरि)

सभी चेतना चेतनों के स्वामी अर्थात् भगवान् को अविकाराय शुद्धाय शब्दों से श्री भीष्म पितामह ने सहस्रनाम मे संबोधित किया है  । अविकाराय अर्थात् अविकारि वा अपरिवर्तनशील । शुद्धाय अर्थात् परम सात्विक वा विशुद्ध । हालांकि भगवान् अविकारि वा अपरिवर्तनशील है परन्तु उनसे भिन्न सभी वस्तुओं मे विकार वा परिवर्तन को प्रवृत्त करते है ।

अनुवादक की टिप्पणि : तिरुवाय्मोऴि ४.८.१ पासुर में, श्रीशठकोप स्वामी कुम्भकोणम मे स्थित तिरुक्कुदन्तै दिव्यदेश के एम्पेरुमान् आरावमुदन् के सौन्दर्य का वर्णन कर रहे है की उनका अर्चा सौन्दर्य इतना अद्भुत है कि यह दास (श्रीशठकोप स्वामी) पूर्णतया द्रवित हो गया । ऐसे दिव्यदेश और अभिमान क्षेत्र अनेक है जिनके अर्चा प्रभाव से अन्य आऴ्वार् एवं आचार्यगण द्रवित हो गए । भगवान् को अविकारि वा अपरिवर्तनशील कहने मे तात्पर्य केवल यह है की भगवान् कर्म से बाध्य नहीं है । जीवों के प्रति दया, कृपा इत्यादि भगवद्गुणों के प्रभाव स्वरूपोत्पन्न भावों से भगवान् मे विकारत्व प्रतीत होता है ।

११०) वस्तु सत्भावम् कोळ्ळुम्पोतु विशेषणम् व्यावर्त्तकमायल्लतिरातु । ओन्ऱुक्कोन्ऱु विशेषणमाम्पोतु, अन्ययोगव्यवच्छेदम् पण्णिक्कोण्डल्लतु विशेषमागमात्ततु

मोक्ष दर्शाने वाला शास्त्र सदैव सविशेष (सगुण) ब्रह्मम् का ही प्रतिपादन करता है । एक वस्तु को जानते वा परखते समय, (उस) वस्तु के विशेष गुण (उस) वस्तु को अन्य वस्तुओं से भिन्न करता है ।  किसी भी वस्तु के गुण (उस) वस्तु का विशेष गुण एवं गुण तब माना नहीं जाएगा जब तक वह गुण उस वस्तु को दूसरें वस्तुओं के भिन्न करें ।

अनुवादक की टिप्पणि : “अयोग्य-व्यवच्छेदम्” अर्थात् वह वस्तु जो एक से अधिक गुणों से अभिज्ञात है । “अन्ययोग्य-व्यवच्छेदम्” अर्थात् वह वस्तु जो वस्तु विशेष गुण से अभिज्ञात है अर्थात् वह विशेष गुण केवल उसी वस्तु मे निहित है । उदाहरणार्थ अनन्त-शायित्व गुण वह गुण है जो केवल भगवान् श्रीमन नारायण के लिए ही अनुकूल और उनमे ही निहित है और यह गुण किसी अन्य वस्तु के लिए अनुकूल कदापि नहीं है । तिरुवाय्मोऴि के ६.३.१ पासुर नल्कुरुवम् चेल्वुम् के सन्दर्भ मे, श्रीनम्पिळ्ळै इस पङ्क्ति को निर्दिष्ट करते है । इस दशक मे भगवान् के विरुद्ध-विभूति का वर्णन करते हुए श्रीशठकोप स्वामी कहते है चेतनाचेन वस्तुओं का आश्रय भगवान् है और भगवान् मे विरोधाभास भाव है । उदाहरणार्थ — श्रीशठकोप स्वामी कहते है भगवान् दरिद्रता-धनता, स्वर्ग-नरक, मित्रता-रिपुता, इत्यादि विरोधाभास गुणों के धाम है । देखिए, वास्तविक्ता मे कोई भी वस्तु मे विरोधाभास गुणो का सामंजस्य होना असंभव है । लेकिन भगवान् से भिन्न वस्तुओं का आश्रय भी भगवान् ही है अत एव भगवान् मे ऐसे विरोधाभास गुण प्रतीत या प्रकाशित होते है । इस दशक मे श्रीशठकोप स्वामी भगवान् के विरोधाभास गुणों का आस्वादन कर परमानंद की अनुभूति प्राप्त करते है ।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-11.html

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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९१ ) शेषत्वम् आत्मावुक्कु स्वरूपमानाल् देहत्तुक्कु विरोधियाय् निर्कुम् निलै कुलैन्दु

यथा आत्म दास्यम् हरेः स्वाम्यं  अर्थात् भगवान् श्रीमन्नारायण ही परमात्मा एवं सर्व शेषी है और अन्य चेतन उनके शेष व दास है । जीवात्मा अगर यह समझ जावें तो जीवात्माके भौतिक शरीर को अऴुक्कु उडम्बु नही माना जाएगा ।

अनुवादक टिप्पणी ः प्रायः मनुष्य देह को आध्यात्मिकता के दृष्टिकोण से बाधा माना जाता है क्योंकि देहात्मक बुद्धि और देहाभिमान हमे भगवद्विमुख कर देते है। लेकिन जीव जब वास्तविक स्वरूप को समझ जावें तो प्राप्त देह से प्रारंभ कर जीव समस्त वस्तुओं को स्वरूपानुरूप भाव से भगवद्-सेवा मे प्रयोग करता है। इस दृष्टिकोण मे, प्राप्त देह बाधक नही है। इस तत्त्व को श्रीतिरुमालै-आण्डान् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के पंचाचार्यों मे से एक आचार्य) की दिव्य वचन से समझ सकते है। श्रीनाच्चियार्-तिरुमोऴि ११.६ व्याख्या मे, श्रीपेरियवाच्चान्-पिळ्ळै स्वामीजी श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी की आचार्य भक्ति का उदाहरण स्व शब्दों मे देते है। श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी कहते है कि हालांकि जीव को देह मे आसक्ति और देह संबंधित सर्व वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी आगे कहते है कि उनका यह देह अर्थात् जीव के देह को उपेक्षित नही करना चाहिए क्योंकि उनके इस देह से ही उनकों श्रीआळवन्दार का दिव्य संबंध प्राप्त किया है जो अन्ततः अपेक्षित लक्ष्य अर्थात् परमपद मे नित्य किङ्करता प्रदान करेगा।

९२) शेषवस्तुविन् व्यापारमडैय शेषितानक्कडिमैयाग निनैत्तिरुक्किरप्पडि

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन का पूर्ण संरक्षण किया।सर्व शेषी भगवान् जीवात्माओं के सभी क्रियाओं को, उनके प्रति समर्पित क्रियाओं के रूप मे मानते क्योंकि जीवात्मा स्वयं भगवान् का दास व शेष है।

अनुवादक टिप्पणी: जब जीवात्मा भगवान् का शरणागत होता है तो भगवान् जीवात्मा का पूर्ण भार लेकर, उसके जीवन का पूर्ण नियत्रण स्वयं करते है। पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी के स्व ग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि २५८वे सूत्र मे चरमश्लोक के विवेचन मे इस विषय को कहते है। चरमश्लोक मे भगवान् कहते है ‘मोक्षयिष्यामि’ अर्थात् मोक्ष व मुक्ति प्रदान करूंगा अर्थात् मै जीव का संरक्षण करूंगा। पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी स्व सूत्र मे कहते है इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित् तारेन् , एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक्कोळ्ळेनो मै तुमको तुम्हारा ख्याल रखने नही दूंगा। क्या मै स्वशरीर की गंदगी को साफ स्वयं नही करूंगा। इस सूत्र के व्याख्याकार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अभूतपूर्व दृष्टिकोण मनमोहक है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते है – अब तक तुम अपने आपको स्वतंत्र मानते रहे। परन्तु अब स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त कर अर्थात् यह जानकर मै (जीव) स्वतंत्र नही परतन्त्र हूं इस भाव से मेरी शरणागति किए। जैसे शरीर आत्मा पर निर्भर है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी परमात्मा पर निर्भर है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को सांत्वना देते हुए कहते है – हे अर्जुन, तुम्हारे मन की अज्ञानता को दूर करने का संरक्षण का पूरा भार भगवान् का है।

९३) अवतार कालत्तिल् उदवातवर्कुम् इऴक्क वेण्डातपडियिरे कोयिलागिळिले वन्दु काण्वळर्तु

तिरुमूऴिक्कळत्तनान् – तिरुमूऴिकळक्कळम्

भगवान् इस जगत् मे अनेकानेक अवतारों के माध्यम से अवतरित होकर स्वाश्रित भक्तों के तापत्रयों को हरते है। जो जीवात्माएँ भगवान् के इन विभिन्न अवतारों का लाभ नही उठा सकें उन सभी के लिए भगवान् स्वयं निर्हेतुक कृपा से अर्चावतार रूप मे श्रीरङ्गमित्यादि दिव्य क्षेत्रों मे अवतरित होकर शयन करते है।

अनुवादक टिप्पणी : श्रीमद्भगवद्गीता ४.५-४.९ श्लोकों मे, भगवान् श्रीकृष्ण अपने अवतारों के रहस्य का प्रतिपादन किया है।  भगवान् श्रीकृष्ण कहते है वह समय समय पर भक्त संरक्षण, दुष्ट शिक्षण और अधर्मों का संहार और धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए अवतार लेते है। प्रायः उनके अवतार हर युग मे होते है। त्रेता और द्वापर युग मे भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप मे प्रकट हुए। जिन जीवात्माओं ने भगवान् के इन अवतारों के अनुग्रह का अवलोकन नही किया उन सभी के लिए भगवान् स्वयं निर्हेतुक कृपा से विभिन्न दिव्यदेशों मे अर्चावतार रूप मे प्रकट होते है। श्रीतिरुमङ्गै-आऴ्वार स्व ग्रन्थ तिरुनेन्डुदाण्डगम् के १०वें पासुर मे इस विषय का प्रतिपादन किए है – पिन्नानार् वाणाङगुम् शोदि तिरुमुऴिक्कळत्तानाये – उन जीवों के लाभ के लिए भगवान् ने तेजोमय तिरुमूऴिक्कळम् अर्चावतार रूप मे प्रकट हुए है जिनने भगवान् के पर,व्यूह, विभव अवतारों का दिव्य अनुभव नही किया है।

 

९४) उगन्तरुळिन निलङ्गळिले मेय्ये प्रतिपत्ति विळैन्दार्क्कु अन्गुळ्ळवरै एल्लाम् उद्देश्यमाय्त्तोन्रुम्


श्रीरङ्गम – प्रमुख दिव्यदेश

जिन भक्तों को इन दिव्यदेशों (श्रीरङ्गम, तिरुमला, मेलुकोटा) मे अपार विश्वास है जो भगवान् के लिए अत्यन्त प्रिय है, उन भक्तों को इन दिव्यदेशों मे सर्व वस्तुएं वांछनीय है।

अनुवादक टिप्पणी : दिव्यदेश भगवान् को सदैव अत्यन्त प्रिय है। भगवान् इन दिव्यदेशों मे प्रगट होकर आश्रित भक्तों और अन्य जीवों को उनके माधुर्य सुलभ स्वरूप के प्रति आकर्षित कर विशेष कृपा करते है। अतः हमारे आऴ्वार् और आचार्यों ने इन दिव्यदेशों के प्रति विशेष लगाव सदा दिखाया है। जिन भक्तों को भगवान् के अत्यन्त प्रिय दिव्यदेशों (श्रीरङ्गम, तिरुमला, मेलुकोटा) मे अपार विश्वास और रति है, इन दिव्यदेशों मे प्रस्तुत सर्व वस्तु सदा वांछनीय और अनूकल है। पूर्वाचार्यों के जीवन मे ऐसे अनेक घटनाएँ है जो पूर्वोक्त वाक्यों को प्रतिपादित करते है। एक ऐसी घटित घटना मे, श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी जी का उदाहरण बार बार दिया जाता है। एक बार, श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी श्रीतिरुवेंकट से उतरने के बाद, प्रसाद पाने के लिए प्रसाद पोटली को खोलते है। पोटली को खोलते ही श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी यह देखते है कि उनकी प्रसाद पोटली मे कई छोटे से बड़े चींटीयां है। श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी तुरन्त प्रसाद पोटली को बन्दकर श्रीतिरुवेंकट पहुँचकर इन चींटीयों को श्रीतिरुवेंकट पर्वत पर छोड देते है। इस दृष्टान्त से यह दर्शा रहें कि श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी को पूर्व आऴ्वारों के दिव्य वचनों मे अपार विश्वास है। आऴ्वारों का कथन है कि श्रीतिरुवेंकट मे श्रीनिवास भगवान् के सेवाभिलाषी देवगण एवं नित्यसूरीगण वहां विभिन्न रूपों मे उपस्थित रहते है। श्रीपराशरभट्ट स्वामी कृत श्रीरङ्गराजस्तव मे श्रीपराशरभट्ट स्वामी कहते है कि श्रीरङ्गम मे, नित्यसूरीगण, वृक्षों और पौधों के रूप मे प्रकट रहते है।

९५) अप्राकृत संस्थानत्तै इतर सजातीयमाक्का निर्पदु, तन् जन्मत्तै अनुसन्धित्तारुडैय जन्मङ्गळ् पोम्पडियायिरुप्पदु

भगवान् के प्रमुख दश अवतार – तिरुचेरै

संस्थान – रूप, अप्राकृत संस्थान – दिव्य रूप

आपके दिव्य (कलंकरहित) स्वरूप का, मनुष्य, पशु, पक्षी इत्यादि मे रूपान्तरण होना आपके विभिन्न अवतारों का एक विशेष अङ्ग और कला है जिसके माध्यम से आप जीवात्माओं को आपके इन दिव्य स्वरूपों का ध्यान करने का लाभ प्रदान कर उनके जन्म-मृत्यु चक्र को रोकते है।

अनुवादक टिप्पणी : परमपद मे विराजमान भगवान् का वास्तविक कलंकरहित दिव्य स्वरूप इस भौतिक जगत् मे भी दृष्टिगोचर है। श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ३.५.५ अङ्गु वैत्तु इङ्गुप्पिरन्दु पासुर मे यही बताये है। श्रीनम्पिळ्ळै इस पासुर व्याख्या अर्थात् ईडु व्याख्या मे भगवान् के दिव्य शब्दों भगवद्गीता ४.६ श्लोक – प्रकृतिम् स्वां अधिष्ठाय – का पुनः उद्धृत कर सुन्दरता से पासुर भाव को समझाते हुए कहते है भगवान् स्वयं इस भौतिक जगत् मे अहैतुकी कृपा से अवतार लेते है। जो जीव भगवान् के इस दिव्य जन्म के प्रति रतिवान होते है वह जीव इस जन्म-मृत्यु चक्कर से मुक्त होते है। भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता ४.४ श्लोक जन्म कर्म च मे दिव्यं मामेति सो$र्जुन – हे अर्जुन ! वह जो मेरे दिव्य जन्म अौर कार्यों को जानता है, वह (जीव) देह त्याग ने के पश्चात् इस भौतिक जगत् मे पुनः नही आता।

 

९६) ओरु प्रयोजनत्तिर्कागप् पोवार्गळन्रो अदुकोण्डु मीळलावदु। तन्नैये प्रयोजनमागप् पट्रप् पोवार्क्कुम् मीळविरङ्गुण्डो? इप्पडियिरे भगवदत् प्रावण्यमुडैयार् पडि।

जब जीव भगवान् के अलावा अन्य वस्तुअों की अभिलाषा से भगवान् की अोर बढता है तो अभिलाषित प्राप्त कर फल प्रदाता भगवान् को जीव भूल जाता है। परन्तु भगवान् को उपेय (लक्ष्य) मानने वाले जीवों को भगवान् को भूलने या छोडने का कोई कारण नही होता है। भगवान् मे पूर्णतया भावुक जीवों की यह वास्तविक स्थिति है।

अनुवादक टिप्पणि : अन्याभिलाषा रहित भगवान् की सेवा करना ही जीवों का स्वभाव है। विभिन्न प्रकार के जीव भगवान् का आश्रय लेते है जैसे भगवान् कृष्ण स्वयं भगवद्गीता ७.१६ श्लोक मे कहते है :

चतुर्विधा भजन्ते माम् जनस्सुकृतिनोर्जुन । अार्तो जिज्ञासुरार्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी (जीव के यथार्थ रूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है को जानने वाला) – ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।

आगले श्लोकों मे, भगवान् कहते है की इन भक्तजनों मे ज्ञानी उनका सर्व प्रिय है क्योंकि ज्ञानी और भगवान् मे एक दूसरे के प्रति पारसपरिक अनुरक्ति है। आगे यह भी कहते है की ऐसे ज्ञानी जन उनके आत्मा के समान है – ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्

इस विषय की सम्मति श्रीपोइगै-आऴ्वार् मुदल्-तिरुवन्दादि के २६वें पासुर मे कहते है –

एऴुवार् विडै कोळ्वर्
ईन् तुऴायानै वऴुवा वगै निनैन्दु वैगल् तोऴुवार्
विनैच्चुडरै नन्दुनिक्कुम् वेङ्गडमे
वानोर् मनच्चुडरैत्तूण्डुम् मलै

ईन् तुऴायानै – (वह) जो अति सुन्दर तुलसी माला से सुशोभित है, एऴुवार् – (वह) जो धन की अभिलाषा से प्रार्थना कर, वांछित फल पाकर भगवान् को छोड देता है, विदै कोळ्वर् – (वह) जो कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर, वांछित फल पाकर भगवान् को सदैव के लिए छोड देता है, वऴुवा वगै निनैन्दु वैगल् तोऴुवार् – (वह) जो भगवान् के साथ नित्य रहने और उनकी सेवा करने के लिए प्रार्थना करता है।

इन तीन प्रकार के भक्तजनों के लिए, तिरुवेंकट पर्वत ही, उनके पापों का नाश करेगा। श्रीनम्पिळ्ळै स्वामीजी इस पासुर व्याख्या मे उपरोक्त भगवद्गीता के श्लोक का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देकर समझाते है।

९७) अनन्तशायित्वम् सर्वाधिक वस्तुक्कु लक्षणमागैयाळे सर्वाधिकने शरण्यन् एन्गिरदु

अनन्तपद्मनाभ पेरुमाळ् , तिरुवनन्तपुरम – सभी के नियन्त्रक

भगवान् की भगवत्ता को इंगित करने वाला विशेष गुण यह है की भगवान् आदिशेषजी के स्वामी है जो श्रीआदिशेषजी पर योगनिद्रावस्था मे शयन करते है। ऐसे परात्पर परमात्मा भगवान् सभी के आश्रय है।

 अनुवादक टिप्पणी : ऐसे कई विशेष गुण है जो केवल भगवान् मे ही विराजमान है। उभयविभूतिनाथत्व – दोनों विभूतियों अर्थात् त्रिपादविभूति (आध्यात्म जगत्) और एकपादविभूति (भौतिक जगत्) के स्वामी भगवान् है। उभयलिंगत्व – दोनों प्रकार के तादात्म्य से भगवान् ज्ञेय है अर्थात् कल्याणमय एवं मंगलमय गुणों का संगम स्थल एवं अमंगलमय गुणों के विपरीत गुणों (कल्याणमय गुणों) का संगम स्थल भगवान् है – कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् मे केवल कल्याणमय एवं मंगलमय गुण सन्निहित है। अनन्यशायित्व – वह भगवान् जो श्रीआदिशेषजी पर योगनिद्रावस्था मे शयन करते है। पुण्डरीकाक्षत्व – वह भगवान् जिनके नयन सुन्दर कमल के फूलों के समान है अर्थात् कमल नयन भगवान्। गरुडवाहनत्व – वेदात्मा शब्द से गौरान्वित गरुडजी पर विराजमान (आरोही) भगवान् अर्थात् वह भगवान् जिनकी सवारी (वाहन) वेदात्मा रूपी गरुडजी है। ऐसे विशेगुण किसी अन्य व्यक्तित्व मे विराजमान होना असंभव और नामुमकिन है। ऐसे विशेषगुण सम्पन्न व्यक्तित्व ही सभी जीवों का आश्रय है। श्रीशठकोप स्वामीजी स्व ग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ५.१०.१० पासुर – नागणै मिशै नम्पिरान् चरणे शरण् नमक्कु मे उपरोक्त भाव को प्रगट किए है। श्रीनम्पिळ्ळै स्वामीजी उपरोक्त पासुर के स्व व्याख्या मे इसी प्रसंग को निर्दिष्ट किए है।

९८) आचार्यन् वार्त्तै केट्टु धरित्तल्, अवन् अभिमानत्ताले धरित्तलोऴिय वेरोन्रिल्लै

एक सच्चे आचार्य और सच्चे शिष्य का सच्चा संबंध – श्रीरामानुजाचार्य और उनके शिष्यों का दृश्य

स्वाचार्य के निर्दिष्ट उपदेशों का अनुपालन और उनकी कृपा का अवलंब से निर्वीह करना ही एक शिष्य का कर्तव्य है और कुछ नही।  

अनुवादक टिप्पणी : सभी उपायों मे, आचार्याभिमान जीवोत्थापन का सबसे सरल और योग्य उपाय है। आचार्य सर्व प्रथम भगवद्विषय के प्रमुख विषय तत्त्वों का प्रतिपादन कर शरणागत जीव को समझाते हुए सतत कहते है – हे जीव, परमात्मा और तुम्हारा संबंध नित्य है। श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र ग्रन्थ के अन्तिम प्रकरण मे पिळ्ळै लोकाचार्य स्वीमीजी इस विषय तत्त्व का प्रतिपादन किए है। इस ग्रन्थ मे पञ्चमोपाय के गौरवमय तत्त्व को समझाकर, आचार्याभिमानमे उत्ताकरम् सूत्र मे तत्त्व सार प्रस्तुत करते है। इस सूत्र की टीका मे टीकाकार कहते है – शिष्य की परिस्थिति भौतिक जगत् मे देखकर एक आचार्य की कृपा दृष्टि एवं अनुग्रह ही शिष्य का उत्तारक है अर्थात् शिष्य के प्रति आचार्य का परगत स्वीकारता। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सत्साम्प्रदाय के प्रमुख तत्त्व को प्रकाशित करते हुए कहते है की पिळ्ळै लोकाचार्य स्वीमीजी इसी प्रमुख तत्त्व को प्रकाशित कर रहे है। यथा कर्म, ज्ञान, भक्ति, स्वगत आचार्य स्वीकारता (अर्थात् जीव स्व प्रयासों से एक आचार्य को स्वीकारना और मानना की यह जीव का पसन्द है) इत्यादि मोक्ष के उपाय माने जाते है, परन्तु वास्तविकता मे ये सभी असली उपाय नही है क्योंकि यह सभी जीव के स्वरूप के प्रतिकूल है। भगवान् के प्रति प्रपत्ति करना भी एक दृष्टिकोण से भयानक है क्योंकि स्वतन्त्र भगवान् जीव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते है। अतः वह आचार्य जो शिष्य के कल्याण की सदा चिन्ता करता है और जो अद्वितीय कृपा के निधि है ऐसे आचार्य की निर्हेतुक कृपा कटाक्ष ही शिष्य के उत्थापन का एक मात्र आश्रयोपाय है।

९९) स्वरूपान्तरगतैयान कृपैक्कऴिविल्लैयिरे। अदु सत्तैयुळ्ळतनैयुम् विलैच्चेल्लुमिरे

कोलप्पिरान् – तिरुवल्लवाऴ्

कृपा भगवान् का स्वाभाविक गुण है। भगवान् की कृपा कभी भी क्षीण नही होती है। जब तक कृपा है तब तक भगवान् का महिमागान निश्चित है।

अनुवादक टिप्पणी ः भगवान् की कृपा भगवान् का सबसे प्रमुख और महत्त्वपूर्ण गुण है। आपकी यह स्वाभाविका कृपा निर्हेतुक है जिससे आप जीवात्माओं का उत्थान सतत करने मे प्रयत्नशील है। आप जीवात्माओं के हृदय मे आपकी इस निर्हेतुक कृपा से आपके प्रति रति को जागृक करते है। जीवात्मा जब भगवान् के सम्मुख होकर सतत उत्थान करने वाली आपकी कृपा का अवलंब करता है तो स्वतः जीवके हृदय मे स्वस्वरूप का तेजोमय ज्ञानका प्रकाश होता है। अऴगिय-मणवाळ-पेरुमाळ्-नायनार् स्वामीजी का अद्भुत ग्रन्थ श्रीसम्प्रदाय का अनोखा एवं श्रेष्ठ ग्रन्थ है। इस श्रेष्ठ ग्रन्थ मे ग्रन्थ रचना कारने श्रीशठकोप स्वामीजी के विभिन्न दिव्य मनोभावों और उनके सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। २१८ सूत्र मे ग्रन्थरचनाकार कहते है – तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक शतक भगवान् के प्रत्येक गुणों को प्रकाशित करते है और तदनुसार कृपा के प्रभाव से श्रीशठकोप स्वामीजी के शरीर मे प्रगट विभिन्न दिव्य मनोभावों का रसमय परिचय विस्तार से करते है। इस सूत्र मे ग्रन्थ रचनाकार कह रहे है की तिरुवाय्मोऴि का पाँचवाशतक भगवान् की कृपा व करुणा का द्योतक है। पूर्वाचार्यों का मत है की इस करुणा के अवलंब से श्रीशठकोप स्वामीजी मे भगवान् के प्रति असीमित प्रेम का उद्भव हुआ था। ग्रन्थ रचनाकार १६५ सूत्र मे कहते है की श्रीशठकोप स्वामीजी को भगवान् की कृपा की दिव्यानुभूति तिरुवल्लवाऴ् दिव्यदेश (तिरुवाय्मोऴि ५.९ – मानेइ् नोक्कु – मेलिविलुम् चेमम् कोळ्विक्कुम् कृपै तेन्नगरिले नित्यम्) मे हुआ। अतः भगवान् की दिव्य एवं गौरव मय कृपा का स्वभाव स्पष्टता से निर्दिष्ट हुआ और ऐसी कृपा का प्रभाव का प्रकाशन श्रीशठकोप स्वामीजी के वैभवमय जीवन और प्रतिपादित सिद्धान्तों से हुआ।

 

१००) नम्माचार्यर्गळ् व्यापक मन्त्रङ्गळ् मून्रिलुम् द्वयत्तैये आधारिप्पर्गळ्

श्रीनम्पेरुमाळ् (श्रीरङ्गनाथ-भगवान्) और श्रीनाच्चियार् (श्रीमहालक्ष्मी-अम्माजी) – द्वयमहामन्त्र का प्रतिपाद्य विषय

भगवान् का स्वभाव और उनकी महिमाका वर्णन दो श्रेणियों के मन्त्रों मे वर्णित है। मन्त्रों की कई श्रेणियाँ है परन्तु मुख्य श्रेणियाँ दो है – व्यापक औऱ अव्यापक। व्यापक श्रेणि मन्त्रों को अव्यापक श्रेणि मन्त्रों की तुलना मे सर्वाधिक माना जाता है। व्यापक श्रेणि के तीन सर्वविदित मन्त्र है – तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर) (भगवान् श्रीमन्नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र), तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र), षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र) जो सर्वश्रेष्ठ है। इन सभीकी तुलना मे पूर्वाचार्यों ने द्वयमहामन्त्र को अधिक महत्त्व दिया है।

अनुवादक टिप्पणी : श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि के प्रारम्भ मे ही कहते है की मन्त्रों की श्रेणियाँ दो प्रकार है। मन्त्र का यह अर्थ है कि वह जो जापक व पाठक की रक्षा करता है। साधारणत: मन्त्र के तीन भाग होते है – प्रणव (यह जीवात्मा और परमात्मा के यथार्थ संबंध को बतलाने वाला भाग है), तिरुनाम (दिव्यनाम) – दूसरा भाग भगवान् का ऐसा नाम जो ध्यान का केन्द्र बिन्दु है,  नम: – तीसरा भाग यह स्वीकारना की भगवान् ही उपाय है। व्यापक मन्त्र तीन है – तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर) (भगवान् श्रीमन्नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र), तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र), षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र)। अव्यापक मन्त्र भगवान् के कल्याण गुणों, लीलाओं का महिमागान करते है यथा केशव नाम का अर्थ केशि राक्षस का नाश करने वाला व सुन्दर केश वाला हुआ। व्यापक मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि भगवान् श्रीमन्नारायण के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करते है।

उपरोक्त तीन व्यापक मन्त्रों का संक्षिप्त अर्थ :

१) षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र) – अोम् विष्णवे नम: – विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति (विषि – व्याप्ति) के अनुसार अर्थ – वह जो व्याप्त है।
२) तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र) – अोम् नमो भगवते वासुदेवाय – सर्वस्य वसतीति वासुदेव: – वह जो सर्व व्याप्त है। यह मन्त्र कहता है कि भगवान् सर्व व्याप्त है लेकिन मन्त्र प्रतिपाद्य भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित नही करता। इस मन्त्र मे भगवते शब्द से षाडगुण सम्पन्न भगवद्-स्वरूप प्रतिपाद्य है परन्तु मन्त्र पूर्ण नही है।
३) तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर – अष्टाक्षरमन्त्र) – अोम् नमो नारायणाय – नारायण शब्द षाडगुण सम्पन्न भगवद्-स्वरूप एवं भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित करता है। नारायण शब्द से हम यह समझते है की भगवान् चिदाचित मे व्याप्त है (सर्वव्यापकत्व) और सभी चिदाचित वस्तुओं का संपोषण भगवान् स्वयं करते है (आधारत्व)। अत: यह मन्त्र भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित करता अत: यह मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है।

तिरुमन्त्र का अधिक विस्तारक रूप द्वयमहामन्त्र है। द्वयमहामन्त्र भगवान् श्रीमन्नारायण और भगवती श्रीमहालक्ष्मी के संबंध का प्रतिपादन सुस्पष्टता से करता है। अतः हमारे पूर्वाचार्यों ने श्रद्धा से इस महामन्त्र को अधिक मान्यता दिया और इस महामन्त्र मे अत्यन्त रति दिखाया भी है।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-10.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तिरुप्पावै अनुभव – नायनार् द्वारा रचित तिरुप्पावै सार

 ||श्री:  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः||

भगवान श्रीमन्नारायण की दिव्य महिषी ” भूदेवी नाच्चियार ”  , इस कलिकाल के शुरुआत में , जीवात्माओं के उद्धार के लिये,  आण्डाल (माँ गोदा देवी)  का अवतार ले इस धरा पर प्रगट हुयी|

इस मृत्युलोक में, माया के कारण भटके हुए जीवो को, अपना ध्येय जतलाने , भगवान के अर्चा विग्रह की सेवा कर, एक निष्ठ  शरणागति कर भगवद कैंकर्य में सम्मिलित हो , अपने ध्येय, परमपद को प्राप्त करने का सुगम मार्ग बतलाने अवतरित हुयी थी|

 

भगवान श्रीमन्नारायण के प्रेमोन्माद और उन्हें पाने / वरण करने की तीव्र लालसा में , पराँम्बा माँ गोदाम्बाजी  अपनी  तरुणावस्था में ही,  दो दिव्य प्रबंधों की रचना की थी | पहले तिरुप्पावै,  जिसमें माँ गोदाम्बाजी  धनुर्मास व्रत ( दक्षिणात्य मार्गली माह में व्रत  , तिरुप्पावै नोम्बु ) का अनुष्ठान कर भगवान को सदा उनके ही आनंद के लिए, उनके कैंकर्य में व्यस्त रखने की प्रार्थना करती हैं | धनुर्मास व्रत (तिरुप्पावै नोम्बु) में भगवान के श्रीचरणों में रखी प्रार्थना / विनती, को भगवान ने नहीं स्वीकारा,  तब भगवान के वियोग में व्याकुल हो, दुःखी हो    १४७ प्रबंधों से भगवद गुणानुवाद किया , जिसे नाच्चियार तिरुमोळि के नाम से जानते है  |

हमारे लिये यह  दोनों ही ग्रन्थ  अनमोल रत्न हैं  |

यह दोनों ग्रन्थ  (तिरुप्पावै और नाचियार् तिरुमोळि) माँ गोदाम्बाजी  इस वैष्णव जगत के लिये , वैष्णवों के उद्धार के लिये दो अनमोल रत्न (तिरुप्पावै और नाचियार् तिरुमोळि) प्रदान कर,  पराम्बा माँ गोदाम्बाजी भगवान श्री रंगनाथजी में समाहित हो नित्य धाम को पधारती है  |

सम्प्रदाय के कई पूर्वाचार्यों ने जैसे,  एम्पेरुमन्नार (भगवद रामानुज स्वामीजी) , भट्टर्, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, पिळ्ळै लोकाचार्य, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार्, वेदान्ताचार्य, मणवाळ मामुनिगळ  ( वर वर मुनि स्वामीजी ), पोन्नडिक्काल् जीयर् ( प्रथम तोताद्रि जीयर ) जैसे कई पूर्वाचार्यो ने श्री गोदाम्बाजी और उनके द्वारा रचित तिरुप्पावै और नाच्चियार तिरुमोळि का वैभव गान   अपने पाशुर , स्तोत्र, और व्याख्यानों में किया है |

हमारे पूर्वाचार्य तिरुप्पावै की महिमा का गुणगान कुछ  इस प्रकार करते हैं:
पादगङ्गळ् तीरक्कुं परमनडि काट्.टुम्
वेदं अनैत्तुक्कुं वित्तागुम्
कोदै तमिळ् ईरैन्दुं ऐन्दुं अरियाद मानिडरै
वैय्यं सुमप्पदुं वम्बु

माँ गोदाम्बाजी द्वारा रचित  तिरुप्पावै जिसे हमारे पूर्वाचार्य सभी वेदों का सार कहते है| हमें , हमारे परम लक्ष्य, भगवान श्रीमन्नारायण के कैंकर्य-प्राप्ति , शरणागति में (केवल भगवान के आनंद के लिए) आनेवाली  सारी बाधाओं को दूर कर  हमें,  भगवान श्रीमन्नारायण के  चरणारविन्द का आश्रय दिला परमपद की प्राप्ति करवाता है  | | पूर्वाचार्यो का यहाँ तक मानना है  जो वैष्णव तिरुप्पावै का गायन , मनन  नहीं करता है वह इस  पृथ्वी पर भार है |

हर वर्ष  मार्गशीर्ष माह  में सभी वैष्णव देवालयों में , वैष्णव मठो आदि स्थानों  पर तिरुप्पावै का पारायण, प्रवचन, व्यख्यान होते है  है और आचार्यों , विद्वानों , वैष्णवों अपने अपने अनुभव से लेख लिखते  हैं | तिरुप्पावै   का वैभव और आकर्षण ही ऐसा है कि,  तीन वर्ष के बालक से लेकर नब्बे वर्ष के वृद्ध तक सभी तिरुप्पावै के  अनुसन्धान में व्यस्त रहते  हैं |

इसका कारण है , आण्डाळ् का  भगवद प्राप्ति के सभी उपाय और शास्त्रों का सार इन तीस पाशुरों  में प्रस्तुत करना |

नम्माळ्वार् आळ्वार जिन्हे भगवद अनुगृह प्राप्त था, ने बहुत ही सरल भाषा में  अपनी तिरुवायमोळि (सहस्त्रगीति)  के ४. ६. ८ में, शास्त्रों के सार को कुछ इस प्रकार बतलाते हैं -“वेदं वल्लार्गळैक् कोण्डु विण्णोर् पेरुमान् तिरुप्पादं पणि”, अर्थात जीवात्मा को  शास्त्रों में  पारङ्गत आचार्य का अनुग्रह प्राप्त कर  , नित्य सूरियों को (महालक्ष्मी इत्यादि) मध्यस्थ बनाकर,  भगवान की शरण लेनी चाहिए और उनके दिव्य चरणयुगल की सेवा कर शरणागत हो कर रहना चाहिये  |

यदि हर जीवात्मा इस सरल भाव को  समझकर आचरण में लाता  है,  तो उसे निश्चित रूप से भगवान् की शाश्वत, दोषरहित सेवा , शरणागति प्राप्त होगी |

पिळ्ळै लोकाचार्यके अनुज, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने विस्तारसे तिरुप्पावै पर एक अद्भुत व्याख्यानकी रचना की | उनका आळ्वारों के अरुळिचेयल् में (प्रबन्धम्) प्रावीण्य अप्रतिम है | उदाहरणार्थ, उन्होंने संपूर्ण रहस्य त्रयम् (तिरुमन्त्रम्, द्वयम् और चरम-श्लोकम्) को, अरुळिचेयल् में प्राप्त शब्दोंका प्रयोग करके एक सुन्दर ग्रन्थ, “अरुळिचेयल् रहस्यम्” की रचना की |

आण्डाळ् अपने भगवद अनुभव में सभी जीवात्माओ को अपने साथ लेकर चली थी , यही सार इस जग को बतलाने माँ भूमि देवी आण्डाळ के रूप में अवतरित हुयी थी , यही गोदाम्बाजी की महिमा थी |शास्त्रों में यह कहा गया है कि “एको स्वतः न  भुञ्जीथ”, अर्थात  किसी पदार्थ का, सबको  बांटे बिना अकेले में उपभोग नहीं करना चाहिये  | भगवद् विषय में यह बहुत ही उपयुक्त है | एकांत भोग  भौतिक सुख (विषयान्तर) गुप्त भोगों में उपभोग किया जाता है, क्योंकि वह स्वभाव से दोषपूर्ण है , जबकि भगवद् विषय सार्वजनिक है और सबके साथ मिल बांटकर उसका आनन्द  लेना चाहिए |आण्डाळ् ने  अपने अनुष्ठान में इसे साकार कर  दिखाया |अपने पिता के पदचिन्हो   का अनुसरण करते हुए, आण्डाळ् ने भी सभी जीवात्माओंको भगवद् कैङ्कर्य में संलग्न रहने को आह्वान किया | बिलकुल वैसे ही जैसे विष्णुचित्त आळ्वार, ने अपनी  रचना, “तिरुपल्लाण्डु”  में,  ऐश्वर्याथी (जो संपत्ति चाहता है), कैवल्यार्थी (जो आत्मानुभव चाहता है), और भगवद् कैङ्कर्यार्थी (जो भगवद् कैङ्कर्य करने  के लिए  उत्सुक है) को  भगवान् का   मङ्गलाशासन करने के लिए आमन्त्रित किया, |अपनी ” ६००० पडि व्याख्यानम्” के “वङ्गक् कडल्” (अन्तिम पाशुर ) की अवतारिका में  नायनार् स्वामीजी  तिरुप्पावै के पहले सभी २९ पाशुरों  का बहुत ही सारगर्भित अर्थानुसंघान देते हैं | नायनार् का पूरे  पाशुर के सार को एक हि पंक्ति  में प्रतिपादन करने के  कौशल्य प्रवीणता की सभी विद्वान् प्रशंसा करते हैं |अब हम तिरुप्पावै के  तत्त्व को उनके ही दिव्य शब्दों में देखते है  |

  • पहले पाशुर   मार्गशीर्ष मास-के प्रथम  दिवस ,में आण्डाळ् , अपने निज स्थान को गोकुल मान  अपनी सभी सखियों गोपियों की तरह मान सभी को संग लेकर  और साथ सभी को  , लेकर नन्द नंदन की आराधना के लिए मनाती है ,  सभी  सदा भगवान् श्री कृष्ण का आश्रय लेते हैं और जो उन्हें कृष्णानुभव में निरत रहने में सहायता करते हैं | आण्डाळ्  भगवान् का  गुणगान करती  हैं, कहती है , यही  उपाय (मार्ग) और उपेय (लक्ष्य) दोनों हैं |जबकि उनका मुख्य ध्येय कृष्णानुभव में निरत रहते हुये भगवान को पाना है , आण्डाळ्  अन्य गोपीका-सखियों के साथ भगवद् अनुभव में संलग्न रहने के लिए एक व्रत रखने का संकल्प करती हैं, (जो कि एक अप्रधान लक्ष्य है) |
  • दूसरे पाशुर में, भगवद् अनुभव में निरत रहने के लिए, आण्डाळ् उन गुणों और पालनीय और अपालनीय नियमो का वर्णन करती हैं|  हमें कौन से नियम स्वीकारना और त्यागना चाहिये | वह स्पष्ट रूप से बतलाती  हैं कि  ” मेलैयार् चेय्वनगळ्” अर्थात जो हमारे पूर्वजों ने (आचार्यों नें) पालन किया है वही हमारे (प्रपन्नों) लिए सर्वोपरि प्रमाण है |
  • तीसरे पाशुर में, भगवन नाम गुणानुवाद के लाभ के रूप में, वह गोकुल  के निवासियों का कल्याण चाहती हैं क्योंकि इन्ही से प्रेरित हो  गोदाजी  और उनकी सखियाँ कृष्णानुभव में व्यस्त रहने का संकल्प लेती है   | निश्चित रूप से मुख्य लक्ष्य तो सभी जीवात्माओं को कृष्णानुभव प्राप्त करना ही है |
  • चौथे पाशुर में वह पर्जन्य देव (वर्षा के  देवता) को यह प्रार्थना करती हैं कि , वह हर महीने में पर्याप्त (महीने में तीन बार- प्रति दस दिन में एक बार ब्राह्मणों के लिए,  एक बार राजा के लिए और एक बार पतिव्रताओं के लिए एक बार) बरसे , ताकि वृन्दावन समृद्ध रहे  और उन्हें  कृष्णानुभव बिना किसी बाधा के निरन्तर होतें  रहे |
  • पाँचवे पाशुर में वह स्पष्ट करती हैं पूर्ण निर्मल मन और निष्काम भाव से  भगवद आराधना कर भगवन नाम संकीर्तन करते रहना चाहिये| निरन्तर नाम संकीर्तन में मग्न रहने से, हमारे प्रारब्ध वश  संचित और आगामी कर्मों (अच्छे और बुरे) भगवत कृपा से कट जाते है | उपनिषदों में बताया गया है कि जब कोई भगवान् की शरणागति करता है तब संचित कर्मों का नाश होता है, बिलकुल उसी तरह , जिस तरह कपास आग में जल कर राख हो जाती  है , और ऐसे ही आगामी कर्म प्रभावहीन हो जाते  है,  जैसे कमल पर जल नहीं ठहरता उसी के समान| यहाँ गोदाम्बाजी ने यह भी , स्पष्ट समझाया की ,भविष्य में  अनजाने में किये कर्म कट जाते है , परन्तु जो  पूर्ण ज्ञान में रखकर किये गये कर्म , उनका फल क्षीण मात्र  भोगना ही पड़ता है |
  • छठवें पाशुर से पन्द्रहवें पाशुर तक, आण्डाळ् विभिन्न दस सखियों को (गोपियों को ,जो पहले से ही, भगवान्  कृष्ण की  भक्ति में आसक्त हैं) जगाने उनके घर जाती हैं | अपने साथ वह कई अन्य  गोपियों को भी ले जाती हैं, जो कृष्ण के नन्द भवन जानेके लिए उत्सुक रहती है |आण्डाल हर पाशुर में एक सखी को जगाती है , सब को साथ ले भगवान श्री कृष्ण को जगाना ही उद्देश्य रहता है, हर सखी को सुन्दर मधुर आवाज़ में भगवान के रूप लावण्य , यश- गौरव की गाथा गाते जगाती है| पूर्वाचार्यो ने तिरुप्पावै की इन गाथाओं को गूढ़ अर्थ वाली बतलाया है |
  • छठवें  पाशुर  में आण्डाळ एक गोपीका को जगाती हैं जो कृष्णानुभव में अपक्व है, नवीन है |  यह  गोपीका स्वयं अकेले ही भगवान् कृष्ण की भक्ति का  आनन्द लेना चाहती है, जो  प्रारम्भिक अवस्था- है जिसे “प्रथम पर्व निष्ठा” कहते है | जब इस “भागवत सहचर्य (सङ्ग)” का मौलिक तत्त्वका ज्ञान होता है तब भक्ति “चरम पर्व निष्ठा” की ओर ले जाती   है |
  • सातवें पाशुर  में, आण्डाळ् उस गोपीका को जगाती है जो कृष्णानुभव में दक्ष है जो जान बूझकर आण्डाळ् और उनकी सखियों की मधुर वाणी  सुनने अन्दर ही सोयी है|
  • आठवें पाशुर  में आण्डाळ् उस  गोपीका को जगाती है अति उत्साह के कारण रात्रि में निद्रा भी नहीं लेती,  पाशुर भाव में भगवन कृष्ण उसे बहुत चाहते है, जिससे गोपिकाओं में उसका सम्मान है  |
  • नौवें पाशुर में वह एक और गोपिका को जगाती है जिसे एम्पेरुमान को उपाय मान उसीमें अति दृढ़ है, इस गोपिका को भगवन के कई प्रकार से अनुभव हुये है, इसे माँ सीताजी की तरह महाविश्वास है, जैसे सीता माता ने हनुमान से कहा, “श्री राम ही आकर मुझे यहाँ से ले जायेंगे , ऐसे ही विश्वास ही कि भगवान् ही “उपाय” हैं |
  • दसवें पाशुर में वह गोदाम्बाजी एक अन्य गोपीका को जगती है , जिसे हमारे साहित्य ने “सिद्ध साधना निष्ठ” बतलाया है, इस गोपिका ने स्वयंको संपूर्ण रूपसे भगवान् को आत्मसमर्पित किया हुआ है, इस कारण यह गोपिका भगवान् कृष्णको अत्यधिक प्रिय है|
  •  ग्यारहवें पाशुर  में आण्डाळ एक और गोपीका को निद्रा से उठाने जाती  है  जिस तरह कृष्ण गोकुल/ वृन्दावन के सर्वप्रिय तरुण है | उसी तरह यह गोपिका वृन्दावन की  प्रिय  कन्या है, इस पाशुर  में गोदाम्बाजी द्वारा  वर्णाश्रम धर्म के पालन करने की महत्ता पर  पूरी तरह से बल दिया  है |
  •  बारहवें  पाशुर में माँ गोदाम्बाजी एक और अन्य गोपीका को निद्रा से उठाती है, जो भगवान् कृष्ण के प्रिय सखा की भगिनी है | भगवान का यह सखा  किसी भी प्रकार के वर्णाश्रम धर्म का कार्य का पालन नहीं करता | गोदाजी यहाँ स्पष्टता से कहती है की  , जब हम लगन से श्री भगवान् की सेवा करने में लगातार मग्न रहते है , तब हमें और कुछ भौतिक कार्य करने के लिए समय अथवा आवश्यकता नहीं होती है | परन्तु जैसे ही भगवान् की सेवा से निवृत होते हैं, दूसरे भौतिक कर्तव्य पूर्ण करने की आवश्यकता होती है  और वे भौतिक कार्य प्राधान्यता  ले लेते हैं |
  • तेरहवें पाशुरम् माँ गोदाम्बाजी एक और अन्य गोपीका को  उठाती है जो एकांतमें अपनी आंखों के  सौन्दर्य का सुख अनुभव कर रही है |  शास्त्र में नेत्रों  को ज्ञान का प्रतीक मानते है , इस गोपी को  भगवान् का यथार्थ ज्ञान है,  और विश्वास है भगवान् कृष्ण जो अरविन्द लोचन है , स्वयं ही उसके समक्ष आएँगे | यह सखी मानती है की , उसके कमल नयन से नेत्र भगवन के अरविन्द लोचन के सम है, और यही उनके मेल है|
  • चौदहवें पाशुरम् आण्डाळ एक अन्य गोपिका को जगाती है , इस गोपिका ने माता गोदाम्बाजी को उनके साथ सभी सखियों को निद्रा से जगाने साथ चलने का वचन दिया था , पर अपने वचन को विस्मृत कर  अपने घर के अन्दर ही निद्रा लेने में मगन है |
  • पन्द्रहवें पाशुरम् आण्डाळ एक अन्य गोपिका को जगाती है, जो आण्डाळ् की अप्रतिम सुंदरता निहारने और उनकी सखियों को देखने अपने घर में प्रतीक्षा कर रही है |
  • सोलह और सत्रहवें पाशुरम् में माँ गोदाम्बाजी नित्य सूरियों के स्थानिक प्रतिनिधिओं को ,क्षेत्र पालक , द्वार पालक (मुख्य प्रवेशिका के रक्षक), आदिशेष इत्यादि को जगाती है |सोलहवें पाशुरम् में माँ आण्डाळ , नन्द भवन के द्वारपाल , मुख्य प्रवेषिका के संरक्षण-पाल और श्री नन्दगोप के शयनकक्ष के बाहर स्थित द्वारपालको जगाने जाती हैं |
  • सत्रहवें पाशुरम् में माँ आण्डाळ श्री नन्दगोप, मैया यशोदा और भैया बलरामजी को जगाती हैं |
  • अठारहवांवे  उन्नीसवे और बीसवें पाशुरम् में, आण्डाळ् भगवान् नन्दगोप कुमार (कृष्ण) को जगाने का प्रयास करती है, इन पाशुरों में आण्डाळ् नप्पिन्नै पिराट्टी  (नीला देवी) का पुरुष्कार प्राप्त करने उन्ही से प्रार्थना करती हुयी उनकी अपरिमित आनन्द प्रदान करनेकी क्षमता, कोमल स्वभाव, अप्रतिम सौन्दर्य, भगवान् कृष्ण के प्रेयसी होने का गौरव, भगवान् कृष्ण से सायुज्य का बखान करते हुये गौरवान्वित करती है|  अन्ततः देवी नप्पिन्नै का पुरुषकारत्व (अनुशंसा करने की क्षमता) का गुणगान करती हैं | इस प्रसंग से माता गोदाम्बाजी यह स्पष्ट करती  है कि, माता  महलक्ष्मीजी की उपेक्षा कर, सिर्फ  भगवान् के प्रेम के लिये मनोरथ करना  शूर्पणखा (जो केवल श्रीराम को चाहती थी) की कामवासना के समान है, और भगवान् श्रीमन्नारायण की उपेक्षा कर केवल माँ लक्ष्मीजी का मनोरथ करना  रावण (जो केवल सीता देवी को चाहता था) की कामवासना के  समान है | सम्प्रदाय साहित्य में ऐसी मान्यता है कि अठारहवां पाशुरम्, ” उन्दु मद कळित्तन्” भगवान् को  अति प्रिय है | अनुवादक टिपण्णी भगवद रामानुज स्वामीजी मधुकरी के समय यही पाशुरम् गया करते थे, इसी से गोष्ठी पूर्ण स्वामीजी ने उन्हें ” तिरुप्पावै जीयर ” के नाम से अलंकृत किया |
  • इक्कीसवें पाशुरम् में, आण्डाळ  भगवान् कृष्ण के उत्तमता  का गुणगान करती है , जैसे श्रीकृष्ण का नन्दगोप के प्रिय पुत्र के रूप में अवतरित होना  , भगवान कृष्ण का परत्व (प्रभुत्व ),दृढ प्रामान्यत्वं   (शास्त्रों द्वारा सर्वोच्चता से प्रमाणित किया जाना कि वही परमेश्वर हैं)  इत्यादि स्तुति करती हैं|
  • बाईसवें पाशुरम् में, आण्डाळ् भगवान् से कहती हैं, हे कृष्ण, मेरे लिये और मेरी सखियों के लिये  आपके सिवा अन्य कोई शरण , आश्रय नहीं है , वह जैसे विभीषण भगवान श्री रामजी की शरण में गये , उसी तरह वह भी सारे बंधनों को त्याग कर आपके दिव्य अनुग्रह के लिये आपकी  शरण में आयी हूँ |
  • तेईसवें पाशुरम् में, भगवान् कृष्ण इस बात का आभास करते  है कि उन्होंने आण्डाळ् बहुत प्रतीक्षा करवाई है| तब भगवान कृष्ण आण्डाळ् से , उनकी क्या इच्छा है पूछते है|  आण्डाळ् भगवान् से निवेदन करती हैं कि आप निद्रा त्याग , शय्या से उठकर ,  सिंहराज की तरह चलते हुये, सभागार में सिंहासन पर बिराजमान होकर , मेरी  प्रार्थना सुनें|
  • चौबीसवें पाशुरम् में, आण्डाळ् भगवान कृष्ण को  सिंहासन पर आसीन देखकर आनन्दभाव से प्रसन्नचित हो भगवान का मङ्गलाशासन करती हैं |  पेरियाळ्वार् की पुत्री होने के नाते , अपने पिता की तरह, दंडकारण्य के ऋषियों की तरह , माता सीताजी की तरह , आण्डाळ् का परम  ध्येय ही भगवान् का मङ्गलाशासन करना है | , भगवान को स्वयं से और सखियों के साथ  मिलकर कष्ट दिया ,अनुभव कर , भगवान का  मङ्गलाशासन  करती  हैं |
  • पच्चीसवें पाशुरम् में जब सिंहसनाधीश भगवान कृष्ण आण्डाळ् और उनकी सखियों से पूछते है , उनके व्रत अनुष्ठान के लिये और कोई वस्तु, द्रव्य की आवश्यकता तो नहीं.?  आण्डाळ् कहती है , भगवन आपके गुणानुवाद से हमारे सारे दुःख कष्ट दूर हो गये, भगवान् को अपने कोमल पादारविन्द  आगे बढाते देख कहती है ,  हमें तो बस आपके चरण कमलों का कैंकर्य  चाहिये|
  •  छब्बीसवें पाशुरम् में आण्डाळ् व्रत को परिपूर्ण रूप से संपन्न करने के लिये भगवान् से कुछ सामग्री के लिये निवेदन करती है | यद्यपि, पिछले पाशुरम् में आण्डाळ् ने भगवान् के पूछने पर, कहा था की , चरण सेवा के सिवा किसी और वस्तु सामग्री को नकार दिया था| इस पाशुरम् में अब आण्डाळ् व्रत सम्पन्न करने के लिये कुछ सामग्री वस्तु निवेदन करती है| आण्डाळ् भगवान से इन वस्तुओं का निवेदन करती है, पाञ्चजन्य शंख , मङ्गलाशासन करने के लिये परिकर , भगवान् के सुन्दर स्वरुप के स्पष्ट दर्शन करने के लिये दीप, एक ध्वज जो भगवान की उपस्तिथिति की अनुभूति कराये और एक वस्त्र जो छतरी की अनुभूति करवा सके | हमारे पूर्वाचार्य अपने व्याख्यानों में यह व्यक्त करते है कि आण्डाळ् को इन वस्तुओं की आवश्यकता , उनके पूर्णरूपेण कृष्णानुभव के लिये चाहिये थी| इस पाशुरम् में आण्डाळ् स्वयं सिद्ध करती हैं कि आण्डाळ् और उनके सखियों पर भगवान् का प्रेम उनके प्रेम से बृहत्तर है |
  • सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें पाशुरम् में, आण्डाळ् ने स्पष्ट रूप से प्रमणित किया है की , प्राप्य (लक्ष्य / ध्येय) और प्रापक (साधन / युक्ति ) दोनों भगवान् श्रीमन्नारायण ही हैं
  • सत्ताईसवें पाशुरम् में आण्डाळ् ने भगवान के विशिष्ट गुण की व्यख्या करते हुये कहती है की, भगवान् श्रीमन्नारायण , दोनों ही , ” आस्तिक / अनुकूल” लोग (भक्त) और ” नास्तिक / प्रतिकूल” लोगों को (भगवान् को अस्वीकार करनेवाले) अपनी ओर आकर्षित करते है | साथ यह भी स्थापित करती है की जीव का चरम लक्ष्य “सायुज्य मोक्ष” प्राप्त कर भगवान के दिव्य धाम में उनकी नित्य सेवा (भगवत् कैङ्कर्य) का आनन्द प्राप्त करें |
  • अट्ठाईसवें पाशुरम् में आण्डाळ्, यह स्पष्ट समझाती है की भगवान् का सभी जीवात्माओं से “निरुपाधिक सम्बन्ध ” (शाश्वत सम्बन्ध ) है | भगवत प्राप्ति के लिये किसी भी साधना अनुष्ठान को करने स्वयं को असमर्थ समझती है| भगवान् का गुणानुवाद करते हुये भगवान की महानता समझाती है | भगवान अपने भक्त के उद्धार के लिये , बिना उससे किसी अपेक्षा के (जीवात्मा से बिना किसी अपेक्षा के, वृन्दावन के धेनु जैसे) सदा तत्पर रहते है , और यह तथ्य प्रमाणित करती है |
  • यह पाशुरम् हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है| एक शरणागत के लिये नायनार छः गुणों का समीकरण बतलाते हैं:o भागवत को “सिद्धोपाय निष्ठ” (भगवान् को ही उपाय स्वीकार करने वाला ) होना चाहिये , उसके पास भगवान् को प्राप्त करने की लिये , अर्पित करने सिवाय अपनी निष्ठां के कुछ नहीं होना चाहिये स्वयं को कोई योग्य न मानते हुये सदा स्वयं को अधम मानना चाहिये , सदा नम्र रहना चाहिये भगवान को सदा “मूल सुकृत” (सभी माङ्गल्य के कारण) जान , सदा उनके दिव्य गुणोंका चिन्तन करते  रहना चाहिये. भगवान का और जीवात्मा के शाश्वत सम्बन्ध का अनुभव करते रहना
    अनादि काल से करते आ रहे, अपराधों के लिये क्षमा याचना करते रहना चाहिये सदा भगवान् से नित्य कैङ्कर्य के लिए प्रार्थना करना
  • उन्तीसवें पाशुरम् में, आण्डाळ् देवी यह प्रकट करती है की , भगवद कैङ्कर्य , केवल भगवान् के आनन्द के लिए है (न कि स्वयं के लिये ), और यह तत्व शरणागति में अति महत्वपूर्ण है | यहाँ पराम्बा गोदाम्बाजी स्पष्ट कहती है की “व्रत” तो केवल कृष्णानुभव करने का प्रयोजन मात्र था, उन्हें तो कृष्ण से मिलने की लगन थी |
  • तीसवें पाशुरम् में श्री भगवान पराम्बा माँ गोदाम्बा देवी के सभी मनोरथ पूर्ण करने का आश्वासन देते है.|
    २९ वे पाशुरम् तक देवी आण्डाळ् भगवान का गुणानुवाद , और भगवान से मिलने की अभिलाषा लिये प्रार्थना गोपी भाव से कर रही थी | इस पाशुरम् में भगवान से आश्वासन पा कर , अब स्वयं के भाव से इस जगत के जीवों को सम्बोधित कर अपार करुणावरुणालय माँ गोदाम्बा जी कह रही है , इन ३० पाशुरों का जो भी अनुसंघान करता है, वह उन्ही की तरह भगवान के कैंकर्य को प्राप्त करता है| साथ यह भी स्पष्ट दर्शाती है की इस अनुसंघान में, प्रेमभाव या निष्ठा भले ही उनकी तरह या वृन्दावन की गोपियों की तरह न हो, फिर भी वात्सल्य मूर्ति माँ आण्डाळ् की कृपा से , भगवत कृपा के प्रसाद की प्राप्ति होती है| भगवान कृष्ण के समय की वृन्दावन की व्रज वनिताओं (गोपियों) की तरह ही, देवी आण्डाळ् ने श्रीविल्लिपुत्तूर को वृन्दावन मान व्रज की गोपियों की तरह ही अपनी सखियों के साथ भगवान वटपत्रशायि के मंदिर को नन्द भवन मान , भगवान को पाने इस व्रत में इन पाशुरों को गाकर भगवान को सुनाया था|यहाँ पूर्वाआचार्य श्री पराशर भट्टर स्वामीजी कहते है , जिस तरह गाय अपने बछड़े को खोने के बाद भी, नकली बछड़े को देखते ही उसके थानों में दूध प्रवाहित होने लगता है, ऐसे ही भगवान की अति प्रिय करुणामूर्ति माँ गोदाम्बाजी द्वारा गाये इन पाशुरों का गान जो भी करता है, उसे भी वही फल मिलता है जो देवी आण्डाळ् को मिला था| देवी आण्डाळ् तिरुप्पावै को क्षीराब्दि मन्थन प्रसङ्ग से विराम देती है , कारण की गोपियाँ भगवान् कृष्ण को पाना चाहती है, और भगवान् को पाने के किए माता लक्ष्मी के “पुरुषकार” की आवश्यकता है | भगवान् ने क्षीरसागर का मन्थन मुख्यतः इसलिए किया था, ताकि माता लक्ष्मी देवी का समुद्र से आविर्भाव हो और भगवान उनका वरण करें |
    अतः आण्डाळ् तिरुप्पावै इस प्रसङ्ग का उल्लेख करते हुये समाप्त करती है | और अपने व्रत के अंत में देवी आण्डाळ् अपनी आचार्य निष्ठा अभिमान जतलाते हुये स्वयं का परिचय “पट्टापीरान कोदै” (पेरियाळ्वार् की सुता) कहती हुयी इस प्रबन्ध को और अपने व्रत में तिरुप्पवे गायन को विराम देती हैं |

इस तरह नायनार् अपनी उत्तम विद्वत्ता का परिचय देते हुये , अपनी अवतारिका में बहुत ही शोभायमान रूप से तिरुप्पावै गाथा का सारांश , एक बडे अनुच्छेद के रूप में देते हैं | दास समूह , नयनार की विद्वत्ता का वर्णन करने का सामर्थ्य नहीं रखते , किन्तु उनके इस ज्ञान पर विस्मय होता है | ऐसा ज्ञान जब भगवान् की परम भक्ति के साथ मिश्रित हो तब यही परिणाम , हमारे लिए परम भगवत् अनुभव हो जाता है | हमारे पूर्वाचार्योनें तिरुप्पावै को बहुत सराहा है और हमारे सम्प्रदाय और नित्यानुसन्धान में तिरुप्पावै का विशेष स्थान है | हम केवल देवी आण्डाळ् के चरणकमलों में प्रार्थना कर सकते हैं कि, उनके भगवान् और भागवतों के प्रति जो प्रेम है, उसका लेशमात्र भी हमारे मन में भी विकसित हो |

अडियेन विजयकुमार रामानुज दासन्
अडियेन श्याम्सुन्दर् रामानुज दासन्

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