Monthly Archives: September 2015

प्रपन्नामृत – अध्याय ७०

🌷 श्रीभट्टार्य का विजय 🌷

🔹श्री पराशर भट्टार्य समस्त शिष्योंके साथ श्रीरंग पट्टण के समीप पहुँचे।

🔹एक ब्राह्मण ने उन्हे कहा की अगर वेदान्ति को मिलना है तो समस्त वैभव को त्यागकर एक याचक के रुपमें उनके अन्नक्षेत्र में मिलें। अन्यथा मिलना दुष्कर होगा।

🔹श्री पराशर भट्टार्य याचक के रुपमें वहाँ गये और वेदान्ति से बोले, “मैं भिक्षा के रुप में शास्त्रार्थ करने की प्रार्थना करुंगा”

🔹वेदान्ति ने पराशर भट्टार्य के बारेमें सुना था।

🔹वेदान्ति नें यह सोचा की इस संसारमें मुझसे शास्त्रार्थ करनेकी अभिलाषा करनेवाले केवल पराशर भट्टार्य ही हो सकते हैं।

🔹वेदान्ति ने पुछा, “आप महान श्रीवैष्णव श्री पराशर भट्टाचार्य तो नही हैं?”

🔹पराशर भट्टार्य नम्रता से बोले, “हाँ मै कुरेशाचार्य का पुत्र पराशर भट्टार्य ही हुँ”

🔹वेदान्ति ने सविनय पराशर भट्टार्य की पूजा करके उनसे तत्वार्थ के लिये प्रार्थना की।

🔹पराशर भट्टार्य ने श्रीभाष्य के माध्यम से तत्वार्थोंका उपदेश दिया।

🔹वेदान्ति ने उपदेश पाकर वहीं श्री पराशर भट्टार्य का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया।

🔹श्री पराशर भट्टार्य ने उन्हे पञ्चसंस्कारोंसे दीक्षित किया और “माधवदास” यह भगवत् संबंधी नामकरण किया।

🔹श्री पराशर भट्टार्य ने माधवदास को उपदेश दिया,

1.चित्-अचित् शरीरवाले श्रीमन्नारायण ही परब्रह्म हैं।
2.वही जगत् के कारण स्वरुप हैं।
3.सभी वेदान्त दर्शनोंमें भगवान् विष्णु ही ब्रह्म कहे गये हैं।
4.वही नारायण, हरी, अविनाशी, लक्ष्मीश, पुंडरीकाक्ष, “ब्रह्मा-रुद्र आदि देवताओंके भी देवता”, जड चेतनात्मक जगत्कर्ता, “धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के प्रदाता” कहे गये हैं।
5.ऐसे दयामय भगवान का दासत्व भाव ही आत्म कल्याण का साधन है।

🔹इस प्रकार महान मायावादी विद्वान वेदान्ति को अपना शिष्य बनाकर श्री पराशर भट्टार्य श्रीरंगम लौट आये।

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प्रपन्नामृत – अध्याय ६९

🌷 श्री भट्टार्य का विजय प्रस्थान 🌷

🔹श्री यतिराज रामानुजाचार्य ने वेदान्तसार, वेदान्त दीप, वेदार्थ-संग्रह, श्रीभाष्य, गद्यत्रय आदि अनेक ग्रंथोंकी रचना की।

🔹श्री यतिराज के वैकुण्ठ गमन के पश्चात् श्री पराशर भट्टार्य ने श्री गोविन्दाचार्य की सेवा द्वारा शीघ्र ही उभय वेदान्त का ज्ञान संपादन किया।

🔹श्री पराशर भट्टार्य स्वामीजी को ज्ञात हुवा की पश्चिम दिशा में श्रीरंगपट्टण नामक स्थानपर श्रीवेदान्ति नामक प्रसिद्ध, सर्व शास्त्र तत्वज्ञ मायावादी विद्वान निवास करते हैं, जिन्होने छ: दर्शन सिद्धान्तोंके विद्वानोंको पराजित किया है।

🔹श्री पराशर भट्टार्य ने तात्काल उस मायावादी वेदान्ति को पराजित करने की ईच्छा की।

🔹श्री परकाल स्वामीजी ने जिस दिव्य प्रबंध से भगवान के अलौकिक प्रभाव का अनुभव किया था उसके द्वारा इस समय उस वेदान्ति तो जीतना चाहिये, ऐसा विचार करके श्री पराशर भट्टार्य रंगनाथ भगवान के सन्निधी में आये।

🔹उन्होने भगवान से निवेदन किया, “वेदान्ति नामक विद्वान को जीतकर तथा अपना शिष्य बनाकर फिर आपकी सेवा में आउंगा।”

🔹भगवान ने उन्हे आज्ञा देकर बहुमान पुर्वक विदा किया।

🔹श्री पराशर भट्टार्य ने समस्त शिष्य समुदाय के साथ श्रीरंग पट्टण के लिये प्रस्थान किया।

प्रपन्नामृत – अध्याय ६८

🌷 श्रीयतिराज का वैकुण्ठ गमन 🌷

🔹वैकुण्ठ गमन से पुर्व श्री यतिराज ने श्री पराशर भट्ट स्वामीजी को श्रीरंगेश के दास्यसाम्राज्य का राजा बनाया।

🔹श्री रंगनाथ भगवान की सन्निधीमें श्री पराशर भट्टार्य को तीर्थ शठकोप दिलवाकर समस्त श्रीवैष्णवोंको कहा, “ये रंगनाथ भगवान के पुत्र हैं और श्रीवैष्णव दर्शन को बढानेवाले तथा आपके रक्षक हैं।”

🔹तत्पश्चात श्री यतिराज पराशर भट्टार्य को सभी विद्वानोंके सन्मुख बोले, “पश्चिम दिशा में वेदान्ति नामक विद्वान है जिसे आप अतिशीघ्र शास्त्रार्थ में पराजित करते हुये अपने सिद्धान्त में दीक्षित कीजिये।”

🔹तदनन्तर सबसे क्षमा प्रार्थना करके गद् गद् कण्ठ होकर श्री यतिराज ने श्री गोविन्दाचार्य के अंकमें सिर रखा और श्रीआन्ध्रपुर्णाचार्य के अंकमें चरण रखकर सोगये।

🔹भृगुवल्ली, ब्रह्मवल्ली तथा सभी दिव्य प्रबन्धों के पाठ होनेपर श्री महापुर्णाचार्य स्वामीजी के चरणारविंदो का ध्यान करते हुये श्रीयामुनाचार्य की चरणपादुका आगे रखकर स्वयं कपाल भेदन कर ब्रह्मरंध्र के मार्ग से शरीर त्याग कर वैकुण्ठ पधार गये।

🔹वह दिवस था माघ शुक्ल दशमी।

🔹उस समय आकाशवाणी हुयी की साक्षात धर्म भूलोक से चल बसे।

🔹श्री दाशरथि, श्री आन्ध्रपूर्णाचार्य, श्री गोविन्दाचार्य, श्री कुरेशाचार्य ने प्रधान रुपसे सभी संस्कार सम्पन्न किये।

🔹पुत्राभिमान रखने के कारण श्री कुरेशाचार्य स्वामी ने सभी ब्रह्ममेधादि चरम कैंकर्य विस्तारपुर्वक तथा विधिवत् सम्पन्न किये।

🔹तत्पश्चात श्री गोविन्दाचार्य प्रचार प्रसार करने लगे तथा श्री यतिराज के वियोग में कुछ समय के बाद परमधामको चले गये।

🔹श्रीपराशर भट्टर ने श्री गोविन्दाचार्य का विधिवत् चरम कैंकर्य सम्पन्न किया।

🔹इसके बाद श्री रंगनाथ भगवान के पुत्र श्री पराशर भट्टार्य सर्वत्र श्री रामानुज सिद्धान्त का प्रचार करते हुये बिराजें।

प्रपन्नामृत – अध्याय ६७

🌷 श्रीयतिराज का परमधाम गमन 🌷

🔹श्रीरंगम निवासी सभी श्रीवैष्णवोंके पुछनेपर यतिराज ने सबको कर्तव्य का आदेश दिया।

🙏🏼 लोकसुख प्रारब्धाधीन और मोक्षसुख भगवत्संकल्पाधीन होने के कारण दोनों के  विषय में निश्चिन्त रहना चाहिये।

🙏🏼 ऐसे प्रपञ्चोंमें पडनेसे शरणागति व्यर्थ हो जाती है।

🙏🏼 आपलोगोंको मोक्ष का उपाय मानकर कोई कर्म नही करना चाहिये अपितु भगवत् कैंकर्य मानकर शुभकर्मोंको करना चाहिये।

रामानुजाचार्य ने आगे कहा –
1. भगवान श्रीमन्नारायण के कैंकर्यभूत श्रीभाष्य का आजीवन श्रवण करना चाहिये।

2. यदि यह न हो सके तो आल्वारोंद्वारा प्रणित दिव्य प्रबंधोंका अभ्यास कर प्रतिदिन शिष्योंको उस विषय का उपदेश देना चाहिये।

3. यदि यह भी न हो सके तो निरन्तर दिव्यदेशों में भगवान श्रीमन्नारायण का कैंकर्य करें।

4.यदि यह भी नही हो सके तो यादवाद्रि में पर्णकुटी बनाकर अहंकार का त्याग करके सदैव निवास करें।

5.यदि यह भी नही होसके तो जीवनपर्यन्त आलस्य का त्याग करके अर्थसहित द्वयमन्त्र का अनुसन्धान कर ईश्वर पर निर्भर होकर निवास करें।

6.यदि यह भी नही होसके तो निरन्तर ज्ञान भक्ति आदि गुणोपेत अहंकारहीन श्रीवैष्णवोंके आदेश का पालन करते उनकी सेवामें संलग्न रहें। यही भवसागर पार होने का अन्तिम उपाय है।

🔹शिष्योंको उपरोक्त लोककल्याणकारी उपदेश देकर यतिराज श्रीरामानुजाचार्य परमधाम पधार गये।

🔹उनके उपदेशानुसार संसारमें वास करनेवाले श्रेष्ठ अधिकारियोंके लिये विरोधी, अनुकूल एवं तटस्थ ये तीन प्रकार के विषय हैं।

🔹भागवतोंमें प्रेम उत्पन्न करनेवाले विषय अनुकूल कहे जाते हैं।

🔹विरोधी विषयोंको अग्नि और सर्प को भाँति दूर से ही त्याग देना चाहिये।

🔹श्रीवैष्णवोंकी संगति से मुक्ति देनेवाला सम्यग् ज्ञान होता है।

🔹धन की इच्छा से अनुकूल विषयोंका अनादर एवं प्रतिकूल विषयोंका सेवन भगवान के लिये शोकदायी होता है।

🔹भगवान भागवतापचार से व्याकूल हो जाते हैं।

🔹अत: अर्थ की ईच्छा से भी विरोधीयोंकी सेवा न करें।

🔹विरोधियों का द्रव्य केवल विरोध के लिये होता है।

🔹किसी श्रीवैष्णव नें यदि किसी एक विरोधी से किसी भी वस्तु की याचना की तो उससे भगवान का उसी तरह अपमान होता है जैसे किसी सार्वभौम राजा की स्त्री द्वारा किसी क्षत्रिय के पास याचना करना।

🔹अत: अर्थ कामना से किसी व्यक्ति से याचना न करें।

🔹भागवतोंका अपमान करने से पूर्व-प्राप्त भक्ति भी निष्फल होकर नष्ट होजाती है।

🔹जिनमें ईर्ष्या-द्वेष-मद न हो ऐसे विलक्षण तथा श्रेष्ठ श्रीवैष्णव महात्माओं के साथ सर्वदा निवास करना चाहिये।

प्रपन्नामृत – अध्याय ६६

🌷 श्रीभूतपुरी माहात्म्य 🌷

🔹श्रीरामानुजाचार्य वैकुण्ठ गमन से ३दिन पुर्व अहर्निश गूढार्थ का उपदेश देते रहे।

🔹यतिराज ने सभी शिष्योंको बताया की उनका ४ दिनमें वैकुण्ठगमन निश्चित है।

🔹सभी शिष्य दु:खी होकर शरीर त्यागनेके लिये तैय्यार होगये तो यतिराजने बताया, “मेरे वियोगमें शरीर त्यागोगे तो पतित होजाओगे”

🔹शिष्य बोले, “हम आपकी सेवाके बिना एक क्षण भी नही रह सकते, अत: आपही कुछ उपाय बताईये”

🔹यतिराज ने कृपावश अपना ही एक अर्चाविग्रह बनवाया और उसका गाढालिंगन करके विग्रह का ब्रह्मरंध्र सूँघकर उसमें अपनी शक्ति प्रतिष्ठित करदी।

🔹इस अर्चाविग्रह की सविधी प्रतिष्ठापना करके यतिराज ने उन्हे उसी अर्चाविग्रहकी प्रेमपुर्वक सेवा करनेका आदेश दिया।

🔹अवतार स्थल श्रीभूतपुरी के समान श्रीरंगम तथा यादवाद्रि पर भी यतिराज ने विग्रह बनवाकर गाढालिंगन करके अर्चाविग्रह की स्थापना करायी।

🔹लोकसंरक्षक यतिराज के श्रीविग्रह का दर्शन आज भी श्रीभूतपुरीमें होता है।

🔹यतिराज का अवतार स्थल श्रीभूतपुरी सभी दिव्यदेशोंसे श्रेष्ठ है। अत: मुमुक्षुओंको चाहिये की यहाँपर निवास करें।

प्रपन्नामृत – अध्याय ६५

🌷श्री यतिराज के द्वारा ७४ वाक्यों का उपदेश🌷

🔹परम ऐश्वर्य सम्पन्न श्रीरामानुजाचार्य के भूमण्डल में रहते हुये १२० वर्ष होगये।

🔹उन्होने जीवनके ६० वर्ष श्रीरंगम में व्यतीत किये।

🔹अब यतिराज ने वैकुण्ठ जाने का निश्चय किया और यह निश्चय भगवान को निवेदन किया।

🔹भगवान ने अनुमति प्रदान की और वर माँगनेको कहा।

🔹रामानुजाचार्य बोले, “मेरे शरणागत के सम्बन्धी के सम्बन्धी की चरमविधि की परम्परा में आनेवाले सभी को मोक्ष मिले।

🔹भगवान नो उनकी प्रार्थना स्वीकार की।

🔹फिर यतिराज ने वैकुण्ठ को प्रस्थान करनेसे पहले अपने शिष्योंको ७४ वाक्योंका उपदेश दिया।

1. अपने आचार्य एवं अन्य श्रीवैष्णव भागवत दोनोंका कैंकर्य समान भाव से करना चाहिये।

2. पुर्वाचार्योंके ग्रंथोंमें विश्वास रखना चाहिये।

3.इन्द्रियोंका दास बनकर नही रहना चाहिये।

4.सामान्य शास्त्रोंमें आग्रह बुद्धि नही रखनी चाहिये।

5.भगवद्विषयक शास्त्रोंमें ही रुचि रखनी चाहिये।

6.आचार्य कृपा से यदि ज्ञान सागर हृदयमें लहरा उठे तो भूलकर भी शब्दादि विषयोंका दास नहीं बनना चाहिये।

7.शब्दादि विषयोंको सामान्य दृष्टि से ही देखना चाहिये।

8.पुष्प चन्दन पान आदि में वासना बुद्धि नही रखनी चाहिये।

9.भगवन्नाम संकीर्तन के समान ही भागवत नाम संकीर्तन भी करना चाहिये, यह सोचकर की भागवतोंके आश्रयण से ही भगवान की प्राप्ति होती है।

10.भागवतोंके आदेश का पूर्णत: पालन करना चाहिये।

11.रागादि से प्रेरित होकर यदि अज्ञ मनुष्य भगवान का और भागवतोंका कैंकर्य छोडेंगे तो वे विषयोंमें आसक्त होकर नष्ट होजायेंगे।

12.श्रीवैष्णव स्वरुप अनुष्ठान भगवत्प्राप्ति का उपाय न मानकर उपेय रुप समझना।

13.महाभागवतोंको एकवचन से नहीं बुलाना चाहिये।

14.श्रीवैष्णवोंको देखतेही हाथ जोडकर प्रणाम करें।

15.भगवान की एवं श्रीवैष्णवोंकी सन्निधी में पैर फैलाकर न बैठे।

16.भगवान, श्रीवैष्णव और गुरुदेव के स्थान की तरफ पैर फैलाकर न सोवें।

17.प्रात:काल जागकर गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करें।

18.भगवत् सन्निधी में बैठे हुये भागवतोंको देखें तब “समस्त परिवार विशिष्टाय श्रीमते नारायणाय नम:” कहकर साष्टांग करें।

19.भगवत् भागवतोंका गुणानुवाद करते हुये श्रीवैष्णवोंकी यथाशक्ति पूजा किये बिना और प्रणाम किये बिना चले जाना महान अपचार है।

20.श्रीवैष्णवोंका आगमन सुनकर सन्मुख आगे बढ़कर स्वागत करना और जाते समय कुछ दूर साथ चलकर बहुमानपूर्वक विदा करना चाहिये, ऐसा न करनेसे अपचार होता है।

21. आत्मा के उज्जीवन के लिये अपने को श्रीवैष्णवोंका शेषभूत मानकर श्रद्धापुर्वक श्रीवैष्णव महात्माओंकी आज्ञा का अनुसरण करते हुये शरीर पोषण कीजिये और लोगोंके घर-घर भटकना और अपने नियमोंको छोड़ना यह ही अनाचार है और श्रीवैष्णव स्वरूप के लिये हानिकारक है।

22.भगवान के मन्दिरों, गोपुरों एवं विमानोंको देखकर हाथ जोड़ें तथा अन्य देवताओं के विमान को देखकर आश्चर्य न करें।

23.देवतान्तर की महिमा सुनकर विस्मय न करें।

24.भगवत् भागवत् महिमा वर्णन करते हुये पुण्य पुरुषोंको देखकर आनन्दित होना चाहिये।

25.किसी श्रीवैष्णव की छाया का उल्लंघन न करें।

26.अपने देह की छाया भी श्रीवैष्णवों पर न पड़ने दें।

27.इतर लोगोंका स्पर्श करनेके बाद श्रीवैष्णवोंका स्पर्श न करें।

28.दरिद्र श्रीवैष्णव के अभिवादन का प्रत्युत्तर न देना भागवत अपचार है।

29.”मैं दास हूँ” ऐसा कहकर प्रणाम करनेवाले श्रीवैष्णव का आदर करना चाहिये। अनादर करना महान अपचार है।

30.श्रीवैष्णवोंके जन्म, कुल और आलस्यादि का निरूपण नहीं करना चाहिये।

31.श्रीवैष्णवोंके दोषोंको देखे बिना गुणों की ही चर्चा करनी चाहिये।

32. सामान्य जनोंके सन्मुख भगवान का तीर्थ और भागवतोंका श्रीपादतीर्थ नही लेना चाहिये।

33. तत्वत्रय और रहस्यत्रय को नहीं जाननेवालों का तीर्थ नहीं लेना चाहिये।

34. ज्ञानी एवं सदाचारी श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ प्रयत्नपूर्वक लेना चाहिये।

35. भागवतों और मुझ (यतिराज) में समबुद्धि नही रखनी चाहिये।

36.यदि भूलसे भी प्राकृत लोगोंका स्पर्श होजाय तो वस्त्रोंसहित स्नान करके श्रीवैष्णवोंका श्रीपादतीर्थ लेना चाहिये।

37.भक्ति, ज्ञान, वैराग्य सम्पन्न महात्माओं को नित्य सूरी के समान मानकर उनमें विश्वास करना चाहिये।

38.ज्ञान, भक्ति, वैराग्य सम्पन्न श्रीवैष्णव महात्माओं मे प्रेम बढाना चाहिये।

39.प्राकृत लोगोंके घरपर भगवान का तीर्थ नही लेना चाहिये।

40.प्राकृत लोगोंके घरमें स्थित भगवान के विग्रह की सेवा नही करनी चाहिये।

41.भगवान के दिव्य देशोंमें साधारण जन के देखनेपर भी तीर्थ प्रसाद ग्रहण करो क्यों की दिव्य देशोंमें दृष्टि दोष नहीं माना जाता।

42.”दास ने आज एकादशी व्रत किया है” ऐसा कहकर भगवान की सन्निधीमें भागवतोंके द्वारा दिये गये गोष्ठीप्रसाद का त्याग नही करना चाहिये।

43.समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले भगवत् प्रसाद में कभी भी उच्छिष्ट भावना नही करनी चाहिये।

44.कभी भी श्रीवैष्णव के सामने अपनी प्रशंसा न करें। नित्य नैच्यानुसंधान रत रहें।

45.श्रीवैष्णवोंकी सन्निधी में किसी का तिरस्कार न करें।

46.श्रीवैष्णव महात्माओं के गुणोंका अनुभव तथा उनकी सेवा क्षणभर भी किये बिना कोई कार्य न करें।

47.दिनमें एक घडी भी अपने आचार्य के गुणोंका अनुसंधान करना चाहिये।

48.दिनभर में एक घडी भी दिव्यसूरियोंके प्रबंधोंका अनुसंधान करना चाहिये।

49.प्रतिदिन कम-से-कम एक घडी अपने आचार्य देव के गुणोंका अनुसंधान करना चाहिये।

50.देहाभिमानी जनोंका संग न करें।

51.शंख चक्रांकित होनेपर भी विषयातुर एवं लम्पट व्यक्तियोंका संग कदापि न करें।

52.पर छिद्रान्वेषी जनों से वार्तालाप न करें।

53.संयोगवश देवतान्तरों के भक्तोंका संग होजाय तो उस दोष निवृत्ति के लिये महाभाग्यशाली श्रीवैष्णवोंका संग करें।

54.भगवान के भक्तोंके निन्दक जनोंको कभी भी न देखें।

55. आचार्य द्वेषी लोगोंको भी कभी नहीं देखना चाहिये।

56.द्वयमंत्र में निष्ठा वाले पुरुषोंका सहवास करें।

57.उपायान्तरमें जिसकी निष्ठा हो ऐसे व्यक्तियोंका संग त्यागना चाहिये।

58.प्रपत्तिमें जिसकी निष्ठा हो उनका सहवास करना चाहिये।

59.रहस्यत्रय एवं तत्वत्रय के मर्मज्ञ महाभागवतों का सदा संग करें।

60.अर्थ और काम में तत्पर रहनेवालोंके साथ कभी भी न रहना चाहिये। भगवान की भक्तिमें श्रद्धा रखनेवालोंके साथ रहना चाहिये।

61.यदि किसी श्रीवैष्णव के द्वारा आपका तिरस्कार भी हो जाय तो बुरा न मानकर मौन रहना चाहिये और उसे याद न रखना चाहिये।

62.श्रीवैष्णवोंकी ईच्छा परमपदमें प्रगट हुई थी, यह जानकर श्रीवैष्णवोंकी निरन्तर भलाई करें।

63.धर्म विरुद्ध महाफल देनेवाले कर्म को भी बुद्धिमान न करें क्योंकि वह अहितकर होता है।

64.भगवान को समर्पित किये बिना अन्न ग्रहण नही करना चाहिये।

65.उपायान्तरसे बिना माँगे मिलनेवाली कोई भी वस्तु स्वीकार न करें।

66.पुष्प, चन्दन, पान, फल, वस्त्र, जल आदि भी भगवान को समर्पित किये बिना ग्रहण न करें।

67.जातिदुष्ट, निमित्तदुष्ट और आश्रयदुष्ट अन्न भगवान को समर्पित न करें।
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68.अपनी रुचि के लिये अपने को प्रिय पदार्थ परमात्मा को भोग न लगावें। शास्त्रानुसार सभी पदार्थों का भगवान को भोग लगावें।

69.भगवान के समर्पित अन्न, जल, फल आदि में सदा प्रसाद बुद्धि रखनी चाहिये, भोग बुद्धि कभी न रखें।

70.भागवतापचार अपना नाश एवं भागवतमुखोल्लास ही अपनी उन्नति है।

71.मन्त्रत्रय (मूल, द्वय, चरम) इन तीनों मन्त्रार्थ में पूर्ण निष्ठा रखनेवाले महाभागवतोंके शास्त्रीय कर्मोंको कैंकर्य बुद्धि से सम्पन्न करें।

72.भागवतोंकी पूजा से बढकर पुरुषार्थ नही और भागवत द्वेष से बढकर आत्मनाश नही।

73.अर्चावतार भगवान में शिलाबुद्धि, आचार्यदेव में मानव बुद्धि, श्रीवैष्णवोंमे जाति की भावना, तीर्थमें सामान्य जल की  भावना, सिद्ध मंत्रोमें सामान्य शब्द की भावना, सर्वेश्वर भगवान को अन्य देवोंसमान मानना यह सब नरक में डालनेवाले महापातक हैं और भगवत भागवत आचार्य अपचार हैं।

74.भागवत पूजा भगवत पूजा से श्रेष्ठ है। भगवतोंका तिरस्कार भगवान के अपमान से अधिक पापजनक है। भागवतोंका श्रीपादतीर्थ भगवानके चरणोदक से उत्तम है। अत: आलस्य रहित होकर भागवतोंकी आराधना में तत्पर रहना चाहिये।

प्रपन्नामृत – अध्याय ६४

🌷जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य का प्रभाव 🌷

🔹एकबार धनुर्धरदास स्वामीजी बोले “बिभीषण जी स्त्री पुत्र आदि का त्याग करके श्री रामजी की शरणागति किये परंतुु मैंने तो कुछ नही त्याग किया है। मेरी गति कैसे होगी?”

🔹रामानुजाचार्य बोले, “अगर शठकोप स्वामीजी को मुक्ति मिली है, यामुनाचार्य, महापुर्णाचार्य को मुक्ति मिली है तो मुझे मुक्ति मिलेगी। और अगर मुझे मुक्ति मिलती है तो तुम्हे भी अवश्य मिलेगी।”

🔹बिभीषण के साथियों ने अलगसे शरणागति नही की। उनको बिभीषण के संबंध मात्र से मुक्ति मिली।

🔹शत्रुघ्नजी ने भरतजी की शरणागति की, मधुरकवि स्वामीजी ने शठकोप स्वामीजी की शरणागति की, गोदाम्बाजी ने विष्णुचित्त स्वामीजी की शरणागति की, सभी बडे बडे महात्माओंने अपने अपने गुरुदेव की शरणागति से मोक्ष प्राप्ति की।

🔹भगवत्प्राप्ति आचार्यादेश के पालन से ही सम्भव है।

🔹सभी दिव्य देशोंके भगवान रामानुजाचार्य के हृदयमें विद्यमान हैं।

🔹यतिराज रामानुजाचार्य जीवोंके लिये उपाय-उपेय दोनों ही हैं।

🔹रामानुजाचार्य के नामोच्चारण से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

🔹”रामानुज” इन चार अक्षरोंके स्मरण बिना संसार बंधन छूट नही सकता।

🔹रामानुजाचार्य का पूजन ही परम पुरुषार्थ है।

🔹रामानुजाचार्य के चरणाश्रित महात्मा जहाँ निवास करते हैं वही परमपवित्र स्थान है।

🔹कोई प्रबल प्रयास करके समुद्र को तैर सकता है पर श्रीयतिराज के चरित्र का आद्योपान्त वर्णन असम्भव है।

🔹जैसे रामराज्यमें प्रजा रोगरहित, उपद्रवरहित, धर्मरत, शान्त, दीर्घजीवी हुयी उसी प्रकार रामानुजाचार्य द्वारा रक्षित मनुष्य दीर्घजीवी, महात्मा एवं श्रीवैष्णव हुये।

🔹रामानुजाचार्य की उपस्थिति में कलियुगमें धर्म चारों चरणोंसे पृथ्वीपर प्रतिष्ठित हुवा।

🔹रामानुजाचार्य की उपस्थिति में समय से वर्षा होती थी, पृथ्वी सस्य श्यामला थी, राजा धर्मपरायण थे, मनुष्य ईर्ष्या-द्वेष-आलस्य-क्रोध-भय रहित होकर धर्म में संलग्न और अत्यन्त शान्त थे और पृथ्वी वैकुण्ठ समान होगयी थी।

🔹रामानुजाचार्य के समय में चित्रगुप्त और यमराज का कार्य बन्द होगया था।