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श्री वैष्णव लक्षण – ११

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग)

4. pl-goshtiश्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी – कालक्षेप गोश्टि

पिछले लेख में हमने सामान्य निर्देश देखे कि कैसे एक श्रीवैष्णव इस संसार में रहकर अपना जीवन काल बिताये। अब हम श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के श्रीवचन भूषण, जो एक दिव्य शास्त्र है, में देखेंगे और समझेंगे कि एक श्रीवैष्णव कि दिनचर्या कैसी होनी चाहिए।

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी श्रीवचन भूषण में भागवतों की महानता और भागवत अपचार की क्रूरता के बारें में समझाते हैं। आगे वह यह समझाते हैं कि कैसे एक श्रीवैष्णव कि दिनचर्या होनी चाहिए। अब हम उन्ह सुत्रों को देखेंगे जो हमारे पूर्वाचार्यों के सारे तत्वों का सार है।  

  • इस शोकार्त संसार में रहते हुए हमें हमेशा इस बात पर क्याल रखना चाहिए कि :- 

  • हमारा शरीर ही हमारे आत्मा का सबसे बड़ा और खतरनाक दुश्मन है क्योंकि यह हमारे अहंकार का मुख्य कारण है (स्व स्वांतन्त्रियम) और हमारे इस सान्सारिक जीवन के प्रति प्रेम का प्रभाव है।

  • सांप के जैसे हम सांसारिक मनुष्यों से भी डरना चाहिए। क्योंकि यह हमारे सांसारिक मोह को जागृत करेंगे और जिसके कारण हम इस संसार कि मायाजाल में और दफ़न हो जायेंगे।

  • श्रीवैष्णव ही हमारे सच्चे आत्मबन्धु हैंक्योंकि वही हमें इस सांसारिक मोह से बाहर निकलने में मदद करेंगे और भगवद् विषयों में रुचि बढायेंगे।

  • भगवान ही हमारे परमपीता हैंक्योंकि वह हमेशा हमारे आत्मा के हित के बारें में सोचते और करते रहेंगे।

  • आचार्य हम जैसे ज्ञान-रिक्त भूके इनसान के भोजन के बारें सोचते हैंक्योंकि हम लोग ज्ञान के भूके हैं और सिर्फ आचार्य ही हमें यह ज्ञान प्रधान कर सकते हैं।

  • शिष्य वह हैं जिसे हम बहुत प्रेम करते हैंक्योंकि शिष्य के सात हम भगवद् विषयं बांट सकते हैं और वह भगवद विषयों के रस का आनंद लेता है और हमें भी भगवद् विषयं में आनन्द दिलाता है।

  • यह सब दिमाग में रखकर, हमें यह सोचना है:

  • अहंकार हमें हमारे सच्चे शुभचिन्तकों (श्रीवैष्णवों) जो हमारे आत्मा के शुभचिन्तक हैं, उनसे दूर ले जाता है और अलग कर देता है।

  • यह सांसारिक धन हमें अवैष्णवों से जोड़ता है जिस समय हम धन के पीछे भागना शुरू करेंगे, हमें सभी के आगे झुकना पढेगा और उन अवैष्णवों का कृपा पात्र बनना पढेगा। इस परिस्थिती में, हम उन अवैष्णवों के कृतज्ञ हो जायेंगे (वो जो भी कर रहा हो उसमे निपुण ही क्यों न हो)- परन्तु एसी कृतज्ञता हमारे लिये हानिकारक है क्योंकि वह हमें भगवद् विषय से दूर ले जाता है और हमें भी उनकी तरह काम करने के लिये मज़बूर करता है।

  • काम-वासना हमें अपने विपरीत लिंग के तरफ आकार्षित करता है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, लगाव से हमारे मन में काम पैदा होती है, काम से हमारे मन में इच्छाएँ उत्त्पन होती हैं, इससे हम पागल हो जाते हैं और हमारी अक्ल भी धीरे धीरे कम होती जाती है, और तब तक हम इस संसार के खोखले में गिर जा चुके होंगे।

  • इसको ध्यान में रखते हुए, हमें यह पूर्ण विश्वास के साथ प्रकट करना चाहिए कि, आत्म गुण किसी एक के परिश्रम से नहीं बनता है परन्तु भगवान की  कृपा से आचार्य द्वारा ही मिलता है और हमें एसे ही मिलना चाहिए।

  • सांसारिक विषयों के प्रति प्रेम, प्रभाव छोडना।

  • भगवद् विषय के प्रति प्रेम भाव प्रकट करना।

  • यह समझना शुरु करना चाहिए कि सांसारिक वस्तुएँ सच में सुखदायी नहीं हैं।

  • प्रसाद उतना ही पाये जितना अपने शरीर के लिये जरुरत है। या हमें प्रसाद लेना चाहिए क्योंकि वह तिरुआराधन का अंतिम भाग है (एक बार हम भोजन बनाते हैं और भगवान को नैवेध्य करते हैं तो वह प्रसाद बन जाता है और हमें उसे थोडा पाना ही चाहिए)

  • हम पर जीवन में कोई दुख या विपत्ति आये तो, हमें उसे खुशी से ग्रहण करना चाहिए, यह सोचकर कि                      1.  वह हमारा कर्म-फल है क्योंकि हम ने आज तक इतने सारे पुण्यपाप किये हैं कि हमें उसका नतीजा                   भोगना ही पडेगा, और इससे हमारा कर्म भोज काम हो रहा है।

       2.  वह भगवान की कृपा-फल है – क्योंकि हमने हमारा सारा जीवन भगवान को समर्पित कर दिया है, वह हमारे              सभी संचित कर्म को क्षमा कर देते हैं और हमें बस थोडी से दुख दे रहे हैं ताकि हम इस संसार के मोह से                छुटकारा पाए और हम परमपद की ओर प्रस्तान करने को तरसे अगर हमें इधर थोडी सी भी अच्छी जिन्दगी          मिल जाती तो हमारे मन में इस संसार के प्रति लगाव बड़ता जाएगा। इसलिय भगवान अपनी निर्हेतुक कृपा से           हमें हमारे कर्मानुसार थोडी तकलिफ देते हैं और हमें परमपद की ओर ले जाते हैं।

  • हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि, भगवान से मिलने के लिये हमारा अनुष्ठान ही उपाय है। हमें भगवान के निर्हेतुक कृपा को समझना चाहिए और सब उनके कैंकर्य समझकर करना चाहिए।

  • पूर्वाचार्यों और परम श्रीवैष्णवों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति प्रेम भाव बढाना चाहिए।

  • दिव्यदेशों के प्रति लगाव बढना चाहिए क्योंकि यहाँ भगवान अपने भक्तों के प्रति निर्हेतुक प्रेम के कारण वास करते हैं।

  • भगवान का मंगलाशासन करना चाहिए  यह प्रार्थना करना कि भगवान को इस भयानक सन्सार में कुछ खतरा न हो क्योंकि आजकल हम यह देखते हैं कि बहुत से मंदिरों में भगवान की मूर्तियाँ चोरी हो जाती हैंऔर हमें यहीं प्रार्थना करना चाहिए कि भगवान हमेशा सुरक्षीत रहें। यह भगवान के प्रति सबसे महत्वपूर्ण भक्ति भाव है जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, श्रीगोदम्बाजी, श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी, आदि ने दिखाया।

  • सांसारिक वस्तुओं से लगाव नहीं रखना चाहिए, उनसे दूर ही रहना चाहिए।

  • परमपद जाने कि मन में सच्ची मनोकामना रखेंहर रोज हम श्रीशठकोप स्वामीजी जैसे रोना चाहिए और श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी से यह पूछना चाहिए कि वह कब हमें मोक्ष देंगे ओर परमपद में भगवान का कैंकर्य करने का मौका देंगे।

  • हमें यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि हम भागवतों के प्रति मर्यादा और विनम्रता का भाव प्रकट करें और अवैष्णवों के प्रति कोई भी लगाव न रखें।

  • हमें आहार नियम (प्रसाद) का पालन करना चाहिए – विनियमित भोजन की आदतें

  • वैष्णवों के साथ सम्बन्ध करने कि चाहत रहना चाहिए।

  • अवैष्णवों से सम्बन्ध करने से बचना चाहिए।

इस सूत्रं के अंत में कहा गया है कि, यह वों बातें हैं जिसे हर श्रीवैष्णवों को अपने जीवन में पालने कि आदत करना चाहिएयह स्वैच्छिक नहीं हैं। अगर हम अपने रोज के जीवन में यह पालन करते तो, हमारे पूर्वाचार्यों ने आश्वस्त किया है कि हम एक पूर्ण श्रीवैष्णव हो सकते हैं। यह सब अपने रोज के जीवन में पालन करने के लिये (आज के परिस्थिति के अनुसार) हमें यह बहुत मुश्किल लगता है। हाँ, यह सब कुछ पालन करना मुश्किल है इसलिये हमें यह निरंतर सोचना चाहिए कि कैसे हमारे पूर्वाचार्यों ने यह पालन किया और हमारे लिए उच्च मानकों को स्थापित करके दिखाया है। परन्तु सभी को अपने जीवन में कहीं से तो शुरुवात करनी चाहिए। अगर हम लोग एक कदम बडाने की कोशिश करेंगे तो भगवान हमारी मदद जरूर करेंगे जैसे कि ऊपर कहा गया है। अगर भगवान हममे उनके प्रति थोड़ा सा भी लगाव देखते तो वे हममे उनके प्रति प्रेम की भावना को और भी विकसित कर देते हैं

यह हम सबको काल्पनिक दिखता होगा, परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों इसे पूरी तरह पालन करते थे। और हम यह सब अपने एक पूवाचार्य के जीवन में भी देख सकते हैं जो कि इन सब के लिये एक प्रतिबिम्ब थे और कैसे भगवान उनको प्रेम कर उनका सम्मान किया यह अपने अगले लेख में देखेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – १०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
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श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग)

अब तक हमने एक श्रीवैष्णव के बाह्य स्वरूप और आंतरिक स्वरूप के बारें में देखा है। यह भी देखा है कि हमें कौन से अपचारों से बचना चाहिए। अंत में हमने यह भी देखा कि कैसे हमें दूसरे श्रीवैष्णवों को उनके जन्म को बिना ख्‍याल किए उनको सम्मान देना चाहिए।

एक बार अगर हम यह सब कुछ समझ जायेंगे, तब हमें यह देखना चाहिए कि कैसे एक श्रीवैष्णव इस संसार में रहकर अपना जीवन काल बिताये। श्रीरामानुजाचार्यजी, आल्वारों और आचार्यों ने अपने लेख और ग्रन्थों में यह बहुत ही अच्छी तरह समझाया है। इन में से कुछ बहुमुल्य बातें हम अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों से देखेंगे :-

श्रीकृष्ण भगवान श्रीभगवद् गीता के १०.९ श्लोक में कहते हैं :-

मद् – चित्त मद् गत प्राण बोधयन्त परस्परं
कथयनतस् च माम नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च

मेरे भक्त केवल मेरे बारें में हीं सोचते रहते हैं, मुझे अपना जीवन मानते हैं, मेरे बारें में चर्चा करने से वक्ता और श्रोता दोनो को हीं बहुत आनन्द आता है।

वेदान्तं में (बृहदारण्यक उपनिषद), यह कहा गया है कि:

आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यः मन्तव्यः निधिद्यासितव्यः

निरन्तर परमात्मा के बारें में सुनने से, जो भी सुना हो, उसके बारें में विचार करने से, परमात्मा पर ध्यान करने से, अंत में जीवात्मा परमात्मा से मिलेगा।

श्रीभागवत पुराण में श्रीप्रल्हादजी सभी को यह ९ कार्य में लगे रहने का निर्देश देते हैं:

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद -सेवनम
अर्चनं वन्दनं सख्यं दास्यं आत्म -निवेधनम

भगवान के बारें में सुनना, भगवान पर भजन करना, उनके बारें में ही सोचना/विचार करना, उनके चरण कमल की सेवा करते रहना, उनकी पूजा करना, उनकी प्रशंसा करना, उनके दोस्त बनकर रहना, उनके दास बनकर रहना और पूरी तरह उनके चरण कमल पर आत्मसमर्पण करना, यही एक भक्त के मुख्य कार्य हैं।

श्रीशठकोप स्वामीजी, जिनको आळवन्दार श्रीवैष्णव कुलपति कहते थे, पेरिय तिरुवन्दादि के ८६वें पाशुर में पूछते हैं कि:

हम इस संसार में, जो कि पूरी तरह दुखों से भरा है, बिना भगवान के बारें में सोचे, कैसे अपना समय बितायेंगे? जो कि सुन्दर सावंले वर्ण लिए हुए , एक हाथ में पांचजन्य लेते हुए , सबको अपने जठर में रखे सबकी रक्षा करते हुए , आदिशेष में लेटे हुए उस पुरुषोत्तम के बारे में बिना सोचे कैसे जीवन काल बिता सकते हैं ? ऎसी ही दशा आल्वारों की है, जो कि एक पल के लिए भी , भगवान के बारें में न सोचने का खयाल नहीं कर सकते हैं और दूसरी तरफ, हम सांसारिक लोग यह सोचते हैं कि, हम बहुत से काम कर सकते हैं, परन्तु कोई हर वक्त भगवान के बारें में ही कैसे सोच सकता हैं?

श्रीभक्तिसार स्वामीजी, नान्मुगन तिरुवन्दादि के ६३वें पाशुर में यह कहते हैं:

वह कहते हैं कि वह अपना समय भगवान के बारें सोचने और विचार करने में, उनके बारें में लिखने में, उनके बारें में पढ़ने में, दूसरों से उनके बारें में सुनने में , बिना घमण्ड के उनकी पूजा करने में और उनकी तिरुआराधन करने में लगाते हैं।

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण के २७४वें सुत्र में कहते हैं कि एक सच्चे शिष्य जो अपने आचार्य पर पूरी तरह निर्भर है, उसके लिए :-

  • रहने कि जगह वह है जहाँ उसके आचार्य रहते हैं (अगर वह सम्भव नहीं हैं तो जहाँ भगवान रहते हैं) ।

  • बोलने का विषय केवल अपने आचार्य की महिमा और अपना दोष।

  • अनुसन्धान करना – गुरू परम्परा और द्वय महामंत्र के वाक्य को गाना और अनुसन्धान करना।

  • अपने पूर्वाचार्यों के निर्देश और इतिहास को अपनाना।

  • अवैष्णवों के सहवास का परित्याग करना और ना ही किसी भी गतिविधि प्रदर्शन करें जिससे अवैष्णवों को यह विचार प्रकट हो जाए कि हम उनमे से एक हैं

  • कर्तव्यं आचार्य कैंकर्यं भगवद् कैकर्यं” – आचार्य, भगवान और उनके भक्तों की सेवा करना।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अपने आर्तिप्रबंध में (श्रीरामानुजाचार्यजी से रोते हुए तुरन्त उन्हें इस संसार के दुखों से मुक्त करने के लिये कहते हैं), विस्तार से अपने कर्तव्यों को २८वें पाशुर में बताते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी हालाकि श्रीरामानुजाचार्यजी के हीं पुनरवतार हैं, परन्तु वें हमेशा श्रीरामानुजाचार्यजी की प्रशंसा करते रहते थे ताकि हम भी उनसे सीख लें। जिस तरह त्रेता युग में श्रीरामजी ने श्रीरंगनाथ भगवान कि पूजा करके हमें तिरुवाराधन का क्रम सिखाया था उसी तरह सिर्फ श्रीरामानुजाचार्यजी पर निर्भर रहकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने हमें सिखाया कि कैसे कोई श्री रामानुजाचार्य के चरण कमलों में निःसन्देह भरोसा रख सकते हैं

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि, उन्होंने पूर्वाचार्यों के सभी ग्रन्थों को ढूढा जो मुसलमान शासन के दोरान घुम गयी या दुसरों में बांट दी गयी थी और एकत्रित किया। इन ग्रन्थों को हमारे पूर्वाचार्यों ने अपार करूणय से हमारे ही हित के लिये लिखा है। जो भी ग्रन्थ उन्हें मिल गयी, उसको उन्होनें ताड के पेड के पत्तों पर लिखा, अपने आचार्य तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) से वह सब सीखे और उनके ही निर्देशानुसार अपना जीवन बिताया और अपने शिष्यों को भी एसे हीं जीवन बिताने का आदेश दिया।

आगे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि, अपने आचार्य श्रीशैलेश स्वामीजी के द्वारा श्रीरामानुजाचार्यजी कि कृपा मिलने के पहले, उन्हें परमपद जाने कि कोई ईच्छा नहीं थी, परन्तु एक बार जब उन पर कृपा हो गयी तब कभी भी एक क्षण भी परमपद जाने के सिवा और कोई इच्छा नहीं है।

इस तरह हम देख सकते हैं कि हमें अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए। हालाकि यह सब साधारण तत्व हैं, आगे हम श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के श्रीवचन भूषण में से एक विशिष्ट सूत्र देखेंगे जिसमे श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी संक्षिप्त रूप से वर्णन देते हैं कि एक श्रीवैष्णव को किस ढंग से रहना चाहिए।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – ९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

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श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग)

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पिछले लेख में हमने श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के काम (जो कि आचार्य और पूर्वाचार्य के काम पर आधारित है) से यह देखा कि, किसी के जन्म के आधार पर एक श्रीवैष्णव महान नहीं बनता है। परन्तु भगवान के प्रति उसके ज्ञान और भक्ति पर ही उसकी महानता निर्भर करता है| यही तात्पर्य अपने आचार्यों के द्वारा भी सम्मानित किया गया है।

श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी के छोटे भाई श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी हमारे सम्प्रदाय के एक बहुत ही महान आचार्य थे। श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी और श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् दोनो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) (श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी के खास शिष्य) के पुत्र हैं। दोनो भाई बचपन से ही श्रीरंगम के गलियों में घूमते थे जैसे श्रीरामजी और श्रीलक्षमणजी (इलयाल्वार) अयोध्या में और बलरामजी और श्रीकृष्ण गोकुल में घूमते थे। दोनों भाइयों ने नैष्टिक ब्रह्मचर्य का पालन करने की शपत ली थी ताकि वे पूरी तरह से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के लिए प्रतिबद्ध हो जाए| श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी के कृपा से जन्म लिये और और अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् नमपेरुमाल की कृपा से जन्म लिये। श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी ने मुख्यता “अष्टादश रहस्य” (१८ रहस्य ग्रन्थों की रचना की) और श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने बहुत सुन्दर और विस्तार रूप से तिरूप्पावै, कन्नीणु चिरूताम्भु, अमल आदि पिराण, आदि ग्रन्थों पर टीका लिखी। उन्होंने “आचार्य हृदयं” (श्रीवचनभूषण को समझाती ग्रन्थ) और अरुळिचेयाल रहस्यं (बहुत हीं सुन्दर तरिके से आल्वारों के पाशुरों से सही मतलब लेकर रहस्यत्रय पर टीका) लिखी।

आचार्य हृदयं (आचार्य= श्रीशठकोप स्वामीजी, हृदयं= तिरूवुल्लम) के आगमन के पहले का इतिहास हमें समझना चाहिए जैसे यतिन्द्र प्रवण प्रभावं (एक दस्तावेज जो ५०० साल पुराना हैजो श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी से लेकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तक सबका जीवन चरित्र देता हैं में समझाया गया है। जब श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी ने श्रीवचनभूषण को पढाना शुरू किया जो हमें सहस्त्रगीति के मूल तत्त्व के बारे में समझाता है, कुछ लोग श्रीरंगम में श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी की सफलता सहन नहीं कर पाये, उन्होंने नम्पेरुमाल से शिकायत की, तब नम्पेरुमाल ने अपने प्रतिनिधि को बेझकर श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी को अपनी सन्निधी में बुलायालेकिन तब श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी स्नान कर रहे थे तो श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने उनके निमित्त मंदिर में गये। और जब नम्पेरुमाल ने श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी से पूछा कि क्या बात है, तब श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी उनके सामने आचार्य हृदय गाना शुरू कर दिया, (उसी तरह जैसे श्रीभक्तांगिरेणु स्वामीजी ने श्रीरंगनाथ भगवान के सामने तिरूमालै गाया) जो आगे श्रीवचनभूषण के अन्दर के मतलबो को और मज़बूती प्रदान किया। यह सुनकर भगवान इतने आनन्दित हुए कि उन्होंने आज्ञा दिया कि श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी को उनके तिरुमालिगै (घर) तक ब्रम्ह रथ में ले जाए। यह सारी बातें सुनकर श्रीपिळ्ळैलोकाचर्य स्वामीजी भी बहुत खुश हुए कि भगवान ना ही ग्रन्थ को सुनकर आनन्दित हुए बलकि ग्रन्थ को पुष्टता के साथ अंगीकार किया। जब नम्पेरुमाल ने स्वीकार कर लिया तो और कौन उसे बदल सकता है?

इस सुन्दर ग्रन्थ आचार्य हृदय में, ८५वें चूर्निकै में, नायनार् समझाते हैं कि कौन अच्छी तरह श्रीवैष्णवों का महत्व समझ सकता है। यह चूर्निकै इस तरह रची गयी हैं कि बहुत सी घटनाये दिखायी गयी है और नायनार् स्वामीजी कहते हैं कि जो इन घटनाओं के तत्व को समझ सकता है वही अच्छी तरह श्रीवैष्णवों का महिमा समझ सकता है (कि उच्च जन्म और नीच जन्म क्या हैं)

इसी अर्थ को समझने के लिए आगे और कुछ उदहारण देखेंगे :-

  • भगवान कहते हैं कि उनके सच्चे भक्तों में आठ गुण होना चाहिए और अगर हम देखते हैं कि एक मलेछ जाती के आदमी (वह जो कि वर्णाश्रम धर्म में नहीं आता) में भी अगर वह आठ गुण हैं तो उसे हमें भगवान के समान समझना चाहिए (हमें उन्हें भगवान से भी ज्यादा सम्मान और उनकी सेवा करना चाहिए) यानि उनकी पूजा करनी चाहिए, उनका श्रीपादतीर्थ और उनका शेष प्रसाद लेना चाहिए। आठ गुण हैं:

  • भगवान के भक्तों में बेशर्त प्रेम।

  • भगवान की पूजा का आनन्द लेना।

  • भगवान की पूजा खुद करना।

  • अहंकार रहित रहना।

  • हमेशा भगवान के बारें में सुनने में लगाव रहना।

  • जब भी भगवान के बारें में सुनते, सोचते, बोलते हैं शारिरीक बदलाव लाना (गद्गद् होना)

  • हमेशा भगवान के बारें में हीं सोचना चाहिए ।

  • भगवान से पूजा और भक्ति के बदले में कुछ भी सांसारिक वस्तु नहीं मांगना।

जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • नमपाडुवान (जिन्होंने तिरूक्कुरुन्गुडी के मलैनम्बी के लिये कैसिका राग गाया और तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) और श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी से तुलना की क्योंकि दोनों ने भगवान के लिये तिरुपल्लीएलुच्ची गाया ) जिन्होंने एक उच्च कुल में जन्म नहीं लिया, एक ब्राम्हण को केवल अपने गानों से ब्रम्ह राक्षस (एक ब्राम्हण जिसने यज्ञ के दोरान अपने अव्यवहारिक तरिके से मंत्र का उच्चारण किया और वह राक्षस बन गया) के शाप से मुक्त किया। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • निषाध (गुहन) एक किरात के घर में जन्म लिया परन्तु वह भगवान श्रीराम से बहुत स्नेह करता था जब भगवान श्रीराम रात्री में शयन कर रहे थे तब भगवान श्रीराम के प्रति प्रेम भावना के कारण उसने श्रीलक्ष्मणजी पर शंखा की। इसलिये उसने पूरी रात जागकर लक्ष्मणजी पर निग्रानी रखी। और जब श्रीभरतजी (उन्हें श्रीराम और श्रीलक्ष्मणजी के गुणों के बारें में पहले ही पता है ) गुहन से मिलते हैं, तब गुहन उन्हें लक्ष्मणजी की श्रेष्ठता समझाते हैं, जैसे कि श्रीभरतजी को कुछ मालुम ही नहीं है। और यह सुनकर श्रीभरतजी इतने खुश होते हैं कि वह भी उन्हें श्रीराम कि तरह अपना भाई मान लेते हैं। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • भगवान श्रीराम ने शबरी माता (जिसने एक किरात के घर में जन्म लिया) जो श्रीराम से बहुत लगाव रखती थी और एक आचार्य निष्ठावान थी, उनके दिये हुए झुठे फल खाते हैं; भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीविदुरजी के घर प्रसाद पाया ना कि भीष्म, द्रोण, आदि के घर; जब भगवान श्रीरामजी को पता चला कि श्रीहनुमानजी (जो एक पशु हैं) सीता माता से मिलकर आये हैं तब उन्होंने श्रीहनुमानजी को आलिंगन किया। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • धर्मपुत्र भगवान श्रीकृष्ण (जो एक ब्राह्मण कुल से नहीं थे) को सबसे पहले मर्यादा देते हैं, पेरुमबुलियूर अडिगल ने सबसे पहले श्रीभक्तिसार स्वामीजी को मर्यादा दिया, जो एक लकडी काटने वाले के यहाँ बडे हुए। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • धर्मपुत्र श्रीविदुरजी की चरण सेवा करते हैं; भगवान श्रीजटायुजी की चरण सेवा करते हैं; श्रीमहापूर्ण स्वामीजी श्रीमारनॆरि नम्बी स्वामीजी कि चरण सेवा करते हैं। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • जो भी अच्छी तरह यह तीन चरित्रों को समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा:

  • श्रीवेंकटेश भगवान ने तिरुमाला के पुष्प मण्डप में कुरुंबरुथ्था नम्बि से मिट्टी के पुष्प स्वीकार किये जो चक्रवर्ती राजा थोन्डैमान से पूजे जाते थे।

  • कांचीपूरम के त्याग मण्डप में पॆरारुळळन तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से पंखी का कैंकर्य स्वीकार किये जो कि श्रीरामानुजाचार्य द्वारा पूजे जाते थे।

  • श्रीरंगं के भोग मण्डप में श्री स्वामी रंगनाथभगवान श्रीयोगीवाहन स्वामीजी से वीणा का कैंकर्य स्वीकार किये जो कि श्रीलोकसारंग मुनि द्वारा पूजे जाते थे।

उपर बताये गये उधारण से, नायनार् स्वामीजी ने यह स्थापित किया कि, अगर किसी व्यक्ति में ज्ञान, भक्ति और अनुष्ठान हो तो उस व्यक्ति को सम्मानीत करना चाहिए, यह नहीं देखना चाहिए कि वह किस कुल में जन्म लिया है।

अगर हम अपने पूर्वाचार्यों के इतिहास को देखे, १५०२०० साल पहले भी, तो हमें यह ज्ञात होता है कि उनके नियत भाव उच्च था। और यह केवल काल्पनिक नहीं बल्कि यह सब उन्होंने अपने जीवन में उतारा भी था और यह सब हम इतने बहुत से उधारण में देख भी सकते हैं और उनके ग्रन्थों में भी चर्चा किया गया है। अगर हम में भी यह इच्छा हो तो, हम भी अपने जीवन में थोडा तो पालन कर सकते हैं। और यह हमेशा दो रास्ते कि गलिया हैं। यह नहीं कि एक वर्ण के लोग दूसरे पर हावि हो गये हैं। हमारे पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में ऎसे बहुत से घटानाएँ देखी जा सकती है। सभी को अपनी जगह पता थी और सभी एक दूसरे को सम्मान भी किया करते थे। और अगर हम भी यह सदाचार हमारे जीवन में उतारेंगे या पालन करेंगे तो हमारा भविष्य भी उज्जवल हो जायेगा। हम यह सब होने के लिये भगवान, आल्वारों और आचार्यों के सामने रोकर या प्रार्थना करके कर सकते हैं।

अब जब कि हम यह सब कुछ देख चुके हैं और एक मुख्य विषय की ओर चलते हैंश्रीवैष्णव दिनचर्या। कैसे एक श्रीवैष्णव अपनी रोज कि जिन्दगी में आचरण करें? वह अगले लेख में चर्चा करेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग)

पिछले लेख में हमने कई विधह के अपचारों के बारें में चर्चा की थी| हर एक श्री वैष्णव को इन अपचारों से बचने में ध्यान देना चाहिए। उन सभी अपचरों में हमारे पूर्वाचार्यों, श्रीवैष्णवों को उनके जन्म के आधार पर भेद–भाव करना / अनादर करना, सबसे क्रूर अपचार मानते हैं|  हालाकि हमें जन्म के आधार पर भेद भाव नहीं करना चाहिए , परन्तु हमें वर्णाश्रम के धर्म को सम्मान देना चाहिए। यह एक पतली रस्सी पर चलने का समान है। एक उधारण इस बात को समझने में हमें मदद करेगा। एक बडे सन्स्थान में एक मालीक है और एक मजदूर है, दोनों इनसान होने के कारण दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए, परन्तु अगर वह मजदूर उस मालिक की कुर्सी पर बैठे तो वह उस संस्थान में स्वीकार नहीं किया जायेगा हालाकि उस संस्थान में सभी को बराबर माना जाता है। इसी तरह की बात भागवत अपचार में समझायी गयी है कि एक श्रीवैष्णव को वर्णाश्रम का सम्मान करना चाहिए और वह उस में अच्छी तरह बंधा है।

हमारे पूर्वाचार्यों के शास्त्र के आधार पर इस विषय के तात्पर्य को, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने अपने ग्रन्थ श्रीवचन भूषण में और अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने अपने ग्रन्थ आचार्य हृदयं में समझाए हैं। उन्होंने सिर्फ आल्वारों और पूर्वाचार्यों के विचारों को दस्तावेज बनाया।

एक सामान्य गलत फेमी हैं कि, चारों वर्णों (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैष्य, शूद्र) में ब्राम्हण ही सबसे उच्च वर्ण है और शूद्र ही सबसे नीच वर्ण है। परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों के कुछ अलग ही सोच विचार थे। इसे हम अब कुछ विस्तार से देखेंगे।

हमारे पूर्वाचार्यों ने यह अच्छी तरह स्थापित कर दिया कि वैदीह (वह जिसने वेद और प्रमाण को स्वीकार किया) वो होते हैं जो विष्णु परत्व को समझते और मानते हैं (सिध्दान्त अलग भी हो सकते हैंअदवैत, द्वैत और विशिष्टाद्वैत) । परन्तु अगर वो वैदीह बिना शास्त्र के मूल तत्त्व को समझे उसे पड़े या गए तो, पढनेवाला उस शास्त्र का सही उपयोग नहीं कर रहा है। इस तरह के व्यक्ति जो शास्त्र पढकर भी विष्णु परत्व को स्वीकार नहीं करते हैं उन्हें १) केसर को ले जाने वाली गधे ( गधे केसर का मूल्य कभी नहीं जानती) । २) शव के उपर सजावट (क्योंकि उसमें आत्मा नहीं होती हैं इसलिये वह काम कि नहीं हैं)। ३) विधवा को सजाना – इनके समान समझा जाता हैं।

एक श्रीवैष्णव को, उसका शारिरीक जन्म मोक्ष का आर्शिवाद देने के लिये एक तुच्छ मात्र भी नहीं है। यह मोक्ष तो हमें सिर्फ श्रीरामानुजाचार्यजी के सम्बन्ध मात्र से ही मिल सकता है। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने दो बातों को स्थापित की है – “उत्कृष्ठमाग ब्रमित जन्मं(गलत फैमी से उच्च जात माना जाता है) और “अपकृष्ठमाग ब्रमित जन्मं(गलत फैमी से तुच्छ जात माना जाता है)। वह आगे समझाते हैं कि ब्राम्हण/ क्षत्रीय/ वैश्य (जिने उच्च कुल समझा जाता है) असल मैं असुरक्षीत कुल हैं क्योंकि इस जाती में पैदा होने वालों को उपायान्तर जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग में भाग लेने की शिक्षा दिया जाता है। और दूसरी कमी यह है कि यह जन्म हममे अहंकार पैदा करता है और हमें नैच्यानुसन्धान का अभ्यास करने नहीं देता है। परन्तु यह दो दुष्परिणाम गलती से नीच जाती माने गए कुल में देखने नहीं मिलता है। इसलिये अंत में यह निर्णय किया जाता है किवह जन्म जिसमें यह दोनों (उपायान्तर और अहंकार ) कमियाँ दूर होती है वही सर्वोत्तम है।

और जो उच्च कुल (माने गए) में जन्म लेते हैं उनके भी यह दो (उपायान्तर संबंध और अहंकार) कमियाँ एक श्रेष्ठ श्रीवैष्णव अधिकारी के सत-संबंध से ही दूर होता है। श्रीरंगनाथ भगवान ने श्रीलोकसारंगमुनि से श्रीयोगीवाहान स्वामीजी को अपने कन्धों पर उठाने को कहे और इस विचार को स्थापित किया है।

नीचे दिए गए पासुरों से आलवारों ने उन श्रेष्ठ श्रीवैष्णवों के निर्मल गुणों की स्तुति की है –

  • पयिलुं चुडरोळि (तितुवैमोजी २.)

  • नेडुमार्कु अड़ीमै (तितुवैमोजी ८.१०)

  • नण्णाथ वलावरुणर (तिरुमोजी २.)

  • कन्सोरा वेंगुरुति (तिरुमोजी ७.)

  • तेट्टरुम तिरल तेन (पेरूमल तिरुमोजी २)

  • तिरूमालै (पाशुरं ३९४३)

बहुत से पौराणिक प्रमाण श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने दिया, यह स्थापित करने के लिये कि किसी का जन्म महत्त्व नहीं है सिर्फ उनके भगवान के प्रति भक्ति ही महत्त्व है।

  • रावण विभीषण को कुल द्रोही समझता था परन्तु भगवान श्रीराम उन्हें इक्षवाकु वंश का अवयव समझते थे (क्योंकि वें उन्हें अपने भाई समझते थे)

  • भगवान श्रीराम ने श्रीजटायुजी (पेरिया उडयार) की चरण सेवा की।

  • धर्मपुत्र (श्रीयुधीष्ठीरजी) ने श्रीविदुरजी की चरण सेवा की।

  • बहुत से ऋषि नियमित रुप से धर्मव्याथनजी (वह एक कसाई था) से शास्त्र की बहुत सी शंखायें दूर करने के लिये  भेंट या प्रतिक्षा किया करते थे क्योंकि धर्मव्याथनजी बहुत ज्ञानी थे।

  • श्रीकृष्ण भगवान श्रीविदुरजी (भक्ति की योग्यता) के घर गये नाकि भीष्म (उम्र और ज्ञान की योग्यता), द्रोण (जन्म और ज्ञान की योग्यता) या दुर्योंधन (अधिकार की योग्यता) के घर।

  • भगवान श्रीरामजी ने शबरीजी (वह एक किरात के घर में जन्म ली थी) के झुठे फल खाये। हमारे पूर्वाचार्यों ने उनको एक पूर्ण आचार्य निष्ठावली कहा है।

  • पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण  स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)  ने मारनेर नम्बी, जो कि श्रीयामुनाचर्यजी के शिष्य थे और बहुत बडे श्रीवैष्णव थे, की चरण सेवा की । जब श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी ने (जिन्होंने सत्य जानते हुए भी अपने आचार्य के मुख से उस बात को दुनिया वालों को समझाने के लिए) उन्हें प्रश्न किया तब पेरिय नम्बि ने बहुत से प्रमाणो दिए और यह स्थापित किये कि उनका कार्य सही है और शास्त्र के अनुसार है।

और कई स्थितियों में आलवारों ने बहुत स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया की उनको उन जगहों में जन्म लेने की उत्साहता है जहाँ भगवान खुद लीलाएँ की थी, जैसे:

  • व्यास और शुक वृन्दावन में धूल बनना चाहते थे जिस पर भगवान कृष्ण और गोपियों के चरण स्पर्श हुआ था।
  • श्रीकुलशेखर आल्वार तिरुमाला में कोई भी वस्तु बनना चाहते थे (मछली, पक्षी, फूल, रास्ता, दरवाजा, आदि )
  • श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी और महारानी गोदम्बाजी ने वृन्दावन के ग्वालों के घर में जन्म लेने की इच्छा प्रकट की।
  • श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने कहा कि ब्रह्मा होने से बेहतर तो यह है की वे एक श्रीवैष्णव के घर में कीड़ा बने|

अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी आचार्य हृदयं में चूर्णिका के रुप में बहुत सुन्दर तरीके से इस तात्पर्य को समझाया है। हम अपने अगले लेख में इसी चूर्णिका के बारे में और विस्तार से चर्चा करेंगे|

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

नम्पिळ्ळै 

 1) स्वपक्षत्तै स्थापिक्कवे परपक्षम् निरस्ततमामिरे | नेर्चेय्यप्पुत्तेयुमापोळे |

 जैसे चावल को उत्थित कर पीटने से, स्वत: अपतृण विनष्ट हो जाते है, उसी प्रकार जब स्वयं का मत स्थापित हो, अन्य मत स्वत: निरस्त हो जाते है |

२) स्वरूप सन्धानत्तुक्क इडायिरुक्किर तिरुमन्त्रत्तिनुडैय अर्थानुसन्धानम् मोक्ष साधनम् |

तिरुमन्त्र जीवात्मा का निज स्वभाव को प्रकाशित करता है, जैसे मै (जीवात्मा), (जो) भगवान् श्रीमन्नारायण का नित्य दास है, (को) बिना किसी स्वाभीमान एवं व्यकितगत इच्छा से (यानी स्वार्थ रहित), भगवान् श्रीवल्लभ ही मेरे शरण्य है, ऐसा मानना चाहिये | मुझे ऐसे सर्वेश्वर श्रीवल्लभ, श्रीमन्नारायण (जो सभी के प्रभु है) की सेवा सभी प्रकार से करना चाहिये | (यह स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य जी के मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के ११५ सूत्र का सारांश है ) | ऐसे वेदरूपी मन्त्र का अर्थानुसन्धान करते हुए, प्रत्येक शरणागत जीव आत्म ज्ञान मे स्थित रहकर, मोक्ष का अधिकारि बनता है |

३) चक्कर्वरत्ति तिरुमगन् अवतरित्त पिन्बु वानरजाति विरुपेत्ताप् (विरुपेट्राप्) पोले काणुम् आळ्वार्गळ् अवतरित्तु तिर्यक् जाति विरुपेट्रतु (विरुपेत्ततु)

 

श्रीराम भगवान् श्रीहनुमानजी को आलिङ्गन करते हुए
तिरुमुळिक्कळतान् भगवान् के लिये, श्री शठकोप स्वामीजी का पक्षी दूत द्वारा संदेश

जिस प्रकार भगवान् श्रीराम के आविर्भाव के तत्पश्चात (जो दशरथ चक्रवर्ती के पुत्र है), वानर जाति प्रख्यात हुई (क्योंकि उनको भगवान् श्रीरामचंद्र का साङ्गत्य प्राप्त हुआ और उनको युध्द मे सहयोग दिया) | ठीक उसी प्रकार, आळ्वारों के आविर्भाव के बाद, तिर्यक (पक्षी) जाति प्रख्यात हुई क्योंकि इन पक्षियों से निवेदन किया कि वे आळ्वारों के दूत बने और भगवान् को उनके विरह भाव बतावें |

अनुवादक टिप्पणी : उपरोक्त आळ्वार तूडु (आळ्वार संदेश) इस लिंक पर देखिये |

४) घटकरुडैय आत्मगुणत्तोपाधि रूप गुणमुम् उद्देश्यम्

 

आचार्य घटक की उपाधि से अभिज्ञात है अर्थात् जो दो व्यक्तित्वों को जोडते है | एक शिष्य के लिये उसके आचार्य के आत्म गुण जैसे कृपा, कारुण्य इत्यादि और रूपगुण जैसे सौन्दर्य, मार्दव इत्यादि सदा प्रशंनीय है |

५) ईश्वरन् आश्रित स्पर्शमुळ्ळ द्रव्यत्ताल्लदु धरियान्

भगवान् श्रीमन्नारायण (जो सभी के नियन्त्रक एवं नित्य निवास स्थान है) वह अपने भक्तों से सम्बन्धित वस्तुओं से कदाचित भी अलग नही रह सकते और उनके बिना जीवित नही रह सकते |

अनुवाद टिप्पणी : उदाहरण के तौर पर, भगवान् श्रीकृष्ण मक्खन के लिये सदैव इच्छुक थे क्योंकि यह मक्खन वृन्दावन के गोपिकाओं ने अपने हाथों से बनाया था जो श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त थे |

६) योग्यनुक्कु अयोग्यतै सम्पादिक्क वेण्डा ; अयोग्यनुक्कु योग्यतै सम्पादिक्क वेण्डा ; आगैयाल् ईश्वरोपायम् सर्वाधिकारम् |

विभीषण की शरणागति भगवान् श्रीराम के प्रति
(उन्होने यह नही सोचा की मुझे पहले शुद्धि (स्नान) कर भगवद् शरणगति करना है)

वह जो योग्य है उसको अपनी योग्यता छोडने की जरूरत नही है भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने के लिये  और वह जो अयोग्य है उसको विशेष रूप से योग्यता प्राप्त करने की जरूरत नही है भगवान् को पाने के लिये | अत: ईश्वर का उपायोपेय (आश्रय) होना सभी के लिये स्वाभिक है और भगवान् का शरणागत होना सभी का विशेषाधिकार है  |

७) नाम् आळ्वारै अनुभवैक्कुम्पोतु चेरुप्पु वैत्तुत् तिरुवडि तोळप्पुक्काप्पोले पोगवोण्णतु

एक बार, एक व्यक्ति ने अपने पादुकों को मन्दिर के बाहर छोड़कर भगवद् सेवार्थ मन्दिर मे प्रवेश किया। भगवद् सेवा मे तल्लीन होते हुए भी उसका मन बाहर छोड़े पादुकों पर था यानि पूरा ध्यान पादुकों पर था।  ऐसा भाव भगवद् सेवा मे अहितकारी है। इसी प्रकार, जब हम आल्वार की उपासना कर रहे हैं तब पूर्णतः आल्वार पर ही केंद्रित होना चाहिए और अन्य विषयांतरों (जैसे भौतिक इच्छा, इन्द्रिय तृप्ति) पर नही।

८) अवन् विदुवतु बुद्धि पूर्वम् प्रातिकूल्यम् पण्णिनारै; कैक्कोल्लुगैक्कु मित्र बावमे अमैयुम्।

भगवान् उस जीव का त्याग कर, (उस को) जीव दण्ड भी देते है, जो स्वेच्छा से भगवान् के इच्छा के प्रतिकूल बर्ताव करता है। पर वह ऐसे जीव को स्वीकारते है और आशीर्वाद देते है जो केवल सुहृद होने का छल करता है।

अनुवादक टिप्पणी : हमारे पूर्वाचार्य कहते है, दानवेन्द्र हिरण्यकशिपु का वध करते समय भगवान् नृसिंह दैत्य राजा के हृदय मे देखते है कि शायद कहीं उनको तनिक समान हितोद्देश्य मिले पर केवल द्वेष और द्वेष ही मिलता है। सीता अम्मा जी भी दैत्य नृप रावण को केवल श्रीरामचन्द्र का मित्र बनने का सदुपदेश देती है ताकि भगवान् श्रीरामचन्द्र उसे माफ़ कर दें। सीता अम्मा जी कहती हैं उसे भगवान् श्रीरामचन्द्र का शरणागत होने की कोई जरूरत नहीं पर केवल थोड़ा मैत्री एवं प्रेम भाव से व्यवहार करे ताकि भगवान् उसे माफ़ कर स्वीकार करें।

९. आश्रितरिले ओरुवनुक्कुच् चेय्ततुम् तनक्कुच् चेय्ततुम् निनैत्तिरातपोतु भगवद् सम्बन्धमिल्लै 

आळ्वार मानते थे कि गज राज (गजेन्द्र) के प्रति भगवान् की सहायता, उनके (प्रति) की गई थी.

भावार्थ : जब किसी भी श्रीवैष्णव पर किये गये भगवदानुग्रह पर हमारा मन प्रफुल्लित हो, हमें आनन्द की प्राप्ति हो, और इस भाव “भगवान् की महती कृपा हम पर भी हुई अर्थात् भगवान् ने हमारी भी सहायता की है” से पोषित है तो वस्तुतः आपने (भगवद्-सम्बन्ध के यथार्थ भाव समझ लिया है. अगर किसी भी कारणार्थ आप मे ऐसा भाव नही है तो भगवद्-सम्बन्ध (भगवान् जो सभी के स्वामी है) यथार्थ भाव आप समझे नही.

१०. अम्मि तुणैयाग आरिऴिगैयिरे, इवनै वित्तु उपायान्तरत्तैप् पत्तुगै (पत्त्रुगै)

अम्मि — पेषण प्रस्तर (जो बहुत भारी होता है). भगवान् श्रीमन्नारायण को उपायोपेय न मानकर (सर्व शरण्य), अन्योपायों के साधन बलों की सहायता से भगवान् को पाना, भारी पेषण प्रस्तर से बन्धा हुआ व्यक्ति का सागर मे कूदने के तुल्य है. क्योंकि भारी पेषण प्रस्तर (पत्थर) स्वयं भी सागर मे डूबेगा और साथ मे हमें भी.

अतः शरणागत प्रपन्न को भगवान् के अलावा अन्य आत्मघातक साधन (जैसे कर्म, ज्ञान,योग, भक्ति) अपनाना नही चाहिए.

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2013/07/divine-revelations-of-lokacharya-1.html

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श्री वैष्णव लक्षण – ७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

<< पूर्व अनुच्छेद

अपचारों से बचना

अपने पिछले लेख में हमने यह देखा कि श्रीवैष्णवों को अपने आंतरिक स्वरूप को कैसे विस्तार करना चाहिए। हमने यह भी देखा कि हमें इन महत्वपूर्ण गुणों से भरपूर श्रीवैष्णवों के सत्संग पाने में हमेशा प्रयत्न करना चाहिए। इस लेख में हम यह समझेंगे कि एक श्रीवैष्णव को किस तरह के अपचारों से बचना चाहिए।

हम श्रीवैष्णव के लिए शास्त्र ही आधार है और उसी शास्त्र के आधारित सभी कार्य करते हैं| शास्त्र हमें यह ज्ञान (निर्देश) देता है कि किस विधी को पालन करना चाहिए और क्या हमारे लिये निषेध है। मुख्यता शास्त्र हमें अपने नित्य कर्म करने की आज्ञा करता है और चोरी, दूसरे के संपत्ति के प्रति लगाव, हिंसा, आदि करने से रोकता है। हमारे पूर्वाचार्यों ने सास्त्र के इन सारांश को हमारे लिए संग्रह किया है।

श्रीवचणभूषण में श्रीलोकाचार्य स्वामीजी ने सूत्र ३००३०७ तक हम श्रीवैष्णवों को नीचे दिए गए इन चार प्रकार के अपचारों से दूर रहने को कहा है :-

  • अकृत्य करणम् – शास्त्र में अस्वीकृत किये हुए कार्यों में लिप्त न होना।

  • भगवद अपचार – भगवान की तरफ किये गये अपचार।

  • भागवत अपचार – भागवतों के प्रति किये गये अपचार।

  • असह्य अपचार – बिना वजह भगवतभागवतों के प्रति किये गये अपचार।

इन अपचारों को हम एक एक करके देखेंगे:

अकृत्य कर्म:-

सामान्यतः शास्त्र हमसे यह उम्मीद करता है की हम इन नीचे दिए गए अपचारों से विरत रहे :-

  • पर-हिंसा किसी को कष्ट देना। किसी को बिना वजह तकलीफ देना, चाहे वह छोटे पौधा हो या चींटी, बिना कोई आवश्यकता उसे तकलीफ देना शास्त्र के विरुद्ध जाने का समान है

  • पर स्तोत्रंभगवान श्रीमन्नारायण ने हमें यह बोलने की शक्ति उनके और उनके भक्तों के गुणों की प्रशंसा करने के लिए ही दिया है। इसे हमें अवैष्णवों की प्रशंसा करने में उपयोग नहीं करना चाहिए ।

  • पर धारा परिग्रहंहमें कभी भी दूसरे स्त्रीयों (जो हमसे विवाह नहीं की हो) के बारें में किसी गलत इरादे से नहीं सोचना चाहिए ।

  • पर द्रव्य अपहारंहमें कभी भी दूसरों के सम्पत्ति को ( उनके इच्छा के खिलाफ ) छीनना नहीं चाहिए

  • असत्य कथनंसत्य तथा सच्चाई के विरूद्ध बोलना और जिससे किसी भी जीवित प्राणी को मदद न मिले।

  • अपक्षय पक्षणंवह भोजन खाना जिसमें जाति, आश्रय या निमित्त दोष हो – इसके बारे में और विस्तृत चर्चा के लिए आहार नियमम के इस लिंक को दबाएँ।

  • ऎसे कई प्रतिबंध रोक मनु स्मृति में कहा गया है।

यह श्रीवैष्णवों के लिये बहुत मुख्य बात है कि वह सामान्य शास्त्र का पालन करें और निषेध विषयों का त्याग करें।

भगवद् अपचार:-

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी अगले निषेध विषय के बारे में समझाने शुरू करते हैं – भगवद अपचार और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके बारें में सुन्दर टीका करते हैं।

  • देवताओं को एम्बेरुमान श्रीमान नारायण के बराबर समझनाश्रीवैष्णवों को प्रधानतम यह बात समझना चाहिए कि भगवान श्रीमन्नारायण ही सर्वेश्वर हैं, यानि वे ही सभी के स्वामी हैं (ब्रम्ह, शिवजी, इन्द्र, वरूण, अग्नि, आदि) और वे ही सभी के अंतरयामी हैं (वह जो सभी के अंतरंग में होते हैं और हम सभी को वें ही नियंत्रण करते हैं)। उनके बराबर और उनके उपर कोई नहीं है। इसी सोच के साथ हमें कभी भी देवतांतर में नहीं पढना चाहिए और नाहीं उनको प्रसन्न करने की कोशिश करना चाहिए।

  • भगवान के अवतारों जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि को साधारण मनुष्य समझना। हम सब को यह ज्ञात रहना चाहिए कि भगवान जब इस संसार में अवतार लेते हैं तो अपनी सारी गुणों के साथ ही अवतरित होते हैं। वह जब इस लीला विभूति में जन्म लेते हैं तो अपनी लीला के भाग के कारण वें गर्भ में प्रवेश करते हैं, किसी एक विशेष दिन जन्म भी लेते हैं, कठिनाईयाँ से भी गुज़रते हैं, आदि पर वें किसी कर्म से नहीं बन्धे हैं। बजाय यह सब तो उनकी इच्छा से हीं हो रहा है ताकि संसार के कष्ट पीडा से जीवात्मा निकल सके। इसलिये जब भगवान अपने संकल्प से इतनी सारी कठिनाईयाँ ले लेते हैं, हमें यह कभी भी विचार नहीं करना चाहिए कि वे भी हमारे तरह इनसान हैं।

  • वर्णाश्रम के सीमा का उल्लंघन करना –  हर एक को वर्ण के और आश्रम (सम्प्रदाय) के नियमों को सम्पूर्णता से पालन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, “श्रुति, स्मृति मम एवं अज्ञान…अज्ञान चेथि मम द्रोही, मद भक्तोपी न वैष्णवः”। श्रुति और स्मृति भगवान के नियम हैं और जो कोई इनका पालन नहीं करता, वे सभी उनके द्रोही हैं और वे भगवान के भक्त होने पर भी वैष्णव कहलाने योग्य नहीं हैं। इस विशेष स्थिति में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि, चौथे वर्ण के श्रीवैष्णव तिरुआराधन के समय वेद मंत्रों के उच्चारण करना, सन्यासी सुपारी खाना इत्यादि शास्त्र में मना किया गया है।

  • एक अर्चा विग्रह को उसे बनाने के लिए उपयोग किये गए पदार्थों के आधार पर उस विग्रह का मूल्य निणर्य करना – हमें यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि भगवान अपने भक्तों के सच्चे प्रेम को देखकर, भक्त जिस रुप में भगवान को देखना चाहते हैं उस रुप में अवतार लेते हैं। अगर हम भगवान के विग्रह को देखकर मन में भी यह भाव प्रकट कर दिया कि यह तो बहुमूल्य सोने से बना हुआ विग्रह है इसलिए यह अधिक सुन्दर हैं या यह तो एक साधारण पत्थर से बना हुआ विग्रह है या केवल कागज के उपर एक चित्र है तो इसे भगवद अपचार कहते हैं| इसे उतना तुच्छ माना जाता है जैसे हम खुद अपनी माँ की पवित्रता पर शंका कर रहे हो|

  • जीवात्मा को स्वतंत्र समझनाहमारी स्वतंत्रीय बुद्धी ही हमारे सभी पापों का मुख्य कारण है और यह शास्त्र में सबसे बडी चोरी माना जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि जीवात्मा भगवान के आधीन है और हमें उनके कहे अनुसार ही चलना चाहिए।

  • भगवद द्रव्यों को चुराना (द्रव्य जो भगवान के हैं)- इस में सब शामिल हैं जैसे भगवान का भोग चुराना, तिरुवाबरन, वस्त्र, आदि। और स्थावर संपत्ति जैसे जमीन चुराना जो आजकल सामान्य हो गया है।

  • उन लोगों की मदद करना जो उपर बताये गये कार्यों में दुसरों की मदद करते हैं।

  • जो भगवान कि सम्पत्ति है, जो चोरी की गयी हो या दुसरों को चोरी के लिये मदद करके लायी गयी हो वह सम्पत्ति ग्रहण करना। यह भी खयाल मन में आ जाये कि, “मैंने तो खुद नहीं माँगा परन्तु अगर वो मुझे दे रहा है तो स्वीकार करने में क्या गलती है? ” – ऐसा सोचना भी भगवान को अस्वीकारनिय है।

  • ऎसे बहुत से आचरणों का निंदा शास्त्र में किया गया है।

भागवत अपचार:-

सबसे पहले हमें यह बात समझना चाहिए कि अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर समझना ही सबसे बडा अपचार है। हमें हमेशा खुद को उनसे नीचे समझना चाहिए , हमको नैच्चानुसंधान भाव रखना चाहिए। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी बहुत ही स्पष्ट रूप से इस सिध्दांत को समझाते हैं कि, “भागवत अपचार, वो बैर की भावना है जो हमारे मन में दूसरे श्रीवैष्णवों के प्रति , लालच और लालसा के कारण बढ़ता है”। भागवत अपचार के बारें में विस्तार से श्रीवचणभूषण के सूत्र १९०२०७ में समझाया गया है।

पहले हम भागवत अपचार के प्रसंग को देखते हैं:

  • जो भी श्रीवैष्णव वेश भूषा (वस्त्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, आदि) धारण करता है लेकिन भागवत अपचार में लगा रहता है वह उस वस्त्र के समान है जो बाहर से देखने में इस्त्री की गयी शुद्ध और निष्कलंक वस्त्र के समान दिखे मगर अंदर से जला हुआ है | ऐसे वस्त्र जब ज़ोर से आंधी या तूफ़ान आये तो चूर-चूर होकर उड़ जाएगा

  • हमें यह बात भी समझना चाहिए कि भगवान के अवतार जैसे वराह, नरसिंह, राम, कृष्ण आदि का का रहस्य, उनके अवतारों का मूल कारण और हिरण्यकशिपु , रावण जैसे राक्षसों को दण्ड देने का कारण भागवद अपचार ही था| भगवान कभी भी अपने भक्तों की पीड़ा और कष्ट सह नहीं पा सकेंगे| इसी कारण उन्हें इस सन्सार में अवतार लेना पडा। श्रीकृष्ण के अवतार रहस्य को हम श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से कहे गये श्रीभगवत गीता के चौथे अध्याय के – “यदा यदा…”, “परित्राणायाम साधुनाम…” , “…जन्म कर्मा च मे…” आदि श्लोकों से अच्छी तरह जान सकते हैं।एम्बेरुमानार और वेदांताचार्यार ने अपने गीता भाष्य और तात्पर्य चन्द्रिका में इन श्लोकों के बारे में विस्तार से चर्चा की है| 

बहुत प्रकार के भागवत अपचार हैं जैसेश्रीवैष्णवों को उनके जन्म, ज्ञान, कर्म, खानपान, रिश्तेदारी, रहने की जगह आदि के आधार पर भेदभाव करना / अनादर करना।

इनमें श्रीवैष्णवों कौ उनके जन्म के आधार पर भेदभाव करना / अनादर करना सबसे क्रूर अपचार है। यह अपचार, एक अर्चा विग्रह को उसे बनाने के लिए उपयोग किये गए पदार्थों के आधार पर उस विग्रह का मूल्य निणर्य करने के अपचार से भी बडा माना जाता है| अर्चा विग्रह का मूल्य निणर्य करना भगवद अपचार के नीचे आता है और हमने यह भी देखा है कि वो अपचार अपनी माँ की पवित्रता पर शंका करने की समान है | इससे भी तुच्छ है भागवतों ( श्रीवैष्णवों ) को उनके जन्म के आधार पर भेद-भाव करना / अनादर करना |

हमारे पूर्वाचार्यों ने अन्य श्रीवैष्णवों के प्रति व्यवहार करते समय बहुत कडक नियम का पालन किया है। वह हर समय सर्तक रहते थे। उधारण के तौर पर एक आचार्य भी अपने शिष्य के प्रति सम्मान जनक भाव रखते थे । परन्तु आज कल जो हम देख रहे हैं वो बिलकुल विपरीत है | शिष्य आचार्य का सम्मान नहीं करता है और कारण भी कहता है की ” वे भी धन के पीछे पड़े हैं और उनको अधिक ज्ञान नहीं है | अगर वे ऐसे हो तो मैं कैसे मर्यादा दे सकता ?” आदि।

भागवत अपचार के परिणामों को विस्तार से आगे समझाया गया है 

  • त्रीसन्गुजी का उधारण यहाँ पर समझाया गया है वह अपने आचार्य (महर्षि वशिष्ट) से अड गये और बाद में महर्षी वशिष्ट के पुत्रों से यवह विनती की कि इसी शरीर के साथ उन्हें स्वर्ग भेजे लेकिन जब वें मना किये तो त्रीसन्गुजी उन ऋषिपुत्रों को फिर से विवश करने की कोशिश की और महर्षि वशीष्ठ के पुत्रों ने त्रिशंकु को चाण्डाल बनने का शाप दिया। ब्रम्ह ज्ञान के जरिये उन्होंने जो यज्ञोपवीत धारण किया था वही उनके लिये चाण्डाल का कमर पट्टा हो गया। उसी तरह शास्त्र के विरुद्ध अगर एक श्रीवैष्णव भागवद अपचार करे तो उसका दण्ड बहुत ही कठोर होगी इसलिए क्योंकि एक श्रीवैष्णव होने के नाते हम पर उम्मीद और उत्तरदायित्व अधिक होता है | एक श्रीवैष्णव को शास्त्र के अनुसार ही अपना जीवनकाल बिताना चाहिए हालाकि शास्त्र के विरुद्ध नहीं| जब एक देश का प्रधान मंत्री जब किसी ब्रष्टाचार में फस जाए तो उसे सभी इतने नीचे देखेंगे परन्तु अगर कोई सामान्य आदमी ब्रष्टाचार में फस जाए तो कोई उसकी इतनी परवाह नहीं करते कारण उस व्यक्ति की स्थिति |

  • तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) कहते हैं कि, “अगर कोई ब्राम्हण कुल में पैदा होकर, ब्रम्होपदेष प्राप्त किया हो और वेद में पूर्ण निपुण हो परन्तु अगर वह श्रीवैष्णवों (जो केवल अपने और भगवान के सम्बन्ध के बारे में जानता हो और जिसको कोई ज्ञान और अनुष्टान नहीं हो) के प्रति अपचार करता है तो वह तक्षण चण्डाल बन जाता है”। हमें कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि जो कोई भी इतने श्रीवैष्णवों के प्रति अपचार करने के बावजुद भी उसमे कोई बदलाव नहीं देख सकते हैं, यह बदलाव बाह्य होना जरूरी नहीं है। गरूडजी एक बार एक चण्डाली (वह भगवान की अनन्य भक्त थी) के बारें में यह सोचा कि, यह दिव्यदेश छोडकर क्यों इतने एकांतिक जगह में रहती है, उन्हके पंख तुरन्त अलोप हो गये।

  • जब पिळ्ळै पिळ्ळै स्वामीजी निरन्तर भागवत अपचार करते थे, तब श्रीकूरेशस्वामीजी उनके अपचारों को कई तरीके से सही करते थे और ध्यान से उस अपचार से बचने की विशेषता समझाते थे।

अंत में यह बात समझना अत्यन्त आवश्यक है कि जैसे हमें यह पूर्ण विश्वास है कि, “जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति ज्ञान और अनुष्ठान के निरपेक्ष सिर्फ आचार्य संभंध पर निर्भर है उसी तरह पूरे ज्ञान और अनुष्ठान से भरपूर होने के नाते भी अगर हम भागवत अपचार करते रहे तो निरपेक्ष पाताल में गिर जाना सत्य है”।

असह्य अपचार:-

असह्य यानि बिना कोई कारण। यह वह अपचार है जो बिना कारण हम भगवद, आचार्य और भागवतों के प्रति करते हैं।

  • भगवद विषयं मेंहिरण्यकशिपु भगवान का नाम भी सुनना नहीं चाहता था। जबकि भगवान ने उसको विशेष रूप से कोई नुकसान नहीं पहुंचाई।

  • आचार्य विषयं मेंआचार्य कि आज्ञा का पालन नहीं करना, उनसे प्राप्त ज्ञान को अप्रतिबंध लोगों को, धन, सम्पत्ति, वैभव, आदि प्राप्त करने के लिए, समझाना।

  • भागवत विषयं मेंअन्य श्रीवैष्णवों के प्रति ईर्षा भाव रखना, आदि।

यह बात समझायी गयी है कि यह सभी अपचार (क्रम सेपहले अपचार से कठोर है। भगवद अपचार अकृत्य कर्म से ज्यादा क्रूर है, भागवत अपचार भगवद अपचार से ज्यादा क्रूर है और असह्य अपचार भागवत अपचार से ज्यादा क्रूर है।

हमारे पूर्वाचार्य शास्त्र के प्रति बहुत आदर भाव रखते थे और कोई भी अपचार करने से बहुत डरते थे। अपने गुरू परम्परा के आचार्य (इतिहास से हम सब देख सकते हैं), अपने इस सांसारिक जीवन के अंत समय में अपने सभी शिष्य और श्रीवैष्णवों को बुलाकर उनसे क्षमा माँगते थे, हालाकि उनसे कोई अपचार ही नहीं होता था। एसी थी उनकी नम्रता ।

हमारे लिये भी यह बातें अच्छी तरह समझना बहुत जरूरी है, और इसे अपने जीवन में लागू करना चाहिए। ज्ञान का अंत जब अनुष्ठान में होता है और जब अनुष्ठान प्रारंभ होता है तभी ज्ञान का प्रबुद्ध होता है | अगर इस प्रकार नहीं होता तो ज्ञान और अज्ञान में कोई अंतर नहीं है|

यह बात भी हमें अच्छी तरह समझना चाहिए कि, असह्य अपचारों में जब हमने यह देखा कि अप्रतिबंध लोगों को ज्ञान और शिक्षा देना अपचार माना जाता है , इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे पूर्वाचार्यों ने किसी को भी कुछ नहीं सिखाया था | अगर ऐसा हो तो इतने सारे ग्रन्थ हमारे पूर्वाचार्यों ने लिखा नहीं होगा और आज के समकालीन आचार्य पुरुष भी हमें सांप्रदायिक विषयों के ज्ञान प्रदान नहीं करते | जीवन में इन ग्रंथों को पढ़कर उच्च गुण प्राप्त करना और संतुष्ट रहना ही इन ग्रंथों का लक्ष्य है|

अगले लेख में उत्कृष्ट जन्म और निकृष्ट जन्म के बारें में चर्चा करेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – ६

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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उन श्रीवैष्णवों की स्तुति करना जिनके पास श्रीवैष्णव गुण/ ज्ञान/अनुष्ठान है

पिछले लेख में हम श्रीवैष्णव अधिकारियों के गुणों के बारे में देखा था | अब हम फिर से नीचे दिए गए इस तर्क को देखेंगे:

5.IMG_0460 पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजीश्रीवरवरमुनि स्वामीजी

इप्पड़ी इरुक्कुम श्रीवैष्णवर्गाल येत्रम अरिन्दु उगन्दु इरुक्कैयुम – एक बार उपर के पाँच गुण अगर हम अच्छी तरह समझ जायेंगे तो हम अपने आप ही एसे गुणों से भरपूर श्रीवैष्णवों को ढूंढेंगे। हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं कि जब हम उन्हें मिलेंगे तो हमें इतनी खुशी होनी चाहिए जैसे हम एक चंद्रमा (सभी को बचप्पन से ही चंद्रमा देखने की इच्छा होती है), थंडी हवा, चंदन की लकडी की लेई को देखा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि, “अगर इस संसार में रहकर हमें ऎसे भी कोई मिल जाए तो वो एक कमल के पुष्प भट्टी में खिलने की समान है (जो कि नामुमकिन है)। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आगे कहते हैं कि शायद हमें यह पहले के पाँच गुण मिल भी जाये तो भी आखिरी गुण मिलना बहुत ही कठिन है परन्तु हमारे सभी पूर्वाचार्य दूसरे श्रीवैष्णवों के स्तुति करते थे और इसी तरह एक उदाहरणात्मक जीवन व्यतीत करते थे।

ऊपर लिखे हुए गुणों को पाना कठिन है, कारण , हमारे बढ़ती हुयी अहंकार | हम इन श्रीवैष्णवों को “सजातीय बुद्धि” से देखते हैं यानि हम इन श्रीवैष्णवों को देखकर यह सोच लेते हैं कि वे हमारी ही तरह स्नान कर रहे हैं, हमारी तरह भोजन खाते हैं और हमारी तरह ही सभी अन्य कामों में लगे हैं तो इनमे और हममे क्या बेध है? हम यह बात भूल जाते हैं कि पूर्वाचार्यों के अनुसार ऐसे श्रीवैष्णव खुद से और भगवान से भी ऊंचे हैं | भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवत गीता में यह कहते हैं कि, “जो मेरे बारें में सोचते हैं, जो मुझे अपनी जिन्दगी समझते हैं, जो मेरे बारें में हमेशा बातें करते रहते हैं और उन पलों का आनन्द लेते हैं ऐसे श्रीवैष्णव मुझे बहुत पसंद हैं”। यह संसार जो कि पूरा निर्दयी है, ऎसे संसार में एक व्यक्ति ढूंढना जो कि भगवद विषय के बारें में चर्चा करे वैसे ही हैं जैसे रेगीस्थान में सरसब्ज ढूंढना। इसलिये हमें हर एक मौके पर अन्य श्रीवैष्णवों के साथ भगवद् विषय के बारे में चर्चा करना चाहिए। श्रीशठकोपस्वामीजी इस संसार के श्रीवैष्णवों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, “श्रीवैष्णव नित्य और मुक्त जीवों से भी बढकर हैं क्योंकि हर वक्त इस अनित्य संसार में रहकर भी सदा भगवान का चिन्तन करते हैं। ” श्रीवैष्णव इस संसार के नित्यसूरी हैं। हमें अहंकार छोडना होगा और नैच्य अनुसंधान (खुद को निच समझना) में रहना होगा तभी श्रीवैष्णवों की तरफ हमारे हृदय में सम्मान बढ़ेगा।

आचार्य अभिमानमे उत्तारकम ” – इस तात्पर्य को मुमुक्षुपडी में ११६ सूत्र और श्रीवचन भूषण में ४४७ सुत्र से समझाया गया है।

हम यह सोचते हैं कि एक शिष्य जिसे अपने आचार्य पर अभिमान है उसे अपने आप ही मोक्ष मिल जायेगा| अपने गुरू परम्परा में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, एक श्रेष्ठ टीकाकार ,यह कहते हैं कि, “अगर आचार्य को (जो अपने असीम कृपा से सारतम ज्ञान अपने शिष्य को प्रदान करते हैं) अपने शिष्य पर ‘यह मेरा शिष्य हैं’ ऎसा अभिमान हो, वही शिष्य संसार के भवसागर से आराम से छूट पा सकता है।” यही सम्प्रदाय का सार है। मुमुक्षुपडी सूत्र ११६ के पत पर कहा गया है कि, श्रीवैष्णव सत्संग का मूल्य समझने से हम भी ऐसे श्रेष्ठ श्रीवैष्णवों के अभिमान प्राप्त करके सत-पात्र बन सकते हैं. यही श्री वचन भूषन सूत्र ४४७ में भी समझाया गया है 

यह सब हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन चरित्र में देख सकते हैं

  • श्रीराममिश्र स्वामीजी (मनक्काल नम्बी) श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी (आळवन्दार) को फिर से सम्प्रदाय में लाने के लिये बहुत प्रयत्न किया (क्यों कि यही श्रीनाथमुनी स्वामीजी की इच्छा थी)

  • श्रीरामानुजाचार्य श्रीरड्गं से गोष्ठीपूर्ण स्वामी से मिलने के लिए १८ बार चलते गये और अंत में श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने उन्हें उनके कार्य के लिये उन्हें “यतिराज” से सम्बोधित किया।

  • श्रीरामानुजाचार्य और श्रीमहापूर्ण स्वामीजी में एक आदर युक्त अच्छा सम्बन्ध और आपसी लगाव था।

  • श्रीकूरेशस्वामीजी अपने सारे धन सम्पत्ती दान करके श्रीरामानुजाचार्य के शरण हुए और उनके प्रति श्रीरामानुज स्वामीजी को भी आदर और प्रेम था।

  • पिळै पिळै स्वामीजी (श्रीकुरेशस्वामीजी के शिष्य) सदैव श्रीवैष्णव अपचार करते रहते थे। एक दिन श्रीकुरेश स्वामीजी उनके पास गये और कहे कि आप से भागवत अपचार से मिले पापों को भेंट के रूप में उनको प्रधान करें। अपने आचार्य कि कृपा देखकर पिळै पिळै स्वामीजी ने उस दिन से किसी के भी प्रति एक भी अपराध नहीं किया।

  • श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी, श्रीभट्टर स्वामीजी से, परमपद जाते समय कहा कि, “आप में यह गर्व नहीं आना चाहिए कि आप कोई बडे विद्वान या श्रीकूरेश स्वामीजी के पुत्र हो, हमेशा इसी में ध्यान करते रहें – एम्बेरुमानार तिरुवडिगले शरणम |

  • श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के बीच में काफी लगाव था और एक बार श्रीरामानुजाचार्यजी ने श्रीअनन्ताल्वार स्वामीजी से कहें कि श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के साथ उनके समान हीं व्यवहार करना चाहिए |

  • श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदान्ती स्वामीजी दोनों में काफी लगाव था। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी परमपद जाते समय श्रीवेदान्ती स्वामीजी को यह उपदेश करते हैं कि, “तुम यह नहीं सोचना कि तुम वेदान्ती हो, आप ने भट्टर आदि को इतना धन दिया है| हमेशा इसी में ध्यान करते रहें – एम्बेरुमानार तिरुवडिगले शरणम |

  • श्रीवेदान्ती स्वामीजी और श्रीकलिवैरदास स्वामीजी में काफी लगाव था। जब श्रीकलिवैरदास स्वामीजी ने श्रीवेदान्ती स्वामीजी से पूछा कि, श्रीवैष्णवों का सर्वोत्तम गुण क्या होना चाहिए, तब श्रीवेदान्ती स्वामीजी ने कहा कि, “जब भी हमें ऎसे कोई श्रीवैष्णव मिले जिनको हम से कोई परेशानी हैं तो ऎसा समझना चाहिए कि गलती हम में हैं उन श्रीवैष्णवों में नहीं ”। यह पंक्ति – ” नाने तान आईडुग” – तिरुप्पावै के १५ पाशुर में है।

  • श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी कंदाडै तोलपपर के पास क्षमा मांगने के लिये गये हालाकि कंदाडै तोलपपर ही थे जिन्होंने श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी के प्रति रोष समर्पण किया।

  • कूरकुलोत्तुम दासर ने श्रीशैलेश स्वामीजी फिर से सम्प्रदाय में लाने के लिये बहुत प्रयत्न किया, यह श्रीलोकाचार्य स्वामीजी कि इच्छा थी।

  • श्रीशैलेश स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बीच में काफी लगाव था।

हमारे पूर्वाचार्यों ने सिर्फ भगवदभागवत कैंकर्य पर हीं अपना पूरा ध्यान केंद्रीत किया और कहीं नहीं। उनके लिये उनके शारिरीक आराम कुछ भी नहीं था। अगर हम इसे अच्छी तरह समझ जायेंगे और भागवत कैंकर्य में लग जायें जैसे अपने पूर्वाचार्य चाहते थे तो हमारा स्वरूप सुधर जायेगा।

इसलिये जब भी हम दूसरे श्रीवैष्णवों में दोष ढुढते हैं तो हमें यह सोचना चाहिए कि हमने सबसे बडी गलती की है। हमें सीता माता के चरित्र को निरन्तर सोचना चाहिए उन्होंने राक्षसो द्वारा किया गया अत्याचार भगवान श्रीराम को भी नहीं बताया।

इसको ध्यान में रखते हुए अगले लेख में श्रीवैष्णव अपचार पर चर्चा करेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासी

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