Monthly Archives: October 2014

चरमोपाय निर्णय – उद्धारक आचार्य

॥ श्री: ॥
॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

उद्धारक आचार्य

जैसे हमने पहिले देखा कि आचार्य दो प्रकार के होते है, उद्धारक आचार्य और उपकारक आचार्य ।

उद्धारक आचार्य याने जो इस संसार के भव बंधन को छुड़ाकर परमपद दिलाते हैं। उद्धारकत्व तीन विभूतियों में विद्यमान है ।

  1. श्री भगवान
  2. श्री शठकोप स्वामीजी
  3. श्री रामानुज स्वामीजी

जो नित्य विभूति (परमपद) और लीला विभूति (संसार) को अपने अधीन कर सकते हैं उनमे मात्र उद्धारकत्व गुण परिपूर्ण रूप से विद्यमान होता है ।

वेदों में और अन्य जगह पर उल्लेख आता है कि उभय विभूति को संभालनेवाले श्री भगवान ही है और

“ श्री विष्वक्सेन संहिता ” में भगवान कहते हैं “अस्य ममश शेषम ही विभूतिरुभयात्मिका ”, इसका अर्थ है दोनों विभूति मेरे और अम्माजी के आधीन है ।

श्री शठकोप स्वामीजी श्री सहस्त्रगीति (६.८.१) में कहते है कि, “ पोन्नुलगलिरो भुवनीमुजूथालिरो ”, याने भगवान कि कृपा सेमै दोनों विभूतियों को संभाल सकता हूँ ।

श्री रंगनाथ भगवान ने श्री रामानुज स्वामीजी को उभय विभूति साम्राज्यप्रदान किया ।
( इसलिये रामानुज स्वामीजी को “उडयवर” नाम से भी जाना जाता है ) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि रामानुज स्वामीजी भी उद्धारक आचार्य है ।

श्रीरंगनाथ भगवान रामानुज स्वामीजी को दोनों विभूतियों के नायक की उपाधि दे रहे है

 

इन तीनो विभूतियों में से उद्धारकत्व श्री रामानुज स्वामीजी में विशेष रूप से विद्यमान है । जब श्री भगवान  संसारी जीवात्मावों पर कृपा करने के लिये श्रीशठकोप स्वामीजी को इस संसार में भेजते है, केवल ३२ वर्षों में ही शठकोप स्वामीजी भगवान से दूर होने के कारण विरह न सहकर चिल्लाकर रोने लगे,“ कुविक्कोल्लुम कालम इन्नुम कुरूगातौ ”, याने कब मुझे इस संसार से परमपद कि ओर ले चलेगें ।

“ एन्नाल यनुन्नै इनी वंतु कुड़ुवनै ” याने कब मै परमपद में आकर आपकी सेवा करूँगा ।

“ मंग्ग वोट्टू उन मामयै ” याने मेरे इस प्राकृत शरीर ( जिसमे आपका इतना प्रेम है ) को छुड़ाइये । जब की भगवान का श्री शठकोप स्वामीजी के प्रत्यक्ष विग्रह में इतना लगाव था तो भी वे इस प्राकृत शरीर को छुड़ाने के लिये कहते है और प्रार्थना करते है कि मुझे परमपद में स्थान दिजिये जहाँ पर मुझे दिव्य शरीर प्राप्त होगा । श्रीशठकोप स्वामीजी लीला विभूति से प्रस्थान करके नित्य विभूति में विराजमान हो गये ।

उनके इस ( संसारी जीवात्माओं के उद्धार ) उदेश्य कि पूर्ति हेतु भगवान ने श्री रामानुज स्वामीजी को १२0 वर्षों तक इस लीला विभूति में विराजमान कराया था ।

श्री रामानुज स्वामीजी के उद्धारकत्व गुण के कारण श्री शठकोप स्वामीजी के समय की अपेक्षा श्री रामानुज स्वामीजी के समय में ज्यादा लोग श्रीवैष्णवता को अपनाने लगे ।

स्वयं श्री शठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति के पाशुर (५.२.१) में कहते है ,

“कड़ल्वन्नन भूत्ंगल मन्मेल मलीयप्पुगुन्तु इचै पाडीयाडी एंग्गुम यूलीतर कण्डोंम”

इसका अर्थ है आनेवाले दिनों में ( कलियुग में श्री रामानुज स्वामीजी का अवतार होगा ) भक्त लोग भगवान के बिना एक क्षण भी व्यतीत नहीं करेगें, वे सभी जगह भगवद गुणानुवाद करेगें ।इससे यह स्पष्ट होता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी ही सबके उद्धारक है ।

कृपामात्र प्रसन्नाचार्यत्व पूर्ण रूप से श्री रामानुज स्वामीजी मै विद्यमान हैं।रामानुज स्वामीजी दूसरो के दुःखो को देखकरस्वयं कष्ट सहन करते हैं और उनपर निर्हेतुक कृपा करते है। ऐसे विशेष गुण बहुत कम आचार्यों में देखे जाते है । श्रीकृष्ण भगवान आचार्य होते हुये भी स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य बनकर रहते हैं । गीता में ( २.७ ) जब अर्जुन भगवान से कहते हैं कि मै आपका शिष्य हूँ और आप मेरे कल्याण हेतु मुझे सब बताइये । भगवान स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य होने के कारण भगवान अर्जुन को उपदेश ( ४.३४ ) करते हैं कि आचार्य कि शरण में जाओ और उनको कैंकर्य करके प्रसन्न करो और उनसे सारतम ज्ञान सीखो । इससे यह मालूम होता है कि कृपामात्रप्रसन्नाचार्यत्व सिर्फ शठकोप स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी में ही पूर्ण रूप से विद्यमान है ।

उपरोक्त सभी बातों को जानने पर यह सारांश निकलता है कि भगवान के पास उद्धारकत्व होने पर भी वे स्वानुवृति प्रसन्नाचार्य बनकर रहते है, श्री शठकोप स्वामीजी में उद्धारकत्व है और संसारी जीवात्माओं पर विशेष कृपा भी करते है। लेकिन भगवान का वियोग सहन नहीं कर पाने के कारण बहुत कम समय में ही इस संसार से प्रस्थान कर गये  । दूसरी ओर श्री रामानुज स्वामीजी जो श्री शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्द हैं, दुःखी संसारी जीवात्माओं पर विशेष कृपा करने के लिये इस संसार में विराजमान थे । इन सभी कारणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री रामानुज स्वामीजी कृपामात्र प्रसन्नाचार्य है और परिपूर्ण रूप से उद्धारक आचार्य भी है ।

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

source : http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-uththaraka-acharyas.html

 

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चरमोपाय निर्णय- तिरूमुडी संबंध

तिरूमुडी संबंध

॥ श्री: ॥

॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

 

 

श्री शठकोप स्वामीजी अपनी निर्हेतुक कृपा से सहस्त्रगीती का उपदेश करते है । (श्री नाथमुनी स्वामीजी ने १२००० बार कन्नीण शिरताम्बू का पारायण किया जिससे श्री शठकोप स्वामीजी ने प्रसन्न होकर उनको दिव्य प्रंबंध ,रहस्य ग्रंथ के अर्थ एवं अष्टांग योग की विद्या को प्रदान किया ।)

श्री शठकोप स्वामीजी त्रिकालज्ञ थे जिनको भूत , भविष्य और वर्तमान में क्या होनेवाला है सब कुछ मालूम था । उनको श्री सहस्त्रगीति के “पोलिग पोलिग” (५.२.१) पाशूर का अर्थ बताते हुये उन्होने श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार रहस्य का खुलासा किया, और “कलियुम केड़ुम कंण्डु कोंण्मीन”कहा जिसक अर्थ है  कली का नाश होगा और कहा कि इस प्रपन्न कुल में एक महान विभूति का अवतार होगा जो सारे संसार का उद्धारक होगा ।

 

यह सुनकर श्रीनाथमुनी स्वामीजी अति आनंदित होगये और उन्होने अधिक जानने के लिये कन्नीण शिरताम्बू के १० वें पाशूर का निवेदन कर स्वामीजी को प्रसन्न करते हैं और पूछते हैं कि आप तो सर्वज्ञ है,तो फिर अवतार लेनेवाले उस महान विभूति के स्वरूप का वर्णन कीजिये ।

 

विनंती सुनकर श्री शठकोप स्वामीजीश्री नाथमुनी स्वामीजी के स्वप्न में आकर कहते है कि “ काषाय वस्त्र, त्रिदण्ड, द्वादश तिलक, विशाल भुजायें, सुन्दर मुस्कुराता हुआ मुखारविन्द और नेत्रो में वात्सल्य गुण रहेगें, ऐसे श्री रामानुज स्वामीजी का दिव्य मंगल विग्रह रहेगा ”।

 

श्री नाथमुनी स्वामीजी स्वप्न में से उठकर श्री शठकोप स्वामीजी के पास गये और कहा की जैसे श्री रामानुज स्वामीजी का दिव्य मंगल विग्रह का वर्णन किया है वह तो आप से भी सुंदर है । तब श्री शठकोप स्वामीजी ने कहा उसमे कोई आश्चर्य होने की बात नहीं हैं क्योंकि श्री रामानुज स्वामीजी के दर्शन से पूर्ण जगत आकर्षित होगा ।

 

श्री नाथमुनी स्वामीजी श्री शठकोप स्वामीजी से पुछते है कि श्री भविष्यदाचार्य का सदैव स्मरण, आराधन कैसे करते रहे । श्री शठकोप स्वामीजी उस दिन एक शिल्पी के स्वप्न में श्री भविष्यदाचार्य के रूप में आकर कहा की मेरा एक श्रीविग्रह बनाओ और उसे तिंत्रिणी वृक्ष के नीचे विराजमान करो। सुबह शिल्पी श्री तिंत्रिणी वृक्ष के नीचे आकर बिना रुकावट के स्वप्न में जैसे दर्शन हुआ था वैसे ही श्री विग्रह बनाना प्रारम्भ किया । श्री विग्रह परिपूर्ण रूप से बनते ही श्री शठकोप स्वामीजी ने उसपर अपनी दिव्य दृष्टि से कृपा कटाक्ष किया।

 

श्री नाथमुनी स्वामीजी को बुलाकर श्री शठकोप स्वामीजी ने श्री भविष्यदाचार्य का श्री विग्रह प्रदान किया। और कहा की जैसे लक्ष्मणजी को श्रीराम भगवान का दायाँ हाथ कहा जाता है वैसे ही श्री भविष्यदाचार्य भी मेरे चरणारविन्द है ।

 

श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं “श्री भविष्यदाचार्य मेरे अंश है, वह मेरे चरणारविन्द है, वे मेरी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाले है।तुम्हारे परिवार में एक महापुरुष होगा जो की श्री भविष्यदाचार्य के साक्षात दर्शन करेगा । श्री भविष्यदाचार्य के अवतार के समय मेष मास होगा, मेरे अवतार नक्षत्र (विशाखा) के १८ वें दिन आद्रा नक्षत्र में होगा। जैसे गीता में १८ अध्याय है और अंतिम अध्याय में श्री भगवान को उपाय बताया गया है। वैसे ही मेरे अवतार नक्षत्र के १८ वें दिन होनेवाले श्री भविष्यदाचार्य को उपाय मानना ।जैसे मेरी सेवा करते हो वैसे ही श्री भविष्यदाचार्य की सेवा करना।”

 

इतना कहकर श्री नाथमुनी स्वामीजी विरनारायणपुर जाने के लिये आज्ञा करते हैं  श्री नाथमुनी स्वामीजी श्री शठकोप स्वामीजी की कृपा का अनुभव करते हुये इस श्लोक को निवेदन करते हैं ।

 

यस्सवैभव कै कारून्नकरस्सन भविष्यादाचार्यपरस्वरूपम  ।

संधार्चयमास महानुभावम तम कारीसुनुम शरणम प्रपद्ये ॥

 

मै श्री शठकोप स्वामीजी की शरण ग्रहण करता हूँ , जो कारीजी के पुत्र है और जिन्होने निर्हेतुक कृपा करके मुझे स्वप्न में श्री भविष्यदाचार्य का दर्शन कराया ।

 

पेरियावाचन पिल्लै स्वामीजी बताते हैं कि इस रहस्य को अत्यन्त गोपनीय रखा गया और सिर्फ गुरु परम्परा स्वामीयों को इसकी जानकारी थी ।

 

श्री नाथमुनी स्वामीजी ४००० प्रबन्ध का अध्ययन करके श्री विरनारायन पुर के लिए लौट जाते हैं ।वहाँ पर विराजमान श्री मन्नार भगवान का मंगलाशासन करते हैं और भगवान उनको तीर्थ, तुलसी, शठारी देकर बहुमान करते हैं। श्री नाथमुनी स्वामीजी घर लौटकर अपने दो भतीजों को श्री शठकोप स्वामीजी की कृपा का वर्णन करते हैं। वे दोनों आश्चर्य चकित होते हैं और अपने आपको भाग्यवान मानते हैं कि ऐसे महान पुरुष के साथ हमारा सम्बन्ध है।

 

उसके बाद श्री नाथमुनी स्वामीजी द्वय मंत्र का अर्थ श्री सहस्त्रगीति के द्वारा अपने शिष्य श्री तिरुक्करमंगई आण्डान को बताते हैं । “पोलिग पोलिग” (सहस्त्रगीति ५.२.१) के पासूर का वर्णन करते हुये श्री शठकोप स्वामीजी के वचनों को और इन्होने जो स्वप्न में अनुभव हुआ उसका वर्णन किया । तब श्री तिरुक्करमंगई आण्डान ने कहा की मेरा संबंध आप के साथ है जिन्होने स्वप्न में श्री भविष्यदाचार्य का दर्शन किया है।

 

इस पूर्ण दृष्टांत को नाथमुनी स्वामीजी ने पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी, कुरुगइ कवलप्पन और अपने पुत्र ईश्वरमुनी को वर्णन करते हैं । नाथमुनी स्वामीजी कुरुगइ कवलप्पन को अष्टांग योग सीखने के लिए,पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी को संप्रदाय कोआगे बढ़ाने के लिये और ईश्वरमुनी को अपने पुत्र का नाम यामुनाचार्य रखने के लिए आज्ञा करते हैं।

 

श्री नाथमुनी स्वामीजी अपने अंतिम दिनों में श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी को बुलाकर श्री भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह को प्रदान करते हैं और इस बात को गुप्त रखने के लिये कहते हैं । इस श्री विग्रह को ईश्वरमुनी के होनेवाले पुत्र को प्रदान करना और कहना कि यह श्रीविग्रह श्रीनाथमुनी स्वामीजी को विशेष रूप से श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा भेंट में मिली है । पूर्ण रूप से इसपर अवलम्ब रहने के लिए कहते हैं । श्री विग्रह का ध्यान करते हुये “आल्वार तिरुवडिगले शरणम” कहते हुये नित्य कैंकर्य के लिए परमपद को प्रस्थान करते हैं ।

 

एक बार श्री राममिश्र स्वामीजी और तिरुवल्लीकेनी पान पेरूमाल अरयर श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी की सन्निधि में सहस्त्रगीति का अध्ययन कर रहे थे । “पोलिग पोलिग” पासूर में “कलियुम केड़ुम” आते ही श्री नाथमुनी स्वामीजी द्वारा बताया गया पूर्ण दृष्टांत का वर्णन करते हैं । दृष्टांत को सुनकर वे पूछते है कि ऐसे श्री भविष्यदाचार्य के दर्शन के भाग्य किसको होगें ? तब श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी कहते हैं कि जब इनका अवतार होगा तब पूर्ण जगत इनकी शरण ग्रहण करेगा और हर एक व्यक्ति को मोक्ष पाने के लिए इनके साथ सम्बन्ध रखना पड़ेगा ।

 

श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी परमपद प्रस्थान करते समय श्रीराममिश्र स्वामीजी को बुलाते हैं और पूनः रामानुज स्वामीजी के अवतार रहस्य का वर्णन करते हैं ।

श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी श्री राममिश्र स्वामीजी को संप्रदाय के कैंकर्य को बढाने के लिए आज्ञा करते हैं ।

और कहते हैं कि श्रीईश्वरमुनी को पुत्र होगा,जिनका नाम यामुन होगा । श्री यामुनाचार्य स्वामीजी का अवतार होने के बाद श्री नाथमुनी स्वामीजी के इच्छा अनुसार वे स्वयं श्री भविष्यदाचार्य को ढूँढकरसम्प्रदाय का वर्धताम अभिवर्धताम करेगें ।

 

श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी श्री भविष्यदाचार्य के श्रीविग्रह को श्री राममिश्र स्वामीजी को प्रदान कर कहते हैं कि रामानुज स्वामीजी के अवतार रहस्य को श्री यामुनाचार्य स्वामीजी को पूर्ण रूप से बताकर श्री विग्रह प्रदान करना ।

 

श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी की आज्ञानुसार श्री राममिश्र स्वामीजी श्री यामुनाचार्य स्वामीजी को श्री रंगम लाकर सम्प्रदाय के रहस्य अर्थ और श्री भविष्यदाचार्य के अवतार रहस्य के बारे में बताते हैं । श्रीवैष्णवों के साथ रहकर सम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करने के लिए आज्ञा करते हैं ।

 

श्री राममिश्र स्वामीजी के अंतिम दिनों में श्री नाथमुनी स्वामीजी स्वप्न में आकर कहते हैं कि श्री भविष्यदाचार्य को जाकर देखो उनका अवतार हुआ होगा और श्री भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह को श्री यामुनाचार्य स्वामीजी को प्रदान करो, जो मुझे अति प्रिय है । श्री राममिश्र स्वामीजी सोचने लगे की श्री नाथमुनी स्वामीजी ने ऐसे क्यों कहा? तब श्री नाथमुनी स्वामीजी कहते हैं कि मैंने श्रीभविष्यदाचार्य का दर्शन सिर्फ स्वप्न में किया है, मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी जबमेरे पौत्र श्री यामुनाचार्य स्वामीजी उनका साक्षात दर्शन करेगें ।

 

 

भविष्यदाचार्य के अवतार रहस्य को यामुनाचार्य स्वामीजी तक पहूँचाने के कैंकर्य को पाकर श्रीराममिश्र स्वामीजी नाथमुनि स्वामीजी की निर्हेतुक कृपा का स्वप्न में अनुभव दर्शन कर बहुत प्रसन्न थे। उस वक्त श्री यामुनाचार्य स्वामीजी मिलने आये,तब श्रीराममिश्र स्वामीजी ने इस पूर्ण दृष्टान्त का वर्णन किया ।श्री राममिश्र स्वामीजी ने श्री यामुनाचार्य स्वामीजी को श्री भविष्यदाचार्य का श्री विग्रह प्रदान किया और कहा कि  “यह श्री विग्रह श्री नाथमुनी स्वामीजी को अतिप्रिय है, तुम परिपूर्ण रूप से इनपर अवलम्ब रहना और इनके अवतार रहस्य को गुप्त रखना । तुम इस महापुरुष को ढूंढकर मिलना जो की हमारे संप्रदाय के वैभव को बड़ानेवाले है।”

श्रीराममिश्र स्वामीजी की आज्ञानुसार श्री यामुनाचार्य स्वामीजी श्री भविष्यदाचार्य के श्रीविग्रह का विशेष ध्यान देते हुये श्रीरंगम में विराजमान थे । वे श्री भविष्यदाचार्य को ढूँढने लगे, लेकिननहीं ढूँढ पाने पर वे अत्यन्त दुखी हुये । उस समय यामुनाचार्य स्वामीजी कुछ श्रीवैष्णवों के द्वारा रामानुज स्वामीजी के वैभव को सुनाते है और उन्हे ढूँढने के लिये वरदराज भगवान कि सन्निधि में पहुँचते हैं, वहाँ पर श्रीकांचिपूर्ण स्वामीजी के पुरुषकार से रामानुज स्वामीजी का दर्शन करते हैं ।

 

 

श्री शठकोप स्वामीजी के अनुसार तीन बातें उन विशेष व्यक्ति में विद्यमान थी।आद्रा नक्षत्र, श्री भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह की तरह उनका स्वरूप और बड़ता हुआ वैभव । इन सब लक्षणों को देखते हुये उन्हे श्री रामानुज स्वामीजी मान लिया गया और अपने श्रीनेत्रो से उन पर विशेष कृपा कटाक्ष किया।

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी अपने अंतिम समय में श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी को बुलाकर श्री भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह को प्रदान करके उसका इतिहास बतायाऔर श्री रामानुज स्वामीजी को रहस्य अर्थों का उपदेश देने के लिये आज्ञा करते हैं । श्री रामानुज स्वामीजी ही श्री भविष्यदाचार्य के अवतार है जिनका अवतार प्रपन्न कुल में सूर्य की तरह प्रकाशमान हो रहा है। और कहा कि श्री वैष्णव संप्रदाय श्री रामानुज सम्प्रदाय के नाम से हीजाना जायेगा ।

 

अंतिम समय में श्री वैष्णव जन श्री यामुनाचार्य स्वामीजी को कुछ वार्ता सुनाने के लिये कहते हैं, तब श्रीस्वामीजी कहते हैं कि “ श्री शठकोप स्वामीजी के पाशूर के अनुसार श्री रामानुज स्वामीजी अपने सम्प्रदाय का नेतृत्व करेगें और मुझे अत्यन्त दुःख हो रहा है कि मुझे श्री रामानुज स्वामीजी के साथ सहवास करने को नहीं मिला। इस प्रकार रामानुज स्वामीजी के पहले के सभी आचार्य यह बताते हैं कि रामानुज स्वामीजी ही उद्धारक आचार्य हैं । ”

 

“श्री रामानुज स्वामीजी के पहिले सभी आचार्यों ने श्री रामानुज स्वामीजी को ही कैसे उद्धारक कहा ?”

 

अस्पोतयन्ती पितर प्रन्तुथ्यन्थी पितामह ।

वैष्णवो नः कुले जात सनः सन्तारायीश्यती ॥ (श्री वराह पुराण श्लोक )

 

श्री वराह पुराण के इस श्लोक में आता है कि परिवार में कोइ श्रीवैष्णव होजाने पर पितृजन पितृलोक में खुश होते हैं कि अब हमें पितृलोक से छुटकारा पाने का मौका आ गया है। पितृलोक में रहनेवाले पितृजन, अपने परीवार में श्रीवैष्णव बने हुये सदस्य को अपना उद्धारक मानते है।पितृलोक में रहनेवालेपितृजन वैष्णव नहीं होते हुये भी उनका अंतिम लक्ष परमपद ही होता है। जो की श्रीवैष्णव के सम्बन्ध मात्र से उनको मिलता है और वे लोग उसे अपना उद्धारक मानते हैं ।

लेकिन श्री नाथमुनि स्वामीजी तो स्वयं श्री वैष्णव शिरोमणि हैं और परमपद में विराजमान है, उनको किसी उद्धारक की आवश्यकता ही नहीं है। “परन्तु वे श्री रामानुज को ही अपना उद्धारक क्यों मानते हैं ?”

 

श्री नाथमुनि स्वामीजी को पूर्ण विश्वास है कि श्री शठकोप स्वामीजी ही उद्धार करनेवाले है, लेकिन शठकोप स्वामीजी ने स्वयं कहा था कि जैसे लक्ष्मणजी को श्रीरामजी का दाया हाथ माना जाता है वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी मेरे चरणारविन्द के रूप में है। इसी कारण श्री नाथमुनी स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी से अपने सम्बन्ध को श्रेष्ठ मानकर उद्धारक मानते और प्रेम बढ़ाते है । वे इस रहस्य ज्ञान को पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी को प्रदान करते हैं, पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी राममिश्र स्वामीजी को, राममिश्र स्वामीजी यामुनाचार्य स्वामीजी को, और यामुनाचार्य स्वामीजी अपने शिष्य गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी, शैलपूर्ण स्वामीजी, वररंगाचार्य स्वामीजी, मालाकार स्वामीजी, महापुर्ण स्वामीजी को प्रदान करते हैं ।

 

जैसे “ तस्मे देहम तथो ग्राहयम ” गरुड पुराण के इस श्लोक में कहा गया है कि जिस भक्त में आठ गुण रहते है,

  • जिसे भागवतो में निस्वार्थ प्रेम है ।
  • जिसे भगवत सेवा में आनंद होता है ।
  • जो भगवान की सेवा करता है ।
  • जिसे अहंकार नहीं है ।
  • जिसे भगवद विषय सुनने में जिसे रुचि है ।
  • जिसे भगवद विषय सुनकर अनुभव– आनन्द होता है ।
  • जो सदैव भगवान के प्रति सोचता रहता है ।
  • जो सांसारिक वस्तुओं की चाहना नहीं करता है ।

 

वह मेरे समान पूजनीय है और उनसे सहवास और सत्संग करना चाहिये।

यामुनाचार्य स्वामीजी के प्रमुख शिष्य, श्री रामानुज स्वामीजी से अपना सम्बन्ध स्थापित करना चाहते थे । रामानुज स्वामीजी के साथ आचार्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।

सभी आचार्यों ने अपने बच्चों को श्री रामानुज स्वामीजी का शिष्य बनाया और अपने सम्बन्ध से भी बढ़कर अपने बच्चों का श्रीरामानुज स्वामीजी से सम्बन्ध होना श्रेष्ठ माना ।

जैसे भगवान घंटाकर्ण पर कृपा करते समय उसके भाई पर भी कृपा कर दिये, विभीषण के साथ आये हुये ४ राक्षसों को भी मोक्ष दिये,प्रह्लाद के सम्बन्धियों पर भी जैसे कृपा किये वैसे ही अपने बच्चे श्री रामानुज स्वामीजी के शिष्य हो जाने पर हम लोगो पर भी कुछ विशेष कृपा हो जायेगी ऐसा श्री रामानुज स्वामीजी के आचार्य गण मानते थे ।

जो कोई भी मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा से शरण में आता हैं, उनके सम्बन्धियों पर भी श्रीरामानुज स्वामीजी कृपा करके मोक्ष देते हैं । इस कारण से आचार्य जन भी श्री रामानुज स्वामीजी से सम्बन्ध स्थापित करना चाहते है ।

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी की आज्ञा का पालन करते हुये श्री रामानुज स्वामीजी को गुरु परम्परा में विराजमान कराने के लिये ५ आचार्य गण “आचार्य का स्थान” ग्रहण करते हैं ।

यामुनाचार्य स्वामीजी अपने पाँच शिष्यों को रामानुज स्वामीजी को रहस्य अर्थो को बताने के लिये आज्ञा कर रहे है

 

आचार्यत्व दो प्रकार का होता है , उद्धारक आचार्य याने जो आचार्य संसार के भव बंधन से छुड़ाते है, और उपकारक आचार्य याने जो शिष्य को संसार के भवबंधन छुड़ानेवाले आचार्य से सम्बन्ध कराते है ।

ये पाँच आचार्यगण उपकारक आचार्य है, जिन्होंने श्री रामानुज स्वामीजी का सम्बन्ध श्री शठकोप स्वामीजी से गुरु परम्परा के द्वारा कराया है।

अगर वे उद्धारक आचार्य होते तो वे अपने बच्चों का स्वयं समाश्रयण कर सकते थे, लेकिन उन्होने श्री रामानुज स्वामीजी (जो की श्री शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्द है )से समाश्रयण करवाया ।

 

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

source : http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-thirumudi.html

चरमोपाय निर्णय – स्मरण एवं प्रार्थना

॥ श्री: ॥

॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

 

 

श्री नायनाराच्चान् पिल्लै   स्वामीजी का तनियन

श्रुत्यर्थ सारजनकं स्मृतीबालमित्रम 

पद्मोंल्लसद् भगवदङ्ग्रि पूराण बन्धुम

ज्ञानाधिराजम अभयप्रदराज पुत्रम

अस्मदगुरुम परमकारुणिकं नमामी ||

 

श्रीनायनाराचान पिल्लैजिन्होने श्री वेदों की सारतम बातों को बताया,जो सूर्य के समान तेजोमय हैं, जो पुष्प के समान कोमल हैं, जिनका सम्बन्ध श्रीमन्नारायण भगवान के साथ है, जो सच्ची और सारतम बातों के राजा है और श्री श्रीपेरियावाचन पिल्लै के पुत्र है, उनको मै प्रणाम करता हूँ, वंदन करता हूँ ।

अभयप्रदपाद देशीकोद्भवम,

गुरुमिडे निजमादरेन्न चाहं |

या इहाकीललोक जीवनादर,

चरमोपाय विनिर्णयं चक्र ||

 

श्री नायनाराचान पिल्लै जो श्रीपेरियावाचन पिल्लै के पुत्र है और जिन्होने इस संसार के भव बंधन को छुड़ाने के लिए श्री चरमोपाय निर्णय ग्रंथ की रचना की है,उनके चरणारविन्दो का वंदन करता हूँ ।

यह ग्रंथ चार श्लोकों की रचना के द्वारा प्रारंभ होता है, जिसमेंश्रीपेरियावाचन पिल्लै का वैभव और इस ग्रंथ रचना का उदेश्य बताया गया है ।

अभयपप्रद पादाख्यं अस्मदेशिकमाश्रये  ।

यत्प्रसादाद अहं वक्ष्ये चरमोपाय निर्णयम ।।

मै पेरियावाचन पिल्लै स्वामीजी की शरणागति करता हूँ, जो की मेरे आचार्य भी है और जिन्हे अभयप्रदपादर भी कहा जाता है, ( भगवान की शरणागति की महीमा का वर्णन करने के कारण अभयप्रदपादर कहा जाता है ) । उनकी कृपा से मै इस चरमोपाय निर्णय ग्रंथ की रचना कर रहा हूँ ।

अस्मज्जनककारुण्य सुधा सन्धुक्षितात्मवान ।

करोमी चरमोपायनिर्णय मत्पिता यथा ॥

मेरा जन्म मेरे पिताजी पेरियावाचन पिल्लै की कृपा से हुआ है । मै उनके पथ प्रदर्शित मार्ग पर चलते हुये मोक्ष प्राप्ति के अंतिम और सुलभ उपाय जो “ चरमोपाय ” है, उसकी स्थापना करता हूँ ।

अस्मदुत्तारक वन्दे यतिराज जगद्गुरूम |

यत्कुपाप्रेरित: कुर्मी चरमोपाय निर्णयम ||

 

मै श्री यतिराज स्वामीजी को प्रणाम करता हूँ, जो की पूरे जगत केआचार्य है और उनकी कृपा के द्वारा चरमोपाय

निर्णय को बता रहा हूँ ।

 

पूर्वापरगुरूक्तेश्च स्वप्नवृतैर्यतिशभाक ।

क्रियतेद्य मया सम्यक चरमोपाय निर्णयम॥

श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार के बाद और पहले अवतार लिए हुये आचार्यो के श्रीसूक्ति द्वारा (वचनों)

एवं अनेक महापुरुषों के स्वप्नों से यह सिद्ध करता हूँ कि श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्द ही मोक्ष प्राप्ति का अंतिम उपाय है । मोक्ष प्राप्ति के चरम उपाय का वर्णन करने के कारण इस ग्रंथ का नाम “ चरमोपाय निर्णय ” कहा गया है ।

श्री वैष्णव अपने आचार्य में पूर्ण निष्ठा रखते हैं और पूर्ण भरोसा है कि इस दुख रूपी संसार से उनके आचार्य मोक्ष दिलायेगें । लेकिन सभी आचार्य कहते हैं श्री रामानुज स्वामीजी कि कृपा को ही मोक्ष प्राप्ति का उपाय मानिये । इससे यह सिद्ध होता है कि श्री रामानुज स्वामीजी मात्र इस संसार से मोक्ष दिलाकर परमपद में भगवान के चरणारविन्दो की सेवा के अधिकारी बनाते हैं ।

इस श्लोक के अनुसार आचार्य के परिपूर्ण रूप से लक्षण श्री रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है। श्री आन्ध्रपूर्ण स्वामीजी भी यही कहते है कि “आचार्य पद” एक विशेष उपाधि है जो कि सिर्फ श्री रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है ।

विष्णु शेषी तदीय शुभगुण नानिलयो विग्रह श्री शठारी

श्रीमन रामानुजार्य पदकमलयुगम भाथी रामा तदीयम ।

तस्मिन रामानुजार्ये गुरुरीथीच पदम भाथी नान्यत्र

तस्मद शीष्ठम श्रीमदगुरुनाम कुलमधी माकीलम तस्य नाथस्य शेष ॥

 

भगवानविष्णु जगत पिता है ,श्री शठकोप स्वामीजी जो विशेष गुणों से परिपूर्ण है, भगवान के श्री चरणारविन्दो के रूप मे विराजमान हैं।श्री रामानुज स्वामीजी श्री शठकोप स्वामीजी के श्री चरणारविन्द है ।ऐसे श्री रामानुज स्वामीजी पर पूर्ण गुरु परम्परा आधारित है ।

 

श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार के पहिले सभी आचार्यों को भविष्य में क्या होनेवाला है यह मालूम था,क्योंकि श्री शठकोप स्वामीजी ने सहस्त्रगीति (५.२.१) में कहा है कि“ कलियुम केडूम ”, कली का विनाश श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार से होगा ।सभी आचार्यों को भगवान में और अपने आचार्य में परिपूर्ण विश्वास था ,तो भी वे श्री रामानुज स्वामीजी के साथ जो सम्बन्ध होनेवाला था उसका अनुभव करते हुये, उनके “ उद्धारकत्व ” गुणका सदैव स्मरण करते थे ।संबंध दो प्रकार से होता है, आरोहण और अवरोहण ।आरोहण याने नीचे से ऊपर वर्तमान आचार्य, अस्मदाचार्य, परमाचार्य । अवरोहण याने ऊपर से नीचे याने शिष्य, उनके शिष्य ।इन दोनों क्रमो में श्री रामानुज स्वामीजी प्रधान स्थान पर विराजमान है। आरोहण क्रम मे श्री भगवान अंत में आते है, जो की प्रथम आचार्य है । और अवरोहण क्रम का कोई अंत नहीं है वह परम्परा बडती ही रहेगी । यह परम्परा श्री रामानुज स्वामीजी पर केंद्रीकृत है ।

हम अपने गुरु परम्परा में देखते हैं कि श्री भगवान से प्रारम्भ होकर श्री वरवर मुनि स्वामीजी तक हैं, जिसमे श्री रामानुज स्वामीजी बीच मे बिराजमान है ।जैसे एक मोती के हार में हीरा बीच में विराजमान होकर दोनोऔर के मोतियों की शोभा बडाता है, वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी बीच में विराजमान होकर पूर्ण गुरु परम्परा की शोभा को बढ़ा रहे हैं ।

जैसे अष्टाक्षर मंत्र में नमः पद बीच में विराजमान होकर उपाय को संबोंधित करता है वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी श्री आचार्य रत्न हार के बीच में विराजमान है और नमः पद की तरह उपाय को संबोंधित करते है ।

अरवनयशो यत पदा सरसीजध्वन्धम आश्रित पूर्वे

मूर्ध्ना यस्यन्वयम उपगता देशिक मुक्तिमापुः ।

सोयं रामानुज मुनीर अपी स्वीय मुक्तिम करस्थं

यत संबन्धम अमनुथ कथम वर्णीयते कुरनाथ  ॥

श्री रामानुज स्वामीजी के बाद में जो आचार्य हुये हैं वे ऐसा मानते हैं कि श्री स्वामीजी के चरण सम्बन्ध से हमें मोक्ष मिलेगा और पहिले जो आचार्य हुये हैं वे ऐसा मानते हैं कि श्री स्वामीजी के सिर (तिरुमुडी) के सम्बन्ध से मोक्ष मिलेगा । श्री रामानुज स्वामीजी मानते थे कि कुरेश स्वामीजी के साथ सम्बन्ध रहने के कारण मुझे मोक्ष मिल रहा है । ऐसे महान श्रीकुरेश स्वामीजी की महिमा का वर्णन कैसे कर पायेगें?

आचार्य दो प्रकार के होते है , स्वानुवृत्ती प्रसन्नाचार्य और कृपामात्र प्रसन्नाचार्य ।

जो आचार्य अपने शिष्यों की परीक्षा लेकर उनको रहस्य ग्रन्थों के अर्थ को बताते है उन्हे स्वनुवृत्ती प्रसन्नाचार्य कहते है। संसार में डुबे हुये अपने शिष्य पर विशेष कृपा करके रहस्य ग्रन्थों के अर्थ को बताते है उन्हे कृपामात्र प्रसन्नाचार्य कहते है ।

एक समान्य शिष्य के मोक्ष के लिये कृपामात्र प्रसन्नाचार्य का आश्रय ग्रहण करना चाहिये,क्योंकि स्वानुवृत्ती प्रसन्नाचार्य कि कृपा का पात्र बनने के लिये शिष्य को अपने आचार्य पर पूर्ण विश्वास और शास्त्र के अनुकूल आचरण एवं अनुष्ठान करना अत्यन्त आवश्यक है।इस बात कि पुष्टि श्रीदाशरथी स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी अपनी वार्ता में करते हैं,तब श्रीकुरेश स्वामीजी बताते हैं कि सिर्फ कृपामात्र प्रसन्नाचार्य ही समान्य जीवों को इस संसार के भव बन्धन से छुड़ा सकते हैं ।

 

श्री पेरियावाचन पिल्लै, “ज्ञानसारम” के ३६वें पासूर का वर्णन करते हुये बताते हैं किकृपामात्र प्रसन्नाचार्य कृपा करके शिष्यों के सिरपर अपने चरणारविन्द को रखकर इस संसार के भव बंधन से छुड़ा देते हैं ।जैसे शरणागति में स्वगत शरणागति की अपेक्षा परगत शरणागति को श्रेष्ठ बताया गया है, वैसे ही चरमोपाय ( आचार्य निष्ठा) में आचार्य अपनी निर्हेतुक कृपा द्वारा शिष्य को अपनाना ज्यादा श्रेष्ठ बताया गया है । “उद्धारकत्व”गुण पूर्ण रूप से कृपामात्र प्रसन्नाचार्य में विद्यमान रहता हैं ।

 

सोमसियाण्डान अपने आचार्य वैभव ग्रंथ के गुरु गुणावली में बताते हैं की

यस्सपराधन स्वपधाप्रपन्नन स्वकीयकारूण्य गुन्नेण पाती ।

स एव मूख्यो गुरूराप्रमेयस तदैव शब्धि परीकीर्त्यादेही ॥

जो आचार्य अपनी निर्हेतुक कृपा से शरण में आये हुये शिष्य की पूर्ण रूप से रक्षा करते हुये उसको स्वरूप ज्ञान करवाते हैं, ऐसे आचार्य का बहुत महत्व बताया गया है । ऐसे कृपामात्र प्रसन्नाचार्य में उद्धारकत्व एवं कृपामय गुण भी होता है । यह उद्धारकत्व गुण पूर्ण रूप से रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है ।

  • उन्होने स्वयं कष्ट सहन करके श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी को प्रसन्न किया और चरम श्लोक के रहस्य अर्थों को ग्रहण किया । लेकिन अपनी निर्हेतुक कृपा से रहस्य अर्थों को सभी इच्छुक श्रीवैष्णवों को प्रदान किया ।इस दृष्टांत में स्वामीजी का कारुण्य गुण प्रकाशित होता है ।
  • राजा महेन्द्र पेरुमाल अरयर नामक एक अरयर स्वामी थे, उनका एक अरंगमालिका नाम का पुत्र था । वह पुत्र उनकी बात को नहीं सुनता था और मित्रता दुष्ट लोगों के साथ थी। इस बात को सुनकर श्री रामानुज स्वामीजी अपने एक शिष्य को भेजकर अपने पास बुलाया और कहा “ ओ मेरे पुत्र तुम मुझे छोड़कर गये तो भी मै तुम्हें नहीं छोड़ूँगा ”। यह बताकर अपने अर्चा विग्रह भगवान के दर्शन कराये और रहस्य अर्थों को प्रदान किया । अपने चरणारविन्दो को अरंगमालिका के सिर पर रखकर कहा कि सदैव इन चरणारविन्दो पर ही अवलंब रहना । अगर और किसी दूसरी चीज का आश्रय लिया तो नरक में डाले जाओगे । इसके बाद अरंगमालिका ने श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दो का आश्रय कभी नहीं छोड़ा ।

 

इन दोनों दृष्टांतो से हम जान सकते है की उद्धारकत्व एवं कृपामय गुण श्री रामानुज स्वामीजी में परिपूर्ण रूप से  विद्यमान है ।

 

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

 

SOURCE :  http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-invocation.html

चरमोपाय निर्णय – प्रस्तावना

श्रीवैष्णव संप्रदाय में आचार्य के श्रीचरणारविन्दो को चरमोपाय बताया गया है। चरम याने अंतिम, उपाय याने उपेय की प्राप्ति का साधन । अपने पूर्वाचार्यों ने यह बताया है कि अपने अंतिम लक्ष की प्राप्ति के लिये आचार्य के चरणारविन्दो को ही उपाय के रूप में स्वीकार करना चाहीये ।

श्री आंध्रपूर्ण स्वामीजी बताते है की “आचार्य एक विशेष स्थान है, श्री रामानुज स्वामीजी मात्र आचार्य स्थान पर सुशोभित हो सकते हैं।”

श्रीपेरियवाच्चान् पिल्लै के पुत्र नायनाराच्चान् पिल्लै  अपने संप्रदाय के विद्वानों में से एक है ,इन्होने चरमोपाय निर्णय नामक एक विशेष ग्रंथ की रचना की है । इस ग्रंथ में भगवान और पूर्वाचार्यो के वचनों का उल्लेख करकेश्रीरामानुज स्वामीजी के वैभव को प्रकाशित किया गया है।

श्रीपेरियवाच्चान् पिल्लै – तिरुचेगंनूर

श्री पिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण ग्रंथ के प्रारम्भ में कहते है की वेद / वेदांतम का सार स्मृति, इतिहास और पुराण के द्वारा जाना जा सकता है । अंत में श्री वचन भूषण के ४४७ वे सूत्र में बताते है कि “ आचार्य अभिमानमे उद्धारकम ”  अर्थात श्री आचार्य की कृपा के द्वारा मात्र शिष्य इस संसार के भव बंधन से छूट जाता है, जो की वेद / वेदांतम का सार है ।

पिल्लै लोकाचार्य – वरवरमुनि स्वामीजी  ( श्री भूतपुरी )

श्री वरवरमुनी स्वामीजी उपदेश रत्नमाला के ३८ वें पासूर में बताते हैं की

एम्बेरुमानार दर्शनमेन्ने इदर्क्कु ,

नम्बेरुमाल पेरीटूट्टू नाट्टीवैतार, अम्बूवियोर

इन्द दर्शनतै, एम्बेरुमानार वलर्त्त

अन्द च्चेयलरिकैका ॥३८॥

 

“श्री वैष्णव संप्रदाय के वैभव को बडानेवाले श्री रामानुज स्वामीजी हैं । श्री रामानुज स्वामीजी का वैभव बड़ाने के लिएश्री रंगनाथ भगवान ने श्रीवैष्णव संप्रदाय का नाम श्री रामानुज संप्रदाय रखा ।”

श्री रामानुज स्वामीजी श्री आदिशेष के अवतार हैं । अनादिकाल से विषयों का अनुभव करते हुये संसार सागर में मग्न रहनेवाले जीवात्माओं पर निर्हेतुक कृपा कर उनको अपना दास बनाकर,रहस्यत्रय आदि के अर्थों को बताकर उनको इस दुःख रूपी संसार से मुक्त कराते हैं ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी बताते हैं कि जो जीवात्मा अपने आचार्य की आज्ञा का तदनुकूल आचरण करेगें,वे महात्मा  श्री रामानुज स्वामीजी के विशेष कृपा पात्र बनेंगे और संसार सागर से पार होकर श्री परमपद में भगवान के श्री चरणारविन्दो का आश्रय लेंगे ।

इस ग्रन्थ को श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने अँग्रेजी में अनुवाद किया है,उसको आधार बनाकर हिन्दी में अनुवाद किया गया है ।

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

Source : http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-introduction.html