द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 3

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 2

श्री तैत्तरीय उपनिषद:

सहस्रपरमा देवी शतमूला शताङ्कुरा |

सर्वं हरतु मे पापं दूर्वा दुस्स्वप्ननाशिनी | |

इस श्लोक में दिव्य प्रबंध अथवा द्रमिडोपनिषद के प्रति की हुयी प्रार्थना है।

“देवी” शब्द मूल “दिवु” से आता है। दिवु – क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु। अनेक अर्थोमें से यहाँ स्तुति यह अर्थ विशेष है। “देवी” यह श्लोकोंकी मालिका है जो भगवान के गुणोंपर स्तुतियोंद्वारा प्रकाश करती है।

देवी दूर्वा शब्द से विशेषण प्राप्त है।इसका अर्थ है “हरभरा”।  आल्वारोंके प्रबंध हरेभरे माने जाते हैं।इससे यह प्रतीत होता है की इन पाशूरोंमें उष्णता नहीं है जो संस्कृत में होती है परंतु तमिल हरिभरी होने के कारण शीतल है।

सहस्रपरमा: जिसमे श्री शठकोप स्वामीजी के १००० पाशूर सबसे महत्त्वपूर्ण भाग के रूप में हैं।इसका आचार्य हृदय के सूत्र में उल्लेख किया गया है। वेदोंमें पुरुष सूक्त, धर्म शास्त्रोंमें मनु, महाभारत में गीता, पुरानोंमें श्री विष्णु पुराण जैसे महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं वैसेही सहस्रगिती द्रविड़ वेदोंमें महत्त्वपूर्ण भाग/सार मानी जाती है।

शतमूला – जिसका आधार १०० श्लोक में वर्णित हैं। श्री सहस्रगिती के १००० पाशूरोंका आधार १०० पाशूर के तिरुविरुथ्थम् में है।  श्री अझगीय मणवाल पेरुमाल स्वामीजी आचार्य हृदय में इसका वर्णन करते हैं।जब ऋग्वेद संगीतमें सुंदर रिती से गाया जाता है तो वो साम वेद के रूप में परिवर्तित हो जाता है।  वैसेही, जब तिरुविरुथ्थम के १०० पाशूर संगीत के साथ गाये गए, तो उनका सहस्रगिती के मधुर १००० पाशूरोंमें परिवर्तन हो गया।  इसलिए, श्री सहस्रगिती के १००० पाशूरोंका आधार १०० पाशूर के तिरुविरुथ्थम् को माना गया है। और इसी कारण इसको शतमूला ऐसे संबोधित किया है।

शताङ्कुरा – वह जो एक सौ पाशूरोंसे से अंकुरित है।सम्पूर्ण दिव्य प्रबंध का योगीत्रय (श्री भूतयोगी, श्री सरोयोगी, श्री महाद्योगी) के मुदल तिरुवंदादी, इरांदम तिरुवंदादी, और मुंद्रम तिरुवंदादी से उगम हुवा है।

 

 

 

 दिव्य प्रबन्ध का स्वरूप क्या है?

श्री परकाल स्वामीजी

दुस्स्वप्न-नाशिनी – यह बुरे स्वप्न नष्ट कर देता है। यहाँ सोते समय आने वाले स्वप्न का संदर्भ नहीं है। श्री परकाल स्वामीजी कहते हैं, “भगवान को जाने बिना बिताए गए दिन एक मूर्ख के स्वप्न से ज्यादा निरर्थक हैं।” स्वप्वनास्था वह अवस्था है जिसमे कोई चेत नहीं होता।  इसी तरह, भगवान को जाने बिना बिताए दिन बुरे स्वप्न के समान हैं।  यह स्वप्न बुरा है क्योंकि जब तक जीव भगवान को नहीं जानता है तब तक वो अनंत यातनाएं सहन करता हुआ समय व्यतीत करता है।  द्रविड़ वेद भगवान के बारे में जीवोंकों ज्ञान देता है और संसार के प्रभाव को नष्ट करता है।   सहस्रगितीमें श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं कीभ्रामक मृगतृष्णा की तरह यह संसार पाशुरोंके के इस दशक से नष्ट हो जाता है।  जो द्रविड वेदोंके ज्ञान से प्रकाशित हैं, उनका दु:स्वप्न रूपी संसार नष्ट हो जाता है।

सर्वं हरतु मे पापंमे सर्वं पापं हरतु। कृपा करके मेरे सभी पापों को नष्ट करो। तत्त्व-हित-पुरुषार्थ के अनुभूति में जो बाधा करते हैं वो पाप हैं।  ऐसे पापोंको नष्ट करने के लिए यह प्रार्थना है।

संक्षेप में, यह श्लोक प्रार्थना करता है की सदा हरेभरे रहनेवाले द्रविड वेद पढ़ने वाले के पाप नष्ट कर दे। दिव्य प्रबन्ध भगवान का महिमा गान करते हैं। उसमें श्री सहसरगिती के १००० पाशूर अधिकतम महत्त्वपूर्ण हैं, जो तिरुविरुथ्थम के १०० पाशूरोंसे विकसित हुआ है।यह योगीत्रय आल्वारोंके प्रत्येकी १०० पाशूर के तिरुवंदादी से अंकुरित है और दु:स्वप्न रूपी संसार का नाशक है।

सांतवे काण्ड के पांचवे प्रश्न में यह कहता है, “वेदेभ्यस्स्वाहा” और तुरंत कहता है “गाथाभ्यस्स्वाहा”। यहाँ वेद से संस्कृत वेद और गाथा से दिव्य प्रबन्ध प्रतीत होते हैं।यह देखा जा सकता है की गाथा यह शब्द श्री देशिकन स्वामीजी द्वारा द्रमिडोपनिशत तात्पर्य रत्नावली में द्रविड़ वेदोंकों संबोधित करने के लिए अनेक बार उपयोग में आया है। उदाहरण के लिए, द्रमिडोपनिशत तात्पर्य रत्नावली के द्वितीय श्लोक में कहा है:

प्रज्ञाख्ये मन्थशैले प्रथितगुणरुचिं नेत्रयन् सम्प्रदायं

तत्तल्लब्धि – प्रसक्तैः अनुपधि – विबुधैः अर्थितो वेङ्कटेश: |

तल्पं कल्पान्तयूनः शठजिदुपनिषद् – दुग्ध – सिन्धुं विमथ्नन्

ग्रथ्नाति स्वादु – गाथा – लहरि – दश – शती – निर्गतं रत्नजातम् | |

सदा सुकुमार श्रीमन्नारायण भगवान का विश्राम स्थल और जिसकी लहरें मधुर १००० पाशुरोंके रूप में उत्पन्न होती हैं ऐसा क्षीर सागर हैं। उस क्षीरसागर समान श्री शठकोप स्वामीजी के उपनिषत का मंथन करके प्राप्त धन संपत्ति का आनंद लेने की जो इच्छा रखते हैं ऐसे निर्मल हृदय के पंडितोंसे अनुरोध होनेपर मैं, वेंकटेश, प्रसन्न होता हूँ।

वेदोंमें वर्णित द्रविड़ वेदोंका वर्णन सम्पन्न हुआ।

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 2

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 1

श्री कुरेश (श्री कुरथ अझवान)

अभी तक यह चर्चा की गई की श्री शठकोप स्वामीजी वेदान्त के सर्वोच्च आचार्य है और श्री रामानुज स्वामीजी का श्री दिव्य प्रबंध के साथ गहरा संबंध था। आगे अब यह दर्शाया जाएगा की संस्कृत वेद, उनके उपब्राह्मण, और पूर्वाचार्योंका संस्कृत साहित्य (विशेष रूप से श्री यामुनाचार्य, श्री कुरेश, श्री पराशर भट्टर और श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी के साहित्य) दिव्य प्रबंध और आल्वारोंके वैभव का ही गान करते हैं।

 

श्री यामुनाचार्य

श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी

 

वेदों में द्रमिडोपनिषत- श्री शठकोप स्वामीजी (सूर्य)

श्री शठकोप

    श्री मधुरकवी स्वामीजी एक बार उत्तर यात्रा में थे, जब उन्होने दक्षिण से एक विलक्षण प्रकाश को आते देखा। बड़ी उत्सुकता से इस प्रकाश का स्रोत ढूंढते ढूंढते वो सीधे दक्षिण में श्री आल्वार तिरुनगरी पहुंचे और उनको पता चला की श्री शठकोप स्वामीजी ही इस प्रकाश का स्रोत हैं।
श्री अझगीय मणवाल पेरुमाल नयनार स्वामीजी आचार्य हृदय ग्रंथ में कहते हैं,
अज्ञान रूपी अंध:कार सूर्य के द्वारा नष्ट नहीं हो सकता। संसार रूपी विशाल महासागर भगवान श्री राम रूपी सूर्य से नहीं सूख सका। हमारे हृदय भगवान श्री कृष्ण रूपी सूर्य से पूरी तरह से खिले नहीं। बकुल पुष्प से सुशोभित श्री शठकोप स्वामीजी रूपी एक नए सूर्य से यह सब संभव हुआ।
श्री नाथमुनी स्वामीजी ने श्री शठकोप स्वामीजी की तनियन की रचना की:

श्री नाथमुनी

यद्गोसहस्रमपहन्ति तमांसि पुंसां, नारायणो वसति यत्र सशंखचक्रः |
यन्मण्डलं श्रुतिगतं प्रणमन्ति विप्राः तस्मै नमो वकुलभूषणभास्कराय | |

जिसके सहस्र किरण (सहस्रगिती के पाशूर) जीवोंका अंध:कार दूर करते हैं, जिनमें श्री नारायण भगवान शंख चक्र सहित बिराजमान होते हैं, शास्त्रोंमें जैसे वर्णन है वैसे जिनका स्थान यथार्थ ज्ञानियोंद्वारा पूजित है, ऐसे सूर्य जो बकुल पुष्पोंसे सुशोभित श्री शठकोप स्वामीजी हैं उनकी में आराधना करता हूँ।
श्री नाथमुनी स्वामीजी सामान्य रूप सी गाये जानेवाले एक श्लोक का अर्थ बताते हैं,

ध्येयस्सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः |
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशंखचक्रः | |

यह श्लोक में वर्णन है की नारायण जो विशेष रूप से सुशोभित हैं और शंख चक्र धारण करते हैं, वे सविता मण्डल में बिराजमान हैं और उनका ध्यान सदा करना चाहिए। श्री नाथमुनी स्वामीजी दर्शाते हैं की सविता मण्डल या सूर्य का संदर्भ श्री शठकोप स्वामीजी से ही है, जो श्री सहस्रगीति के सहस्र किरणोंसे दैदीप्यमान हैं, जहां भगवान श्री नारायण अति आनंद के साथ बिराजते हैं, जिनका प्रकाश जगत के अज्ञान का विनाश करता है, और जिनके प्रकाश ने श्री मधुरकवी स्वामीजी को उत्तर से दक्षिण तक मार्गदर्शन किया। सवित्रा प्रातुर्भावितं सावित्रम्. – सवितृ से जो उत्पन्न होता है उसे सावित्र कहते हैं। इसी कारण श्री सहस्रागिती को सावित्र कहा गया है। इंद्र ने भारद्वाज को सावित्र का अध्ययन करनेका निर्देश दिया था।

भारद्वाज की समस्या पर इंद्र का समाधान

श्री यजुर्वेद के कटक अनुभाग में प्रथम प्रश्न यजुर्वेद इंद्र के शब्द से संबंधित है.
भरद्वाजो ह त्रिभिरायुर्भिर्ब्रह्मचर्यमुवास। तं ह जीर्णं स्थविरं शयानम्। इन्द्र उपव्रज्योवाच। भरद्वाज। यत्ते चतुर्थमायुर्दद्याम्। किमेनेन कुर्या इति। ब्रह्मचर्यमेवैनेन चरेयमिति होवाच॥ तं ह त्रीन्गिरिरूपानविज्ञातानिव दर्शयाञ्चकार। तेषां हैकैकस्मान्मुष्टिमाददे। स होवाच। भरद्वाजेत्यामन्त्र्य। वेदा वा एते। अनन्ता वै वेदाः। एतद्वा एतैस्त्रिभिरायुर्भिरन्ववोचथाः। अथ तम् इतरदननूक्तमेव। एहीमं विद्धि। अयं वै सर्वविद्येति॥ तस्मै हैतमग्निं सावित्रमुवाच। तं स विदित्वा। अमृतो भूत्वा। स्वर्गं लोकमियाय। आदित्यस्य सायुज्यम् इति॥

भारद्वाज मुनी की इच्छा थी की तीनों वेदोंपर प्रभुत्त्व प्राप्त करें। इसी इच्छा से उन्होने इंद्रा से वर प्राप्त किया की वो तीन मनुष्य की आयु प्राप्त करेंगे। एक जीवन में एक वेद का अध्ययन करेंगे।  तीन जीवन के अंत में भारद्वाज मुनी अशक्त होगये।  इंद्र ने उनसे पूछा की अगर में तुम्हें और एक जीवन प्रदान करूँ तो तुम उसे कैसे व्यतीत करोगे? भारद्वाज जी ने बताया, “में वेदोंका पुन: अध्ययन करूंगा।

इंद्रा को समझ गया की भारद्वाज जी वेदोंपर प्रभुत्त्व प्राप्त करना चाहते हैं।    इंद्र ने अपनी योग शक्ती से तीनों वेदोंकों भारद्वाज जी के सामने तीन विशाल पर्वत के रूप में दर्शाया।     इन्द्र ने भारद्वाज जी को बताया की तीन जीवन के अंत में उन्होने तीनों वेदोंका कुछ ही अंश सीखा है।   इंद्र ने यह भी बताया के वेद अनंत हैं और उनपर कोई भी प्रभुत्त्व नहीं प्राप्त कर सकता।

भारद्वाजजी उदास हो गए।   चिंतायुक्त शब्दोंसे उन्होने पूछा, “फिर क्या वेदोंकों जाननेना कोई मार्ग नहीं है?”  भारद्वाज जी की निराशा देखकर इंद्र ने उन्हे परम ज्ञान बताया की जिसे जानने से सब कुछ जाना जा सकता है और इस संसार बंधन से छुटकारा भी मिल सकता है।  और वो ज्ञान का स्रोत है सवित्र अथवा श्री सहस्रगिती।

श्री भट्ट भास्कर का कथन इस प्रकार है, “इमं सावित्रं विद्धि, अयं हि सावित्रः सर्वविद्या तस्मात्तत्किं वृथाश्रमेण? इदमेव वेदितव्यमित्युक्त्वा तस्मै भरद्वाजाय सावित्रमुवाच.”

“इस सवित्रा को जानो।   यह सवित्रा के माध्यम से वेदोंके समस्त ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है।  जब यह सवित्रा उपलब्ध है तो फिर तुम क्यों व्यर्थ में संघर्ष करते हो?  केवल सवित्रा को जननेकी आवश्यकता है।    इसी कारण इंद्र ने भारद्वाज जी को सवित्र का अध्ययन कराया।

वेद अनंत हैं।  इनके सीधे अध्ययन से उन्हें पूरी तरह से जानना असंभव है।  अगर कोई उन्हे पूरी तरह जानना चाहता है तो हमे सवित्रा के ज्ञान को जानना होगा जिसे जानने से वेदोंका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है।  हमारे आचार्योंने उस सवित्रा (जो सूर्य के किरण हैं) उनको श्री सहस्रगिती के समान समझा। श्री सहस्रगिती , श्री वकुल भूषण भास्कर श्री शठकोप स्वामीजी के सहस्र पाशूर।

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 1

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

श्री रामानुज स्वामीजी और दिव्य प्रबन्ध

श्री दिव्य प्रबन्ध साक्षात आल्वारोंद्वारा प्रदत्त ज्ञान होने के कारण हमे श्री रामानुज स्वामीजी का श्री दिव्य प्रबन्ध के साथ जो संबन्ध है उसका अवलोकन करना आवश्यक है। ज्ञान की प्रणाली के साथ किसी के भी संबन्ध को विभिन्न दृष्टिकोणोंसे देखा जा सकता है।व्यक्ति एक छात्र के रूप में इस विषय का अध्ययन करने के लिए चुन सकते हैं. कोई एक छत्र के रूप में इसका अध्ययन करना चाहते हैं तो कोई और आगे बढ़कर एक विद्वान आचार्य बन सकता है ताकि वो इतरोंकों इस ज्ञान का प्रकाश कर सके। छात्र रूप में हो अथवा आचार्य रूप में हो, यह तो प्रमाणित होही जाता है की उसका संबन्ध इस विषय है।हम प्रवचन के प्रारम्भिक स्थिति में होने के कारण तर्क वितर्क करने वालोंकी आवश्यकता पूर्ण करनेके लिए तथा उन्हे और पढ़नेके लिए प्रोत्साहित करनेके लिए हमे इतनी जानकारी पर्याप्त है।

श्री रामानुज स्वामीजी – दिव्य प्रबन्ध के छात्र श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य प्रबन्ध के छात्र हैं इसके अनेक उदाहरण श्री गुरूपरम्परा ग्रंथोंमें प्राप्त होते हैं। श्री गुरूपरम्परा सारम् ग्रंथ के अनुसार श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री मालाधार स्वामीजी से सहस्रगीती का अध्ययन किया। श्री रामानुज नूट्रन्दादि (प्रपन्न गायत्री) में भी कई बार श्री रामानुज स्वामीजी के दिव्य प्रबंध के अध्ययन का उल्लेख किया गया है। इतिहास में तथा विविध स्तोत्रोमें श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य प्रबंध के विद्यार्थी होने के अनेक प्रमाण मिलते हैं। साथ में यह भी जानना जरूरी है की यह केवल ऊपरी अध्ययन अथवा व्यक्तिगत रुचि पे आधारित अध्ययन नहीं था। यह अध्ययन तो श्री नाथमुनी स्वामीजी से प्रणित आचार्य शिष्य परंपरा से दिव्य प्रबंध को जाननेकी व्यवस्था थी। यह कहना यथार्थ होगा की यह दिव्य आचार्य शिष्य परंपरा सहस्र वर्षोंसे चले आने का कारण एकमात्र श्री दिव्य प्रबंध ही हैं और श्री दिव्य प्रबंध इस परम्पराका अविभिन्न घटक है। अत: यह कहने में यत्किंचित भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए की श्री रामानुज स्वामीजी श्री दिव्य प्रबंध के एक समर्पित विद्यार्थी थे

 एम्पेरुमानार्  तिरुमलिअन्डन   र्श्रपाततिले्  तिरूवैमोज्हिकु अर्तम क्ए्ट्टरूलिनार

श्री रामानुज स्वामीजी – दिव्य प्रबन्ध के आचार्य

परंपरागत रूपसे श्री आलवारोंके दिव्य प्रबन्ध के पूर्व कुछ श्लोक निवेदन किए जातेए् हैं, जो श्लोक दिव्य प्रबन्ध का हिस्सा नहीं हैं। उन श्लोकोंको “तनियन” कहा जाता है।

हर दिव्य प्रबन्ध के लिए तनियन की संख्या परिवर्तनशील होती है। तनियन के कुछ उद्देश्य होते हैं, जो इस प्रकार हैं:
(I) यह दिव्य प्रबन्ध के महत्व को बताते हैं।
(II) जिन आल्वारोंने दिव्य प्रबन्ध की रचना की उनका महत्त्व बताते हैं।
(III) जिन आल्वारोंने दिव्य प्रबन्ध की रचना की उनका अवतारस्थल, अवतारदिन, या और कोई विशेषता बताते हैं।
(iv) दिव्य प्रबन्ध से जो संदेश मिलता है उसे संक्षिप्त रूप में समझाते हैं।
तनियन के उपरोक्त उद्देश्य स्पष्ट हैं। हमारे पूर्वाचार्योंकों दिव्य प्रबंधोंसे जो बोध हुआ और जो संदेश मिला वो सरल भाषा में तनियन हमे संक्षिप्त काव्य रूप में देते हैं।

परन्तु हमे ऐसे भी तनियन मिलते हैं जो उपरोक्त उद्देश्योंसे अलग हैं। यहाँ सहस्रगिती और पेरीय तिरुमोलि से कुछ तनियन प्रस्तुत कर रहे हैं।

सहस्रगिती में एक संस्कृत तथा पाँच तमिल श्लोक तनियन के रूप में हैं। उनमेसे दो तनियन हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। एक श्री अनन्तालवान स्वामीजी से रचित है तो दूसरी श्री पराशर भट्टर स्वामीजी से रचित है। दोनों आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के समकालीन शिष्य एवं परम शिष्य हैं।

एयन्दवाबरूगींरत्ति ,इरामानुशमुनि तन ,वायन्दमलर प्पादम वणड्ंगुगिन्रेन,आयन्द पेरूम् , शीरार शडगोबन शैन्दमिळ वेदम तरिक्कम् पेराद उळ्ळम् पेर ,                                                                                      

तनियन में निवेदन किया है की शठकोप स्वामीजी दूारा रचित दिव्य प्रबंघोको ठीक तरह से आत्मसात करने के श्री रामानुज स्वामीजी के चरणकमलोकी वंदना करता हूं

वान तिगळुम् शोलै मदिळरगॅंर वण् पुगळ्मेल् , आन्र तमिळ्मरैगळ् आयिरमुम  ईन्र   मुदल्दाय् शडगोबन्  मोयम्बाल वळरत्त , इदत्ताय् इरामानुशन्                

  तनियन में निवेदन किया है की शठकोप स्वामीजी  एक माॅं की तरह  सहस्त्रगिती के १००० पाशुरोकों जन्म दिया‍‍ सहस्त्रगिती रूपी इस बालक का पालन पोषण धात्रेय माता के रूप मे श्री रामानुज स्वामीजी ने किया

पेरीय तिरुमोलि में एक संस्कृत तनियन तथा तीन तमिल तनियन हैं। उसमेसे एक विशेष तनियन श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी से रचित है।

एगंल गदिये इरामानुज मुनिये,शगैं केडुत्ताण्डदवराशा,पोड्ंगु पुगळ्,मगैंयरकोनीन्द मरैयायिरम आनैत्तम् तगुंमनम नीयेनक्कु त्ता

यह तनियन श्री रामानुज स्वामीजी से निवेदन करता है की मेरे मन को आशीर्वाद दीजिये की मेरा मन श्री परकाल स्वामीजी के पेरीय तिरुमोलि को धारण कर सकें।

श्री रामानुज स्वामीजी का उल्लेख ही इन सब तनियन के मुख्य भाग है। यह विचित्र है क्योंकी कोई सीधे उन प्रबन्ध करता श्री आल्वार को निवेदन कर सकता है ।अथवा वो सीधे श्रीमन्नारायण भगवान को भी निवेदन कर सकता है। अथवा वो श्री लक्ष्मी अम्माजी को भी निवेदन कर सकता है। अथवा वो लूप्त दिव्य प्रबन्ध का पता लगानेवाले श्री नाथमुनी स्वामीजी को भी निवेदन कर सकता है। परन्तु वो मुख्य रूप से श्री रामानुज स्वामीजी के तनियन ही निवेदन करना पसन्द करते हैं।

इस रहस्य का उत्तर श्री पराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा रचित तनियन से मिलता है। यह तनियन सहस्रगिती के संदर्भ में होनेपर भी सामान्य रूप में सभी प्रबंधोंके लिए लागू है।इसका उत्तर यह है: दिव्य प्रबन्ध श्री आल्वारोंके द्वारा रचित होनेपर भी उन प्रबंधोंका पालन पोषण करके उनको सामान्य अतिसामान्य जीवोंके उपयुक्त बनानेका कार्य श्री रामानुज स्वामीजी ने ही किया। श्री रामानुज स्वामीजी का महत्वपूर्ण योगदान है की उन्होने अपने शिष्योंकी की टिप्पणियों के माध्यम से दिव्य प्रबंधोंके अर्थोंको सुरक्षित बनानेकी व्यवस्था की। श्री रामानुज स्वामीजी के विषय में एतिह्य तथा निर्वाह दिव्य प्रबंधोंके टिप्पणियोंमें उपलब्ध हैं।
यह सब ध्यान रखते हुये श्री वरवरमुनी स्वामीजीने आर्ति प्रबन्धं में द्रविड़ वेदोंका पालन पोषण करने वाले श्री रामानुज स्वामीजी का मंगलशासन किया है।मारन् उरै  सैइद ठमिल् मरै वलर्तोन् वा्ज्हिडये
इस तरह श्री रामानुज स्वामीजी का दिव्य प्रबन्ध के आचार्य के रूप में जाना जा सकता है।

श्रीरामानुज स्वामीजी का संचलन
श्री रामानुज स्वामीजी उनके समय में अपने संचलनसे कैसे प्रसिद्ध हुये?
क्या वे एक महा विद्वान के रूप में जाने जाते थे या एक निपुण वेदांति के रूप में जाने जाते थे?
श्री रामानुज स्वामीजी के आचरण के प्रत्यक्ष साक्षी श्री तिरुवरंगथ्थु अमूधनार स्वामीजी थे। वो कहते है:

उऱू पेरूञ्जेल्वमुम् तन्दैयुम तायुम, उयर कुरूवुम् वेरि तरू पूमगळ् नादनुम, मारन विळडि्गय श नेरि  तुरूम शन्दमिळ् आरणमे एन्रिन नीळ् निलत्तोर ,अरिदर निन्र इरामानुशन एनक्कारमुदे

श्री रामानुज स्वामीजी ने अपने आप को ऐसा संचालित किया की समस्त विश्व यह जान जाये की श्री शठकोप स्वामीजी द्वारा रचित द्रविड़ वेद उनके माता हैं, पिता हैं, धन है, गुरू हैं, और भगवान भी हैं।
श्री रामानुज स्वामीजी का द्रविड़ वेदोंके प्रति समर्पण इससे श्रेष्ठतर रूप से नहीं कहा जा सकता।

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

५७) प्रसाद विरोधी – शुद्ध प्रसाद में बाधाएं

श्रीरंगनाथ भगवान के प्रसाद से श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदव्यास भट्टर स्वामीजी प्राप्त हुए

प्रसाद का अर्थ वह भोजन है जो सबसे पहिले भगवान को अर्पण किया गया हो। भोजन जो तिरुमदप्पल्ली (रसोई) में बनाया गया हो। कच्चा दूध, फल, शक्कर आदि का एक बार भगवान को भोग लग गया तो वह प्रसाद हो जाता है। भगवान को भोग लगाना इसे तमील में ऐसे समझाया गया है “कंण्डरुलप पण्णुत्तल” – इसका अर्थ है वह जो भगवान को निवेदन किया गया हो जिसे कृपाकर वे अपनी दिव्य दृष्टी से देखकर पवित्र कर सके। प्रसाद स्वीकार का अर्थ प्रसाद को ग्रहण कर उसे पाना है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्रीवैष्णवों के लिये सर्वश्रेष्ठ महत्त्वपूर्ण है कि केवल प्रसाद को ही भोजन में पाये। बिना भगवान को भोग लगाये पाना सर्व प्रथम पाप हैं – यह भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता के ३.१३ में समझाया हैं तिरुवाराधन को यागम् समझाया गया है और तिरुवाराधन में अर्पण किया हुए प्रसाद को पाने को अनुयागम् कहा गया है। दोनों ही श्रीवैष्णवों के लिये महत्त्वपूर्ण है। हमारे पूर्वाचार्य प्रसाद का बहुत सम्मान/ आदर करते थे। जब श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली में भगवद प्रसाद भेजा गया था तो उसे पूरे हर्षोल्लास के साथ भेजा गया था। जिस पात्र में प्रसाद हो उसे सिर पर पूर्ण आदरपूर्वक रखते है। उसके साथ छत्र, चामर, वाद्य आदि भी होते है। एक और घटना में जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को प्रसाद दिया गया तो उन्होंने बड़े आनन्द से कहा “यां पेरू संमानम्” – यहीं वो सम्मान है जो हम प्राप्त करते है। अत: प्रसाद को पूर्ण आदर और सम्मान देना चाहिये। आजकल यह देखा जाता है कई जन (श्रीवैष्णव भी) प्रसाद का पूर्ण रूप से आदर नहीं करते है। कई जन प्रसाद ग्रहण कर दूसरों को दे देते है। कई जन प्रसाद लेकर मन्दिर में ही रख देते है। ऐसे व्यवहार से बचना चाहिये।

  • सांसारिक गाँव/ शहरों के मन्दिर में भगवान का प्रसाद ग्रहण करना और पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद जो सांसारिक जनों द्वारा बनाया और दिया गया हो तो भी उसका त्याग करना चाहिये। जब सांसारिक जन प्रसाद को बनाते और देते है तो वो सांसारिक विचार से करते है और उसका असर जो प्रसाद पाता है उस पर होता है। ऐसे प्रसाद से बचना उचित है। टिप्पणी: हमें सर्व प्रथम यह समझना चाहिये कि हम सांसारिक नहीं है, परंतु यदि सांसारिक बुद्धि वाले है और संसार में रत है तो भगवान के प्रसाद यह कहकर अनादर करना कि यह संसारी द्वारा पकाया गया है, अनुचित है।
  • दिव्य देश (अभिमान स्थल, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल) के मन्दिर में प्रसाद पाने से बचना बाधा है। उसे वितरण करते ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह समझाया गया है कि जब भी प्रसाद का वितरण हो उसे उसी क्षण पाना चाहिये। “प्रसाद प्रपत्ती मात्रेण: भोक्तव्य” व्याख्यान में भी लिखा है। हम यह स्मरण कर सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगम में खेल खेलनेवाले बच्चों से भी प्रसाद ग्रहण किये और तिरुवाराधन को पूरा किया जब की वह उनके खेल का हिस्सा था।
  • दिव्य देश के भगवान का प्रसाद विश्लेषण करने के पश्चात पाना बाधा है। वह कैसे बनाया गया है, किसने बनाया है आदि यह पुछताछ किये बिना उसे जैसे प्राप्त हुआ वैसे ही पाना चाहिये।
  • उपवास आदि के कारण प्रसाद का त्याग करना बाधा है। शास्त्रानुसार एकादशी का पालन करना चाहिये परन्तु दिव्य देश के मंदिरों में जब प्रसाद आदि देते है तो उसे सन्मान के साथ ग्रहण कर पाना चाहिये। भगवद प्रसाद का त्याग अर्थात उनका अपमान है। अनुवादक टिप्पणी: उपवास केवल विशेष दिवस पर किया जाता है जैसे एकादशी, पितृ तर्पण, ग्रहण आदि – ऐसे उपवास का कोई विकल्प नहीं है, उसे करना ही चाहिये। ऐसे उपवास के समय हमें भगवद प्रसाद प्राप्त हो तो हमें उस प्रसाद को सम्मान करते हुए ग्रहण करना चाहिये।
  • प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात आचमन कर स्वयं को शुद्ध करने कि इच्छा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: कुछ भी पाने के पश्चात हम हाथ, पैर धोते है और आचमन करते है। परंतु मन्दिर में भगवान का प्रसाद पाने के पश्चात अगर हमारे हाथ मुँह को स्पर्श न हो तो ऐसा कुछ भी शुद्धीकरण करने कि आवश्यता नहीं है। प्रसाद पाने के पश्चात हाथ पर जो भी बचा हो उसे अपने माथे पर पोछ लेना चाहिये।
  • भागवत प्रसाद को दूषित मानना बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ४१वें पाशुर में समझाते है कि “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदमन्रे” – अगर भागवत अपना शेष प्रसाद देते है तो वह सबसे अधीक पवित्र है। सामान्यत: किसी के द्वारा भोजन झूठा छोड़े जाने पर वह दूषित होने से हम उसे नहीं पाते है। ऐसे विचार हमें भागवत प्रसाद के समय नहीं आना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सामान्य मानना बाधा है। उसे बड़े आदर के साथ ग्रहण करना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सभी के सामने ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है।
  • आचार्य के मुख से स्पर्श होकर यह प्रसाद दूषित हो गया है ऐसा समझना बाधा है।
  • आचार्य प्रसाद पाने के लिये पूरे दिन भूखे नहीं रह पाना बाधा है। हमें प्रति दिन आचार्य प्रसाद को बड़े ही उत्सुकता से पाना चाहिये। इस सम्बन्ध में हम श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर को स्मरण कर सकते है जो “मोर मुन्नार ऐयर” (जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शेष प्रसाद (दही के चावल) को उनके केले के पत्ते में सबसे पहिले पाते थे) के नाम से भी प्रसीद्ध थे। वे “चिरोपासित सत वृत्तर” के नाम से भी प्रसीद्ध थे – जो अपने अच्छे आचरण के लिये जाने जाते थे। यहाँ सत वृत्ति (अच्छा आचरण) अर्थात प्रतिदिन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रसाद पाने के पश्चात उसी पात्र में पाना। वह भी इसलिये क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपना प्रसाद दही के चावल से समाप्त करते थे और जीयर प्रसाद को वही से प्रारम्भ करते थे जिससे उनके प्रसाद में आचार्य का स्वाद आये और उसके पश्चात वो रसम चावल और नेगिलकरीयमुत्तु (कुलम्भु) चावल पाते थे। यही श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर स्वामीजी हम पर “श्रीवचन भूषण मीमांसा भाष्य” नामक ग्रन्थ की कृपा किये।
  • भगवान को अर्पण किये हुए भोग पर जब उनके पाने के कोई निशान न दिखे तब भी ऐसे प्रसाद को खुशी से न पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अर्चावतार भगवान सामान्यत: अपने पवित्र नेत्रों से प्रसाद पाते है न की मुख से और उस भोग को प्रसाद में परिवर्तित करते है। इसलिये उनके द्वारा पाए गये प्रसाद पर कोई चिन्ह नहीं होंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें भगवद प्रसाद पाने में आनन्द नहीं लेना चाहिये।
  • जब आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से प्रसाद प्रदान करते है तो उसे उसी क्षण पा लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन से हम कई घटना ऐसी देख सकते है जहाँ उन्होंने स्वयं अपने शिष्य को अपना प्रसाद दिया है जैसे श्रीशैलेश स्वामीजी अपना शेष प्रसाद श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी को दिये है।
  • आचार्य के साथ बैठ कर प्रसाद पाना बाधा है। हमें आचार्य के प्रसाद पाने कि प्रतिक्षा कर फिर पाना प्रारम्भ करना चाहिये।
  • अपने आचार्य को प्रसाद पाते देख हमें पूर्णत: आनंदित होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • स्वयं भगवान के प्रसाद के पात्र से प्रसाद लेना बाधा है। हमें दूसरों के द्वारा प्रसाद वितरण करने तक रुकना चाहिए।
  • बिना अर्चक कि आज्ञा से प्रसाद लेना बाधा है।
  • भोग या प्रसाद जो भी अर्पण किया हो उसे दूषित करना बाधा है।
  • गुरु भाइयों को छोड़ प्रसाद पाना बाधा है। हमें दूसरों को प्रसाद देकर उनके साथ बैठकर प्रसाद पाना चाहिये।
  • प्रसाद के बर्तन या पत्ते को पीछे नहीं छोड़ना चाहिये जिससे संसारी, नास्तिक, पशु-कुत्ते आदि उसे स्पर्श न करें। ऐसा करना बाधा है।
  • भगवद/ भागवत प्रसाद को पाते समय शिष्टाचार न पता होना बाधा है। प्रसाद को बड़े आदर के साथ पाना चाहिये जैसे हमारे पूर्वाचार्य रखते थे और ऐसे तत्व का पालन न करना / उसे न जानना बाधा है।
  • प्रसाद को जमीन पर गिराना, पैर रखना, आदर न करना, आदि बाधा है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

५६) तीर्थ विरोधी – तीर्थ (पवित्र जल) से सम्बंधित बाधाएं

श्रीदाशरथी स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर सभी नगरवासी पवित्र होते हुए। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हुए।

तीर्थ का अर्थ है पवित्र जल। यह पवित्रता भगवान, आचार्य आदि के सम्पर्क में आने से आती है। जो जल भगवान के तिरुवाराधन में प्रयोग होता है उसे तीर्थ कहते है। उसे “भगवान का तीर्थ” भी कहते है। श्रीवैष्णव के परिभाषा में भगवान को स्नान कराने को “तिरुमञ्जन” कहते है। अन्य परिपेक्ष्य में भगवान के स्नान को “अभिषेक” भी कहते है। भगवान के स्नान के लिये जिस जल का प्रयोग होता है उसे “तिरुमञ्जन तीर्थ” कहते है। श्रीवैष्णव गोष्ठी (अन्य भी) में उसे एकत्रित कर सभी को वितरित किया जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में श्रीवैष्णवों के स्नान किये हुए जल को भी “तीर्थादुथल” कहते है। आचार्य और उच्च कोटी के श्रीवैष्णवों के चरणामृत को “श्रीपादतीर्थ” कहते है। जो जल आचार्य के चरण पादुका के सम्पर्क में आता है उसे भी “श्रीपाद तीर्थ” कहते है। इस भाग में हम भगवान के तीर्थ, तिरुमञ्जन तीर्थ और श्रीपादतीर्थ से सम्बंधित “तीर्थ विरोधी” विषयों में अभ्यास सिखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ के कई अर्थ है – पवित्र जल, पवित्र स्थान, स्वयं भगवान आदि। यहाँ हम केवल पवित्र जल जो कई प्रकार के है उस पर विषय को केन्द्रीत करेंगे।

  • भगवान का तीर्थ सांसारिक जनों या उनके घर से लेना बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष पर केन्द्रीत रहता है। जो सांसारिक लाभ पर केन्द्रीत होता है उसे भुभुक्षु कहते है। ऐसे जनों से भगवान का तीर्थ ग्रहण करना हानिकारक है क्योंकि ऐसे जनों से कोई भी सम्बन्ध हमारी निष्ठा पर प्रभाव डाल सकता है और पूर्वाचार्यों द्वारा दर्शाये गये मार्ग पर चलने से हमें डिगा सकता है।
  • साधनान्तर मनुष्यों (वह जो भगवान छोड़ अन्य सभी को उपाय मानता है) के सामने भगवान का तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: साधन का अर्थ कुछ पाने के लिये उपाय करना है। शास्त्र में भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त करने के उपाय हेतु कई विधियाँ समझायी गयी है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। कुछ जन प्रपत्ति को भी उपाय मानते है। परन्तु सच्चे प्रपन्न/ शरणागत केवल भगवान को ही एकमात्र उपाय मानते है। जो स्वयं के प्रयत्न को भगवान के प्राप्ति का उपाय समझते ऐसे जनों के सामने हमे कुछ भी पाना नहीं चाहिये।
  • मन्त्र उच्चारण (द्वय महामन्त्र छोड़ अन्य मन्त्र) करनेवालों के सामने भगवान का तीर्थ पाना बाधा है। शिष्य को आचार्य द्वारा बताये गये रहस्य त्रय ही उपयुक्त है उसके अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र है तो वह देवतान्तर मन्त्र है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही उपाय और अम्माजी और भगवान के प्रति पवित्र कैंकर्य ही उपेय है, द्वय महामंत्र इस बात को अत्यंत स्पष्टता से प्रकाशित करते है, इसलिये हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि बड़ी स्तुति करते है। सभी मंत्रों में इस मन्त्र को मन्त्र-रत्न कहते है और हमारे पूर्वाचार्य इसका निरन्तर जप करने और स्मरण करने को कहते है। “पूर्व-दिनचर्या” रचना में श्रीएरुम्बी अप्पा यह दिखाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ओष्ठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते है और उनका मन सदा उसके अर्थ का अनुसंधान करता था।
  • दिव्य देश में तीर्थ लेने से पहिले भगवान के तीर्थ कि पवित्रता को जाँचना बाधा है। दिव्य देशों में तीर्थ लेने से हमे घबराना नहीं चाहिये। दिव्य देश अर्थात वह मन्दिर जहाँ आल्वारों ने अपने दिव्य प्रबन्धनों में भगवान कि स्तुति की है। यही नियम उस स्थान के लिए भी है जो आचार्य / आल्वारों से सम्बंधित है (उदाहरण – अभिमान स्थल, अवतार स्थल आदि) – वों भी दिव्य देश के समान है।
  • अन्य स्थानों पर भगवान के तीर्थ की शुद्धता को जाँचे बिना ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देश, अभिमान स्थल और आचार्य / आल्वारों का अवतार स्थान को छोड़कर – अन्य स्थानों प्र हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि वहां श्रीवैष्णव क्रम का पालन हो रहा है। उदाहरण के लिए हमारे पूर्वज मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेते थे कि मन्दिर में जहाँ आचार्य/ आल्वारों कि सन्निधी है वहाँ सही क्रम का पालन हो रहा है और भगवान के साथ उनकी भी उचित सेवा हो रही है।
  • सांसारिक जनों के सामने तीर्थ लेना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य सांसारिक मानसिकता वाले लोगों से बचते थे और उनके सामने कुछ भी नहीं पाते थे।
  • अन्य श्रीवैष्णव के ग्रहण करने से पूर्व हमारा तीर्थ पाना बाधा है। हमें तीर्थ अन्य श्रीवैष्णव लेने के पश्चात ही लेना चाहिये। हमें जबरदस्ती कर आगे जाकर तीर्थ ग्रहण करने कि कोई आवश्यकता नहीं है।
  • किसी दिशा या स्थिति विशेष में तीर्थ लेने से बचना बाधा है। तीर्थ लेने के लिये ऐसा कोई नियम नहीं है जैसे पूर्व दिशा में होना, इत्यादि। हम श्रीवैष्णव गोष्ठी में कहीं भी हो हम तीर्थ ले सकते है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात उसे हमे अपने नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात हाथों को धोने का विचार करना भी बाधा है।
  • भगवद, आचार्य आदि का कोई भी कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धोना चाहिये। तीर्थ लेते समय हाथ ओष्ठ को छु सकते है – इस अशुद्धी को पवित्र करने हेतु हमें कोई कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धो लेना चाहिये।
  • तीर्थ को जमीन पर गिराना बाधा है। हमें तीर्थ ग्रहण करते समय अपना उपरी वस्त्र को हाथों के नीचे रखना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि तीर्थ जमीन पर न गिरे। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह समझाया गया है कि जो भी तीर्थ गिराता है वह बहुत बड़ा पाप करता है। तीर्थ या प्रसाद पर पैर रखने पर भी यही कहा गया है।
  • तीर्थ को माथे पर उछालना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले कहा गया है तीर्थ को नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये।
  • सांसारिक बाते करते हुए तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है। तीर्थ को बड़े आदर पूर्वक ग्रहण करना चाहिये और उस समय बाते करने से बचना चाहिये।
  • सांसारिक जनों द्वारा देखे जाने पर उस तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • हमें यह ज्ञान होना चाहिये कि भगवान के तीर्थ से भी बढ़कर श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ है। यह न समझना बाधा है।
  • तीर्थ कि सच्ची महिमा न जानकार, उसके देनेवाले के बाह्य रूप को देखकर ग्रहण करना बाधा है।
  • तीर्थ केवल एक बार ग्रहण करना पर्याप्त है यह तीर्थ देते समय क्या बोल रहे है उसपर आधारित है। सामान्यत: शातुमोरा के समय तीर्थ दिया जाता है और उस समय एक बार तीर्थ ग्रहण करना उचित है। यह न समझना बाधा है।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ जो आचार्य के कृपा से प्राप्त होता है उसे एक से अधीक बार ग्रहण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: कुछ मठ/तिरुमाली श्रीपाद तीर्थ दो बार और कुछ में तीन बार दिया जाता है। शास्त्र में दोनों के लिये उचित प्रमाण है। इसलिये यह समझा जा सकता है कि श्रीपाद तीर्थ को केवल एक बार नही लेना चाहिये।
  • हमें यह समझना चाहिये कि सदाचार्य का श्रीपाद तीर्थ हमेशा पूजनीय है (जैसे मटके में रखा गंगा जल पूजनीय है)। हमें यह भी समझना चाहिये कि यह शिष्टाचार है (यह बड़ों द्वारा आचरण मे लाया गया है) और हमे भी यह करना चाहिये। यह न समझना बाधा है।
  • श्रीपाद तीर्थ की महिमा “वेधकप पोन” (वह कसौटी जो ताम्बे को सोने में बदल देता है) से कि जाती है। श्रीपाद तीर्थ के केवल सम्बन्ध मात्र से हम पवित्र हो जाते है। “श्रमणी विदुर ऋषि पत्निकलैप पुतराक्किन पुण्डरीकाक्षन् नेदुनोक्कू” आचार्य हृदय – भगवान श्रीमन्नारायण के पवित्र नेत्र जिन्हें पुण्डरीकाक्ष ऐसे स्तुति किया जाता है उन्होंने शबरी, विदुर और ऋषियों कि पत्नीयों को भी पवित्र कर दिया। भगवान के पवित्र नेत्र जैसे आचार्य के पवित्र नेत्र भी श्रेष्ठ है। ऐसे आचार्य के श्रीपाद तीर्थ को विशेष मानना चाहिये। और इसे विशेष ज्ञान कहते है। ऐसा ज्ञान न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना दर्शायी गयी है। एक श्रीवैष्णव का पुत्र उसके गलत संगत से अवैष्णव कि ओर बढ़ रहा था। परन्तु एक दिन अचानक वह अपने पिता के सामने सुन्दर वैष्णव वेष, तिलक आदि के साथ आया। उसके पिता ने तुरन्त पूछा कि क्या श्रीकुरेश स्वामीजी ने तुम्हें अपने पवित्र नेत्रों से देखा? ऐसा श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा थी कि केवल अपने दृष्टि से किसी व्यक्ति में अच्छे पवित्र गुण लायेंगे।
  • केवल श्रीपादतीर्थ कि महिमा जानकार उसे ग्रहण करना और उसे पाने कि चाह नहीं होना बाधा है। केवल महिमा ही नहीं जानना चाहिये परन्तु ऐसे श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करने कि अति आर्तता भी होनी चाहिये।
  • किसी ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना जिनका देवतान्तर सम्बन्ध हो वो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विरुद्ध है। परिणाम जाने बिना ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • आनंदित होकर सबसे पहिले तीर्थ ग्रहण करना और अन्त में ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है। तीर्थ को जो भी स्थिति हो यह समझकर कि वो हमें शुद्ध करेगा, बिना कुछ अधिक सोचे विचारे ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से अस्वीकार करना क्योंकि उसमें स्वयं का श्रीपादतीर्थ है। विशेष समय में जब तिरुमाली में श्रीवैष्णव गोष्ठी होती है यह सामान्य प्रथा है कि वहाँ पधारे सभी श्रीवैष्णवों का श्रीपादतीर्थ लिया जाता है। उस श्रीपादतीर्थ को एकत्रीत किया जाता है और सभी को वितरीत किया जाता है। उस समय यह सोचकर कि उसमें अपना श्रीपादतीर्थ मिला हुआ है किसी को भी उस श्रीपादतीर्थ को अस्वीकार नहीं करना चाहिये। हमें यह विचार कर उस श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये कि उसमें वह जल है जो कई श्रीवैष्णवों के चरण साफ करने हेतु प्रयोग किया गया हो और यह हमें अधीक शुद्ध करेगा।
  • प्रायश्चित के लिये उपयोग तीर्थ जो कुछ कर्मों के लिये किया गया हो उसे प्रपन्नों को उपयोग नहीं करना चाहिये। ऐसा करना बाधा है।
  • शैव आदि से शारीरिक सम्पर्क में आने से हमें स्वयं को शुद्ध करने हेतु श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जब शारीरिक सम्पर्क होता है तो हमें उस भाग को धोकर साफ कर श्रीपाद तीर्थ लेना चाहिये। उस पाप के लिये यह प्रायश्चित है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि घटना को स्मरण कर सकते है। जब एक पाषण्ड के शरीर कि भस्म फैलकर स्वामीजी को स्पर्श कि तो स्वामीजी उसी क्षण अपने माता के पास गये और उन्हें शुद्ध करने को कहा। उनकी आण्डाल माता जो शास्त्र में विद्वान है उन्होने एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने को कहा और भट्टर स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु उत्सव के समय आये एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव से विनंती कर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करके स्वयं को शुद्ध किया। यह घटना वार्तामाला ३२७ में है।
  • श्रीपाद तीर्थ को केवल शुद्ध मानना और श्रीपादतीर्थ के प्रति अधीक लगाव न होना बाधा है। उसे बहुत आनंददायक समझना चाहिये।
  • केवल दिन में एक बार श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने से संतुष्ट होना और उसे दोबारा लेने कि इच्छा न करना बाधा है। जैसे कि एक शिशु जो अभी माँ का दूध पी रहा है उसे अपनी माँ के दूध कि और अधीक ललक होती है वैसे हीं हमें अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ कि ललक होनी चाहिये। ऐसे न करना बाधा है।
  • यह समझे बिना कि यह हमारे आचार्य का इस संसार में अन्तिम जन्म है आचार्य के श्रीपादतीर्थ से वंचीत रहना बाधा है। जैसे सहस्त्रगीति में “मरणमानाल वैकुण्ठं” कहा गया है (जब हम मर जायेंगे तो हम परमपद जायेंगे) हमें अपने आचार्य को बड़े आदर से देखना चाहिये और उनके श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और जब तक वे संसार में है उनसे बहुमूल्य उपदेश सुनना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ तीर्थ देनेवाले से सीधा ग्रहण करना चाहिये नाकी किसी ओर से। जैसे भगवान के तीर्थ वितरण के समय एक सह तीर्थकार देता है। ऐसा यहाँ नहीं होता है।
  • स्वयं श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना बाधा है। हमें आचार्य या जो तिरुवाराधन करते है उन्हीं से श्रीपादतीर्थ लेना चाहिये।
  • जब तक श्रीपादतीर्थ न मिले उसे पाने कि हमें बहुत ललक होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ अनजाने से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीपादतीर्थ देनेवाले और लेनेवाले दोनों का द्वय महामन्त्र पर ध्यान केन्द्रीत होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: द्वय महामन्त्र का अर्थानुसंधान हमेशा गुरुपरम्परा मन्त्र के साथ करना चाहिये। यह हमें निरन्तर स्मरण करायेगा कि हम अम्माजी और भगवान के दास है, जब हम स्मरण करेंगे की सिर्फ भगवान ही उपाय है तब परमपद में उनकी नित्य सेवा की हमारी लालसा बढ़ती जायेगी। गुरुपरम्परा मन्त्र को निरन्तर कहने से हमें यह स्मरण होता है कि भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध आचार्य के संबंध से ही है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २२

thyaga-mandapam
श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी जो श्रीवरदराज भगवान के अति प्रिय सेवक हैं, उनका शेष प्रसाद पाने की इच्छा श्रीरामानुज स्वामीजी रखते हैं

५५) भोग्य विरोधी – प्रसाद / प्रसाद पाने में बाधाएं

भोग्य अर्थात वह जिसे पाया जाता है। इस भाग में वह स्थान जहाँ हम प्रसाद पा सकते है और जहाँ हम प्रसाद नहीं पा सकते है उस विषय पर विस्तार से चर्चा कि गयी है। अनुवादक टिप्पणी: जब प्रसाद लेने या ग्रहण करना होता है तो बहुत सी बाधाएं आती है। बहुत पहिले वैधीक (वेद का पालन करने वाले) “परान्न नियमं” का पालन करते थे – अर्थात किसी से भी भोजन गृहण नहीं करना (स्वयं पकाना) और केवल सन्निधी (मन्दिर, मठ) से ही गृहण करना। परन्तु आजकल बहुत बड़ा बदलाव है – बहुत लोगो को भोजन बनाना नहीं आता है और वे बाहर के भोजन पर ही निर्भर रहते है। सामान्यत: सात्विक भोजन ही भगवान को अर्पण किया जाता है और श्रीवैष्णवों द्वारा पाया जाता है। जो भी भोजन हम पाते है उसे पहले भली प्रकार से जांच लेना चाहिए कि वह भोजन श्रीवैष्णवों द्वारा ही बनाया गया है, वह भगवत प्रसाद है और उस समय के अनुकूल उसे पाना उचित है अथवा नहीं। उदाहरण के लिए श्रीवैष्णव द्वारा भी विभिन्न प्रसाद बनाये और भगवान को भोग लगाये जा सकते है – परन्तु एकादशी के दिन इन विभिन्न प्रकार के व्यंजनों को पाया नहीं जा सकता है (सिमित सात्विक भोजन पाना चाहिए)। जब प्रसाद का विषय आता है ३ प्रकार की निषेधता देखी जाती है – “जाती दुष्ट” (भोजन जो उसके स्वभाव से ही पाने योग्य नहीं है – प्याज, लहसुन आदि), “आश्रय दुष्ट” (सात्विक भोजन परन्तु वह जो अवैष्णवों के स्पर्श में आया है) और “निमित्त दुष्ट” (भोजन जो खराब हो गया हो आदि)। यह तीनों प्रकार के दुष्टता वाले अन्न को किसी भी परिस्थिति में हमें नहीं पाना चाहिये। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण १७.८ से १७.१० से विस्तार से समझाते है कि हमें किस प्रकार का अन्न नहीं पाना चाहिये जैसे वह भोजन जो कुछ घण्टों पहिले बना हो, वह भोजन जो उसका प्राकृतिक गुण खो चुका है, वह भोजन जो बासी हो गया है आदि। सबसे उत्तम है भोजन सम्बंधित विषय पर आदरणीय बड़ों से ज्ञान प्राप्त करे और उसे ही भोग लगाकर पाए जो श्रीवैष्णवों के लिए उचित है। आहार नियम पर पूर्ण चर्चा इस लिंक द्वारा प्राप्त हो सकती है। http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-aahaara-niyamam_28.html  और http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-ahara-niyamam-q-a.html

  • सांसारिक जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा हैं। संसारी कौन है यह हम चर्चा कर चुके है – वह जो आत्म ज्ञान और भगवद ज्ञान रहित है।
  • देह सम्बन्धी जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों में भी कुछ श्रीवैष्णव लक्षण जैसे आचरण आदि होना चाहिये।
  • जो भगवान से क्षणिक सांसारिक लाभ की आशा करते है उन लोगों द्वारा बनाया गया भगवद प्रसाद पाना यह भी बाधा है। कुछ जन अपनी सांसारिक इच्छा (जैसे परीक्षा उत्तीर्ण होना, अथवा विवाहोत्सव) पूर्ण होने पर विशेष प्रसाद भोग लगाने का संकल्प लेते है। एक बार इच्छा पूर्ण होते हीं वे विशेष भोग बनाते और भगवान को भोग लगाते है। भगवद प्रसाद होने के उपरान्त भी क्यूंकि वह प्रसाद सांसारिक इच्छा पूर्ति हेतु भोग लगाया गया है इसलिये ऐसे प्रसाद से बचना चाहिये।
  • दिव्य देश कि महिमा को पूर्ण रूप से जाने बिना वहाँ का भगवद प्रसाद पाना बाधा है। दिव्य देश में आल्वारों ने द्वारा स्तुति कि है। ऐसे स्तुति को अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • केवल भगवान के प्रति भक्ति रखनेवालों के यहाँ प्रसाद पाना बाधा है। ऐसे लोगों को आचार्य, भागवतों आदि कि महिमा के विषय में ज्ञान नहीं है और इसलिये उनके तिरुमाली में प्रसाद नहीं पाना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव के तिरुमाली में स्वयं द्वारा बनाया हुआ प्रसाद पाना – यह विषय स्पष्ट नहीं है। परंतु इसे ऐसे समझा जा सकता है कि प्रसाद केवल स्वयं के पाने के लिये बना है भगवान के भोग के लिए नहीं। भगवान स्वयं भगवद गीता ३.१३ में कहते है “तेत्वकम भुन्जथे पापा ये पचन्ति कारणात्” – ऐसे जन जो केवल स्वयं के तृप्ति के लिये भोजन बनाते है वह पाप ही खाते है।
  • तिरुमाली में प्रसाद पाना जहाँ प्रसाद पवानेवाला इस विषय पर केन्द्रीत होता है कि तदियाराधन में कितना धन खर्च हुआ है, वह बाधा है।
  • किसी के कीर्ति, यश आदि में दिया हुआ भोजन पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग भोजन केवल इसलिये खिलाते है कि जिससे वो सब को यह बता सके कि वे दान पुण्य में कितने महान है। ऐसी जगह से बचना चाहिये।
  • विवाह में भोजन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर तदियाराधन मठ अथवा तिरुमाली में सही तिरुवाराधन विधि आदि से नहीं बना हो तो विवाह में प्रसाद पाने से बचना चाहिये। आजकल प्रसाद बनाने के तत्व में इतनी अशुद्धता है कि अवैष्णव जन प्रसाद बनाते है। ऐसे जगह में पाने से बचना चाहिये।
  • जिनके यहाँ कोई मृत्यु हुई हो उनके यहाँ प्रसाद पाना बाधा है।
  • पैसे देकर भोजन लाना और उसे पाना बाधा है। होटल और मंदिरों में बेचे जाने वाले भोजन को पाने से बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई तिरुवाराधन करता हो तो वहाँ प्रसाद पाने के पश्चात थोड़ा दान कर सकते है उस व्यक्ति के प्रति जिसने तिरुवाराधन विधि का प्रबन्ध किया है। परन्तु जो भोजन केवल बेचने के लिये बना है उसे खरीदना आत्मा के लिये हानिकारक है क्योंकि वह व्यक्ति केवल धन कमाने के लोभ में भोजन बेचता है और ऐसा भोजन करने से हमारा भी व्यवहार वैसी ही हो जाता है।
  • दूसरों का बचा हुआ शेष पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ यह समझना चाहिये कि सामान्य जनों का शेष भोजन पाने से सदैव बचना चाहिये। भगवान भगवद गीता में भी इस तत्व को समझाते है। भगवान कहते है किसी को किसी का शेष भोजन नहीं पाना चाहिये। अपने व्याख्या में श्रीरामानुज स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य आदि का शेष प्रसाद पाना सर्व-योग्य है। श्रीवेदान्ताचार्य अपनी व्याख्या में आगे और यह समझाते है कि पिता, बडे भाई, पति (पत्नी के लिये) आदि का शेष प्रसाद पा सकते है। श्रीभक्ताङिघ्ररेणु आल्वार के तिरुमालै के ४१वें पाशुर से हम यह समझ सकते है कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद पाने योग्य है।
  • बदले में कुछ पाने कि आशा से किसी को प्रसाद पवाना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण के २८६ और २८७ सूत्र में यह दर्शाते है कि हम भगवान के सही दास तभी होंगे जब हम किसी भी कैंकर्य को श्रीविदुरजी, श्रीमालाकार स्वामीजी और कुब्जा के समान प्रेम से करेंगे। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का इन सूत्रों के लिये विश्लेषण बहुत ही सुन्दर है। वे यह समझाते है कि सामान्यत: अगर कोई मनुष्य कैंकर्य करता है तो उसके बदले में वह कुछ आशा करता है। इन सभी परिस्थितियों में इन भागवतों ने बिना कोई आशा के कैंकर्य किया। श्रीविदुरजी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रेमभाव से केले का छिलका पवाये जिसे भगवान ने भी अत्यधिक प्रेम से पाया। श्रीमालाकार स्वामीजी ने भगवान कृष्ण के कहने पर बिना संकोच के उन्हें पुष्प दे दिया – यह भी न सोचा कि यहीं पुष्प उसके जीने का आधार है। कुब्जा पवित्र चन्दन का लेप भगवान कृष्ण को दी। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह भी दर्शाते है कि इन तीन भगवतों और घटना की अन्य विद्वानों ने भी स्तुति की है।
  • कुछ कार्य के लिये बनाया हुआ प्रसाद पाना बाधा है। कुछ वैधीक कार्य में थोड़ा सा प्रसाद कुछ देवता के लिये कुछ मन्त्र द्वारा अर्पण किया जाता है। उदाहरण के लिए श्राद्ध निमंत्रण पर। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।
  • कोई बड़े घमण्ड से प्रसाद पवाता है कि मैंने प्रसाद पवाया है। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।

आगे बढ़ने से पहिले आहार नियम से सम्बंधित, श्री उ.वे. वि.वि रामानुज स्वामी ने जैसा अपने बड़ो के आचरण को देखा है और जो अन्य ग्रंथ पढ़कर सिखा है वह समझाते है। आजकल यह तत्व समझनेवाले बहुत कम है और उन्हें पालन करनेवाले और भी कम है। प्रसाद को ३ गुणों के अनुसार से वर्गीकृत किया गया है सात्विक, रजस और तमस। रजस और तमस तो श्रीवैष्णवों को पूर्ण तरह निषेध है जिसकी भगवद गीता के १७वें भाग में चर्चा कि गयी है। आजकल लोग केवल बाह्य स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारें में सोचते है। आन्तरिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के विषय में ज्ञान बहुत थोड़ा है। अच्छे हृदयवाले लोग जो हमारे पहचान के हो उनको ही फल, सब्जियां, अन्न आदि उपजाना चाहिये और अच्छे मन से ही देना चाहिये। जो भोजन बनाता हो उसमें आचरण और अनुष्ठान दोनों ही होना चाहिये – नियमों का पालन के साथ स्वरूप ज्ञान होना चाहिये (कि वह जीवात्मा है जो भगवान की दास है)। वह श्रीवैष्णव सम्प्रदाय ग्रन्थों से भी परिचित होना चाहिए। पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित “यतीन्द्र प्रवण प्रभावम” से एक घटना वर्णित है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य थे उनको दो पत्नीयाँ थी। वो एक बार अलग अलग कर दोनों से एक प्रश्न किये। सर्वप्रथम उन्होंने अपनी पहिली पत्नी से पूछा कि “तुम मेरे विषय में क्या सोचती हो?” वह उत्तर देती है कि “मैं आपको को स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान ही जानती हूँ और अपना आचार्य मानती हूं”। वो प्रसन्न होकर उन्हें तिरुवाराधन और स्वयं उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर अपनी दूसरी पत्नी से भी यही प्रश्न करते है और प्रतिउत्तर में वह कहती है “मैं आपको अपना पति मानती हूं”। तब वह उन्हें अपनी पहिली पत्नी की प्रसाद बनाने में सहायता करने के लिए कहते है। जब उनकी पहिली पत्नी मासिक समय से होती है तब वह अपनी दूसरी पत्नी को प्रसाद बनाने कि आज्ञा देते है परन्तु उस पाने से पहले वे अपने प्रिय शिष्य को जो उच्च श्रीवैष्णव है प्रसाद को छुने को कहते है और तत्पश्चात पाते है। अत: वे अपने व्यवहार से यह बताते है कि हम श्रीवैष्णवों में सच्चा ज्ञान होना चाहिये ताकि भगवान और भागवतों के लिये प्रसाद बनाने का कैंकर्य प्राप्त कर सके। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय उनके मठ में उनके सभी शिष्य महान थे व् उच्च कोटी के आचार्य बनने में सक्षम थे। कई सामान्य, सांसारिक, देहिक जनों को उन्होंने अपनी सेवा से निकाले दिया था। ऐसा उनके जन्म के आधार पर नहीं किया गया था। अपितु यह पूरी तरह भगवद विषय के प्रति के उनके समर्पण के आधार पर था। भोजन जो हम पाते है वह भगवद प्रसाद होना चाहिये। हम यह देख सकते है कि भोजन विरोधी और भोग्य विरोधी दोनों पवित्र हृदय और सात्विक व्यवहार पर केन्द्रीत है।

  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए प्रसाद को पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए पात्र जिसमें प्रसाद हो उसे पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा बनाया हुआ प्रसाद, जो प्रसाद बनाते समय निरन्तर भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का स्मरण करता हो ऐसा प्रसाद पाना बाधा है। भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का अर्थ देवतान्तर भजन, गप्पे आदि।
  • प्रसाद बनाते समय दिव्य प्रबन्ध आदि का उच्चारण करना चाहिए और ऐसे प्रसाद को ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव जन प्रसाद बनाते समय तिरुपल्लाण्डु, तिरुपावै आदि पाठ करते है और भगवान के दिव्य लीलाओं का स्मरण करते है। ऐसे विषय कि चर्चा करते समय भगवान के लिये जो प्रसाद बनाया गया हो वो स्वादिष्ट हो जाता है। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ तिरुमला में हुई एक घटना को स्मरण कर सकते है। श्रीप्रतिवादी भयंकर अण्णन स्वामीजी श्रीनिवास भगवान के तिरुमंजन के लिये जल सेवा का कार्य करते थे। वह जल लाकर उसमें इलायची आदि डालकर उसे सुगन्धीत कर भगवान के अर्चक को दे देते थे। एक दिन श्रीरंगम से एक श्रीवैष्णव तिरुमला में पधारे और उन्होंने अण्णन स्वामीजी के समक्ष श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति और जीवन के विषय में चर्चा करना प्रारम्भ किया। उस प्रक्रिया में अण्णन स्वामीजी जल में सुगन्धीत द्रव्य डालना भुल गये और अर्चकों को ऐसे ही दे दिया। कुछ समय पश्चात अण्णन स्वामीजी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरन्त अर्चकों के समीप जाकर अपनी गलती के विषय में कहा। अर्चकजनों ने जो उस जल का उपयोग कैंकर्य हेतु करना प्रारम्भ कर चुके थे कहा कि आज तो यह जल प्रतिदिन से भी अधीक सुगन्धीत है। यह सुनकर श्रीअण्णन स्वामीजी को बहुत अचम्बा हुआ और उन्हें स्मरण हुआ की यह केवल श्रीरंगम से पधारे श्रीवैष्णव के साथ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में चर्चा करने से ही हुआ है। पश्चात वे श्रीरंगम जाकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए।
  • भगवान और भागवतों हेतु न होकर स्वयं कि तृप्ति के लिये भोजन बनाकर पाना बाधा है।
  • उन पात्र से भोजन लेकर पाना जिन पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो बाधा है। पात्र जिसमें प्रसाद बनाया, परोसा आदि जाये उस पर भगवान का तिलक होना चाहिये।
  • भगवान को भोग लगाये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • सांसारिक जनों द्वारा भोजन पवाना और भोजन जो सार्वजनिक स्थलों में दिया जाये, वह पाना बाधा है। भगवान को जब भी भोग लगाते है तो उस स्थान को परदे से ढकना या कक्ष का दरवाजा बंद कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद को कभी भी ढक कर रखना चाहिये। प्रसाद के वितरण के समय ही उसपर से कपड़ा निकालना चाहिये।
  • उस प्रसाद को पाना जो केवल भगवान को निवेदन किया हो और नित्यसुरी जैसे आदिशेष, विष्वक्सेन आदि आल्वार और आचार्य को अर्पण नहीं किया हो, बाधा है। जब हम भगवान को भोग लगाते है तब हम एक क्रम का अनुसरण करते है। पहिले हम कहते है “सर्व मंगल विग्रहाय समस्त परिवाराय श्रीमते नारायणाय नम:” (भगवान श्रीमन्नारायण जो अपने अनेक रूप और परिवार के साथ यहाँ पधारे है, मेरा यह कैंकर्य स्वीकार करें)। “अडियेन मेवी अमर्गिनर अमुधे! अमुदु सेय्तरुल वेण्डुम्”। (मैं यह प्रसाद पूर्ण भक्ति से अर्पण कर रहा हूँ कृपया स्वीकार करें)। अत: पहिले हम भगवान को अर्पण करते है। तत्पश्चात श्रीदेवी, श्रीभूदेवी और श्रीनीलादेवीजी आदि को यह कहकर कि “श्री भूमी नीलादिभ्यो नम:”। पश्चात हम शंख, चक्र, अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि को अर्पण करते है। फिर हमें आल्वार और आचार्य को “परांकुश परकाल यतिवराधीभ्यो नम:” कहकर उन्हें अर्पण करते है। (श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, आल्वार, श्रीरामानुज स्वामीजी और अन्य आचार्य भगवान का प्रसाद स्वीकार करें)। अन्त में हम अपने आचार्य को “अस्मद गुरुभ्यो नम:” कहकर अर्पण करते है। अत: प्रसाद पाने से पहले हम भोग भगवान, अम्माजी, नित्यसूरी, आल्वार और आचार्य को पहिले अर्पण करते है।
  • उस भोजन को पाना जिसके जाति या स्वभाव में ही दोष हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्याज, लहसुन, मुली, ढ़ोल का छड़ी, आदि सब्जियां उनके स्वभाव से अवगुण कारक है।
  • जो भोजन कीड़े, बाल (केशों), कृमी आदि से स्पर्श होता हो, वह भोजन पाना भी बाधा है।
  • अवैष्णवों के साथ बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम प्रसाद पाते है तब हमारे आस पास कौन है यह सदैव देखना चाहिये।
  • व्यर्थ चर्चा करते हुए प्रसाद पाना बाधा है। प्रसाद पाने से पहिले हमें परिसेषनं (अन्तरयामी भगवान को भोग लगाना) करना चाहिये और तनियन, श्लोक आदि गाना चाहिये। केवल व्यर्थ सांसारिक चर्चा करते हुए पाने से बचना चाहिये।
  • द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप किये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • केवल आनन्द भोग से प्रसाद पाना बाधा है। हमें सांसारिक आनन्द पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये। अपितु हमें प्रसाद कि शुद्धता पर केन्द्रीत होना चाहिये। अगर बड़े भी स्वाद लेकर चखते है वो कहते है “भगवान ने प्रसाद का आनन्द लिया है और शेष हमारे लिये दिया है”।
  • भगवद प्रसाद का बहुत आदर करना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद को भगवद आराधना का अन्तिम भाग समझकर पाना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन का एक भाग है भगवान, आल्वार और आचार्य को भोग लगाना। अब यही भोग प्रसाद हो गया है। हमें उस प्रसाद को स्वीकार कर ही तिरुवाराधन के क्रम को समाप्त करना चाहिये। तिरुवाराधन को याग कहते है और तदियाराधन को अनुयाग कहते है। हमारा आचरण यह होना चाहिये कि प्रसाद पाना भगवद कैंकर्य का एक अंश है (जिससे भगवद कैंकर्य के लिये हमारे में ऊर्जा आये) और यह हमारे निजी आनन्द भोग के लिये नहीं है। यह तत्व श्रीवचन भूषण के प्रपन्न दिनचर्या के २४३ सूत्र में विस्तार से समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि हमें प्रसाद देह धारण के लिये पाना चाहिये और तिरुवाराधन कि प्रक्रीय को सम्पन्न करना चाहिये।
  • भागवतों को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • सदाचार्य को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • केवल प्राण वायु को पवाकर प्रसाद पाना बाधा है। परिशेषण विधि के अनुसार हमें प्रसाद को अलग अलग वायु अर्थात प्राण, अपान, व्यान, उधान और समान को अर्पण करना चाहिए। केवल मन्त्र उच्चारण करना और अर्पण करना पर्याप्त नहीं है। हमें आचार्य तनियन आदि भी बोलना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों द्वारा शुद्ध किये बिना भोजन को पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों के देखने और स्पर्श मात्र से प्रसाद शुद्ध हो जाता है।
  • श्रीवैष्णव, जो सभी को शुद्ध करते है, उनको तदियाराधन विधि में देखकर भी उस विधि में भाग लेने से भागना। एरुम्बी अप्पा के वरवरमुनि दिनचर्या के व्याख्या में तिरुमलिसै अण्णाप्पंगार यह दर्शाते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का ऐसा दिव्य शोभा है की जिनकी उपस्थिति सभी श्रीवैष्णव तदियाराधन गोष्ठी (श्रीवैष्णव का समूह जो एक साथ प्रसाद पाते हैं) में शुभता लाती है। इसलिये प्रसाद पाने से पूर्व वरवरमुनि दिनचर्या का अनुसन्धान करते हैं।
  • अपने स्वयं कि तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना (जो अपने आचार्य जैसे अच्छे है)। अनुवादक टिप्पणी: तैत्तिरीय उपनिषद कहता हैं “अन्नं बहु कुर्वियात” (अधिक प्रसाद बनाओं और उसे बाटों)। हमें भी अधिक मात्रा में प्रसाद बनाकर श्रीवैष्णवों को बाँटना चाहिए और जितना जरूरत है उतना ही पाना चाहिये ताकि सरलता से कैंकर्य कर सके।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/05/virodhi-pariharangal-23.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २१

५४) भोजन विरोधी – तदीयाराधन में बाधाएं

सामान्यत: भोजन अर्थात खाद्य पदार्थ प्रदान करना जिसे “भगवद तदीयाराधन” कहा जाता है। इस विषय में श्रीवैष्णव जो प्रसाद देते है और जो प्रसाद ग्रहण करते है, उनका भाव और इसके सम्बन्ध में जो मुख्य पहलु है उसे समझाया गया है। यहाँ सामान्यत: जो त्रुटियाँ होती है उसे दर्शाया गया है। मुख्य अभिप्राय यही है कि जो त्रुटियाँ है उसे पहचान कर ठीक कर ले। अनुवादक टिप्पणी: आज कल मुख्य समस्या यह है कि कई स्थानों पर सही तिरुवाराधन और भगवद भोग के बिना ही भागवत तदीयाराधन होता है। हर भोग को सबसे पहिले भगवान को अर्पण नहीं किया गया तो वह प्रसाद नहीं होता है। कई स्थानों पर भगवान को भोग लगाने में कई कठिनाईयां आती है परन्तु सही व्यवस्था कर यह देखना चाहिये कि पहिले भगवान को भोग लगे और उसके पश्चात तदीयाराधन मे सभी को प्रसाद दिया जाये।

  • जब कोई श्रीवैष्णव प्रेम से प्रसाद (भगवान को अर्पण किये गए भोजन का शेष) देते है तो उस प्रसाद में मात्रा, विशेषता, स्वाद आदि देखना बाधा है। हमें केवल प्रेम देखना चाहिये कि किस प्रेम से हमें प्रसाद दिया गया है और उसे स्वीकार कर पा लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता में भगवान स्वयं कहते है कि वे प्रेम से अर्पण किया हुआ सब (एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल) जो भी है उसे स्वीकार करते है, प्रसाद की विशेषता नहीं देखते। इसलिये हमें केवल जिस प्रेम से प्रसाद दिया गया है उसे देखना चाहिये।
  • भगवद प्रसाद का आदर न करना बहुत बड़ी बाधा है।
  • जब प्रसाद देनेवाला से कोई भूल हो जाये तो हमें अचंभित नहीं होना चाहिये कि “इस व्यक्ति को प्रसाद देने भी नहीं आता है” यह बाधा है। हमें प्रसाद देनेवाले व्यक्ति में कोई दोष नहीं देखना चाहिये।
  • इसके आगे प्रसाद देनेवाले से जो भूल हो सकती है उस पर ध्यान केन्द्रित करेंगे (जिससे उन त्रुटियों से बचा जा सकता है)। अपने लिये अलग और अन्य के लिये अलग प्रसाद बनाना बाधा है। अतिथि को हमारे बराबर या उससे भी ऊँचा सम्मान देना चाहिये।
  • घमण्ड से प्रसाद देना (कि मैं प्रसाद दे रहा हूँ) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी अपनी तिरुमला यात्रा में तिरुक्कोवलूर पहूंचे। तिरुमला के रास्ते में उन्होंने यह विचार किया कि वह अपने एक धनी शिष्य एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली में जायेंगे। यह सुनकर उस शिष्य ने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के स्वागत कि भव्य तैयारी कि। श्रीरामानुज स्वामीजी एक ऐसी जगह पहुंचे जहाँ मार्ग दो भागों में विभाजित हो जाता है। उन्होंने मार्ग में किसी से उन दो रास्तों के विषय में पूछा। उसने कहा एक रास्ता एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली कि ओर जाता है जहाँ रजस गुणों वाले लोग जाते है और दूसरा रास्ता परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली के ओर जाता है जहाँ सात्विक गुणों वाले लोग जाते है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसी क्षण परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली में जाने का विचार किया। यह चरित्र पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित रामानुजाचार्य दिव्य चरित्र में समझाया गया है। इससे हम यह समझ सकते है कि दूसरों का सम्मान करते समय हमें अहंकार को साथ नहीं जोड़ना चाहिये।
  • अतिथि स्वामी है और वह हमसे सेवा लेकर अपनी ही संपत्ति को स्वीकार कर रहे है यह विचार न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तैतरीय उपनिषद यह घोषणा करते है “अतिथि देवो भव:” – अतिथि (श्रीवैष्णवों) को भगवान के समान आदर देना चाहिये। भगवान सभी के स्वामी है – हम जो कुछ भी भगवान को अर्पण करते है उसके स्वामी वे स्वयं हीं है। जब श्रीवैष्णव पधारते है तो उन्हें वही सम्मान देना चाहिये। हमें यह विचार करना चाहिये कि जो भी हमारे पास है वह सभी अतिथि श्रीवैष्णव का है और वह बहुत करुणा से उसे स्वीकार करते है।
  • अतिथि को इस बात पर जांचना कि वह कितने प्रकार के पकवान पाता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति सामान्य से अधिक पाता है तो उस व्यक्ति में हीन भाव नहीं रखना चाहिये।
  • अगर तदीयाराधन में कुछ कमी या गलती हो तो अतिथि को यह नहीं सोचना चाहिये कि “वह मुझे सही तरीके से भोजन नहीं पवा रहा है” – यह बाधा है।
  • यह सोचकर ग़ुस्सा करना कि हमें सही मान सम्मान नहीं मिला और प्रसाद का त्याग कर वहाँ से निकल जाना बाधा है।
  • अतिथि को बाहर मेहमानों के कमरे में बिठाकर प्रसाद पवाना और स्वयं अन्दर बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अतिथि को पूर्ण आदर देकर उनकी सेवा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाना और तत्पश्चात अतिथि को परोसना बाधा है। हमें अतिथि को उनके संतुष्ट होने तक उनकी सेवा कर तत्पश्चात स्वयं पाना चाहिये।
  • जब हम अतिथि के साथ प्रसाद पाने के लिये बैठते है तब हमें अतिथि का प्रसाद पाकर उठने तक प्रतीक्षा कर फिर उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: तदीयाराधन के प्रारम्भ में कुछ श्लोक (आचार्य तनियन, देवराज अष्टकम, पूर्व/उत्तर दिनचर्या, वानमामलै जीयर प्रपत्ती/ मंगलाशासन आदि – मठ, तिरुमाली आदि पर निर्भर करके) का उच्चारण होता है और फिर भगवान का तीर्थ सभी को परिशेषणम (प्रसाद पाने के पूर्व अन्तरयामी भगवान को भोग लगाने कि एक साधारण क्रिया) के लिये देना। सभी श्रीवैष्णवों को इसे साथ में करना चाहिये। उसी तरह प्रसाद पाने के पश्चात भगवान का तीर्थ सभी को दिया जाता है और सभी वैष्णव इसे पाकर प्रसाद को सम्पन्न करते है। सभी वैष्णव एक साथ अपने हाथ को धोने के लिये उठते है। यह सामान्य प्रकिया है। तदीयाराधन के मध्य में उठना यह शिष्टाचार नहीं है।
  • अतिथि का इस बात से दुखी होना कि प्रसाद पवानेवाला स्वयं भीतर प्रसाद पाकर उसे प्रसाद बाहर पवा रहा है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह पहले चर्चा किये गए विषय से संबंधित है- यहाँ अतिथि के संदर्भ में समझाया गया है। अतिथि को इसे सामान्यतः लेना चाहिये और अपमान स्वरुप नहीं लेना चाहिए।
  • अतिथि का इस बात से घबराना कि प्रसाद पवानेवाला उसके पहिले ही प्रसाद पा लिया है, यह बाधा है।
  • अतिथि का यह सोचना कि प्रसाद पवानेवाला उसे छोड़कर उठकर चला गया। यह बाधा है।
  • प्रसाद पवानेवाले को करुणा से अतिथि को बड़े विनम्र शब्दों से बुलाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जैसे पहिले कहा गया है, यहाँ अतिथि भी श्रीवैष्णव होना चाहिये।
  • प्रसाद पवानेवाला अवैष्णवों को प्रसाद पवाने में भी अत्यंत विनम्रता और आथित्य करता है जहाँ उसकी जरूरत नहीं है, यह बाधा है।
  • अतिथि का नाराज/क्रोध होना यह सोचकर कि प्रसाद पवानेवाला उससे विनम्र शब्दों से स्वागत नहीं किया, यह बाधा है।
  • अतिथि को इस बात से गर्व होना कि प्रसाद पवानेवाले ने उसका उदारता से स्वागत किया बाधा है।
  • अतिथि द्वारा मानवता नहीं दिखाना और यह अतिथेय से कहना कि “आपको मेरे लिए स्वागत करने कि आवश्यकता नहीं है”। यह बाधा है।
  • अतिथि से पहिले स्वयं तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। बुनियादी तौर पर हमें अतिथि का प्रसाद होने तक प्रतिक्षा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाकर, शेष अतिथि को देना बाधा है। पहिले अतिथि को पवाना फिर स्वयं पाना यह सभ्यता है। अत: पहिले स्वयं पाना और बचा हुआ अन्य को देना सदाचार नहीं है।
  • स्वतन्त्रता से अतिथि द्वारा प्रसाद पाना प्रारम्भ करना बाधा है। श्रीवैष्णव तदीयाराधन में कुछ श्लोक, आचार्य तनियन आदि पहिले गाया जाता है। तत्पश्चात भगवान का तीर्थ दिया जाता है जिसके प्रयोग से परिशेषणम किया जाता है। उसके पश्चात हीं हमें पाना चाहिये।
  • अगर कोई अतिथि सभी श्रीवैष्णवों के पाने के पश्चात आता है तो उसे इस बात से नहीं घबराना चाहिये कि यह बचा हुआ खाना है। ऐसा करना बाधा है।
  • श्रीवैष्णवों के साथ उनकी सच्ची निष्ठा को समझे बिना प्रसाद आदान प्रदान करना बाधा है। वह प्रसाद आचार्य निष्ठ श्रीवैष्णवों का शेष हो सकता है अथवा उन श्रीवैष्णवों द्वारा प्रदत्त हो सकता है जो अच्चार्य निष्ठा में स्थित है। जब कोई आचार्य अभिमानी होता है तो उसे ऐसे प्रसाद के प्रति बहुत अनुराग होता है। ऐसी निष्ठा होने के बावजुद ऐसे प्रसाद का त्याग करना अपचार है। (डॉ वी.वी.रामानुजम स्वामी) एक व्यक्तिगत अनुभव कह रहे है। २० साल पूर्व वे श्रीधनुर्दास स्वामीजी के तिरुमाली में कैंकर्य कर रहे थे। उस समय सिंगपपेरुमाल के मन्दिर में एक महा संप्रोक्षण किया गया था। तिरुमाली में एक बहुत बड़ा तदीयाराधन का आयोजन किया गया था। श्रीपेरेम्बूतूर से उनके एक प्रिय मित्र पधारे थे। उन्होंने उन्हें तिरुमाली में आकर प्रसाद पाने को कहा। परंतु उन्होंने यह कहकर कि “मैं धनुर्दास स्वामीजी के वंशज के यहाँ प्रसाद नहीं पाता” आना अस्वीकार किया। अनुवादक टिप्पणी: प्रमेय रत्न में श्रीकुरेश स्वामीजी और उनकी पत्नी आण्डाल अम्माजी से संबंधित एक घटना समझायी गई है। बहुत लम्बी यात्रा के पश्चात श्रीकुरेश स्वामीजी और अम्माजी घर को लौट रहे थे। दोनों थके हुए और भुखे भी थे। वें एक श्रीवैष्णव के तिरुमाली में आते है जो उन्हें रहने को एक स्थान और प्रसाद देता है। स्वामीजी अपनी अनुष्ठान कर प्रसाद पाते है परन्तु अम्माजी नहीं पाती है और स्वामीजी से कहती है “आप श्रीवैष्णव नाम और रूप देखकर उनका प्रसाद पा लिये। परन्तु हमें उनकी निष्ठा का पता नहीं है। इसलिये मैं अपने घर जाने तक इंतजार करूंगी”। यह सुनकर स्वामीजी अचंभित होते है और अम्माजी से कहते है “मेरी आप जैसी निष्ठा क्यों नहीं है? कृपया भगवान से प्रार्थना कीजिये कि मेरे में भी आप जैसी निष्ठा आ जाये”। यह अम्माजी कि निष्ठा और स्वामीजी कि नम्रता है।
  • श्रीवैष्णवों कि आचार्य निष्ठा देखकर प्रसाद न पाना बाधा है।
  • खराब हाथों से प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे हाथ मुह, नाक आदि अथवा अन्य कोई शरीर का निचला भाग को छुने से खराब हो जाता है। हमें तुरन्त अपने हाथों को पानी से धो लेना चाहिये।
  • बर्तन में प्रसाद पाना बाधा है, यद्यपि सभी को प्रसाद वितरण करने के लिए बर्तन का उपयोग करने कि विनती करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में कभी भी प्रसाद नहीं पाना चाहिये। आजकल हम इस बुनियादी तत्व से पूर्णत: अज्ञान हो जाते है आज के संस्कृति के प्रभाव से जैसे खराब हाथों से पाना, मुख्य पात्र में प्रसाद पाना, गंदगी का ध्यान न देना आदि।
  • जैसे तिरुमालै के ४१ पाशुर में कहा गया है “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदम अन्रे”, अर्थात हमें जानना चाहिये कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद सबसे अधीक पवित्र और शुद्ध है। इसमें विश्वास न रखना बाधा है। यह श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु आल्वार के पवित्र शब्द है। शेष प्रसाद दो प्रकार के होते है – पाण्डा शेष (प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में शेष) और पात्र शेष (श्रीवैष्णव द्वारा प्रसाद पाकर उस पत्ते पर शेष)। यहाँ आल्वार, पात्र शेष अर्थात – श्रीवैष्णव द्वारा पाए गए पात्र / पत्ते का शेष के विषय में कह रहे है। यह सुगमता से समझा जा सकता है कि इस शेष प्रसाद की महिमा में श्रद्धा उत्पन्न होना अत्यंत कठिन है (क्यूंकि सामान्यतः लोग दूसरों के द्वारा पाए गए प्रसाद के शेष को हीन भाव से देखते है)।  अनुवादक टिप्पणी: इस संदर्भ में, हमें स्मरण होना चाहिए -“मोर मुन्नार ऐयर” – वे जो प्रथम दद्ध्योधन से प्रसाद प्रारम्भ करते थे यह सोचकर की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पाए गए अंतिम पकवान का स्वाद न बदले) – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य जो नियमानुसार उनके द्वारा पाए गए पत्ते में ही प्रसाद पाया करते थे। पूर्वाचार्यों के ग्रंथों के अनुसार उन्होंने 30 वर्षों तक ऐसा ही किया। अंततः वे सन्यासी होकर परवस्तु पट्टरपिरान जीयर नाम से प्रख्यात हुए।
  • जब श्रीवैष्णव प्रसाद का पात्र परोसने के लिये हाथ में लेते है उन्हें देखते रहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह सेवा करने के लिये आगे बढ़ना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को परोसने के लिये स्वयं ही प्रसाद के पात्र को हाथ में लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा।
  • तदीयाराधन के समय प्रसाद पवानेवाले को स्वयं अपनी पत्नी के साथ परोसना चाहिये नाकी अपने तिरुमाली के सेवको या सांसारिक जनों द्वारा, ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद पाने के पश्चात अतिथि को स्वयं अपना पत्ता उठाना चाहिये यह विचार करके कि यह एक श्रीवैष्णव कि तिरुमाली है जिसे बहुत सम्मान देना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • अगर घर के वैष्णव प्रसाद के पत्ते उठाने से मना भी करते है तो अतिथि को बल पूर्वक यह जिम्मेदारी लेकर पत्ते को उठाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • पत्ते को निकालते समय यह सावधानी रखनी चाहिये कि प्रसाद तिरुमाली में सभी जगह बिखरे नहीं।
  • अन्य श्रीवैष्णवों से आगे बढ़कर हाथ धोना बाधा है। हमें हमारा समय आने पर ही संयम से हाथ, पैर आदि धोना चाहिये।
  • अन्य श्रीवैष्णव द्वारा उपयोग किये हुए जल से हाथ, पैर आदि को धोने से हिचकिचाना बाधा है। हमें इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिये।
  • उस स्थान को शुद्ध करना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है, बाधा है। उस स्थान को प्राकृतिक रूप से साफ किया जा सकता है जहाँ अन्य श्रीवैष्णव प्रसाद पायेंगे। मठ, तिरुमाली में यह सामान्यत: देखा जाता है कि श्रीवैष्णव प्रसाद पाने के पश्चात अन्य के लिये उस स्थान को गाय के गोबर से साफ किया जाता है।
  • भस्म से जगह को साफ करना बाधा है।
  • सावधान न होना और उस स्थान पर पैर रखना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है बाधा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को दिये बिना पान, सुपारी और चुना पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तदीयाराधन के पश्चात पान, सुपारी और चुना पाना यह एक सामान्य प्रथा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को देनेवाले पान पर स्वयं के पाये हुए शेष चुना लगाना बाधा है।
  • अतिथि का उन श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में त्रुटियाँ देखना जिन्होंने उन्हें तदीयाराधन करवाया, यह बाधा है।
  • अतिथि जो तदीयाराधन करानेवाले के हृदय को हानि पहूंचाते है वह बाधा है।-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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