अन्तिमोपाय निष्ठा – १० – श्री रामानुज के शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – ९ – श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) का वैभव २) में हमने नम्पिळ्ळै की दिव्य महिमा देखी। हम इस लेख में श्री रामानुज के विभिन्न शिष्यों के साथ घटित विभिन्न घटनाओं का क्रम जारी रहेगा।

एक बार श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के समय के दौरान, अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी) बीमार पड गये थे। उनकी रोगावस्था को जानकर भी श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेश स्वामीजी) तुरंत नहीं गए लेकिन चार दिनों के बाद उनसे मिलने के लिए गये और उनसे पूछा, “जब आप बीमार थे तो आपने स्वयं का प्रबंधन कैसे किया?” तब अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि) जवाब देते हैं “आपके और मेरे बींच की मित्रता के स्थर पर, मैंने सोचा था कि आप आएंगे और मुझसे मिलेंगे जैसे ही आपने मेरी बीमारी के बारे में सुना होगा, लेकिन आपने मुझे अनदेखा कर दिया है और इस कारण मुझे गहराई से चोट लगी है। जब तक मैं श्रीआळवन्दार् (यामुनाचार्य स्वामीजी) के पास नहीं जाता हूं और उनके चरणकमलों की पूजा नहीं करता तब तक यह ठीक नहीं होगा “। इस घटना को पोन्नौलागाळीरो (तिरुवाय्मोऴि ६.८.१) पासुर व्याख्या में स्पष्ट रूप से समझाया गया है। (अनुवादक टिपण्णीः यहां संदर्भ यह है की, पोन्नौलागाळीरो पदिग में, श्रीनम्माऴ्वार (श्रीशठकोप) एक पक्षी को दूत के रूप में एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) के पास भेजते हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि पक्षी एम्पेरुमान् (श्रीरंगनाथ) को अपने नियंत्रण में लेने में पूरी तरह से सक्षम है। लेकिन पक्षी तुरंत श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) की मदद नहीं कर रहा है। इसी प्रकार, अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (देवराज मुनि) यह जानकर की श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्री कूरेश) के पास एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) हैं, उनके नियंत्रण में और उन्हें तुरंत परमपद भी मिल सकता था लेकिन वह लंबे विलंब के बाद आए। इसलिए, वह कह रहे हैं, वह भावना केवल तब ठीक होगी जब वह परमपद तक पहुंच जाए और आळवन्दार् (यामुनाचार्य) के सामने झुक जाए जो पहले से ही परमपद में है)।

श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के परमपद पहुँचने के बाद कुछ समय तक श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) जीवित थे। लेकिन, अंत में वह भी परमपद पहुँच गये। एक श्रीवैष्णव भट्टर् के पास जाता है और उनहें बताता है “श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण) परमपद पहुँच गये”। भट्टर् जवाब देते हैं, “आपको श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) के लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए”। श्रीवैष्णव पूछता है “क्यों नहीं? क्या हम नही कह सकते हैं कि वह परमपद पहुँच गये?”। भट्टर् ने स्पष्ट रूप से समझाया कि परमपद प्रपन्नों और उपासकों के लिए आम है (जो भक्ति योग से गुजरते हैं और अपने स्वयं के प्रयासों से परमात्मा प्राप्त करते हैं) – श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) का ध्यान / केंद्र-बिंदु ऐसा नहीं है। फिर, श्रीवैष्णव पूछता है “तो, क्या उनके मन में कुछ और जगह है?” और भट्टर् बताते हैं “हां। आपको कहना चाहिए कि श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमलों को प्राप्त हुए” – यह मेरे आचार्य (मामुनिगल् / श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा समझाया गया है। श्रीआळवन्दार् (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने स्तोत्र-रत्न की शुरुआत में घोषणा की “अत्र परत्रचापि नित्यम् यदीय चरणौ शरणम् मदीयम्” – संसार और परमपद में, मैं हमेशा नाथमुनि के कमल पैरों की सेवा करना चाहता हूं)। तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगनाथगुरु स्वामीजी) कहते हैं रामानुज-नूट्रन्दादि के ९५ वें पासुर “विण्णिन् तलै निन्ऱु वीडळिप्पान् एम्मिरामानुशन् मण्णिन् तलत्तुदित्तु मऱै नालुम् वलर्त्तनने” – परमपद से हमारे श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी जीवात्माओं को परमपद में कैङ्कर्य के अंतिम लक्ष्य का आशीर्वाद प्रदान करेंगे और जब वह इस संसार में प्रगट होंगे, उचित रूप से वेद शास्त्र स्थापित कर इस संसार के दोषों से मुक्त करेंगे)।

प्रज्ञ अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी), (श्रीकूरत्ताऴ्वान्) श्रीकूरेशस्वामीजी के सुपुत्र भट्टर् हैं, परमाचार्य आळवन्दार् (श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी), तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगनाथगुरु स्वामीजी) जो श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी), (श्रीकूरत्ताऴ्वान्) श्रीकूरेशस्वामीजी इत्यादि की दिव्य महिमाओं को आचार्य निष्ठा के माध्यम से पूरी तरह से प्रकाशित करते हैं । इस प्रकार यह स्थापित किया गया है कि आचार्य के चरणकमलों पर कुल निर्भरता जो संसार और परमपद में शिष्य के लिए अतुल्य स्वामी है, संसार और परमपद में भगवान् के चरणकमलों पर कुल निर्भरता से कहीं अधिक है, जो सभी के लिये बराबर कहा जाता है, जिसे जितन्ते स्तोत्र के रूप में कहा गया है “देवानाम् दानवाञ्च सामान्यम् अदिदैवतम्” – भगवान् सभी प्राणियों के लिए आम है)। यही कारण है कि मामुनिगल् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी ) ने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी की ओर भी प्रार्थना की, “मैं आपके चरणकमल कब प्राप्त करूं?”, “हे यतिराज! (श्री रामानुज!) कृपया मुझे हमेशा अपनी सेवा में खुशी से संलग्न करें”।

हमारे जीयर् निम्नलिखित घटना बताते हैं। एक बार श्रीवैष्णव प्रसाद खा रहा था और श्रीकिडाम्बि-आचान् (श्रीप्रणतार्तिहर) स्वामीजी उसे पीने के लिये पानी दे रहे थे। लेकिन इसे विपरीत दिशा से सीधे देने (सेवा करने) के बजाय, वह इसे बाजु से दे रहे थे और इसके कारण श्रीवैष्णव को पानी को स्वीकार करने के लिए अपनी गर्दन को थोड़ा झुकाना और मोड़ना पड़ा। उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) ने यह दृश्य देखा और तुरन्त श्रीकिडाम्बि आचान् (प्रणतार्तिहर) को उनके रीढ़ (पीठ) पर धक्का देकर बताते हैं की “हमें अत्यधिक देखभाल के साथ श्रीवैष्णव की सेवा करनी चाहिए”। यह सुनते ही श्रीकिडाम्बि-आचान् (श्रीप्रणतार्तिहर) स्वामीजी उत्साहित होकर कहते हैं, “आप मेरे दोषों को साफ़ कर रहे हैं और मुझे सेवा में और अधिक आकर्षक बना रहे हैं और मैं इस तरह की दया के लिए बहुत आभारी हूं” और उनका आभार व्यक्त करते हैं।

मणिक-माला (मानिक्क-मालै) में, पेरियवाचान्-पिळ्ळै स्वामीजी निम्नलिखित घटना की पहचान कराते हैं। एक बार, श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) के साथ परेशान हो जाते हैं। वहां मौजूद कुछ लोग श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) से पूछते हैं “अब श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) ने आपको धक्का दिया है, अब आप क्या सोच रहे हैं?” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) जवाब देते हैं “चूंकि मैं पूरी तरह से श्रीभाष्यकार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के अधीन हूं, वह जो भी करते हैं उसे मैं स्वीकार करूंगा – चिंता करने के लिए कुछ भी नहीं”।

निम्नलिखित घटना की पहचान वार्तामाला में की जाती है। पिळ्ळै-उऱङ्ग-विल्लि-दास (धनुर्दास) स्वामीजी एक बार श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि) स्वामीजीके पास जाते हैं, उनके चरणकमलों पर झुकते हैं और पूछते हैं, “एक शिष्य को अपने आचार्य की ओर कैसे होना चाहिए?” और श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि) कहते हैं, “आचार्य के लिए, शिष्य एक पत्नी, शरीर और एक गुण की तरह होना चाहिए – यानी, एक पत्नी जो भी पति उसे बताएगा वह करेगी, एक शरीर जो भी आत्मा चाहता है वह करेगा और वस्तु द्वारा पैदा किया जाएगा “। पिळ्ळै-उऱङ्ग-विल्लि-दास (धनुर्दास) स्वामीजी इसके बाद श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) के पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं, “अाचार्य को अपने शिष्य के प्रति कैसे होना चाहिए?” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) जवाब देते हैं, “शिष्य के लिए, आचार्य को पति, अात्मा और वस्तु को पसंद करना चाहिए – यानी, एक ऐसे पति की तरह जो पत्नी को सही तरीके से निर्देशित करता है, जैसे कि आत्मा, जो शरीर को नियंत्रित करता है और वह वस्तु जो गुण को धारण करता है” ।

एक बार, श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) और श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) के बीच दिव्य मामलों पर चर्चा हुई और एक विषय सामने आया “क्या हम स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य (एक आचार्य जो शिष्य को दिव्य ज्ञान से आशीर्वाद देने से पहले कई कठोर परीक्षणों में डालते हैं) द्वारा मोक्ष के अंतिम लक्ष्य का आशीर्वाद देते हैं या कृपामात्र प्रसन्नाचार्य (एक आचार्य जो शिष्य में शुद्ध इच्छा के आधार पर शिष्य को दैवीय ज्ञान का आशीर्वाद देता हैं)? “। श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) कहते हैं, “मोक्ष केवल स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य के माध्यम से है” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) कहते हैं, “मोक्ष कृपामात्र प्रसन्नाचार्य के माध्यम से है”। श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) का कहना है कि पेरियाऴ्वार (श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी) कहते हैं, “कुट्रमिन्ऱि गुणम् पेरुक्कि गुरुक्कळुक्कु अनुकूलराय्” – किसी को अपने दोषों को दूर करना चाहिए और अपने आचार्य के प्रति अनुकूल कार्य करना चाहिए), हमें ऐसा भी करना चाहिए। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) कहते हैं, “ऐसा नहीं है”, जैसा कि मधुरकवि आऴ्वार् कहते हैं, “पयनन्ऱागिलुम् पाङ्गल्लरागिलुम् शेयल् नन्ऱागत् तिरुत्तिप् पणिकोळ्वान् कुयिल् निन्ऱार् पोऴिल् शूऴ् कुरुगूर् नम्बि” – यहां तक ​​कि अगर हम योग्य नहीं हैं और पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं, तो उद्यानों से घिरे आऴ्वार-तिरुनगरि में रहने वाले श्रीनम्माळ्ळवार् (श्री शठकोप स्वामीजी) हमें शुद्ध करेंगे और हमें अपनी सेवा में संलग्न करेंगे) । हमें इसे अपने आप करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और इसके बजाय हमें मोक्ष के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आचार्य की दया पर निर्भर होना चाहिए। यह सुनकर कि श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) बहुत खुश थे। यह घटना मेरे आचार्य (मामुनिगल् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी)) द्वारा सुनाई गई थी।

श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दिव्य दया के द्वारा, एक कारण के रूप में किरुमिकण्डन् (क्रिमिकण्ठ शैवराजा) उद्धृत तिरुनारायणपुरम् कि यात्रा की। चूंकि मंदिर में कैङ्कर्य करने वाले इस वजह से पीड़ित थे, सोचते हैं, “हम केवल श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के कारण इन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, इसलिए कोई भी जो श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) से संबंधित है, मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए”, इस तरह के प्रभाव पर एक आदेश दिया गया था। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) हमारे सिद्धांत को स्थापित करने और किरुमिकण्डन् (क्रिमिकण्ठ शैवराजा) की सभा में जाकर स्वनेत्रों को सदा के लिए खो दिया और अंततः श्रीरंगम लौट आए। मंदिर में स्थिति को जाने बिना, वह पेरिय पेरुमाळ् (श्री रंगनाथ्) की पूजा करने जाते हैं और द्वार का रखवाला कूरताज़्ह्वान् (श्री कूरेश) को रोकता है। इसका अन्य साथी द्वारपाल श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) को मंदिर में प्रवेश करने को कहा। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) द्वारपालों के दो अलग-अलग विचारों को सुनकर आश्चर्यचकित हुए और उनसे पूछा, “यहां क्या हो रहा है?”। वे जवाब देते हैं “राजा का आदेश है कि मंदिर के अंदर जाने की अनुमति श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) से संबंधित किसी भी व्यक्ति को नहीं है”। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) पूछते हैं “लेकिन तुम मुझे क्यों अनुमति दे रहे हो?”। उन्होंने जवाब दिया “श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) ! दूसरों के विपरीत आप आत्म गुण संपन्न एवं निर्मल हृदय वाले हो, इसलिए हमने आपको मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दी”। यह सुनकर श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) चौंक गये और पानी में एक चंद्रमा की तरह कांपना शुरू कर देते हैं। वह कुछ कदम पीछे चलते हैं और कहते हैं, “शास्त्र कहता है कि एक व्यक्ति आत्म गुण को अाचार्य संबंध (रिश्ते) का नेतृत्व करता है, लेकिन यहां मेरे मामले में, आत्म गुण एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के साथ अपने रिश्ते को गहरे दुःख के साथ छोड़ने के लिए अग्रणी हैं। वह आगे कहते हैं, “मेरे लिए, एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमल अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त हैं; मुझे एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के रिश्ते को छोड़कर भगवान् की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है” और एम्पेरुमान् की पूजा किए बिना अपने तिरुमालि (निवास) लौट आते हैं। यह घटना हमारे जीयर् द्वारा सुनाई गई है।

तिरुविरुत्तम् व्याख्यान में समझाया गया है कि आळवन्दार् (श्रीयामुनाचार्य) पेहचानते हैं की एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दया से कारण, खुद श्रीनम्माळ्ळवार (श्री शठकोप स्वामीजी) के रूप में दिखाई दिये। अऴगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् (रम्यजामात्रुदेव स्वामीजी) अपने आचार्य-हृदय में भी आश्चर्य करते हैं कि क्या चतुर्थ वर्ण में प्रगट हुए श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) कलियुग के अवतार हैं अर्थात् इससे पिछले युगों (सत्, त्रेता, द्वापर) मे क्या वह ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य वर्णस्थ अत्रि, जमदग्नि, दशरथ, वसुदेव/नन्दगोपाल इत्यादि के पुत्र के रुप में प्रगट हुए। (अनुवादक की टिपण्णी ः श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) की महिमा हर किसी को आश्चर्यचकित करती है कि क्या वह एम्पेरुमान् अर्थात् भगवान् के अवतार हैं, लेकिन वास्तव में हमारे पूर्वाचार्यों ने स्पष्ट रूप से समझाया की वह भगवान् के अवतार नही है। यहां संदर्भ यह है कि एम्पेरुमान् अर्थात् भगवान् यह दिखाने के लिए है कि वह स्वयं आचार्य पद को ग्रहण करना चाहता है क्योंकि यह वह सर्वोच्च स्थान है जिसपर जीव निर्भर कर सकता है)।

अनुवादक की टिपण्णीः इस प्रकार, हमने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के विभिन्न शिष्यों की निष्ठा और श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी में उनकी कुल निर्भरता का प्रकटीकरण को देखा।

जारी रहेगा………….

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ११ – १

सवोर्च्च भगवान  अष्ठ भुज, आयुध और कवच के साथ प्रकट हुए । वह ब्रह्मा और उनके यग्न को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पहुंचे थे।

अपने मुख पर एक मुस्कुराहट लेके उन्होंने काली और उसके सहयोगी, क्रूर असुरों को ललकार कर विरुद्ध किया। कुछ हि समय में, जीत और विजय से वे  विभूषित हुए। काली को भगा दिया गया था और असुरों का नाश कर दिया गया था।

ब्रह्मा के लिए, वे तत्क्षण पहुंचे और शीघ्रता से इस कार्य को पूरा किया जिसके लिए वह अपने इस रूप में आये हैं। क्या कृपा है? प्रसन्न होने से नहीं रोक सकते I

“पुम्साम ध्रुष्टि चित्तापहारिनाम” – उनकी उत्कृष्ट सुन्दरता ऐसा था कि यहां तक ​​कि पुरुष भी उन्हें देखकर स्त्री की भावना विकसित करेंगे I

“मेरे प्रति कितने उदार हैं! उन्होंने मेरी रक्षा के लिए अपने अष्ठ भुजायें सहित दौडे चले आये”।

उनके शरीर के सभी अंग ऐसे थे कि जैसे किसी एक अत्युत्तम चित्रकारी से लिया गया हो। यहां तक ​​कि मनमध भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते हैं और वह उनके सामने कांतिहीन और फीके होके तुच्छ लगेंगे। उनके पास अविनाशी शाश्वत सौन्दर्य का आधिपत्य है। वह नित्य युवा (नित्य योवन) हैं और कई मात्रा में प्रशंसनीय है; प्रशंसा के सबसे श्रेष्ट शब्द भी अतिरंजित नहीं हो सकते हैं।

विशेषज्ञ, कुशल कलाकारों द्वारा प्रदान किए गए चित्र की भाँती, उनके पास कमल नेत्र, सुंदर शरीर और अष्ठ भुजायें है। अयन ने कहा, “वे मेरे हृदय में पूर्णत: बस गए हैं !!”

हम तिरुवरन्गक् कलमबकम में पिळ्ळैप् पेरुमाळ् अय्यंगार के वर्णन को याद कर सकते हैं। उनकी तिरुवरन्गन् की ओर अटल भक्ति थी। वह एक चित्र में तिरुवरंगनाथन को चित्रित करके अपनी इच्छा पूरी करना चाहते थे।

वह एक सुंदर चित्र था, अरंगन् का एक सटीक प्रतिरूप था। लेकिन पिळ्ळैप् पेरुमाळ् अय्यंगार खुश नहीं थे और विलाप करने लगे। चित्रकारी पूर्ण थी। दर्शकों ने यह भी राय दिया कि यह एक सटीक छवि थी। फिर अय्यंगार शोक क्यों थे!

कारण के लिए पूछा तो, उन्होंने कहा….

“वालुम मवुलित्तुलय मनामुम मगराकुल्लई तोय विलियरुलुम मलरन्ध पवलात तिरुनगैयुम मार्विलन्निंद मन्निच्छुदरुम तालुमुल्लरित तिरुनाबित तड़त्तुलाडन्गुम अनैत्तुयिरुम चरना कमलत्तुमैकेल्वन स्द्यिरपुनलुम कानेनाल अलमुडैय करूँगडलिन अगडू किलिय्च चुलित्तोडी अलैक्कुम कूड़क्कविरि नाप्पन्न ऐवायरविल तुयिलमुडै एलुपिरप्पिल अदियवरै एलुधाप पेरिय पेरुमानै एलुधवरिय पेरुमानेंर्रेन्नाधु एलुधियिरून्धेने!!”

“चित्र में, देखों कि तुलसी माला उनके शरीर को सुशोभित कर रही है। परंतु यह सुगंध व्यक्त नहीं कर रही है “।

भगवान के नेत्र लग रहे हैं कि वार्तालाप कर रहे हैं (इतना सजीव है), परंतु उपकार और उदारता का प्रवाह नहीं है। मैंने क्या भूल किया?

यह चित्र मुस्कराहट कि धारा नहीं दर्शाता है; हम उस भावना को प्रदान करने में विफल रहे हैं।

नीले रंग का रत्न चमक का विकिरण नहीं करता। हम यह उदर (पेट) को देख नहीं पा रहे हैं जिसमें सप्त लोक हैं, जो उनके द्वारा उदरित है।

दृढ़ विश्वास के साथ कि अरंगन के पवित्र चरण ही एक मात्र आश्रय हैं, भगवान शिव को यह पवित्र जल धारण करने का विशेष सम्मान मिला है जिसने अरंगन के चरणों को स्पर्श किया है। यह चित्र बहती गंगा को नहीं दर्शाता है, शिव के शीर्ष पर, जिसे वो जल कहा जाता है जो हरि के कमल चरणों को शुद्ध किया था।

वह भगवान जो अपने शय्या (पांच फनों वाला सर्प) पर विश्राम करते हैं, उन लोगों को मुक्ति प्रदान करते हैं जो उन्हें आत्मसमर्पण और शरणागति  प्रस्तुत करते हैं।

उन्हें “पेरिय पेरुमाल” के नाम से जाने जाते है। उनका सौंदर्य ऐसा है कि उस शोभा को पूरी तरह से चित्र में चित्रित नहीं किया जा सकता है।

मैं इस सत्य से विस्मरणशील हो गया और उनकी छवि की प्रतिलिपि बनाने का साहस किया। मैं कितना अज्ञानी रहा हूँ? इस प्रकार उन्होंने स्वयं को दोष दिये।

पिळ्ळैप् पेरुमाळ्पि अय्यंगार कि स्थिति उसी सामान थी जैसे ब्रह्मा का जब उन्होंने अष्ठ भुजाओं और शस्त्र के साथ भगवान का दर्शन पाया था।

“क्या मैं उनके मनोरम मुख को देखूँ या उनकी सुंदर नाक को जो कली समान है और कर्पग व्रुक्ष के अनुरूप हिस्सों को देखूँ? मैं नष्ट में हूँ! या मैं उनके सुंदर लाल अधरों को देखूँ?

मैं क्या प्रयास करूं? मैं क्या खोऊँगा?

“तिन्कैम्मा तुयर तिर्तवन, एन कैयानै एन मुन निर्पधे” – वोह जिन्होंने गजेंद्र, जिनने शक्तिशाली गज की रक्षा कि, वो भगवान मेरे सामने अष्ठ भुज के रूप में खडे हैं ” ब्रह्मा ने कहा।

गजेन्द्र पर कृपा वर्षा बरसाने वाले भगवान का इस वृत्तान्त के बारे में पुराण भी कहते है –

“स पिद्यमानो बलिना मकरेना गाजोत्तमा I प्रभेते चरणं देवं तत्रैव अष्टभुजम हरिम I I”

ब्रह्मा ने इन शब्दों से अराधना करना प्रारंभ किया “आप धर्मनिष्ठकों के लिए एक मात्र अंतरंग सहायक (विश्वासयोग्य संरक्षक) हैं।

आपका धर्माचरण गुणों की सूची अनंत है (प्रयास करना व्यर्थ है) I

“आदिकेशवन” से नामांकित होके आपने  मुझ जैसे आत्माओं की रक्षा का एक मात्र उद्देश्य से इस स्थान को शाश्वत निवास के रूप में चुना है “।

पुराण ने गजेंद्र के उद्धारकर्ता के रूप में यहां भगवान (अष्ट भुज पेरुमाल) को स्थापित किया गया है।

पेयाळवार (श्री महताह्वय स्वामीजी) के छंद (“तोट्टपडैयेट्टुम…..”) भी भगवान के इस गजेंद्र मोक्ष की कहानी का वर्णन करते हैं।

क्या आप जानते हैं कि बुरे सपनों के कारण डर से छुटकारा पाने के लिए, आश्रय गजेंद्र वरदन् दूसरा नाम ​​”अष्ट भुज पेरुमाल” है?

“वास्तव में?” .. यदि आप आश्चर्य होके पूछते हैं, इसी स्थिती में अगले भाग का स्वागत करते है।

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी के भाग 11-3 में, अष्ठ भुज पेरुमाल अहम् स्थान लेते है। यह उनके प्रति समर्पित है। भिजगिरी क्षेत्र, तिरुपारकडल क्षेत्र और तिरुवेक्का की महानता के साथ है। केवल तभी अत्तिगिरी अप्पन का आनंदमय वर्षा की झलक मिलेगी । पाठकों के धीरज और समर्थन  के लिए  धन्यवाद।

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अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-11-2/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १० – २

ब्रह्मा देवतओं के सर्वोच्च नेता को देखने के लिए तीव्र आग्रह के साथ तपस्या कर रहे थे! वशिष्ट, मारिची और समान रूप से महान विद्वानो के सात अपरिमित ज्ञानी यग्न में भागी थे I यज्ञ के वीक्षण के लिए बड़ी संख्या में जन एकत्र हुए थे।

ब्रह्मा ने यग्न में आने वाले निरंतर बाधाओं पर और कैसे भगवान् ने उन्हें तत्क्षण निष्फल किया उन पर विचार कर रहे थे। अनैच्छिक रूप से ब्रह्मा भगवान कि प्रशंसा कर रहे थे।

क्या उदारता के साथ भगवान, जो वेदांत के शोभायमान सार हैं, दीपक के प्रकाश के रूप में प्रकट हुए; बाद में नरसिम्ह के रूप में प्रकट हुए और असुरों का संहार किया! – ये शब्द हर किसी के मुंह में था।

ऐसा कहा जाता है कि महान कार्यों के लिए बहुत बाधाएं आएंगी; हाँ! हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि केवल अगर बाधाएं हैं, तो कार्य वास्तव में महान कार्य है।

एक साधारण, पवित्र कार्य में लौटने के दौरान हमें कितनी बाधाएं आती हैं? गलत, प्रयास किए जाने पर, खतरे के बिना संपन्न हो जाता है। तरीके कितने विचित्र हैं!

इन पर ध्यान देते हुए अयन का मन, इन विचारों में खो गया था। उन्होंने दृढ़ता से विश्वास किया कि वे और वेल्वी को इस समय भी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। परंतु वे चिंतित नहीं थे I

निकट में किसी ने अयन से प्रश्न किया “ब्रह्मा .. क्या अब भी समस्याएं जारी रहेंगी?”

ब्रह्मा ने उत्तर दिया “हां। निश्चित रूप से”।

ब्रह्मा से इस अनपेक्षित उत्तर ने प्रश्नकर्ता को स्तंभित और भयभीत कर दिया। उन्होंने ब्रह्मा को आंखें गाड़कर देखा, उसकी आंखों बाहर निकल जाएंगी ऐसा लगाI

एक काँपते हुए स्वर में, उन्होंने पूछताछ किया कि “अयन! क्या आप खतरे का सामना करने के लिए तैयार और सशस्त्र हैं? ”

“निश्चित रूप से नहीं!” अयन ने उत्तर दिया। “मुझे विश्वास नहीं है कि मेरे पास सरस्वती के क्रोध को पराजित करने की क्षमता है।”

इससे प्रश्नकर्ता और चकित हो गए I

अयन ने मुसकुराये और कहा “मैंने केवल इतना कहा कि मैं सुसज्जित नहीं हूं और व्यवस्था नहीं कर सकता परंतु यह नहीं कहाता कि यह भगवान की शक्ति और सुविधा से परे है। क्या हमें उन पर अविश्वास करना चाहिए, इतनी रक्षा करने के बाद भी? उन्होंने बार-बार प्रस्तुत किया हैI  उनके उत्तम मन में यह विचार है कि, कान्चि शहर में हर जगह अपनी उपस्थिति अनुभूत करना चाहते हैं, मुझे साधन के रूप में उपयोग करके I

मैंने यह अशरीरी की आवाज़ सुनने के उपरांत यग्न आरम्भ किया। आरंभ से बाधाएं आयी हैं परंतु वे उनके संरक्षण से ध्वस्त हो गये।

(हमें यह निरिक्षण आवश्यक है। अनेक बाधाएं आएंगी I यह अत्यावश्यक है कि हमें एक दृढ़ विश्वास रहे कि वोह हमारे साथ हैं और हमारी अनुरक्षण कर रहे हैं। वह हमें कभी नहीं त्यागेंगे)।

ब्रह्मा इन शब्दों को एक शांतचित्त होके बोले। “मेरी परिकल्पना इस विषय में है कि वोह आगे कैसे प्रकट होंगे और कैसे मैं उनके उद्भव के उपरांत अपना आभार व्यक्त करु I

दीपक के प्रकाश के रूप में और सिम्हेंद्र (सिंह के राजा) के रूप में आने के उपरांत अगला आलंकारिक अवतार क्या होगा – यही वह है जो मैं अब अनुमान लगा रहा हूं। ”

इस तरह से बात करते हुए सुनकर, वशिष्ट उतावले हो कर उनकी निष्ठा कि प्रशंसा करते हुए उनके पास पहुचे।

“आदरणीय ब्रह्मा! भगवान में आपके विश्वास और निष्ठा से निश्चित रूप से कल्याण होगा !! “आप के माध्यम से, हम भी उच्चता प्राप्त करेंगे।

वशिष्ट ने आगे बात जारी रखने का प्रयत्न किया, कि “सिवाय सरस्वती…..”। हाथों को जोड़ कर, ब्रह्मा ने वशिष्ट को रोक दिया I

जब कोई विचलित और क्रोधित हो तो बुद्धि पीछे हो जाती है। लेकिन इस स्तिथि में, बुद्धि (बुद्धी – सरस्वती) खुद क्रोधित हैं। वह निश्चित रूप से शांति से विश्राम नहीं करेंगी। परंतु भयभीत न होना I श्री हरि ध्यान रखेंगे “।

ब्रह्मा के इस संभाषण को सुनने पर, सभी भावनाओं से अभिभूत थे और परमन (सर्वोच्च व्यक्ति) की प्रशंसा में गाये थे।

उधर सरस्वती नदी तट पर , सरस्वती असुरों के साथ विचार-विमर्श में व्यस्त थी। चैंपरासुर और कई अन्य राक्षस ने प्रयत्न किया परंतु यग्न में बाधा डालने में विफल रहे। अचानक कलै अरसि (कला और ज्ञान की देवी) के मन में कुछ चमक उठा, और उन्होंने काली का नाम उच्चारित किया।

काली सरस्वती के सामने उपस्थित हुई। ज्ञान कि शोभायमान अध्यक्ष ने आदेश दिया “काली। आप तत्क्षण प्रस्थान करो। लोगों का समूह लेके उस स्थान पर जाएं जहां ब्रह्मा यग्न की व्यवस्था कर रहे है I

कई आसुरों के साथ, काली तत्क्षण प्रस्थान किया।

वह तपस्या स्थल पहुंची, एक भयंकर हंसी से, जिसमें रक्त से रंगें हुए दांत बाहर की ओर लटकते हुए, आंखें आग प्रज्वलित करते हुए, कई शास्त्रों के साथ क्रूर लग रही थीं। सभी निराश थे।

लेकिन एकमात्र ब्रह्मा हाथों को जोड़कर मुस्कुराते हुए काली के विपरीत दिशा में देख रहे थे।

इस अवसर पर, भगवान् विपत्तियों के आगमन के उपरांत नहीं उभरे, किन्तु काली स्वयं को दिखाने से एक पल पहले।

यह वही थे जिनकी ब्रह्मा ध्यान कर रहे थे।

आंखें प्रतिभाशाली चित्रकारों द्वारा खींचे गए कमल जैसे थी, सबकुछ – उसकी ऊपरी भुजाएँ, मुंह उत्तम और समुचित थी। सभी व्यापक रूप से विभाजित होंठ से चकित थे। वह कौन थे?

क्या हम जानने के लिए प्रतीक्षा करें…?

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १० – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १० – १

मुकुंध नायकन वेलुकै के भगवान का शीर्षक है, जो सिंह और मनुष्य का मिश्रण है। मुकुंद का अर्थ है कि जो सांसारिक जीवन की व्याधी (रोग) से मुक्त होने के लिए मोक्ष या मुक्ति प्रदान करते हैं (संसार)। वह सर्वरोगहारी, अमृत, उपाय है।

हिरन्य वध के उपरांत, भगवान ने  विश्राम करने के लिए जगह की तलाश की। यह जगह (तिरुवेळ् इरुकै) उनकी रुचि और पसंद थी। यही कारण है कि वे आज भी यहां स्थित हैं।

नरसिम्ह अवतार…..

उन्होंने यह भूमिका धारण किया था प्रहलाध (असुर पुत्र) को अभय देने के लिए । ब्रह्मा ने वर प्रदान (हिरन्य को) किया था। भगवान ब्रह्मा के शब्दों को सम्मान देना चाहते थे और सिर्फ इस कारण, वह स्तंभ से उभरे और हिरन्य का वध किया।

उन्होंने क्या व्याकुलता और चिंता प्रदर्शित किया कि ब्रह्मा के शब्द झूठा और असफल प्रदर्शित न हो!

उनके अवतारों को समझने के लिए कई कारणों की प्रस्तुती की गयी है। कृष्ण ने स्वयं गीता में सूची दिए हैं कि “साधु की रक्षा करने के लिए, दुष्ट का नाश करने, धर्म परिरक्षण और पोषण करने (सत्यनिष्ठा और धर्म)”, वह धरती पर उतरते हैं। यह उनके मुख से निकले शब्द हैं।

धर्म स्थापना क्या है?

अगर हम यह जानना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले समझना होगा कि धर्म क्या है।

श्री पराशर भट्टर के अनुसार, धर्म एक नैतिक सदगुण / सदाचार है, धार्मिक और उत्कृष्टता है।

इस कारण से  लगता है कि वह अपने असंख्य गुणों का अनावरण करने के लिए अवतार लेते हैं।

“अजायमान: बहुध विजायते” – वेद घोषित करते है I अर्थात, “वोह अजन्मा, कई तरीकों से पैदा हुआ है”। (“वे अजन्म है, कई तरीकों में जन्में हुए”) I

हम अपने कर्म (भाग्य और कर्म) के परिणाम स्वरूप जन्म लेते है। हम से भिन्न, वह कर्म परिणाम स्वरुप से नहीं जन्म लेते हैं। फिर भी वह स्वयं कि इच्छा से और हमारे प्रति प्रेम और चिंता के कारण जन्म लेते है।

“इच्छा गृहीतोपिमधोर देह:” –  विष्णु पुराण के अनुसार, प्रत्येक अवतार का अर्थ उनके गुणों में से एक को प्रकट करने के लिए है I

(साधारणता से हम हर अवतार में उनकी सभी गुणों को देख सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से उनकी अनूठी विशेषताओं में से एक, एक अवतार में विशिष्ट रूप से प्रकाशित होती है)

नरसिम्ह अवतार में, उनके सर्वव्यापी पन (हर जगह मौजूद, भीतर और बाहर, कोई शून्य नहीं छोड़कर) प्रदर्शित किया गया है।

वह उपनाम “अन्तर्यामी” द्वारा भी जाने जाते हैं। वह हमारे भीतर रहते हैं और हमारे कार्यों को नियंत्रित  और क्रियात्मका रूप में लाते है।

वेद भी पुष्टि करता है “अंतर बहिश्च तथा सर्वम व्याप्य नारायण स्तिता:” –  वह पूरी जगह में फैले हुए है, अन्तर्गत और अतिरिक्त, सर्व व्यापि होके ।

यह अनूठी विशेषता हमें नरसिम्हावतार में प्रबुद्ध होता हैं। प्रहलाद ने भगवान की विशेषता और इस पहलू को “तून्नीलम इरुप्पान तुरुम्बिलुम इरुप्पान” के रूप में घोषित किया (वे स्तम्भ के भीतर रहते है एक क्षुद्र अंश में भी ) – यह इतनी सरलता से दिया गया है कि एक बालक को भी सुस्पष्ट होगा I

आळवार इस विचार की पुष्टि करते हुए कहते है कि “एन्गुमुलान कन्ननेरा मगनायक कायन्तु” –  अत्याचारी के पुत्र ने प्रमाणित किया कि किर्ष्ण हर जगह हैंI

हमारी अवधारणा से परे सिंहपेरुमाल की महिमा नहीं है?

वेलुकै आलरि (नर – सिंह सम्मिश्रण ) जो वेल्वी का रक्षा के किये आये थे ब्रह्मा को भी सुरक्षित करदिया असुरों का संहार करके I

ब्रह्मा ने अपनी तपस्या जारी रखी।

सरस्वती, अपमानित और असुरों द्वारा दूषित एक और योजना की कल्पना की। वह योजना क्या थी?

खोजने के लिए प्रतीक्षा करें …

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १० – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ९

असुर यागशाला को लूटने के लिए तरस रहे थे , ब्रह्मा के इस याग को ध्वंस करके, भगवान के पवित्र रूप का दर्शन करने की अभिलाषा और अपने पद को संरक्षित रखने की कामना को नाश करने के लिए लालस थे ।

बड़ी संख्या में एकत्र हुए, उन्होंने याग के समीप गमन किया। जैसा कि उनकी आदत है, ब्रह्मा झुके और भगवान के लिए देखा।

तब ही, गरजते हुए आवाज़ के साथ भगवान नरसिंह उस कक्ष के मद्य से उत्पन्न हुए,  पश्चिम की ओर मुख करते हुए I उन्होंने याग, ब्रह्मा और अन्य जनों को विपत्ति से बचाया। यह हम पुराण के श्लोकों (छंद) से सीखते हैंI

“न्रुसिम्हो याग्न्शालाया: मध्ये शैलाश्च पश्चिमे I
तत्रैवासित मक़म रक्षण असुरेभ्य: समंतत: I I”

ब्रह्मा आश्चर्यचकित होक खड़े थे, अभिभूत।

“ओह इमैयोर तलइवा! (देवतओं के नेता – जनजाति जो कभी भी अपनी आंखें झुकाते नहीं ) इससे पहले कि हम आप से अनुरोध करें और प्रार्थना करें, जिस क्षण हम आपको स्मरण करते हैं, आप हमारे रक्षा के लिए शीग्र आते हैं और सुरक्षा प्रदान करते हैं। क्या इस प्रकार की प्रतिष्ठा और विशिष्टता आपके अलावा कोई अन्य हो सकता है क्या?

तेजोमंडल के रूप में प्रकाश का चक्र, अंतरिक्ष के चारों ओर फैलता है, आपका अंतरिक्ष पर पूर्ण अधिकार हैं, आप सर्वव्यापी हो। आपके पास मातृत्व है और करुणा भी। आपकी अनूठी विशेषता का वर्णन करने की क्षमता किसको हो सकती है?

इसके अतिरिक्त आपका आधिपत्य नरहारी, नरसिम्हा के रूप में उभरा है। आपके सभी अवतारों (भूमि पे अवतार और आविर्भाव) में, यह सर्वोच्च के रूप में मानने का सम्मान है। यह मेरे नेत्रों के लिए एक प्रीतिभोज है। मैं धन्य हो गया हूँ। इस प्रकार ब्रह्मा ने अनेक शब्दों से स्तुती कीया।

वेदांत देसिकन कहते है – “त्रिणी जगंत्याकुंड महिम वैकुंट कान्तिरवा”

भगवान को वैकुंटन कहते है I

वैकुंट कान्तिरवन या ” भगवत सिम्हम” – अर्थात भगवान् सिंह के रूप में I (कन्तिरवा, मतलब जो कंठ से गरजते हो, अर्थात सिंह) I

वह मनुष्य और सिंह के मिश्र के रूप में उभरे, प्रहलाद के कवच और रक्षा के लिए हि नहीं; यह तीनों लोकों की रक्षा और संरक्षित करने के लिए भी था – वेदांत देसिकन दृढ़तापूर्वक कहते है दशावतार स्तोत्र में।

ब्रह्मा की इस स्थिति में ये शब्द कितने सच हैं?

वेल्वी की रक्षा करने के लिए भगवान को नरसिम्हा के रूप में प्रकट होने की अत्यावश्यक नहीं था । फिर भी, यह उनके करुणामय दिल में पाया था कि वह याग को बचाने के बाद मानव जाति की रक्षा के लिए यहां रुकेंगे। यही कारण है कि वह धरती पर उतरे थे।

ब्रह्मा ने स्वयं को इसमें लुप्त कर दिया “मूरी निमिरन्धू मुलंगिप पुरापाटटू” (तिरुप्पवै से) –  सिंह की सौन्दर्य गर्जना के साथ सीधे प्रगति कर रही थी I

न केवल ब्रह्मा, वशिष्ट, मारिची और अन्य संत, जो भी इच्छाओं पर विजय प्राप्त किया हैं, भगवान का यह दर्शन को पसंद किया।

उनकी सुंदरता मनमध को भी मोहित कर देगी। केवल इस कारण से, भगवान को कामन नाम से भी जाने जाते है। तमिल में, कामन को “वेळ” कहा जाता है। यह वेळ, प्यार से, इस स्थल में निवास करने के लिए चुना है (वेळ इरुक्कै)। इसे इरुक्कै के नाम से जानने लगे।

“अळगियन ताने अरियुरुवन ताने”  अत्यन्त मनोहरता का यह सुंदर आकार। यह सिंह के आकृति में भगवान है) ! – तिरुमलिसै का प्रकाश ने कहा (तिरुमलिसै आळवार नान्मुगन तिरुवंदादी में) I

यही कारण है कि भगवान को “अळगीय सिंगम” कहा जाता है। सहस्रनाम भी उन्हें “नारसिम्ह वपू: श्रीमान” के रूप में संदर्भित करती हैं, जिसका तात्पर्य ऐश्वर्य के आधिपति है। उनकी विशाल संपत्ति उनका सौंदर्य और शिष्टता है।

उनके अवतारों में से कुछ में जानवरों का रूप है। कुछ अन्य अवतारों में, वह मानव रूप में है।

पराशर भट्टार श्री रंगराजा स्तवं में विस्तृत करते हैं कि, “कुछ लोगों को दूध पीने कि आदत होती है बिना चीनी का स्वाद कभी चके हुए। कुछ चीनी को चके होंगे लेकिन दूध नहीं I लेकिन जब दूध में चीनी जोड़ा जाता है, जब दूध और चीनी मिश्रित होते हैं, और मिश्रण का उपभोग करते है, तो उपभोक्ता पछताते है कि जीवन में इतने दिन अभी तक ऐसे स्वाद को गवा दिया ।

यदि जानवरों के रूप में भगवान का “जन्म” दूध के समान है, तो उनके मानव रूपों की तुलना चीनी से की जा सकती है। लेकिन अवतार जो दूध और चीनी (मानव और पशु का मिश्रण) के मिश्रण की तरह है, केवल नरसिम्हावतार है। कितना मधुरता से समझाया!

शास्त्रों का कहना है, “सत्यम विधातुम निज ब्रुथ्या भशितम” – तीव्र पक्षपाती और उपासक के लिए, भगवान रक्षा करने के लिए दौड़ते हैं, जैसे  प्रहलाद के मामले में हुआ था , जो एक प्रबल अनुयायी और उपासक हैं।

ब्रह्मा भी समान रूप से समर्पित,भक्त अनुयायी थे। तो यहां भी भगवान नरहारी यग्न के उद्धारकर्ता के रूप में प्रकट हुए।

“ध्रवंती दैत्य: प्रनामंति देवता:” –  जब जन भगवान की स्तुति में गाते हैं, वहां से दुष्टात्मा भाग जाते है। और देवताएँ उन गायकों की आराधना करते हैं।

प्रसिद्ध केसरी की प्रतिष्ठा कितनी महान है?

हमारे भगवान की भव्यता को जानना और आनंद लेना – वेलुकै के शासक हमें अनंत आनंद देंगे। यह अतृप्य है।

उनका एक अन्य नाम भी है – मुकुंध नायकन। इसका क्या अर्थ है?

हम खोज करेंगे।

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

६४) सख्य विरोधी – मित्रता में बाधाएं

सभी जनों के प्रति श्रीकुरेश स्वामीजी की दयाभाव के कारण उनकी बहुत प्रशंसा है

सख्य का अर्थ मित्रता / परिचित है। मित्रता अर्थात एक दूसरे के प्रति हितकारी भावना। शत्रुता न दिखाना मित्रता की ओर पहला कदम है। सात्विक जनों (भागवत – भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त) की ओर मित्रता और आदर दोनों होना चाहिये और वह जो पवित्र ज्ञान से भरा हो, नित्य दिनचर्या में यथार्थ ज्ञान का प्रयोग करना है। हमें यह समझना चाहिये कि सच्ची मित्रता पवित्र है। भगवान श्रीराम का श्रीगुहा के साथ मित्रता को अध्यात्मिक समझना चाहिये। उनकी सुग्रीव महाराज के साथ मित्रता भी ऐसी ही है। अनुवादक टिप्पणी: दो प्रकार की मित्रता है। एक शारीरिक वेदिका पर आधारित – हम उनसे मित्रता करते हैं जो हमारे शरीर का पोषण करते है अथवा हमारे शरीर पर अनुग्रह करते है। उदाहरण के लिये जब हम गिरते हैं तो कोई हमें उठाता है और हम उससे मित्रता करते हैं। या हमारे साथ पढ़नेवाले के साथ हम मित्रता करते हैं। फिर अध्यात्मिक वेदिका पर भी मित्रता होती है – अर्थात यह समझना कि हम सभी भगवान और भागवतों के दास हैं और ऐसे भागवतों के साथ मित्रता करना जो हमारे मन को समझते हैं। इन भागवतों को आत्म बन्धु (जो आत्मा से सम्बंधित हैं) कहते हैं। सच्चे भागवत निरन्तर भगवद विषय की चर्चा करते हैं, भगवान/ आल्वार/ आचार्य, आदि के सुन्दर अनुभव को सभी के साथ बाँटते हैं। ऐसे भागवतों के साथ मित्रता प्रशंसनीय है क्यूंकि इस लीलाविभूति में हमारे अन्त श्वास तक वे ही हमारे साथ रहेंगे। सांसारिक जनों के साथ मित्रता का त्याग करना चाहिये क्योंकि वे हमें इस संसार में खींचते हैं और सांसारिक कार्य में लगाते हैं।

  • नीच सांसारिक जनों से मिलना बाधा है। यह वे हैं जो निरन्तर भोजन, मकान, कपड़ा, आदि के पीछे भागते हैं। वे हमेशा सांसारिक कार्य में लगे रहते हैं और ऐसे जनों में घुलना मिलना अर्थात समय नष्ट करना है और यह हमें हमारे अध्यात्मिक जीवन में उन्नत्ती करने से रोकते हैं।
  • महान भागवतों से मित्रता करना और उन्हें अपने बराबर मानना बाधा हैं। हमें कभी भी अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर नहीं समझना चाहिये – उन्हें हमेशा उच्च स्थान देना चाहिये। फिर भी हमें उनसे मित्रता रखनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र के २२२ से २२५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भागवतों से कैसे व्यवहार करें यह समझाते हैं। हमें भागवतों को पने आचार्य के समान, यहाँ तक की स्वयं और भगवान से भी उच्च मानना चाहिये। भागवतों के प्रति आदर न होना अपचार माना गया है।
  • भागवतों से मित्रता रखना और उनमें दोष देखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे पूर्ण विस्तार से समझाते हैं। हमें किसी में (संसारियों में) भी दोष नहीं देखना चाहिये। हमें हमेशा स्वयं में ही सभी गलतियों को देखना चाहिये। तिरुप्पावै के १५वें पाशुर में आण्डाल अम्माजी कहती हैं “नाने दान आयिडुक” (सभी दोष मेरे ही रहने दो)। श्रीरामायण में जब श्रीभरतजी अयोध्या से लौटते हैं और उन्हें जब ज्ञात होता है कि भगवान राम वन के लिये चले गये हैं और श्रीदशरथजी परमपद को प्राप्त हुए है तो वह पहले कैकयी के पास जाते हैं। वह पूरी घटना के लिये दशरथजी, कैकयी, मंथरा, आदि को दोष देते हैं परन्तु अन्त में कहते हैं “यह मेरे स्वयं के दोष हैं जो मुझे भगवान से बिछड़ने की परिस्थिति में लाये हैं”। ऐसी स्थिति से उभरना बड़ा कठिन है परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने हमारे लिये यह राह बनायी है और हम ऐसे भाव की चाह कर सकते हैं।
  • यह मानना की सबकुछ/सभी जन भगवान की वस्तु / सेवक हैं। सभी को सभी के साथ मित्रतापूर्वक रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही इस नित्यविभूति और लीलाविभूति के स्वामी हैं। और हर एक जीवात्मा किसी न किसी तरीके से भगवान की ही सेवा कर रही हैं। अगर एक आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव हो जाता है तो वह भगवान की सेवा अपने प्राकृतिक स्थान पर रहकर सीधे कर सकता है। अगर आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव नहीं होता है तो वह भगवान की सेवा अनुचित ढंग से करता है (जैसे देवतान्तर, माता-पिता, मित्र, सम्बन्धी, स्वयं के शरीर, आदि)। यह समझकर एक श्रीवैष्णव को प्राकृतिक दया दिखानी चाहिये और अन्य को अध्यात्मिक विषय में मदद करनी चाहिये।
  • अन्य जीवात्मा की ओर बैर की भावना रखना, जो भगवान के ही शेषी हैं, बाधा है। यह देखना चाहिये कि सबकुछ/ सभी में भगवान अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं – ऐसे व्यक्ति जिनकी ऐसी दृष्टी हो वे महान ज्ञानी हैं। अत: सभी को सभी से मित्रता रखनी चाहिये और किसी से दुश्मनी नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सबकुछ / सभी में अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं। चित और अचित दोनों में भगवान ही प्रवेश करते हैं – इसे भगवान का सर्व व्यापकत्वम ऐसा समझाया गया है। शरीर का अर्थ देह है और शरीरि का अर्थ हैं जो शरीर में है। शास्त्र कहता हैं “यस्य आत्मा शरीरं, यस्य पृथ्वी शरीरं, …” (आत्मा उसी का शरीर है, धरती उसी का शरीर है, आदि)। जैसे जीवात्मा एक शरीर में है वैसे ही भगवान उस जीवात्मा में हैं। अत: यह समझना कि सबकुछ /सभी का शरीर भगवान का है हमें दूसरों से बैर नहीं करना चाहिये। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं “सुकृतं सर्व भूतानाम्” (मैं सभी का मित्र हूँ)। हमारे आचार्य भी सभी की ओर बहुत अनुकम्पा दिखाते थे ओर भगवान के पवित्र सन्देश का प्रचार करते थे।
  • श्रीवैष्णवों के साथ मित्रता कर उनको दुख या धोखा देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ जन बाहर से अच्छे मित्र दिखते हैं परन्तु भीतर से दूसरों के प्रति उनमें घृणा भावना होती है। और ऐसी भावना चेतना या अवचेतना दोनों स्थितियों में बाहर आ जाती हैं। ऐसे आचरण की यहाँ निन्दा की गयी है।
  • कुछ चाह कर किसी से मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई किसी से कोई चाह करके मित्रता करता है तो ऐसे आचरण को यहाँ नीचे देखा गया है। मित्रता प्रेम के आधार पर होनी चाहिये जिसमें किसी से कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिये।
  • दूसरों की गलतियों को भी उनके अच्छे गुण के समान मानना चाहिए, ऐसा न करना बाधा है। गहरे मित्रों के संग उनके दोष को भी अच्छे गुण माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों तत्वों (चित – जीवात्मा, अचित – वस्तु, ईश्वर – भगवान) को तत्वत्रय में विस्तार से समझाते हैं। ईश्वर प्रकरणम भाग में सूत्र १५० तक भगवान के कई सुन्दर गुणों को समझाया गया हैं विशेषकर १५१वें सूत्र में वात्सल्य गुण जहाँ भगवान अपनी पत्नी श्रीमहालक्ष्मी और नित्यसूरियों से भी अधिक अपने नवीन भक्तों के प्रति गहरी मित्रता और लगाव दिखाते हैं। इस भाग में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जैसे एक गाय अपने बछड़े को अपने सींग से धकेलती है परन्तु अपने अभी जन्मे बछड़े से प्रेम करती है भगवान वैसे ही अपने शरण में आये हुए से बड़ा प्रेम करते हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ज्ञानसारम के २५वें पाशुर में समझाते हैं “एट्रे कन्रिन् उडम्बिन वलुवन्रो कादलिप्पदु अन्रदनै ईन्रुगन्द आ” – जब एक गाय बछड़े को जन्म देती है तो उस बछड़े के शरीर पर लगी गंदगी को अपनी जीभ से साफ करती है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी एक और विशेष उदाहरण देते हैं – वे कहते हैं एक पुरुष प्रेमी को उसकी प्रेमीका का पसीना पसन्द आता है उसी तरह भगवान हमारे उन दोषों पर ध्यान न देकर हमसे प्रेम करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से कई उदाहरण के साथ समझाते हैं। उसी तरह हमारे आचार्य अन्य श्रीवैष्णवों में कुछ दोष हैं तो भी उनके गुणों की प्रशंसा किये हैं और उन्हें सकारात्मकता से लिये हैं।
  • जो हमारे प्रति प्रेम भाव रखते हैं उन्हें प्रेम दिखाना और जो हमारे प्रति बैर रखते हैं उनके प्रति बैर रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को सभी के साथ स्नेह के साथ रहना चाहिये न कि उनके साथ पक्षपात करना चाहिये।
  • जो अपने आचार्य के साथ दुश्मनी रखता हो उससे सम्बन्ध रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि हमें सभी के प्रति करुणामय होना चाहिये परन्तु हमें भगवान और आचार्य से बैर रखने वालों से सावधान रहना चाहिये। आचार्य ही वे हैं जो जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध को प्रज्वलित करते हैं। जीवात्मा और परमात्मा दोनों पर कृपा दृष्टी रखने के कारण उनकी बड़ी स्तुति होती हैं। जीवात्मा को उसके सच्चे स्वभाव को स्मरण कराते हैं कि वह भगवान का सेवक हैं। परमात्मा अपनी सम्पत्ति (जीवात्मा) को अपने निकट लाते हैं, जीवात्मा को सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में इसे समझाते हैं।
  • आचार्य के शिष्यों / भक्तों के साथ स्नेह सम्बन्ध न रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४५१वें सूत्र में समझाते हैं कि जिनमें आचार्य निष्ठा हैं उनको दूसरे आचार्य निष्ठावालों से हितकारी सम्बन्ध प्राप्त होता हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि उनके ऐसे सम्बन्ध से हमारी आचार्य निष्ठा में वृद्धी होगी अत: हमें ऐसे अधिकारी से ही मित्रता करनी चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ८

दीप प्रकाश…..

तिरुत्तणका,  कांची में यह दिव्य पवित्र स्थल आज के दिन भी उनका निवासस्थान है। यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि वहां कई बगीचे और नंदवन हैं जो इस जगह को ठंडा रखते हैं। यह श्री वेदान्त देसिकन का विशेषाधिकार प्राप्त जन्म स्थान है।

ब्रह्मा की प्रार्थना को ध्यान देते हुए भगवान्, एक उच्च तीव्र प्रकाश के रूप में प्रकट होकर चम्पासुर द्वारा प्रेरित अंधेरे को नष्ट किया जो यग्न को नाश करने की योजना बना रहा था I

इस प्रकार भगवान ने एकत्र सभी को संरक्षित किया। ब्रह्मा और अन्य गण ने भगवान की करुणा और कृपा की सराहना और प्रशंसा की जो एक प्रकाश के रूप में उभरा और कवच के रूप में उनका संरक्षण किया I

पुराण इस नाम के लिए एक स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं …

“प्रकाशिथम जगत सर्वम यथ दीपापेना विष्णुना|तस्मात् दीप प्रकाशाक्यम लबते पुरुषोत्तम I I”

अपनी अद्वितीय प्रकाश से, वह पुरे जगत को चमकाते हैं और इसलिए “दीप प्रकाश” नाम को प्राप्त किया है।

वह आग के एक गेंद के आकार का था। परंतु उसने उपस्थित अन्य किसी को कोई हानी या बाधा नहीं पहुंचाई जहां यग्न प्रारम्भ होना था। वह केवल प्रकाश प्रस्तुत कर रहा था।

पुराण कहता है…

” न तधाह तधा शालम तदद्भुतमिवाभवत ” –  प्रकाश से जुड़े किसी भी अन्य पदार्थ उनके प्रदीपन और दीप्ति के तुलना नहीं आते है I

सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, बिजली या अग्नि उनकी उपस्थिति में नीरस और मंद दिखाई देंगे।

उन्हें देव के नाम से भी संबोधित करते हैं क्योंकि उनके पास यह उत्कृष्ट सौंदर्य है I कृष्ण भी, गीता में, प्रमाणित करते हैं ” दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेथ युगापदुथिथा ! यति भासदृचि सा स्यात भासस्थास्य महात्मनः ” – ( यदि असंख्य सूर्य, सभी एक साथ प्रकाशित होंगे, तो उन सभी का चमक उनके तेज से अस्पष्ट रूप से मेल खाता है )

उपनिषद घोषित करते हैं कि वह “भारूप:” (प्रकाश का अवतार, प्रकाश का व्यक्तित्व)

आळ्वार भी इसी समरूप भावनाओं को मनाते हैं……

” कधिरायिरमिरवी कलंधेरित्तालोत्ता निल मुड़ियाँन” (उनके लंबे केशों की चमक एक हजार सूरज एक सात जलने के समतुल्य है), “सोथि वेल्लात्तिनुल्ले एलुवाथोरोरु”… (प्रकाश की प्रलय से उद्भव) I

देसिकन अपने “शरणागति दीपिका” में भगवान की प्रसिद्धि, कृपा और गुणों कि प्रशंसा करते है, जिसे प्रसिद्ध रूप से “विलाक्कोली” (दीपक का प्रकाश) और दीप प्रकाशन के नाम से जाना जाता है।

भगवान प्रचण्ड वैभवशाली थे, ब्रह्मा ने इस की प्रकाश प्रशंसा कई रीतियों में किया। ब्रह्मा द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न, भगवान ने ब्रह्मा को आशीर्वाद दिया। असुरों के योजना को ध्वस्त कर दिया गया।

कई बार पराजय का सामना करने के बावजूद असुर हार स्वीकार नहीं करेंगे, बार-बार प्रयत्न करते रहेंगे। उन्होंने याग को क्षति पहुंचाने के लिए एक और प्रयास किया।

वे एक जुट होके यागशाला पर आक्रमण करने के उधेश्य से फिर से इकट्ठे हुए I  उन्होंने एक पल में सबकुछ नष्ट करने का विचार किया।

दीपप्रकाश दुःख और पीड़ा को पूर्ण रूप से नाश करने के लिए पहुंचने के बाद,  ब्रह्मा शत्रुओं द्वारा फिर इस बाधा से निराश हुए I लेकिन वह भगवान में अपने विशाल विश्वास से सांत्वना लिया।

ब्रह्मा ने असुरों की विशाल सेना को आवागमन करते देखा। उन्होंने स्वयं से कहा की “यह भी गुज़र जाएगा – उनकी दिव्य कृपा से” I

तब गरजनेवाला गड़गड़ाहट के साथ यागशाला से कुछ उत्पन्न हुआ।

वो क्या था ?

अगले भाग में…..

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/18/story-of-varadhas-emergence-9/

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