विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४१)

७३) पुम्स्त्व विरोधी – पौरुष विरोधी

श्रीराम – मर्यादा पुरुषोत्तम – आदर्श श्रेष्ठ पुरुष माता सीता और लक्ष्मणजी सहित – श्रीपेरूम्बूतूर

पुम्स्त्वम का अर्थ पौरुष / पुरुषार्थ – पुरुष होना है। दिव्य प्रबन्ध के व्याख्यानों में किसी के शारीरिक स्थिति को देखकर, पुरुषों को “मोवायेलुन्तार” कहते हैं – जिसके ऊँची ठोड़ी है या जबड़े के नीचले भाग जहाँ दाढ़ी होती है और नारी को “मुलैयेलुंतार” कहते हैं – जिसके ऊँचे स्तन हो। यह तो दैहिक / बाहरी विशेष लक्षण हैं जो उसके पूर्व कर्म का फल है। जैसे भगवद गीता में समझाया गया है कि “उत्तम: पुरुष:” – श्रेष्ठ पुरुष जो भगवान हैं वो हीं सर्वोच्च पुरुष हैं। जैसे प्रमाण में समझाया गया हैं कि “स्त्री प्रायम इतरम जगत” – इस ब्रह्माण्ड में बाकी सभी स्त्री वर्ग में हैं दैहिक (नर/मादा) कोई भी स्वरूप क्यों न हो। स्त्री के मुख्य पहलू में पूर्ण रूप से आश्रित, आज्ञाकारी, लज्जा, आदि शामिल हैं। जीवात्मा भी आंतरिक रूप से परमात्मा पर आश्रित है। अब इसकी व्याख्या देखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: प्रणवम में भगवान को “अ” ऐसे दर्शाया गया हैं। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने अष्ट श्लोकी (आठ अत्कृष्ठ और सुन्दर श्लोकों की रचना जिसमें रहस्यत्रय [तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक] के अर्थो को बताया गया है) का प्रारम्भ  ऐसे किया है “अकारार्थों विष्णु:” “अकारम” भगवान है ऐसे गुंजता हैं। अकारम का एक मुख्य स्पष्टीकरण है रक्षकत्वम। रक्षकत्वम का अर्थ अनचाहे पहलुओं को निकालकर इच्छित पहलुओं को प्रस्तुत करना। केवल भगवान श्रीमन्नारायण हीं सर्वश्रेष्ठ स्वतन्त्र पुरुष है और अन्य सभी पूर्णत: उनपर निर्भर हैं। हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन की एक अद्भुत घटना को स्मरण कर सकते हैं। श्रीपेरियवाचान पिल्लै इस घटना को तिरुनेडुंताण्डगम के तीसरे पाशुर के व्याख्या में दर्शाते हैं। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी क्षीरसागर के मंथन की घटना के विषय में बताते हैं। वें समझाते है कि जब श्रीमहालक्ष्मीजी क्षीरसागर से प्रगट होती हैं वे सीधे भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर उनके वक्षस्थल पर जाती है जो उनका स्थायी निवास है और उन्हें अपने पति रूप में स्वीकार करती हैं। इस समय श्रीवेदांति स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी से पूंछते हैं कि “वहाँ कई देवता मौजूद थे – एक नारी होते हुए वे एक पुरुष के निकट सबके सामने पहुँचने में शर्म नहीं आयी?”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बड़ी चतुराई से उत्तर देते हैं कि “जब पति के साथ सगाई होती है तो क्या पत्नी को अपनी सहेलियाँ जो अपने संग वस्तु, तोफे, आदि को देखकर शर्माती है?”। इसका अर्थ हुआ सभी जीवात्मा जो वहाँ पर उपस्थित थे सभी स्त्री स्वभाव के हैं हालाँकि वे दैहिक रूप से पुरुष रूप में हैं। इस तरह सर्वोच्च स्वतन्त्रता का पहलू पुरुषार्थ से जुड़ा हुआ है और अन्य सब इसके विपरीत नारीत्व वाले हैं।

  • सर्वश्रेष्ठ भगवान जो गरुड वाहन और पुरुषोत्तम है उनके बदले में स्वयं को पुरुष मानना बाधा है। पुरुषोत्तम हीं एक मात्र व्यक्ति हैं जो पुरुष कहलाने के योग्य है। अन्य सभी जीवात्मा स्त्री वर्ग में हैं। स्वयं को पुरुष का स्वरूप होने से पुरुष मानना अज्ञानता है। यह भी एक गलती है। अनुवादक टिप्पणी: सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा को गरुड वाहनत्वम कहना उनके प्रमुख गुणों को दर्शाता है। गरुड को वेदात्मा कहते है – वह जो वेद की आत्मा है। भगवान गरुडजी की सवारी करना और गरुडजी उँगली कि नोक भगवान कि ओर करना यह भगवान श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता का संकेत है। और श्रीमन्नारायण को पुरुषोत्तम भी कहते हैं – पुरुषों में श्रेष्ठ। इसलिये पुरुषार्थ केवल भगवान श्रीमन्नारायण के साथ जुड़ा हैं।
  • देवताओं को जैसे ब्रह्म, रुद्र, आदि को उनके पुरुष स्वरूप होने के कारण पुरुष मानना बाधा है। जैसे पहिले समझाया गया है कि यह तत्व देवताओं पर भी लागू है। जब पुरुषोत्तम से तुलना करते हैं तो सभी अन्य देवता नारी प्रतिरूप है, हालांकि वे दैहिक रूप से पुरुष हैं। इसके विपरीत समझना अज्ञानता है।
  • हममें जो नारीत्व के लक्षण हैं वे स्वाभाविक जय जो कि भगवान के पुरुषार्थ के लक्षण के प्रतिरूप है। इसे न मानना बाधा है। हमारा स्वाभाविक गुण है भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना और उनकी सम्पूर्ण स्वतन्त्रता को संतुष्ट करते हैं।
  • पुरुष देह जो हमें प्राप्त हुआ है वह हमारे कर्म के आधार पर प्राप्त हुआ है और अस्थाई है। यह न जानना बाधा है। पुरुष रूपी जो बाहरी दिखावट है वह हमारे पूर्व कर्मो के आधार पर प्राप्त है। हमें यह जानना जरूरी हैं कि हमारे पूर्व कर्मों के आधार पर हम भिन्न भिन्न दैहिक रूप प्राप्त करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण इस शारीरिक बदलाव के सिद्धान्त को विस्तार रूप से समझाते है। वे समझाते हैं कि जैसे कपड़ा पुराना होने पर बेकार हो जाता है और उसके स्थान पर नया कपड़ा लाते हैं वैसे ही जब जीवात्मा के लिये एक शरीर निष्प्रयोजन हो जाता है वह शरीर का त्याग कर देता है और एक नया शरीर प्राप्त करता हैं। एक और उदाहरण के साथ समझाते हैं – जैसे आत्मा एक नन्हें बच्चे के शरीर में, एक किशोर के शरीर में, एक युवा और एक वृद्ध के शरीर में वास करके जब उस विशिष्ट देह के कर्म समाप्त हो जाते हैं तो आत्मा वह देह को त्यागकर नये देह में प्रवेश करती है। इस तरह हम बहुत सरलता से समझ सकते हैं कि हम प्रत्येक जीवन के पश्चात नया देह प्राप्त करते है और प्रत्येक ऐसे देह अस्थाई हैं।
  • यह न जानना कि पुरुष और स्त्री का देह जिसे अनादिकाल से प्राप्त करते हैं यह नश्वर है – बाधा है। अनन्त काल से हम इस संसार में हैं और कर्मों के फल स्वरूप भिन्न भिन्न देह प्राप्त करते रहे है। इसलिये यह कुछ भी शाश्वत नहीं है। यह सुस्पष्ट है।
  • भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना यह जीवात्मा का शाश्वत गुण है। इसे न जानना बाधा है। भगवद पारतंत्रयम यह जीवात्मा का शाश्वत व मूल भूत गुण है। पारतंत्रयम का अर्थ भगवान के पूर्णत: नियन्त्रण में रहना। अनुवादक टिप्पणी: हमने पहले प्रमाणों में देखा है “स्वत्वम आत्मनि संजातम स्वामित्वम ब्राह्मणी स्तिथम” – जीवात्मा का स्वभाव भगवान की संपत्ति होना है और भगवान के गुण स्वामी के हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि जीवात्मा का स्वभाव भगवान के आश्रित बनकर रहना है।
  • स्वतन्त्रता की झलक पाना और दैहिक स्वरूप पुरुष का होने के कारण स्वयं को समझना यह जानते हुये भी कि हम पूर्णत: भगवान के आश्रित हैं – बाधा है। एक बार यदि हम पारतंत्रीयम (सम्पूर्ण आश्रित) का सही ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो स्वयं को पुरुष मानने का कोइ प्रश्न ही नहीं उठता है चाहे स्वतन्त्रता की झलक ही क्यों न हो जो पुरुष में स्वाभाविक गुण है। अनुवादक टिप्पणी: मूलभूत विषय देहात्मा अभिमानम (आत्मा और शरीर को एक समझना)। इतने कालक्षेप सुनने के पश्चात और इस सिद्धान्त को समान जानकर भी हम आत्मा और शरीर के विषय में भ्रमित हैं। इस महत्त्वपूर्ण मूलभूत अन्तर को समझने के लिये निरन्तर ध्यान मग्न होकर इसे अपने दैनंदिन जीवनी में लागू करने की कोशिश करना चाहिये।
  • स्वयं को स्त्री गुण वाला समझकर भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना और अन्य नारीत्व के सुखों को पाने की इच्छा रखना बाधा है। स्वयं को स्त्री समझने के पश्चात जो भगवान पर आश्रित है स्वयं के दूसरी नारीत्व का आनन्द की इच्छा सिर्फ अज्ञानता (स्वयं को देह के साथ जोड़ना आत्मा के साथ नहीं) है। यह सही नहीं हैं। हमें श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०१वें सूत्र को इस सन्दर्भ में स्मरण करना चाहिये “विहित विषया निवृत्ति तननेररम”। अनुवादक टिप्पणी: ९९, १०० और १०१वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इंद्रिय, सुख और अन्य के सभी इंद्रियों का नियंत्रण से अलग करने के पहलू के विषय में चर्चा करते हैं। पहिले उन्होंने कहा है कि इस भौतिक सुख को अलग रखना यह आध्यात्मिक उत्थान के लिये मूलभूत योग्यता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रमाणों के भावपूर्ण सम्बन्धों को समझाते हैं। ९९वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि जो मनुष्य भौतिक सम्पत्ति, आदि की चाहना रखता है, जो भक्ति योग में व्यस्त रहता है और अन्त में प्रपन्नों के लिये यह अलग रखना आवश्यक है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि यदि कोई मनुष्य बहुत अधिक भौतिक सम्पत्ति की चाहना रखता है और उसे पाने की प्रक्रिया में उसे अपने इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखना जरूरी है। उपासक और प्रपन्न में स्पष्ट रूप से अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है और वे भौतिक आनन्द से पूर्णत: भिन्न हैं। १००वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है कि प्रपन्नों के ३ वर्गों में इंद्रियों पर नियंत्रण अति मुख्य है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बहुत सुन्दर और स्पष्टता पोरवाक दर्शाते हैं कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी प्रपन्नों के अन्य २ वर्ग कोनिर्लिप्ता के महत्त्व को समझाने के लिये शामिल किया है। १०१वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं कि जिसे भौतिक सम्पत्ति कि आस है और उपासकों को शास्त्र में वर्जित चीजों से स्वयं को अलग रखना चाहिये। प्रपन्नों के लिये तो जो शास्त्रों में मान्यता प्राप्त को भी अलग रखना चाहिये क्योंकि वह स्वरूप विरोधी (जीवात्मा के स्वरूप के विपरीत) है। शादी की परिधी में इंद्रियों के सुख की शास्त्र में मान्यता है हालांकि कई शर्तें हैं जैसे कि कब और कैसे शारीरिक सम्बन्ध होना चाहिये। यहाँ प्रपन्नों के लिये श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते हैं कि हमें अपनी पत्नी के प्रति भी वियोग होना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों में इस विषय को बहुत ही अद्भुत तरीके से विस्तृत रूप से समझाते है। आचार्य के मार्ग दर्शन में इसे सुनना अती उत्तम है। किसी की स्पष्ट समझ कि वह स्वयं एक नारी होने से स्वाभाविक रूप से भगवान का दास है और इसलिये उसे दूसरी नारी के प्रति दासता की चाह नहीं रखनी चाहिये चाहे वह शादी के सिलसीले में ही क्यों न हो।
  • भगवान के सन्दर्भ में हम सब स्त्री है और यह न समझना बाधा है। हमें यह जानना चाहिये कि परमपुरुष के दृष्टी से देखेंगे तो सभी जीवात्मा स्वभाव से नारी हैं।
  • स्वयं कि पत्नी के साथ जिसे भगवद और भागवतों के सेवा हेतु स्वीकार किया है के साथ दास बनकर बाधा है। गृहस्थाश्रम – पत्नी के साथ रहना। जैसे श्रीरामायण में कहा गया है “सहपत्न्या विशालाक्षया नारायणमुपाकमत” श्रीराम स्वयं माता सीता से विवाह कर श्रीरंगनाथ भगवान की सेवा किये। यही गृहस्थाश्रम का धर्म हैं। हालाँकि यह पति पत्नी का सम्बन्ध हैं परन्तु भगवान के सन्मुख आने पर दोनों नारीत्व में आजाते है और दोनों भगवान के हीं दास हैं। अनुवादक टिप्पणी: ४ आश्रमों में (ब्रह्मचार्या, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थान और सन्यासाश्रम) गृहस्थाश्रम दूसरों कि सेवा करने पर पूर्णत: केन्द्रित करता हैं। ब्रह्माचार्या के समय वह अध्ययन पर केन्द्रित होता है और कमाने का कोई साधन नहीं होता हैं। वानप्रस्थ जो जंगलों में निवास करता है और ध्यान में अपना समय केन्द्रित रखता है। सन्यासी ज्ञान बाँटने व सिखाने का कार्य करता है और धन संग्रह नही कर सकता है। केवल गृहस्थ ही धन ब्रह्मचारी और सन्यासी के कैंकर्य हेतु कमा सकता हैं। यात्रीगण भी स्थानीय गृहस्थों पर यात्रा के समय आश्रित रहते हैं। अत: गृहस्थाश्रम पूर्णत: भगवान और भागवतों पर पूर्णत: केन्द्रित होते हैं। इसलिये स्वयं की पत्नी के साथ इंद्रियों के सुख के बदले भगवान और श्रीवैष्णवों के कैंकर्य में पूर्ण ध्यान देना चाहिये।
  • स्वयं को पूरुष दास मानना बाधा है। यह पहिले ही समझाया गया है कि स्वयं को पूरुष नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें भगवान और भागवतों का स्त्री रूप में दास समझना चाहिये।
  • यह ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अपनी पत्नी के साथ शयन करने के बजाय अपने साथ शारीरिक रूप से व्यस्त रहने की कोशिश करना उसके लापरवाह स्वभाव के कारण है यह बाधा है। जैसे पत्नी स्वयं को पती को समर्पित करती है वैसे हीं हमें स्वयं को भगवान को समर्पित करना चाहिये। हमारा पूरुष का देह हो तो भी हमें स्वयं को स्वतन्त्र नहीं समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह किसी के सही गुणों को जानना महत्वपूर्ण है। हमें उस स्थिति तक पहूंचना चाहिये कि अगर कोई अपनी पत्नी के साथ शयन कर रहा है तो उसे एक स्त्री दूसरे स्त्री के साथ शयन कर रही है जहां कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं हैं ऐसा महसूस होना चाहिये। किसी को स्वयं कि पत्नी के साथ भी काम भावना नहीं रहना है और यहाँ तक कि करीबी सहवास में भी ऐसे विचारों से दूर रहते हैं। विशेषकर ब्रह्म के विषय में और रागम (इंद्रियों के सुखों के लिये लगाव) – या कोई एक की उपस्थिती में नर और मादा एक दूसरे के शारीरिक सम्बन्धों में व्यस्त हो जाते हैं।
  • आल्वारों का जन्म पूरुष रूप में हुआ था फिर भी वें नारी मनो दशा में रहकर और भगवान के दिव्य स्वरूपों की लालसा करते थे। यह पाशुरों का अध्ययन करने और उनके अर्थों को समझने के पश्चात और अपने पुराने अनुभावों से मतिभ्रम हो कर, शारीरिक सम्बन्धों से लगाव होना और ऐसे शारीरिक सुख की चाह करना सब बाधा है। आलवारों में विशेषकर श्रीशठकोप स्वामीजी और श्रीपरकाल स्वामीजी ने स्त्री भावना में भगवान के दिव्य रूप पर कई पाशुरों की रचना किये हैं। उन्होंने अपने बिछुड़ने के वियोग के दर्द को इन पाशुरों में भरा है। इन पाशुरों के शब्दार्थ और गूढ़ार्थ को सुनने के पश्चात हमें फिर यह नहीं सोचना चाहिये कि “मैं पुरुष हूँ” और इसी तरह इंद्रियों सुखो की लालसा करना जिसे हमें त्यागना चाहिये। श्रीपरकाल स्वामीजी द्वारा रचित तिरूमोही के पाशुर में कहा गया है “आविये अमुधे एन निनैन्तुरुगी अवरवर पणैमुलै तुणैया पावीयेणुणरातु एत्तनै पगलूम पलुतु पोयोलिन्तन नालगल” – मैं पापी हूँ क्योंकि मैं बिना समझे सिर्फ औरतों के विषय में जिनके उभरे हुये स्तन हैं जिन्हें मेरी जिंदगी! मेरी अमृत! आदि कह कर मेरी जिन्दगी के कई दिनों को बर्बाद कर चुका हूँ। फिर वें ज़ोर देकर कहते हैं कि श्रीमन्नारायण की कृपा से ऐसी दयनीय स्थिति से छुटकारा मिल गया है।
  • आस्तिक – नास्तिक बनकर रहना और आचार्य द्वारा त्याग होना बाधा है। सामान्यतया आस्तिक व नास्तिक वह है जिसने भगवान के अस्तित्व को तो माना है परन्तु पूर्ण विश्वास नहीं है और कोई किसी सिद्धान्त का पालन नहीं करता है। अधिक समझने हेतु हमें उपदेश रत्नमाला के ६८वें पाशुर को देखना चाहिये “नास्तिकरूम नर्क्कलैयिन् नन्नेरिशेरास्तिकरुम् आस्तिकनास्तिकरूमामिवरै ओर्त्तु नेञ्जे! मुन्नवरूम पिन्नवरूम मूर्खरेन विट्टु नडुच्चोन्नवरै नालुम तोड़र्”। नुवादक टिप्पणी: आस्तिक का अर्थ वह जो वेद शास्त्र को प्रमाण रूप में स्वीकार करता हैं। शास्त्र प्रमाण है जिसके जरिये हम हम भगवान को समझ सकते हैं जो प्रमेय हैं। यहाँ वेद शास्त्र में उपनिषद, स्मृति, इतिहास, पुराण, पांचरात्रम, आदि शामिल हैं। दिव्य प्रबन्ध, पूर्वाचार्य के स्तोत्र और व्याख्या को  हमारे आचार्यो द्वारा बहुत आदर सम्मान किया गया है क्योंकि वे हमें शास्त्रों का सार दिखाते हैं। नास्तिक आस्तिक के विपरीत है। जिसका अर्थ वह जो वेद शास्त्रों को प्रमाण रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। तीसरा वर्ग हैं आस्तिक-नास्तिक। आस्तिक-नास्तिक यानि वह जो वेद शास्त्रों को प्रमाण की तरह स्वीकार करता हैं परन्तु जब स्वयं के जीवन में उतारना होता हैं तब अनादर करता हैं। इन पाशुर के व्याख्यानों में श्रीपिल्लै लोकम जीयर विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शब्दों को समझाते हैं। इस पाशुर में सबसे मुख्य पहलू है – यह पाशुर आचार्य की पूर्ण शरणागति एक विषय पर केन्द्रित होता है। इस सन्दर्भ मे आस्तिक, नास्तिक और आस्तिक-नास्तिक के उच्चतम पहलू को समझना है यानि क्रमश: से आचार्य के पूर्ण शरण होना, स्वयं के आचार्य के प्रति पूर्ण विश्वास न होना और विश्वास होना पर उनके मार्ग पर न चलना। अगर आचार्य आस्तिक-नास्तिक के कारण अपने शिष्य पर अपनी निर्हेतुक कृपा न करें तो उस शिष्य को दूसरी कोई आशा बाहीं है। ज्ञान और अनुष्ठान दो मुख्य पहलू हैं। उपदेश रत्नमाला प्रबन्ध में स्वयं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आचार्य के इन दो महत्त्वपूर्ण गुणों को दर्शाते हैं। यह सभी श्रीवैष्णवों के लिये लागू होता है।
  • विद्वानों और बड़ों के द्वारा दोषी ठहराना क्योंकि वे सारम और असारम पहलू में भेद नहीं बताते हैं बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य के शरण होने का कारण है उनसे विवेक ज्ञान (सार और बाहरी विषयों में भेद की क्षमता) प्राप्त करना है। हंस को विशेषकर उसके दूध और जल को अलग करने कि योग्यता के लिये स्तुति करते हैं। हमारे पूर्वाचार्यों को भी हंस की तरह स्तुति करते हैं क्योंकि शास्त्रानुसार सार विषय को दर्शाना और बाहरी विषयों को निकाल बाहर फेंकने में समर्थ हैं। हमारे पूर्वाचार्यों के पदचिन्हों पर चलकर विद्वानों से ज्ञान प्राप्त कर हमें सार और बाहरी विषयों में भेद समझने की योग्यता को विकसित करना चाहिये। जो सार हैं उसे बचा कर रखना और जो बाहरी पहलू का त्याग करना चाहिये। ऐसे न करना और बाहरी विषयों के पहलू मे लगे रहे तो विद्वानों द्वारा निन्दा होगी। उदाहरण के लिये विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भी अगर कोई सांसारीक सुख, आदि रखता हैं और आध्यात्मिक उत्थान पर ध्यान केन्द्रित नहीं करता हैं तो विद्वान ऐसों कि निन्दा कर दोषी मानते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४२

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

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७२) तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – 3

भगवान श्रीमन्नारायण श्रीमहालक्ष्मी, भूदेवी, नीलादेवी और नित्यसूरियों के संग – श्रीवैकुण्ठ

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पिछले अध्याय से तत्व विरोधी विषय पर आगे चर्चा करेंगे। ऐसे अनेक विषयों को जानने के लिये गहरा ज्ञान होना आवश्यक है जो शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होता है। इसे पूर्ण समझने के लिये इन तत्वों को आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।

  • चित्त और अचित्त जो भगवान के लिये शरीर है, चित्त को देह, इंद्रियाँ, आदि मानना बाधा है। जैसे श्रुति में कहा गया है “जीवध्वारा अनुप्रविष्य” (जीवात्मा द्वारा प्रवेश करना), भगवान अचित्त (अनगिनत निर्विकार पदार्थ) में जीवात्मा के द्वारा प्रवेश करते हैं। जैसे कि कहा गया है “देहेंद्रिय मन: प्राणधिभ्यों अन्य:” – जीवात्मा देह, इंद्रियाँ, मन, प्राण, बुद्धी, आदि से भिन्न हैं, यह सामान्य ज्ञान है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ से प्रारम्भ करते हैं कि जीवात्मा तत्वम का यहाँ पर विस्तृत वर्णन किया गया है। तत्वत्रय में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी चित्त प्रकरणम विषय को विस्तार से समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्या से इस विषय को हम स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। ६ठें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी आत्मा और देह, आदि में बहुत भेदों को समझाते हैं। मुख्य रूप से आत्मा को “मैं” और देह, आदि को “मेरा” ऐसा देखा गया हैं। आत्मा स्वयं के लिये निरन्तर एक वचन महसूस करता हैं (“मैं” – केवल एक) परन्तु स्वयं के देह, आदि के लिये वह अनेक महसूस करता हैं (जैसे शरीर, इंद्रियाँ, मन, आदि)। इससे हम समझ सकते हैं कि देह, आदि से आत्मा भिन्न हैं। ७वें सूत्र में वें एक मुख्य पहलू को दर्शाते है। यहाँ तक की बुद्धिमत्ता पूर्ण दलीलों से इन्हें भी नकार देते हैं, शास्त्रानुसार हमें यह समझना चाहिये कि आत्मा देह, आदि से भिन्न है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वें कहते हैं कि इस सिद्धान्त को नकारना बहुत कठीन है – फिर भी यदि कोई अधिक बुद्धिमान हो ओर ऐसी दलील प्रस्तुत करता हैं जो मैं और मेरा मे जो अन्तर है उसे नकारते हैं परन्तु शास्त्रों द्वारा इसे सरलता पूर्वक प्रमाणित कर सकते हैं कि आत्मा और देह, आदि भिन्न हैं। वें अपने व्याख्या में इस विषय में कई प्रमाण देकर इसे स्थापित करते हैं। अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बहुत ही विश्वास पूर्वक शास्त्रों के आधार पर प्रमाणित करते हैं कि आत्मा के स्पष्ट लक्षणों को कोई भी बुद्दिमत्ता पूर्ण दलील से नकार नहीं सकते हैं।
  • आत्मा केवल ज्ञान है यह समझना और आत्मा का ज्ञान प्रासंगिक संकलन है यह जानकार हैरान होना बाधा है। यह शास्त्र से जाना गया है कि आत्मा ज्ञान स्वरूप है। परन्तु आत्मा को हमेशा ज्ञान का घर मानना चाहिये। आत्मा दोनों ज्ञान और ज्ञानगुणकन (जिसे ज्ञान है) है। अनुवादक टिप्पणी: ज्ञान दो प्रकार के हैं। धर्मी ज्ञान (आत्मा स्वयं ज्ञान है) और धर्म भूत ज्ञान (आत्मा ज्ञान का घर है) हैं। धर्मी ज्ञान वह ज्ञान है जो निरन्तर अपनी मौजूदगी का स्मरण करता है। धर्म भूत ज्ञान वह है जिसके द्वारा हम बाहरी पहलूओं को समझ सकते है। कुछ तर्क शास्त्र जैसे बौद्ध शास्त्र हैं जहाँ आत्मा को केवल ज्ञान ऐसा समझाया गया है और अन्य विशेषताओं को नकारा गया हैं। परन्तु ऐसे तत्व शास्त्र के विपरीत हैं जो आत्मा हीं ज्ञान ऐसा समझाता हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस सिद्धान्त को तत्वत्रय के २६, २७ और २८ सूत्र में समझाते हैं। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुन्दर व्याख्या से समझेंगे। २६वें सूत्र में वें कहते है कि आत्मा ज्ञान का घर हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे एक सुन्दर उदाहरण के साथ समझाते है। जैसे दीप (ज्योति) और प्रभा (प्रकाश) दोनों दीपक के अंग है, दीप प्रकाश का घर हैं। इसी तरह धर्मी ज्ञान और धर्म भूत ज्ञान दोनों ज्ञान हैं, धर्मी ज्ञान (आत्मा) धर्म भूत ज्ञान का घर हैं। वें कई प्रमाणों के साथ बताते हैं कि आत्मा भी ज्ञान का घर है। २७वें और २८वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है “आदि आत्मा केवल ज्ञान है और ज्ञान का घर नहीं है तब हमें कहना चाहिये कि मैं ज्ञान हूँ और न कि मैं जानता हूँ”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है “किसी के बारें में जानना” यह इशारा करता है कि उसे ज्ञान है और इसे प्रत्यक्ष से हीं समझ सकते हैं। वें श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को भी इसी तत्व को स्थापित करने को कहते हैं।
  • स्वाभाविक रूप से निर्भर जीवात्मा को स्वतन्त्र समझना बाधा है। हालाँकि ज्ञान हैं और ज्ञान होना जीवात्मा का स्वभाव है, भगवद शेषत्वम और पारतंत्रयम जीवात्मा के गोपनिय पहलू है। जीवात्मा का स्वयं को स्वतन्त्र समझना सबसे बड़ा पाप है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में समझाया गया है कि सबसे बड़ी चोरी/पाप स्वयं (आत्मा) को स्वतन्त्र मानना और उसके अनुसार कार्य करना – इसे श्रीमहाभारत में ऐसे समझाया गया है “किम तेन न कृतम पापं चोरेण आत्मापहारिणा” – वह जो आत्मा को स्वयं कि सम्पत्ति मानता है वह सभी प्रकार के पाप किया है ऐसा मानना है। स्वयं के बारें में सच्चा ज्ञान का अर्थ समझना यानि स्वयं को जीवात्मा मानना जो भगवान का शेष है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के “अडियेन उल्लान” [8.8.2] पाशुर में अपने पूर्वाचार्य के जीवन कि घटना से समझाया है। श्रीरामानुज स्वामीजी के कालक्षेप गोष्टी में संदेह उत्पन्न होता है – जीवात्मा का मुख्य गुण क्या हैं? क्या वह ज्ञान है या भगवान का दास होना है। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी को इसका उत्तर प्राप्त करने हेतु श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के पास भेजते है। श्रीकुरेश स्वामीजी ६ महिने तक श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कि सेवा करते है और जब अन्त में जब श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी उनके आने का कारण पूछते हैं तो श्रीकुरेश स्वामीजी उन्हें प्रश्न पूछते हैं। उसके लिये श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कहते है “क्योंकि आल्वार कहते है आडियेन उल्लान, जहाँ अड़िएन जीवात्मा को संभोधित करता है और शेषत्वम जीवात्मा का मुख्य गुण हैं”। “अड़िएन” भगवान की दासता को संभोधित करता है – इसलिये श्रीशठकोप स्वामीजी (जिन्हें भगवान ने दिव्य ज्ञान प्रदान किया)  जीवात्मा के सच्चे पहचान को स्थापित करते हैं।
  • जीवात्मा जो भगवान का दास है उसे अन्य किसी का भी दास मानना बाधा है। जीवात्मा स्वभाव से भगवान का हीं दास है। स्वयं को दूसरे का दास मानना बाधा है। यहाँ अन्य का अर्थ अम्माजी या परम भागवत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: केवल भगवान हीं स्वामी हैं अन्य सभी उनके दास है। देवतान्तर का अर्थ अन्य देवता गण। ब्रह्माजी से प्रारम्भ कर इस लौकिक संसार में कई देवता है। यह देवतागण हमारे जैसे जन्म मरण के चक्र में बंधे हुए हैं। परन्तु कुछ पुण्य कर्म के कारण जीवात्मा देवता के जैसे उच्च स्थान पाते हैं। फिर भगवान कृष्ण गीताजी के ८.१६ श्लोक में कहते “आब्रह्माभुवनाल्लोका: …” – ब्रह्म लोक से – सबसे उच्च स्थान से नीचे के स्थान तक निरन्तर जन्म मरण हैं। इसलिये मुमुक्षुओं (जो मोक्ष कि इच्छा करते है) के लिये यह उपदेश किया गया है कि वें केवल भगवान कि पूजा सेवा करें नाकि देवताओं की करें। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी विस्तार से समझाते हैं जब “उ” कार प्रणवम के विषय में समझाते हैं। उकारम स्पष्ट रूप से ज़ोर देकर समझाता है कि जीवात्मा भगवान का एक मात्र दास है। यहाँ ६१वें सूत्र में दूसरों के प्रति दासता को हटा देने का महत्त्व को समझाते हैं। ६२वें सूत्र में वें उदाहरण के साथ समझाते हैं। वें कहते है जीवात्मा का दूसरों के प्रति दासता उसी प्रकार है जिस प्रकार हम यज्ञ आदि में जो कुछ देवताओं को अर्पण करते हैं उसे एक कुत्ते को देते हैं (जिसे देखना भी नहीं और छूना भी नहीं चाहिये)। ६३वें सूत्र में वे कहते हैं कि भगवान के प्रति दासता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं अन्यों के प्रति दासता को दूर करना। ६४वें सूत्र में वें श्रीपरकाल स्वामीजी के नान्मुगन तिरुवन्दादि के ६८वें पाशुर को दर्शाते है कि श्रीवैष्णव कभी भी देवतान्तर की पूजा नहीं करेंगे – “तिरुवडि तन नामम मरन्दुम पुरम तोला मान्दर” – श्रीवैष्णव वें है जो भगवान का नाम भूल सकते हैं परन्तु कभी भी भगवान छोड़ अन्य कि पूजा नहीं करेंगे। अन्त में ६५वें सूत्र में वें कहते हैं कि यह उकारम यह स्थापित करता है कि जीवात्मा स्वयं या किसी का भी दास नहीं है – वह केवल भगवान का दास है। यहाँ अम्माजी और और भागवत जन भगवान के शरण होने के कारण स्वाभाविक स्वामी है। जो भी पूर्णत: भगवान का शरण हुआ है उसे हमारा स्वामी मानना चाहिये।
  • यह न जानना कि जीवात्मा दिव्य युगल जोड़ी का दास नहीं है बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान श्रीमन्नारायण कि मुख्य पत्नी हैं। मिथुनम – युगल जोड़ी। यहाँ भगवान और अम्माजी दिव्य युगल जोड़ी हैं। अनुवादक टिप्पणी: रहस्यत्रयम में पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि अधिक स्तुति करते है। यह इसलिये कि श्रीमहालक्ष्मीजी कि भूमिका स्पष्टता से दर्शाई गयी हैं। द्वय मन्त्र के पहिले खण्ड में श्रीमहालक्ष्मीजी को पुरुषकार भूताई (प्रशंसा करनेवाले अधिकारी) ऐसे समझाया गया है, जो यह सुनिश्चित करती है कि भगवान शरण में आये जीवात्मा को स्वीकार करते हैं। दूसरे खण्ड में यह समझाया गया हैं कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण और माता महालक्ष्मीजी दोनों कि ओर कैंकर्य करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के १६६ सूत्र में यह समझाते हैं कि जब भगवान हीं उपाय हैं तब माता पहिले खण्ड में पुरुषकार हो जाती है और जब भगवान प्राप्यम (लक्ष्य) हैं तब माता दोनों लक्ष्य और जीवात्मा द्वारा की जानेवाले कैंकर्य को बढ़ावा देनेवाली होती हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि जब जीवात्मा उनके प्रति कैंकर्य करता है तब अम्माजी इसे भगवान के समक्ष कई गुणा बढ़ाकर दिखाती है और भगवान का अधिक मुखोल्लास करती हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी १६८वें सूत्र में आगे समझाते हैं कि श्रीलक्ष्मणजी माता सीता और श्रीरामजी का एक साथ कैंकर्य करते हैं। १६९वें सूत्र में वें कहते है ऐसा कैंकर्य होता हैं और आनन्ददायक होता है जब भगवान और अम्माजी साथ में होते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि कैसे श्रीलक्ष्मणजी श्रीरामजी की शरणागति माता सीता के पुरुषकार के द्वारा किये और कैसे श्रीलक्ष्मणजी ने दोनों की सेवा किये। वें एक व्यवहारिक उदाहरण के साथ समझाते हैं – जब एक पुत्र अपने माता पिता दोनों की एक साथ सेवा करता हैं तो वह योग्य है – उसी तरह जीवात्मा दिव्य माता पिता कि सेवा करता है तो वह उसके स्वभाव के लिये अधिक योग्य हैं।
  • जीवात्मा भगवान के भक्तों का दास है यह न समझना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का स्वाभाविक गुण है भगवद दास और पूर्णत: भगवान के आधिन होकर रहना हैं। इससे भी अधिक महत्व – स्वरूप यातात्मयम (सच्चे स्वभाव का तत्व) – भागवत शेषत्वम (भागवतों का दास बनकर रहना)। पेरिया तिरुमोली में श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमन्त्र का तत्व स्वयं भगवान को घोषित किया “निन तिरुवेट्टेळुत्तुम कट्रु नान उट्रदुम् उन्नडियार्क्कडिमै कण्णपुरत्तुरैयम्माने” (तिरुक्कण्णपुरम के प्रिय नाथ! तिरुमन्त्र के तत्व को सिखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं दासों का दास हूँ)। श्रीपरकाल स्वामीजी नान्मुगन तिरुवन्दादि के १८वें पाशुर में दर्शाते हैं कि “एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मट्रवरैच् चार्त्ति इरुप्पार तवम” (भक्तों के प्रति भक्ति भगवान कि भक्ति से भी अधिक महान है)। एत्तियिरुप्पवर – भगवद शेष भूतर – वह जो भगवान के शरण हुआ हो। ऐसे जन जो भगवान के शरण हुये हैं वें अधिक महान हैं। श्रीरामायण में श्रीलक्ष्मणजी और श्रीभरतजी दोनों श्रीराम के शरण हुये थे। श्रीशत्रुघनजी के लिए श्रीभरतजी ही सबकुछ थे। श्रीरामायण में कहा गया हैं कि “शत्रुघनो नित्याशत्रुघन:” (वह जिसने नित्य बाधा को जीता है)। हमारे पूर्वाचार्यों ने समझाया हैं कि “श्रीशत्रुघनजी श्रीरामजी के सुन्दरता और दिव्य गुणों को जीता या अनदेखा कर दिये और श्रीभरतजी कि सेवा किये”। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अवनडियार सिरुमामनीसराय एन्नईयाण्डार”। सिरुमामनीसर – वह जो भगवान की पूर्णत: शरणागति किये हैं जो दीखने में छोटे परन्तु ज्ञान और कार्य प्रणाली में महान हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसे भक्तों को स्वामी ऐसे घोषित करते हैं। जब ऐसे भक्त गण यहाँ विराजमान रहते हैं तो उन्हे अनदेखा कर, कैसे कोई भगवान के चरण कमलों की सेवा कर सकता हैं? जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के लिये भागवत कैंकर्य अधिक योग्य है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ८९वें सूत्र में समझाते हैं कि “उट्रदुम् उन अदियारक्कडिमै एंगिरपड़िये इथिले भागवत शेषत्वमुम अनुसंदेयम” – क्योंकि श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमन्त्र सिखने के पश्चात कहते हैं कि “मैं यह समझ सकता हूँ कि मैं आपके दासों का दास हूँ, नम: पद भागवत शेषत्वम को बताता है”।
  • यह न जानना कि भगवान जो सर्व शरीरि (अन्तर्यामी) है, सर्वेश्वर (सभीको नियंत्रण में करनेवाले) है, बाधा है। यह पहिले ही समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: शरीरि आत्मा है और शरीरम देह है। देह का नियन्त्रक आत्मा है – स्वयं प्रत्यक्षम से हम इसे समझ सकते हैं। जब तक देह के भीतर है तब तक ही देह क्रिया शील है। एक बार नियंत्रण करनेवाली आत्मा शरीर का त्याग कर देती हैं देह मृत और निष्क्रिय हो जाता है। भगवान सभी अस्तित्वों के लिये अन्तरात्मा है। भगवान स्वाभाविक रूप से सब की आत्मा है इसका अर्थ वे सबके नियन्त्रक हैं। अन्तर्यामीत्वम (आत्मा का निवास करने का स्थान) और नियन्तृत्वम / ईश्वरत्वम दोनों साथ साथ चलते हैं।
  • भगवान स्वभाव से स्वतन्त्र है, उनके भक्तों पर उनका आर्विभाव उनकी सर्वोच्च स्वाधीनता / स्वतन्त्रता पर आधारीत है उनके भक्तों पर उनकी निर्भरता निरन्तर है। यह न जानना बाधा है। भगवान सत्यकाम (सभी इच्छा कि पूर्ति करने वाला), सत्य संकल्प (सभी कार्य पूर्ण करने वाला), निरंकुश स्वतन्त्र (अनियंत्रर्णाय ढंग से स्वतन्त्र), आदि माना गया हैं। फिर भी वे आश्रित पक्षपादि (वह जो अपने भक्तों पर अनुग्रह करते है) हैं। जो भगवान के पूर्ण शरणागत हो जाते हैं और उनसे प्रेम करते हैं तो भगवान भी स्वयं को आपको समर्पित करते हैं। क्योंकि यह उनकी इच्छा का परिणाम है यह उनकी स्वतन्त्रता का परिणाम है। यह नित्य है और इसे हम अधिकत्तर अवतारों के समय देख सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सर्वोच्च रूप से स्वतन्त्र है। फिर भी वह स्वयं को ऐसी परिस्थिति में लाते हैं जहाँ वे अपने भक्तों के आधीन है। महाभारत युद्ध के दौरान वे पाण्डवों के दूत बन गये थे। वें अर्जुन के सारथी भी बने। यह सब पाण्डवों के प्रति प्रेम के कारण हुआ जो उनके अनन्य भक्त थे। यह सब उनकी सर्वोच्च इच्छा ही का परिणाम है कि वे अपने भक्तों के प्रति दासता / आश्रित का स्थान लेते हैं। यह गुण उनके अर्चावतार में अधिक स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अपने अर्चकों पर पूर्ण रूप से निर्भर है चाहे अपने प्रसाद, स्नान, वस्त्र, श्रृंगार, आदि के लिये। हमारे पूर्वाचार्यों ने समझाया हैं कि यह उनके सौलभ्य गुण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
  • भक्तों के आधीन रहना यह केवल उनके दिव्य प्रेम का परिणाम है, यह न जानना बाधा है। प्रणायित्वम – भव्य प्यार / लगाव होना। जब किसी के प्रति अधीक प्रेम न हो तब वह अपनी अवस्था के विषय में और किसे प्रेम करना है – नहीं विचार करता है। अनुवादक टिप्पणी: हालाँकि भगवान श्रेष्ठ हैं और जीवात्मा तुच्छ है यह उनके भक्तों के प्रति बहुत दया और प्रेम है वें जीवात्मा के छोटे पन का विचार नहीं करते हैं। वें केवल जीवात्मा में प्रेम देखते हैं और स्वयं जीवात्मा को पूर्ण लगाव के साथ स्वीकार करते हैं। यह गुण जिसमे स्वयं से छोटों के साथ मिलने को सौशिल्य कहते है।
  • यह न जानना कि अपने भक्तों के प्रति ऐसा प्यार केवल श्रीमहालक्ष्मीजी के प्रति प्रेम और लगाव के कारण हैं जो सब की माता है, यह बाधा है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “कोलमलर्प पावैक्कनबागिय एन अनबेयो” – भगवान मुझे अधीक प्रिय हैं क्योंकि वे श्रीमहालक्ष्मीजी के दास हैं और जो आपको अधीक प्रिय है। अनुवादक टिप्पणी: इसके साथ श्रीमहालक्ष्मीजी के गुणों को भी समझाया है। भगवान सर्वोच्च स्वतन्त्र हैं। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान कि दिव्य भार्या हैं जो पूर्णत: उन पर निर्भर है। यह उनकी पुरुषकार के कारण भगवान जो उनकी शरण में आते हैं उनको स्वीकार करते हैं। क्योंकि मनुष्य जो शरण में आता हैं उसके अनगिनत पाप होते हैं और भगवान ऐसे मनुष्य को स्वीकार करने के लिये घबराते हैं। परन्तु अम्माजी यह सुनिश्चित करती हैं कि भगवान की कृपा / करुणा का गुण उनकी स्वतन्त्रता गुण से भी बड़ा है और अम्माजी सुनिश्चित करती हैं कि भगवान जीवात्मा को स्वीकार करते हैं। भगवान का अम्माजी के प्रति अपार प्रेम के कारण जीवात्मा को स्वीकार कर पूर्ण सावधानी से जीवात्मा को देखते हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान को प्रिय है, उनके जैसे सुन्दर हैं, उनके द्वारा भगवान की पहचान होती है, जो कभी उनसे अलग नहीं होती है, जो उनकी पूर्ण दास हैं, उनकी दिव्य मंगलमय पत्नी और सभी जीवात्मा कि माता हैं। यह न जानना बाधा है। यहाँ अम्माजी का स्वभाव स्थापित होता हैं। वें अभिमताई है – वह जो भगवान को बहुत प्रिय है; अनुरूपै – शारीरिक सौन्दर्य में भगवान के समान; निरूपकै – उनके पहचान का एक भाग – उनको श्रिय:पति (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी) ऐसे पहचाना जाता है; नित्यानपायिनी – जो अनन्तकाल तक अभिन्न हैं; शेषभूतै – भगवान का पूर्णत: दास होकर रहना; महिषी – भगवान की पटरानी – श्रुति कहती है “अश्येषाना जागतो विष्णु पत्नी” (वह ब्रह्माण्ड की स्वामी हैं और भगवान विष्णु की पत्नी) – क्योंकी वें एक मात्र भगवान श्रीमन्नारायण की पत्नी हैं वे इस ब्रह्माण्ड की स्वामीनी हो जाती है; जगन माता – ब्रह्माण्ड की माता – क्योंकी भगवान ब्रह्माण्ड में सभी के पिता हैं तो उनकी भार्या सभी की माता हैं। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ श्रीमहालक्ष्मीजी को स्वामी ऐसे समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से मुमुक्षुप्पड़ी के ४४वें सूत्र में समझाते हैं। जब कोई किसी के तिरुमाली में दास होकर रहता है तो उस घर के स्वामी और उस नौकर के मध्य में एक समझौता होता है। परन्तु वास्तव में क्योंकि पूरा दिन घर का स्वामी बाहर रहता हैं तो वह नौकर सारा दिन उस स्वामी के पत्नी की आज्ञा का पालन करता है। इसलिये स्वाभाविक रूप से पति का नौकर पत्नी का भी नौकर हो जाता है। भगवान श्रीमन्नारायण श्रेष्ठ स्वामी है और श्रीमहालक्ष्मी उनकी दिव्य पत्नी। सभी जीवात्मा श्रीमन्नारायण के दास हैं। अम्माजी उनकी श्रेष्ठ और मुख्य पत्नी है इसलिये स्वाभाविक रूप से सभी जीवात्मा अम्माजी के भी दास हैं।
  • हालाँकि अम्माजी भी जीवात्मा है परन्तु वें नित्यसूरिगण, मुक्तात्मा, बद्धात्मा से भिन्न हैं। इसे न जानना बाधा है। सभी जीवात्मा एक ही तत्वों से बने हैं – परन्तु उनके परिस्थिति अनुसार उन्हें नित्य, मुक्त, बद्ध वर्ग में किया गया हैं। बद्ध – हमारे जैसे जो इस लौकिक संसार में बंधे हैं; मुक्त – जो इस लौकिक संसार से भगवान कि कृपा से मुक्त होकर परमपदधाम को प्राप्त करते हैं; नित्य – जो नित्य परमपदधाम में भगवान कि सेवा करते हैं। हालाँकि अम्माजी नित्यसूरियों का हीं एक अंग हैं फिर भी उनसे भिन्न हैं क्योंकि वह भगवान की श्रेष्ठ पत्नी हैं। अनुवादक टिप्पणी: साधारणतया श्रीमहालक्ष्मीजी नित्यसूरियों के वर्ग की एक अंग है। फिर भी भगवान कि दिव्य पत्नी होने के कारण उन्हें जीवात्मा में उच्च माना गया हैं। यहाँ तक की भूदेवी, नीलादेवी और अन्य अनगिनत भगवान की पत्नीयां श्रीमहालक्ष्मीजी के आधीन हैं। अन्य सभी नित्य सूरिगण जैसे अनन्तजी, गरुडजी, श्रीविश्वक्सेन आदि और मुक्तामा सभी श्रीमहालक्ष्मीजी के दास हैं। चतु:श्लोकि के प्रथम श्लोक में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि श्रीमहालक्ष्मीजी कि परमपदधाम में सभी सेवा करते हैं और इस संसार के देवता जैसे ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र, आदि भी सेवा करते हैं – यह सभी इसी कारण से कि वें भगवान श्रीमन्नारायण की प्रिय पत्नी हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी सर्वेश्वरी (सभी कि स्वामी) है जब ईश्वरत्वम (नियन्त्रक स्वभाव) एक से अधिक मनुष्य में नहीं रह सकता है और यह कहना कि उनमें कारणत्वम (सबका कारण)  है जो केवल ब्राह्मण का हीं गुण है कहना बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी के लिये स्वामी होना स्वाभाविक गुण नहीं हैं – परन्तु क्योंकि वें श्रीमन्नारायण की दिव्य पत्नी हैं उसके कारण उन्हें यह गुण प्राप्त है। उसी तरह कारणत्वम (सब कुछ के लिये कारण) यह परमपुरुष का हीं (परब्रह्म) अनूठा गुण है और यह अम्माजी के लिये लागू नहीं हैं। कारणत्वम का अर्थ है जगत व्यापारम में सीधा सह भागिता होना – सृष्टी, स्थिति, संहारम, आदि। अनुवादक टिप्पणी: कभी भी सर्वोच्च तत्व दो नहीं हो सकते हैं। केवल एक ब्रह्म है वों हैं श्रीमन्नारायण। जीवात्मा में अम्माजी सबसे अधिक प्रिय हैं भगवान को क्योंकि वह दिव्य पत्नी है।
  • यह कहना कि श्रीमहालक्ष्मीजी और श्रीमन्नारायण स्वभाव से भिन्न नही हैं और केवल रूप में भिन्न हैं और यह कहना कि भगवद स्वरूप दो रूप (भगवान और अम्माजी) में है बाधा है। क्योंकि अम्माजी जीवात्मा के वर्ग में आती है वह स्वभाव से परमात्मा से भिन्न है। ऐसा न कहना सत्य के अंतर्विरोधी होगा।
  • यह कहना श्रीमहालक्ष्मीजी स्वयं भगवान हैं और कोई अलग नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमहालक्ष्मीजी जीवात्मा के वर्ग की एक हिस्सा हैं और भगवान कि दिव्य पत्नी हैं। इसलिये स्वाभाविक रूप से वें भगवान से कई तरह से भिन्न हैं – सबसे प्रथम – वह हर कार्य में भगवान पर निर्भर हैं। इसलिये श्रीमहालक्ष्मीजी को ईश्वरत्वम, कारणत्वम, आदि से जोड़ने का कोई प्रश्न हीं नहीं आता है जिसे हमने पहिले देखा हैं।
  • अम्माजी में एकही गुण है जब कि वास्तव में वें एक जीवात्मा है जिनमें कई सुन्दर गुण /लक्षण आदि हैं यह कहना बाधा है।
  • भगवान अहम (परमपुरुष) है और अम्माजी अहंता (वह पहलू जिसमे भगवान को विलक्षण ढंग से पहचाना जाता है) है को न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले चर्चा हुई है कि भगवान को विलक्षण ढ़ंग से पहचानते हैं कि वे श्रीमहालक्ष्मीजी के पती हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी अणु स्वरूपम है जो निरन्तर भगवान से जुड़ी हुई है जो विभु स्वरूपम हैं को न जानना बाधा है। क्योंकि अम्माजी जीवात्मा हैं वे एक अनुस्वरूप तत्व हैं। फिर भी क्योंकि वें भगवान से अनपायिनी (अभिन्न) हैं वें निरन्तर भगवान से जुड़ी हुई रहेंगी। यह भगवान की एक विशेष योग्यता है – इसे हम भगवान की अकल्पनीय फिर भी संभवनीय योग्यता समझ सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है [6.10.10] “अगलगिल्लेन इरैयुम एनरु अलर्मेल् मन्गै उरै मार्बा”। यहाँ श्रीशठकोप स्वामीजी अम्माजी के विषय में यह कहकर कहते है कि “अगलगिल्लेन इरैयुम” – मैं आपके वक्षस्थल को एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ूँगी। पुराणों में कहा गया हैं कि जब भी भगवान भूलोक में अवतार लेते है (देव, मनुष्य, त्रियक –पशु, पक्षी, स्थावर –पेड़, पौधे, आदि) अम्माजी भगवान के संग यथोचित्त स्वरूप में अवतार लेती है। इसलिये भगवान किसी भी स्वरूप में हों अम्माजी निरन्तर उनके संग रहेंगी।
  • जिस तरह रसम क्षीराब्धी में सर्वत्र फैला हुआ है उसी तरह अम्माजी भगवान के सभी ओर फैली हुई हैं। जिस तरह खारेपानी के महासागर में नमक व्याप्त है उसी तरह क्षीरसागर में दिव्य स्वाद व्याप्त है। उसी तरह जहाँ भगवान हैं वहाँ अम्माजी अवश्य होंगी। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के ४६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि भगवान सूर्य के समान हैं और अम्माजी सूर्य के किरणों के समान और भगवान पुष्प के समान हैं और अम्माजी उस पुष्प कि सुगन्ध की तरह हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा बताये अनुसार कहते हैं कि जैसे पुष्प और सुगन्ध एक साथ रहते हैं और अलग नहीं हो सकते हैं वैसे ही भगवान और अम्माजी भी अभिन्न हैं।
  • भगवान के साथ अम्माजी का रहने का कारण यह हैं कि वें अपने पुरुषार्थ द्वारा जीवात्मा को भगवान तक पहुँचाने में निरन्तर सहायता करती हैं। यह न जानना बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान के साथ निरन्तर रहकर भगवान को जीवात्मा जो कभी भी किसी भी समय भगवान के निकट आता है उसको स्वीकार करने में सहायता करती हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तत्व द्वय महामन्त्र में बहुत ही सुन्दरता से समझाया गया है। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि “श्री” यानि जो जीवात्मा को सुनते हैं और भगवान तक उनकी प्रार्थना पहुँचाते हैं। वें आगे समझाते हैं कि जीवात्मा भगवान के पास कभी भी जा सकते है। और यदि अम्माजी उस समय उनके निकट न होती तो वें जीवात्मा के असंख्य पापों को गिनाकर अस्वीकार कर देते। ऐसी परिस्थिति से बचने के लिये श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान श्रीमन्नारायण के साथ रहती हैं। पहले के पाशुर में जो कहा हैं “अगलगिल्लेन” उसमें विस्तार से समझाया गया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि “जैसे माता सीता विवाह के पश्चात अपने पिता के घर नहीं गई और जैसे मुक्तात्मा इस संसार में फिर नहीं आते है”, अम्माजी भी भगवान को छोड़ने का विचार भी नहीं करती हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी के भगवत स्वरूप को श्रिय:पति की तरह प्रमाणित करने के लिये कार्य में लेना चाहिये, यह न जानना बाधा है। जिस तरह श्रीमहालक्ष्मीजी को अपूर्व ढंग से विष्णुपत्नी के रूप से पहचानते हैं उसी तरह श्रीमन्नारायण को भी अपूर्व ढंग से श्रिय:पति के रूप से पहचानते हैं – हमें इसे दृढ़तापूर्वक समझना चाहिये।
  • भगवान स्वाभाविक रूप से ज्ञान और आनन्द से भरे हैं, सभी दोषों को नाश करनेवाले, सभी पवित्र गुणों के भण्डार, तीनों प्रतिबंधों (समय, स्थान और वस्तु) के नियंत्रण में न रहना, विभु (महान, सब में व्याप्त) है, निरंतर रूप से सृजन, भरणपोषण, विनाश के चक्र द्वारा आनंदित होना हालाँकि इस में उनकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं है और किसी से कुछ अपेक्षा भी नहीं हैं। यह सब न मानना बाधा है। इससे प्रारम्भ कर भगवत स्वरूप को विस्तार से समझाया गया है। जैसे श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं कि भगवत स्वरूप उणरनलम है। उणर ज्ञानम – ज्ञान प्रतिभा और नलम – आनंदम। उनके लक्षण सभी दोषों के विपरीत हैं और दूसरों के अन्दर से इन दोषों का नाश करनेवाले हैं। वें कई पवित्र गुणों से परिपूर्ण है। वें स्थान, समय और वस्तु के नियंत्रण में नहीं है। इसका अर्थ वे सर्वव्यापी है, निरन्तर सभी स्वरूप / पहलुओं में है। अपनी सही गुण के कारण वे सर्वव्यापी हैं और इस गुण को “विभु” कहते हैं। वे अवाप्तसमस्थाकामन है – वह जिसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति हो गयी है और उन्हें न ही कोई नयी इच्छा पूरी करनी है। ऐसे भगवान जो सभी चीजों से पूर्ण हैं – सृजन, भरण, पोषण व विनाश को एक खेल की तरह करने में व्यस्त हैं। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है कि “इंबुरुम इव्विळैयाट्टुडैयान्” – उनके लिये सब कुछ एक खेल की तरह है।
  • भगवान नित्य विभूति में तिरुमामणि मण्डप (हीरे जवाहरात से जड़ा हुआ सभा भवन) में आदिशेष के दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। वे वहाँ अपनी दिव्य पत्नियों के साथ विराजमान हैं जो भगवान के साथ ही बहुत प्रफूल्लित और तेजोन्मय हैं। वें वहाँ से हीं नित्य विभूति और लीला विभूति दोनों पर शासन करते हैं। वें नित्यसूरिगण जैसे श्रीअनन्तजी, श्रीगरुड़जी, श्रीविश्वक्सेनजी, आदि कि सेवा का आनन्द लेते हैं जैसे समझाया गया है “सोष्नुते सारवान कामान”। फिर भी संसार में दु:खी आत्मा कि सहायता करने के लिये तथा जो भगवान की पूजा करते हैं आर्शिवाद देने उनके कार्यपूर्ति के लिये परमपदधाम से क्षीराब्धी में व्यूह वासुदेव के रूप में अवतार लेते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान के पाँच भिन्न स्वरूप (परत्वाधी पंचकम) को विस्तृत रूप से समझाया गया है। इसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रंथ में विस्तृत रूप से समझाया गया है जिसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा दिये गए व्याख्या में भी अध्ययन किया जा सकता हैं। यहाँ पर हम भगवान के परत्व स्वरूप जिसे हम पर वासुदेव के रूप में परमपद में दर्शन कर सकते हैं समझाया गया है। परमपद एक शुद्ध सत्वम से भरा हुआ महल है जिसे हम मण्डप, गोपुर, आदि कह कर व्यक्त करते हैं। यह हम पहिले भी देख चुके हैं। सम्पूर्ण परमपद आनन्द से परिपूर्ण है और भगवान ही उसके एक मात्र सर्वश्रेष्ठ उपभोक्ता हैं और सभी नित्य सूरिगण, मुक्तात्मा इसे अच्छी तरह समझते हैं और उसके अनुसार अपना कैंकर्य करते हैं। पर वासुदेव से अगले व्यूह वासुदेव का प्राकट्य होता है। तीन और स्वरूप – संकर्षण, प्रध्युम और अनिरुद्ध व्यूह वासुदेव से प्रगट होते है। व्यूह वासुदेव में भगवान सामान्यतया क्षीराब्धी में विराजमान होते हैं। यहाँ भगवान अपने भक्तों की सहायता के लिये रहते हैं। सभी देवता ब्रह्म से प्रारम्भ कर अपनी तकलीफ को दूर करने हेतु यहीं आते हैं।
  • संसारी जीवात्मा जो अज्ञानता से ढके हैं उनके उत्थान के लिये स्वयं भगवान कई रूप जैसे मानव, आदि धारण करते हैं और जो साधारण मानव की तरह दु:ख से गुजरते हैं। परम और व्यूह स्वरूप के पहिले यहाँ से प्रारम्भ कर विभव, अर्चावतार और अन्तर्यामी स्वरूपों को समझाया गया हैं। क्षीराब्धीनाथन अलग अलग लोकों में अलग अलग स्वरूप में अलग अलग लक्ष्यों को पूरा करने के लिये जैसे साधु परित्राणम (सही लोगों कि रक्षा करना), धर्म संस्थापनम (धर्म कि रक्षा करना) और पाप का नाश करने के लिये अवतार लेते हैं। अति प्राचीन काल से इस संसार में जीवात्मा जन्म मरण के चक्र तड़प रहा हैं – इसे निद्रावस्था (अज्ञानता) कहते हैं। वह उन्हें उठाते हैं और कई रामकृष्णादि अवतार लेकर उन्हें उत्तेजित करने का कार्य करते हैं। हालाँकि साधारण मनुष्य कि तरह अवतार लेकर भगवान भी सुख और कष्ट को सहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: विभवम – अवतार। अवतारम का अर्थ नीचे अवतरित होना – स्वयं नीचे आना। भगवान समय, स्थान और वस्तु से बंधे हुए नहीं हैं। परन्तु कई अवतार लेकर नीचे आते हैं और वे स्वयं को विशिष्ट समय (जैसे श्रीराम त्रेता युग में थे), स्थान (श्रीराम अब अयोध्या में है) और उद्देश (भगवान श्रीराम के रूप में है) के आधीन हो जाते हैं। भगवान के नैच्छानुसंधान के पहलू को आचार्य और आल्वारों ने बहुत प्रशंसा किये हैं। यहाँ अवतार को दो मुख्य वर्ग में बाँटा गया है – मुख्यावतार – भगवान स्वयं भिन्न भिन्न रूप में प्रगट होते हैं और गौणावतार – भगवान अपने कुछ विशिष्ट गुण / शक्ति को जीवात्मा को प्रदान कर कुछ विशिष्ट कार्यों की पूर्ति के लिये भेजते हैं। मुमुक्षु मुख्यावतार कि पूजा करते हैं और गौणावतार कि पूजा मुमुक्षु नहीं करते हैं।
  • यह देखना कि उनके इच्छा विरुद्ध उनका कोई पीछा तो नहीं कर रहा है वें स्वयं को अन्तर्यामी की तरह छुपाने की कोशिश करता है जैसे किसी ने भी नहीं देखा हो। श्रीसहस्रगीति के पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं “करन्तसिलिदन्तोरुम इदंतिगल पोरुल तोरूम करन्थेंगुम परंतुलन” – जो सर्व व्यापी है – सब जगह व्याप्त रहना और श्रीसहस्रगीति के पाशुर में “कट्किली” (जो हमारे नेत्रों से नहीं दीखता है) – भगवान अन्तर्यामी का रूप धारण करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: अन्तर्यामी भगवान का एक पहलू है जिसमें भगवान प्रत्येक अणु कण में रहते हैं और एक कणों की क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं। भगवान सचेतन व निर्विकार दोनों में व्याप्त हैं और उनका नियंत्रण करते हैं।
  • ऐसे सर्वोच्च भगवान जो अर्चा स्वरूप धारण करके दिव्य देश व अन्य मंदिरों में भिन्न भिन्न मुद्राओं में जैसे खड़े, शयन, बैठे, आदि रहते हैं जैसे मानों एक राजा किसी बगीचे में विश्राम कर रहा हो और उसके दासों से उसकी सेवा हो रही हो। इसे न मानना बाधा है। यहाँ जैसे एक चोर को पकड़ने के लिये पूरे इलाके को पुलिस घेर लेती है भगवान भी जीवात्मा के हृदय को पकड़ने के लिये चारों ओर से मंदिरों में भिन्न भिन्न स्वरूप को धारण करते हैं। और अर्चावतार भगवान अपने प्रसाद, तिरुमंजन, वस्त्र, शयन, आदि सबके लिये अपने अर्चकों पर निर्भर रहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देशों को “उगन्तु अरुलीन निलंगल” कहते हैं – जीवात्मा के उद्धार के लिये तीव्र इच्छा के कारण भगवान द्वारा आधिकृत स्थान हैं। अर्चावतार भगवान दिव्य देशों, अभिमान स्थल, गाँव, शहर, मन्दिर, मठ, तिरुमाली, आदि में भगवान का आर्विभाव होता है, यह भगवान का श्रेष्ठ सौलभ्य गुण है। वें इस भूतल में ऐसी जगह अवतरित होते हैं जो स्थान सबके लिये सुलभ है, अपने सौन्दर्य द्वारा सबको आकर्षित करते हैं। जो भाग्यशाली हैं वे उनके वैभव को जानते हैं और भगवान के प्रति अपने विश्वास को दृढ़ आत्म विश्वास में विकसित कर भगवान का निरन्तर कैंकर्य से अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
  • परत्वम (परवासुदेव स्वरूप) यह जीवात्मा (नित्य, मुक्त, बद्ध) के हर वर्ग के नित्यसूरि व अवतार के आनन्द के लिये हैं। परमपदधाम में भगवान का आनन्द केवल नित्यसूरि व मुक्तात्मा हीं प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु विभव और अर्चावतार के समय इस संसार के सभी जीवात्मा देख भी सकते हैं और आनन्द भी प्राप्त कर सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह एक मनोहर पहलू हम देख सकते हैं कि अर्चावतार भगवान का आनन्द और सेवा नित्यसूरिगण भी करते है। उदाहरण के लिये श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी “इन ओलिविल कालम” पाधिगम में दर्शाते हैं कि नित्यसूरिगण भी परमपदधाम से तिरुमला आकर भगवान श्रीनिवास की सेवा करते हैं। परन्तु जो इस संसार में बंधा है (देवता, ऋषि, मनुष्य, आदि) इस सांसारिक शरीर और वस्तु के लगाव में वों परमपदधाम के अन्दर जाने का विचार भी नहीं कर सकते हैं – केवल भगवान कि कृपा से वह परमपदधाम में प्रवेश कर सकता हैं।
  • मुख्यावतार को भगवान जिस विशिष्ट रूप आदि में अवतरित हुये थे उसका सिर्फ अवशेष मात्र समझना बाधा है। मुख्य अवतार में भगवान कि श्रेष्ठता पूर्ण स्पष्ट प्रगट होती हैं। हमें भगवान को सिर्फ मत्स्य, कछुवा, वराह, मनुष्य, आदि नहीं मानना चाहिये। ऐसे रूप लेने के समय भी उन्होंने अपनी श्रेष्ठता बनाये रखे जैसे पुण्डरीकाक्षत्वम (जैसे सुन्दर कमल नयन), आदि सभी समय में स्पष्ट हो जाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान प्राणी, मानव, आदि का मिलता हुआ स्वरूप धारण किया हैं इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वे भी नश्वर हैं। जो भी स्वरूप हो वह दिव्य और सांसारियों से भिन्न हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाते हैं कि ऐसे स्वरूप में शारीरिक तृटियों को देखना स्वयं में भगवद अपचार हैं।
  • गौणावतारम को पूजनीय मानना बाधा है। गौणावतारम में आवेश अवतार (भगवान के उच्च शक्तियों को कुछ जीवात्माओं पर प्रभाव डालना) शामिल है जैसे श्रीपरशुरामजी, श्रीकार्तवीर्यार्जुन, आदि। यह अवतार मुमुक्षुओं द्वारा पूजनीय नहीं हैं। उन्हें केवल भगवान के अवतार हैं इसलिये सम्मान करना चाहिये। श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ५६वें पाशुर “कोक्कुल मन्नरै मूवेलुकाल” के व्याख्या में हम देख सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान अपनी कुछ शक्तियां कुछ जीवात्माओं को देते है ताकि कुछ निश्चित कार्यों को कर सके परन्तु जरूरी नहीं ऐसे जीवात्मा पूर्ण रूप से सात्विक गुणों के हो, मुमुक्षुओं को इनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह प्रश्न एक व्याख्या में उठाते हैं और समझाते हैं कि ऐसे अवतार पुरुषों को पूर्ण मर्यादा देनी चाहिये उनके द्वारा किये गये कार्य के लिये परन्तु पूजा नहीं करनी चाहिये। वें अन्य आल्वारों के पाशुरों को दर्शाते है जो परशुरामजी कि स्तुति अपने पाशुरों में करते हैं।
  • अर्चावतार भगवान को असमर्थ समझना बाधा है। अर्चावतार रूप में भगवान कई सन्निधियों में विराजमान रहते हैं, वें प्रतिज्ञा किये हैं कि वें पूर्ण रूप से अपने अर्चक पर निर्भर रहेंगे। यह उनकी प्रतिज्ञा को उनकी असमर्थतता नहीं समझनी चाहिये। हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते हैं कि भगवान की सर्वोच्चता पूर्ण रूप से अर्चावतार स्वरूप में भी हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम यह पहिले भी देख चुके हैं कि भगवान कि इच्छा हैं कि वें अर्चा स्वरूप में रहकर सबकी उन्नति करें। क्योंकि भी वें सीधे किसी से वार्तालाप नहीं करते हैं और अपनी इच्छा को प्राकृतिक ढंग से व्यक्त करते हैं, इसलिये हमें यह नहीं विचार करना चाहिये कि वे असमर्थ हैं। कई उदाहरण हैं जहाँ अर्चावतार भगवान महान भक्तों से वार्ता करते हैं। श्रीवरदराज भगवान का निरन्तर श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से बात करना यह एक इतिहास का आधारीत तथ्य है।
  • अपने आचार्य में भगवान के अवतार की तरह आस्था नहीं रखना बाधा है। जैसे कहा गया है “आचार्यास स हरी: साक्षात” हमें यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि आचार्य स्वयं भगवान के अपरावतार हैं। भगवान के पाँच प्रकारम में आचार्य को छठा स्वरूप समझा गया है। अनुवादक टिप्पणी: इसे समझने के लिये “अन्तिमोपाय निष्ठा” (http://ponnadi.blogspot.in/p/anthimopaya-nishtai.html) पढना चाहिये।
  • अवतार परत्वम से उच्च है। यह न जानना बाधा है। परमपदधाम में केवल उनकी श्रेष्ठता ही सर्वत्र दिखाई देती है। परन्तु जब भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, आदि का अवतार लेते हैं तो उनके सभी दिव्य गुण चमकते हैं। इस तरह हम परत्वम से अधिक अवतार की महानता समझ सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: दु:खी जीवात्माओं की सहायता के लिये भगवान इस संसार में बिना किसी कारण के दया दिखाते हुये अवतार लेते हैं। इसलिये ऋग्वेद में कहा गया हैं कि “स उ श्रेयान भवति जायमान:” – भगवान जब इस संसार में अवतार लेते हैं तो वें अधिक प्रशंसनीय हो जाते हैं। और जब वें परमपदधाम से इस संसार में अवतरित होते हैं वे अपनी किसी भी दिव्य गुणों को कम नहीं करते हैं और उसी दिव्य स्वरूप (जीवात्माओं के भौतिक देह के तत्वों से भिन्न) में प्रगट होते हैं। इस तत्व को श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते हैं – “आधियम चोटी सोदि उरुवै अन्गु वैत्तु इंगुप पिरन्तु” – भगवान जो नित्य है इस संसार में अपने सबसे अधिक मोहित करनेवाले और दिव्य स्वरूप जिसे हम परमपदधाम में देखते है में अवतरित होते हैं।
  • आचार्य के दिव्य शरीर / स्वरूप को भौतिक मानना, यह समझाने के पश्चात कि वें भगवान के अवतार है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना आवश्यक हैं कि आचार्य हीं शिष्य को भगवान के चरण कमलों तक पहुँचा सकते हैं। अपनी महान अनुकम्पा से ही आचार्य सही ज्ञान को अपने उपदेशों और व्यवहार द्वारा सबको समझाते हैं। ऐसे आचार्य के शिष्यों को सबसे अधिक आदर और स्तुति करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-42.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४१

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४०)

७२) तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – 2

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – श्रीभूतपुरी

पिछले अध्याय से हम तत्व विरोधी विषय पर आगे की चर्चा करेंगे। ऐसे अनेक विषयों को जानने के लिये हमें गहरा ज्ञान होना जरूरी है जिसे हम शास्त्रों के सुव्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त कर सकते हैं। विषय कि सम्पूर्ण वह गहरी ज्ञान के लिये आचार्य के मार्गदर्शन में इन सिद्धान्तों का अध्ययन करना चाहिये।

  • पदार्थ का परिवर्तन अपने ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड से बाहर दूसरे ब्रह्माण्ड में चेतन की इच्छा से होता है, यह न समझना बाधा है। सभी अचित्त हमारे और दूसरे ब्रह्माण्ड में जो हमारे ब्रह्माण्ड से बाहर हैं (सभी भांति के ब्रह्माण्ड को मिलाकर लीलाविभूति – संसार कहते हैं) में जो परिवर्तन होता है वह परम चेतन (भगवान – श्रीमन्नारायण) की इच्छा से होता है। चांदोग्य उपनिषध कहता है “तधऐक्षत – बहुस्याम प्रजायेयेती” – मुझे मेरे रंग बिरंगे आविर्भाव को देखने दो। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टी जो भगवान के सर्वोच्च चेतानन है (ज्ञान पुरुष) भगवान के संकल्पानुसार होती है। श्रुति कहती है “नित्यो नित्यानाम चेतनश चेतनानाम” – शाश्वतों में शाश्वत और ज्ञानियों में ज्ञानी। अन्य कई स्थानों में “बहु श्याम” से सम्बोधित करते हैं और प्रमाणित करते हैं कि सृष्टि भगवान के संकल्प का परिणाम है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “मुन्नीर् ज्ञालम पडैत्त एम मुगिल्वन्णने” – जो बादल कि तरह है (शाम वर्ण और दयालु स्वभाव)! – आपने इस ब्रह्माण्ड कि रचाना किये है जिसमें तीन प्रकार के जल हैं। यहाँ पर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी की दैविक भावनाओं को दर्शाते हैं। वें कहते हैं कि भगवान द्वारा इस ब्रह्माण्ड कि रचना के लिये श्रीशठकोप स्वामीजी उनको धन्यवाद देते है, इसलिये सभी जीवात्मा (स्वयं के सहित) को उपयुक्त शरीर, इंद्रियाँ, आदि हैं जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं और अन्त में वे ऊपर उठाये जाते हैं। फिर भी श्रीशठकोप स्वामीजी दर्शाते हैं कि ऐसा अवसर व्यर्थ हो जाता है क्योंकि इस शरीर का हम भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये ही प्रयोगे में लेते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि केवल भगवान की दैविक ईच्छा ही है जो इस सृजन के द्वारा जीवात्मा की उन्नति में सहायता करती है।
  • यह न मानना कि ब्रह्माण्ड परिणाम अद्वारक भगवद संकल्प अधिनम (भगवान के दिव्य ईच्छा के अधीन है) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहले समझाया गया है यहाँ दो प्रकार की सृष्टी है – अद्वारक सृष्टी और सद्वारक सृष्टी। अद्वारक सृष्टी सूक्ष्म द्रव्य से पूर्ण द्रव्य के रूप में बदलाव है और यह सीधे भगवान द्वारा किया जाता है। इसके पश्चात जो रंग बिरंगी स्वरूप आदि का उत्पत्ति स्वयं भगवान ब्रह्माजी, आदि द्वारा उत्पन्न करवाते हैं। उसी तरह विनाश के समय भगवान पहिले रंग बिरंगी स्वरूप का विनाश रुद्र, अग्नि, आदि के द्वारा करवाते हैं। अन्त में वें सभी पदार्थ को ग्रहण करते है और उसे सूक्ष्म पदार्थ में परिवर्तित करते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है।
  • यह न जानना कि सभी तत्व भगवद आत्मकम (भव्य आत्मा की तरह वास करना जो भगवान द्वारा सर्व व्यापी है) हैं वाधा है। नारायण सूक्त से यह स्पष्ट है कि “अंतर बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणस्थित:” – नारायण सबके अन्दर और बाहर व्याप्त हैं और सबको एक साथ बाँधकर रखते हैं। “सर्वभूतांतरात्मा” सभी के तत्त्वों के अन्दर निवास करनेवाली आत्मा। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्म (भगवान) इस संसार में रहनेवाले सभी जीवों की आत्मा में निवास करते हैं। भूत शब्द का मूल है “भू सततायाम” – वह जिसका अस्तित्व है। जिसका भी अस्तित्व है वह भगवान द्वारा है। यह भगवान की अंतर्यामी रूप में विध्यमानता है जो पदार्थ के अस्तित्व को बनाये रखते हैं। शास्त्र कहते हैं “यस्य आत्मा शरीरम, यस्य पृथ्वी शरीरम, …” – जीवात्मा भगवान के लिये शरीर है, पृथ्वी भगवान के लिये शरीर है, आदि। यहीं तत्व श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “परंध तण परवैयुल नीर तोरूम परंधुलन परंध अण्डम इधेन नील विसुम्बु ओलिवर करंध सील इडं थोरूम इडं थिगल पोरुल थोरूम करन्धेंगुम परंधुलन ईवै उण्ड करने” – भगवान सागर के ठण्डे जल के छोटी से बूँद में जिस तरह आराम से व्याप्त हैं उसी तरह इस विशाल ब्रह्माण्ड में भी स्वयं आराम से निवास करते हैं।
  • सभी तत्व हमारे लिये अनुकूल हैं क्योंकी उनमें स्वयं भगवान व्याप्त है इसलिये वें अनुकूल हीं हैं।
  • कुछ तत्व देखने में हमारे लिये अनुकूल नहीं होते हैं क्यों कि स्वयं को उस वस्तु की तरह संभ्रम समझते हैं यह बाधा है। यह केवल हमारी अज्ञानता दशा है कि हम अपने शरीर को ही आत्मा मानते हैं और यह विचार करते हैं कि वह हमारे प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: यह और इससे पहिले कि बात एक दूसरे से सम्बंधीत है। इसे थोड़ा हम समझें। जिसने जीवात्मा के लक्षणों को सही तरीके से समझा है, वह यह समझात है कि प्रतिकूल रूप से जीवात्मा सुखद है। यह तत्व तत्वत्रय के ७३ से ७६ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने बहुत ही सुन्दरता से समझाया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपनी व्याख्या में बड़े विस्तार से समझाया हैं। ७३वें सूत्र में कहते है कि सच्चे ज्ञान को पूर्ण विस्तार से देखेंगे तो लगेगा कि सुख खुशी का ही परिणाम है और यह जीवात्मा के सही लक्षणों के अनुकूल है। अगले सूत्र में वे समझाते हैं कि विष, हथियार, आदि दिखने में प्रतिकूल लगते हैं क्योंकी हमें शरीर और आत्मा के विषय में भ्रम है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि किसी को भी विष, आदि से ३ कारणों से भय लगता है – अ) यह समझना कि शरीर और हम स्वयं एक ही हैं और यदि कोई शरीर को प्रभावित करती है तो हमें स्वयं को भी प्रभावित करती है; आ) हमारे स्वयं के कर्म जो विचारों की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और इ) यह सच्चा ज्ञान न होना की विष, शस्त्र, आदि में वही भगवान व्याप्त हैं जो स्वयं में और शरीर में व्याप्त हैं। अगले सूत्र में वें समझाते हैं कि क्योंकि सभी तत्वों में भगवान व्याप्त हैं तो स्वाभाविक रूप से वे सहायक ही होंगे और उन्हें प्रतिकूल समझना यह अवधारणा संयोगवश ही है। इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई प्रमाण दिये हैं। अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। ७४वें सूत्र में वें कहते हैं “यदि कोई वस्तु अपने लिये अनुकूल है उसके लिये कोई दूसरा कारण भी हो सकता है (वह कारण जो भगवान में व्याप्त है उसे छोड़), एक निश्चित समय में वहीं चन्दन का लेप, पुष्प, आदि, किसी के लिये अनुकूल हो सकते हैं लेकिन कोई दूसरी जगह या समय में उसी के लिये यह प्रतिकूल हो सकती है या किसी ओर के लिये उसी स्थान या समय में पदार्थ प्रतिकूल हो सकती है – यह ऐसा नहीं होना चाहिये”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे अच्छी तरह समझाते हैं। किसी व्यक्ति के लिये चन्दन का लेप गर्मियों में अनुकूल है परन्तु वहीं चन्दन का लेप उसी व्यक्ति के लिये ठंड में प्रतिकूल है। उसी तरह एक तंदूरस्त व्यक्ति को गर्मियों में चन्दन का लेप अनुकूल रहता है लेकिन उसी गर्मी के मौसम में यदि कोई दूसरे व्यक्ति को बुखार है उसके लिये चन्दन का लेप प्रतिकूल हैं। इसलिये चन्दन के लेप का ठण्डक का लक्षण स्वयं यह तय नहीं कर सकता है कि वह किसी के लिये अनुकूल है या नहीं – परन्तु यह जिस व्यक्ति के शरीर को लगाना है उसके शरीर कि दशा तय करती है। इसलिये सच्चा अनुकूल चन्दन के लेप में व्याप्त है और कल्पित अनुकूल लक्षण उसके शरीर के सहयोग पर आधारीत है। और जब किसी को सही जानकारी हो जाती है कि यह शरीर भगवान का है – उस पर भगवान की कृपा होगी चाहे वे किसी भी शारीरिक अवस्था में क्यों न हो।
  • यह न जानना कि नित्य विभूति नित्य है भगवान के नित्य इच्छा के कारण – बाधा है। नित्य विभूति – श्रीवैकुण्ठ। इसके विपरीत लीला विभूति जिसका इस भौतिक क्रिया के एक हिस्से के रूप में निरन्तर सृजन और विनाश होता रहता है और जो बिना किसी भौतिक बदलाव के निरन्तर है उसे नित्य कहते हैं। इसका मूल भूत कारण भगवान का संकल्प है। अनुवादक टिप्पणी: नित्य विभूति – परमपदधाम के लक्षणों को पहिले कई ग्रन्थ में समझाया गया है। विष्णु सूक्तम कहता है “तद विश्णोर परमं पदम सदा पश्यंती सुरय:” – भगवान विष्णु के श्रेष्ठ महल में निरन्तर नित्य सूरिगण इनका दर्शन करते हैं। लिंग पुराण कहता है “वैकुंठेतु परे लोके … आस्ते विष्णुरचींत्यात्मा” – वैकुण्ठ में भगवान श्रीमन्नारायण और अम्माजी के सेवा कई भक्त करते हैं। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न में वैकुण्ठ का बड़ी सुन्दरता से वर्णन करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीवैकुण्ठ गध्य में भी इसको समझाते है। यह परमपदधाम को भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य और आध्यात्मिक तिरुमाली ऐसा समझाते हैं।
  • अप्राकृत अचित्त (पवित्र पदार्थ) में बदलाव शुद्ध रूप से भगवान की ईच्छा के आधार पर होता है यह न जानना बाधा है। अचित्त जिसे परमपद में देखते है वह उसी तरह इस भौतिक संसार में नहीं दिखता है। यह पवित्र पदार्थ है जो शुद्ध सत्वम हैं। भगवान के इच्छानुसार वह कई रूप धरण करता हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में विस्तार से परमपदधाम के तत्वों को समझाते हैं। इसे सही आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।
  • पवित्र पदार्थ में सूक्ष्म और स्थूल अवस्था जो इस भौतिक संसार में पाँच तत्वों से है इसे न समझना बाधा है। यह पवित्र पदार्थ पंच उपनिषध (जैसे भौतिक संसार में यह पदार्थ पाँच तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश से बने है) से बने हैं ऐसा कहा गया है। इसलिये वे जैसे भौतिक संसार में दिखते हैं वे वैसे पदार्थ नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: सांसारिक पदार्थ जीवात्मा के सही लक्षणों को ढक देता हैं और अज्ञानता से जीवात्मा को उत्तेजित करते हैं। परन्तु परमपद के दिव्य पदार्थ ज्ञान बढ़ाने में सहायक होते हैं और जीवात्मा जो वहाँ हैं इनके लिये अधिक सुख वह आनन्द देते हैं।
  • भगवान के दिव्य रूप इन दिव्य पदार्थ (जो पंच उपनिषध से बनी है) से बनी है यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया भगवान के दिव्य रूप पाँच विभाग के भीतर समझाये जाते हैं – पर, व्यूह, विभव, अर्चा, अन्तर्यामी। इन सभी स्थितियों में जहाँ कहीं भी भगवान का स्वरूप है वहाँ हमें यह समझना आवश्यक है कि यह सभी भगवान के दिव्य पदार्थ से बना है। यहाँ से प्रारम्भ कर हमारा ध्यान ईश्वर तत्व, उनके रूप और दिव्य सहायक पर केन्द्रित होता है।
  • भगवान के यह रूप उनके ६ गुणों को दर्शाते हैं, यह न जानना बाधा है। भगवान के यह सभी स्वरूप भगवान के दिव्य पदार्थ से बने हैं जो भगवान के सच्चे गुणों को दर्शाते हैं और अपनी ज्ञान को बढ़ाते हैं। मुख्य ६ गुण हैं ज्ञान, बल, वीर्य, ऐश्वर्य (धन, सभी को नियंत्रण करने योग्य), शक्ति, तेज। शेष भगवान के गुण इन्हीं मुख्य गुण से उत्पन्न होते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान का अक्षरश: अर्थ है वह जो इन ६ गुणों से परिपूर्ण हैं। इसलिये श्रीमन्नारायण ही हैं जो इन ६ गुणों के पूर्ण रूप से स्वामी हैं वे ही एक मात्र योग्य है जिन्हें भगवान कह सकते हैं। और किसीको जिन्हें भगवान कहते हैं (श्रीपराशर, श्रीव्यास, आदि) यह उनके प्रशंसा मात्र के लिये – सत्य में नहीं – क्योंकि दूसरे किसी में भी यह ६ गुण नहीं पाये गये हैं। भगवान के दिव्य स्वरूप उनके गुणों को स्पष्ट करते हैं।
  • हालाँकि भगवान और नित्य सूरिगण दोनों एक श्रेणी में हैं, फिर भी भगवान का स्वरूप एक विशेष है जो उनके तेजस्वी गुण के कारण है। यह न जानना बाधा है। श्रीअनन्त, श्रीगरुड़जी, श्रीविश्वकसेनजी, आदि नित्य मुक्त हैं। इनमे कोई भेद नहीं जैसे सांसारिक दुनिया के वर्णों में देखा जाता है। उनके स्वरूप भी विशेष हैं। क्योंकि उनका स्वरूप दिव्य पदार्थ से बना है उनका रूप उनके द्वारा किये गये कैंकर्य पर आधारित है। उदाहरण के लिये श्रीअनन्त शेष रूप धारण करते हैं, श्रीगरुडजी पक्षी का रूप और श्रीविश्वकसेनजी  मनुष्य रूप धारण करते हैं। यहाँ गजमुख (हाथी के सिर वाला मानव), सिंहमुख (सिंह के सिर वाला मानव), पुरुष नौकर, महिला नौकर, आदि। परन्तु हमें यह जानना चाहिये कि संसार कि तरह परमपदधाम में स्त्री-पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: विशिष्ट कैंकर्य के लिये नित्यसूरि विभिन्न रूप धारण कर सकते हैं और करते भी हैं। जैसे हमने पहिले देखा हैं परमपद में सभी पदार्थ दिव्य हैं और जैसे कि हम भौतिक संसार में देखते है वे पदार्थ बहुत ही भिन्न हैं। यह भी जानना आवश्यक है कि नित्यसूरि भगवान से स्पष्ट रूप से अलग हैं – जैसे नित्यसूरि जीवात्मा हैं और भगवान परमात्मा हैं। यह भी भगवान की दिव्य इच्छा है जिसके कारण नित्यसूरि अनन्तकाल तक मुक्त हैं। चांदोज्ञ उपनिषद में बताया गया है कि भगवान का स्वरूप तेजोन्मय बहुत ही प्रफुल्लित और आश्चर्य चकित करनेवाला स्वर्णिय स्वरूप है।
  • यह न जानना कि भगवान के रूप उनके अवतार के समय परमपदधाम में जो दिव्य पदार्थ हैं से बने हैं और यह न जानना कि शिवजी, आदि ने अपना रूप भगवान कि दिव्य इच्छा से प्राप्त किये हैं और यह सोचना कि भगवान का दिव्य रूप “सामान्य पदार्थ” से बना है। यह सभी बाधा है। उनके अर्चावतार रूप को इच्छगृहित अप्राकृत दिव्य मंगल विग्रह कहते है – वह दिव्य स्वरूप जिनको भगवान ने अपनी स्वयं की इच्छा से धारण किये हैं। हालाँकि यह रूप दिखने के लिये मनुष्य कि तरह है लेकिन वह उस पदार्थ से नहीं बना है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ४ अध्याय में हमने देखा हैं कि स्वयं भगवान अपने अवतार रहस्य को कई श्लोकों में दर्शाते हैं। भगवद्गीता के ४.९ में वें स्वयं कहते हैं – “जन्म कर्म च दिव्यमेवं” – मेरा जन्म और कार्य दोनों दिव्य हैं। गीता में स्वयं भगवान ९.११ में कहते हैं – “अवजानन्ति मां मूढा” – अज्ञानी जन मेरे अवतार के समय मेरी श्रेष्ठता को नहीं समझते है और मेरी निन्दा करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में ३०३ और ३०४ सूत्र में विस्तार से भगवत अपचार को समझाते हैं। इनमें से जो भगवान के अवतार को मात्र एक नश्वर मानव रूप समझना अपचार है। जब कि भगवान यह पवित्र रूप अपनी इच्छा से धारण करते हैं और अन्य देवता जैसे ब्रह्माजी, शिवजी, इन्द्र, आदि ऐसे पद हैं जिन्हें जीवात्मा इन रूप को धारण करके कई अन्य क्रियायें करते हैं। इसलिये इन संसार में जीवात्मा अपने कर्म के आधार पर और भगवान की इच्छा से ऐसे महत्त्व पूर्ण पदों को पाते हैं।
  • सभी चित्त और अचित मिलकर भगवान का शरीर बनाते हैं, यह न जानना बाधा है। जैसे “सर्वं विष्णुमयम जगत” में समझाया है – इस भूमण्डल में सबकुछ विष्णु में व्याप्त है – जो कुछ हम देखते सुनते हैं, भगवान अन्तर्रात्मा है – सब कुछ भगवान श्रीमन्नारायण के अंश है। अनुवादक टिप्पणी: हमने नारायण सूक्तम में देखा है “अंतर बहिश्च तत सर्वं व्याप्य नारायण स्तिथ:” और श्रीरामायण का श्लोक हैं “जगत सर्वं शरीरम ते”। विष्णु का अर्थ है जो सर्वव्यापी है इसलिये श्रीमन्नारायण ही सभी तत्त्वों में सर्वोच्च आत्मा के रूप में निवास करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-41.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३९)

७२)तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – १श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

ऐसे अधिकतम विषयों का गहरा ज्ञान होना चाहिये जो हमें शास्त्रों के अध्ययन करने से प्राप्त होगा। सम्पूर्ण व गहरे ज्ञान प्राप्ति के लिये हमें इन सिद्धान्तों को अच्छे आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करने से प्राप्त होगा।

  • तत्व त्रयम (भोक्तृ – आनंद प्राप्त करनेवाला – आत्मा, भोग्य – आनंद प्राप्त किया हुआ – पदार्थ और नियंत्रु – निर्वाहक – भगवान) को छोड़ अन्य कोई तत्व नहीं हैं – यह न जानना बाधा है। श्रुति कहती है “भोक्ता, भोग्यं, प्रेरितारम च मत्वा”। भोग्यम – वह जिसका आनन्द प्राप्त किया गया है। भोक्ता – वह जो आनन्द प्राप्त करता है। प्रेरिता – वह जिसकी भोग्य और भोक्ता दोनों उसकी सम्पत्ति है और वह जो इन दोनों को नियंत्रित रखता है। अत: यह ३ सत्य हैं। श्रीरामानुज दर्शन के मूल सिद्धान्तों को हमें मानना चाहिये कि तत्वत्रय हीं एक मात्र नीति है। शरीर अचित्त है – पदार्थ – जिससे आनन्द प्राप्त कर चुके हैं। वह जो शरीर में विराजमान हैं और जो सुख और दु:ख का अनुभव करता है उसे चित्त – जीवात्मा – आत्मा कहते है। वह जिसका शरीर दोनों चित्त और अचित्त हैं और उस पर नियंत्रण करता है वे ही सर्वेश्वर (श्रीमन्नारायण) हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इन तीन सत्य के आगे और कुछ भी नहीं है। जिसे इस तत्त्व पर स्पष्टता व दृढ़ विश्वास है वह दूसरे सिद्धान्तों को कभी नहीं मानेगा। और नहीं दूसरे के सिद्धान्तों को सुनकर हैरान होगा। आगे आगे भिन्न भिन्न मतों के सिद्धान्तों को समझाया है और यह भी समझाया गया है कि ऐसे सिद्धान्तों से भ्रमित होना हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदान्त के सार को श्रीभाष्य और अपने अन्य ग्रन्थ जैसे वेदार्थ संग्रह, वेदान्त दीपम, आदि में समझाया है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध में वेदान्त के सार कि स्तुति कि गयी है। इनमें श्रीसहस्रगीति सबसे अधिक प्रसिद्ध है। श्रीसहस्रगीति के लिये ५ व्याख्या हैं – वो है श्रीतिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान द्वारा ६००० पडि, श्रीवेदांति स्वामीजी द्वारा ९००० पडि, श्रीपेरियावाचान पिल्लै द्वारा २४००० पडि, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के व्याख्यानों को सुनकर श्रीवडक्कु तिरुविधि पिल्लै द्वारा लिखे गये ईडु ३६००० पडि, श्रीवादि केसरी अलगीय मणवाल जीयर द्वारा रचित १२००० पडि। इनमें से ईडु ३६००० पडि हीं अत्यंत विस्तृत और व्यापक टिप्पणी मानी गई है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईडु व्याख्या के दो अरुमपधम हैं अप्पु अरुमपधम और जीयर अरुमपधम। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने इस ईडु व्याख्या के लिये ३ प्रस्तावना दिये हैं जिसमें हर प्रस्तावना में कई अद्भुत सिद्धान्त को शामिल किया है। प्रथम प्रस्तावना का नाम “मुदल श्रिय: पति” जिसमें पहिले वें समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं भगवान के कृपा पात्र थे जिन्हें सत्य का दिव्य ज्ञान भगवान ने दिया। अपने सिद्धान्तों को समझाने के पहिले उन्होंने अन्य सिद्धान्तों के विषयों में समझाते हैं और फिर उनकी त्रृटियों को समझाते हैं। अन्य सिद्धान्त के लोग तत्त्वों को कैसे समझते है यह कहकर वें प्रारम्भ करते हैं। वे ऐसे १७ सिद्धान्तों की चर्चा करते हैं और अन्त में वेदों के विपरीत के कारण सभी को अमान्य करते हैं। अन्त में इस बात कि पुष्टी करते हैं कि वेद हीं तत्वत्रय को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इन ३ तत्व (चित, अचित, ईश्वर) को एक रहस्य ग्रन्थ “तत्वत्रय” में बड़े विस्तार से समझाते हैं। इस ग्रन्थ को “कुट्टी भाष्यम” (छोटा श्रीभाष्यम) कहते हैं क्योंकि इसमें श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य के मुख्य पहलू समझाये गये हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ के लिये सुन्दर व्याख्या लिखे हैं जिसमे उन्होंने वेद के पेचिदे विषयों को बहुत ही भावपूर्ण तरीके से लिखा हैं। इस विषय के अध्ययन के दौरान हम श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रथम श्रिय: पति वह श्रीलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यानों के साथ चर्चा करेंगे।
  • वैशेषिका में समझाये अनुसार यहाँ ६ तत्व (द्रव्य से प्रारम्भ होकर) है – इससे घबराना बाधा है। हम यह पहिले हीं देख चुके हैं कि हमारा सिद्धान्त तत्वत्रय पर आधारित है। सांक्य, वैशेषिका, पासुपथ, चार्वाक, बौद्ध, जैन विभिन्न सिद्धान्तों के विध्यालय हैं। हमें इन सिद्धान्तों को नहीं सुनना चाहिये और “क्या यह सही तत्व हैं?” इस तरह सुनकर घबराना नहीं चाहिये। जिसने भी श्रीरामानुज सम्प्रदाय को अच्छी तरह समझ लिया है वे इन दूसरे सिद्धान्तों को सुनकर या देखकर घबड़ायेंगे नहीं। सभी अन्य सिद्धान्तों को निकाल फेंकने की आवश्यकता है। हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति ऐसी हुई है “अरुसमयच चेडियतनै अडियारुत्तां वालिये, अदर्नतुवरुम  कुधरुत्तिगलै अरत्तुरंतान वालिये” – जुग जुग जीवो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने षण मथम (६ सिद्धान्त – जो वेद के बाहर और विपरीत है) नामक पेड़ का सर्वनाश किया, जुग जुग जियो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने घास फूस आदि लताओं का विनाश किया – कुदृष्टि मथम (वह तत्व जो वेद को स्वीकार कर गलत तरीके से पेश करते हैं)। उनके तिरुनक्षत्र दिन कि स्तुति ऐसे होती है “शंकर भास्कर यादव भाट्ट प्रभाकरर् थंगल मतम चाय्वुर वादियर  माय्गुवरेनरु चतुमरै वालनदिडु नाल” – वह दिन जब चारों वेद यह देख खुश हो रहे थे कि श्रीशंकरजी, श्रीसूर्य, श्रीयादव प्रकाश, श्रीभाट्टा, श्रीप्रभाकर, आदि पूरी तरह से परास्थ हो गये और विवादी गण भी परास्थ हो गये। हमें इन सिद्धान्तों के विषय में चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिन्हें पहिले ही निकाल दिया गया है।
  • नैयायिक में (न्याय विध्यालय) जैसे समझाया गया है कि १६तत्व (प्रमाण से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • सांख्य में जैसे समझाया गया है कि २५तत्व (मूल प्रकृति से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • पतंजली में जैसे समझाया गया है कि २६तत्व है, इससे घबराना बाधा है।
  • पासुपथन में जैसे समझाया गया है कि ३६तत्व है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पासुपथ, पासुपथ आगमा पर आधारित है जो रुद्र पर केन्द्रित है।
  • चार्वाकों में समझाया गया है कि ४ भूत पृथ्वी से प्रारम्भ होकर तत्व हैं, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: चार्वाक केवल ४ तत्वों को (पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु) को हीं सत्य मानता हैं। मूलत: इस अवधारणा के आगे कुछ नहीं है। चारु वाक का अर्थ सुन्दर अलंकृत शब्द हैं। वे समझाते है की कोशिश करें कि इस जीवन को हुआ इतना सुखमय से जीयों क्योंकि यही सत्य है। उन्हें लोकायथ से भी जाना जाता है – पूर्णत: भौतिकता वादि व नास्तिक सिद्धान्त वाले हैं।
  • बौद्ध मत के अनुसार सच्चाई पाँच स्कन्ध, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया बौद्ध के ४ सिद्धान्त को समझाया गया है। वैभाषिका, सौत्रांतिका, योगाचर और माध्यमिक यह बौद्ध सिद्धान्त में ४ विध्यालय हैं। मूलत: यह सून्यवाधम यानि सबकुछ कुछ भी नहीं है।
  • जैन धर्मानुसार सत्य धर्म, अधर्म, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैन धर्म अहिंसा, त्याग पर केन्द्रित है। वेद और उसके सिद्धान्त के लिये कोई आदर सम्मान नहीं है।
  • मायावादियों के अनुसार जीवात्मा ही एक मात्र तत्व है इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: मायावादि एक मात्र आत्मा जिसका कोई नाम, रूप, सहायक, आदि नहीं है की उपस्थिति और आत्मा जो अज्ञानता से ढकी हुई है इस मायावी संसार को हीं सत्य मानता है। जैसेहीं अज्ञानता का नाश होता आत्मा अपने सच्चे स्वरूप में आती है और उसे ही मोक्ष कहते हैं।
  • भाट्टा और प्रभाकर के सिद्धान्त से घबराना और यह मानना की जीवात्मा के आगे ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुमारीला भट्ट और प्रभाकर यह दो अद्वैत वेदान्त सिद्धान्त के कट्टर दार्शनिक थे।

अब प्रारम्भ करते हैं अचित्त तत्व (पदार्थ – निर्विकार), जिसके विषय में बहुत संभ्रम थी जिनका स्पष्टीकरण किया गया है और जिन्हें गलत तरिके से पेश किया गया है उन्हें भी समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रन्थ में अचित तत्व के सिद्धान्त के विषय में जो बाते स्थापित की गई हैं पहिले उन विषय को समझायेंगे। एक बार इसे समझने से बाधाएं स्वयं दूर हो जायेगी। प्रत्येक को अलग से समझाने कि आवश्यकता नहीं है।

अचित तत्व श्रेणी के हैं। शुद्ध सत्वम, मिश्र सत्वम और सत्व सून्यम। अनुवादक टिप्पणी: सभी निर्विकार वस्तु में तीन गुणों में से एक से अधिक लक्षण जैसे सत्व, रजस और तमस गुण होते है। यहाँ पदार्थों को शुद्ध सत्वम कहते हैं क्योंकि उनमें पवित्र सत्व ही उनका गुण है। पदार्थ से उसके गुण हीं भिन्न होते हैं परन्तु पदार्थ को उसके गुणों से जाना जाता है इसलिये जब हम शुद्ध सत्वम गुण कहते यानि वह पदार्थ जो अच्छाईयों से भरा हुआ है।

  • शुद्ध सत्वम केवल परमपदधाम में ही देखा जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: परमपदधाम में सभी पदार्थ शुद्ध सत्व वर्ग के होते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि शुद्ध सत्वम राजस और तामस गुणों के बगैर है और पूर्ण रूप से शुद्ध है। वे समझाते हैं कि यह पवित्र पदार्थ स्वयं को कई रूपों में बदलते हैं जैसे कि मण्डप, गोपुरम, विमान, प्रसाद, आदि और भगवान नित्य और मुक्त जीवों को अपार आनन्द प्रदान करते है। इस भौतिक संसार में भगवान का जो दिव्य अर्चा स्वरूप है उसका हम दर्शन करते हैं और वह शुद्ध सत्वम वर्ग में आता है।
  • मिश्र सत्वम- रजस और तमस का मिश्रण है जिसे हम इस भौतिक संसार में देखते हैं। हालाँकि अचित्त नित्य है फिर भी निरन्तर समान रूप से बदलता है। इसलिये उसे तात्कालिक कहते हैं। हालाँकि चित्त जो ज्ञान से भरा हुआ है और जब भौतिक शरीर में विवश है, ज्ञान और आनन्द जो जीवात्मा के लिये मूलभूत है अचित्त से ढ़क जाता है। यह अचित विपरीत ज्ञान को उत्तेजित कर सकता है। कुछ समय बाद हम इसे विस्तृत रूप से देखेंगे।
  • सत्व शून्यम यह काल (समय) है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में यह समझाते है कि कुछ दार्शनिकों ने काल का तिरस्कार कर दिया है। परन्तु क्योंकि हम काल कि अस्तित्व सीधे तौर पर अनुभूति और शास्त्रों द्वारा महसूस कर सकते हैं, इसलिये काल को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं आता है। काल एक ऐसा घटक है जो अचित्त को निरन्तर बदलाव के लिये सरल बनाता है। काल को भगवान के भूतकाल के उपकरण की तरह समझाया जाता है। काल का दोनों परमपदधाम और इस संसार में अस्तित्व है – जब कि परमपद में पूर्णत: आज्ञाकारी है (भगवान के पूर्णत: मुखोल्लास के लिये) और इस संसारके कार्य को नियंत्रण करने हेतु एक विशिष्ट भूमिका है।

मिश्र सत्वम के विषय पर अधिक जानकारी:

  • मूल प्रकृति (आदिकालीन विषय) एक ऐसी परिस्थिति हैं जहाँ पर सभी तीनों गुण –सत्व, रजस और तमस पूर्णत: संतुलित है। यह एक सूक्ष्म अवस्था है और यह तत्व जो भगवान का शरीर है। सृष्टि उत्पत्ति के समय जब गुणों का संतुलन बदल जाता है तब सूक्ष्म अवस्था टोस पदार्थ बनकर रंग बिरंगे नाम व रूप में बदल जाता है। सृष्टि के समय प्रकृति उपाधान कारणम है। भगवान के दिव्य संकल्प से सूक्ष्म स्थिति सकल बन जाती है। ऐसी अवस्था के इस तरह के बदलाव से २४ तत्त्वों का प्रार्दुभाव होता है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते है कि “पोंगैम्पुलनुम पोरियैंन्थुं करुमेन्द्रियम ऐम्भूतं इंगीव्वुयीरेय पिरकिरुति मानान्गार मनंगले”। अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रुति में बताये गये अनुसार भगवान घोषणा करते हैं “बहु स्याम” – मैं अनन्त हूँ। इस प्रतिज्ञा के साथ जटिल पदार्थ को तत्क्षसृष्टिण रंग बिरंगी पूर्ण स्वरूप में बदल देते हैं। इन पदार्थ के २४ तत्त्वों को इस तरह समझाया जाता है।
    • पोंगैम्पुलन – वह जो हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है – पञ्च तनमात्रा – इंद्रियाँ के ५ उद्देश – शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद, गंध।
    • पोरियैंन्थुं – वह जो हमें इच्छाओं के जाल में फँसाता है – पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञान के ५ इंद्रियाँ – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक।
    • करुमेन्द्रियाँ – वह जो हमें इन इच्छाओं में निरत करता है – पञ्च कर्मेन्द्रियाँ – ५ कार्य करने के इंद्रियाँ – मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ।
    • ऐम्भूथम – पञ्च तन्मात्रा कि तिरुमाली – पञ्च भूत – ५ महान तत्व – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
    • मानस – मन
    • अहंकार – अहम
    • महान – पदार्थ जो स्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
    • मूल प्रकृति – पदार्थ जो अस्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
  • शब्द, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श ५ भिन्न अनुभव हैं। इन अनुभवों से आकर्षित होनेवाले ज्ञानेन्द्रियाँ भी पाँच हैं – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक। कर्मेन्द्रियाँ जो इन इच्छाओं को रूप देता है वह भी पाँच है मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ। कोई भी स्वरूप पाँच तत्वों से बनता हैं – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। अब तक हमने २० तत्व को देखा हैं। महान एक सिद्धान्त हैं जो जीवात्मा के परिश्रम को गती देता है। अहंकार – घमण्ड / आदर को गती देता है। मानस इच्छाओं को गती देता है। अन्त में मूल प्रकृति इस तरह २४ अचित्त तत्त्व हुये। २५वां तत्व जीवात्मा है और २६वां तत्व ईश्वर है।
  • जब पदार्थ के गुण सत्व, रजस और तमस गुण में समान मात्रा में वितरित होते हैं तब उस अवस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। जब वह असंतुलित हो जाता है तब उसका असर प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। जब ऐसा संतुलन खो जाता है तब पहिले महान प्रगट होता है। इसे महत तत्वम भी कहते हैं। जिस तरह किसी बीज को पानी में भिगोकर रखने के बाद जब बीज अंकुरित होता है ठीक उसी तरह हम इन तत्वों का वर्णन कर सकते हैं। यह महत तत्वम ३ अवस्थाओं में है – सात्विक, राजस और तामसिक। इन ३ महान अवस्थाओं से तीन प्रकार के अहंकार – वैकारिकम, तैजसम, भूताधि होते हैं। अहंकार एक ऐसा सिद्धान्त है जो वास्तविकता को घटाता है और भ्रम फैलाता है। उदाहरण के लिये शरीर और आत्मा को समान मानना एक ऐसी गलत फैमी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे तत्वत्रय में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्याओं में पदार्थ के भिन्न भिन्न पहलुओं के लक्षणों के विषय में प्रमाण देकर समझाते हैं। सामान्यतया मूल प्रकृति को प्रधानम (प्रमुख अवस्था), अव्यक्तम (अस्पष्ट स्थिति) की तरह समझाते है। जब मूल प्रकृति को महत तत्वम में बदलते हैं – पदार्थ स्पष्ट अवस्था में आजाता है और उसका नाम, स्वरूप, आदि आजाते हैं। माहन से प्रारम्भ होकर प्रकृति २३ अन्य तत्वों में फैलती है।
  • वैकारिकम से दोनों कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती है और वे सूक्ष्म अवस्था में ही रहती हैं। मन भी वैकारिकम का एक उत्पादन है। भूताधि, पंचभूतम आदि जन्म लेते हैं। तैजसम वैकारिकम और भूताधि को अनेक बलाव में मदद करते हैं।
  • भूताधि से पंचतनमात्रा (ज्ञान का अनुभव करनेवाले पदार्थ) जो पंचभूत के सूक्ष्म पहलुओं के निर्माण होते है और यहाँ उनका अनुक्रम समझाया जायेगा। भूताधि से प्रथम शब्द तनमात्रम प्रगट होता है। यह आकाश (रंग रहित द्रव्य) कि स्पष्ट स्थिति है। शब्द तनमात्रम से आकाश और स्पर्श तनमात्रम प्रगट होते है। स्पर्श तनमात्रम से वायु और रूप तनमात्रम प्रगट होते है। रूप तनमात्रम से अग्नि और रस तनमात्रम प्रगट होते है। रस तनमात्रम से गन्ध तनमात्रम और जल प्रगट होते है। गन्ध तनमात्रम से पृथ्वी प्रगट होते है। अनुवादक टिप्पणी: तैत्रिय उपनिषध में इसे इस तरह समझाया है “आकाशात वायु:, वायोर अग्नि:, अग्नियैर आप:, अभय: पृथ्वी …” – आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी और इस तरह आता है। इस प्रक्रिया को सामान्यतया पंचीकरणम (पाँच तत्वों का मिश्रण) कहते हैं।
  • इस तरह सृष्टी के एक अंश अनुसार भगवान २४ तत्वों का प्रयोग कर पहिले कई ब्रह्माण्डों का निर्माण करते है और एक बार इन ब्रह्माण्डों का निर्माण हो जाता है तब अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माजी द्वारा कई प्रजातियों का निर्माण करवाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टि को ब्रह्माजी द्वारा इन भागों में विभाजित किया जाता है जैसे अद्वारक सृष्टि – स्वयं भगवान द्वारा निर्मित और सध्वारक सृष्टि – ब्रह्माजी, ऋषि, आदि द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भगवान द्वारा निर्मित। जब तक ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है यह स्वयं भगवान के द्वारा होता है। एक बार ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है तब वे हर प्रत्येक ब्रह्माण्ड के लिये एक ब्रह्म को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माण्ड में आगे कि उत्पत्ति के लिये उनकी सहायता करते है। ब्रह्मा, सप्त ऋषि, मनु, आदि सभी को प्रजनन की क्रिया में व्यस्त कर ब्रह्माण्ड में विविध रंग बिरंगी जातियों और रूपों में उत्पत्ति करते हैं, उन्हें ब्रह्माण्ड में देखा जा सकता है। यह समझाया गया हैं कि ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं और सभी ब्रह्माण्ड को एक ब्रह्मा का नेतृत्व प्राप्त है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि यह भौतिक संसार खुद ही बहुत विस्तृत है और हमारी कल्पना के बाहर है। परमपदधाम को सामान्यतया त्रिपाद विभूति (संसार से ३ गुणा बड़ा) ऐसा समझाया गया है। साथ ही सृष्टी जो हम देखते हैं वह आवर्ती मात्र है। वहाँ पर सृष्टी, स्थिति और संहार है। इस तरह के अनंत चक्र काल से है जिसका न प्रारम्भ है और न अन्त है।

इस प्रस्तावना के साथ ही हम शेष बाधाओं के इस विभाग में विस्तृत रूप से जानेंगे।

  • आकाश (रंग रहित द्रव्य) एक आवरण अभावम (जिसकी कोई सीमा नहीं है) और शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य और सर्वव्यापी है ऐसा समझकर घबराना बाधा है। आकाश पंचभूतों में से एक है जिसका निर्माण सृष्टी के एक भाग के रूप में सृष्टी के संग ही हुआ है। इसलिये उसे शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य नहीं समझ सकते हैं।
  • दिशा एक अलग पदार्थ है और इससे घबराना बाधा है। दिशाएँ जैसे पूरब, पश्चिम, आदि भिन्न पदार्थ नहीं है। चेन्नई में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम दक्षिण में है। परन्तु आल्वार तिरुनगरी में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम उत्तर में है। इसलिये यह तुलनात्मक है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२७वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि वैशेषिका, आदि दिशा एक अलग पदार्थ जैसे पृथ्वी ऐसा नहीं समझाते है। इस विषय पर विद्वानों से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • काल का अलग से कोई अस्तित्व नहीं हैं इससे घबराना बाधा है। काल निमिष, मणि, मुहूर्तम, आदि के नाम से जाना जाता है। यह सभी समय के परिवर्तन पर आधारित है, इस संसार में सब कुछ परिवर्तन शील है। “कालो ही धुरतिक्रम:”- (समय का प्रभाव अवश्यभावी है) यह प्रसिद्ध पद है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२५वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि बौद्ध, आदि काल के उत्पत्ति को स्वीकार नहीं करते है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते है कि क्योंकि काल दोनों अनुभूति और शास्त्र से समझा जा सकता है, ऐसे तत्त्व जो काल के अस्तित्व को ही नहीं मानते हैं उन्हें हम कैसे स्वीकार कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के व्याख्यान में बहुत ही सुन्दर उदाहरण से इस सिद्धान्त को स्थापित करते हैं।
  • वायु को देख नहीं सकते हैं, इससे घबराना बाधा है। हालाँकि वायु को देख नहीं सकते है लेकिन उसकी उपस्थिती को स्पर्श द्वारा महसूस किया जा सकता है, इसे अप्रत्यक्ष के तरह समझा नहीं सकते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-40.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३८)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – ३ (समापन भाग)

 श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीपेरुमबदुर – वह जिन्होंने हमारे सिद्धान्त का प्रचार सही रीति से किया

हम इस विषय पर चर्चा जारी रखेंगे। इनमें से कई विषयों को जानने के लिये अधिक ज्ञान की आवश्यकता है जिसे हम शास्त्रों का सही अध्ययन करके प्राप्त कर सकते हैं। इस विषय के बारें में सम्पूर्ण वह गहरी समझ प्राप्त करने हेतु इन सिद्धान्तों को आचार्य के मार्गदर्शन में हीं अध्ययन करना उत्तम है।

  • मोक्ष जिससे परमपदधाम में नित्य कैंकर्य का मार्ग प्रशस्त होता है की चाहना न करना बाधा है। पिछले भाग में हमने अस्थाई व गौण सांसारिक सुख से सम्बन्ध को त्यागने की आवश्यकता के विषय में देखा है। यहाँ मोक्ष को अनन्त व स्थिर परिणाम कहा गया है। ऐसे लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा न रखना बाधा है। जैसे “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” में समझाया गया है कि मोक्ष असीम और परम आनन्द है। जिसको एक बार जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त हो जाता है उसका फिर पुर्नजन्म नहीं होता है। अनुवादक टिप्पणी: चांदोग्य उपनिषद में घोषणा की गई है कि “न च पुनर आवर्त्तते, न च पुनर आवर्त्तते” – वापिस नहीं आना है। दो बार कहने से यह महत्त्वपूर्ण वार्तालाप यह सिद्धान्त ओर अधिक ताकतवर हो जाता है। भगवान कृष्ण गीता के ८.१६ में कहते है “अ ब्रह्मा भुवनाथ लोका:” – ब्रह्म लोक से – सर्वश्रेष्ठ स्थान से न्यूनतम स्थान तक बारम्बार जन्म मरण होगा परन्तु जिसने मुझे प्राप्त कर लिया है उसके लिये इस भौतिक संसार में पुर्नजन्म नहीं है। यह विशिष्ट लक्षणों वाला परमपदधाम है – एक बार जीवात्मा वहाँ पहुँचते ही वह पूरी तरह पवित्र होकर और उसके ज्ञान का पूर्ण विस्तार होता है। इसलिये इस संसार में पुन: आने का कोई सम्भावना हीं नहीं है। परमपद में जीवात्मा कई स्वरूपों से भगवान के भांति भांति कैंकर्य निरत रहते है। इसे चांदोग्य उपनिषद में समझाया गया है “स एकता भवति, थ्रिता भवति …” – वों एक, तीन, आदि स्वरूप धारण कर सकता है। वहाँ इस तरह के परमानंद का कोई अन्त नहीं है और जीवात्मा का इस संसार में पुन: आने कि कोई संभावना नहीं है, वों भी ऐसे परमानंद का स्वाद चखने के पश्चात जो उसके लिये स्वाभाविक है। भगवान स्वयं जीवात्मा को वापिस संसार सागर में नहीं भेजेंगे क्योंकि उन्होंने जीवात्मा को परमपद में लाने के लिये बहुत परिश्रम किया है। इसलिये हमें भगवान के परमपदधाम में निरन्तर नित्य कैंकर्य की चाहना करनी चाहिये।
  • मुमुक्षु को लौकिक संसार में रुचि होना बाधा है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि चाह करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित तिरुविरूत्तम के प्रथम पाशुर में वर्णन किया गया है “इन् निन्र नीर्मै इन याम उरामै” – मैं इस संसार में फँसे होने की मेरी अभी की स्थिती को सहन नहीं कर सकता क्योंकि इस लौकिक संसार में जीवन के लिये मुझे अरुचि होनी चाहिये। ऐसी स्थिती से बाहर आने के लिये हमें परमपद प्राप्ति कि इच्छा होनी चाहिये। इसे “संसारत्तिल अडिक्कोधिप्पु” – ऐसे समझाया गया है यानि भौतिक संसार में रहना यानि गरम रेत पर चलाने के समान है। अनुवादक टिप्पणी: जब कोई गरम रेत पर चलते हुये फँस जाता है तो वह बड़ी आतुरता से छाया की ओर देखता है। संसार को गरम रेत और परमपदधाम को ठंडी छाव से तुलना की गयी है। स्वयं भगवान को ऐसे समझाया गया है “वासुदेव तरुछ्छाया” – वसुदेव छाँव देनेवाला वृक्ष। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ११६ सूत्र (द्वय प्रकरणम का पहला सूत्र) में श्रीवैष्णव लक्षणम को समझाते है। कई लक्षणों में एक को चिन्हित करते हैं कि श्रीवैष्णवों को परमपदधाम पहुँचकर नित्य कैंकर्य करने का पूर्ण विश्वास होना चाहिये। इसके साथ उस लक्ष्य की पूर्ति के लिये निरन्तर लालसा होनी चाहिये। हम जिस अवस्था में हैं उसीमे हीं संतुष्ट नहीं होना चाहिये और आनन्दपूर्वक अपना जीवन निर्वाह करना चाहिये। बजाय इसके कि इस भौतिक संसार से मोक्ष पाने की निरन्तर लालसा होनी चाहिये ताकि परमपदधाम में निवास कर भगवान का नित्य कैंकर्य कर सकें। ऐसी चाहना न होना ही बाधा है।
  • यह न समझकर कि हमने जो कुछ भी प्राप्त किया है वह हमारे कर्मों का फल है जो अस्थायी आर नगण्य व तुच्छ है और ब्रह्म सकारात्मक है के विषय में जानने की इच्छा न रखना बाधा है। कर्म साध्य फलम – हमने यज्ञ, याग्य, आदि से जो कुछ प्राप्त किया है जैसे कि सांसारिक धन, स्वर्ग, आदि का सुख। यह अस्थाई हैं – हमारे पुण्य समाप्त होते ही यह समाप्त हो जायेंगे। वे शाश्वत नहीं हैं। परमपदधाम की निरन्तर कैंकर्य के आर्शिवाद से तुलना की जाये तो यह सब नगण्य, तुच्छ है। ऐसे सांसारिक आनन्द की कमियों को जानते हुये भी यदि कोई भगवान के नित्य कैंकर्य की चाहना नहीं करता है तो उसकी यह बहुत ही दयनीय दशा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण भगवद्गीता के ८.१५ श्लोक में समझाते हैं कि “मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयम शाश्वतम् …” – मुझे प्राप्त करके जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत में नहीं लौटते जो दुख और शाश्वत का घर है, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है। इस भौतिक संसार में चाहे पाताल लोक हो, ब्रह्म लोक हो, जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापा, आदि रहेंगे। इन चार समस्याओं के रहते दु:ख की सम्भावना रहती है। अत: हमें तुच्छ सांसारिक पहलुओं से सम्बन्ध त्याग कर परमपदधाम में भगवान का नित्य कैंकर्य और अपना लक्ष्य केन्द्रित करना चाहिये।
  • यह न जानना कि नारायण जिसे नारायण अनुवाकम प्रगट किया गया है वे ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं बाधा है। नारायण सूक्त में देखा जाता हैं कि “नारायण परम ब्रह्म तत्वम नारायण: परा: नारायण परोज्योति: आत्मा नारायण: परा:”। यहाँ श्रृति में घोषणा की गई है कि सर्वश्रेष्ठ भगवान जो नारायण है वही परब्रह्म हैं जिनके बराबर कोई नहीं है। इसका सभी को अध्ययन करना चाहिये और समझना चाहिये।
  • यह न समझना कि शास्त्रों के कर्म भाग स्वयं भगवान ने ही प्रतिस्थापित किया है जिसे सबको पालन करना चाहिये – बाधा है। वेदों को दो भागों में बाँटा गया है। कर्म भाग हमें यागम (त्याग), यज्ञम (पूजा), आदि समझाता हैं। कर्म दो प्रकार के हैं। आज्ञा कर्म – नित्य, नैमित्तिक कर्म। यह नित्य / नैमित्तिक कर्म हमें करना चाहिये। अकारणे प्रत्यवायम – जब ऐसे कर्म नहीं किये जाते हैं तो वह पाप कि ओर ले जाता है। एक और प्रकार का कर्म है काम्य कर्म – यह वैकल्पिक है और सामान्यता सांसारिक लाभ कि ओर केन्द्रित है। हम अपने नित्य कर्म यह संकल्प के साथ करते है “श्री भगवद आज्ञा भगवत कैंकर्यं रूपं” – कर्म जो भगवद आज्ञा है और भगवद कैंकर्य का एक अंश है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वेदों के दो भाग करने के तत्त्व को समझाते हैं – श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के पहले सूत्र पर व्याख्या में पूर्व भाग और उत्तर भाग को समझाते हैं। वे आगे कहते हैं कि पूर्व मीमांसा (जैमिनी सूत्रम) के साथ में “अथातो धर्म जिज्ञासा” उत्तर मीमांसा (वेद व्यास ब्रह्म सूत्रम) जो “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” से प्रारम्भ होता है। इसलिये पूर्व भाग में कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान की विविध पूजा पद्धत्ति को समझाने पर केन्द्रित किया गया हैं और उत्तर भाग में ऐसे भगवान जिनकी पूजा की जाती है उनके गुणों को समझाया गया है। तैत्रीय उपनिषद में भी यह दर्शाया गया हैं कि “स आत्मा, अङ्गान्यन्या देवता:” – सभी देवता भगवान के अंश है और भगवान द्वारा अनवरत हैं। इसे जानने के लिये विद्वान जन स्वयं को कर्मानुष्ठान से भगवान की पूजा में व्यस्त रखते हैं (स्वयं भगवान की आज्ञा द्वारा)। इस विषय पर उनकी व्याख्या वास्तव में विस्तृत है – परन्तु यह सुन्दर विश्लेषण / प्रस्तुति अपने सत सम्प्रदाय के मूलभूत सिद्धान्त जिसे आचार्य के सही मार्गदर्शन में अध्ययन करने की आवश्यकता है।
  • यह न जानना कि वेदों के ब्रह्म भाग भगवन के स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि को विस्तार से समझाता है और भगवान को पूर्णत: प्राप्त करने में समाप्त होता है – बाधा है। ब्रह्म भाग – उपनिषद है। यह भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, अवतार, आदि को समझाता हैं। स्वरूप का अर्थ सच्चा स्वभाव है – सर्वश्रेष्ठ, अन्तर्यामी, आदि। रूप का अर्थ है भगवान के दिव्य स्वरूप की सुन्दरता, मृदु स्वभाव, आदि। गुण में उनके सभी पवित्र लक्षण शामील है – गुण जो उनके श्रेष्ठता को दर्शाता है जैसे ज्ञान, शक्ति, आदि और गुण जो उनके सादगी जैसे मिलनसार, मातृत्व की तरह सहिष्णुता आदि। वैभव, आदि – उनके अवतार, अपार सम्पत्ति, आदि शामील हैं। एक बार यदि कोई इनको (स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि) समझ जाता हैं तो स्वयं उसमें भगवतप्राप्ति की लालसा जागृत होती है और वह उन्हें प्राप्त करने के तरीकों कि खोज करता है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ ब्रह्म भाग में उपनिषद और ब्रह्म सूत्र शामील हैं। वेदान्त सूत्र एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण साहित्य है जो ब्रह्म के लक्षणों को स्थापित करते हैं। बोधायन ऋषि ने सर्व प्रथम ब्रह्म सूत्र की व्याख्या की थी जिसे काश्मीर में सुरक्षित रखा गया था। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी की इच्छा पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीविशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की स्थापना के लिये इस सूत्र की विस्तृत व्याख्या लिखने की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ काश्मीर तक प्रयाण किया और बोधायन वृत्ति ग्रन्थ लेकर पुन: श्रीरंगम की ओर प्रस्थान किया। कुछ बदमाशों ने जब इस विषय के बारें में सुना तो उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी का पीछा किया और उनसे ग्रन्थ को पुन: छीन लिया। श्रीरामानुज स्वामीजी बहुत दु:ख और शोक में डूब गये, लेकिन श्रीकुरेश स्वामीजी ने उन्हें बताया कि जब आप विश्राम कर रहे थे उस समय आपने सम्पूर्ण ग्रन्थ को कंठस्थ कर लिया है। वे श्रीरंगम लौट आते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी की सहायता से श्रीभाष्य (ब्रह्म सूत्र पर विस्तृत व्याख्या) ग्रन्थ कि रचना किये। श्रीरामानुज स्वामीजी पुन: काश्मीर जाते हैं और वहाँ सरस्वती देवी शारदा पीठ में उनका हर्षोल्लास के साथ स्वागत करती हैं। वे श्रीरामानुज स्वामीजी से श्रीभाष्य स्वीकार कर उसका अवलोकन करती हैं। साहित्य की महान स्पष्टता को देखकर वे अति प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी को “श्री भाष्यकार” की उपाधि से सम्मानीत करती हैं। उपनिषद के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने अलग से कोई व्याख्या नहीं लिखी हैं। श्रीवेंकटेश भगवान के सन्मुख उन्होंने स्वत: वेदार्थ संग्रह पर व्याख्या प्रस्तुत किया। इस वेदार्थ संग्रह में वें विशेषकर उपनिषद के ऐसे पहलुओं पर ज़ोर देकर समझाया है जिन्हें अद्वैत गलत तरीके से पेश करते हैं। कुछ व्याक्यांश जैसे “तत्वमसी, अहं ब्रह्मासमी, आदि” अद्वैती गलत तरीके से समझाते है और ऐसे व्याक्यांश बहुत साफ तरीके से, सही सन्दर्भ के साथ और कई प्रमाणों के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदार्थ संग्रह में समझाया हैं। इस तरह भगवान के अद्भुत पहलुओं को श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं के जरिये मूल तरीके से बिना किसी संशय भ्रम के हम समझ सकते हैं।
  • परमपद में नित्य सेवा कैंकर्य ही अन्तिम लक्ष्य है यह न मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण के निकट पहुँचना ही परमपुरुषार्थ (श्रेष्ठ लक्ष्य) है। इस लक्ष्य में भगवद अनुभव सर्व प्रथम कदम है। ऐसा अनुभव हमें प्रीति के मार्ग में अग्रसर होकर भगवान के अद्भुत गुणों को समझाते हैं। ऐसा प्रेम हमें उनके कैंकर्य जो उनके आनन्द के लिये हो की ओर आगे बढ़ाता है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे “अकिञ्चितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” में कहा गया हैं – किसीके दासत्व का सच्चा स्वभाव छोटे छोटे कैंकर्य कर अनवरत रख सकते हैं। वेदान्त हमें दासत्व के सही स्वरूप में रहकर मोक्ष प्राप्ति समझाते हैं। शेषत्व आत्मा का मुख्य गुण हैं। वह शेषत्व हमें भगवान के आनन्द के लिये निस्वार्थ कैंकर्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। इस अन्तिम लक्ष्य के विषय में कोई दूसरा ज्ञान केवल एक मिथ्याबोध है।
  • साम्यापत्ति (जीवात्मा का ब्रह्म के बराबर स्तर तक पहुँचना) सामरस्यम (समान आनन्द होना) कि इंद्रिय को प्रगट करता है, यह न जानना बाधा है। श्रृति में मोक्ष को “परमं साम्यमुपैती”, “सोस्नुते सर्वान्कामान सहब्रह्मणा”, आदि ऐसे समझाया गया है। विशेषकर भगवान, नित्यसूरीगण और मुक्तामा में समान ज्ञान और आनन्द होता हैं। फिर भी भगवान स्वामी है और जीवात्मा उनके दास हैं। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा के लिये भगवान के चरण कमलों तक पहुँचना ही वास्तविक आर्शिवाद है। वह जो भगवान के निकट पहुँचता है उसे साम्यापत्ति मोक्ष से आर्शिवाद प्रदान करते है जिसे श्रीपरकाल स्वामीजी अपने पेरिया तिरुमोझी में इस तरह पहचानते हैं – “थम्मैये ओक्क अरुल चेयवर” – भगवान मुक्तामा को अपने गुण प्राप्ति का आर्शिवाद प्रदान करते हैं। साम्यापत्ति मोक्ष का अर्थ मुक्तामा भगवान कि निर्हेतुक कृपा से आठ गुण प्राप्त करना हैं। यह गुण भगवान में पूर्णत: हैं। इन आठ गुणों से भी आगे कुछ गुण जैसे श्रिय:पति, शेष सायित्वम (वह जो आदि शेष पर विश्राम कर रहा हो), उभय विभूति नाथम (नित्य विभूति और लीला विभूति के निर्वाहक), आदि भगवान में हीं हैं। आठ गुण हैं: अपहठपाप्म – सभी पापों से मुक्त, विजरा: – बुढ़ापे से मुक्त, विमृत्यु: – मृत्यु से मुक्त, विशोक: – दु:खों से मुक्त, विजिगत्सा: – भूख से मुक्त, अपिपासा: – प्यास से मुक्त, सत्यकामा: – सभी इच्छा पूर्ण करने योग्य, सत्य संकल्प: – कोई भी कार्य पूर्ण करने योग्य।
  • यह कल्पना करना कि स्वरूप ऐक्यम (परमात्मा और जीवात्मा का मिलन) है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है कि अद्वैत जन ऐसा भ्रम फैलाते हैं कि जीवात्मा ही ब्रह्म बनते है।
  • यह न जानना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात भगवान के कैंकर्य के लिये कई स्वरूप धारण करते हैं और इस भ्रम में रहना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात कोई स्वरूप / शरीर नहीं रहता है – यह बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि मुक्तात्मा के लिये कैंकर्य हीं अन्तिम लक्ष्य है। कैंकर्य करने हेतु जीवात्मा को एक शरीर या रूप कि आवश्यकता है। श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवन्दादि के ५३वें पाशुर में समझाते है “शेन्राल् कुडैयाम् इरुन्दाल् शिङ्गशनमाम् निन्राल् मरवडियाम्…” – जब भगवान भ्रमण करते है तो आदिशेषजी छत्र का रूप धारण करते हैं, जब वें बैठते हैं तो आदिशेषजी सिंहासन का रूप धारण करते हैं, जब भगवान खड़े हो जाते हैं तो आदिशेषजी खड़ाऊ का रूप धारण करते हैं, आदि। इस तरह आदिशेषजी (जो नित्यसूरी हैं – नित्य मुक्त जीवात्मा) छत्र, खड़ाऊ, सिंहासन, आदि रूप धारण कर कई कैंकर्य करते हैं। उसी तरह मुक्तात्मा भी कई रूप लेकर बहुत कैंकर्य करते हैं। कैसे कोई बिना शरीर के कैंकर्य कर सकता हैं? अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर की व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाते हैं कि श्रीअम्माजी और श्रीमन्नारायण के मुखोल्लास के लिये श्रीआदिशेष कोई भी रूप धारण करते हैं। वे और कहते हैं कि इस पाशुर में केवल आदिशेषजी कि चर्चा हुई है परन्तु सभी जीवात्मा का परमपद में यहीं होता है जिसे उपलक्षणम (उदाहरण / बराबरी) कहते हैं। चांदोग्य उपनिषद में इन प्रमाणो को देख चुके हैं “स एकता भवति, थ्रिता भवति …”।
  • मुक्ति का अर्थ अर्चिरादि मार्ग से जाना (वह राह जो अर्चि से प्रारम्भ होता है) जो अन्त में परमपद को पहुँचाता है और जीवन मुक्ति (इस जीवन और संसार से मुक्ति पाना) से भ्रम होना – यह न मानना बाधा है। सच्चा मोक्ष / मुक्ति का अर्थ इस संसार के जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाना, परमपद पहुँचना, भगवान परवासुदेव का अनुभव करना और अनन्तकाल तक उनका कैंकर्य करना और उनका पूर्ण मुखोल्लास के लिये बिना किसी त्रुटि के निरन्तर सेवा करना। जीवात्मा (जो मुक्त हो गया हो) मृत्यु के समय अपना शरीर त्यागकर अर्चिरादि मार्ग से जो प्रकाशित राह हैं स्वयं भगवान उसकी मदद करते है और परमपद पहुँचाते हैं। इस अन्तिम दशा को “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” कहते हैं – सुखद मोक्ष। श्रीशंकराचार्यजी के अद्वैत सिद्धान्त में, वेदान्त के वाक्यों का अध्ययन करना व समझना जैसे कि “तत्वमसि” और समझना कि मैं ही ब्रह्म हूँ और उसे ही मुक्ति मानते हैं। अद्वैत सिद्धान्त अनुसार इसी जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है। परन्तु ऐसी समझ अस्पष्ट व भ्रम करनेवाली है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में अर्चिरादि मार्ग को समझाते है “सूळ्वीसुम्बणीमुगिल”। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “अर्चिरादि” नामक रहस्य ग्रन्थ में अर्चिरादि मार्ग व परमपद में सुखद अनुभावों को विस्तार से समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी स्वयं मुमुक्षुप्पड़ी के २७वें सूत्र में दर्शाते हैं कि परमपद में भगवान का कैंकर्य करना, जो हमारा अन्तिम लक्ष्य है इसे “प्रमेय शेखर” और “अर्चिरादि गति” (उनके १८ रहस्य ग्रन्थों में से २ ग्रन्थ) में समझाया गया है। श्रीनायनार बताते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी अपनी दिव्य भावनाओं से भगवान को तिरुमोगुर आप्तन ऐसा कहते है जिसका अर्थ भगवान जो जीवात्मा के अर्चिरादी गति में साथ हो – राह जो जीवात्मा को मोक्ष भूमि कि ओर ले जाता है। आप्तन का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति – उनमें विश्वास करना चाहिये कि वे हमें परमपदधाम को सुरक्षित पहुँचायेंगे।
  • प्रपन्नों के इस जीवन के अन्त में उनके कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसका सूक्ष्म शरीर जीवात्मा के संग जाता है और विरजा नदी में स्नान करने के पश्चात पूर्ण रूप लेता है और इसमें सन्देह करना बाधा है। हालाँकि भगवान कि कृपा से किसी के कर्म (सद्कर्म / अपकर्म) उसके जीवन के अन्त में मिट जाता है और अर्चिरादि मार्ग द्वारा आगे बढ़ता है तथापि जीवात्मा का सम्बन्ध अचित से पूरी तरह नष्ट नहीं होता है क्योंकि उसका सूक्ष्म शरीर अब तक जीवात्मा के साथ जुड़ा रहता है। यह सब भगवान के संकल्प मात्र से होता है। परमपद की सीमापर एक दिव्य नदी है विरजा। जैसे हीं जीवात्मा इस नदी में स्नान करता है भगवान जीवात्मा का “अमानवन” के रूप में हाथ पकड़कर ऊपर उठा लेते हैं। भगवान के इस कृपा के स्पर्श से सूक्ष्म भौतिक शरीर पूर्णत: कट कर अलग हो जाता है तब तक जीवात्मा का इस भौतिक संसार से सम्बन्ध रहता है। “भौतिक पहलुओं के सम्पूर्ण नष्ट होने से उसकी अज्ञानता भी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है” और इसके बाद ही जीवात्मा के पूर्ण ज्ञान का विस्तार हो जाता है। अनुवादक टिप्पणी: स्थूल शरीर – पंच भूतों (पाँच तत्त्व – भूमि, जल, हवा, अग्नि और आकाश) से बना हुआ है। सूक्ष्म शरीर – मन, वासना / रुचि यह हमें अपने पिछले अनुभव से प्राप्त होता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आचार्य हृदय के १०४वें चूर्णिकै के अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से समझाते है। यह चूर्णिकै बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करता है कि कैसे भगवान जीवात्मा जो इस संसार में पूर्णत: डूबा हुआ है को परमपद प्राप्ति कर वहाँ कैंकर्य के लिये कष्ट सहते हैं। इस चूर्णिकै में नायनार एक किसान का उदाहरण देते हैं कि कैसे किसान मेहनत कर अपनी मन पसन्द फसल तैयार करने के लिये कष्ट उठाना पड़ता है। इस पहलू को उसी चूर्णिकै में आगे श्रीनायनार समझाते हैं कि “सूक्ष्मवोट्टुम नीरिले कलुवि” – वें समझाते है “जैसे धान कि गंदगी को निकालने के लिये जल का प्रयोग होता है” उसी तरह श्रीविरजा नदी के पवित्र जल से जीवात्मा को स्नान कराकर उसके सूक्ष्म शरीर को निकाल देते हैं। यहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी एक सुन्दर प्रश्न करते हैं – जब जीवात्मा के सम्पूर्ण कर्मों को निकाल देते हैं तो फिर सूक्ष्म शरीर में वासना, (भौतिक इच्छाओं के कण) आदि का क्या आवश्यक है? इसका वें स्वयं जवाब देते हैं कि यह भगवान का एक संकल्प मात्र है कि जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक ले जाना है और जीवात्मा का वहाँ तक जाने के लिये एक शरीर की आवशयकता होती है। इसलिये स्वयं भगवान ही जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक पहुँचने तक रखते हैं। इस सिद्धान्त को स्थापित करने हेतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पूर्वाचार्यों कि आज्ञाओं को प्रस्तुत करते हैं। जैसे कि जीवात्मा विरजा नदी में स्नान करता है उसका सूक्ष्म शरीर धुल जाता है और अमानवन भगवान स्पर्श मात्र से वह आध्यात्मिक शरीर का स्वरूप धारण करता है (उसी चूर्णिकै में श्रीनायनार स्वामीजी ने भी इसे समझाते है)। यहाँ श्रीएरुम्बी अप्पाजी के पाशुर को स्मरण करना चाहिये “मन्नुयिरगाल इंगे मणवाल मामुनिवन पोन्नडियां सेंगमलप पोधुगलै उन्निच चिरत्ताले तीणडील अमानवनुम नम्मैक करत्ताले तिणडल कदन” – वह जो यहाँ दृढ़ता से हैं, वह जो निष्ठा से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों को पकड़े हैं, अमानव अपने कर्तव्य से बाध्य होकर उनका स्पर्श करते हैं। इस पाशुर का पठन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी विरचित उपदेश रत्नमाला के अन्त में करते हैं।
  • एक विस्मयपूर्ण भक्ति योग में रहना जो इस संसार चक्र से मुक्ति पाकर भगवान के पास जाने का साधन है और प्रपत्ति हीं भगवद्प्राप्ति का वास्तविक साधन है यह न मानना बाधा है। शास्त्र में मुक्ति (परमपद में नित्य कैंकर्य) के कई साधन बताये गये हैं। भगवद्गीता में समझाया गया है कि भक्ति योग जिसे शास्त्रों में भगवान तक पहुँचने के लिये सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है। परन्तु यह भक्ति योग मूलत: जीवात्मा के स्वयं के परिश्रम पर निर्भर करता है फिर भी वह जीवात्मा के सही स्वभाव के विपरीत है जैसे कि स्वाभाविक लक्षण शेषत्व और पारतंत्रय आदि है। इसलिये हमारे आल्वारों और आचार्यों ने भक्ति योग ही उपाय है इसे अस्वीकार करके प्रपत्ति जो जीवात्मा के लिये सहज है को उपाय माना है। यह हमारे लिये उचित होगा कि हम अपने पूर्वाचार्यों के पद चिन्हों का पालन करें।
  • प्रपत्ति शब्द सीधा भगवान कि ओर संकेत करता हैं इसे स्पष्ट रूप से न समझना बाधा है। प्रपत्ति शरणागति है – पूर्णत: भगवान के शरण होना और उनके हीं सहारे को मानना। हालाँकि ऐसे दिखता है कि “हमने” उन्हें पकड़ रखा है लेकिन यह सत्य नहीं है। शरणागति का वास्तविक अर्थ है “त्वमेव उपाय भूतो मे भव – इति प्रार्थना मति:” – यह प्रार्थना करने की मानसिक स्थिति है “आप केवल मेरा उपाय हो जाओं”। यानि प्रपत्ति में स्वयं भगवान उपाय हो जाते हैं। क्योंकि वें उपाय है हमारी यह सोच कि “मैं शरण हो रहा हूँ” उपाय नहीं हैं। वों एक हीं उपाय और उपेय हैं। अत: यह कहा जा सकता हैं कि प्रपत्ति हीं भगवान को दर्शाता हैं। अनुवादक टिप्पणी: गीताजी के चरम श्लोक में भगवान अर्जुन को आज्ञा देते हैं कि सभी धर्मों को त्याग कर सिर्फ मेरी शरण में आवो मैं तुम्हें सारी चिन्ताओं से मुक्त कर दूँगा। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी में इस चरम श्लोक को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। यहाँ भगवान कृष्ण कहते “मामेकं शरणम्” – मुझे हीं सिर्फ उपाय मानो। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “एक” शब्द की विस्तृत व्याख्या करते हैं। यहाँ वे पहचानते हैं कि “एक” शब्द प्रमाणित करता है कि केवल शरणागत होना उपाय नहीं है और भगवान ही उपाय हैं। हमारे सत सम्प्रदाय के इस सूक्ष्म सिद्धान्त को समझना कि यह सिद्धान्त बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई सूत्रों में “एक” को विस्तार से समझाया गया है। इस सिद्धान्त को अच्छी तरह से समझने के लिये हमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मुमुक्षुप्पड़ी के कालक्षेप के सुन्दर व्याख्या को श्रवण करना चाहिये।
  • शरणागति जो अधिकारी विशेषण है (योग्यता प्राप्त व्यक्ति का सहायक) को उपाय समझना बाधा है। जैसे समझाया गया है कि समर्पण कि प्रक्रिया मोक्ष चाहनेवाले व्यक्ति का सिर्फ एक गुण है – अधिक कुछ नही। इस उपाय से भ्रमित होना सही नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: अधिकारी विशेषण का अर्थ वह सहायक जो मनुष्य की विशिष्ट पहचान करता है। यहाँ अधिकारी वह है जो मोक्ष कि “चाहना” करता है – ऐसे जीवात्मा के लिये शरणागति एक प्राकृतिक है क्योंकि भगवान की शरणागति ही जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। मुमुक्षुप्पड़ी के ५५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी घोषणा करते हैं कि “शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपं” – भगवान का दास बनकर रहना जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से प्रमाणों से स्थापित करते है कि जीवात्मा दास है और श्रीहरी स्वामी है। अगले सूत्र में कहते है कि “शेषत्वमिल्लाधपोधु स्वरुपमिल्लै” – जब शेषत्व नहीं है तो उसका सच्च स्वभाव नष्ट हो जाता है। इसलिये जीवात्मा के सच्चे स्वभावनुसार भगवान के शरण होना एक स्वाभाविक क्रिया है – उसे कोई विशेष साधन नहीं मानना चाहिये। कालक्षेप में इस सिद्धान्त को समझाने के लिये एक अच्छा उदाहरण सुना है। एक परोपकारी मनुष्य अपने तिरुमाली में सबको प्रसाद बाँट रहा है। वहाँ एक व्यक्ति आता है और उसे पाने की इच्छा करता है। यहाँ पर प्रसाद के लिये उपाय है परोपकारी मनुष्य का सभी को खिलाने का करुणामय भाव है। परन्तु जिसे वहाँ पाना है उसे “भूख” होनी चाहिये – यही भूख अधिकारी विशेषण है – बिना भूख के वह प्रसाद नहीं पा सकता है जो वहाँ बाँटा गया है। परन्तु यह भूख उपाय नहीं है – यह तो केवल प्रसाद पानेवाले के लिये एक मूलभूत सहायक है।
  • बिना पुरुषकार के शरण होना बाधा है। सामान्यता पुरुषकार का अर्थ सिफारिश है। जीवात्मा को ऊपर उठाने के लिये भगवान को समझाना कि आप ही उपाय हैं। क्योंकि हम कृत्य अकरणम् (शास्त्रों की आज्ञा का पालन नहीं करना), अकृत्य अकरणम् (शास्त्रों द्वारा वर्जित कार्यों में निरत रहना), भगवद अपचार (भगवान के प्रति अपराध करना), भागवत अपचार (भागवतों के प्रति अपराध करना), आदि से भरे हुये हैं, भगवान हमारा तिरस्कार कर सकते हैं। हमारे में इतने अवगुण होते हुये भी माता श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान को समझाती हैं कि वे इन्हें स्वीकार करें और इनकी रक्षा करें। पुरुषकार का यही मुख्य अर्थ हैं। यह कहा गया हैं कि बिना पुरुषकार के शरणागति असफल हैं। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वाचार्यों ने श्रीमहालक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार की भूमिका को विस्तार से समझाया हैं। शरणागति गध्य में श्रीरामानुज स्वामीजी पहिले अम्माजी के पास जाते हैं और फिर भगवान के शरण होते हैं। हमारे सत सम्प्रदाय में द्वय महामन्त्र की बहुत स्तुति होती है क्योंकि यह अम्माजी की भूमिका को पूर्णत: प्रकाशन करता है। द्वयम के पहिले खण्ड में यह समझाया गया हैं कि अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण के शरण होना चाहिये और सिर्फ भगवान को हीं उपाय मानना चाहिये। द्वयम के दूसरे खण्ड में यह समझाया गया है कि इस दिव्य युगल जोड़ी की हमें एक साथ सेवा करनी चाहिये जिससे भगवान का मुखोल्लास होगा। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अम्माजी के भूमिका और पुरुषकार को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी १३५वें सूत्र में समझाते है कि काकासुर (कागभुसण्डी) ने गलत इरादे से माता सीता जो प्रभु श्रीराम के संग थी को दु:ख पहुँचाया लेकिन अन्त में माता सीता हीं के पुरुषकार से काकासुर को अभयदान दिया। परन्तु दूसरी तरफ रावण श्रीराम के हाथों मारा गया क्योंकि माता सीता उस वक्त श्रीराम के संग नहीं थी। इसलिये जब हम भगवान के शरण होते हैं और यदि अम्माजी भगवान के साथ हैं तो भगवान जीवात्मा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं और यदि अम्माजी के पुरुषकार को अनदेखा करेंगे तो अपने इच्छा के विरुद्ध परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • आचार्य के विषय में यह विचार करना कि वे केवल पुरुषकार हैं नकि स्वतन्त्र उपाय है बाधा है। सामान्यतया आचार्य को अम्माजी का सहायक/दास समझा जाता है। आचार्य अम्माजी की तरह ही दयालु, बिना किसी भेदभाव के सभी के प्रति करुणामय हैं। परन्तु श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ९५वें पाशुर में समझाया गया हैं कि “विण्णिन् तलैनिन्नु वीडलिप्पानेम्मिरामानुजन्” – समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्रीरामानुज स्वामीजी पधारे हैं, आचार्य भी स्वतन्त्र उपाय हो सकते हैं। यह श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें पाशुर का भी सार है “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – हमारे उज्जीवन के लिए आचार्य की कृपा ही सर्वश्रेष्ठ आर्शिवाद है। अनुवादक टिप्पणी: अंतिमोपाय निष्ठा में आचार्य को स्वयं भगवान का अपरावतार समझाया गया है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४२७वें सूत्र में समझाते हैं कि सीधे भगवान के पास पहुँचने का अर्थ है भगवान का हाथ पकड़ने के लिये सहायता मांगना और आचार्य के द्वारा भगवान के निकट पहुँचने का अर्थ है भगवान के चरण कमलों को पकड़ना। आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। भगवान के चरण कमलों के जैसे आचार्य भी बहुत दयालु हैं। अत: उन्हें स्वतन्त्र उपाय माना गया है।
  • उपाय और उपेय को दो भिन्न भिन्न तत्त्व समझना बाधा है। अन्तिम लक्ष्य तो परमपदधाम में भगवान के निकट पहुँचना और उनके आनंद के लिये नित्य कैंकर्य करना है। इस अन्तिम लक्ष्य प्राप्ति के लिये वों हीं एकमात्र साधन है। अत: उपाय और उपेय भगवान हीं हैं।
  • अन्य सिद्धान्तों के विध्यालय के जनों से सम्बन्ध रखना जो भगवान को जगत शरीरत्वम (पूर्ण ब्रम्हाण्ड में निवास करनेवाली अकृष्ट आत्मा), आदि सिद्धान्त को नहीं मानते हैं – बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “उडन्मिसै उयिरेनक् करनथेंगुम परनतुलन” – जैसे आत्मा सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई है (ज्ञान के द्वारा), स्वयं भगवान भी सर्वत्र व्याप्त हैं। यहाँ पर भगवान हर ब्रह्माण्ड के हर तत्त्व में व्याप्त है और सबकुछ उनका शरीर है – यही विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है। रावण को परास्त करने के पश्चात ब्रह्माजी भगवान श्रीराम कि बहुत स्तुति करते हैं। वें श्रीराम की श्रेष्ठता को “सीता लक्ष्मी भवान विष्णु:” कहकर स्थापित करते हैं – श्रीसीताजी श्रीमहालक्ष्मीजी हैं और आप विष्णु है और “जगत सर्वं शरीरं ते” – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। परन्तु कुदृष्टिवाले (जो शास्त्र को गलत ढंग से पेश करते हैं) इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं करते हैं। अत: हमें ऐसों से मित्रता नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी:  विष्णु का अर्थ है जो सर्व व्यापी है। वासुदेव का अर्थ जो सर्वत्र रहते हैं। नारायण का अर्थ है जो स्वयं सबके निवास स्थान हैं और वे स्वयं भी सब में व्याप्त हैं। भगवान के यह तीन नाम उनके सर्वत्र व्यापी गुण को दर्शाते हैं। वे सब वस्तुओं की आत्मा है यह जगत शरीरत्वम की पुष्टी करता है। यह बहुत साधारण विचार है। आत्मा की तरह आत्मा का भी एक शरीर है, परमात्मा के लिये सबकुछ उसके शरीर जैसे है। इस मतभेद में केवल एक समानता है – आत्मा शरीर के एक निश्चित अंग पर है और वह पूर्ण शरीर में ज्ञान के द्वारा फैली हुई है (यानि आत्मा शरीर के सभी अंगों में प्राकृतिक रूप में उपस्थित नहीं है) – क्योंकि आत्मा स्वभाव में अणु है। परन्तु परमात्मा विभु है – इसलिये इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण कण में वे शारीरिक रूप से व्याप्त हैं। वेद के इस तत्त्व को अन्य विध्यालय के विद्वानों को मान्य नही है और ऐसों से मित्रता हमारे ऊपर विपरीत परिणाम कर सकता है यदि हम स्वयं इस मूल सिद्धान्तों में दृढ़ नहीं है। इसलिये ऐसे लोगों से मित्रता से बचने की सिफारिश की जाती है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-39.html

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तिरुप्पावै अनुभव – तिरुप्पावै – अर्थपञ्चकम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पराम्बा माँ गोदाम्बाजी (आण्डाळ् देवी) द्वारा रचित तिरुप्पावै उभय वेदांत का सार है| इस तिरुप्पावै के गूढ़ रहस्यार्थ को आत्मसात करने पर , परमपद प्राप्ति में आने वाली सारी बाधाएं , अड़चने ,स्वयमेव समाप्त हो जाती है| परमपद का मार्ग सुगम और सुलभ हो जाता है|

आण्डाळ् – रन्गमन्नार्, श्रीविल्लिपुतूर्

आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने अपनी मुमुक्षुप्पडि में  कहा है की,  एक मुमुक्षुको ( इस संसार के बंधनो से मुक्त हो, मृत्यु लोक में आवागमन से मुक्त हो , परमपद में भगवान् के नित्य कैङ्कर्य में सलंग्न रहने की आकांक्षा रखने वाला) को  “अर्थ पञ्चकम्” (पञ्च भाव ) का पूर्ण रूपेण ज्ञान होना अति आवश्यक है  |

अर्थ पञ्चकम् के यह पांच भाव कुछ इस प्रकार है:

१.  परमात्म स्वरूपम्| (भगवान् के स्वरूप का ज्ञान) |

२.  जीवात्म स्वरूपम्| (स्व-स्वरूप/ पृथक आत्म स्वरूप/जीव का स्वरूप का ज्ञान) |

३.  उपाय स्वरुपम्| (भगवत प्राप्ति के साधन का का ज्ञान ) |

४.  उपेय स्वरूपम्|  (जीव के अपने लक्ष्य याने भगवत प्राप्ति के पश्चात की गतिविधियां का ज्ञान) |

५.  विरोधि स्वरूपम्| (लक्ष्य की प्राप्ति याने भगवत प्राप्ति में आने वाली बाधाएं \ रुकावटों का ज्ञान   होना) |

तिरुप्पावै के पहले पासुरम् में ही आण्डाळ् देवी संक्षेप में अर्थ पञ्चकम् बतलाकर समझाती है | यहां आण्डाळ् देवी कहती है  “नारायणने नमक्के परै तरुवान्”, पूर्वाचार्यों के अनुसार आण्डाळ् देवी की इस पंक्ति के भाव कुछ इस प्रकार है|

  • “नारयाण”  भगवान नारायण को सम्बोधित करने वाला यह नाम , यहाँ भगवान के परमात्म स्वरुप को दर्शाता है|
  • इस पंक्ति में नारायण नाम के दो अर्थ है, जो इस प्रकार है:
      • परत्व (स्वामित्व) – भगवान् के स्वामित्व को जतलाते हुये, इस चराचर जगत में जीवात्मा के आधार (अवलम्बन) हैं , दर्शाता है|और सभी जीवात्मा के नारायण ही आधेय है| , दर्शाता है (आधार \ अवलम्बन पर आश्रित है) |
      • सौलभ्य (भगवान का सुलभ गुण , उपगम्य-सर्व व्यापी) – भगवान के सौलभ्य गुण को दर्शाते हुये, इस का आभास करवाता है की , जीवात्माओं को भगवान बड़ी सरलता से मिल जाते है,  इसका अर्थ यह भी ले सकते है की ,भगवान अंतर्यामी रूप में सभी जीवात्माओ में विराजमान है |
  • “नमक्कु” यह शब्द, जीवात्म स्वरूप (स्व स्वरुप) को स्पष्ट रूप से सम्बोधित करता है|”ए” कार से यह शब्द (नमक्के) हुआ, देवी आण्डाळ् जीव को (स्वयं को) इंगित करते हुये कहती है,  जो  जीवात्मा स्वयं को, भगवान् को आत्म समर्पण करने के लिए तत्पर है अर्थात् जो अपना ” अकिंचनत्व ” (जिसके पास भगवान् को अर्पण करने के लिए स्वयं के आलावा कुछ नहीं), “अनन्य गतित्व” (उसका और कोई आश्रय नहीं) और  वह भगवान् का पूर्ण रूपसे शरणागत है |
  • “नारयणने तरुवान्” उपाय स्वरूप को स्पष्ट करता है – ” नारायणने तरुवान् “ का अर्थ है कि केवल नारायण ही मात्र जीवात्मा पर परम उपकार कर सकते हैं |
  •  “परै”  उपेय स्वरूप को दर्शाता है – परै का अर्थ है निस्वार्थ भाव से भगवत् कैङ्कर्य करना |
  • “विरोधी स्वरूपम्” अन्तर्निहित हमारे स्वतन्त्र्य भाव, जो हमें भगवान से विमुख कर ,भगवान् को हमारी सहायता करनेसे रोकता है|

हमारे संप्रदाय के अनेक पुर्वाचार्यों ने अपने व्याख्यानों में इस को और भी स्पष्ट रूपसे समझाया है |  

तिरुप्पावै व्याख्यान कर्ता (टीकाकार)


पेरियवाच्चान् पिळ्ळै- ३००० पडि


अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नयनार्-६००० पडि

आयि जनन्याचार्यर् – २०००पडि, ४००० पडि


पोन्नडिक्काल् जीयर्- स्वापदेशम्

भगवान के परमात्म स्वरूप को आण्डाळ् देवी द्वारा पुनः कई पदों में समझाया गया:

    • “पार्कडलुळ् पैय तुयिन्र परमन्” – परम पुरुष पुरुषोत्तम भगवान् श्रीमन्नारायण जो क्षीर सागर में शयन कर रहे हैं|
    • “ओंगि उलगळन्द उत्तमन्” -परम पुरुष पुरुषोत्तम, जिन्होंने अपने तीन पगों में तीनों लोकों को माप लिया|
    • “पर्पनाभन्” – जिनके नाभि से , कमल पर ब्रह्मा जी का आविर्भाव हुआ|
    • “तूय पेरुनीर् यमुनै तुरैवन्” – जो यमुना तट पर रहते है|
    • “गोविन्दन्” – धेनुओं (गायों) को पालने वाले, धेनुओं को आनन्द प्रदान करने वाले, धरती माता को सुख प्रदान करने वाले|

जीवात्म स्वरूपम् :

आण्डाळ् देवी अपने तिरुप्पावै के छठवें से पन्द्रहवें पासुरम् में और भी स्पष्ट रूप से जीवात्मा के स्वाभाव और गुण का वर्णन कर रही है. इन पासुरम् में देवी आण्डाळ्, यह उपदेश देती हुई प्रमाणित कर रही है कि, जीवात्मा को सदा श्रीवैष्णवों के सङ्ग का जिज्ञासु होते हुये उन्ही के सहयोग और मार्ग दर्शन में भगवत प्राप्ति,परमपद प्राप्ति की और अग्रसर होना चाहिये |

अपने १६ वे और १७ वे पाशुरम में पराम्बा माँ गोदाम्बाजी भगवान को पाने , अपने व्रत पालन के लिये , सखियों के स्वरुप में नित्य सुरियों का संग लेने स्वयं इन उपदेशों पालन करते हुये , इस उपदेश को सिद्ध करती है की जीवात्मा को , भगवान के अति प्रिय उनकी सेवा में लीन नित्य सुरियों की शरण ले उनकी महिमा को गौरवान्वित करते हुये गुणगान करना चाहिये |

अठारवें से बीसवें पासुरम् में माँ गोदाम्बाजी  पुरुष्कार रूपा (नप्पिन्नै नाचियार्- नीला देवी का अवतार और वृन्दावान में भगवान् कृष्ण के प्रिय महिषी) को गौरवान्वित करते हुये , प्रमाणित करती है की भगवद प्राप्ति पुरुष्कार स्वरूपा माँ की कृपा से ही प्राप्त की जा सकती है |  

विरोधी स्वरूपम् का वर्णन माँ गोदाम्बाजी तिरुप्पावै के दूसरे पासुरम् में “नेयुण्णोम् पालुण्णोम्” कहते हुये उद्घृत करती है, अर्थात् जब हम भगवान् की प्राप्ति को ही लक्ष्य बनाकर चलते है, तब उनके सिवा और कोई वस्तु हमारे लिये भोग्य नहीं समझेंगे | आण्डाळ् यह भी कहती है “चेय्याधन चेय्योम”, जिसका अर्थ है हम वह निषिद्ध कार्य नहीं करेंगे जो हमारे पूर्वाचार्यों ने नहीं किया |  

मुख्यतः  उपाय स्वरूप और उपेय स्वरूप को समझना हमारे लिये अत्यंत आवश्यक है |  
देवी आण्डाळ्  तिरुप्पावै के अट्ठाईसवें और उन्तीसवें पासुरम् में “गोपी और गोप भाव” लेकर इसकी बहुत ही सुन्दर व्यख्या करती है |   

आचार्य पेरिय वाच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी और आचार्य नायनार् स्वामीजी ने इन दोनों पासुरम् पर बहुत ही सुन्दर, अद्भुत व्याख्यान (टीका) लिखें है |  
आचार्य नायनार् स्वामीजी का विस्तृत व्याख्यान अनेक उत्कृष्ट विवरणों से भरा हुआ है | इन पासुरम् के आचार्य द्वारा तत्व निष्कर्ष कुछ इस तरह है |  

उपाय स्वरूप  – तिरुप्पावै का अट्ठाईसवां पासुरम् “करवैगळ् पिन्चेन्रु” (கறவைகள் பின்சென்று):

देवी आण्डाळ्, इस पासुरम् में प्रामाणित करती है, कि भगवान ही “सिद्ध साधन” हैं (स्थापित उपाय जिसे हमारे व्यक्तिगत प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं हैं) |

देवी आण्डाळ् आरम्भ में ही बताती हैं कि, उनका कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग में कोईअन्वय  (संबंध) नहीं है |  माँ गोदाम्बाजी इस पाशुर में भगवान की जीवो पर निर्हेतुक कृपा भी सिद्ध करती है|

    • देवी आण्डाळ् कहती है कर्मयोग हमारे लिए नहीं है क्योंकि कर्मयोग की आवश्यकताओं का पालन हम नहीं कर सकते, जैसे:
      • मनुष्य को महान पण्डितों / विद्वानों का अनुसरण करना चाहिये, परन्तु हम इनकी जगह गायों के पीछे जा रहे हैं |  
      • मनुष्य को दिव्यदेश के दर्शन करने जाना चाहिये, पर यहाँ हम वन में जा रहे है , वन में भी जाकर तपस्या करना कर्मयोग का अङ्ग है, पर हम वन में केवल धेनु चराने जाते हैं ,  धेनु चराना भी वर्ण-धर्म में मान लें , पर हम तो केवल उन धेनुओं को चराते हैं जो दूध देती हैं (दुधारू है) और अन्य पशुओं की उपेक्षा करते हैं |
      • भोजन में भी अनेक नियम हैं, पर हम किसी भी नियम का पालन नहीं करते |हम बिना स्नान किये भोजन करते हैं, हम किसी भी हाथ से भोजन कर लेते है ( बगैर धोये , उच्छिष्ट हाथों से भी,, हम चलते- फिरते भी भोजन कर लेते हैं |  
  • हम ज्ञानयोग नहीं जानते क्योंकि हम “अरिवोन्रुं इल्लाद आय्क्कुलम् ” (अनपढ/अज्ञानी ग्वाले) ग्वाल कुल के लोग हैं, अर्थात हम में सच्चा ज्ञान नहीं है |  
  • भक्ति ज्ञान-विशेष (ज्ञान की विकसित स्थिति) | चूंकि हमें ज्ञान ही नहीं, भक्तियोग करनेका प्रश्न ही नहीं उठता |
  • भगवान भागवतों पर निर्हेतुक कृपा कर , स्वयं के लालन पालन का अवसर प्रदान करते है , जैसे माता कौशल्या और माता यशोदा को प्रदान किया था | हम को यह सौभाग्य भी भगवान स्वयं प्रदान करते है, और यह जीवों का मौलिक धर्म है  (“कृष्णं धर्मं सनातनम्” – भगवान् कृष्ण शाश्वत धार्मिक सिद्धान्त हैं)  | यह स्व-प्रयास से नहीं हुआ है, भगवान स्वयं हम जीवो पर कृपा कर हमारे साथ रहने आते है  | अतः न तो हमारे बाह्य शत्रु हैं (कर्म/ज्ञान/भक्ति योग)  और न ही आन्तरिक शत्रु हैं (“स्वागत स्वीकारम्”- हम स्वयं भगवान् की ओर उपगमन कर, इस प्रयास को “उपाय” ) समझते रहना चाहिये |
  • जिस तरह हमारे पास कोई ज्ञान नहीं है,  वैसे ही भगवान “दोष” रहित है | भगवान मङ्गलमय गुणों से परिपूर्ण है | भगवान का यह मङ्गलमय गुण पूर्णतया उनके ग्वालों के साथ “गोविन्द” के स्वरुप में रहते  प्रकट होता हैं | जब नित्यसूरियोंके के साथ रहते है तब भगवान का “प्रभुत्व” पूर्णतया प्रकट होता है, और  गोप गोपियों के साथ रहते है तब भगवान का “सौलभ्य”  पूर्ण रूपेण प्रकट होता है|
  • भगवान न केवल मङ्गलमय गुणोंसे परिपूर्ण है, बल्कि सिद्ध-साधन भी है (स्थापित उपाय है, जीव को  विशेष प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती) | भगवान का हर जीवात्मा से सम्बन्ध है | भगवान अन्तर्यामि है , हर जीवात्मा के मूल है | भगवान द्वारा प्रसादित “तिरुमन्त्र”, परमात्मा और जीवात्मा के बीच नौ प्रकार के सम्बंधों को दर्शाता है | पिता-पुत्र, रक्षक-रक्ष्य, शेषी-शेष, भर्ता-भार्या, ज्ञेय-ज्ञाता, स्वामि-स्वम्, आधार-आधेय, आत्मा-शरीर और भोक्ता-भोग्य | अतः शरण में आये शरणागत की रक्षा करने का उत्तरदायित्व भी भगवान का है |
  • माँ गोदाम्बाजी कहती है , हे गोविन्द आप हम जीवो पर निर्हेतुक कृपा कर , अपने सरल सुलभ स्वभाव वश ,  आप हमारे अपने सखा बन हमारे मध्य , हमारे ही साथ रहने आते है, जिसका अहसास हम नहीं कर पाते , हम अज्ञानी अज्ञानतावश , प्रेमवश आपको सखा न मान , सर्वे सर्वा मान  “नारायण” नाम से सम्बोधन करते है , पर हे गोविन्द हमारी इस भूल को क्षमा करना | यहाँ हमारी गुरु परंपरा के आचार्य नायनार कहते है की, शरणागति में हमेशा क्षमा याचना करते रहना चाहिये, कारण की जीवात्मा गलतियों का पुतला है, और गलती और भूल इसका स्वाभाव है|
  • पराम्बा माँ गोदाम्बाजी बतला रही है , भगवान स्वयं परमपद प्राप्ति के परम उपाय है , जीव मात्र अकिञ्चन है, जिसको कोई और शरण नहीं है (अनन्यगतित्वं), भगवान से परम कैंकर्यं की प्रार्थना करते हुये कहती है की , वह भगवान को स्वयं की रक्षा करने से रोक नहीं  सकती | (“विलक्कामै”) |
  • इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् भगवान् का निरपेक्ष उपायत्व (अनपेक्षित हमारी रक्षा करना) को दर्शाती है | यह स्मरण रहे कि भगवान् को हमारी रक्षा करने के लिए, हममें आकिञ्चन्य भाव, अनन्य गतित्व और विलक्कामै होना आवश्यक है – ये उपाय के अंश नहीं हैं, बल्कि केवल अधिकारी विशेषण (मुमुक्षुके गुण) हैं | ये गुण ही अन्तर है एक जीवात्मा में जो भगवान् को शरणागति करना चाहता है और जो नहीं चाहता |

उपेय स्वरूपम् -उन्तीसवां पासुरम्- चिट्रम् चिरुक्काले

इस पासुरम् में आण्डाळ् समझाती हैं कि भगवत् कैङ्कर्य जो भगवान् को तुष्ट करता है वही अन्तिम ध्येय है |

  • बडे सवेरे हम सब आपकी शरण में आये हैं | नायनार् उषा काल की तुलना मुमुक्षु बनने की प्रारम्भिक अवस्थासे कर रहे हैं –  यह वह स्थिति हैं ,जब हम अज्ञानता से मुक्त हुये हैं , परन्तु भगवान् से प्रेम , लगाव , उनमें आसक्ति पूर्णतया विकसित नहीं हुयी है, प्रातःकाल की बेला में उठकर भगवान की शरणागति करना ज्ञानमय अवस्थाका प्रतीक है |
  • आप स्वामी है, हम पर आपका स्वामित्व है, आपको हमारी रक्षा के लिए आना था, पर हम आपसे मिलने आ गये| भगवान रामजी के वनवास के समय दंडकारण्य में, जब सारे ऋषि मुनि उन्हें मिलने उनके आश्रम पहुँच अपनी व्यथाएँ बतलायी  , तब भगवान श्री रामजी को बड़ा क्लेश हुआ की ,  जहाँ मुझे उनके पास जाकर उनके कुशलक्षेम पूछना चाहिये था , ऋषि मुनियों को कष्ट उठा कर स्वयं मेरे पास आना पड़ा | ऐसे जिससे भगवान को क्लेश हो, उसे स्वागत स्वीकाराम संज्ञा दी गयी, कारण की यह स्थिति अस्वाभाविक है|
  • इस में यह भाव भी बतलाया गया, भागवत आपके सम्मुख आकर दंडवत प्रणाम कर श्रद्धा से आपकी आराधना भी कर रहे है|  भगवान इतने स्वराध्य है की , वह भक्तों से प्रणाम की अपेक्षा भी नहीं रखते| भक्त को स्वयं की और आता देखकर ही आनन्दित हो जाते है| जैसे पिता बिना किसी अपेक्षा के पुत्र को देखते ही हर्षान्वित हो जाता है| जबकि देवतान्तर में अन्य देवता अपने उपासको से सदा उपासना  की कामना रखते है|
  • हमनें आपके स्वर्ण से भी बहुमूल्य पाद पद्मों का गुणगान कर रहे है, जो सभी वैदिकों को अति प्रिय है | हम आपकी और आपके चरणकमलों का महिमा मंडन किसी अपेक्षा से नहीं किये है – हमारा ध्येय केवल उनका गुणगान करना है, और आपके चरणों की शरणागति ही हमारा ध्येय है |
  • देवी आण्डाल कह रही है , हम आपको हमारा व्रत क्या है बतलाती है  | आपका वृन्दावन में अवतरित होना ही पर्याप्त नहीं है | आप अपनी मर्जी से हम गोप गोपियों के कुल में अवतरित हुये है|  आप हमारे मनो को निर्मल करते हुये अपने प्रति हमारा लगाव , आसक्ति बढ़ाई है| इसलिए अब आपको, हमारी इच्छाओं की पूर्ति करते हुये,  हम सभी को अपने यथोचित निज कैंकर्य में सम्मिलित करना होगा|
  • भगवान देवी आण्डाल को आश्वासन देते है की “व्रत का फल जरूर प्रदान करेंगे”, तब देवी आण्डाल कहती है की , हम ने व्रत, फल के लिये नहीं किया, व्रत आपकी सेवा – स्मरण में रत रहने के लिये किया है , हमें आपके निज कैंकर्य के सिवाय और कोई अभिलाषा नहीं है |
  • देवी आण्डाळ् कहती हैं कि भगवान् जहाँ कहीं भी हों- परमपद में या इस भौतिक चराचर जगत में – वह सदा उनके साथ ही रहना चाहती हैं | ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मणजी “इळैय पेरुमाळ् ” , भगवान् श्री रामजी का विरह सहन नहीं की स्थिति में, भगवान रामजी के साथ ही वन गमन को गये थे | उसी प्रकार देवी आण्डाळ् भी कहती है कि, भगवान् स्वामी हैं और वह स्वामी की संपत्ति है, इसलिये सदा भगवान कृष्ण के साथ ही रहना चाहती है | कहती है की , यह सम्बन्ध शाश्वत है, और चाहती है की, यह सम्बन्ध स्पष्ट रूपसे प्रकट हो |
  • अन्त में देवी आण्डाळ् स्थापित करती हैं कि, उनका परम ध्येय भगवान् की प्रसन्नता के लिये, भगवत कैंकर्य में रत रहना है | वह लक्ष्मणजी की तरह, सदा भगवान् का कैङ्कर्य करते रहना चाहती है,  न कि भरताळ्वान् (भरतजी) की तरह जो श्रीरामजी से कुछ समय के लिये दूर रहे थे |”मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” अर्थात् भगवान से प्रार्थना करती है की, हमारी सभी कामनाओं को मिटा दे, यहाँ देवी आण्डाल स्पष्ट करती हैं कि,  उन्हें स्वयं के आनन्द की कोई कामना नहीं  है,  साथ यह भी कहती है की  भगवान् को भीलगना चाहिये की, वहकोई कामना नहीं रखती है |इसी अवधारणा को तिरुवाय्मोळि में नम्मळ्वार् “एम्मा वीडु” (२.९) दशक “तनक्केयाग एनैकोळ्ळुमीदे” में स्पष्ट किये है अर्थात् भगवान् अपने ही आनन्द के लिए आळ्वार् संत को कैङ्कर्य में रखें |

इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् परम लक्ष्य को प्रकट कर स्थापित करती हैं | इसके अतिरिक्त “मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” विरोधी स्वरूप को स्पष्ट करता है – अपने स्वार्थ के लिये ,भगवान् के निजी आनन्द के बजाय, स्वयं के आनंद के लिये भगवान् का कैङ्कर्य करना |

इस प्रकार हम “अर्थ पञ्चकम्” को आण्डाळ् के तिरुप्पावै की दिव्य वाणि और अनेक आचार्यों के इस दिव्य प्रबन्ध के व्याख्यानों में दिये गये उत्कृष्ट व्याख्यान  उपदेश द्वारा समझ सकते हैं |

अडियेन विजयकुमार रामानुज दासन्
अडियेन श्याम्सुन्दर् रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/01/thiruppavai-artha-panchakam.html

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १२

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

 

१११) मुक्तात्मानुक्कु लीलाविभूति तदीयत्वाकारत्ताले उद्देश्यमाग निन्रतिरे

मुक्तात्मा के लिए, लीलाविभूति (यह भौतिक संसार) भोग्य वस्तु ही है क्योंकि यह भी भगवान् की ही सम्पत्ति है । यह हमने १०५ वें  सूत्र मे विस्तारपूर्वक देखा है ।

११२) उरङ्गिनानागिल् परक्क्षणत्तुक्कु उडलायिरुक्कुम् । उणर्तिरुन्तानागिलुम् अप्पडिये ।

 

जैसे कहा गया है — उरङ्गुवान् पोल् योगु शेय्द परुमाळ् अर्थात् वह परब्रह्म भगवान् जो शयन (योग-निद्रा) का छल कर निरन्तर सभी चिदाचित वस्तुओं का संरक्षण और श्रेय का चिन्ता कर रहे है। यथारूप वही भगवान् सबका संरक्षण जागृक अवस्था मे भी करते है ।

अनुवादक टीका: इस पासुर व्याख्यामे, श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी कहते है – भगवान् स्वनेत्र बन्द (योग-निद्राका छल कर) करते है ताकि वह विभिन्न योजनाओंसे जीवोंका संरक्षणेत्यादि कार्यों पर दीर्घ आलोचन कर सकें (जैसे हम सभी किसी कार्य के सन्दर्भ में स्वनेत्र बन्द कर दीर्घ आलोचन करते है)। आऴ्वार नित्य इंगित करते है कि सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने वाले एक मात्र भगवान् ही है। भगवान् के इस दिव्य गुण से प्रभावित आऴ्वार परम श्रद्धा से अपना निर्वाह कर रहें है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् छल (योग-निद्रा) अवस्था और जागृक अवस्था दोनों अवस्थाओं में सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने में तत्पर रहते है। यह प्रतिपाद्य विषय श्रीमद्रामायण की लीलाओं में दृग्गोचर है। भगवान् श्रीरामचन्द्र का शिविर समुद्रतट के किनारे पर था। हर रात्रिमे भगवान् के शिविर के चारों ओर तैनात वानर सेना टहलते है। भगवान् के शिविरके चारों ओर टहलते वानर सेना में प्रत्येक वानर बारी-बारी मे थक कर विश्राम करने चले जाते और अन्तोगत्वा शिविर की रक्षा करने मे कोई भी तैनात नही बचता। शिविर के अन्दर से यह दृश्य देखकर भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वयं शिविर के भीतर आकर विश्राम करते हुए वानर सेना के चारों ओर स्वयं चलकर उनका संरक्षण करते थे।  देखिए यह कितना सुन्दर दृश्य है। हमारे पूर्वाचार्य अतः बारम्बार कहते है की भगवान् ही जीवके परमकल्याण कारक और श्रेयोभिलाषी है क्योंकि जीवके जागृक-अवस्था और निद्रावस्था दोनों अवस्थाओं मे भगवान् जीवका संरक्षण करते है।

११३) चक्करवर्ति तिरुमगनुक्कु विल्लुकैवन्दिरुक्कुमापोलेयायिट्रु कृष्णनुक्कु कऴल् कैवन्दिरुक्किपडि

जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रको उनके शार्ङ्ग धनुष पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे धनुषका प्रयोग करते है, ठीक उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को भी उनकी मुरली पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे मुरली का प्रयोग सुन्दर मधुर वेणु-ध्वनि का है।

अनुवादक टीका: यथा श्रीमद्रामायण मे उल्लिखित है – भगवान् श्रीरामचन्द्र का शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी तिरुप्पल्लाण्डु दिव्य-प्रबंध के अन्तिम पासुर ‘शार्ङ्गमेन्नुम् विल्लाण्डान्मे यही दर्शाते है की वह जो स्व धनुष का पूर्ण नियंत्रण करता है अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्रका शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। इस पासुर टीका मे टीक कर (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामाजी) यह दर्शाते है की भगवान् का शार्ङ्ग धनुष सभी आयुधों का प्रतिनिधि है। इसका यह अर्थ हुआ की भगवान् सभी जीवों (नित्यसूरिगणों, मुक्तात्माओं, अन्य जीवात्माओं) के एक मात्र नियंत्रक है। यहां आण्डान् शब्द का केवल यह अर्थ नही की भगवान् यह दिव्यायुध को धरे है परन्तु भगवान् के परिपूर्ण नियंत्रण को भी दर्शाता है यथा एक राजा स्वप्रजा को परिपूर्ण नियंत्रण मे रखता है।

भगवान् श्रीरामचन्द्र

श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ३.६ ‘नावलम् पेरियतीविनिल् पदिग‘ मे श्रीकृष्ण भगवान् की वेणु माधुर्य कुशलता और वेणुधुण के आकर्षक प्रभाव का वर्णन अति सुन्दरता से करते है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामाजी, श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य शरीर के अंगों का वर्णन आकर्षक ढंग से करते है (जैसे उनके दिव्य करकमलों का सुन्दर स्थान/स्थिति, उनकी वेणु को स्पर्श करते हुए उनके अधर ताकि वेणु को बजा सकें, उनका एक तरफ़ा दिव्य अर्गभाग, वायु उच्छश्वसन और निश्वसन के कारण भगवान् के कोष्ठ का विस्तार और निपात होना)। श्रीकृष्ण भगवान् की दिव्य वेणुधुण के श्रवण से मन्त्रमुग्ध वृन्दावन की गोपिकाएँ, गाएँ और अन्य पशु, देवलोक के नृत्यक ऐसे खडे है जैसे उनके सभी के नेत्रों की गतिविधि प्रतिबन्धित है। इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् का उनकी वेणु पर नियंत्रण और प्रभुत्व है।

 

११४) गणत्तारुण्डायिरुक्कच् चेय्देयुम् भारमिल्लैये अहङ्कार स्पर्शमुडैयार् इल्लामैयाले


श्रीभगवान् के दिव्य धाम (परमपद) मे ऐसे अनेक दिव्यसूरिगण है जो परिपूर्ण ज्ञानी (सुविज्ञ) है परन्तु उनमे स्वल्प मात्रा मे अभिमान व गर्व नही है। अतः ऐसे दिव्यसूरिगण को भार नही माना जाता है।अनुवादक टीका: श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ४.४.६ पासुर मे कहते है की जो सुदर्शनचक्र से सुशोभित तिरुक्कोष्ठियूर के अर्चाविग्रह भगवान् का ध्यान नही करता और भगवान् को नही भजता,वह केवल भू-भार है। इसी प्रकारेण तिरुप्पावै के मंगलाचरण पासुर – ‘पातङ्गळ् तीर्क्कुम्’ मे पासुर रचनाकार कहते है – वह सभी जो तिरुप्पावै के (३०) तीस पासुरों के ज्ञाता नही है वह भूमि के द्वारा कदापि स्वीकृत नही है। इनकी तुलना मे परमपद के दिव्यसूरिगण पूर्णतया सिद्ध और सुविज्ञ है अतैव किसी के लिए भी भार नही माना जाता है।

११५) शेषिक्कुपायभावम् स्वरूपानुबन्धियान पिन्बु शेषत्वनुक्कुम् प्रावण्यम् स्वरूपानुबन्धियागक् कडवदु

जैसे भगवान् (शेषि) का मोक्षोपाय (जीवका संरक्षण कर जीवको मोक्ष प्रदान करना) होना स्वाभाविक है वैसे ही जीवात्मा (शेष) का भगवान् मे रति होना भी स्वाभाविक है।

आऴ्वारों को भगवान् मे अत्यन्त रति का दृश्य

अनुवादक टीका: मोक्ष का एक मात्र उपाय भगवान् ही है। जीवों का संरक्षण करना भगवान् का स्वाभाविक गुण है। अतः इस प्रकारेण जीवात्मा का भगवद्-कैङ्कर्य (स्वस्वामी का कैङ्कर्य) करना स्वाभाविक है। भगवान् के प्रति इस स्वाभाविक-कैङ्कर्य को अत्यन्त प्रेम, भक्तिभाव, और रतियुक्त से करना चाहिए। इस विषयको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्रके ८०वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में बहुखूबी से समझाते है।

सर्वप्रथम, भगवद्-कैङ्कर्य विषय मे, इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी), पेरिय-उडयार् (जटायु), पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामीजी और चिन्तयन्ती को प्रेरणास्तोत्र मानकर श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उनका वर्णन ८०वें सूत्र मे करते है।

श्रीमद्रामायण से अभिज्ञात है की इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) सदैव श्रीरामचन्द्रजी के साथ ही रहते थे। श्रीरामचन्द्र की सन्निकटता मे इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) ने उनकी सेवा विभिन्न प्रकार और अवस्थाओं मे की है। पेरिय-उडयार् (जटायु) और पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी के विषयमे कहते है की इन दोनों ने स्वदेहकी चिन्ता छोड़कर भगवान् के लिये शरीर को त्याग दिया। चिन्तयन्ती नामक गोपी ने भगवद्-विप्रलम्ब भावमे शरीर को त्याग दिया।

८० वें सूत्रकी व्याख्या मे, पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्यचरित्र का वर्णन विस्तार पूर्वक है। पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्य जन्म श्रीरङ्गम के कुछ कोस दूर तोट्टियम् तिरुनारायणपुरम नामक दिव्य क्षेत्र मे हुअा था। एक बार कुछ भगवद्-विरोधि भगवद्विग्रह को आग लगाने की कुचेष्टा करते है। यह जानकर पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी तुरन्त जलते भगवद्विग्रह को आलिंगन कर और इसके पारिणाम स्वरूप शरीर को त्याग देते है। यहां एक प्रश्न उठता है – क्या भगवान् के लिये शरीर को त्यागना क्या उपाय है ? – श्रेष्ठ एवं सिद्ध भगवान् ही उपायोपाय तत्त्वमे परम निष्ठ पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का इस प्रकार के कार्य मे संलग्नता कितना उचित है।

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी ८० वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में इस तत्त्व का वर्णन करते है जिसकी अभूत पूर्व व्याख्या श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने हम भगवद्-बन्धुओं के लिये प्रेषित किया है यथा :

  • सूत्र ८६ – भगवद्-प्रेम से येन-केन प्रकारेण किया गया कार्य कदाचित भी उपाय नही माना जाता है। इस प्रकार का व्यक्तिकरण भगवद्प्रपन्नों मे भगवद्-प्रेम का ही परम स्वरूप है।
  • सूत्र ८७ – उपाय भावना से किए गए कार्य त्याज्य है और कैङ्कर्य भावना से किए गए कार्य सर्वदा स्वीकृत है।
  • सूत्र ८८ – भौतिक वस्तुओं मे रुचि रखने वाले भौतिकवादि, उन भौतिक वस्तुओं को पाने के लिये जिस प्रकार स्वप्राण त्यागने के लिये सदैव तत्पर रहते है ठीक उसी प्रकार भगवद्-प्रेम से ओत-प्रोत भगवद्प्रपन्नों के विभिन्न कार्य भगवद्-प्रेम के कारण स्वाभाविक है।
  • सूत्र ८९ – ऐसे भगवान् से अत्यन्त आसक्त एवं अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्नजनों का अनुष्ठान (शास्रविधि) और अननुष्ठान (अशास्रविधि) उपाय (अन्य मार्ग के माध्यम और स्वप्रयासों से भगवान् को प्राप्त करना) के भाग नही होते है।
  • सूत्र ९० – ऐसे कार्य जैसे भगवान् के प्राकट्य अप्राकट्य मे विलम्ब होने से उत्पन्न मनोवेदना को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना ,भगवान् को संदेशवाहकों के द्वारा संदेश भेजना इत्यादि आऴ्वारोंमे द्रष्टव्य है परन्तु यह केवल भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम और भक्ति का ही व्यक्तिकरण है।
  • सूत्र ९१ – ऐसे कार्य जो विशेष और महान व्यक्तित्वों मे द्रष्टव्य है, वह सदा स्मरणीय और कीर्तनीय है क्योंकि आप सभी सर्वज्ञ है तथापि भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम से संभ्रांत है।
  • सूत्र ९२ – ऐसे कार्य भगवदनुभव और कैङ्कर्य के अङ्ग है। भगवान् स्वयंकी सम्पूर्ण हर्षता के लिये नियुक्त अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्न जनों को दिव्यानुग्रह से आऴ्वारों मे परिवर्तन करने का स्वप्रयत्न का प्रतिफल ऐसे कार्य होते है।

११६) प्राप्त विषयप्रावण्यम् स्वरूपमागैयाले अवध्यकरमन्रु । सीआज्ञमामित्तनै ।

चूंकि भगवान् के प्रति रति (जो जीव के स्वाभाविक रति विषय वस्तु है) जीव के लिये स्वाभाविक है और तुच्छ नही है।  वास्तव मे यह सराहनीय है।

अनुवादक टीका: भगवान् के प्रति रति और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने की लालसा जीव के लिये स्वाभाविक है। इस तत्त्वको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे सुन्दर ढंग से समझाया है और इन सूत्रों पर श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने अभूतपूर्व व्याख्या लिखा है यथा :

  • सूत्र ५२ – शेषत्वम् दु:खरूपमागवन्रो नात्तिल् काण्गिरदु एन्निल् – ऐसा माना जाता है की इस भौतिक जगत् मे किसी व्यक्ति की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है। श्रीवरवरमुनि स्वामाजी मनुस्मृति के श्लोक ‘सर्वम् परस्वं दु:खम्‘ – (अर्थात् किसी की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है) और ‘सेवा श्व वृत्ति‘ (अर्थात् सेवा श्वान की वृत्ति है अत: त्याज्य है) का उदाहरण से समझाते है की शेषत्व दु:ख पूरित है ।
  •  सूत्र ५३ – अन्द नियमम् इल्लै; उगन्द विषयत्तुक्कु शेषमायिरुक्कुम् इरुप्पु सुखमागक्काणगैयाले – सेवा वृत्ति दु:ख पूरित है यह असत्य है। आत्मीय जनों का भृत्य बनना सदैव सुखदायक और आनन्दप्रद है।
  •  सूत्र ५४ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। प्रणव मे अ-कार वाच्य शब्द भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के निधित्व का प्रतीक है। हमारा (जीवों) का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है और उनकी सेवा करने का फल सदैव आनन्दप्रद और सुखदायक है।
  •  सूत्र ५५ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। यह पूर्ववर्ति सूत्र मे संशय प्रश्न का उत्तर है।  अगर जीवों का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है तो क्या यह स्वाभाविक है या अस्वाभाविक है। क्या यहां यह कहना उचित होगा की भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के अभाव मे जीव स्वशेषत्व त्याग देगा ? इसका उत्तर यह है -भगवान् का शेष होना जीव का वास्तविक और स्वाभाविक रूप है जैसा शास्त्रों मे निर्देषित है।
  •  सूत्र ५६ –  शेषत्वम् इल्लादपोदु स्वरूपमिल्लै – जब शेषत्व नही है तो जीवात्मा स्वस्स्वरुप को त्याग देता है।

११७) जीवपरङ्गळ् इरुवरुक्कुम् अपहतपाप्मत्वादिगळ् उण्डायिरुक्कच्चेय्तेयुम् जीवात्मावुक्कु हेयमुण्डाय् भगवदनुग्रहत्ताले कऴियुम् परमात्मा हेय सम्सारग्गनर्हनाये इरुक्कुम्

भगवान् स्वत: विशुद्ध और निष्कलंक है

अपहतपाप्मा गुण से शुरूवात होकर जीवात्मा और परमात्मा दोनों मे आठ गुण समान है। यह गुण जीवात्मा मे तभी प्रकट होते है जब जीवात्मा देह को त्यागकर भगवान् की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। इसे स्वरूपाविर्भाव कहते है। भगवान् का कोई भौतिक शरीर नही है जो उनके कल्याण गुणों को गुप्त रखता है अर्थात् भगवान् का स्वरूप विशुद्ध और पारलौलिक है। आठ समान गुण है –

  • अपहतपाप्मत्वम् –  अपराधों और दोषों से असम्बन्धित या मुक्ति
  • विरजत्वम् –  वृद्धावस्था से मुक्ति
  • विमृत्यत्वम् – मृत्यु से मुक्ति
  • विशोकत्वम् – शोक से मुक्ति
  • विजिगत्सत्तवम् – क्षुधा से मुक्ति
  • अपिबासत्वम् – पिपासा से मुक्ति
  • सत्यकामत्वम् – दिव्य गुण जो रसास्वादनीय है
  • सत्यसङ्कल्पत्वम् –  स्वसङ्कल्पों को पूरा करने की क्षमता

अनुवादक टीका : जीवात्मा स्वाभाविक रूपसे विशु्द्ध और सत्त्वगुणों से सम्पन्न है। भौतिक जगत् मे कर्मसे बन्धित जीवोंका ज्ञान और आनन्द प्रतिबन्धित होता है। भगवान् की कृपासे उन जीवोंका उद्धार होता है अर्थात् कर्म के बन्धन से मुक्त होता है तो मुक्तात्मा कहलाते है और अन्ततोगत्वा परमपद को पहुँचते है। उस समय, मुक्तात्मा सम्पूर्ण ज्ञान, आनन्द और भगवान् की कृपासे प्राप्त आठ सत्त्व गुणों को भली-भाँती समझता है।

भगवान् कदापि कर्म से बन्धित नही होता है। वास्तविकता मे, जीवोद्धार हेतु भगवान् इस भौतिक जगत् मे निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है। अत एव ऋगवेद कहता है – ‘ स उ श्रेयान् भवति जायमान: ‘ – अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् के प्राकट्य से भगवान् स्वयं  प्रशंनीय हो जाते है। जब भगवान् परमपद से भौतिक जगत् मे प्रगट होते है तो वह अपने सत्त्वगुणों को यथारूप और दिव्य पारलौलिक शरीर सहित पधारते है। उनका शरीर जीवात्माओं के शरीर से भिन्न है। इस विषय को अति उत्तम से श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ – ‘ अदियम् शोदि उरुवै अङ्गु वैत्तु इङ्गुप् पिरन्दु ‘ पासुर मे समझाते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस पासुर मे यह कहते है की परमपदमे भगवान् (जो नित्य है) का जो दिव्य मंगल आकर्षक स्वरूप द्रष्टव्य है वही स्वरूप इस भौतिक जगत् मे प्रगट होता है।

११८) नीर्मैक्केल्लैयान तिरुमलै अाश्रयणीयस्थलम् ; मेन्मैक्केल्लैयान परमपदमनुभवस्थानम्

नीर्मै – सरलता, सौलभ्यता – अर्थात् सरलता से कोई भी भगवान् की सन्निकटता (का सान्निध्य) प्राप्त कर सकते है। ऐसी सरलता केवल तिरुमला (श्रीनिवास भगवान्) मे दृश्यमान है। परत्व की पराकाष्ठा परमपद मे दृश्यमान है जहां जीव भगवान् के गुणों का नित्य रसास्वादन करता है।

अनुवादक टीका : श्रीनिवास भगवान् सरलता और सौलभ्यता के प्रतीक है। तिरुमऴिशै आऴ्वार नान्मुगन् तिरुवन्दादि ४५ पासुर मे कहते है की श्रीनिवास भगवान् नित्य सूरियों और संसारियों के लिये समान है। उत्तरवर्ति पासुर मे तिरुमऴिशै आऴ्वार कहते है की तिरुमला मे जन्तु (जानवर) भी श्रीनिवास भगवान् की सौलभ्यता का लाभ उठाते है। कुलशेखराऴ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि ४.५ – अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडन्तियन्गुम्  पासुर मे कहते है सभी प्रकार के जीव तिरुमला मे रहकर तिरुमला के अधिपति श्रीनिवास भगवान् की सेवा और वन्दना करते है। पूर्वाचार्य आगे कहते है यह जीव त्रिश्रेणी के होते है – १) अनन्य प्रयोजनपरर जीव – अन्याभिलाषा रहित अनन्य भक्त जिन्हें अडियार् कहते है। २) प्रयोजनान्तरपरर जीव व वानवर् — वह सारे देव जो साम्सारिक सुखों की अभिलाषा रखते है। ३) अन्यशेषपरर व अरम्बै – रम्भा, ऊर्वशी इत्यादि जो अन्य देवों की सेवा करते है।

परमपद आनन्दप्रद और हर्षमय है। वहां आनन्द की कोई सीमा नही होती है। वहां भगवान् ही पूर्ण केन्द्रबिन्दु है और भगवान् का परत्त्व पूर्णतया दृष्टिगोचर है।

119) स्वरूपानुरूपमान प्राप्यानुसन्धानम् पण्णिनाल् पोय्प्पुक्कल्लन्दु निर्क वोण्णादु

जीवात्मा भगवान् के प्रति स्वदासत्व तत्त्व को समझकर तथा (स्वस्वरूपानुरूप ज्ञान के फलसे प्राप्त) स्वस्वरूपानुरूप कैङ्कर्य की अभिलाषा, का नित्यानुसन्धान करते रहने से, वह (जीवात्मा) अवश्य भगवद्धाम को पहुँचता है।

अनुवादक टीका : श्रीशठकोप स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ३.३ पासुर ‘ओऴिविल् कालम्’ मे कैङ्कर्य प्राप्तिकी अत्यन्त इच्छा को व्यक्त करते है। भगवान् की निर्हेतुक कृपासे जीवके वास्तविक स्वरूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है इस सिद्धतत्त्वको समझकर श्रीशठकोप स्वामीजी स्वरुपानुरूप कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना ३.३ पासुर मे करते है। इस पासुर मे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की दोषरहित वह भगवान् की सेवा हर अवस्था, हर समय, हर रूप और भगवान् की सन्निकटता मे सेवा करते है। हमारे पूर्वाचार्य कहते है हम प्रपन्नजनों को सदैव कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना भगवान् से करते रहना चाहिए जो भगवान् को आनन्ददायक है।द्वयमहामन्त्र जाप का प्रतिफल और ध्येय (लक्ष्य) यही तो है। द्वयमहामन्त्र के दो खण्ड (भाग) है – प्रथम भाग मे हम पहले श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से भगवान् के दिव्य चरणों को उपाय मानते है। दूसरे भाग मे अन्याभिलाषा रहित केवल दिव्य दम्पति के परमसुख के लिये दिव्य दम्पति के प्रति हम विशुद्ध सेवा की प्रार्थना करते है। एरुम्बियप्पा स्वामीजी, पूर्वदिनचर्या स्तोत्र मे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या का सुन्दर वर्णन लिपिबद्ध किये है। इस स्तोत्र मे, एरुम्बियप्पा स्वामीजी कहते है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अधर सदा द्वयमहामन्त्रका जाप करते है और उनका मन सदा द्वयमहामन्त्र के अर्थांका (अर्थात् तिरुवाय्मोऴि का) अनुसन्धान करता है। इस प्रकिया से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को दिव्यानुभूति होती है और उनके दिव्य शरीर मे अनेकानेक रूपान्तरण जैसे रौंगटे खडे होना इत्यादि द्रष्टव्य है।


१२०) नम् मुदलिगळ् गुरुपरम्परै मुन्नाग द्वयानुसन्धानम् पण्णुगिरदु

गुरु परम्परा

द्वयमहामन्त्र (मन्त्ररत्न – मन्त्रों मे रत्न मन्त्र) का विषय – श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् – जीवों का एकमात्र शरण

 

अनुवादक टीका : हम सभी इस विषय से परिचित है की हमारे पूर्वाचार्य सदा द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करते थे। इससे यह बात और भी सुस्पष्ट होती है की द्वयमहामन्त्र का उच्चारण व जाप स्वतंत्र भाव से कदापि नही किया जा सकता है अर्थात् गुरुपरम्परा का अनुसन्धान किये बिना द्वयमहामन्त्र का उच्चारण करना वर्जित है। जीव कदापि द्वयमहामन्त्र के विषय अर्थात् श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्वतंत्र भाव से उनकी शरण नही लेता परन्तु केवल गुरुपरम्परा के माध्यम से ही उभय का शरण लेता है। अत एव हमारे पूर्वाचार्य सदैव द्वयमहामन्त्र जाप के पहले सर्वप्रथम गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करते थे।

अस्मद्गुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य )  
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य के आचार्य – परमाचार्य )
अस्मद् सर्व गुरुभ्यो नम:  (सभी पूर्वाचार्य और वर्तमानाचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुश दासाय नम: (श्रीपेरियनम्बि – श्रीपराङ्कुशदास स्वामीजी)
श्रीमद्यामुनमुनये नम: (आळवन्दार – श्रीयामुनमुनि स्वामीजी)
श्री राम मिश्राय नम: (मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (उय्यकोण्डार् – श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन् नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनिगळ् – श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (नम्माऴ्वार – श्रीशठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वकसेनाय नम: (सेनै मुदलियार् – श्रीविष्वकसेन)
श्रियै नम: (पेरिय पिराट्टि – श्रीमहालक्ष्मी)
श्रीधराय नम: (पेरिय पेरुमाळ् – श्रीरङ्गनाथ भगवान्)

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उपरोक्त विषय का विवेचन श्रीवचनभूषण २७४ सूत्र मे अती सुन्दर ढंग से करते है। वह कहते है – जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – प्रत्येक प्रपन्न को नित्य गुरुपरम्परा सहित द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिए।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-12.html

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