यतीन्द्र प्रवण प्रभावम – भाग १४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम

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श्रीरङ्गनाथ​ भगवन का मन्दिर से उत्प्रवास करना जबकि श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी प्रमाण (प्रामाणिक ग्रन्थ जैसे वेद, आदि), प्रमेय (भगवान) और प्रमातृ (कई ग्रन्थ के लेखक) के गौरव को बनाने में लगे थे ताकि सभी चेतन उपर उठ सके और वह भगवान श्रीरङ्गनाथ​ (उत्सव मूर्ति) के जीवन के जैसे थी जब श्रीरङ्गम् का व्यवसाय तुर्की (और आसपास के देश) देश के जनों के हाथों में था। श्रीरङ्गनाथ भगवान और उनकी उत्सव मूर्ति को कोई क्षति न पहुंचे इसके लिये एक पत्थर की दीवार का निर्माण किया गया और श्रीरङ्गनाथ भगवान को छिपाया गया और भगवान के विग्रह को दीवार के सामने स्थापना किया गया। श्रीरङ्गनाथ भगवान और साथ में उभय नायच्चीमार (श्रीदेवी और भूदेवी) को मंदिर के बाहर पालकी में ले जाया गया। जैसे पेरुमाळ तिरुमोऴि के ८-६ में कहा गया हैं “सुऱऱमेल्लाम पिन तोडरत तोल्कानम अडैन्दवने” (भगवान श्रीराम अपने निकट के प्रेमी जनों के संग वन में पहुंचे) और जैसे पेरिय तिरुमोऴि ५.६ में कहा गया हैं “ताम्बीयोडु ताम ओरुवर तन् तुणैवि कादल तुणैयाग” (श्रीराम अपने अनुज और भार्या के संग गये) श्रीरङ्गनाथ​ भगवान मंदिर से अपने गोपनीय अनुचरों के संग उत्प्रवास किए। जैसे श्रीलक्ष्मणजी अपने धनुष और खड्ग के साथ श्रीराम के पीछे चले गये उनके प्रति सेवा करने के लिये वैसे हीं श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीरङ्गनाथ​ भगवान के पीछे चले गये जैसे कि श्रीसहस्रगीति के पाशुर ८.३.७ में उल्लेख किया गया हैं “उरुवार चक्करम सङु सुमन्दु इङु उम्मोडु ओरु पाडु उऴल्वान ओर अडियानुम् (यहाँ एक सेवक (भक्त) हैं जो आप के संग चल रहा हैं और आपके सुन्दर, दिव्य चक्र और शङ्ख साथ लेकर जा रहा हैं)। श्रीलोकाचार्य स्वामीजी और अन्य आचार्य गण (जो उनके संग गये साथ में श्रीरङ्गनाथ भगवान और श्रीदेवी और भूदेवी) श्रीरङ्गनाथ भगवान के गुणगान करते रहे, जंगल के इलाखे में प्रवेश किया वैसे हीं कहा गया जैसे संक्षिप्त रामायण में कहा गया हैं “प्रविश्यतु महारण्यं रामो राजीवलोचनः” (कमलनयनवाले श्रीरामजी गहरे वन में प्रवेश किये) और श्रीरामायण के अरण्य काण्ड के ११९-२२ “वनम सभार्यः प्रविवेश राघवः सालक्षमणः सूर्य इव अभर मण्डलम्” (श्रीराम वन में अपनी भार्या माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ वैसे हीं प्रवेश किया जैसे सूर्य बादल में प्रवेश करता हैं)। वें वन में जा रहे थे जहां कई जंगली जानवर जैसे शेर, लकड़बग्धा, जंगली सूअर, भालू, आदि गरज कर बयानक शोर कर रहे थे, शिकारी भी हाथ में धनुष लेकर घूम रहे थे। घुमते घुमते एक स्थान पर पहुंचे जहां लुटेरे प्रचलित हैं श्रीरङ्गनाथ भगवान ने कृपाकर अपना सम्पूर्ण धन उन लुटेरो को दिया। यह सुनकर कि श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी कृपाकर पीछे हटे और अपनी पूर्ण कृपा उन्हीं लुटेरों पर बरसाये। तत्पश्चात ऐसे हीं अनेकों वन के निवासी श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी के पास आकार शरण हुए और वें स्वामीजी को कुछ भेट अर्पण किये। 

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीशैलेश स्वामीजी को संप्रदाय में लाने का निर्देश देकर श्रीवैकुंठ पधार गये। 

वें श्रीरंगनाथ भगवान सहित मदुरै के समीप एक गाँव जिसे ज्योतिषकुड़ी (आज के समय में कोडिक्कुळम्) कहा जाता हैं वहाँ पहुंचे और वहाँ अपनी तिरुमाळिगै बनाये। बीमारी से थकावट के कारण श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी वहाँ विश्राम करने लगे। उनके शिष्य दुखी हुए और उनसे पूछे कि वें अब किसके शरण हो। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी का दिव्य हृदय श्रीशैलेश स्वामीजी का विचार किया और वे उन्से एक उच्च स्वर में कहे कि श्रीशैलेश स्वामीजी दोनों लौकिक (संसार संबन्धित) और वैदिक (वेद संबन्धित) पहलू में विशेषज्ञ हैं और वें मदुरै के राज्य का कार्य देखा रहे हैं। वे उन्से कहे कि श्रीशैलेश स्वामीजी को राज्य​ कार्य को छोड़ सम्प्रदाय का कार्य  संभालने को कहें। उन्होंने श्रीकूर कुलोत्तम दास नायनार को उन्हें सभी रहस्य ग्रन्थ और उनके गूढ़ार्थ सिखाने को कहा, श्रीतिरुप्पुट्कुऴि जीयर और तिरुकण्णङ्गुडि पिळ्ळै को श्रीसहस्रगीति सिखाने को कहा, श्रीनालूर्प्पिळ्ळै को मूवायिरपडि (तिरुप्पावै) कि व्याख्या सीखने को कहा, श्रीविळाञचोलैप्पिळ्ळै को सप्तकादै और अन्य विशिष्ट अर्थ सिखाने को कहा। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी मिथुन महीने के अमावस्य के पश्चात द्वादशी के दिन वें तिरुनाडु (श्रीवैकुंठ) जाने का निश्चय किया। उन्होंने श्रीविळाञचोलैप्पिळ्ळै को उनके अन्त तक तिरुवनंतपुरम में निवास् कर्ने को कहा। उन्होंने अपने आचार्य और पिताजी श्रीकृष्णपाद स्वामीजी के दिव्य चरण कमलों को स्मरण कर तिरुनाडु कि ओर प्रस्थान किया। उनके शिष्यों के दु:ख पर काबू पाना मुश्किल था। उन्होंने एक दूसरे को सांत्वना दी और उन्हें दिव्य परियट्टम (कपड़ा जिसे मस्तक पर धारण करते हैं), श्रीरङ्गनाथ​ भगवान के दिव्य पुष्प हार से सजाया और अंत्येष्टि क्रिया पूर्ण किये। 

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी का दिव्य नक्षत्र श्रवण और तमिऴ महिना तुला हैं। उनकी तनियन हैं 

लोकाचार्यय गुरुवे कृष्णपादस्य सूनवे ।
संसारभोगिसन्दष्टजीवजीवातवे नम: ॥ 

(मैं श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी के शरण लेता हूँ जो श्रीवडक्कुत्तिरुवीदिप्पिळ्ळै (श्रीकृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र हैं और वें संसार रूपी जहरीले सर्प के कांटने कि औषद हैं)

आदार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2021/07/29/yathindhra-pravana-prabhavam-14/

अडियेन् केशव् रामानुज दास्

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