लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार्

71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।

 भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार्

भक्त की भक्ति भक्ति-योग (भक्ति-शास्त्र) के नियमों के अनुसार ही होती है । परन्तु प्रपन्न के लिए भगवद्विषयोत्पन्नासक्ति ही भक्ति कहलाती है । साधना-भक्ति से भक्तिमान भगवान् को प्राप्त करता है । प्रपन्न के लिए, भक्ति का उपयोग स्वरूपानुरूप जीवन व्यापन मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे इन तत्त्वों को बहुत सुन्दर रूप से समझाया है । सूत्र 271 मे स्वामी कहते है ः- प्रपन्न के लिए भक्ति भगवद्विषयासक्तिरूप धारण करती है । श्रीवरवरमुनि स्वामी इस सूत्र व्याख्या मे कहते है जिस प्रकार अत्यन्त भूखा जैसे अन्नादि ग्रहण करता है ठीक वैसे ही भक्ति से ही एक प्रपन्न भगवद्कैङ्कर्य को यथारूप  से कर सकता है ।

72) भक्तिमानुक्कु पलत्तिल् स्रद्दै इल्लातपोतु तविरलायिरुक्कुम्, प्रपन्नुक्कु स्वरूप-प्रयुक्तमाय् वरुमतागैयाले ओरुकालम् तविरातायिरुक्कुम्

तिरुप्पाणाऴ्वार – पूर्णतया पेरियपेरुमाऴ् के प्रति आसक्त

भक्तिमान जब उपेय (लक्ष्य) के प्रति निरुत्साहित या रुचि या इच्छा को खोता है तो उसकी भक्ति मे रुकावट होती है अतः भक्ति सफलीकृत नही होती । चूँकि प्रपत्ति जीव के स्वरूपानुरूप है अतः एक बार करने से उस जीव की रुचि (मे रुकावट) प्रतिबंधित नही होती ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भक्तियोगानुयायी को प्रतिक्षण भगवद्चिन्तन करते रहना है । अगर गलती से भी एक क्षण के लिए भगवद्विस्मृति हो तो उसकी भक्ति मे बाधा आती है और अन्ततः रुक जाती है । चूँकि प्रपत्ति सिद्धोपाय (भगवान् ही उपायोपेय है और भगवान् अपने शरणागत की रक्षा करने मे सक्षम है) है अतः भगवान् को उपायोपेय स्वीकृति ही जीव (जो नित्य भगवद्दास है) का यथार्थ स्वरूप है ।

73) अवन् गुण निबन्धनमन्रु, अवनोट्टै सम्बन्धम् सत्ताप्रयुक्तमेङ्गै

जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भगवद्गुणों पर आधारित नही है अपितु यह स्वाभाविक सम्बन्ध भगवच्छेषत्व (जो स्वरूपानुरूप) है के आधार पर है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः नम्माऴ्वार  तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ “कडियन् कोडियन्  . . . आगिलुम् कोडिय एन् नेन्जम् अवन् एन्रे किडक्कुम् ” पासुर मे कहते है भगवान् पाषाण-हृदयी है फिर भी इस दास का मन आप पर ही केन्द्रित है और सदैव आप के ही मनन चिन्तन मे है । नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे अनसूया और श्री सीता देवी के संवाद का उदाहरण देते है । जब अनसूया कहती है कि ” एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति साक्षात् भगवान् है ” तो भगवती सीता कहती है –  सभी का ऐसा विचार है कि मै भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य गुणाधार पर उनके प्रति आसक्त हूँ । अगर मेरे स्वामी स्वगुणों को त्याग दे और बदसूरत भी हो जाए फिर भी उनके प्रति मेरी आसक्ती को नही त्यागूँगी । पर मै स्वकथन का निरूपण नही कर सकती क्योंकि मेरे प्रिय स्वामी कदाचित भी स्वगुणों का त्याग नही करेंगे । पिळ्ळै लोकाचार्य इसी तत्त्व को श्रीवचनभूषण के 111वें सूत्र मे कहते है ” गुण कृत दास्यत्तिलुम् काट्टिल् स्वरूप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानम्” अर्थात् स्वरूपारूप भगवच्छेषत्व, गुणानुरूप भगवच्छेषत्व की तुलना मे श्रेष्ठ है । अगर मान लिया जाए कि यह भगवच्छेषत्व गुणानुरूप है तो जिस दिन यह गुण नज़र नही आयेंगे उस दिन (समय) दासत्व को छोड़ देंगे और इसी को वास्तविक आत्महत्या कहते है । परन्तु यह स्वाभाविकानुरूप (जो अपरिवर्तनशील है) है तो हम इसका (भगवच्छेषत्व का) परित्याग कदापि नही करेंगे ।

74) भगवद्विषयत्तिलोरडिवर निन्रवर्गळ् स्लाकनीयर्

जो कोई भी भगवान् के प्रति छोटा सा कार्य (करता) (कदम उठाता) है वह सदा कीर्तन (प्रशंसा) के योग्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः इस भौतिक जगत् मे जीवों के लिए जब इन्द्रिय तृप्ति के अनेकानेक साधन है तो उन जीवों मे अगर एक भी जीव भगवान् के प्रति आसक्त हो, वह सदा प्रशंसा के योग्य है । ऐसे आसाक्त अगर किसी श्रीवैष्णव का नित्य मार्गदर्शन प्राप्त हो तो वह अतीव शीघ्रता और सरलता से स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त करता है और सद्व्यवहार से स्वस्वरूप को समझता है ।

75) अत्तलैयाले वरुमतोऴियत् तान्तामोन्रै आशैयप्पडुगैकूडप्पऴि

सब कुछ भगवदेच्छा (भगवान् की इच्छा) अनुसारेण होना चाहिए । स्वमनोरथ पूर्ती भगवान् से याचना करना स्वदोष है । सदैव भगवद्मुखोल्लास से कार्य करना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् शेषी (स्वामी) है और जीव शेष (किंङ्कर) है । स्वामी को इच्छा कर आशीर्वाद देना चाहिए जो उस (दास) (सेवक) के लिए अनुकूल हो । शेषी होने की वजह से जीव का स्वतन्त्र इच्छा होना दोषयुक्त है और स्वरूप नाश कारक है ।

76) उडैयवने नम् कार्यत्तुक्कुक्कडवन्

भगवान् स्वामी है और जीवात्मा उनका सेवक है । शरणागतों का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः आत्मा देह द्वारा कार्य करता है और इन्हीं कार्यों को करने का मार्गदर्शन आत्मा देता है । भगवान् जीवात्मा का आन्तरिक आत्मा के रूप मे आवास करते है और यही जीव उनका शरीर । अतः शरीर रूपी जीव का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है । पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के चरमश्लाक विवरण 258 वें सूत्र इसी विषय को समझाते हुए कहते है ःः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है – “मोक्षयिष्यामि” अर्थात् ” उद्धार करूँगा ” “मै रक्षा करूँगा” । सूत्र मे स्वामी कहते है – ” इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित्तरेन् एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक् कोळ्ळेनो ” । इस सूत्र व्याख्या मे श्रीवरवरमुनि कहते है – अब तक तुम (अर्जुन) स्वयं को स्वतन्त्र मानते थे ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा । परन्तु अब तुम परतन्त्र मानकर (जैसे देह आत्मा पर निर्भर होता है उसी प्रकार) मुझ मे शरणागति किये । वरवरमुनि स्वामी कहते है यहाँ अर्जुन का भ्रम (दोष) निवारण कर्तव्य भगवान् का है और अर्जुन का शुद्धी एवं उद्धार का फलस्वरूपी भगवान् ही हैं।

77) वस्तुवुक्कु गुणत्तालेयिरे उत्कर्षम्  । अन्द गुणाधिक्यमेङ्गेयुण्डु, अङ्गेयिरेयेत्तम् (अङ्गेयिरेयेट्रम्)

एक वस्तु के प्रति उत्कर्ष का कारण उस वस्तु मे उपलब्ध विशेष गुण ही है । जब ऐसे गुणाधिक्यता हो तो ऐसे गुण उत्कृष्टता (विशिष्टता) प्राप्त करते है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् मे मुख्यतः दो विशेष गुण है – पहला कि वह विशिष्ट असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार राशि है और दूसरा असद् गुणों के विपरीत है वह । इसी कल्याण गुणों के सान्निध्य की वजह से उनकी वन्दना (स्तुति) सभी करते है ।

78) शेषभूतन् स्वरूपम् पेट्ट्रडिमै सेइगै शेषिक्कु पेट्ट्रिरे

जैसा कहा गया है “मेय्याम् उयिर् निलै” (तिरुवाय्मोऴि तनिया) – अर्थात् भगवद्मुखोल्लास तभी होता है जब जीव भगवच्छेशत्व को स्वीकार कर भगवद्सेवा करें । ऐसा करने पर भगवान् को अत्यन्तहर्ष प्राप्त होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः कहा गया है – “चेतन लाभं ईश्वरनुक्कु” अर्थात् जब भगवद्सम्पत्ति जीव भगवद् निष्ठा मे परिपूर्ण रूप मे सिद्ध होता है, भगवान् ही इससे लाभ प्राप्त करते है ।

भगवान् ही जीव को मोक्ष प्राप्ति के सम्मुख लाने के लिए नित्य संसार की सृष्टि कर, विभिन्न अवतार लेकर, आऴ्वार एवं आचार्य रूप मे इस दिव्य ज्ञान का प्रसार करते है । अन्ततः यह कार्य से जब उनकी सम्पत्ति की शुद्धि होती है तो यह उनके लिए ही श्रेयस्कर है ।

79)  स्वनिकर्षम् सोल्लुगै ज्ञानकायम् । ईश्वरोऽहं एन्रिरुक्कै अज्ञान कार्यम् ।

जैसे अमुदानर (तिरुवरङ्ग स्वामी) रामानुज नूत्तन्दादि के 48वे पासुर मे कहते है – –  स्वदोष गुणानुसन्धान ही असली पहचान है सच्चे आत्मज्ञान की । अर्थात् मुझ समान कोई तुच्छ नही है ।

मै ईश्वर हूँ कहना अज्ञानता और अहं कारणोत्पन्न है ।

80) तीर्थङ्गळिळे वर्त्तिक्किर सत्त्वङ्गळुक्कु पापम् पोगिरतिल्लैयिरे ज्ञानमिल्लामैयाले

कहते है की तीर्थ स्थलों के जलों मे रहने वाले विभिन्न जीवों का आत्मोद्धार नही होता है क्योंकि उनको स्वरूपानुरूप ज्ञान नही होता है अतः दोष निवारण नही होता है । केवल और केवल स्वरूपानुरूप ज्ञान से ही जीव दोषों से मुक्ति पाता है । अतः केवल तीर्थ जल मे स्नान मात्र से उद्धार नही होता ।

अनुवादक टिप्पणी ःः उदाहरणार्थ गङ्गा मे कोई स्नान करता है तो उसको यह ज्ञान होना चाहिये कि यह दिव्य गङ्गाजल का उद्भव भगवान् श्रीमन्नारायण के दिव्य चरणारविन्दों के चरणामृत से हुआ है जो इस सम्पूर्ण जगत् के सर्वरक्षक है । जब तक ऐसा ज्ञान वर्धन विचार नही होता है और केवल सोचता है कि यह सिर्फ दिव्य नदी जल है तो कोई उद्धार नही होता है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-8.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १८

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

४९) अंजली विरोधी – अंजली/ प्रणाम/ नमस्कार करते समय बाधाएं (दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करना)।

अंजली का अर्थ दोनों हथेली को जोड़ नमस्कार करना। यह ४८वें विषय (“वन्दना”- प्रणाम) से संबंधित है। साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात हमें उठकर नमस्कार करना चाहिये। बहुत से समय यह भी देखा गया है कि बिना पूर्ण अभिवादन/ साष्टांग के केवल नमस्कार ही किया जाता है। नमस्कार दोनों हाथों को जोड़कर छाती के करीब लाकर किया जाता है। प्रायः यह भी देखा जाता है कि हाथो को अंजलि मुद्रा में सिर पर भी रखा जाता है। अंजली यानी “अम् जलयती इति अंजलि:” वह जो भगवान को पिघला दे, जिन्हें “अ” –अकार कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि “अंजलि: परमामुद्रा क्षिप्रं देवप्रसादिनी” – अंजली अन्तिम और उच्च स्तर की मुद्रा है, जिससे भगवान कि कृपा तुरन्त प्राप्त हो जाती है।

  • भगवान के चरण कमलों पर अपना ध्यान केन्द्रीत कर अंजली मुद्रा को करना चाहिये। देवतान्तर, सांसारिक अमीर जनों आदि अन्य तत्वों पर ध्यान केन्द्रीत कर अंजलि नहीं करना चाहिये।
  • यह समझना चाहिये कि नमस्कार करने हेतु कोई समय की पाबंदी नहीं है और नमस्कार करने हेतु कोई अच्छा समय आदि नहीं देखना चाहिये।
  • यह किसी भी श्रीवैष्णव द्वारा और किसी भी श्रीवैष्णव के प्रति किया जा सकता है (किसी योग्यता की जरूरत नहीं है), यह तथ्य न समझना बाधा है। उसी तरह यह विचार करना कि अंजली करने के लिये कोई विशेष ज्ञान कि आवश्यकता है यह सही नहीं है। जिसे भी भगवद सम्बन्ध प्राप्त हो वह नमस्कार कर सकता है। हम श्रीपरकाल स्वामीजी के तिरुनेडुन्दाण्डगम के १४वें पाशुर में देख सकते है कि “वलरत्तदनाल पयन पेट्रेन वरुगवेन्रु मडक्किलियैक कैकुप्पि वणङ्गिनाले” – अर्थात यद्यपि वह तोता परकाल नायकी (श्रीपरकाल स्वामीजी का स्त्री भाव) द्वारा उत्थापित किया गया था, परंतु जब वे तोते को भगवान का नाम उच्चारण करते हुए सुनती है तो बहुत आनंदित होती है और स्वयं अपने ही तोते को दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करती है।
  • कोई किसी भी परिस्थिति में नमस्कार कर सकता है, यह न समझना बाधा है। शरणागति गद्यम में श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है “ऐनकेनाबि प्रकारेण द्वयवक्ता” – जिस प्रकार किसी भी परिस्थिति में द्वय महा मन्त्र का अनुसन्धान किया जा सकता है – उसी तरह किसी भी परिस्थिति में नमस्कार किया जा सकता है, जिससे भगवान द्रवित हो जाते है।
  • एक अंजली प्रर्याप्त है ऐसा न समझकर सब ही को कई अंजली करना, यह सोचना बाधा है। सकृत- एक बार। असकृत- अनेक बार। स्तोत्र रत्न में आल्वंदार स्वामीजी भगवान से कहते है “तवदडिघ्रमुद्दिश्य कदापि केनचित् यथातथा वापि सकृत्कृतोञ्जलि: तदैव मुष्णात्यशुभान्यशेषतः शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते” – किसी के द्वारा किसी भी समय किसी भी तरीके से आपके चरण कमलों कि ओर किया गया एक नमस्कार उसी क्षण उसके सारे पाप मिटा देगा और उस व्यक्ति का कल्याण होगा और उसकी वह अच्छाई कभी कम नही होगी। इसलिये एक बार नमस्कार करना पर्याप्त है उसे बार बार करने कि कोई अवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने श्रीगुण रत्न कोष में बड़ी सुन्दरता से ५८वें श्लोक में पेरिय पिरट्टियार कि स्तुति करते है “ऐश्वर्यम अक्षर गतिम् परमं पदम् वा कस्मैचित्त अंजलि परम वहथे विधिर्य अस्मै न किंचित उचित्तम कृतं इति अथ अम्ब त्वं लज्जसे कथय क: अयं उदारभाव:” – अर्थात प्यारी माँ! अगर कोई एक बार आपके सन्मुख नमस्कार करता है, तो आप उसे सांसारिक धन, परमपदधाम और परमपदधाम का कैंकर्य देकर कृपा करती हो। सबकुछ देने के पश्चात भी आप यह सोचती हो कि ‘क्या मैंने पर्याप्त प्रदान किया?’ और संकोचवश अपना सिर झुका देती हो। इससे भगवान और अम्माजी के भावों का पता चलता है कि भक्त के उनके पास पहूंचने के सबसे न्यूनतम प्रयास को भी अत्यंत बड़ा जानकार, वे उस पर एक ही क्षण में कृपा बरसाते है। इसलिये अधिक प्रयास के बारे में तो क्या कहना?
  • नमस्कार से भविष्य में उसका फल प्राप्त होगा और उसका परिणाम तुरन्त नहीं मिलेगा, ऐसा विचार करना बाधा है। जैसे कहा गया है “क्षिप्रं देव प्रसादिनी” कि जब कोई एक ही बार अंजली अर्पण करता है, तो भगवान एक ही क्षण में उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है। यह पिछले बात कि चर्चा से समझाया जा चुका है।
  • प्रत्येक अपचार के लिये पृथक प्रणाम करना अथवा सभी अपचार के लिये एक ही प्रणाम पर्याप्त नहीं है, यह सोचना बाधा है। केवल यह कहना कि “अपराधानिमान् सर्वान् क्षमस्व पुरुषोत्तम!” – हे आत्माओं में श्रेष्ठ (भगवान)! कृपा कर मेरी सारी गलतियों को क्षमा करना ऐसा कहकर केवल एक अंजली करना प्रयाप्त है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्लोक “उपचारापदेशेन……” के भाग से संबंधित है। यह श्लोक तिरुमाली में तिरुवाराधन के अन्त में गाया जाता है। इसका अर्थ “हे भगवान! मैंने यह तिरुवाराधन आपका लाड़ लड़ाने और सेवा करने हेतु प्रारम्भ किया। परन्तु मैंने इसको समाप्त करते समय सेवा कम और गलतियाँ अधिक की है। इसलिये कृपया आप मुझे मेरी गलतियों के लिये क्षमा करें”। भगवान की महानता को देखते हुए कोई भी उनकी सम्पूर्ण सेवा नहीं कर सकता है। और इस संसार बन्धन में बंधे हुए जीवात्मा और उसकी मानसिक स्थिति को सोचते हुए भगवान की सेवा करते समय भी भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीत करना और सही तरिके से उनकी सेवा करना कठीन है। इसलिये भगवान की महानता और जीवात्मा में दोष (कमी) के कारण जीवात्मा के दृष्टीकोण से तिरुवाराधन असंतोषजनक ही होगी। परन्तु भगवान सौलभ्य के सारसंग्रह है इसलिए जो भी कैंकर्य भक्त जन करते है, वे उसमें दोष न देखते हुए बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करते है।
  • अंजली थोड़े नहीं बल्कि सम्पूर्ण पाप को मिटा देती है। इसे “सर्वपापनिवारणी” (वह जो सभी पापों को निकाल देती है) कहते है। परन्तु जो जानकर पाप करके विचार करते है कि भगवान को नमस्कार करने से सभी पाप समाप्त हो जायेंगे उनके लिये कोई आशा नहीं है।
  • यह विचार करना कि प्रणाम से थोड़ा शुभ होगा और पूर्ण शुभ नहीं होगा, यह बाधा है। जैसे स्तोत्र रत्न के २८वें श्लोक में चर्चा की गयी है कि यह पूर्ण शुभ करता है।
  • केवल इच्छा फल प्राप्ति हेतु प्रणाम करना और यह न जानना कि फल प्राप्ति के पश्चात भी प्रणाम करते रहना चाहिए, यह बाधा है। इसके परिणाम स्वरूप यह भगवद अनुभव पर केन्द्रीत है। परमपद में नित्य और मुक्तजन भी प्रणाम करते है। जैसे “नम इत्येव वादिन:”। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्रगीति में कहते है “कैकलालारत थोलुत्तु थोलूतुन्नै” – मैं प्रणाम कर निरन्तर आपकी पूजा कर रहा हूँ। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि व्याख्यान इसके लिये बहुत श्रेष्ठ है – उनका तेज जो चमकदार सूर्य कि तरह चमकता है, वह आल्वारों के दिव्य मनोभाव को दर्शाता है। वह कहते है श्रीशठकोप स्वामीजी कि प्रणाम करने की प्रवृत्ति उन्हें अत्यधिक प्रिय है। वह कहते है “वह जो सांसारिक लाभों पर केन्द्रीत है, वह एक बार उसकी इच्छा पूर्ण होने पर आराधना करना छोड़ देता है। वह जो साधन भाव से अपनी इच्छाओं के लिये पूजा करता है, उन इच्छाओं कि पूर्ति होने पर उसे बन्द कर देता है। परन्तु जैसे ‘नित्यांजली पुड़ा’ में कहा गया है कि वह जो इसे यात्रा (जीवन पोषक कार्य) मानता है, और श्वेत द्वीप वासिस (दूध के समुन्द्र के निवासी), नित्य और मुक्त जन परमपद में भी निरन्तर प्रणाम करते है जैसे पहिले देखा गया है ‘नम इत्येव वादिन:’”। वह निरन्तर यह समझाते है कि इन महान भक्तों से उनके प्रति प्रणाम करवा कर भगवान स्वयं पोषण करते है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि भगवान के प्रति प्रेम और स्नेह से जनित कैंकर्य के रूप में प्रणाम करते रहना चाहिए।
  • यह नहीं समझना कि जिसप्रकार गरुड मुद्रा साँप के जहर को नियंत्रण करती है उसी प्रकार, यह प्रणाम मुद्रा भगवान के स्वातंत्रीयं (सम्पूर्ण मुक्तता) को नियंत्रित और जीतती है। हमें इस तत्व पर विश्वास होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण के श्लोक में “च चाल चापं च मुमोच वीर” – जब रावण धनुष हाथ में लिये भगवान राम पर बाण चला रहे थे, तो भगवान राम भी उनका उत्तर बाण चला कर दे रहे थे – परन्तु जब भगवान ने रावण का धनुष तोडा, रावण ने उस टूटे धनुष को नीचे गिरा दिया (यह सोचकर कि भगवान राम उस पर वार नहीं करेंगे, क्योंकि उसके हाथ में शस्त्र नहीं है) भगवान राम ने तुरन्त उस पर वार करना छोड़ एक और जीवन दान दिया। हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते है कि अगर रावण उस वक्त हाथ जोड़ लेता, तो वह भगवान राम पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेता – क्योंकि भगवान एक ही श्रेष्ठ मुद्रा से नियंत्रण में आते है, वह है प्रणाम की मुद्रा।
  • हमें यह दृढ़ता से समझना चाहिये कि जैसे अभय हस्त (रक्षण अवस्था), शेषी (स्वामी) के लिये योग्य है, वैसे ही अंजली हस्त (हथेलियाँ जोड़ी हुई स्थितिमें), शेष-भूत (सेवक) के लिये योग्य है। ऐसा विश्वास न होना बाधा है। शेषी अर्थात भगवान। वह अपने हस्त अलग अलग प्रकार से धारण करते है जैसे अभय हस्त (रक्षा प्रदान दशा), वरद हस्त (आशीर्वाद प्रदान करना), आह्वान हस्त (निमंत्रण देना) आदि। उसी तरह जीवात्मा के लिये अंजली हस्त ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह जीवात्मा के अनन्य गतित्व और आकिंचनयं को प्रगट करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति के पाशुर के व्याख्या में हम यह देख चुके है, भगवान भक्तों की रक्षा करके स्वयं को प्रमाणित करते है और जीवात्मा भगवान द्वारा की गयी रक्षा को स्वीकार करके स्वयं को प्रमाणित करते है।

abhayam-anjali

  • स्वयं के रक्षा हेतु प्रणाम मुद्रा को करना बाधा है। नमस्कार करने से हम यह स्पष्ट कर देते है कि हमारी रक्षा हम स्वयं नहीं कर सकते है। जिस प्रकार अन्य कोई रक्षा प्रदान नहीं कर सकता, वैसे ही हम स्वयं कि रक्षा नहीं कर सकते है। जैसे तिरुक्कोलुर पेण पिल्लै वार्ता ग्रन्थ में कहा गया है कि “इरु कैयुम विट्टेनो द्रौपदीयैप पोले”– क्या मैं अपने दोनों हाथों को ऊपर करके स्वयं की रक्षा करना छोड़ दू और संपूर्णत: भगवान की शरण हो जाऊ, जैसे द्रोपदी ने किया था? जब द्रोपदी स्वयं का सम्मान खो देने की भयावह स्थिति में थी, उसने स्वयं को बचाने के सभी प्रयासों को छोड़ दिया, “हे कृष्ण! हे द्वारकानाथ!” ऐसे भगवान को पुकारा और तुरंत भगवान ने उसका रक्षण किया। इसी तरह हमें भी स्वयं की रक्षा के विश्वास का रंग चढ़े बिना सिर्फ मुखौल्लास हेतु प्रणाम करना चाहिए।

draupadi-krishna

  • कैंकर्य को छोड़ अन्य लाभ के लिये प्रणाम करना। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का इस जीवन में एक ही कार्य है भगवान और उनके भक्तों कि सेवा। ओर कोई आशा नहीं होनी चाहिये। जीवात्मा और भगवान के मध्य में यह कोई व्यापार सम्बन्ध नहीं है जो किसी लाभ से प्रणाम करें। हमने पहिले यह श्रीसरोयोगी स्वामीजी के मुदल तिरुवंदादि के २६वें पाशुर में देखा है “एलुवार विडैगोल्वार ईन तुलायानै वलुवा वगै निनैन्दु वैगल तोलुवार …” – वह जो सांसारिक धन को देखता है और वह जो कैवल्य को देखता है अपनी इच्छा पूर्ण होते ही भगवान को छोड़ देगा, परन्तु जो शुद्धता से भगवान कि सेवा करना चाहता है वह बिना कोई चाह के भगवान कि निरन्तर सेवा करेगा।
  • मन्दिर में देवतान्तर के सामने शठारी (श्रीशठकोप स्वामीजी) लेना बाधा है। यह सामान्य चलन है कि जब भी श्रीसहस्रगीति को गाते है हर पाधिगम (१० पाशुर को) के अन्त में जब ११वें पाशुर को गाते है और श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते है, तो तुरन्त प्रणाम करना चाहिये और श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति आभार प्रकट करना चाहिये कि उन्होंने हम पर बहुत कृपा की। यह भी कहा जाता है कि श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम किसी भी समय कहीं भी सुने तो हमें प्रणाम करना चाहिये। परन्तु हम किसी देवताओं के मन्दिर में या निकट भी हो तो ऐसा करना नही चाहिये (उसे भूलवश, उन देवताओं को प्रणाम समझा जा सकता है)। इस संदर्भ में यह कहा जाता है कि “शठगोपनुम त्याज्यं ” – ऐसी परिस्थिति में शठारी का प्रणाम भी त्याग किया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि श्रीसहस्रगीति को पुरप्पाडु (सवारी) के समय ज़ोर से नहीं गाया जाता परन्तु महान भक्त इन पाशुरों को अपने हृदय में उनके अर्थ का स्मरण करते हुए गाते है। ऐसी दशा में सावधान रहना चाहिये और देवतान्तरों को आदर देने से बचना चाहिये।
  • जब कोई अवैष्णव नमस्कार करता है तो उनके प्रति ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिये। इसके प्रतिकूल किसी भागवत को देखकर उनके नमस्कार करने के पूर्व हमें प्रणाम करना चाहिये।
  • आचार्य को देखते ही हमें न केवल प्रणाम अपितु साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात उठकर फिर प्रणाम करना चाहिये।
  • प्रणाम को अशुद्ध हृदय से अथवा बनावट (फैशन) से नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रणाम को पूर्ण प्रसन्नता से सही प्रकार से करना चाहिये। शास्त्र में किसी को भी एक हाथ से प्रणाम करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते ही अपने सर पर हाथ रखकर प्रणाम नहीं करना बाधा है। इसकी पहिले भी चर्चा की गयी है। गोष्ठी में पाशुरों का गान करते समय, हम लोगों को हाथ को शीष पर रखकर अंजली करते नहीं देखते। भगवान की पादुका (चरण कमल) को ही श्रीशठकोप कहते है। गोष्ठी में या कहीं भी जब हमें श्रीशठकोप स्वामीजी से आशीर्वाद मिल रहा है, तब हमें आदरतापूर्वक शीष झुकाना चाहिये और उस आशीर्वाद को प्रणाम के साथ स्वीकार करना चाहिये।

srisatagopam-vanamamalai

श्रीशठारी में विराजे श्रीशठकोप स्वामीजी – वानमामलै

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ७

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

६१) एम्पेरुमानार् दर्शनस्तरिल् एत्तनैयेणुम् कल्वियिल्लात स्त्रीप्रायरुम् देवतान्तरगळै अडुप्पिडु कल्लोपादियाग निनैत्तिरुक्कुम्

श्रीरामानुज दर्शनान्तर्गत अनुयायियों मे, एक अशिक्षित स्त्री (जिसको प्राथमिक शिक्षा भी अप्राप्त हो वह) भी जानती है कि परतत्त्व, परमेश्वर, परब्रह्म श्रीमन्नारायण ही है और अन्य देवतान्तर (देवी-देवता) उस पत्थर (ईंट) की भाँति है जिसका प्रयोग व्यन्जन बनाने मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व परमेश्वर परब्रह्म है । ब्रह्मा,रुद्रादि देवी-देवता गण श्रीमन्नारायण के सेवक हैं । वह सभी कर्म से लिप्त (कर्म से बन्धित) हैं और रजो तमो गुण से पूरित हैं । तोण्डरडिप्पोडि आल्वार तिरुमालै दिव्य-प्रबन्ध के दसवे पासुर मे कहते हैं ” भगवान्  श्रीमन्नारायण अकारणकरुणालय अहैतुकी कृपा से, अन्य देवी-देवताओं को उन सभी के लिए स्थापित करते हैं जो पूर्ण रूप से भगवान् के प्रति शरणागत नहीं हो सकते ” । ऐसे सामान्य जन इन देवी-देवताओं के प्रति समर्पित होकर भक्ति भावना मे प्रगतिशील होते हैं और अन्ततः विष्णु भक्ति का बीज उगता है । अगर ये भी नही होते तो सामान्य जन सभी नास्तिक हो जाते और उनका पूर्णतः पतन हो जायेगा । अतः श्रीरामानुज दर्शन के अनुयायी जन उपरोक्त कथन तत्त्व ” देवतान्तर गण विशेष कार्यार्थ रत (अन्यकों के हितकारी) हैं ” को भलीभाँति जानकर इनके प्रति कोई विशेष लगाव (रुचि) नही होता जैसे व्यंजन बनाने मे ईंट का केवल मात्र उपयोग होता है और उसके प्रति कोई आसक्ति (रति) नहीं होती ।

६२) मोक्षपलम् (मोक्षफलम्) सिद्दिक (सिद्धिक) वेणुम् एन्रिरुक्किरवर्गल् क्षुद्र देवतैगलैप् पिन् चेल्लार्गलिरे 

वह (जो) मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रतिक्षण स्थिरचित्त है (वह) क्षुद्र देवी देवताओं के शरणागत नहीं होता ।

परमपद – नित्य आनंद का निवास और मुमुक्षुयों का परम लक्ष्य

अनुवादक टिप्पणी :

उपेय (लक्ष्य) पुरुषार्थ है – – पुरुष की इच्छा (कामना) है । पुरुषार्थ चतुष्टय 1) धर्म [शास्त्र वचन का पालन] 2) अर्थ [लक्ष्मी – धन] 3) काम [विपर्य लिंग के प्रति आकर्षण (काम वासना) ] 4) मोक्ष (मुक्ति) है । श्रीमन्नारायण को मुकुन्द कहते हैं – – जो मोक्ष दाता है । अन्य देवी देवता स्व अनुयायियों के लौकिक तुच्छ इच्छापूर्ति कर सकते हैं लेकिन मोक्ष प्रदान करना केवल श्रीमुकुन्द ही कर सकता है । अतः मुमुक्षु जन भगवान् श्रीमन्नारायण का ही शरण लेते हैं । ऐसे अन्य कर्म बन्धित देवतान्तरों के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती ।

६३) गरुड़ध्वज, गरुड़वाहन एन्रु चोल्लप्पडुमवनायित्तु मोक्ष प्रदनावान् 

मोक्ष प्रदाता (वह) भगवान् है (जिसका) वाहन गरुड़ (जी) है और (जिसके) विजय पताका पर गरुड़ (जी) विद्यमान हैं । वह भगवान् श्रीमन्नारायण (विष्णु) हैं ।

गरुड़ वाहन में श्रीरंगनाथ 

अनुवादक टिप्पणी : गरुड़ जी वेदात्मा के नाम से जाने जाते हैं । भगवान् श्रीमन्नारायण को वहन करने के कारण वेदुद्देश्य परमात्मा भी वह ही है ।

६४) ” कारणन्तु ध्येयः ” एङ्गिरपडिये जगत्कारण वस्तुवेयिरे उपास्यमावतु

शास्त्र कहता है “कारणम् तु ध्येयः”। वह जो इस सृष्टि का मूल कारक, सृष्टि संहारक, सृष्टि पोषक है (सृष्टि, स्थिति, संहार कारक है) (वह) ही ध्येय वस्तु है ।


अनुवादक टिप्पणी :

तैत्रीय उपनिषद् कहता है – -” यतो वा इमानि भूतानि,  येन जातानि जीवन्ति, तद् विजिज्ञास्य, यत् प्रयन्त्याभिसम्विसन्ति, तद् ब्रह्मेति ” अर्थात्  (वह) जिससे सकल चित-अचित पदार्थ प्रकट होते हैं, जो सकल पदार्थ का निवास स्थान है, अन्ततः सकल पदार्थ समा जाते हैं – – वह सदा अनुसन्ध्येय ब्रह्म है । श्रीमन्नारायण ही सर्व सृष्टि कारण कारक है (पंच भूत निर्माण तक) तदुपरांत ब्रह्मा को निर्दिष्ट शक्ति से व्यष्टि सृष्टि का निर्माता बनाते हैं । वह परब्रह्म ही महाविष्णु रूप मे सकल पदार्थों मे स्वयं विद्यमान होकर पोषण धर्ता के रूप मे विराजमान है । वह ही रुद्रादि देवतान्तरों को यथा शक्ति प्रदान कर सृष्टि संहारेत्यादि संपन्न कर अन्ततः सभी का संहार करते हैं । अतः भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व और सर्व कारण कारक हैं ।

६५) मोक्ष प्रदानुमाय सर्वनियन्तावुमान सर्वेस्वरनुक्कु अडिमै पुगुवाते कर्त्तव्यम् 

जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह उस सर्वेश्वरेश्वर की सेवा करें जो मोक्ष प्रदाता है ।

आदिशेष जो निरंतर भगवदकैंकर्य में तल्लीन हैं – जीवात्मा की स्वरूप का प्रधान उदाहरण

अनुवादक टिप्पणी : श्रीमन्नारायण ही परात्पर परतत्त्व हैं जो सर्व चेतनाचेतन वस्तुओं के शेषी (स्वामी) हैं । स्वाभाविक रूप से प्रत्येक चेतन का कर्तव्य है की वह स्वाभाविक स्वामी की सेवा करे न कि अन्यों की।

६६) सेय्य (शेय्य) वेण्डुवतोन्रिल्लै. अवनडुमैयै अवनुकाग इसैय (इशैय) अमैयुम्

जीवात्मा को कुछ करने की जरूरत नही है । उसे तो केवल सत्य को स्वीकारना है कि वह भगवान् का है ।

अनुवादक टिप्पणी :

सभी चेतनाचेतन वस्तुएं भगवान् के हैं अर्थात् भगवत्सम्पत्ति है । जीवात्माओं को इस सत्य को स्वीकरना है । इस स्वीकृति से भगवद् कृपा का दिव्यानुभव का प्रभाव दिखता है और तुरन्त भगवद् कृपा की वर्षा स्वकार्य करती है । इस सन्दर्भ मे पूर्वाचार्य एक सुन्दर उदाहरण देते हैं – – एक समय की बात है –  एक राजा और उसका पुत्र राजकुमार शिकार हेतु जंगल गये । पर दुर्भाग्यवश वह राजकुमार जंगल मे खो गया और दुःखित राजा स्वराज्य को लौट गया । इस दौरान एक शिकारी ने इस खोये नन्हे राजकुमार को प्राप्त कर उसका देखभाल करने लगा । तदुपरान्त वह राजकुमार स्वयं को शिकारी का ही बेटा मानकर शिकारी की तरह व्यवहार करने लगा और इस प्रकार शिकारी बन गया । पर एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे पहचाना और उसके राजकुमार होने का सत्य प्रकाशित किया । अब उसे उसके राजकुमारत्व को स्वीकारना है और इस प्रकार से खोये राज गद्दी को पुनः प्राप्त करना है । अतः इसी प्रकारेण जीवात्मा भी इस जन्म मृत्यु जाल चक्र मे बंधा सोचता है कि वह स्वतंत्र है या केवल देहाभिमान से युक्त जीवन व्यतीत करता है । पर जब वह अपने भगवद्परतन्त्र स्वरूपानुरूप स्थिती को स्वीकारता है तो तत्क्षण भगवदानुग्रह का मंगल पात्र हो जाता है और भगवद् कृपा का प्रवाह उसमे होता है ।

६७) अवन् कोडुत्त उपकरणगळैक् कोण्डु अप्राप्त विषयङ्गळिल् पोगाते, ” तन्तनी कोण्डाक्किनै ” एङ्गिरपडिये वागुत्त विषयत्तुक्के शेषमाक्किक् कोण्डु कित्तुगै 

उस परब्रह्म द्वारा प्रदत्त उपकरण (जीवात्मा के लिए इन्द्रिय और देह) का सही उपयोग करना चाहिए अर्थात् भगवद्-सेवा और भागवत-सेवा मे ही होना चाहिए न कि इन्द्रिय तृप्ति मे |

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् ही शेषी (स्वामी) है और चेतन तत्त्व शेष (भगवद्दास) है| अतः जीवात्मा का स्वाभाविक रूप से स्व इन्द्रियों से नित्य भगवद्-सेवा करना ही परम उद्देश्य है. भगवान् जीवात्मा को देह और इन्द्रिय प्रदान इसी लिए करते हैं ताकि (वह) जीव उनकी सेवा करें| भगवद्-पार्षद भगवद्भक्त श्रीनम्माळ्वार (शठकोपसूरि) स्व पासुर मे “तन्तनी कोण्डाक्किनै” (तिरुवाय्मोळि 2.3.4) कहते हैं वह भगवद्-कृपा से भगवान् के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ हैं । वह कहते हैं, “अनन्त काल से मैं इस भौतिक जाल चक्र मे बंधा था और आपकी अहैतुकी कृपा से आप बहुत समीप आकर मेरे हृदय मन्दिर मे विद्यमान और प्रकाशवान है । इस कृत्य के लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ । इस कृतज्ञता को कैसे व्यक्त करूँ ? मैं अपने आप को समर्पित करता हूँ । लेकिन यह भी कैसे हो सकता है क्योंकि मैं आपकी सम्पत्ति हूँ और मेरी मान्य सम्पत्ति भी असल में आपकी ही सम्पत्ति है । आपकी देन ही यह मेरा देह है और आप स्वयं ही मुझसे आपकी सेवा करवा रहे हैं । ” लोकाचार्य स्वामीजी (नम्पिळ्ळै) ईडु व्याख्या मे कहते हैं कि आत्मसमर्पण करने का कारण सर्व मुक्ति प्रसंग से बचने के लिए किया जाता है । “सर्व मुक्ति प्रसंग” – –  सभी जीवों का परमपद मे होना भगवदेच्छा (भगवान् का निर्वाचन) है क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि सभी जीव परमपद का आस्वादन करे (नित्य उनके साथ ही रहे) । परन्तु यह जीव के लिए स्वाभाविक (स्वरूपानुरूप) नहीं है और ऐसा कदाचित भी नहीं करना चाहिए । मोह वश जीव आत्मसमर्पण करता है और स्वरूपानुरूप ज्ञान प्राप्त कर यह कृत्य अनुचित मानकर ऐसे सोचता है ” मैं जो भगवद्सम्पत्ति ही हूँ अपने आपको पुनः कैसे उस भगवान् को समर्पण करूँ जैसे कुछ नया वस्तु समर्पण कर रहा हूँ ” और उसके लिए प्रायश्चित करता है । वास्तव मे यह छल है ।

६८) एकान्त भोगत्तुक्कागप् पोन्त (पोन्द) पिराट्टि अशोकवनिकैयिळे इरुन्ताप्पोले तोट्रा निन्रतायित्तु स्वरूप ज्ञानम् पिरन्त (पिरन्द) पिन्बु देहत्तिले इरुक्क इरुप्पु

भगवती सीता देवी ने भगवान् श्रीरामचन्द्र के साथ एकान्त मे भोग करने की इच्छा से ही उनके साथ वनवास किया परन्तु यह इच्छा प्रतिकूल हुई और अन्ततः अशोक वन मे विरह भावना से रही । इसी प्रकार जब जीवात्मा को स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त होता है (भगवद् सम्बन्ध) तब इस देह मे रहना शोक पूरित होता है ।

६९) तिरन्तुकिडन्त वासल्तोरुम् नुळैन्तु तिरियुम् पदार्त्तम् पोले, कर्मानुगुणमाग देवादि सरीरङ्गळ्तोरुम् प्रवेशित्तुत्तिरियुम्

जैसे खुले घर मे कुत्ता प्रवेश करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी देव, मनुष्य, पक्षी, जानवर, पेड़, इत्यादि शरीरों मे स्वकर्मवश प्रवेश करता है और इस संसार चक्र मे फँसता है ।

अनुवादक टिप्पणी : स्वकर्मवश जीव देह (मे प्रवेश) प्राप्त करता है । इस संसार मे अनेकानेक वर्ण दृश्य हैं । भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता मे कहते है अन्त काल मे जीव जैसा इच्छा करता है उसी प्रकार अगला देह प्राप्त होता है । मनु स्मृति मे कहा गया है – जब जीव मन से अपराध करता है तो अगले जन्म मे चण्डाल रूप (इस रूप मे कोई उच्चतम सोच विचार नही होता है) धारण करता है, वाचिक अपराध से तिर्यक (पक्षी) रूप मे (इस रूप मे वाक् का कोई प्रयोजन नही होता) जन्म लेता है, कार्मिक अपराध से पेड़ के रूप मे जन्म लेना पड़ता है (क्योंकि इस देह मे कुछ कर्म नही कर सकता है) ।

७०) भक्तिमानुक्कुम् भक्तियुण्डु । प्रपन्नुक्कुम् भक्ति उण्डु । रुचियै ओऴिय प्रपत्ति पण्णकूडाते

भक्तिमान (भक्तिमार्गानुयायी) और प्रपन्नों (शरणागत मुमुक्षुओं) दोनों में भक्ति होता है । बिना भक्ति के (भक्ति को छोड़कर) शरणागति नहीं करना चाहिए ।

भक्ति भगवान् के प्रति प्रेम या आसक्ति है। दोनों – भक्तिमान (भक्तियोग अनुयायी) और प्रपन्न (भगवान् का शरणागत) मे भक्ति होती है । बिना भक्ति के जीव शरणागति नही कर सकता है । अगर बिना भक्ति के जीव शरणागति कर भी लें तो कोई प्रयोजन नही होता है ।

अनुवादक टिप्पणी : भक्तिमान (भक्तियोग निष्ठ) और प्रपन्न (शरणागत निष्ठ) की भक्ति मे यही भेद है कि भूतपूर्व के लिए भक्ति उपाय है और उत्तरवर्ती के लिए भगवान् सिद्धोपाय (उपायोपाय) है अर्थात् भगवद्कैङ्कर्य मे आसक्ति (रति) ही भक्ति है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-7.html

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कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:
श्रीवानाचल महामुनये नम:

यह हिन्दि लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे कृष्णस्वामी य्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन है ।

यह लेख “श्रीमन्नम्पाडुवान्” के जीवन का वर्णन करती है जो तिरुक्कुरुन्गुडि एम्पेरुमान् (भगवान्) – नम्बि पेरुमाळ् (भगवान्) के परम पावन भक्त थे । इसी वर्णन मे एकादशि कि रात को इनका एक ब्रह्म राक्षस से वार्तालाप भी उपलब्ध है ।

ब्रह्म राक्षस — वह सद्ब्राह्मण जो पूर्व जन्म मे यागेत्यादि मे गलति कर राक्षस रूप मे पैदा हुआ हो ।

बहुत समय पहले, पृथ्वी (धरती) प्रलयजाल (कारणजल) मे डूब गयी थी । उस समय, धरती को बचाने भगवान् श्रीमन्नारायण ने वराह रूप धारण कर, इस कारणजल मे कूद गये । ब्रह्माण्ड के दीवारों मे फसी धरती को अपने तेज़ दन्तों (जो गजदन्त समान दिखे) से रक्षा कर, धरती को यथारूप व्यवस्थित करने के लिये योग्य क्षक्ति प्रदान कर, श्रीभूमि पिराट्टि (भगवान् कि मुख्य पत्नी जो धरती कि मुख्य देवी है) को सराहते हुए आलिङ्गन किये । उस समय श्रीभूदेवी धरती पर त्रस्त समस्त चेतनों के प्रति कृपा दर्शाते हुए अपने स्वामी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीवराह रूपावतार से नम्र निवेदन की – हे भगवन् ! आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ दासी की रक्षा की है । इस धरातल पर रहने वाले समस्त चेतनों (मेरे पुत्रों / पुत्रियों) का सुगम उद्धार हेतु मार्ग दर्शन करावें । भगवान् तुरन्त बोले – हे देवी ! मेरा नामोच्चारण ही सरल और सुगमोपाय है । इसी से इनका समस्त कल्याण व उद्धार होगा । इस उपलक्ष मे, मै तुमको एक सरल सद्भक्त नम्पाडुवान् की महिमा प्रस्तुत करूँगा जिससे नामोच्चारण (नाम-सङ्कीर्तन) कि महिमा प्रकाशित स्वत: होगी ।

यह दिव्य चरित्र गाथा भगवान् ने इस प्रकार से बताया :

भगवान् तिरुक्कुरुन्गुडि नामक दिव्यदेश मे स्वपत्नी समेत (श्री-भू सहित) अर्चारूप मे कृपावशात वास कर रहे है । इस दिव्यदेश के भीतर प्रान्त मे, एक चाण्डाल वंश (यह चातुर्वर्ण के अन्तर्गत् नही है) मे जन्मे भगवान् के महद्भक्त । इनको बचपन से ही भगवान् का नाम-सङ्कीर्तन करने का बहुत बडा शौक था । अत: इस प्रकार से प्रेरित भगवद्भक्त, प्रतिदिन रात्रि समय मे, इस दिव्य देश के अर्चारूप भगवान् को वीना-गान संयुक्त अपनी भक्ति को भगवन्नाम सङ्कीर्तन के जरिये, शास्त्र सम्मत दूरी से, दिव्य देश के वासियों के उठने से पहले स्वकैङ्कर्य (नाम-सङ्कीर्तन) कर चले जाते थे । अत: इस प्रकारेण आप श्री पाडुवान् के नाम से विख्यात हुए । पाडुवान् — जो मधुर गान गाता है । भगवान् ने स्वयं आप श्री को नम्पाडुवान् कि उपाधि देकर आपके नाम-सङ्कीर्तन के स्वारस का अनुभव करने लगे । अत: इस प्रकार से बहुत समय तक नित्य रात्रि समय मे भगवद्-कैङ्कर्य मे अपने आप को सम्लग्न किया ।

एक समय, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात मे, जागरण-व्रत हेतु तिरुक्कुरुन्गुडि भगवान् के प्रति प्रगतिशील नम्पाडुवान् की भेंट एक ब्रह्मराक्षस से हुई । यह ब्रह्मराक्षस अपनी भूख मिताने के लिये इन्तेज़ार कर रहा था । अचानक आप श्री को देखकर वह सन्तुष्ट हो गया कि उसको उसका आहार स्वयं चल कर आया है । अत: यही निवेदन ब्रह्मराक्षस ने आप श्री के समक्ष रखा और आप से परस्पर चर्चा कर अपना जीवन वृत्तान्त बताया कि वह पिछले जन्म मे सोम शर्मा नाम का ब्राह्मण था और जिसने यज्ञ-यागादि मे त्रुटि कर ब्रह्मराक्षस रूप धारण किया । तब आप श्री ने उसको सराहते हुए कहा – हे ब्रह्मराक्षस ! आपकी बातों से बहुत प्रसन्न हुआ । आपकी महती कृपा से आज मै अपने प्राण त्याग सकता हूँ । लेकिन एक बात है कि मै अभी आपकी इच्छा पूर्ति नही कर सकूँगा । मै नित्य रात्रि को समीप मे स्थित भगवान् के मन्दिर जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन करता हूँ । मेरा यह सुवसर छोडने पर मजबूर न करें और मुझे जाने की आज्ञा दे । मुझे मेरा स्वगान से जागरण-व्रत सम्पूर्ण कर, भगवान् को सन्तुष्ट कर आने दे । मै अवश्य आवूँगा । यह मेरा वचन है । ब्रह्मराक्षस ने कहा : हे नम्पाडुवान् ! यह तुमहारा कोई छल लग रहा है । अगर तुमको छोड दूँ तो तुम मुझसे छुटकारा प्राप्त कर सकते हो और पुनः लौटोगे नही । यह सुनकर आप श्री ने इस ब्रह्मराक्षस को आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहा :

अगर मै नही लौटा तो निम्नलिखित पापों के फल का अधिकाधिक फल मुझे प्राप्त हो :

१) असत्यता का पाप (श्लोक ३३)
२) कामवासना से आवृत अन्यों कि पत्नियों के साथ अवैध सम्बन्ध का पाप (श्लोक ३४)
३) जब मै और कोई अन्य भोजन करते समय भोजन मे भेदभाव दिखाने का पाप (श्लोक ३५)
४) ब्राह्मण को दान मे स्थल दे कर पुनः उससे छीनने का पाप (श्लोक ३६)
५) युवनावस्था कि लडकी का सम्भोग करना और बुढापे उसमे दोष देखकर उसका परित्याग करने का पाप (श्लोक ३७)
६) पित्रु-तर्पण के दिन स्वपत्नी का सम्भोग का पाप (श्लोक ३८)
७) उस व्यक्ति का अपमान करना जिसने भोजन प्रदान किया है वह पाप (श्लोक ३९)
८) अपनी बेटी का विवाह करने का वचन देना और तत्पश्चात् उस व्यक्ति से उसका विवाह न करना का पाप (श्लोक ४०)
९) षष्ठी, अष्टमी, अमावास्य, चतुर्दशि के दिन बिना स्नान किये भोजन ग्रहण करने का पाप (श्लोक ४१)
१०) दान करने का वादा कर दान नही करने का पाप (श्लोक ४२)
११) स्वयं के मित्र की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखना जिसका बहुत बडा एहसान स्वयं पर हो का पाप (श्लोक ४३)
१२) स्वाचार्य एवं राजा की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने का पाप (श्लोक ४४)
१३) दो स्त्रियों से विवाह करना और तदुपरान्त एक का पक्षपात करने का पाप (श्लोक ४५)
१४) एक पतिव्रता स्त्री का यौवनावस्था मे त्यागना (जो पूर्णतया निर्भर है) का पाप (श्लोक ४६)
१५) उस गोवृन्द को रोकना का पाप जो जल पीने के लिये जा रहे है (श्लोक ४७)
१६) ऐसे पूर्वपीढी कृत पञ्च महापापों (जैसे ब्राह्मण हत्या) का फल (श्लोक ४८)
१७) अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने का पाप (श्लोक ४९)
१८) अन्य देवी-देवताओं को श्रीमन्नारायण के तुल्य मानने का पाप (श्लोक ५०)

जब तब अठारहवाँ पाप के बारे मे नही बताया, तब तक ब्रह्मराक्षस पूर्वोक्त पापों को नही माना । जब आप श्री ने अठारहवाँ पाप के बारे मे बताया, ब्रह्मराक्षस को पूर्ण विश्वास हुआ क्योंकि यह ऐसा महामहापाप जिसे करने से हर एक जीव इस सम्सार चक्र मे नित्य बन्धित हो जाता है । ऐसे विश्वास से ब्रह्मराक्षस ने आप श्री को छोडकर आपके वापसी की प्रतीक्षा करने लगा ।

अनुवादक टिप्पणी : अठारहवाँ पाप – अन्य देवतान्तरों को भगवान् श्रीमन्नारायण के तुल्य मानना महद्पाप है । इस पूराण का महदुदेश्य यही है कि ज्ञानी जन इसको जानकर इसका पूर्ण परित्याग करे ।

अत: इस प्रकारेण वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् अपने प्रिय भगवान् के समक्ष जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन कर, भगवान् को प्रसन्न किये और स्वदेह त्याग की अन्तिम इच्छा से ब्रह्मराक्षस की ओर अति शीघ्रता से चले । पुनः स्वाहार को देखकर प्रसन्न ब्रह्मराक्षस ने आप श्री की महिमा को जान गया । ब्रह्म राक्षस ने वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् से उनके मधुर गान के फल को माँगा । श्रीमन्नम्पाडुवान् ने यह सुनकर उत्तर दिया – यह तो असम्भव है श्रीमन् ! मुझे पता नही आपको इसका फल भी दे पावूँगा कि नही क्योंकि वह स्वकैङ्कर्य के प्रति किछु भी नही चाहते थे । पुनः पुनः निवेदन करने पर उनके एक गान का फल देने के लिये राज़ी हो गये आप श्री । इस प्रकार कैशिक छन्द मे गान का फल प्राप्त कर यह ब्रह्म राक्षस मुक्त हो गया । इस स्थिति से मुक्त ब्रह्मराक्षस ने राक्षस देह त्यागकर, परलोक प्राप्त किया । तदनन्तर पुनः स्वकैङ्कर्य प्राप्त कर श्रीमन्नम्पाडुवान् भगवन्नाम-सङ्कीर्तन सेवा मे सम्लग्न हुए और अन्तत: भगवद्धाम प्राप्त किये ।

यह दिव्य चरित्र का वर्णन श्रीमन्नारायण (वराह भगवान्) ने स्वपत्नी श्रीभूदेवी को किया । अत: इस प्रकारेण यह सङ्क्षिप्त वर्णन सम्पूर्ण हुआ ।

इस पुराण का पाठ अनेक दिव्यदेशों मे इस दिन किया जाता है । तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्य देश मे नाटक रूप मे यह दिव्य चरित्र दर्शाया जाता है ।

इस पुराण का मङ्गल श्लोक :

नमस्तेस्तु वराहाय लीलोद्धराय महीम् ।
कुरमध्यतोऽयस्य मेरु:गणगणायथे ॥

अर्थात् : मै उन वराह भगवान् को भजता हूँ, जिनने इस भू (धरातल) को बिना विशेष प्रयास से उठा लिया और जिनकी तुलना मे मेरुपर्वत तिनके के समान है ।

यही भाव पेरिय तिरुमोऴि ४.४.३ – ” शिलम्बिनिडैच् चिरु परैपोल् पेरिय मेरु तिरुक्कुरुळम्बिल् कणकणप्पा ” मे है ।

प्रलयोदन्वदुत्तीर्णम् प्रपद्येऽहम् वसुन्धराम् ।
महावराह दम्श्ट्राग्र मल्लीकोसमधुव्रतां ॥

मै उन भूदेवी के शरणागत हूँ जिनको महावराह भगवान् ने कारणजल से उठाया, और उनके (भगवान् के) मल्लिका पुष्प तुल्य दन्तों मे कृष्णवर्ण भौंरे के समान है ।

श्रीपराशर भट्ट ने इस पुराण की व्याख्या लिखी है और इस महद्कार्य के लिये उनको भी प्रणाम करते है :

श्रीपराशर भट्टार्यः श्रीरङ्गेश पुरोहित: ।
श्रीवत्साङ्कसुत: श्रीमान् श्रेयसेऽमेस्तु भूयसे ॥

(वह) श्रीपराश्रभट्ट स्वामी मुझे सभी शुभ प्रदान करे, (जो) श्रीरङ्ग भगवान् के पुरोहित है, (जो) श्रीवत्साङ्क (कूरेश) के सत्पुत्र है और जो कैङ्कर्यश्री भाव से सर्वदा पुरित है ।

आऴ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं
जीयर् तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन् सेट्टलूर कार्तीक श्रीहर्ष रामानुज दास

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nampillai-thiruvallikeni-3

नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

५१) मुन्बु मुकम् तोट्ट्राते (तोत्ताते) निन्रानागिलुम् आबत्तु वन्दवारे मुकम् काट्टि रक्षिक्कुमवनायिट्ट्रु (रक्षिक्कुमवनायित्तु) | अवनिप्पडि इरुप्पानोरुवनागैयाले स्वाराधन् |

हालांकि बहुत लम्बे समय तक भगवान् प्रकट नही होते व दर्शन नही देते पर जब भी भक्त आपत्तिजनक स्थिति मे हो तो भगवान् भक्त रक्षणार्थ प्रकट होते हैं और दर्शन देते हैं | केवल इस गुणाधार पर पूर्वाचार्य भगवान् को सौलभ्य और पूजनीय भजनीय कहते हैं|

अनुवाद टिप्पणि : भगवान् अन्तरयामीब्रम्ह के रूप मे रहकर जीवात्मा को सदा मार्गदर्शन देते हैं और खयाल रखते हैं| जब कोई आपत्तिजनक स्थिति उद्भव होती है तो भक्त रक्षणार्थ अन्तरयामीब्रम्ह रूपी भगवान् तुरन्त प्रकट होते हैं| यहाँ दृष्टान्त गजेन्द्र का दिया गया है | गजेन्द्र ने मनोबल व शारीरिक बल से मगरमच्छ को जीतने का स्वप्रयास हज़ार वर्षों तक किया | पर जैसे ही उस आपत्तिजनक स्थिति मे गजेन्द्र ने स्वप्रयास को छोडकर भगवान् को आर्तभाव से पुकारा तो भगवान्  तुरन्त स्वधाम छोडकर उडते हुए आ पहुचें और मगरमच्छ को मारकर अपने भक्त गजेन्द्र की रक्षा बहुत प्रेम से किये |

५२) तान् रक्षिक्कुमिडत्तिल् इत्तिलैयिल् आनुकूल्यत्तुक्कु सूचकमान अप्रतिशेधमे वेण्डुवतु

जीवात्मा के प्रति भगवान् का किया हुआ रक्षण प्रयास मे भगवान् केवल यह चाहते हैं कि उनके द्वारा क्षेम, प्रेमपूर्वक किया गया यह कृत्य को जीव अस्वीकार (नकारे) न करे अर्थात् पूर्ण विश्वास से स्वीकारे | यही स्वीकारता भगवान् के प्रति अनुकूल कृत्य है और भगवान् स्वयं इसको अनुकूल मानते हैं|

अनुवादक टिप्पणि : ” भगवद्कृपा की स्वीकृति ” के विषय मे आण्डाळ् अम्मा जी तिरुप्पावै २८ वे पासुर मे इस प्रकार कहती है : जैसे भगवान् कृष्ण के विशेष प्रेम व अनुग्रह को जिस प्रकार वृन्दावन के गायों ने स्वीकारा था (गायों की रक्षा करना) ठीक उसी प्रकार इस दासी की रक्षा करने की कृपा करे जिसने आपके अनुग्रह को नकारा नही अर्थात् स्वीकृत ही किया है | पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी जी भी मुमुक्षु-पडि ग्रन्थ के २७३ वे सूत्र कहते हैं : ” पेट्ट्रुक्कु वेण्डुवतु विलक्कामैयुम् इरप्पुमिरे  ” अर्थात् जीवात्मा को परम ध्येय भगवद्-सेवा (कैङ्कर्य) प्राप्ति के लिये दो ही कार्य करणीय है : १) पहला भगवदहैतुकी कृपा को सदैव स्वीकारे (कभी भी तिरस्कार न करे) | २) दूसरा परम ध्येय – भगवद्-कैङ्कर्य के प्रति अटूट अप्रतिबन्धित चाहना या कामना | (जब तक पुरुष की चाहना उसके प्रति नही हो तो उसको पुरुषार्थ नही कह सकते हैं) |

५३) देवतान्तर स्पर्शम् उडैयारुडैय स्पर्शत्तिर्कु श्रीवैष्णवर्गळुडैय पादरेणुवैक् कोण्डु परिहारिक्कैप्पारुन्गोळ्

देवतान्तरि व्यक्ति (या देवतान्तर से सम्बन्ध रखने वाले) के स्पर्श के मात्र से उद्भवित देवतान्तरि वासना के परिहार हेतु प्रपन्न को तुरन्त श्रीवैष्णवों के चरणों की पाद धूलि का आश्रय लेना चाहिये |

अनुवादक टिप्पणि : देवतान्तर माने श्रीमन्नारायण को छोडकर अन्य सभी देवी-देवता | अन्य देवी-देवता जीवात्मों की भान्ति जीव ही है और स्वकर्मणा संसार के चक्र मे बन्धे हुए हैं| वे सभी अहंकार युक्त व रजसतमसोद्भव गुणों से प्रभावित हैं | अतैव हमारे पूर्वाचार्यों ने ऐसे देवी-देवता (देवतान्तर) संबन्ध को सदैव को त्यागा और उन सभी को भी त्यागा जो ऐसे देवतांतरी संबन्ध रखते हैं | इससे हम सभी को समझना चाहिये कि यह विषय कितना तीव्र और गम्भीर है |

इस दृष्टान्त मे, पूर्वाचार्य श्री पराशर भट्टर स्वामी जी का उल्लेख दिया गया है| एक दिन, गलती से किसी देवतान्तरि व्यक्ति के धोती का छोटा सा हिस्सा श्री पराशर भट्टर स्वामी पे लगा | हालांकि बहुत बडे विद्वान होते हुए भी, वह डगमगाहट गये | तुरन्त अपनी माता के पास पहुंचकर पूछे : हे माते ! क्या करूँ अब ? उनकी माताश्री ने कहा कि कोई अब्राह्मण श्रीवैष्णव को ढूँढो और उनका श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करो ! ऐसे महद्व्यक्तित्व को ढूंढकर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हैं| हालांकि पहले तो यह श्रीवैष्णव मना करते हैं पर बाद मे मान जाते हैं|

४४) भगवद् विषयत्तिल् पण्णिन अञ्जलिमात्रमुम् शरण्यम् नीमैयाले मिगै

भगवान् ही शरण्य है जो उनकी शरण मे आकर शरणगत होता है | जब कोई भी व्यक्ति भगवान् के प्रति प्रणाम या करबद्ध होकर प्रार्थना करता है तो इस कृत्य को भगवान् विशेष व महद् कार्य समझते हैं और ऐसे व्यक्ति की सम्पूर्ण रक्षा करते हैं |

अनुवादक टिप्पणि :  भगवान् के ज़खम से उद्भव रक्त वेग को कम करने के लिये,पाण्डव पत्नि, भगवच्छरणागत द्रौपदी ने अपने साड़ी का तुकडा निकालकर ज़खम के चारों ओर बाँधती है | इस कृत्य को देखकर भगवान् उसे बहुत बडा उपहार (अनुग्रह) मानते हैं | भगवान् ने इस भावना से उनके सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त पाण्डवों की सहायता व रक्षा की है | स्वधाम जाने से पूर्व भगवान् कहते हैं कि द्रौपदी द्वारा किया गया उपहार के बदले मे भगवान् अधिक नही पर पाये और उनको यह अफ़सोस सदैव रहेगा | देखिये भगवान् के विचार की विशालता और उदारशील भावना को | कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी श्री यामुनाचार्य के स्तोत्ररत्न के २८ वे श्लोक का अनुसरण करते हैं और यही उपदेश किया है| स्तोत्र रत्न का श्लोक निम्नलिखित है :

त्वदङ्घ्रिम् उद्दिष्य कथापि केनचित्
यथा तथा वापि सकृत् कृतोञ्जलि: !
तवैव मुष्नाति अशुभानि अशेषतः
शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते !! 

यहाँ श्रीयामुनाचार्य कहते हैं भगवान् के चरणों के प्रति किया गया अनुचित विधिवत अञ्जलि भी उचित ही है क्योंकि उनके चरण उस व्यक्ति के समस्त पापों का नाश कर, समस्त शुभ प्रदान करते हैं|

५५) इङ्गिरुक्कुम् नाळैक्कु पुरुषकारमाग मुमुक्षुक्कळुण्डु | अङ्गुत्तैक्कु नित्यसूरिगळुण्डु

यहाँ कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी कह रहे हैं कि इस धरातल (यहाँ) पर दीक्षोपरान्त समय से मुमुक्षु के लिये मुमुक्षु सत्सङ्ग है | पर वहाँ (भगवद्धाम मे) हमे नित्यसूरि और मुमुक्षुओं का सङ्ग मिलेगा |

अनुवादक टिप्पणि : इस भौतिक जगत् मे मुमुक्षु जन, अन्य श्रीवैष्णव जन सहित भगवद्-भागवत-आचार्य सेवा मे सम्लग्न हो सकते हैं या होना चाहिये | देह त्याग पर्यन्त परमपद मे नित्य पार्षद एवं अन्य मुक्तों के सङ्ग मे भगवद्-सेवा मे सम्लग्न होते हैं| आचार्य पुरुषकारेण हम सभी भगवान् व भागवतों की सेवा कर मार्गदर्शन प्राप्त करते है | ऐसे आचार्य ही सत्यज्ञान प्रदान करते हैं और इसका अनुशीलन करवाते हैं| ऐसे मार्गदर्शन से ही इस भौतिक जगत् मे समय का सदुपयोग कर सकते हैं |

५६) ओरुवन् वैष्णवनागैयावतु इतु – सर्वेश्वरन् रक्षकन् एन्रोरुवन् पक्कलिले ओरु वार्त्तै केट्टुविट्टु

एक व्यक्ति तभी वैष्णव बन सकता है जब वह दूसरे वैष्णव (के उपदेशों) का श्रवण करता है :- कि भगवान् श्रीमन्नारायण ही एक मात्र परम देवता है और अन्य देवता जैसे इन्द्र, ब्रह्मा, शिव इत्यादि उनके अधीन मे है और श्रीमन्नारायण ही एक मात्र शरण्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस सूत्र को समझने के लिये पूर्वाचार्यों ने क्षत्रबन्धु का उदाहरण दिया है | क्षत्रबन्धु क्षत्रिय कुल मे जन्मा था पर कुकर्मिक वासानाओं से बन्धित था | एक समय मे, क्षत्रबन्धु ने एक महात्मा साधु की सहायता कर उनसे भगवान् का ” केशव ” नाम उपदेश मे प्राप्त किया | सन्त महात्मा ने इस दिव्य नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा : कल्याण गुण सम्पन्न, श्रिय: पति, अखिलहेय प्रत्यनीक, ब्रह्मा और शिव के स्वामी, ही जगत् स्वामी और परम देवता है जिन्हे श्रीमन्नारायण कहते हैं | यह दृष्टान्त तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार अपने तिरुमालै दिव्य प्रबन्ध के चौथे (४) पासुर मे वर्णन करते है |

४७)  कऴिवतोर् कातलुट्ट्रार्क्कुम् उण्डो कण्गऴ् तुन्जुतल् एन्रिरेयिरुप्पतु स्वरूपमितु एन्रारिन्तल् स्वरूपनुरूपमान वृत्तियुम् इतुक्कुविरोधियानवट्ट्रैत् तळ्ळुतलुम् इल्लैयागिल् ज्ञानम् पिरन्ततिल्लैयामित्यनैयिरे इत्तिल्लैयागिल् आऴ्वारगळ् पोन वऴियिल् अन्वयैत्तिलनामित्तनैयिरे

श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं : जब किसी व्यक्ति को भगवान् और भगवद् विषय के प्रति रति और आसक्ति बढती है, ऐसा व्यक्ति एक क्षण के लिये भी कभी सो नही पायेगा (क्योंकि वह कुछ और सोच नही सकता) | इस प्रकार से ऐसे व्यक्ति जब तब उन्हे भगवान् प्राप्त न जाये तब तक चैन से नही रहते | वास्तविकता यही है | यह समझने के बावजूद भी आत्मा के अनुकूल कृत्य को अपनाकर, प्रतिकूल क्रियाओं को त्यागेगा नही तो प्राप्त ज्ञान की प्रगति नही होगी | अतः आळ्वार दर्शित मार्ग (वह मार्ग जिसमे लौकिक विषयों मे अनासक्ति और पूर्णासक्ति भगवान् के प्रति दर्शाया गया है) के लिये वह अयोग्य होगा |

५८)  नारायण शब्दत्तिर्कु उपायत्व उपयोगियान वात्सल्यादिगळुम् , उपेयत्व उपयोगियान शेषित्वादि गुणङ्गळुम् अर्थम्

भगवान् उपायोपेय हैं अर्थात् भगवान् ही उपाय और भगवान् ही उपेय हैं  (सियाराम ही उपाय – सियाराम ही उपेय) | भगवान् ही साधन-साध्य वस्तु हैं  | नारायण शब्द उपाय-उपेय (साधन-साध्य) (दोनो) को इङ्गित करता है | इस शब्द मे अनेक कल्याण गुण सन्निहित हैं | ऐसे कुछ गुण इस शब्द रूपी ब्रह्म के उपाय और उपेय को प्रकाशित करते हैं| जैसे वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य इत्यादि उपायत्व को दर्शाते हैं और शेषित्व (चितचित वस्तुवों का एक मात्र स्वामी होना) इत्यादि उपेयत्व को दर्शाते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुपडि के १३६ – १३८ सूत्र मे, भगवान् के अनेक कल्याण गुणों और इन गुणों की भूमिका का उल्लेख करते हैं जिससे भगवान् का उपायत्व सुगम हुआ है | अन्तत: यह कहते हैं ऐसे कल्याण गुणों का साक्षात् स्वरूप अर्चावतार भगवान् ही हैं|

५९) सृष्टियादिगळिल् सत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्, आश्रित विरोधिगळळविले असत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्

सृष्टि के प्रारंभ मे भगवान् अपना सत्यसङ्कल्प (जो प्रतिज्ञा ली उसकी परिपूर्णता) प्रदर्शित करते हैं| पर अपने भक्तों के विरोधियों के विषय मे हट के (उनको कठोर दण्ड देते हैं) अलग ढंग से व्यवहार करते हैं| कहने का तात्पर्य यह हुआ कि अगर कोई भक्तों का विरोध हो तो भगवान उनको दण्ड देते हैं हालांकि वे उनको चाहे तो सुधार ही सकते हैं |

६०) आश्रित विरोधिगळैत् तनुक्कु विरोधिगळागक् कोण्डु वळक्कु पेशुमवन्

भगवान् अपने भक्तो के विरोधियों को अपना विरोधि समझकर उनसे तर्क वितर्क करते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : जब पाण्डवों के प्रति दुर्योधन पूर्णतया प्रतिकूल हो गया और पाण्डवों को बाधा पहुचाने लगा तो भगवान् ने पाण्डव पक्ष मे दूत के रूप धारण कर दुर्योधन से संवाद किया |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-6.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

आगे बढ़ने से पहले, श्रीवैष्णव तिरुवाराधन के विषय में भली प्रकार से जानने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html पर देखें क्यूंकि यह लेख इसी तत्व से सम्बंधित है।

४८) वन्दन विरोधी अभिवादन (साष्टांग दण्डवत) करने में बाधाएं

वन्दन का अर्थ है साष्टांग दण्डवत करना – पूर्ण दण्डवत आठ अंग (२ पैर, २ घूटने, पेट, २ कन्धे, २ हाथ और ललाट) इस सन्दर्भ में धरती को छुना। शास्त्र में आदेश हुआ है कि “वैष्णवो वैष्णवं दृष्टवा दण्डवत प्रणमेत पुवी” – जब एक श्रीवैष्णव दूसरे श्रीवैष्णव को देखता है, तो उसे उसी क्षण एक लकड़ी के जैसे धरती पर गिरकर साष्टांग दण्डवत करना चाहिये। पूर्ण अभिवादन अर्थात तमील में दण्डम समरप्पित्तल, दण्डनिडुदल कहते है – यहाँ दण्डम लकड़ी को दर्शाता है और अभिवादन एक लकड़ी धरती पर गिरने के जैसे होनी चाहिये (एक क्षण भी कुछ दूसरा सोचे बिना)। इस भाग में भगवद, भागवत और आचार्य के सन्मुख किये जाने वाले कई अभिवादन को स्पष्टता से समझाया गया है। यहाँ एक तत्व को अच्छी तरह समझना चाहिये। हमारे पूर्वाचार्य केवल एक बार अभिवादन करते थे – सिर्फ सकृत (एक) प्रणाम ही। एक वैष्णव अंश बारबार अभिवादन करते है – यहाँ इस विषय कि पर चर्चा नहीं करेंगे। परन्तु दण्डदनिदुतल का अर्थ एक लकड़ी के समान गिर जाना। एक लकड़ी एक बार गिर जाने के पश्चात फिर नहीं उठती – इस तरह हम इसे याद रख सकते है।

अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: अभिवादन दूसरे के प्रति सम्मान दिखाना है। हम भगवान, अम्माजी, नित्यसूरी (अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि) आल्वार, आचार्य और भागवतों के प्रति अभिवादन करते है। हमें सांसारिक जीवों के प्रति अभिवादन नहीं करना चाहिये जो हमारे साथ लौकिक सम्बन्ध रखते है, वह जो देवतान्तर सम्बन्ध रखते है, सामान्य आचार्य (जो कला,विज्ञान आदि पढ़ाते है) जो भगवान के प्रति थोड़ा भी झुकाव नहीं रखते हो आदि के प्रति भी अभिवादन नहीं करना चाहिये। इस विषय मे यहाँ चर्चा हो रही है। श्रीवैष्णवों में एक और मुख्य विषय है कि आयु अभिवादन के लिये खण्ड नहीं है। हमारे पूर्वाचार्य के जीवनी द्वारा हम देख सकते है कि किस प्रकार आयु में बड़े श्रीवैष्णव छोटे श्रीवैष्णवों का अभिवादन किया करते है। श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमौली में कहते है “कणपुरम कैतोलुम पिल्लैयैप पिल्लै एनरेण्णप पेरुवरे” – जो भगवान तिरुक्कण्णपुरम को पूजता है और वो चाहे एक छोटा बच्चा हो तो भी हम उन्हें एक बच्चे जैसे नहीं सोच सकते है – उसे श्रीवैष्णव ही समझना चाहिये। वो तिरुनेडुन्दाण्डगम के 14वें पाशुर में कहते है “वलरत्तदनाल पयन पेट्रेन वरुग ! एन्रु मडक्किलियैक्कै कूप्पि वणग्ङिनाले” – यद्यपि परकाल नायकी ने एक तोते को उठाया था (श्रीपरकाल स्वामीजी स्त्री भावना में) परंतु जब उन्होने तोते को बड़ी सुन्दरता से भगवान का नाम स्मरण करते हुए सुना तो वह बहुत आनन्दित हो गयी और अपने तोते को अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। श्रीकुरेश स्वामीजी कि पत्नी आण्डाल अम्माजी अपने पुत्र श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी, जो बहुत बड़े विद्वान थे और श्रीरंगम में सत सम्प्रदाय के मार्गदर्शक थे, उनका नित्य श्रीपादतीर्थ लेती थी। इसलिये युवा हो या वृद्ध श्रीवैष्णवों को अभिवादन करना बहुत आवश्यक है।

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आदर्शस्वरूप उदाहरण – श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुए

  • साष्टांग दण्डवत करने से पूर्व धरती को देखना बाधा है। चाहे जमीन गीली, कीचड़ आदि हो सभी को अपने कपड़े, शरीर कि ओर न देखते हुए अभिवादन करना चाहिये।
  • पूर्णत: अभिवादन न करना बाधा है। केवल झुक कर और जमीन को हाथों से छुना नहीं चाहिये। यह सुनिश्चित करना चाहिये कि सभी आठ अंग धरती को छु रहे है। एक लकड़ी के समान गिरना इसमें समझाया गया है।
  • पूर्ण ध्यान के बिना अभिवादन करना बाधा है। हमें साष्टांग करते समय पूर्णत: भगवद/ भागवत/ आचार्य कि ओर अपना ध्यान केन्द्रीत करना चाहिये।
  • द्वयमन्त्र को स्मरण और अनुसन्धान किये बिना साष्टांग करना बाधा है। भगवान को साष्टांग करते समय द्वयमन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिये। हमारे पूर्वज सामान्यत: आलवन्दार स्तोत्र के २२वा श्लोक “न धर्म निष्ठो …” का अनुसन्धान करते थे – “मेरे पास कोई कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि नहीं है; मेरे हाथों में अर्पण करने के लिये कुछ नहीं है और मुझे जाने के लिये कोई और स्थान भी नहीं है; मैं आपके चरण कमलों में अपने आपको समर्पित करता हूँ”। इस सन्दर्भ में हमें एक मुख्य विषय को जानना चाहिये। साष्टांग के पश्चात अभिवादन नहीं करना है (जो गोत्र, सूत्र, नाम आदि को बताता है) क्योंकि अभिवादन वैधिक कर्मानुष्ठान तक ही सीमित रहता है। अन्य श्रीवैष्णवों से बात करते समय हमें केवल “अडियेन् रामानुजदास” ऐसा कहना चाहिये – जैसे “अडियेन् श्रीवैष्णवदास” प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी के शिष्यगण कहते है, “अडियेन् मधुरकविदास” – श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी के शिष्य कहते है आदि। यह श्रीवैष्णवों को स्पष्टता से समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: अभिवादन (किसी को गोत्र, सूत्र, वेद आदि द्वारा पहचान) शरीर से सम्बन्ध रखता है। जब हम आत्मा पर केन्द्रीत कर रहे है और जब हम आत्मबन्धु (श्रीवैष्णव – वो जो हमसे भगवान के दास होने से सम्बन्ध रखते है) से मिलते है, हमें स्वयं की आत्मा द्वारा पहचान करानी चाहिये। आचार्य हृदयम में अळगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ३६वें चूर्णिका में बहुत सुन्दरता से समझाते है “विप्रर्क्कु गोत्र चरण सूत्र कूटस्त्तर पराशर पाराशर्य बोधायनाधिगल; प्रपन्न जन कूटस्त्तर परांगुश परकाल यतिवराधिगल” – ब्राह्मणों के लिये (जो केवल शारीरिक वेदिका के बारें में सोचते है), गोत्र (वंश), चरणा (वेद का एक भाग), सूत्र (वेद के भाग को कर्मानुष्ठान पर केंद्र करता है) ऋषी है जैसे पराशर, व्यास, बोध्याना क्रमश: में। प्रपन्नों के लिये (जिन्होंने यह जान लिया कि वे भगवद्दास है उन्हें समर्पण कर दिया है) उनकी पहचान आल्वारों से सम्बन्ध से है जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी आदि और आचार्य जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी आदि। यहाँ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी इस व्याख्यान में एक विशेष बात पर ज़ोर देते है – प्रपन्न अपने आपको आल्वार और आचार्य के सम्बन्ध से पहचानते है, क्योंकि आल्वार और आचार्य अपने उपदेश और अनुष्ठान से उन तत्वों को स्थापित किये जिसे हम प्रपन्नों को पालन करना है।
  • केवल शास्त्र में लिखा है इसलिये अभिवादन करना और प्रेम और भक्ति से न करना बाधा है।
  • जैसे भगवान को साष्टांग करते है, वैसे भागवतों को करने में हिचकिचाना। अनुवादक टिप्पणी: भगवान को श्रेष्ठ मानना, भगवान को कोई भी प्रेम से आसानी से अभिवादन कर सकता है। परन्तु भागवतों को भी वहीं प्रेम और सन्मान मिलना चाहिये। भगवान स्वयं जब अपने भक्तों से जो आठ गुणों कि आशा करते है वो समझाते हुए यह दर्शाते है कि उनके भक्तों के साथ बड़े सन्मान और प्रेम के साथ व्यवहार करना चाहिये। भक्त कहलाने को योग्य होने के लिए पहिले हमें भगवान के भक्तों से सम्मान और सावधानी से व्यवहार करना चाहिये।
  • आचार्य के प्रति अभिवादन करने से पूर्व हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारा सिर आचार्य के चरण कमलों कि तरफ होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हालाकि ऐसा कहा गया है फिर भी आचार्य को स्पर्श करने से पूर्व हमें ध्यान रखना चाहिये – विशेषकर सन्यासी जो कड़े नियमों का पालन करते है और किसी को भी शारीरिक स्पर्श नहीं करते है। इसलिये हमें सहीं शिष्टाचार का पालन करना चाहिये और हमें ऐसी स्थिति में आचार्य को शारीरिक स्पर्श करने से बचना चाहिये।
  • हमें कभी भी एक बार में अभिवादन से संतुष्ट नहीं होना चाहिये। यह असकृत प्रणाम को नहीं दर्शाता है – हमारे आचार्य द्वारा बाद में प्रणाम करने के लिए कहे जाने पर या किसी विशेष कारण की वजह से या एक बार भगवान /आचार्य की सन्निधि से जाकर वापिस आने पर। ऐसे समय में हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि “मैंने पहिले अभिवादन किया है और यह पूरे दिन के लिये काफी है”।
  • हमें तब तक साष्टांग कर उठना नहीं चाहिये जब तक आचार्य न कहे “पर्याप्त है! कृपया अब उठिये”। हम यहाँ एक घटना को स्मरण कर सकते है: श्रीरामानुज स्वामीजी जब श्रीरंगम पधारे तब वे मन्दिर के शासन प्रबन्ध को सुधार रहे थे। उस समय कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा और वे श्रीरामानुज स्वामीजी के भिक्षा में जहर मिलाने कि सोचे (सन्यासी होने के कारण वें भिक्षा ग्रहण करते इसलिये वे उस खाने में जहर मिलाने का सोचे)। श्रीरामानुज स्वामीजी को इस बात का पता चल गया और वे एक दो दिन के लिये उपवास कर लिये। यह सुनकर श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी तुरन्त श्रीरंगम पधारे। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने आचार्य के आने का संदेश सुनकर उनके स्वागत हेतु स्वयं कड़ी धूप में कावेरी नदी के किनारे गये। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को देखते ही उन्होंने लम्बी साष्टांग दण्डवत किया। परंतु आचार्य आज्ञा न होने के कारण वह उस तप्त भूमि से नहीं उठे। यह देख किडाम्बी आच्चान (श्रीरामानुज स्वामीजी के एक प्रिय शिष्य) श्रीरामानुज स्वामीजी को उठाने को जाते है और श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से कहते है कि “शिष्य और आचार्य के मध्य यह कैसा व्यवहार है? आप श्रीरामानुज स्वामीजी जैसे को क्यों इस कडक धूप में तड़पने को रखे हो? क्या कभी कोई एक नाजुक फूल को कडक धूप में जलने के लिये छोड़ता है?”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी, किदाम्बी आच्चान का श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति प्रेम देख प्रसन्न हो गये और कहते है “मैं ऐसे ही व्यक्ति कि तलाश कर रहा हूँ जिसे श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति इतना लगाव हो। अब से आप इन्हीं से भिक्षा लेना और कहीं जाने कि जरूरत नहीं है”। इससे हम यह देख सकते है कि साष्टांग करने हेतु स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी सही शिष्टाचार बता रहे है।
  • केवल साष्टांग करना और आचार्य के चरण कमलों को अपने माथे से नहीं छुना। यह पहिले चर्चा किये गए पहलू जैसा ही है।
  • जब हम भगवान कि आराधना के लिए जाते है, और उस समय हम आचार्य को वहां उपस्थित देखे, तो सबसे पहिले उन्हीं को साष्टांग करना चाहिये और तत्पश्चात भगवान को। अगर आचार्य स्वयं न हो तो मानसिक रूप से उन्हें अभिवादन कर फिर भगवान को साष्टांग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हम भगवान के पास अपने आचार्य के माध्यम से ही जा सकते है। इसलिये अगर वे मौजुद हो तो पहिले उन्हें साष्टांग कर फिर भगवान को के पास जाना चाहिये। यह हम तिरुवाराधन में भी देखे है। हम पहिले आचार्य के पास जा कर उनकी पूजा कर, उनकी आज्ञा लेकर फिर उनके निमित्त तिरुवाराधन करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने “जीयर पडी तिरुवाराधन क्रमं” में यह समझाते है कि हम तिरुवाराधन श्रीरामानुज स्वामीजी, आल्वार, नित्यसूरी और अन्त में भगवान का इस क्रम से करते है।
  • भगवान कि सन्निधी में भागवतों को साष्टांग करने में हिचकिचाना बाधा है। यद्यपि यह आजकल अभ्यास में नहीं है। साधारणत: आजकल मन्दिर के अन्दर भगवान, अम्माजी, आल्वार और आचार्य को छोड़ और किसी को भी साष्टांग नहीं करते है।
  • पहिले दूसरे श्रीवैष्णवों का साष्टांग करने का इंतजार करना और पश्चात हमारा साष्टांग करना बाधा है। श्रीराम की इस तरह स्तुति हुई है “मृदु पुर्वंच भाषते”, पूर्व भाषी – वह जो पहिले किसी से भी मिलने पर नम्र शब्दों से विचार करता है। उसी तरह दूसरे श्रीवैष्णवों के साष्टांग करने से पूर्व हमें स्वयं उनको साष्टांग करना चाहिये।
  • जब कोई श्रीवैष्णव साष्टांग करता है, तब यह सोचना कि “वह मेरी पूजा कर रहा है” और उसका उलट सोचना भी बाधा है। इससे सम्बंधित एक घटना अळगिय मणवाल पेरुमाल नायानार तिरुपावै के पहिले पाशुर पर व्याख्यान में बताते है। एक बार श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शिष्यों के साथ घुम रहे थे। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी, जो श्रीरामानुज स्वामीजी के आचार्य है, उनके सामने आते है और वे उन्हें साष्टांग दण्डवत करते है। यह देख सभी चकित हो जाते है। यद्यपि श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कि हृदय कि बात की जानकारी थी फिर भी सभी के भ्रम को दूर करने हेतु वे श्रीमहापूर्ण स्वामीजी से पूछँते है कि उन्होंने अपने शिष्य को ही साष्टांग क्यों किया? श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कहते है कि उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी (श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के आचार्य) को देखकर साष्टांग किया। अत: श्रीरामानुज स्वामीजी यह स्पष्ट करते है कि अपने आचार्य के हृदय को स्पष्टता से समझ कर उन पर आश्रित होना चाहिये और यह सोचना चाहिए कि अभिवादन स्वयं के लिये नहीं था। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि अभिवादन हमें कर रहे है यह तो हृदय में विराजमान अंतर्यामी भगवान के लिये और भागवत सम्बन्ध जो हमारा अपने आचार्य और आल्वारों के साथ है उनके लिए है। अभिवादन स्वीकार करने का और दूसरों को अभिवादन करने का यही सही तरीका है।
  • अगर कोई श्रीवैष्णव उनका हमारे प्रति प्रेम के कारण साष्टांग करना चाहे, तो किसी का अनादर नहीं करना चाहिए और अलग ठहर जाए। अनुवादक टिप्पणी: पहिले बताये गये उदाहरण के समान। सभी को श्रीवैष्णवों का आदर कैसे करे इसे और उनके वास्तविक अभीष्ट को समझना चाहिये। अगर उनका अभीष्ट हमे साष्टांग करने में हो जो हमे उनसे भी उच्च स्थान पर पहुंचा रहा है, तो हमें भी बड़ी नम्रतापूर्वक दयालुता से उस स्थान को अपनाना चाहिये।
  • पूर्ण तिरुवाराधन करने के पश्चात हमें पूर्ण साष्टांग दण्डवत करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन के अन्त में “उपचारपदेशेन…” श्लोक का अनुसन्धान करना चाहिये और पूर्ण साष्टांग दण्डवत करना चाहिये और तिरुवाराधन के समय अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांगना चाहिये। यह पहलू इधर दर्शाया गया है।
  • इयल गोष्ठी सेवाकालम (पुरप्पाडु/सवारी के समय मिलकर पाशुरों को गाना) को सम्पूर्ण करने के पश्चात सभी श्रीवैष्णव एक दूसरे का अभिवादन करते है। अभिवादन किये बिना वहाँ से जाना गलत है। हालाकि यहाँ “ईयल साट्रु” का वर्णन किया गया है जो स्तुति करने के पद के संग्रह है, इसे अन्य इयल गोष्ठी के संदर्भ में भी लिया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: यह अभी भी सभी स्थानों पर अभ्यास में है। पुरप्पाडु के समाप्ति के पश्चात एकत्रीत श्रीवैष्णव अभिवादन करते है और तिरुवंधिक काप्पु (बुरी नजर से बचने हेतु आरती) किया जाता है।
  • श्रीवैष्णव गोष्ठी में प्रवेश करते समय और वहाँ से बाहर निकलते समय सभी को अभिवादन करना चाहिये और आज्ञा लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • अगर कोई आचार्य के समीप रहता हो तो उसे प्रतिदिन आचार्य के सन्मुख होना चाहिये और अभिवादन कर और उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। परन्तु अगर वो उनके निकट नहीं रहता है तो आचार्य के तिरुमाली के दिशा में प्रतिदिन साष्टांग करना चाहिये।
  • पुरोदासा का अर्थ यज्ञ (भगवान) का शेष – इसे कुत्ते आदि को नहीं देना चाहिये। उसी तरह एक बार भगवान के शरण होने के पश्चात सांसारिक संबंधियों को (जो श्रीवैष्णव नहीं है) अभिवादन नहीं करना चाहिये।
  • केवल किसी के जन्म के आधार पर हमें किसी को साष्टांग नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् सुन्दरता और स्पष्टता से श्रीवैष्णव और अन्य वर्णों में भेद बताते है। ब्राम्हण्यम अर्थात जो भगवान की तरफ लेके जाए परन्तु कोई ब्राम्हण अगर इसे न समझे और वाद ,वेदान्त में निपुण होने का दावा करे तो ऐसा कीमती ज्ञान व्यर्थ है।
  • अगर कोई श्रीवैष्णव पधारते है, तो उन्हें एक उच्च स्थान देना चाहिये और तत्पश्चात उन्हें साष्टांग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब अतिथी पधारते है तो उन्हें हाथ, पैर धोने के लिये और मुँह के कुल्ली के लिये जल देना चाहिये। अगर वह एक कठीन यात्रा से आये है तो उन्हें आराम महसूस हो ऐसा करवाना चाहिये।
  • देवतान्तर के मन्दिर में साष्टांग करना और पाखण्डी के सामने भी अभिवादन करना बाधा है। इस तत्व की पहिले भी चर्चा की जा चुकी है।
  • तिरुपति में प्रवेश करते समय (सामान्यत: तिरुपति अर्थात दिव्यदेश, परंतु इस शब्द का अर्थ मन्दिर भी हो सकता है) मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व ही साष्टांग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • सार्वजनिक स्थान में आचार्य और आचार्य के समान श्रीवैष्णवों को साष्टांग करने से हिचकिचाना बाधा है। जब भी हम उन्हें देखे तुरन्त हमें उनका अभिवादन करना चाहिये।
  • जो अध्यात्म विद्या (भगवान का रहस्यमय ज्ञान) में पूर्णत: निपुण न हो, उनके प्रति भी पूर्ण अभिवादन प्रकट करना बाधा है, यद्यपि वो अन्य सांसारिक विषयों में निपुण हो। जैसे समझाया गया है “तत कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्ते, आयासायापरं कर्म विध्यान्या सिल्पनैपूणम” – वह कार्य जो बन्धन से मुक्त करे, वह ज्ञान, जो बन्धन से मुक्त करे, वह सच्चा ज्ञान है; अन्य कार्य केवल हमें थकायेंगे और अन्य ज्ञान केवल व्यवसाय के लिये है, गुरु जो सांसारिक ज्ञान सिखाता है वो अभिवादन का सच्चा लक्ष्य नहीं है। हमारे पूर्वाचार्य ऐसे ज्ञान को चप्पल सीने के ज्ञान के समान मानते है और वेदों के अर्थ को समझे बिना जो व्यक्ति उसका उच्चारण करते है वह केसर को ढोने वाले गधे के समान है (केसर का मोल जाने बिना उसे ढोते है)
  • उनका अभिवादन करना, जो मन्त्र रत्न (द्वय महामन्त्र और उसका अर्थ) के गुरु नहीं है, अपितु अन्य मंत्रों को सिखानेवाले है, यह एक बाधा है। यहाँ मात्र द्वय मन्त्र को दर्शाया गया है, परंतु इसका आशय तीनों मन्त्रों से है – तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक, एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुये है। यहाँ अन्य मन्त्र का सामान्यत: अर्थ है, अवैष्णव मन्त्र और ऐसे मन्त्र जो साँप, आदि काटने पर देते है।
  • कठिन परिस्थितियों में भी हमें सांसारिक जनों के आगे नहीं झुकना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिये जो हमारी हर समय हर परिस्थिति में चिन्ता करेंगे। जब यह विश्वास है तो और किसी भी सहायता को देखने कि जरूरत नहीं है।
  • आलस्य में भगवान को साष्टांग करना टालना नहीं चाहिये। यहीं विषय आचार्य और भागवतों के लिये भी लागू है।
  • भगवान की सन्निधी में अवैष्णवों को साष्टांग करना ओर भागवतों को नहीं करना बाधा है। यह विषय हम पहिले चर्चा कर चुके है कि अवैष्णवों को साष्टांग करने से बचना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/03/virodhi-pariharangal-17.html

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ५

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै – तिरुवल्लिक्केणि

४१) अव्यतत्तिनुडैय व्यक्ततदशैयिरे महानागिरतु

मूल प्रकृति प्रथम तत्त्व है | ऐसी प्रकृति के तीन गुण हैं : सत्त्व, रजस, तमस | प्रकृति केअव्यक्त स्थिति को अव्यक्त कहते हैं| इस स्थिति मे तीनो गुण (सत्त्व, रजस, तमस) समान मात्रा मे रहते हैं | जब ऐसे अव्यक्त स्थिति मे तीनो गुणों की मात्रा असमान होती है तब प्रकृति की व्यक्त स्थिति प्रदर्शित होती है | ऐसे व्यक्त स्थिति को महान कहते हैं |

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ ” तत्त्व त्रय ” को ” कुट्टि भाष्य ” कहते हैं | यह ग्रन्थ श्रीभाष्य के विभिन्न अंशों को संक्षिप्त रूप मे प्रकाश करती है | श्रीमद्वरवरमुनि जी ने इस ग्रन्थ पर स्वभाष्य लिखकर महद्योगदान दिया है | इस प्रकार से वेद के सार को स्वभाष्य मे सरल भाव से प्रकाशित करते है | संक्षिप्त विवरण आप के लिये यहाँ ” https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thathva-thrayam/” उपलब्ध किया गया है | अचित विषय का संक्षिप्त विवरण यहाँ उपलब्ध है :                                       ” https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/07/17/thathva-thrayam-achith-what-is-matter/” |

४२) सात्त्विकमायुम् राजसमायुम् तामासमायुम् मून्रु वगैप्पत्तिरे अहङ्कारन्तनिरुप्पतु

अहङ्कार ही बद्ध जीवों को भ्रमित करता है जिससे हम अपने शरीर को आत्मा मान लेते है | अहङ्कार २४ तत्त्वों मे से एक तत्त्व है | यह तत्त्व प्रकृति के व्यक्त स्थिति से उत्पन्न होता है | अहङ्कार तीन प्रकार का होता है : सात्त्विक, रासजिक, तामसिक |

अनुवादक टिप्पणी : अहङ्कार अर्थात् ” अनात्मनि आत्म बुद्धि ” – माने जो आत्मा न हो उसको आत्मा मानना व शरीर को आत्मा मानना अविवेकता एवं अज्ञानता कारण | यह आध्यात्मिक मार्ग मे सबसे बडा विरोधि है | जब तक हम शरीर और आत्मा को भिन्न एवं स्वयं को शरीर नही मानेंगे, तब तक सुनी आध्यात्मिक वचन प्रभावशाली नही होंगे और हमारे सोच कि बुनियाद असत्य ही रहेगी क्योंकि हमारी पहचान असत्य के पर्दे से घिरा हुआ है | भगवद् गीता के दूसरे अध्याय मे, भगवान् श्रीकृष्ण सर्व प्रथम आत्मा का रहस्य एवं आत्मा का स्वभाव समझाते है | बारहवें श्लोक ” नत्वेवाहं ” मे, भगवान् श्रीकृष्ण कहते है जीवात्मा स्थायी है और शरीर अस्थायी है | इसी श्लोक मे भगवान् बहु जीवत्व (जीव असंख्य) है, प्रत्येक जीव का अलग व्यक्तिगत पहचान और जीवात्मा एवं परमात्मा का भिन्नत्व तत्त्व को दर्शाते है | कृपया अधिक जानकारी के लिये यह लिंक क्लिक कर पढे :

https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/07/17/thathva-thrayam-achith-what-is-matter/

४३) सात्विक अहङ्कार कार्यम् एकादश इन्द्रियङ्गळ् | तामसाहङ्कार कार्यम् पृथिव्यादि भूतङ्गळ् | इरण्डुक्कुम् उपकारमाय् इरुक्कुम् राजस अहङ्कारम् |

सात्विक अहङ्कार से एकादश इन्द्रियोत्पन्न होते है (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय : कर्ण(कान), त्वचा (शरीर), चक्षु, जीब (जिह्वा), नाक (नासिका) ; पञ्च कर्मेन्द्रिय : वाक (मुह), हस्थ (हाथ), पाद (पैर), उत्सर्गी इन्द्रिय, उपस्तिन्द्रिय (उत्पादन संबन्धित इन्द्रिय) ; मन (मनस) | तामसिक अहङ्कार से पञ्च भूतेन्द्रियोत्पन्न होते है (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) | राजसिक अहङ्कार, सात्त्विक एवं तामसिक अहङ्कार के कार्यों मे अपना सहयोग देता है |

४४) किट्टिनार्क्कु साम्यापत्तिरयिरे फलम्

परमपद नाथ – श्रीमन्नारायण एवं परमपद घोष्टि

जीवात्मा के लिये निज उद्देश्य उस परमपदनाथ को प्राप्त करना है | ऐसे जीव जो भगवद्धाम प्राप्त करते है उनको साम्यापत्ति (साम्य मोक्ष) जैसे तिरुमङ्गैयाळ्वार पेरिय तिरुमोळि ११.३.५ पासुर मे कहते है : तम्मैये ओक्क अरुळ् चेय्वर् अर्थात् भगवान् उस जीव पर अनुग्रह कर अपने गुण देते है |

अनुवाद टिप्पणी : साम्यापत्ति मोक्ष (साम्य मोक्ष) का अर्थ है कि भगवद्कृपा से जीव परमपद मे आठ विषेश गुण प्राप्त करता है जो भगवान् मे स्वयं है | इन गुणों के अलावा, ऐसे कुछ विषेश गुण है जो केवल भगवान् मे ही है जैसे – श्रिय: पतित्व, शेषशायित्व, उभयविभूतिनाथत्व इत्यादि |

उपरोक्त आठ गुण है :

  • १) अपहतपाप्मा : सभी प्रकार के दोषों के मुक्त (दोष रहित)
  • २) विजर : वृद्धापन से मुक्ति (सदैव युवावस्था मे रहना) यौवनत्व
  • ३) विमृत्यु : मृत्यु के मुक्ति (अमरत्व)
  • ४) विशोक: शोक के मुक्ति
  • ५) विजिगट्स : भूख से मुक्ति
  • ६) अपिपास : प्यास से मुक्ति
  • ७) सत्यकाम : सभी प्रकार के इच्छाओं कि पूर्ति
  • ८) सत्यसङ्कल्प : सभी प्रकार के कार्यों को करने कि क्षमता

४५) मुक्तर् पञ्च विंशति वार्शिकरायिरुप्पर्गळिले – निरन्तर भगवदनुभवत्ताले

नित्य निरन्तर भगवदनुभव करने वाले मुक्त जीव 25 वर्षीय ही रहते है अर्थात नित्ययौवनावस्था प्राप्त करते है |

अनुवादक टिप्पणी : नित्य भगवदानुभव करने वाले, आध्यात्मिक यौवनावस्था भगवदानुग्रह से प्राप्त करते है | यह निदर्शन है कि कैसे नित्य पार्षद एवं मुक्त जीव सदैव यौवन रहते है | उदाहरणार्थ :

  • श्री दशरथ महाराज, नित्य भगवान् श्रीरामचन्द्र के सौन्दर्य लावण्य को देखकर आत्मानंद प्राप्त कर रहे थे जिसका फलस्वरूप उनको यौवनावस्था प्राप्त हो रही थी | ऐसी प्राप्त यौवनावस्था का उल्लेख स्वामी कुलशेखर आळ्वार स्व पेरुमाळ् तिरुमोळि के ९.४ वें पासुर ” वा पोगु वा ” मे करते है |

  • श्री तिरुप्पावै के ग्यारहवें पासुर “कट्ट्रक्करवै” मे भी यही भाव का प्रसतुतिकरण हुआ है श्री गोदाम्बा अम्मा जी द्वारा | कट्ट्र : गाय का बछड़ा, करवै : दूध देने वाले गाय ! यहाँ एक प्रश्न उठता है कि कैसे गाय का बछड़ा दूध देने योग्य है ? कैसे यह सम्भव है ? इसका समाधान श्री अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार इस प्रकार से करते है : जिस प्रकार नित्य त्रिपादविभूति धाम मे मुक्त एवं नित्य पार्षद सदैव यौवनावस्था मे रहते है ठीक उसी प्रकार इस धाम के गाय भी अपने यौवनावस्था के कारण बछड़े के समान होकर भी दुग्ध धारा बहाते है केवल भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य स्पर्श से |

४६) क्षुद्र विषयङ्गळाय् अनुभविक्पुककाल् , अवै अल्पास्थिरत्वादि दोष तुष्टमागैयाळे , अनुभविक्कुम् कालमुम् अल्प आयिरुक्कुम्

भगवद् विषय के परिधि के बाहर आने वाले समस्त विषय (क्षुद्र विषय) अल्पायुषी, अनित्य, अशाश्वत, तुच्छ है |

४७) अनुभाव्य विषयम् अपरिच्छिन्नमागैलाये कालमुम् अनन्तकालमाय् इरुक्कुम्

श्री शठकोप सूरि तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन् भगवान् को नित्य असीमित अबाधित अमृत रस से सम्बोधित करते हैं

क्योंकि भगवान् असीमित हैं, उनके प्रति की गई सेवा (कैङ्कर्य) भी असीमित है अर्थात् नित्य होती ही रहेगी

४८) माता पिताक्कळ् कुरैवालर् पक्कलिलेयिरे इरङ्गवतु

जैसे शारीरिक व मानसिक विकलांगता से बाधित सन्तान के प्रति माता-पिता ज्यादा अनुरक्त और चिन्तित रहते हैं ठीक उसी प्रकार भगवान् भी भौतिक जगत् मे पीडित बद्ध जीवों के प्रति चिन्तित एवं अनुरक्त रहते हैं |

अनुवादक टिप्पणी : नित्य एवं मुक्त पार्षद, सम्पूर्ण ज्ञानमयी है एवं परिपूर्ण रूप से भगवद्-कैङ्कर्य मे संलग्न है परन्तु बद्ध जीव भौतिक जगत् मे बाधित एवं पीडित हैं | क्योंकि भगवद्-कैङ्कर्य सभी जीवों का समान हक है, बद्ध जीव भी इसका सदुपयोग कर स्वरूप, स्वस्वरूप ज्ञान से भगवद्दास होकर भगवान् श्रीमन्नारायण का स्वामित्व स्वीकर करने से उसका आत्मोज्जीवन होगा अन्यथा कालरूप संसार चक्र मे पुनरागमन अवश्य होगा | ऐसे अचेतनता वश मे गिरा हुआ बद्ध चेतन के लिये भगवान् का उद्यम को देखिये :

  • सृष्टि करना
  • जीवों को शरीर व इन्द्रिय प्रदान करना
  • ज्ञान प्रदान करना
  • जीवों का साथ देना – अन्तर्यामी ब्रह्म के रूप मे
  • भगवद् श्वासोत्पन्न नित्य शास्त्र प्रदान करना
  • भौतिक जगत् मे यथावत धर्म वृद्धि, भगवद् भक्त संरक्षणार्थ, अधर्म विनाशार्थ अवतरित होना (अवतार लेना)
  • करुणामय आळ्वार, आचार्यों का भौतिक जगत् मे सुसाध्य आगमन करना बद्ध जीवों के लिये

उपरोक्त विषयों को स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३८१ सूत्र ” त्रिपाद विभूतियिळे परिपूर्ण अनुभवम् नडवा नीर्क ” और अगले चन्द सूत्रों मे दर्शाते हैं | ये सूत्र भगवान् कि निर्हेतुक कृपा तत्त्व को सविस्तार पूर्वक प्रतिपादित करते हैं | श्री वरवरमुनि अपनी व्याख्या मे और विस्तृत रूप से इस विषय को समझाते हैं |

४९) तेळिविसुम्बागैयाले अन्निलम् ताने सोल्लुविक्कुम् | इरुळ् तरुमा ज्ञालमागैयाले इन्निलम् अत्तैत् तविर्पिक्कुम् |

त्रिपादविभूति श्रीवैकुण्ठ धाम अनन्त असीमित आनन्द व निष्कलंक ज्ञान का आलय है | अत: यह स्वभावतः सभी जीवों को भगवान् श्रीमन्नारायण का नित्य गुणगान (साम गान, भगवन्नाम सङ्कीर्तन इत्यादि) करने मे संलग्न करता है | इसके विपरीत मे देखा जाये तो सांसारिक जगत् मे केवल अज्ञान है जिसकी वजह से सभी जीव सांसारिक व इन्द्रिय तृप्ति विषय मे ही व्यस्त रहते हैं जो तुच्छ है |

५०) भगवन्नाम सङ्कीर्तननुम् भागवत सहसवासमुम् सत्तयातारकम्

भगवद् भक्तों (भागवतों) के सहवास मे (सत्सङ्ग मे) अन्य भगवद्भक्त भगवन्नाम सङ्कीर्तन और कैङ्कर्य परायणता से आत्मोज्जीवन करते हैं (अपना जीवन व्यापन करते हैं) |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-5.html

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