लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १३

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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121) शिष्यनुक्कु आचार्यानुवर्त्तनम् पण्णलावदु अवन् देह परिग्रहम् पण्णियुरुक्किर नाळिलेयिरे।पिन्भुळ्ळत्तेल्लाम् भगवदनुभवत्तिले अन्यविक्कुमिरे इरुवर्कुम् ।                        

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पिन्भऴगिय पेरुमाळ् (जो लोकाचार्य (नम्पिळ्ळै) के दिव्य चरणों मे आसीन) स्वामीजी को योग्य और आदर्श शिष्य मानते है)

अनुवर्त्तनम् – आज्ञा पालन और सेवा करना, पिन्बु – परमपद पहुँचकर

इस संसार मे, एक शिष्य, स्वाचार्य की सेवा स्वदेह के साथ ही करता है। परमपद मे अर्थात् परमपद प्राप्त करने के बाद, शिष्य और आचार्य दोनों ही परमपदनाथका निगूढ़ानुभव (भगवदानुभव) मे संलग्न रहते है। लेकिन इस अवस्था मे भी आचार्य के पुरुषाकार से ही, शिष्य को, भगवान् की सन्निकर्षता प्राप्त करना चाहिये।

अनुवादक टीका :  इस अभूतपूर्व तत्त्व को श्रीवरवरमुनि स्वग्रन्थ उपदेशरत्नमाला ६४वें पासुर मे कहते है :

तन्नारियनुक्कुत् तान् अडिमै सेय्वदु
अवन् इन्नादु तन्निल् इरुक्कुम् नाळ्
अन्नेररिन्तुम् अदिल् आशैयिन्रि आचारियनैप् पिरिन्तिरुप्पारार्
मनमे पेशु  

सरलानुवाद – हे मन! मनन और विचार कर! भगवान् की इच्छापूर्तिके लिये इस भौतिकजगत् मे प्रगट आचार्यकी सेवा एक शिष्य करता है। यह समझनेके बाद भी वह शिष्य स्वाचार्यसे अलग व दूर रहकर उनकी कैसे सेवा नही करें यह कैसे हो सकता है?

पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र मे शिष्य लक्षण अध्याय मे कहते है शिष्य को स्वाचार्य का लौकिक व शारीरिक आवश्यकताओं (जैसे भोजन, वस्त्र, निवास आश्रय इत्यादि ) का पूरा ध्यान रखना चाहिये। इस अभूतपूर्व तत्त्व को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र ग्रन्थकी व्याख्या और श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र ग्रन्थ के सारसारतम प्रतिपाद्य तत्त्वों को स्वग्रन्थ उपदेशरत्नमाला के सुन्दर पासुरों मे दर्शाते है।

परमपद मे भी आचार्य के पुरुषकार से ही शिष्य भगवान् की सेवा करता है क्योंकि आचार्य के पुरुषकार से ही शिष्य को परमपद का सौभाग्य मिला। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्वग्रन्थ स्तोत्ररत्नके दूसरे श्लोक मे आचार्य किङ्कर्ता भाव अर्थात् श्रीमन्नाथमुनि स्वामीजी के प्रति उनके दास्य भाव को प्रकाशित कर कहते है – अत्र परत्र चापि नित्यम् यदीय चरणौ मदीयम् शरणम् – इस संसार और परमपदमे, श्रीमन्नाथमुनि के दिव्यचरणार्विन्द ही मेरे (श्रीयामुनमुनि के) शरण है।

122) देहात्माभिमानियानपोदु देहत्तिले अहम् बुद्धियैप् पण्णुम्। देहात् व्यतिरिक्तम् ओन्रुण्डु एन्ररिन्तपोदु आत्माविले अहम् बु्द्धियैप्पण्णुम्। तन्नै भगवच्छेषभूतनाग अनुसन्धित्तपोदु तन्नै तदीय शेषत्व पर्यन्तमाग अनुसन्धिक्कक् कडवन्।

मधुरकवि-आऴ्वार जीव के वास्तविक स्वरूप को दर्शाते हुए – भागवत पारतन्त्रय (शेषत्व)

जब जीवात्मा अनित्य शरीर और आत्माके अभेद तत्त्वको समझकर एक मानता है, ऐसा प्राप्त ज्ञान उस जीवमे अभेद भाव को सिद्ध करता है। जब जीवात्मा अनित्य शरीर और आत्माके भेद तत्त्वको समझकर दोनोें को भिन्न मानता है, वह स्वस्वातन्त्र अर्थात् ‘अहम् भाव’ को सिद्ध करता है। जब जीवात्मा, भगवान् के प्रति जीवात्मा का दासत्व को स्वीकार कर समझता है जैसा उत्ततुम् उन् अडियार्क्कु अडिमै मे कहा गया है, वह जीवात्मा शनै: शनै: भागवतों के प्रति जीवात्मा का दासत्व तत्त्वको समझने लगता है अर्थात् वह भगवान् के भक्तों का दास है।

अनुवादक टीका : उपरोक्त सरलार्थ मे व्याख्याकार जीवात्मा के विभिन्न अवस्थाओं मे जीवके ज्ञानप्रगति को दर्शा रहे है। कहने का तात्पर्य यह हुआ की परमात्मारूपी भगवान् जीवात्माको नित्य मार्गदर्शन देकर और जीवके ज्ञानका पालन-पोषण करते है। और अन्तोगत्वा जीवको स्वस्वरूप ज्ञान की पूर्णानुभूति प्रदान करते है। अऴगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी इस तत्त्वको आचार्य-हृदय ग्रन्थ के १५वें सूत्र मे कहते है –

अदु तानुम् आस्तिक्य विवेक अन्य शेषत्वस्वस्वातन्त्रिय निर्वृत्ति पारतन्त्रियङ्गलै उण्डाक्किन वऴि

पूर्ववर्ति सूत्रों मे, अऴगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी सभी जीवों के प्रति भगवान् की मातृत्व सहनशीलता को समझाते है। एक माता जिस प्रकार स्वशिशुको स्वतन्त्रता देकर, और स्वशिशुके,स्वतन्त्रताभिमानसे किये गये अपराधों व गलतियोंको अतिशीघ्रता से सुधारकर स्वशिशुको श्रेष्ठ बनाती है ठीक उसी प्रकार भगवान् भी जीवात्माके कार्यविधियों व कर्मों को शास्त्रोचितविधि से अग्रसर कर जीव को तदनन्तर श्रेष्ठ ऊर्ध्वपथ मे यथानुरूप मार्गदर्शन कराते है। इस सूत्रमे विविध-विविध सोपानों पर भगवान् का जीव को यथानुरूप मार्गदर्शन कराने की विधि द्रटव्य है। इस सूत्र की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की टीका अभूतपूर्व है जिसके कुछ अंश यहां प्रस्तुत कर रहे है –
    • सर्वप्रथम, एक नास्तिकावादिमे विश्वास व श्रद्धाको बढ़ानेके लिये, भगवान् शास्त्रोंके कुछ शीघ्रफलप्रदायक अंशोंको प्रकाशित करते है। यथा मान लीजिए – एक व्यक्ति के बहुत सारे शत्रु है। बहुशत्रु विषादसे पीडित इस व्यक्तिको केवल शत्रुनाशकी इच्छापूर्ति के लिये शास्त्रोचित विधि स्येन यज्ञ को भगवान् प्रदान किये है। योग्य ब्राह्मण के कर कमलों से इस स्येनयज्ञको शास्त्रोचित विधिसे सम्पन्न कराने के पश्चात् यज्ञके प्रतिरूप शत्रुनाशके सुखद समाचारके श्रवणसे इस नास्तिकावादिमे शास्त्रों के प्रति विश्वास बढ़ता है। यह शास्त्रों के प्रति विश्वास प्रगति का सर्वप्रथम सोपान है। कहने का तात्पर्य यह हुआ की शास्त्रो मे श्रद्धा के बिना आध्यात्मिक पथ मे प्रगति असंभव है।
    • शास्त्रो के प्रति श्रद्धालता जब जीव मे जागृक होती है, तब भगवान् जीवात्मा को, जीवात्मा और प्राप्त शरीर दोनों के भिन्नत्व को दर्शाते है। भगवान् ज्योतिष्टोमम् (इत्यादि) (एक प्रकार का यज्ञ जिसे सम्पन्न करने पर तथा देह त्यागनेके पश्चात स्वर्गके विभिन्न सुख उस जीवको प्राप्त होगा) को प्रकाशित कर जीवोंमे श्रद्धालताको जागृक करते है। इससे जीवात्मा और प्राप्त शरीर का भेद को और समझने लगते है।
    • तदनन्तर भगवान् यह दर्शाते है की उपरोक्त स्वर्गके सुख अनित्य है। नित्यसुख तो केवल परमपद मे भगवान् की सेवा करने मे ही है जो भगवद्भक्ति से ही साध्य है। इससे जीवात्माको यह समझ आता है की नित्यसुख प्राप्तिके लिये उसे केवल भगवान् की सेवा करनी चाहिए न की अन्यों की।
    • तदनन्तर भगवान् यह दर्शाते है की भगवद्भक्ति मे अंशमात्र भी अहंकार जीवात्माके वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देता है। अत: स्वस्वातन्त्र विचारधारा को परिपूर्णतया त्यागकर भगवान् की शरणागति करना जीवात्माका परमश्रेय कर्तव्य है।
  • अन्तोगत्वा भगवान् की निर्हेतुककृुपा से जीवात्मा परतन्त्र भाव (ऐसी अवस्था जहां जीव भगवान् पर परिपूर्णतया निर्भर है और केवल भगवान् के विशुद्ध परमसुख के लिये ही जीवित है) प्राप्त करता है ।

जब ऐसी परतन्त्र भावरूपीलता जीवात्मामे विकसित होती है तो फलस्वरूप यह लता भागवत-शेषत्व और भागवत-सेवाके चरम रूपमे प्रकाशित होती है। इस तत्त्व को परकालन स्वामीजी पेरियतिरुमोऴि ८.१०.३ पासुर मे कहते है – हे तिरुक्कण्णपुर के स्वामी ! पेरियमहामन्त्र (तिरुवष्टाक्षर) के दिव्यार्थोंके अनुसन्धानके पश्चात् मै यह समझाकी आपका यह दास वास्तविकतामे आपकेदासों का दास है। इन्हीं शब्दों और इस तत्त्व को पुन: पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुपडि के ८९वें सूत्र मे दर्शाते है। इस ८९वें सूत्रकी टीका मे, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है की जब जीवका अहंकार (भौतिक देह और आत्मा मे अभेद मानना) और ममकार (अपने आप को स्वतन्त्र मानना) पूर्णतया नष्ट हो जायें, तब जीव मे वास्तविकत स्वरूप अर्थात् भगवच्छेषत्व भाव प्रगट होता है। इस भावकी चरमसीमा भागवत-शेषत्व कहलाती है। इस प्रकारसे भगवान् अज्ञानी जीवात्मा (जिसे शास्त्रमे श्रद्धा नही है) को स्वस्वरूप ज्ञानप्रदान  कर उस जीवको स्वस्वरूप ज्ञानी मे परिवर्तित कर भागवत-शेषत्व की चरमसीमा मे प्रतिष्ठित करते है।

१२३) दिव्यमङ्गळ विग्रहमुम् , विग्रहगुणङ्गळुम् , दिव्यात्मस्वरूपमुम् , स्वरूपगुणङ्गुळुम् नित्यमुत्कर्कु प्राप्यमानाप्पोले, मुमुक्षुवाय् प्रपन्नान इव्वतिकारिक्कु द्वय शरीरमे प्राप्यमायिरुक्कुमिरे

मुमुक्षु – मोक्ष की इच्छा करने वाला, नित्य – भगवान् के पार्षदगण, मुक्त – वह जीव जिनको भगवद्धाम प्राप्त हुआ है।

नित्य और मुक्त जीव भगवान् के इन विभिन्न अंशों पर ध्यान कर प्राप्त करना चाहते है –

  • भगवान् का दिव्य स्वरूप
  • भगवान् के दिव्य मंगल स्वरूप के विभिन्न गुण जैसे सौकुमार्य (नम्रता व कोमलता), सौन्दर्य (अंग-अंग की सौन्दर्यता), सौगन्धय (दिव्य मंगल स्वरूप की परिमलता व महकता), यौवन (भगवान् का दिव्य यौवन स्वरूप)
  • यथा ‘एण्णुम् पोन्नुरुवाय् .. ‘ मे निर्दिष्ट भगवान् का दिव्यात्म स्वरूप
  • भगवान् के दिव्य स्वरूप को दर्शाने वाले दिव्यमंगल गुण यथा ज्ञान, शक्ति

अत एव, भगवच्छरणागतों को सदैव द्वयमहामन्त्र और इस महामन्त्र के दिव्यार्थ का चिन्तन-मनन और जाप करना चाहिए।

अनुवादक टीका : हमारे पूर्वाचार्य की अनुरक्ति सदैव द्वयमहामन्त्रमे ही थी। परम्परागत प्राप्त रहस्यत्रयों मे, शास्त्र सम्मत एवं सुखप्रदायक पेरियमन्त्र व तिरुमन्त्र है क्योंकि जीवात्मा और परमात्मा के विशिष्ट सम्बन्ध को यह मन्त्र स्पष्टता से दर्शाता है। चरमश्लोक भगवान् को अतिप्रिय है क्योंकि यह भगवान् को ही परमोपाय के रूप मे दर्शाता है। द्वयमहामन्त्र आचार्य को अतिप्रिय है क्योंकि यह महामन्त्र दर्शाता है की भगवती श्रीपिराट्टि ही पुरुषकार स्वरूपी है, भगवान् ही परमोपाय है, इनका युगल-स्वरूप ही जीव का एकमात्र शरण एवं संसेव्य है और इस युगल-स्वरूप की सेवा व कैङ्कर्य नित्यता की प्रार्थना कर जीव युगल-स्वरूप का शरण ग्रहण करता है।

श्रीरङ्गनाथ भगवान् के श्रीमद्रामानुजाचार्यको निर्देश दिया की वह उनके दिव्यक्षेत्र श्रीरङ्गममे द्वयमहामन्त्रके जाप और दिव्यार्थानुसन्धान से नित्य निवास करे। श्रीरङ्गनाथ भगवान् का यह निर्देश श्रीमद्रामानुजाचार्य स्वग्रन्थ श्रीगद्यत्रय मे दर्शाते है। पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र मे यही कहते है – ‘ जप्तव्यम् गुरुपरम्परैयुम् द्वयमुम् ‘ जिसका वर्णन पूर्वोक्त १२०वें सू्त्र मे हो चुका है। श्रीमद्वरवरमुनि स्वामीजीने इस तत्त्वको स्वजीवनमे भरपूर पालनकर यही दर्शाया है की द्वयमहामन्त्रके जाप और दिव्यार्थानुसन्धान से नित्य निवास कैसे करे।

पूर्वदिनचर्या मे, देवराजगुरु (एरुम्बियप्पा) स्वामीजी श्रीमद्वरवरमुनि स्वामीजीके विभिन्न कार्यों को श्लोकबद्ध कर कहते है –

मन्त्र रत्नानुसन्धान सन्तत स्पुरिताधरम् ।
तदर्थतत्त्वनिध्यान सन्नद्धपुलकोद्गमम् ।।   

सरलार्थ :  श्रीमद्वरवरमुनि स्वामीजीके अधर मन्त्ररत्नानुसन्धान (द्वयमहामन्त्र का) निरन्तर जपते रहते है। इस निरन्तर मन्त्ररत्नानुसन्धान (जो तिरुवाय्मोऴि ही है ) व जप के प्रभाव से उनके शरीर मे विभिन्न दिव्य प्रतिक्रिया दृष्टिगोचर है।

श्री अऴगिय-मणवाळ-पेरुमाळ्-नायनार्  स्वामीजी स्वग्रन्थ आचार्य-हृदय २१०वें सूत्र मे कहते है –  द्वयमहामन्त्र के अर्थों का विवरण ही तिरुवाय्मोऴि है। तथा – ‘ द्वयार्थम् दीर्घ शरणागति एन्रदु सारसङ्ग्रहत्तिले ‘ इसका यह अर्थ हुआ की श्रीमद्वरवरमुनि स्वामीजी कहते है की द्वयमहामन्त्र के दश तत्त्व (श्रिय:पतित्व, पुरुषकारत्व इत्यादि) तिरुवाय्मोऴि मे विस्तार मे वर्णित है। इसी माध्यम से पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी का विशेष सारसङ्ग्रह  ग्रन्थ की पूर्ण प्रतिलिपि को स्वटीका मे उद्धृत कर समस्त जीवों पर महोपकार करते है। समस्त जीवोंके उद्धार हेतु पूर्वाचार्योंकी कृतियोंको शुद्धता एवं सरलता पूर्वक प्रकाशित करने की उनकी यह अहैतुकीकृपा का एक सीधा उदाहरण है।

१२३) भगवत्विषयत्तिले नेञ्जै वैत्तनुभविक्कैये यात्रैयानावनुक्कु अन्यपरनावनन् ओप्पागप्पोरुमो

              श्रीमद्रामानुजार्य और श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी

वह व्यक्ति जो नित्य भगवान् का स्वभाव, नाम, रूप, दिव्य गुणों का नित्यानुसन्धान क्रिया मे नित्य संलग्न है, उसकी तुलना किसी अन्य देवतान्तराश्रित व्यक्ति से कदापि नही की जा सकती है।

अनुवादक टीका : भागवत वह है जो नित्य भगवान् की स्तुति करने मे संलग्न है। श्रीमद्भगवद्गीता के १०.९ वे श्लोक मे भगवान् श्रीकृष्ण कहते है – निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं।

तथा श्रीमद्भगवद्गीता ९.१४ मे कहते है –

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥9.14॥

वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।

ऐसे भक्तजनों की तुलना उन व्यक्तियों से कदापि नही की जा सकती है जो अल्पफलों की इच्छा पूर्ती के लिये अन्य देवतान्तराश्रित है।

तिरुवाय्मोऴि ४.४.८ पासु्र मे श्रीशठकोप स्वामीजी घोषणा करते है – ‘इनियावर् निगर् अगल्वानत्ते’ अर्थात् भगवान् का प्रेम और वात्सल्य के प्रभाव से उत्साहित श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की श्रीवैकुण्ठ मे भगवान् की स्तुति करने वालों मे उन जैसा कोई नही है। गोविन्दाचार्य स्वामीजी श्रीमद्रामानुजार्य स्वामीजी का दिव्य एवं अलौकिक शरीर का रसास्वादन कर कहते है – इल्लै एनक्कु एतिर् ? अर्थात् श्रीमद्रामानुजार्य के कृपापात्रों मे मुझसे अधिक सौभाग्यशाली और कौन हो सकता है। ठीक इसी प्रकार श्रीमधुरकवि-आऴ्वार का कण्णिणु्न्-शिरुत्ताम्बुमे श्रीशठकोप-स्वामीजी (की) एवं श्रीरङ्गनाथगुरु का इरामानुश-नूत्तन्दादि मे श्रीमद्रामानुजार्य की कीर्ति एवं स्तुति से यह स्थापित करते है की भागवत-जन अतुल्य है, भगवान् की तुलना मे भागवत-जन ही श्रेष्ठ है, फिर देवतान्तराश्रित व्यक्तियों की क्या कहें ?

१२५) आकिञ्चन्यमुम् स्वरूपमुम् प्रपत्तिक्कु परिकरमिरे

श्रीमन्नाथमुनि – श्रीयामुनाचार्य, काट्टुमन्नारकोइल् । पूर्णतया अकिंचनता भाव को श्रीयामुनाचार्य ने दर्शाया।

आकिञ्चन्यमुम् – पूर्ण निराश्रयता, स्वरूपम् – सत्स्वरूप (आत्मा भगवान् की किङ्कर्ता के लिये है)।

भगवच्छरणागति के अनुषंगी विषय – १) पूर्ण निराश्रयता और २) सत्स्वरूप के अनुसार जीवन का पालन करना है।

अनुवादक टीका : भगवान् को परमोपाय (एक मात्र शरण्य) के रूप मे स्वीकार करने से पहले जीव को यह समझना बहुत आवश्यक है की इस चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जीव को स्वसाधनाश्रय रहित होना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी इस तत्त्वको स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ५.७.१ – नोत्त नोन्बिलेन् नुण्णरिविलेन् पासुर मे कहते है मेरे पास न तो कर्मयोग है, न ज्ञानयोग है, तथा भक्तियोग है परन्तु मै मेरे संरक्षण के लिये आप (भगवान्) पर पूर्णतया निर्भर हूं। तथा जीव को यह भी समझना चाहिये की जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप भगवान् पर पूर्ण निर्भरता है। यह दोनों तत्त्व प्रपत्ति के अनुषंगी है।

१२६) इरुवरुमान चेर्त्तियिलेयिरे इवनडिमै चेय्वदु। अच्चेर्त्ति तन्नैयेयिरे इवनुपायमागप् पत्तुवातुम। इत्ताल् शोल्लित्तगिरदु नित्यप्राप्यत्वमिरे। नित्यपूर्वविषयमिरे नित्यप्राप्यमाग वल्लतु।

जीवात्मा का चरमलक्ष्य युुगल-स्वरूप (पेरिय-पिराट्टि और पेरुमाळ्) जैसा ‘श्रीमते नारायणाय नम:‘ पद मे निर्दिष्ट, की सेवा करना है।श्रीमन नारायणाय  चरणौ शरणम् प्रपद्ये’ पद मे निर्दिष्ट युुगल-स्वरूप (पेरिय-पिराट्टि और पेरुमाळ्) को जीवात्मा उपायोपाय स्वरूप मानता है तथा उनका शरण ग्रहण करता है। इससे स्पष्ट है की जीवात्मा का नित्य कल्याण युुगल-स्वरूप (पेरिय-पिराट्टि और पेरुमाळ्) की सेवा करना है। वह जो अपूर्व एवं अतुल्य होता है वह ही वास्तविक चरमलक्ष्य होता है।

अनुवादक टीका : पेरिय-पिराट्टि और पेरुमाळ् सदा एक साथ रहते है। श्रीशठकोप स्वामीजी, पिराट्टि के शब्दों को दोहराते हुए तिरुवाय्मोऴि ६.१०.१० मे कहते है – अगलगिल्लेन् इरैयुम् अर्थात् एक क्षण के लिए भी भगवान् के वक्षस्थल का त्याग नही कर सकती। जिस प्रकार एक पुत्र-पुत्री का अपने माता-पिता (उभय) की सेवा करना सहजस्वभाव है ठीक उसी प्रकार युुगल-स्वरूप की सेवा करना जीवात्मा का सहज स्वभाव है। इस तत्त्व को पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वग्रन्थ मुमुक्षुपडि द्वय-प्रकरण मे द्वयमहामन्त्र के दूसरे खण्ड का श्रीमते ‘ शब्द की परिभाषा मे समझाते है। हम यहां श्रीमद्वरवरमुनि प्रणीत टीकाके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे है :

    • सूत्र १६५ – ‘श्रीमते’ अर्थात् पेरुमाळ् जो सदैव पिराट्टि के साथ रहते है
    • सूत्र १६६ – जब भगवान् उपाय है, तो पिराट्टि परुषकार है। जब भगवान् प्राप्य (लक्ष्य) है, तो पिराट्टि भी इस प्राप्य (लक्ष्य) का अंग है और कैङ्कर्यवर्धन मे सहायता करती है। द्वयमहामन्त्र के प्रथम भाग मे, पिराट्टि पुरुषकारस्वरूपी है का वर्णन है। जब भगवान् जीवात्मा के दोषों को देखते है, तब पिराट्टि, भगवान् को समझाती है की, आप, जीवके, आप तक पहुंचनेके प्रयासकार्यको ही देखें और जीवात्मा के दोषों की अपेक्षा आप स्वयंकी महतीकृपाको अधिक महत्त्व दीजिए और जीव पर अनुग्रह कीजिए। इस प्रकार से श्रीजी, भगवान् को शान्त कर तथा भगवान् के मत को दृढ़ कर जीव को स्वीकारने को कहती है।द्वयमहामन्त्र के द्वितीय भाग मे दोनों अर्थात् श्रीजी और भगवान् प्राप्य लक्ष्य है यह सप्रमाण सिद्ध है।श्रीजी जीवात्मा को नित्यकैङ्कर्य करने मे प्रोत्साहन देती है। जब जीव स्वरूपानुरूप नित्यकैङ्कर्य मे सहर्ष संलग्न होता है तो इस हर्ष विषय को भगवान् के समक्ष प्रस्तुत कर भगवान् का मुखोल्लास करती है।
    • सूत्र १६७ – तिरुमन्त्र के नारायण ‘ शब्द मे वर्णित कैङ्कर्य का विस्तृत वर्णन है। तिरुमन्त्रमे भगवान् और श्रीजीका अप्रत्यक्ष संबंध है। परन्तु द्वयमहामन्त्र मे प्रत्यक्ष संबंध है।
    • सूत्र १६८ – इळय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) कहते है की वह श्रीसियपिय की सेवा नित्य करना चाहते है तथा यही आजीवन भर दर्शाया। यह एक श्रीवैष्णव का स्वरूपानुरूपाचरण है – भगवान् और श्रीजी की सेवा करना।
  • सूत्र १६९ – यथा माता-पिता के प्रति सन्तान की सेवा, माता-पिता को रसास्वादनीय है, तथाजीवात्मा की किङ्करता पूर्णभाव से ,भगवान् और श्रीजी के समक्ष, सन्तुष्ट है तथा रसास्वादनीय है।

१२७) इवनुडैय अपराधकालम् पार्त्तिरुन्दु प्रतिपत्ति पण्णुगैकु अवणुक्कु अवकाशमिल्लै – अवळ् कूड इरुक्कैयाले

श्रीरामचन्द्र के प्रकोपसे काकासुर का संरक्षण करती हुई पिराट्टि का दृश्य

प्रतिपत्ति – विचार करना !

पिराट्टि के संगमे रहने वाले परमेश्वर भगवान् को जीव के दोषों तथा तदनुसार जीव को दण्ड देने का विचार व अवकाश भी नही है क्योंकि पिराट्टि पुरुषकारत्व से जीव को भगवान् के प्रकोप से बचाती है।

अनुवादक टीका : जीवात्माओं के प्रति पिराट्टि सदैव चिन्ताग्रस्त रहती है। आप सदैव जीवात्माओं का योग-क्षेम देखती रहती है। अत एव आप यह सुनिश्चित करती है की जीवात्माओं के दोषों को देखकर भगवान् कुपित न हो और जीवों को दण्ड न दे। भगवान् के हृदय मे गुप्त कृपा को भीतर प्रकाशकर तथा यह सुनिश्चित करती है जीव भगवान् से संरक्षित/स्वीकृत है। पिराट्टि के इस गुणको पुरुषकार कहते है। पुरुषकार तत्त्व का वर्णन श्रीपिळ्ळेलोकाचार्य स्वामीजी स्वग्रन्थ के द्वयप्रकरण मे विस्तारपूर्वक किये है। इस सन्दर्भ मे श्रीवरवरमुनि प्रणीत टीका के कुछ अंश प्रस्तुत है –

    • सूत्र १२७ – भगवान् का हृदय चन्द्रमा की तरह शीतल और उपशामक है। लेकिन जीव के दोषों को देखते ही कुपित हो जाते है क्योंकि यह शास्त्रानुसार है। ऐसे सन्दर्भों मे भगवान् का कोप, पिराट्टि के सुन्दर और मनमोहक वचनों को सुनकर, शान्त हो जाता है और जीव पर कृपा करते है।
    • सूत्र १२८ –  पिराट्टि का पुरुषकार (अनुरोध) अचूक है। यह दो कारणों से सदैव सफल होता है – पहला १) आपश्री को जीवों के प्रति मातृ वात्सल्य है। दूसरा २) आप भगवान् की अनपायिनी व स्वामीनी है तथा भगवान् की प्रिया है। इसलिये भगवान् आपके विचारों व वचनों को सुनते है।
    • सूत्र १२९ – रावण संहार के पश्चात्, सीताजी को हानी तथा कष्ट पहुंचाने वाली राक्षस स्त्रियों के प्रति श्रीहनुमानजी बहुत कुपित थे। परन्तु लोक-माता सीताजी श्रीहनुमानजी से कहती है – हे कपि श्रेष्ठ ! आप इन राक्षस स्त्रियों पर आपका क्रोध न करें। इन्हें कृपा कर छोड़ दीजिये। लोकमाता के वचनों को सुनते ही श्रीहनुमानजी ने राक्षस स्त्रियों को छोड़ दिया। जब लोकमाता  श्रीहनुमानजी को समझाने मे सक्षम है तो भगवान् (जो प्रिया-श्रीजी के प्रति सदैव आकर्षित है) को समझाने मे क्या आपत्ति होगी?
  • सूत्र १३५ – श्रीरामजीके साथ उनकी (पिराट्टि की) सहज समीपता (उपस्थिति) के कारणार्थ काकासुर भगवान् के कोप से बच गया। परन्तु पिराट्टिकी असमीपता व अनुपस्थिति के कारण ही रावण की मृत्यु हुई।

१२८) वेरुमैयुम् स्वरूपमुम् इरण्डुम् प्रपत्तिक्कु परिकरिमिरे

भगवच्छरणागति के अनुषंगी विषय – १) पूर्ण निराश्रयता और २) सत्स्वरूप के अनुसार जीवन का पालन करना है।

अनुवादक टीका : भगवान् को परमोपाय (एक मात्र शरण्य) के रूप मे स्वीकार करने से पहले जीव को यह समझना बहुत आवश्यक है की इस चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जीव को स्वसाधनाश्रय रहित होना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी इस तत्त्वको स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ५.७.१ – नोत्त नोन्बिलेन् नुण्णरिविलेन् पासुर मे कहते है मेरे पास न तो कर्मयोग है, न ज्ञानयोग है, तथा भक्तियोग है परन्तु मै मेरे संरक्षण के लिये आप (भगवान्) पर पूर्णतया निर्भर हूं। तथा जीव को यह भी समझना चाहिये की जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप भगवान् पर पूर्ण निर्भरता है। यह दोनों तत्त्व प्रपत्ति के अनुषंगी है।

१२९) अधिकारिस्वरूपमादु अनन्यगतित्वमुम्, प्राप्यरुचियुम्, स्वरूपप्रकारशमुम् एन्-गिर-इवैयिरे

योग्य अधिकारी के लक्षण व गुण इस प्रकार है : १) केवल श्रीभगवान् को अनन्य शरण्य के रूप मे मानकर जीवन व्यतीत करना, २) भगवद्-कैङ्कर्य के प्रति रुचि रखना, ३) स्वरूपानुरूप स्वभाव को प्रकाशित करना अर्थात् मै भगवान् का दास हूं यह मानते हुए जीवन व्यापन करना।

अनुवादक टीका : यहां उपरोक्त तीन लक्षण प्रपन्न (भगवान् का शरणागत) के अत्यावश्यक गुण है। इन गुणों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है –

    • अनन्यगतित्वम् –  यह स्वीकारना की भगवान् के अलावा कोई और शरण्य नही है। भगवान् को अनन्यगति मानकर इसी परमेच्छा से उनका शरण लेना जीव का परम कर्तव्य है। जीव को अन्याभिलाषा रहित भगवान् की शरणागति करनी चाहिए। भगवान् जब यह देखते है की जीव अन्य देवी-देवताओं मे रुचि रखते है व स्वयं की स्वातन्त्रता मे विश्वास रखता है, तो भगवान् यह निश्चित करते है की वह जीव स्वकर्म के चक्रबन्धन मे फंसकर कर्मों के फलों को भोगता है तथा अन्योपायों मे जीव की रुचि बढ़ती है, अन्तोगत्वा देवतान्तरों के पूजार्चन मे संलग्न होता है। हम बारंबार सुनते आये है –  ‘ सणप्पनार् कण्ड ब्रह्मास्त्रम् पोले ‘ अर्थात् जब एक व्यक्ति ब्रह्मास्त्र प्रयोग से बन्धित है, अगर उस व्यक्तिको अन्य रस्सी से बान्ध दिया जाये तो ब्रह्मास्त्र निरस्त्र हो जाता है और वह व्यक्ति ब्रह्मास्त्र से मुक्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार से जीव को केवल भगवान् की ही अनन्यता से प्रपत्ति करनी चाहिए। अत एव जीव को देवतान्तर और स्व-स्वातन्त्रता को त्याग देना चाहिए। पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्त्व को समझाने के लिये एक अभूतपूर्व ग्रन्थ ‘ प्रपन्न परित्रान ‘ प्रदान किये है। इस अभूतपूर्व ग्रन्थमे पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी यह स्थापित करते है की भगवान् के अलावा अन्य कोई भी सच्चा रक्षक नही है।
    • प्राप्य रुचि – प्रपन्न होने के दो आवश्यक पहलू है १) जीवको भगवाद्धाम पहुंचने की तीव्रता तथा २) युगल-स्वरूप की सेवा करने मे जीव की रुचि और तदनुसार जीवन व्यापन करना। हमारे पूर्वाचार्य कहते है – ‘ इच्छैये अधिकारम् ‘ – इच्छा होना ही अधिकार है अत एव जीव को इच्छा होना अत्यावश्यक है। इसी कारण से भगवान् की कृपा से नियुक्त श्रीमद्रामानुजाचार्य ने अनेक आचार्यों को नियुक्त किया, तथा उनको निर्देश दिया की इस दिव्य ज्ञान का अभिवर्धन करे और जो कोई भी जानने की इच्छा रखते है उनको दिव्य ज्ञान का उपदेश दे। यही श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वग्रन्थ उपदेशरत्नमाला मे कहते है – ‘ ओरण्वऴियै उपदेशित्तार् मुन्रोर् एरार् यतिराजर् इन्नरुळाल् पारुलगिल् आशैयुडैयोर्क्केल्लाम् कूरुम् ‘ – श्रीमद्रामानुजाचार्य ने अहैतिकीकृपा से निर्देश दिया की इस दिव्य ज्ञानको इच्छुक जीवों को उपदेश करें तथा सम्प्रदाय का अभिवर्धन करें।
  • स्वरूपप्रकाश – स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त जीव को स्वस्वरूपानुरूप स्वभाव को प्रकाशित करना चाहिए। शास्त्र कहता है – ‘अकिञ्चतकरस्य शेषत्वनुपपत्ति:‘ – अर्थात् जीवात्मा का स्वरूप ही भगवान् की सेवा करना है। अगर ऐसा सेवा-भाव प्रकाशित न हो, तो जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप नष्ट हो जाता है।

१३०) त्रिविध चेतनरैयुम् मातृत्व प्रयुक्तमाग नियमिक्कुम् । इश्वरनै प्रणयित्व निबन्धनमाग नियमिक्कुम्

चेतन (जीवात्मा) तीन प्रकार के होते है – १) बद्धजीव (वह जीव जो भौतिक जगत् मे बद्ध है), २) मुक्तजीव (वह जो पूर्व काल मे बद्ध थे परन्तु अब परमपद मे है), ३) नित्यजीव – वह जीव जो नित्य मुक्त है तथा परमपद मे है। पिराट्टि सभी जीवों के प्रति मातृ-वात्सल्य दर्शाकर नियन्त्रण करती है। भगवान् की अनुरागशील पट्टरानी होने के एक मात्रकारण से, पिराट्टि, भगवान् का नियन्त्रण करती है।

अनुवादक टीका : भगवान् और जीवात्माओं को यथारूप निर्देश व पुन: संभावित करने का उत्तरदायित्व मात्र पिराट्टि का है। श्रीजी यह सुनिश्चित करती है की मुक्त-जीवात्माओं और नित्य-जीवों को नियंत्रित कर तथा भगवद्-सेवा का मार्गदर्शन कराकर भगवद्-सेवा मे संलग्न करती है।श्रीजी स्वयं की कृपा से बद्धजीवों को सुधारकर भगवान् के सन्मुख कराती है। पिराट्टि का, भगवान् के साथ उनकी पट्टरानी होने का जो सम्बन्ध है, मात्र उससे भगवान् का नियन्त्रण कर, भगवान् को जीवात्माओं का संरक्षण करने का मार्गदर्शन देकर,जीवात्माओं के प्रति भगवान् के क्रोध को शान्त करती है। परुषकार विषय सन्दर्भमे पिळ्ळै-लोकाचार्य ने विस्तारपूर्वक इस तत्त्वको स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र मे समझाया है। उसी के कुछ अंश यहां प्रस्तुत है :

  • सूत्र ११ – स्व-उपदेशों से पिराट्टि, भगवान् और बद्धजीवों को सुधारती है।
  • सूत्र १२ – स्व-उपदेशों से पिराट्टि, भगवान् और जीवों के कर्मबन्धन को नष्ट करती है। भगवान् जीवके कर्मोंका फल देने तथा जीव उन कर्मों के फलों का उपभोग करने के बन्धन मे है। श्रीजी स्व-उपदेशों से इन दोनों को इस बन्धनसे मुक्त कर तथा जीव के कर्मों की उपेक्षा भगवान् की दिव्यकृपा को अग्रस्थान मे प्रकाशमय कराकर जीव पर दोनों की वात्सल्यवर्षा बरसाती है।
  • सूत्र १३ – जब जीव श्रीजी के दिव्य उपदेशों के श्रवण तथा अनुग्रह से अपरिवर्तित व असुधारा है, तब केवल स्वाहैतुकी कृपा वर्षा से दिव्यानुग्रह कर जीव को शु्द्ध करती है। जब भगवान् का हृदय उनके दिव्य उपदेशों से अपरिवर्तित है तब स्वयं की मनमोहक सुन्दरता से भगवान् को वशकर तदनन्तर जीव के योगक्षेम के लिये भगवान् को नियन्त्रित करती है।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-13.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन)- निष्कर्ष

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४६)

श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीवंगी पुरत्तु नम्बी

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

अब तक हमने सभी बाधाओं को बहुत विस्तृत रूप से देखा है जिन्हें इस सुन्दर ग्रन्थ में समझाया गया है। अब हम अंतिम भाग के अनुवाद को देखेंगे जो सभी बाधाओं के बारें में ज़ोर देकर बताता है और उन्हें दूर करने के परिणामों के विषय में भी समझाता है।

१)  स्वर्ग के सुःख की इच्छा रखनेवालों के लिये यह संसार बाधा के रूप में प्रतिपादित होता हैं।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

२) जब सांसारिक भोगों की तृष्णा का त्याग होगा, फिर स्वर्ग के सुखों की इच्छा प्रारम्भ होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

३) जब स्वर्ग के भोगों की इच्छा का त्याग होगा, तब ही आत्मानुभव प्रपट होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

४) जो अपने आत्मा का अनुभव करना चाहता है उसे स्वर्ग के सुःख भी बाधाओं के रूप में प्रतिपादित होते है (आत्मानुभवम)।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

५)  जैसे की हम जानते है स्व-आनंद का त्याग करने पर ही, भगवान के गुणों का अनुभव किया जा सकता है (भगवद अनुभवम)।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

६)  जब स्व-आनंद की अभिलाषा अलग होगी, तभी भगवत अनुभव की अभिलाषा उत्पन्न होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

७)  जब हमारा हृदय ब्रह्म को परमात्मा जो मात्र ज्ञान से परिपूर्ण है के अतिरिक्त जानेगा, तभी हम भगवान के अन्य अनेकों दिव्य गुणों का आनंद प्राप्त कर पाएंगे। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

८)  जब हम भगवान के अत्यंत सौन्दर्य से दृष्टि को हटाएँगे तभी भगवान के प्रति हमारे दास भाव का विकास होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

९)   जब भगवान के प्रति दास-भाव का स्वाद भी कम होगा तब भागवतों के प्रति दास भाव का विकास होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2013/12/29/virodhi-pariharangal-1/

१०)  जब कर्म, ज्ञान, भक्ति योगों के प्रति उपाय भाव के संभ्रम का नाश होगा, तभी भगवान ही एकमात्र उपाय है इस बात पर विश्वास दृढ़ होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

११)  जब यह समझ उत्पन्न होगी की उपायान्तरों (भगवान के अतिरिक्त अन्य उपाय) में बहुत कठिन प्रयास, स्व-प्रयास शामिल है और परिणाम फिर भी त्वरित नहीं है, तब जीव का प्रपत्ति (शरणागति) के प्रति पूर्ण भाव जागृत होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१२)  जब देवांतरों जैसा अग्नि, इंद्र, आदि के प्रति दासत्व भाव का नाश होगा, तभी भगवान के प्रति सच्चे दासत्व का विकास होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१३)  जब हम यह जानते है के देवांतरों  के प्रति सेवा का त्याग करना चाहिए, तभी भगवान के प्रति सच्ची सेवा का भाव उत्पन्न होगा जो जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१४)  जब हम स्पष्टता से यह जानेंगे की जीव के द्वारा की गयी भगवान के प्रति शरणागति उपाय नही है, हम यह जान पाएंगे की एकमात्र स्वयं भगवान ही भगवान को पाने का उपाय है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१५)  जब शास्त्र निर्धारित गतिविधियों में स्वतन्त्रता पूर्वक संलग्न होगे, साधनान्तर (कर्मा, ज्ञान, भक्ति योग) फलीभूत होंगे। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१६)  जब स्वयं के उत्थान के लिए की गयी गतिविधियों के प्रति आसक्ति का नाश होगा, तभी स्वयं के लिए सिद्धोपाय ( भगवान ही उपाय है) की स्थापना हो पाएगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/09/18/virodhi-pariharangal-2/

१७) जब उपाय के मार्ग की बाधाओं का नाश होगा, भगवान ही उपाय है यह दृढ़ता से स्थापित होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/10/02/virodhi-pariharangal-3/

१८)  जब उपेय (उदेश्य) के मार्ग की बाधाओं का नाश होगा, भगवान के प्रति कैंकर्य ही एकमात्र उपेय (उदेश्य) है यह दृढ़ता से स्थापित होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/10/02/virodhi-pariharangal-3/

१९) जब उपेय (उदेश्य) के मार्ग की 3 मुख्य बाधाओं का नाश होगा, भगवान के प्रति असीमित, नित्य और अत्यंत आनंदमयी चरम उदश्य की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/10/02/virodhi-pariharangal-3/

२०)  जब मुख्य प्रमाणों को समझने की बाधाओं का नाश होगा, हमारा शास्त्रों के प्रति विश्वास स्थापित होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/19/virodhi-pariharangal-4/

२१) जब जीवात्मा के साथ सदा रहने वाली बाधाओं का नाश होगा, आत्मा का सच्चा स्वरूप स्थापित होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/19/virodhi-pariharangal-4/

२२)  जैसे हीं नित्य बाधा निकाल देते है सांसारिक सुख कि ओर वियोग स्वयं में स्थापित हो जाता है।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/19/virodhi-pariharangal-4/

२३)  जब अस्थायी बाधाओं का नाश होगा, तभी नित्य परमानंद स्थापित होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/19/virodhi-pariharangal-4/

२४) जब जीवात्मा के सच्चे स्वरूप के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब ही यह ज्ञान प्रकाशित होगा की जीवात्मा भगवान द्वारा भोग्य है।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/19/virodhi-pariharangal-4/

२५) जब परमात्मा के सच्चे स्वरूप के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तभी भगवान के प्रति जीवात्मा का पारतंत्रीयम पूर्णतः स्थापित होगा। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/20/virodhi-pariharangal-5/

२६) जब स्वयं के भोग/ आनंद का मनोभाव समाप्त होगा, स्वयं के प्रति आसक्ति का नाश होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/20/virodhi-pariharangal-5/

२७) जब भगवान के आनंद हेतु गतिविधियों में बाधाओं का नाश होगा, तब नियंत्रित करने की इच्छा के प्रति वैराग्य स्थापित होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/20/virodhi-pariharangal-5/

२८) जब भगवान से मिलन में बाधाओं का नाश होगा, भगवान के श्रीचरणों की प्राप्ति सुलभ है इसकी स्थापना होगी।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/20/virodhi-pariharangal-5/

२९) जब भगवान से वियोग की बाधाओं का नाश होगा, भगवान के साथ अटूट संग की स्थापना होगी।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/20/virodhi-pariharangal-5/

३०) जब सांसारिक सुख के प्रति बाधाओं का नाश होगा, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण/ विजय स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/18/virodhi-pariharangal-6/

३१) जब स्वयं की श्रद्धा में बाधाओं का नाश होगा, चरम श्रद्धा की प्राप्ति होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/18/virodhi-pariharangal-6/

३२) जब प्रवृत्ति में बाधाओं का नाश होगा, भगवान के आनंद हेतु केन्द्रित गतिविधियां स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/18/virodhi-pariharangal-6/

३३) जब निवृत्ति में बाधाओं का नाश होगा, ऐसी गतिविधियों (जो स्वयं पर केन्द्रित है) में वैराग्य की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/18/virodhi-pariharangal-6/

३४) जब निंद्रा की बाधाओं का नाश होगा, स्वयं के सच्चे स्वरूप की अनुभूति की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/02/15/virodhi-pariharangal-7/

३५) जब जाग्रत अवस्था के विषय में बाधाओं का नाश होगा, सत्यता के ज्ञान की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/02/15/virodhi-pariharangal-7/

३६) जब चलने (मार्ग, गतिविधि, आदि) के विषय में बाधाओं का नाश होगा, संसार में पुनः जन्म न लेने के विषय में ज्ञान होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/05/virodhi-pariharangal-8/

३७) जब खड़े रहने के विषय में बाधाओं का नाश होगा, परमपद में भगवतों के सानिध्य में खड़े रहने की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/05/virodhi-pariharangal-8/

३८) जब आवश्यक तथ्यों में बाधाओं का नाश होगा, यह शरीर ही दोषरहित अंतिम शरीर (परमपद प्राप्ति के पूर्व का शरीर) है यह स्थापित होगा। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/15/virodhi-pariharangal-9/

३९) जब शरीर की पवित्रता की बाधाओं का नाश होगा, आत्मा की पवित्रता की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/15/virodhi-pariharangal-9/

४०) जब स्नान के विषय में बाधाएँ दूर होगी, विरजा नदी में स्नान (परमपद में जाने के पूर्व) ही उत्तम है यह स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/15/virodhi-pariharangal-9/

४१) जब हमारे आचरण में बाधाओं का नाश होगा, पूर्वाचार्यों की आचरण आधारित परम्पराओं की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/20/virodhi-pariharangal-10/

४२) जब पहचान/ विशेषता के प्रति बाधाओं का नाश होगा, वैलक्षणत्व (महानता) की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/05/25/virodhi-pariharangal-11/

४३)  जब स्मरण के विषय में बाधाओं का नाश होगा, ऐसे स्मरण की पवित्रता की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/05/31/virodhi-pariharangal-12/

४४) जब कहने/ गाने की बाधाओं का नाश होगा, वाणी में पवित्रता स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/06/18/virodhi-pariharangal-13/

४५) जब सुनने की बाधाओं का नाश होगा, तब स्वयं में सत- संप्रदाय की पवित्रता (मिलावट रहित परंपरा) की स्थापना होगी। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/07/19/virodhi-pariharangal-14/

४६) जब सेवा के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब यह स्थापित होगा की ऐसी सेवा को भगवान प्रसन्नता से स्वीकार करते है। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/08/25/virodhi-pariharangal-15/

४७) जब समाराधनम (पूजन) के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब यह स्थापित होगा की ऐसी आराधना को भगवान प्रसन्नता से स्वीकार करते है। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/10/17/virodhi-pariharangal-16/

४८) जब आज्ञाकारिता के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब यह स्थापित होगा की ऐसी आज्ञाकारिता को भगवान प्रसन्नता से स्वीकार करते है। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/11/15/virodhi-pariharangal-17/

४९) जब हाथ जोड़कर प्रणाम करने की बाधाओं का नाश होगा, तब भगवान के हृदय की चोरी की जा सकेगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/02/04/virodhi-pariharangal-18/

५०) जब हमारे समय के उपयोग के विषय में बाधाओं का नाश होगा, समय को सही उपयोग करने से उत्पन्न सच्ची संतुष्टि प्रकट होगी। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/03/30/virodhi-pariharangal-19/

५१) जब धन अर्जन के विषय में बाधाओं का नाश होगा, सात्विक स्वरूप स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/06/23/virodhi-pariharangal-20/

५२) जब गृह/ घर के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब संतों की यात्रा और उनके साथ का महान भाग्य प्राप्त होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/08/15/virodhi-pariharangal-21/

५३) जब अपनी जमीन/ भूमि के प्रति बाधाओं का नाश होगा, तब भगवान के प्रति ऐसे भूमि से प्राप्त फलों का समर्पण स्थापित होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/08/15/virodhi-pariharangal-21/

५४) जब भोजन/ आहार के प्रति बाधाओं का नाश होगा, तब दाता और आनंद प्प्राप्त करने वाला दोनों की प्रसन्नता स्थापित होगी।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/09/25/virodhi-pariharangal-22/

५५) जब भोजन में बाधाओं का नाश होगा, सत्व की उच्च स्थिति की प्राप्ति होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/12/02/virodhi-pariharangal-23/

५६) जब तीर्थ के विषय में बाधाओं का नाश होगा, स्वयं का उत्थान स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/12/22/virodhi-pariharangal-24/

५७) जब प्रसाद के विषय में बाधाओं का नाश होगा, स्वयं की पवित्रता स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/01/29/virodhi-pariharangal-25/

५८) जब भाषा/ वाणी में बाधाओं का नाश होगा, सांसरियों से भिन्नता स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/03/25/virodhi-pariharangal-26/

५९) जब संग/ साथ के विषय में बाधाओं का नाश होगा, श्रीवैष्णवों के गुण स्थापित होंगे।नोट- संग विरोधी भाग श्री. उ.वे. वी वी रामानुजम स्वामी की इस पुस्तक में से अनुपस्थित है। 

६०) जब सम्बन्धों के विषय में बाधाओं का नाश होगा, भगवान जो नित्य संबंधी है उनके विषय में ज्ञान स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/05/16/virodhi-pariharangal-27/

६१) लगाव के प्रति बाधाएं हट जाती है तो भगवद प्राप्ति स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/06/12/virodhi-pariharangal-28/

६२) भक्ति के प्रति बाधाएं हट जाती है तो भगवान कि सेवा और भगवान कि खुशी स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/06/12/virodhi-pariharangal-28/

६३) दासत्व के प्रति बाधाएं हट जाती है तो नित्य स्वामी के प्रति ज्ञान स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/06/13/virodhi-pariharangal-29/

६४) मित्रता के प्रति बाधाएं हट जाती है तो सभी के एक समान कि भावना स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/07/13/virodhi-pariharangal-30/

६५) अर्पण करने में बाधाएं हट जाने पर हमारा स्वयं पर अधिकार और भगवान पर अधिकार का ज्ञान स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/08/08/virodhi-pariharangal-31/

६६) तत्वज्ञान में बाधाएं हट जाने पर आचार्य का हमें स्वीकार करना स्थापित हो जाता है। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/08/28/virodhi-pariharangal-32/

६७) जब वर्ण आश्रम के प्रति बाधाओं का नाश होगा, तब भगवान के प्रति सच्ची निष्ठा स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/09/16/virodhi-pariharangal-33/

६८) जब जाति (जन्म) के प्रति बाधाओं का नाश होगा, तब भागवतो के दास होने का ज्ञान स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/11/05/virodhi-pariharangal-34/

६९) जब अविश्वास्य सिद्धांतों के विषय में बाधाएँ समाप्त होगी, तब ऐसे विश्वसनीय दोषरहित सिद्धांतों के प्रति दृढ़ विश्वास स्थापित होगा। 
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/11/28/virodhi-pariharangal-35/

७०) जब कुटिल/ असिद्धांतिक नियमों में बाधाओं का नाश होगा… (नोट: यह पंक्ति स्त्रोत में प्राप्त नहीं है)। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/12/10/virodhi-pariharangal-36/

७१) जब सिद्धान्त के विषय में बाधाएँ समाप्त होगी, तब अत्यंत आदरणीय प्रमाणों में दृढ़ विश्वास स्थापित होगा।https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/01/05/virodhi-pariharangal-37/, https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/01/31/virodhi-pariharangal-38/ और https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/03/02/virodhi-pariharangal-39/

७२)  जब यथार्थ के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब अत्यंत मंगलमय प्रमेय (उद्देश्य- भगवान है) इसका ज्ञान स्थापित होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/03/26/virodhi-pariharangal-40/, https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/04/13/virodhi-pariharangal-41/और https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/06/17/virodhi-pariharangal-42/

७३) जब स्वयं के पुरुषत्व की बाधा का नाश होगा, तब भगवान की दासी के रूप में स्वयं की पहचान स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/07/06/virodhi-pariharangal-43/

७४) जब अंतिम समय के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब हमारा सच्चा स्वरूप शरणागति है यह स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/30/virodhi-pariharangal-44/

७५) जब अविश्वास के प्रति बाधाओं का नाश होगा, तब भगवान, भागवत, आचार्य और विशेष शास्त्र ( शास्त्र के वे विशेष भाग जो भागवत धर्म की चर्चा करते है) की दिव्य वाणी में विश्वास स्थापित होगाhttps://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

७६) जब संग/ साथ के विषयक में बाधाओं का नाश होगा, भगवान के विषय में ज्ञान स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

७७) जब संतान के विषय में बाधाओं का नाश होगा, वैष्णव संतानों की उत्पत्ति होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

७८) जब वर्णाश्रम के विषय में बाधाओं का नाश होगा, आत्मा का वर्ण अर्थात शेषत्व की स्थापना होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

७९) जब जप की बाधाओं का नाश होगा, तब द्वय मंत्र में नित्य जप स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

८०) जब पुजा के विषय में बाधाओं का नाश होगा, भगवान के प्रति आराधना स्थापित होगी। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/08/31/virodhi-pariharangal-45/

८१) जब स्वामित्व के विषय में बाधाओं का नाश होगा, तब भगवान के परम स्वामित्व के विषय में ज्ञान स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/09/21/virodhi-pariharangal-46/

८२) जब परिहार्य पक्षों में बाधाओं का नाश होगा, सात्विक भोजन, सात्विक पुराणों में श्रद्धा और सात्विक कार्यकलाप स्थापित होगा।
https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/09/21/virodhi-pariharangal-46/

८३) जब परिहार्य पक्षों में बाधाओं का नाश होगा, इस शरीर के अंत होने पर चरम लक्ष्य स्थापित होगा। https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2019/09/21/virodhi-pariharangal-46/

जीवात्मा के लिये यह बाधाएं उसके स्वरूप, सत्ता, स्थिति और प्रवृत्ति से सम्बन्ध है। निरन्तर प्रणव (ओंकार) जो भगवान का स्वभाव और अस्तित्व है का ध्यान करने से जीवात्मा के बाधाओं से संबन्धित स्वभाव और सत्ता को निकाल देते है। निरन्तर नम: का ध्यान करने से जीवात्मा के स्थिति संबन्धित बाधाओं को निकाल देता है। “नारायण” शब्द का निरन्तर ध्यान करने से जो भगवान द्वारा प्रारम्भ किये गये कार्य और जो भगवान द्वारा पूर्णत: आनंद लिये गये कार्य को प्रगट करता है और जीवात्मा के संबन्धित बाधाओं को निकाल देता है। अत: यह समझाया गया है कि सच्चे आचार्य कि सेवा कर, तिरुमन्त्र का अर्थ सिखकर जिसके ३ भाग है, बाधाओं को निकालकर, हमें अपना जीवन व्यतित करना चाहिये। अनुवादक टिपण्णि: तिरुमन्त्र कि महत्वता को यहाँ दर्शाया गया है। तिरुमन्त्र आवश्यक तत्वों का आधार हैं। तिरुमन्त्र को आगे और द्वय महामन्त्र और चरम श्लोक में भी समझाया गया हैं। इन तीनों को एकत्रीत में रहस्यत्रय कहा गया हैं जिन्हें एक आधिकारिक आचार्य से सीखना चाहिये। आचार्य कैंकर्य करना भी एक प्रधानतम महत्व है। इसे श्रीएरुम्बी अप्पा ने पूर्व दिनचर्या के ९वें श्लोक में समझाया हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी निरन्तर द्वय महामन्त्र का अर्थानुसन्धान करते थे। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने ज़ोर देकर कहा कि हमें द्वय महामन्त्र का उच्चारण करने से पूर्व गुरु परम्परा मन्त्र (अस्मद गुरुभ्यो नम: … श्रीधराय नम:) को कहना चाहिये। अत: एक श्रीवैष्णव होने के कारण हमें तुरंत बाधाओं को मिटाकर / निकालकर एक सुन्दर भव्य जीवन आपने आचार्य के निर्देशानुसार व्यतित करना चाहिये और अन्त में परमपदधाम जाकर वहाँ भगवान लक्ष्मीनारायण कि नित्य सेवा कैंकर्य पूर्ण आनंद से करना चाहिये।

अब श्रीवंगी पुरत्तु नम्बी कि “विरोधी परिहारंगल” पर व्याख्या समाप्त होती हैं जिसे भगवद श्रीरामानुजाचार्य ने कृपा किये हैं।श्री वी.वी.रामानुजम स्वामी

श्री सारथी तोताद्री स्वामी

यह दास का बहुत सौभाग्य रहा कि भगवानभगवान श्रीमन्नारायण, आल्वार, आचार्य और अस्मदाचार्य कि कृपा से दास इस अनुवाद कैंकर्य में शामिल रहा। दास श्री उभय वेदान्त वी.वी रामानुजम स्वामी का भी धन्यवाद प्रगट करता हूँ जिन्होंने एक सरल और असरदार अनुवाद बताया हैं (तमील से अंग्रेजी में अनुवाद किया) और श्री सारथी तोताद्री स्वामीजी का (तमील से अंग्रेजी में ग्रंथ का अर्थ बताया) इस गहरे ग्रन्थ के विषय में और अन्य सभी विद्वानों का जिन्होंने मुझे सत सम्प्रदाय के बहुमूल्य तत्वों को सिखाया हैं। और उन सब भागवतों को जिन्होंने मुझे इन पूर्वाचार्य के ग्रन्थों को अनुवाद करने में प्रेरणा देते हैं। विशेषकर श्रीमती भगवती माताजी को भी धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने प्रकाशन और अनुवाद किये हुए को सही करने में बहुत मदद की हैं। अत: अब श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीवंगी पुरत्तु नम्बी को अन्तिम उपदेश विरोधी परिहारंगल का हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/12/virodhi-pariharangal-conclusion.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन-४६)

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४५)

श्रीमन्नारायण अपनी रानियाँ और पार्षदों के साथ – परमपद में

८१) पतित्व विरोधी – स्वामी होने में बाधाएं

जैसे “पतिम विश्वस्य” (भगवान सभी के श्रेष्ठ स्वामी है) में समझाया गया है, प्रजापति, पशुपति, बृहस्पति, सुरपति, धनपति, सेनापति, गणपती, आदि को स्वामी समझना – यह भगवान हमारे सर्वोच्च स्वामी हैं के विपरीत है – बाधा है।

पती यानि स्वामी। जैसे उपनिषद में स्थापित हुआ है “पतिम विश्वस्य” – श्रीमन्नारायण हीं सारे जगत के स्वामी हैं। कई देवताओं के नाम में “पती” होता है। प्रजापती – ४ मुखवाले ब्रह्माजी। पशुपती – रुद्र। बृहस्पति – राक्षसों के गुरु। सुरपती – इन्द्र- सभी देवताओं का स्वामी। धनपती – कुबेर – धन का स्वामी। सेनापती – कार्तिकेय, देवताओं कि सेना का मुखिया। गणपती – हाथी के मुख वाले गणेश। इन सब देवताओं को स्वामी मानना गलत हैं।

अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया पती का अर्थ मालिक, स्वामी, आदि। श्रीमन्नारायण को “विश्वपती” और आचार्य हृदयम के १२१वें चूर्णिकै में श्रीनायनार द्वारा “लोकभर्ता” (सभी के स्वामी) ऐसा समझाया गया है। यह शब्द बड़ी सुन्दरता से नायनार द्वारा नारायण सूक्तम (पतिम विश्वस्य) और श्रीरामायण (कौसल्या लोकबर्तारम श्लोक) से रचना किये गये हैं।  इसलिये श्रीमन्नारायण को भगवान और सब का स्वामी समझा गया है। जिसे भी हम पती ऐसे बुलाते हैं साधारणतया ऐसे शब्द सम्मान तौर पर सिर्फ महिमा गुणगान की तरह समझना चाहिये नकि उसे वास्तविक रूप में समझना चाहिये। ऐसा मानना समझना चाहिये कि यह भगवान कि निर्हेतुक कृपा है जिसके लिये इन देवताओं कि स्तुति होती हैं। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के ११वें से १४वें श्लोक तक इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। विशेषकर १३वें श्लोक में “वेदापहार गुरूपातक दैत्य पीड़ाध्यापद्विमोचन महिष्ठ फल प्रदानै:। कोन्य: प्रजापशुपती परिताति कस्य पादोदकेन स शिवस्स्वशिरो धृतेन ॥” – यहाँ श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी भगवान श्रीमन्नारायण से पूछते है “देवताओं को विपत्ती के समय जैसे कि ब्रह्मा ने वेदों को गवायां, रुद्र ने ब्रह्मा का सर काट दिया था जो स्वयं उनके पिता हैं, इन्द्र को राक्षसों के संकट से बचाना, आदि से किसने उद्धार किया? आपके सिवा और कौन है जो प्रजापती और पशुपती की रक्षा कर सकते है? आपके चरण कमलों को धोने के जल को धारण करने मात्र से रुद्र पवित्र हो गये?”। यह श्लोक पूर्णत: पुराणों में दर्शाये घटनाओं पर आधारीत है और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी भगवान जो सब के सच्चे स्वामी हैं, रक्षक हैं, उनसे प्रश्न पूछते हैं। हालाँकि ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र सभी महान देवता हैं वें भी ताकत भगवान से हीं प्राप्त करते हैं जो उनके अन्तर्यामी में विराजमान है और ऐसे कार्य करने के लिये जिन्होंने उन्हें यह शक्ति प्रदान किये। जब वें विपत्ति में रहते हैं तब भगवान श्रीमन्नारायण हीं उनकी रक्षा करते हैं। जब एक असुर ने ब्रह्माजी से वेदों को चुरा लिया तब भगवान श्रीमन्नारायण ने हयग्रीव का अवतार लेकर उस असुर से वेदों को वापस लाया। ब्रह्माजी का सर काटने के कारण जब रुद्र पर ब्रह्म हत्या दोष लगा तब वह कपोल रुद्र के हाथ में रह गया था। तब शिवजी भगवान श्रीमन्नारायण के पास गये जिन्होंने अपने छाती के पसीने एक बूंद उस कपोल पर डाला जो टुकड़े टुकड़े होगया और शिवजी को पाप मुक्त किया। जब भी इन्द्र पर असुर आक्रमण करते तो वें भगवान श्रीमन्नारायण से हीं प्रार्थना करते है और वें हीं उनकी रक्षा करते है। जब ब्रह्माजी ने भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों को जल से धोया तब वह गंगा नदी के रूप में धरती पर बहने लगी। जब भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाना चाहा तब पहिले उसे रुद्र नें अपनी जटा में धारण कर उसके प्रवाह को शान्त किया। भगवान श्रीमन्नारायण के चरण कमलों से पवित्र जल पकड़ने के कारण शिवजी शुद्ध हो गये और उनका नाम “शिवा” पड़ा यानि पवित्र। अत: हम समझ सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं सभी के लिये श्रेष्ठ हैं और अन्य के साथ सम्बन्ध रखना बाधा है।

८२) वर्जनीय विरोधी – जिन्हें छोड़ने में बाधाएं है

तामस आहार जैसे मदिरा, मांस, आदि को पाना जो शास्त्र में भी वर्जित है और सात्विक आहार, सात्विक शास्त्र और सात्विक अनुष्ठान का त्याग करना बाधा है।

वर्जनियम – वह जिसका त्याग करना है। निषिद्धम – वह जो वर्जित है। आहार सामान्यतया ३ वर्ग में बाँटा गया है – सात्विक, राजस और तामस। वह आहार जिससे सत्व गुण का विकास होता है उसे सात्विक आहार कहते हैं। वह जिससे आलस्य, नींद, अकर्मव्यता आदि का विकास होता हैं उसे तामस गुण कहते हैं। ऐसे आहार जैसे मदिरा, मांस, आदि से बचना चाहिये। यही तत्व सभी अन्य पहलूओं के लिये लागू है।

अनुवादक टिप्पणी: हम आहार और उसके पाने कि आदतों पर चर्चा यहाँ कर चुके है https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/12/02/virodhi-pariharangal-23/। इस पर विस्तार से चर्चा के लिये यहाँ पढ़िये https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/06/12/virodhi-pariharangal-28/ और प्रश्न उत्तर के लिये http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-ahara-niyamam-q-a.html। जिसे भी शास्त्र ने वर्जित करने को कहा है उस आहार का हमें त्याग करना चाहिये। जबकि शास्त्रों मे जीवात्मा के प्रगति के लिये जिसे स्वीकारा है उसका पालन करना चाहिये और त्याग नहीं करना चाहिये। यह कहा गया है कि अकृत्य करणम (जो शास्त्र में वर्ज है) और कृत्य अकरणम (जो शास्त्र में कहा है उसका पालन नहीं करना) दोनों कि निंदा करना चाहिये। दोनों का त्याग करना चाहिये और उसीका पालन करना चाहिये जिसे शास्त्र और हमारे आचार्य ने स्वीकरती दिये है।

८३) अवर्जनीय विरोधी वह जिसे हमें त्याग करना हैं में बाधाएं

अवर्जनीय – वह जिसका त्याग नहीं किया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: इस अंतिम विषय में कई महत्वपूर्ण पहलूओं को दर्शाया गया है जैसे मुमुक्षु (प्रपन्न) और मुक्त (मोक्ष के पश्चात अवस्था)।

  • मुमुक्षु होने के पश्चात भी सांसारिक धन और लालसा कि इच्छा होना और विस्मरण हो जाना कि यह मुमुक्षु के सही लक्षणों के विपरीत है यह बाधा है। अप्राप्त – जो उपयुक्त न हो। मुमुक्षु के लिये ऐसी इच्छाएं बहुत खतरनाक है। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षु यानि जिसे मोक्ष कि इच्छा हो। विशेषकर यहाँ प्रपन्न जनों का संदर्भ है – वह जो पूर्णत: आचार्य के माध्यम से भगवान के शरण हुये है। ऐसे जनों को अपने सच्चे स्वभाव यानि भगवद और भागवतों का दास होने से विस्मरण नहीं होना चाहिये। यदि किसीका धन और काम कि ओर लगाव हो जाता है तब वह सांसारिक जीवन की ओर अग्रसर होता है और अन्त में मुमुक्षु की अवस्था से नीचे गिर जाता है क्योंकि मुमुक्षु की इच्छा से सांसारिक इच्छाएं भारी पड़ती हैं और मुमुक्षु इच्छा को विफल कर देती है। तत्वत्रय के पहले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि एक मुमुक्षु को मोक्ष प्राप्त करने हेतु तत्वत्रय (जीव, ईश्वर और माया) का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। एक बार यह ज्ञान पूर्णत: स्थापित हो गया तो फिर सांसारिक सुख के लिये कोई इच्छा नहीं रहेगी। मुमुक्षुप्पड़ी में भी द्वय प्रकरणम के प्रारम्भ में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवैष्णव के कई मुख्य गुणों को समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के लिये विस्तार से व्याख्या दिये हैं। यहाँ पहिला मुख्य गुण हैं सांसारिक सुख का पूर्ण त्याग करना। सर्व प्रथम लक्ष्य – सांसारिक सुख को पूर्णत: त्याग करना और फिर महत्वपूर्ण है अपना अंतिम लक्ष्य, दिव्य कैंकर्य की लालसा करना। इस पर पूर्ण विश्वास होना, इस बात को ज़ोर देकर कहा गया है। अत: मुमुक्षु के मन में सांसारिक इच्छाओं के लिये कोई स्थान नहीं है।
  • भागवत अपचार जो इन सांसारिक इच्छाओं का परिणाम हैं बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब हमारी इच्छाएं सांसारिक सुख के लिये बढ़ती है तब भागवतों के प्रति अपचार होते है जैसे कभी कभी हम इन सांसारिक सुख को पाने के लिये भागवतों का अपमान कर देते हैं। एक प्रपन्न के दिनचर्या को समझाते समय यही तत्व श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं। अन्य में वें दर्शाते हैं कि हमें अहंकार, अर्थम (सांसारिक धन) और काम से डरना चाहिये क्योंकि वें ३ प्रकार के संकट को जन्म देते हैं। एक बार अहंकार आ जाये तो हम श्रीवैष्णवों को अपने बराबर नहीं मानते और उनको जो सम्मान देना चाहिये वों नहीं देते हैं। सांसरिक धन कि ओर हमारी इच्छा के कारण सांसारियों के निकट जाकर प्रेम से अपेक्षीत सम्पती पाने का प्रयत्न करते हैं। काम कि इच्छा के कारण हम स्त्री, आदि कि ओर जायेंगे जो हमारा अपमान भी करती है। ऐसे कठिनाइयों को बड़ी सावधानी पूर्वक हमें दूर करना चाहिये क्योंकि यह सभी श्रीवैष्णव के अपमान की ओर ले जाते हैं।
  • सांसारिक पहलूओं को सुखदायक समझकर अचम्बित होना बाधा है। सांसारिक पहलूओं को सुखदायक यानि ऐसे सुखों को त्यागने का मन न बनाना। अनुवादक टिप्पणी: जब कोई स्वयं का सच्चे स्वभाव जो कि जो भगवान का सच्चा दास है ऐसा समझता है तब वह भगवान के कैंकर्य को ही आनन्ददायक पहलू समझता है। मून्राम तिरुवंदादि के १४वें पाशुर में श्रीमहद्योगी स्वामीजी समझाते है “मार्पाल मनम शुलिप्प मङ्गैयर तोल कैविट्टु” – जब हम भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति लगाव विकसित करते हैं तब हमारी स्त्री (और अन्य सांसारिक सुख) के प्रति लगाव स्वयं खत्म हो जायेगी।
  • यह मानना कि भगवान कि सेवा कर परमपद पहुँचने के पश्चात स्वयं को भोक्ता मानना बाधा है। हमें यह नहीं विचार करना चाहिये कि मुक्त होकर परमपद पहुँचकर भगवान का कैंकर्य करते हुये स्वयं को भोक्ता मानना गलत है। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में समझाया है “तनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते” – भगवान आप मुझे सिर्फ आपके कैंकर्य के लिये हीं निरत रखे।
  • स्वयं के आनन्द का रवैया रखना जो परमपद में भी ऐसे स्वयं को आनंदित करने की इच्छा का कारण हो सकता है – बाधा है। भोक्तृत्व बुद्धि – स्वयं को भोक्ता समझना। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी द्वारा स्तोत्र रत्न के ४६वें श्लोक में समझाये अनुसार भगवान को खुश रखने के लिये हमें चाहना चाहिये “प्रहर्षयिष्यामी” – कब मैं भगवान को पूर्ण आनन्द दूँगा। अनुवादक टिप्पणी: अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार आचार्य हृदयम के २१वें चूर्णिकै में समझाते है “शेषत्व भोक्तरुत्वंगल पोलन्ऱे पारतंत्रिय भोग्यतैगल” – पारतंत्रीयम और भोग्यतैगल दोनों शेषत्वम और भोक्तृत्वंगल से बढ़कर हैं। यहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़े हीं सुन्दर ढंग से बताते हैं की शेषत्वम सोने की ईंट की तरह है (कीमती है परन्तु उसके आकृती बदलने पर हीं उसका उपयोग कर सकते हैं) और पारतंत्रीयम सोने के आभूषण जैसे हैं (वों जैसा है वैसे हीं प्रयोग में आ जाता है)। हमें यह पूर्ण रूप से समझना चाहिये कि हमारे अस्तित्व का मूल उद्देश भगवान का पूर्ण रूप से मुखोल्लास करना मात्र ही है। यहाँ समझने का मुख्य तत्व है – भगवान स्वामी है और जीवात्मा दास। वह दासत्व केवल स्वामी के सुख के लिये हीं है। क्योंकि जीवात्मा में चेतना है वह भगवान के सम्पूर्ण मुखोल्लास को देख सकता है। यह बहुत घहरा तत्व है और इसे आचार्य द्वारा कालक्षेप के जरिये समझना चाहिये।
  • उपर बताये अनुसार स्वयं के आनंद के रवैये के लिये “केवल भगवान के मुखोल्लास के लिये” इस तत्व का त्याग करना बाधा है। भोग्यम – वह जिससे आनंद प्राप्त किया जा सके। परैका भोग्यत्वम – यह दृढ़ विश्वास होना कि भगवान का मुखोल्लास हो रहा है। इस रवैया को कभी नहीं त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह अपने सत सम्प्रदाय का बहुत ही मुख्य सिद्धान्त है जिसे “अचित्वत पारतंत्रियम” – जो अचित की तरह पूर्ण रूप से भगवान के निष्कासन पर हैं फिर भी जब भगवान जीवात्मा के जैसे अपना सुख प्रगट करते हैं वें आनंदित होते है। यह तत्व द्वय महामन्त्र के दूसरे भाग के (स्वयं पर केन्द्रित सुख को मिटाने का) “नम:” में समझाया गया हैं। पेरुमाल तिरुमोली में श्रीकुलशेखर स्वामीजी कहते है “पडियायक किदन्तु उन पवलवाय काणबेने” – क्योंकि मैं भगवान के मन्दिर की सीढ़ी का पत्थर हूँ फिर भी मैं आपके सुन्दर होटों को देखकर और आनंदित होना चाहता हूँ। यहाँ सीढ़ी का पत्थर अचित है जिसे कुछ भी ज्ञान नहीं हैं। परन्तु चेहरे पर आनंद देख पाना तभी सम्भव है जब उसमें ज्ञान होगा। श्रीपेरियवाचान पिल्लै समझाते हैं कि “पदियायक किदन्तु उन पवलवाय काणबेने” अर्थात अचित्वत पारतंत्रियम – अचित के तरह भी हमें भगवान कि ओर पारतंत्रियम होना चाहिये। उदाहरण के लिये यदि हम चौकी को लेकर दूसरे स्थान पर रखते हैं तो वों हमसे कोई प्रश्न नहीं पूछेगी – जब भी भगवान हमारे साथ ऐसा कुछ करते हैं तो हमें भी ऐसे ही होना चाहिये और उनसे कोई प्रश्न नहीं करना चाहिये। जब भगवान हमारे कैंकर्य से संतुष्ट है तो वें हमारे उपर अपार संतुष्टी और आनंद दिखाते हैं और हमें भी यह दिखाना चाहिये अन्यता हम भी अचित से भिन्न नहीं रहेंगे। उदाहरण के लिये जब हम एक बच्चे को उठाकर उसके संग खेलते हैं और अगर वह बच्चा हमारे साथ खेल आनंदित होता है तो हमारा आनंद भी दुगना हो जाता है उसी तरह जब हम भगवान के सुख को प्रतिक्रीया दिखाते है तो उनका आनंद भी दुगना हो जाता है। जैसे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के ४६वें श्लोक मे यही तत्व को समझाते है कि “कदाप्रहर्षयिष्यामि” – भगवान के लिये आनंद लाने कि लालसा करना। जब जीवात्मा भगवान के आनंद को प्रतिक्रिया दिखाता है तब भगवान पूर्ण रूप से आनंदित होते हैं। हमारे कैंकर्य का एक मात्र उद्देश उनका मुखोल्लास है।
  • मुक्तात्मा की अवस्था में आनंदित होने की इच्छाओं को स्वयं भगवान प्रारम्भ करते हैं और इससे उन्हें बहुत आनंद प्राप्त होता है और उनका आनंद ओर बढ़ता है और यह कोई बाधा नहीं है। जैसे तिरुविरुत्तम के ३३वें पाशुर में समझाया गया है कि “अगल विशुम्बुम निलनुम इरुल आर केडच्चेङ्गोल नडावुदिर” – आकाश और पृथ्वी को नियंत्रण में रखना, हमसे किये गये पापों का नाश करना जो अज्ञानता वश हुये हैं आपके पवित्र सुदर्शन चक्र द्वारा नाश करना, यहाँ तक कि मुक्त अवस्था में भी भगवान के नित्य संकल्प से वे सुनिश्चित करते हैं कि मुक्तात्मा स्वयं नियंत्रित और स्वयं के आनंद के लिये कोई इच्छा अर्जित न करें। अधमि – मैं खाता हूँ, मैं मौज करता हूँ। अहमन्नम – मैं भगवान का प्रसाद हूँ। अहं अधमि – मैं उसे खाता हूं (आनंद प्राप्त करता हूँ) जो आनंद पा रहा हैं (जो आनंदित हो रहा है)। इसका अर्थ यह हैं कि यह मुख्य हैं कि भगवान जीवात्मा से आनंदित होते हैं। भगवान के श्रीमुख पर आनंद की छटा देखकर जीवात्मा भी आनंदित होता है। परप्रेरितम – वह जो भगवान से प्रेरित है। जीवात्मा में कम मात्र में स्वयं द्वारा आनंदित होने के पहलू भी भगवान की आज्ञानुसार पाये जाते हैं। यह बाधा नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: इसे हम पिछले भाग में विस्तार से देख चुके है। जीवात्मा के लिये आनंदित होने का रवैया होना स्वाभाविक है। मुक्तात्मा कि अवस्था में पहिले भगवान स्वयं जीवात्मा से आनंदित होते है और उसे उजागर करते है। इसे देखकर जीवात्मा भी बहुत ही आनंदित महसूस करता है और उसे उजागर करता है। एक बहुत हीं सुन्दर उदाहरण है जब पिता अपने बच्चे को उठाकर खेलता है उसे बहुत खुशी होती है। पिता के चहरे पर खुशी देख बच्चा भी खुश हो जाता है। यह देख पिता पहिले से भी अधिक आनंदित हो जाता है। अत: परमपद में आनंद का कोई अंत नहीं है और यह भगवान श्रीमन्नारायण कि दिव्य प्रतिज्ञा भी है।
  • “न छोड़ सकने वाले पहलू” के विषय में यहाँ एक दूसरा स्पष्टीकरण दिया गया है। भगवद सौन्दर्य जो कि आचार्य कैंकर्य के लिये बाधा है यहाँ पर मुख्य बाधा कैंकर्य के लिये इस संसार और परमपद दोनों के लिये है। भगवान यह बाधा को दूर कर जीवात्मा के कैंकर्य को स्वीकार करते है। वर्जित गतिविधियों में हम निरत रह कर और अनुशासन के अभाव जो हमारे कई पूर्व जन्मों का परिणाम है – मुख्य बाधाएं है। यहाँ पर “अवर्जनीय विरोधी” के लिये एक दूसरा स्पष्टीकरण दिया गया है। यहाँ और वहाँ – दोनों लीला और नित्य विभूति। “सौन्दर्यम अन्तरायम” – मुमुक्षुप्पड़ी १८२ – भगवान के अलौकिक दिव्य स्वरूप की दिव्य सुन्दरता अवरोध हैं। जब कोई भगवान के दिव्य अलौकिक सुन्दर स्वरूप का दर्शन करता है वे भावनाओं सी पिघल जाते हैं जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी पेरिया तिरुवंदादि के ३४वें श्लोक में समझाते “काल आलुम नञ्जलियुम कण शुलुलुम” – पाँव कांपने लगते हैं, हृदय पिघल जाता है और चक्कर आकर सब धुंधली हो जाती हैं। इससे जीवात्मा स्वयं को भगवन के कैंकर्य में निरत नहीं कर सकता है। विशेषकर जो जन भागवतों और आचार्यों के कैंकर्य में निरत रहते हैं उनके लिये भगवान का सौन्दर्य ही एक बहुत बड़ी बाधा है। श्रीरामायण के अयोध्या काण्ड १.१ में कहा गया है “शत्रुघ्नों नित्य शत्रुग्न:” यानि “शत्रुघन – जिसने जिसने नित्य शत्रुओं को जीता”। यहाँ – नित्य शत्रु क्या है? श्रीरामचन्द्रजी की अलौकिक सुन्दरता व गुण जो कि उन्हें भगवान के कैंकर्य में लगाने में बड़ी बाधा है। इसे अवर्जनीय विरोधी ऐसे समझाया गया है। हमारे आचरण और अनुष्ठान में जो त्रुटियाँ अनजाने में ही पूर्व कर्मों के कारण उत्पन्न हो जाता हैं उन्हें इसमें शामिल किया गया है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ विशेषकर दो बाधाएं को संभोधित किया गया है। प्रथम भगवान का सौन्दर्य हमारे कैंकर्य में बाधक है को समझाया गया है। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वय प्रकरणम को बड़ी सुन्दरता से दर्शाया गया है। हमारा सच्चा लक्ष्य दिव्य दंपत्ति श्रीमहालक्ष्मीजी और भगवान श्रीमन्नारायण के मुखोल्लास के लिये सेवा करनी है। लेकिन उनके स्वयं की सुन्दरता ही हमें उनके कैंकर्य में निरत होने से रोकती है क्योंकि उस सुन्दरता से हम सम्मोहित हो जाते हैं और हम मूर्छित की हालत में आ जाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों में समझाते हैं कि उनकी सौन्दर्य हमारे हृदय को चुरा लेता है और हमारी पूरी शारीरिक क्रियाएं बंद हो जाती है, इस तरह उनका सौन्दर्य हीं उनके कैंकर्य में एक बड़ी बाधा है। अत: स्वयं भगवान ही उस बाधा को दूर कर हमें कैंकर्य करने देते हैं। यहाँ श्रीशत्रुघनजी का उदाहरण बड़े सुन्दर ढंग से समझाया गया है। यह कहा गया है कि श्रीशत्रुघनजी कभी भी श्रीरामजी की ओर आँख उठाकर नहीं देखते थे क्योंकि यदि वे श्रीरामजी का दर्शन करते हैं तो वें सम्मोहित हो जायेंगे और इससे उनका जो श्रीभरतजी के ओर जो निरंतर कैंकर्य है वह संकट में पड़ जायेगा। दूसरा पहलू जो यहाँ समझाया गया है वह है हमारे पूर्व कर्मों में किये गये पाप और दिखावा है। श्रीपेरियवाचन पिल्लै सकल प्रमाण तात्पर्य में विस्तार से इस तत्व को समझाते है। हम इसे एक विशेष पहलू के संदर्भ में देखेंगे। एक प्रपन्न भगवान कि पूर्ण शरणागति करके भी अपने पिछले कर्म, वासना और रुचि के कारण पाप करता हैं। इसे उत्तरागम (उत्तरा – पश्चात, अगम – पाप)। यह पाप दो प्रकार के हो सकते हैं – जानबूझकर और बिना इरादे। एक और श्रेणी भी है – पाप जिनके लिए प्रायश्चित किया जाये और पाप जिनके प्रायश्चित न किया जाये। प्रायश्चित यानि किये गये कार्य के लिये पछताना और उसे फिर न दोहराना। भगवान से संबन्धित पापों के लिये हमें भगवान के समक्ष ही प्रायश्चित करना चाहिये। भागवतों के प्रति किये गये पापों का प्रायश्चित, जीवात्मा के प्रति अधिक स्नेह, ममता द्वारा बिना इरादे के पापों को भगवान स्वयं मिटा देते हैं और वे पाप जिन भागवतों के लिये किये गये हैं उनके समक्ष हीं प्रायश्चित करना चाहिये। पापों के लिये प्रायश्चित  न करने के ३ प्रकार है – अ) क्रूरता – वे वर्जित क्रियाएं जिन्हें पूर्वाचार्यों और शास्त्रों में दोषी ठहराया है। इनमें शामिल है अन्य की पत्नीयों की लालसा करना, मास खाना, मदिरा, आदि और अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार नित्य नैमित्तिक कर्मानुष्ठान जैसे संध्या वन्दन, आदि नहीं करना। आ) अधिक क्रूरता – वें पाप जो भगवान के प्रति किये गये हैं। इसमें शामिल है अन्य देवताओं को भगवान श्रीमन्नारायण के समान समझना, भगवान के अवतार को केवल नश्वर मानना, आदि। इ) सबसे अधिक क्रूरता – भागवतों के प्रति किये गये पाप जैसे उनका अपमान करना, उनको सम्मान न देना, उनके जन्म, धन, ज्ञान, आदि के आधार पर आंकलन करना। इन ३ प्रकार के पाप जिनके लिये प्रायश्चित न किया गया हो के परिणामों को प्रपन्नों को सामना करना पड़ता है। क्योंकि एक प्रपन्न भगवान कि कृपा पर केन्द्रित करता है, वह स्वयं को बहुत समझदारी से संचालित करेगा और उपर बताये गये तीनों में से कोई भी पाप करने से बचेगा। आदर्शत: एक बार शरण होने के पश्चात कोई भी पापों में निरत नहीं होगा। अगर कोई गलती से भी पाप करता है तो वह तुरंत प्रायश्चित करता है – यह विचार करना असंभव है कि एक सच्चा प्रपन्न अपने किये हुए पापों का प्रायश्चित नहीं करेगा। अत: बिना इरादे के किये गये पापों को और पाप जिनके लिये प्रायश्चित किया गया है और हमें ऐसा समझना चाहिये कि इन सबको भगवान अपनी कृपा से उपेक्षित कर देते हैं।

इसके साथ हम सभी बाधाओं के विषय पर चर्चा समाप्त कर चुके हैं जिन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीवंगी पुरत्तु नम्बी को दर्शाया है और श्रीवंगी पुरत्तु नम्बी द्वारा दिये गये स्पष्टीकरन और श्री वी.वी.रामानुजम स्वामी द्वारा तमिल से साधारण अंग्रेजी में किये गये अनुवाद से समझाया है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/12/virodhi-pariharangal-46.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४४)

श्रीपार्थसारथी भगवान श्रीदेवी, भूदेवी और श्रीगोदम्बाजी के साथ – सबसे अधिक विश्वसनीय और पूजनीय

७५) अविश्वास विरोधी – अविश्वास में बाधाएं

अविश्वास विरोधी यानि अविश्वसनीय संसारी, देवतान्तर और सामान्य शास्त्रों का विश्वास करना।

विश्वास यानि भरोसा, आस्था। यहाँ जिन पहलूओं को जिन्हें हमें विश्वास नहीं करना और कब विश्वास करना यह बाधा है ऐसा समझाया गया है। सामान्य शास्त्र – साधारण धर्म ग्रन्थ के अनुसार आदेश। हालाँकि प्रपन्नों को इनका पालन करना चाहिये फिर भी यदि सामान्य शास्त्र में विशेष धर्म (भगवद / भागवतों कि ओर गोपनीय कैंकर्य) का पालन करते समय यदि कुछ त्रुटियाँ है तो भी उन त्रुटियों को दोष नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस विषय पर पहिले भी हम विस्तृत से चर्चा कर चुके है। यहाँ ३ पहलूओं के प्रति विश्वास – संसारी, देवतान्तर और सामान्य शास्त्र को बाधा ऐसे दर्शाया गया है।

  • जब हम सांसारिक पहलूओं पर केन्द्रित होते हैं तब हम सांसारिक जनों के अहसान के लिये उन पर विश्वास करना बंद कर देते हैं। और ऐसे कार्यों में लगाने से इस संसार बन्धन में हम अधिक फँस जाते है। इसलिये संसारियों पर अधिक विश्वास करने से बचना चाहिये।
  • जहाँ तक देवतान्तर का प्रश्न है यह ब्रह्म, रुद्र, आदि सभी देवताओं से सम्बंधीत है। वें भी आत्मा हीं है। वैधिक कर्मानुसार हम देवताओं का सम्मान करते है इससे अधिक और कोई महत्व नहीं देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक घटना में इसे बहुत सुन्दर ढंग से समझाते हैं जब कोई उनसे प्रश्न करते हैं कि क्यों कुछ श्रीवैष्णव वैधिक कर्मानुसार देवताओं कि पूजा करने में निरत रहते हैं और कोई अन्य मंदिर में नहीं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी समझाते हैं कि शास्त्रानुसार यज्ञ, संध्या वन्दन, आदि में हम इन देवताओ कि पूजा करते हैं जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण अन्तर्यामि रूप में विराजमान हैं। परन्तु वे स्वयं भी क्योंकि दास आत्मा है जो अपनी स्वतन्त्रता को उजागर करते हैं और स्पष्ट रूप से श्रीमन्नारायण भगवान की श्रेष्ठता को जानते हुये भी उनसे झगड़ते है, भगवान उन्हें पूर्ण रूप से निकाल फेंकते हैं।
  • शास्त्र को सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र में बांटा गया हैं। सामान्य शास्त्र शरीर और सामान्य दैनिंदनी अनुष्ठान जो वर्णाश्रम धर्म पर आधारित है पर केन्द्रित होता है। यह आवश्यक है। विशेष शास्त्र आत्मा और उसकी नित्य भगवान से सम्बन्ध पर केन्द्रित करता है। यह गोपनीय सेवा है जो भगवान और भागवतों कि किया करते हैं। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी श्रीतिरुपल्लाण्डु के “अत्ताणीच चेवकम” में ऐसे समझाते हैं। आचार्य हृदयम के ३१वें चूर्णिकै में अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं – “अत्ताणी चेवगत्तिल पोधुवानतु नलुवुम”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि जब हम भगवद / भागवत कैंकर्य में निरत रहते हैं तो सामान्य शास्त्र पीछे रह जाता है और उसे बाद में भी कर सकते है या टाला भी जा सकता हैं। इस विषय में अधिक https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/20/virodhi-pariharangal-10/ में चर्चा कर चुके हैं।

७६) संग विरोधी – सम्बन्ध या मित्रता में बाधाएं

जिसने भगवद ज्ञान प्राप्त किया हो और अन्य जैसे शैव, आदि के अनुयायियों से सम्बन्ध रखता हो।

संग यानि मित्रता, सम्बन्ध। भगवद ज्ञान यानि भगवान श्रीमन्नारायण कि श्रेष्ठता के प्रति सच्चा ज्ञान। अनुवादक टिप्पणी: भगवान के प्रति सच्चा ज्ञान का अर्थ वों हीं श्रेष्ठ है यह समझना और हम उनके नित्य दास हैं। एक बार यह सच्चा ज्ञान प्राप्त हो जाता हैं तो हमारे रवैये में स्वाभाविक बदलाव आ जाता है। जो भी भगवान को नकारता है या अपमान करता है तो हम ऐसे जनों से स्वाभाविक रूप से मित्रता नहीं करते हैं। सच्चा ज्ञान आचार्य और भगवान के कृपा आर्शिवाद से प्राप्त होता हैं। जिसके पास सच्चा ज्ञान नहीं हैं वह भगवान कि श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं कर सकता हैं। हमें ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। यहाँ यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि एक श्रीवैष्णव होने के कारण हमारा कर्तव्य बनता है कि हमें ऐसे अनुकूल व्यक्ति जिन्हें भगवान के विषय में जानने कि जिज्ञासा हो और उनकी पृष्ठ भूमिका पर अधिक ध्यान न देते हुये समझाना चाहिये क्योंकि इस सच्चे ज्ञान को बांटने से हम किसी को उसके सच्चे स्वभाव को जानने में बहुत बड़ी सहायता करते हैं।

७७) सन्तान विरोधी –  सन्तान विरोधी में बाधाएं

यदि स्वयं की सन्तान भी भगवद, भागवत और आचार्य का अपमान करता है तो ऐसे सन्तान को न त्यागना बाधा है। ऐसा वराह पुराण में समझाया गया है:

माजनिष्ठा स नो वम्सेजातों वात्राक्विश्रुज्यताम

आजान्ममरणम यस्य वासुदेवों नदैवतम

संतानम – स्वयं के बच्चे। यदि हमारे स्वयं के बच्चे चाहे पुत्र / पुत्री अगर वो भगवद, भागवत और आचार्य के प्रति अपचार करता है तो हमें उसका त्याग करना चाहिये। ऐसे सम्बन्ध को तोड़ देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: एक प्रपन्न के लिये यह मुख्य हैं कि वें अन्य हितकारी प्रपन्नों से हीं हिल मिले, यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे बच्चे या हमारे संबंधियों के सन्तान अगर वें भगवद, भागवत और आचार्य के प्रति घमण्ड से कोई कार्य करें तो वह सहन नहीं करना चाहिये। हालाँकि हमें बच्चों को सही ज्ञान और मार्गदर्शन देना चाहिये। परन्तु जब ऐसे कोशिश विफल हो जाती है तो सम्बन्ध नहीं रहता हैं। हम इन उदाहरण के साथ यह देख सकते है।

  • प्रह्लादजी भगवान श्रीमन्नारायण के बहुत बड़े भक्त थे। उनके पौत्र महाबली ने भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति यह भक्ति उनसे प्राप्त किया। परन्तु लालच के कारण उन्होंने इन्द्र का धन ले लिया और भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति अपराधिक कार्य किया। यह देख प्रह्लादजी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया परन्तु वह बहरे कानों में गिर गया और स्वयं उन्होंने श्राप दिया कि वह अपनी पूर्ण संपत्ति खो देगा।
  • जब भगवान श्रीराम को माता कैकयी के कहने पर वनवास भेजा गया था तो वहाँ श्रीभरतजी नहीं थे। उनके लौटने पर जब उन्हें यह पता चला कि वह कैकयी थी जिसने श्रीराम को वन में भेजा तो उसी क्षण उसने माता का त्याग कर दिया।
  • जब रावण ने माता सीता का हरण किया तो विभीषणजी ने अपने बड़े भैया को माता को श्रीराम को लौटा देने को कहा। परन्तु रावण ने विभीषण कि नहीं सुनी। कई बार प्रयास करने के पश्चात विभीषण अंत में रावण का सब कुछ छोड़कर उसका त्याग कर श्रीराम के निकट जाकर पूर्णत: उनके शरण हो गया। अंत में उन्होंने रावण को मारने के लिये श्रीराम कि सहायता की।

७८) वर्ण विरोधी – वर्णाश्रम संबन्धित बाधाएं

किसी के वर्ण के विपरीत कार्य करना बाधा है।

वर्णाश्रम मनुष्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षुद्र के आधार पर किया गया है। सभी मनुष्य को शास्त्रानुसार उनके लिये बताये कार्यों को ही करना चाहिये। किसी को भी अपने वर्ण के विपरीत कार्य नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस विषय को विस्तार से चर्चा कर चुके हैं https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/11/05/virodhi-pariharangal-34/ । सभी वर्ण में कुछ कर्तव्य होते हैं। भिन्न भिन्न वर्ण के मुख्य कार्य हैं:

  • ब्राह्मण के लिये ६ मुख्य कार्य पहचाने गये हैं। अध्ययन (वेदों को पढ़ना), अध्यापनम (अन्य को वेद सिखाना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना), याजनम (अन्य के लिये यज्ञ करना), दान (दान देना), परिग्रह (दान स्वीकार करना)।
  • क्षत्रिय के लिये अध्ययन (वेदों को पढ़ना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना) और दान (दान देना) कार्य लागू हैं। अन्य को वेद सिखाना, अन्य के लिये यज्ञ करना और परिग्रह (दान स्वीकार करना) यह लागू नहीं है। परन्तु इसके स्थान पर उन्हें शस्त्र का उपयोग करना, नागरिकों की रक्षा करना और राष्ट्र का काम देखना पड़ता है।
  • वैश्य के लिये भी अध्ययन (वेदों को पढ़ना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना) और दान (दान देना) कार्य हीं लागू हैं-अन्य को वेद सिखाना, अन्य के लिये यज्ञ करना और परिग्रह (दान स्वीकार करना) यह लागू नहीं है। परन्तु इसके स्थान में इन्हें खेती, गौ पालना, बिज़नस, आदि करना चाहिये।
  • क्षुद्र केवल अन्य ३ वर्ण के लोगों की सहायता करता हैं।

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७६, २७७ और २७८ सूत्र में कैंकर्य के विषय में समझाते हैं। पहिले २७६ सूत्र में कहते हैं “कैंकर्य दो प्रकार कि है”। सूत्र २७६ में कहते हैं “वें उन्हें जो अनुकूल हैं उसे करते हैं और जो प्रतिकूल कार्य हैं उससे बचते हैं”। २७७ सूत्र में कहते हैं “अनुकूल और प्रतिकूल किसीके वर्ण, आश्रम और सच्चे स्वभाव जैसे जीवात्मा पर आधारित है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के लिये विस्तृत व्याख्या द्वारा समझाते हैं। वें कहते हैं हमें सभी कैंकर्य (नित्य, नैमितिक कर्मानुष्ठान और भगवद/भागवत का कैंकर्य) निस्वार्थ भाव से भगवान कि सेवा समझ करना चाहिये। यहाँ तक कि वर्णाश्रम धर्म का पालन करना भी भगवान का कैंकर्य की तरह समझना चाहिये और हमारे शेष कार्य शास्त्रों और आचार्य द्वारा सिखाये मार्गानुसार भगवान की दिव्य इच्छानुसार होनी चाहिये।

७९) जप विरोधी – मन्त्र जाप में बाधाएं

मूल मन्त्र के जाप के समय अपना ध्यान भगवान श्रीमन्नारायण जो इन मंत्रो के देवता है कि ओर केन्द्रित न करके सांसारिक अनुकूलता और अन्य देवताओं को स्मरण करना बाधा है।

मूल मन्त्र – श्रीअष्टाक्षर महमन्त्र। “मंतारम त्रायति इति मंत्र:” – वह जो किसी कि रक्षा करता है जो उसका ध्यान देता है उसे मन्त्र कहते हैं। हमें मन्त्र के देवता की ही जानकारी होनी चाहिये और उसका ध्यान करना चाहिये। भगवान श्रीमन्नारायण श्रीअष्टाक्षर महामन्त्र के देवता हैं। अन्य कि ओर ध्यान देना या कैंकर्य छोड़ अन्य कोई लाभ लेने से मन्त्र का कोई फल नहीं मिलेगा। अनुवादक टिप्पणी: हर मन्त्र के ३ मुख्य पहलू होते हैं – चन्दा, ऋषि (जो मन्त्र का प्रचार करता है) और देवता (मन्त्र जिनके लिये जपा जाता है)। मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४ सूत्र में दर्शाते हैं – मंत्रत्तिलुम मंत्रत्तुक्कु उल्लिडान वस्तुविलुम मंत्र प्रदनान आचार्यन पक्कलिलुम प्रेमम गनक्क ऊणडानाल कार्यकरमावतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि शिष्य को मन्त्र, भगवान और आचार्य में पूर्ण विश्वास होना चाहिये और इन तीनों के प्रति पूर्ण लगाव विकसित करना चाहिये। वें उसके समान एक सुन्दर संस्कृत श्लोक भी कहते हैं जो वहीं तत्व बताता है – मंत्रे तत देवतायांच तथा मंत्रप्रदे गुरौ, त्रिशू बकतीस सधाकार्या सा ही प्रथम साधनम। अत: मन्त्र के सभी पहलूओं को समझकर जाप करने से अधिक लाभ प्राप्त होगा। श्रीसहस्रगीति जो द्वय मन्त्र का अर्थ समझाता है को ध्यान लगाकर निरन्तर जाप करना चाहिये। हम श्रीएरुम्बी अप्पा के पूर्व दिनचर्या में पहचान सकते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते थे और उसे श्रीसहस्रगीति के अर्थ के आधार पर जाप करते थे। इसे ९वें श्लोक में देख सकते है “मन्त्र रत्न अनुसन्धान …”। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७४ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भी दर्शाते है “जपतव्यम गुरूपरंपरैयुम द्वयमुम” – गुरूपरम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप करना चाहिये।

८०) आराधना विरोधी – पठन में बाधाएं

निस्वार्थ भाव से सिर्फ अपने सही लक्षणों की पूर्ति के लिये भगवान का तिरुवाराधन करने के सिवाय भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये सांसारिक पदार्थ जो दोषपूर्ण है जैसे जाति, आश्रय, निमित्त और शास्त्र में जो निषेद हैं जैसे मांस, मदीरा, आदि तिरुवाराधन में अर्पण करना बाधा है।

तिरुवाराधन के समय बिना कुछ अपेक्षा किये भगवान की पूजा करनी चाहिये। भगवान की पूजा का परिणाम हीं सुखद पूजा है। यह सामान्य और सबकी जानकारी का ही नियम है – “यदन्न: पुरुषोभवती तदन्नस तस्य देवता” – शास्त्रानुसार हम जो भी पाते है उसे पहिले अपने भगवान को अर्पण कर फिर पाना चाहिये। उदाहरण के लिये एक सन्यासी जिसे सुपारी और ताम्बूल खाना वर्ज है वह भगवान को तिरुवाराधन में अर्पण नहीं कर सकता है। यह हम अनुष्ठान विरोधी में चर्चा कर चुके हैं  (https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/20/virodhi-pariharangal-10/)।

अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन भगवान कि पूजा करने कि एक प्रक्रिया हैं। यह विस्तार से https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/09/04/srivaishnava-tiruvaradhanam/ में समझाया गया है। भगवान कि पूजा में बाधाएं भी https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/10/17/virodhi-pariharangal-16/ में समझाया गया है।

जब खाध्य पदार्थों का प्रश्न आता है तब इनके सेवन में ३ प्रकार के प्रतिबंध हैं – जाति दुष्ट अन्न (पदार्थ जो पाने योग्य नहीं है जैसे कि प्याज, लहसून, आदि), आश्रय दोष अन्न (सात्विक अन्न जो अवैष्णव के सम्पर्क में आया हैं) और निमित्त दोष अन्न (गंदे/वर्जित पदार्थ)। यह विस्तार से https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/12/02/virodhi-pariharangal-23/ में समझाया गया हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/11/virodhi-pariharangal-45.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४३)

७४) अन्तिम दशा विरोधीअंतिम क्षणों में बाधाएं

वराह भगवान (तिरुविदवेंतै के दर्शन) – वह जिन्होने अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने का वचन दिया

अंतिम दशा यानि मृत्यु शैया पर अंतिम समय। जब मृत्यु निकट आती है तो कई जन अपनी स्मृति खो देते हैं। कई जन को पूर्ण ध्यान रहता है और अंतिम क्षणों में होश में भी रहते हैं। हमारे आचार्यों ने “’पेरु तप्पाटु’ एनरु तुण्नितिरुक्कैयूम, पेट्रुक्कु त्वरिक्कैयुम श्रीवैष्णवाधिकारिक्कु अवस्यापेक्षितम” में दो मुख्य पहलू को दर्शाया है – एक योग्यता प्राप्त श्रीवैष्णव को अपना अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने में पूर्ण विश्वासी होना चाहिये और उसे प्राप्त करने की उत्कृष्ठ लालसा भी होनी चाहिये। यह पूर्ण विषय इन्हीं दो पहलुओं पर आधारीत है। यहाँ ‘पेरु’ अर्थात अंतिम लक्ष्य श्रीवैकुण्ठ पहुँचकर भगवान के मुखोल्लास के लिये स्वयं को नित्य कैंकर्य में रखना हैं। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्रों में अंतिम स्मृति को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। भगवद्गीता के ८.६ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि “यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौंतेय सदा तद्भावभावित: ॥” – हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस जिस भाव का स्मरण करता है, वह उस उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त करता है। इसलिये भगवद नामस्मरण, स्वरूप और लीलाओं पर ध्यान देने को अधीक महत्वपूर्ण बताया गया हैं। परन्तु यह सब मनुष्य के अंतिम दशा / अवस्था पर ही सम्भव होना है। यदि कोई उस समय अचेत अवस्था में है तो उस समय वह भगवान का ध्यान नहीं कर पायेगा। और स्वयं के सांसारिक लगाव के कारण वह उस समय सांसारिक पहलुओं के विषय पर सोचेगा। यहाँ तक महान राजऋषि भरत जो ज्ञान योग में कुशलता प्राप्त किये थे वें भी हिरण के प्रति लगव के जाल में फँस गये और उस हिरण का ध्यान करने लग गये। इसका परिणाम स्वरूप अगले जन्म में उन्हें हिरण रूप में पैदा होना पड़ा। परन्तु यह सब उपासक या कर्म/ज्ञान/भक्ति योग निष्ठावालों के लिये है। प्रपन्नों के लिये यह आवश्यक नहीं है। एक शरणागत पूर्णत: भगवान के नियन्त्रण और ज़िम्मेदारी में है चाहे वह अंतिम समय भगवान का नामस्मरण करें या नहीं उसे परमपदधाम की प्राप्ति अवश्य होगी। जब श्रीरामानुज स्वामीजी कुछ शंकाओं का निवारण करना चाहते थे तो वें श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी के निकट गये जो गुप्त रूप से भगवान कि निजी सेवा करते थे तब श्रीरामानुज स्वामीजी उनसे निवेदन किया कि वे भगवान कि राय इन शंकाओं के विषय में लेवें। श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी श्रीवरदराज भगवान से श्रीरामानुज स्वामीजी कि परिस्थिति के विषय में निवेदन करते हैं और श्रीवरदराज भगवान श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से ६ वार्ता कहकर आर्शिवाद प्रदान कर कहते हैं इनका उद्देश श्रीरामानुज स्वामीजी कि दुविधा स्पष्ट करना हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि न तो श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपनी शंकाएं श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को बातया और न ही श्रीवरदराज भगवान ने श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से इन शंकाओं के विषय में पूछा। श्रीवरदराज भगवान ने श्रीरामानुज स्वामीजी के मन कि बात जानकर सीधे श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से यह उत्तर दे दिये। यह ६ वाक्य हैं – “मैं, श्रीमन्नारायण श्रेष्ठ हूँ”, “व्दिविधता ही वास्तव में सत्य है”, “प्रपत्ति हीं उपाय है”, “अंतिम स्मृति कि कोई आवश्यकता नहीं है”, “प्रपन्नों को मोक्ष जीवन के अन्त मे स्वयं हीं प्राप्त हो जाता है” और “श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करों”। यह विशेषकर प्रपन्नों के लिये अंतिम स्मृति की आवश्यकता को स्वयं भगवान नकारते हैं। वराह चरम श्लोक का भी यह मुख्य अभिप्राय है – जहाँ भगवान वराह विशेषकर कहते हैं कि जो उनके अनन्य भक्त हैं यहाँ तक कि वें सम्पूर्ण अचेत अवस्था में हैं तो भी वे उसे स्मरण कर उसे परमपद तक पहुँचायेंगे। हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवनी में  देख सकते हैं कि वें अपने अंतिम क्षणों में भगवान का ध्यान न करके स्वयं के आचार्य का ध्यान किया। अब हम इस विषय कि चर्चा करेंगे।

  • यह चिन्ता करना कि मृत्यु के पश्चात घर, जमीन, बच्चे, पत्नी, सांसारिक धन, आदि जिनसे हमें लगाव है यहीं रह जायेंगे – यह बाधा है। प्रावण्यम – लगाव। मनुष्य कुछ वस्तु के लिये रोना प्रारम्भ करता है जब वे पिछे रह जाते हैं जैसे घर, खेती योग्य जमीन, पत्नी, बच्चे, आदि। यह अज्ञानतावश होता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी हर मनुष्य के चित्त की हालत जब वह मृत्युशैया पर अंतिम क्षणों में रहता है विस्तृत जानकारी पेरियालवार तिरुमोझी के पादिगम जो “तुप्पुडैयारै…” से प्रारम्भ होता हैं उसमें बताते है। इस पादिगम में वें पहिले भगवान को सूचित करते हैं कि भगवान का ध्यान करने के लिये उनका मन स्थिर नहीं हैं और भगवान से विनंती करते हैं कि उनके अभी कि शरण हुये स्थिति को स्मरण कर और जीवन के अंत समय में मोक्ष प्रदान करें। १० पाशुरों में वें विस्तृत रूप से समझाते हैं कि मनुष्य को अंतिम क्षणों में कितना कष्ट होत है। मनुष्य जब मृत्यु शैया पर रहता है तब उसके सम्बन्धी उसे घेरे हुये रहते हैं जो ज़ोर ज़ोर रो रो कर उसकी घबड़ाट को ओर अधीक बढ़ाते हैं। शरीर त्यागने से पहिले वें सभी रिश्तेदार उससे अधीक धन लेने कि कोशिश करते हैं। इसके बावजूद उसे स्वयं पर दया आती है क्योंकि वह अपने पिछे अपने बच्चे, पत्नी, धन, दौलत, आदि छोड़कर जा रहा है। परन्तु जब हमें यह अहसास हो जाता हैं कि वे जीवात्मा है और वें तो केवल इस शरीर का त्याग कर रहे हैं तब उन्हें यह तकलीफों से गुजरना नहीं पड़ता हैं। यह अनुभव करना प्रपन्नों का स्वाभाविक गुण है। यह कहा जाता हैं कि प्रपन्न जन आतुरता से मृत्यु देव (मृत्यु) का इंतजार करते हैं जैसे कोई अपने प्रिय अतीथि के आने का करता है। यह इसलिये होता हैं कि प्रपन्नों को मृत्यु के पश्चात स्वयं भगवन बिरजा के तट (परमपदधाम और संसार के मध्य) तक ले जाते हैं। वें अर्चिरादि मार्ग से बिरजा नदी को पार करते हैं और अन्त में भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य महल तक पहुँचते हैं जहाँ पर नित्यसूरिगण व मुक्तात्मा उसका स्वागत करते हैं। तब वह शेष परयंकम (सिंहासन) पर चढ़ता है जहाँ भगवान विराजमान हैं और भगवन का आलिंगन करता है। उसके पश्चात भगवन उसे नित्य कैंकर्य प्रदान करते हैं और वह वहाँ अनंतकाल तक आनंदपूर्वक निवास करता है। अत: मृत्यु के पश्चात जो प्रशंसनीय जीवन है यह देख प्रपन्न शरीर त्याग करने में कभी नहीं चिंता करते है। परन्तु सामान्य जन जिन्हें यह दार्शनिक समझ नहीं हैं उन्हें मृत्यु के समय बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है।
  • जैसे “क्षेत्राणी मित्राणी” में समझाया गया है ऐसे लगावों को असहायक पहलू की तरह मानना चाहिये। ऐसे न होना ही स्वयं बाधा है। क्षेत्राणी मित्राणी – लगाव जैसे मेरी संपत्ति, मेरे मित्र। यह सब दासत्व के कारण हैं और परमपदधाम पहुँचने में बाधक है और इस तरह इन्हें प्रतिकूलम के रूप में दर्शाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी पूर्ण श्लोक को शरणागति गध्यम में कहते है। श्लोक और उसका अर्थ इस तरह है। “पितरं मातरं दारान् पुत्रान्बन्धून्सखीन्गुरून् । रत्नानि धनधान्यानि क्षेत्राणि च गृहणि च ॥ सर्वधर्मांश्च संत्यज्य सर्वकामांश्च साक्षरान् । लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेsव्रजं विभो ॥” – हे भगवान (विभो)! मैंने अपने माता, पिता, पत्नी, बच्चे, सम्बन्धी, मित्र, शिक्षक, रत्न भूषण, धन, धान्य, खेती कि जमीन, घर, आपको पाने के सभी साधन, आदि सभी के प्रति लगाव का त्याग कर दिया है और आपके चरण कमलों के शरण हो गया हूँ। इस श्लोक का बहुत गुणगान किया जाता है क्योंकि स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित करता है कि इन सब के प्रति जो लगाव है उसे तिरस्कृत करने के पश्चात हमारे उत्थान का एक मात्र उपाय भगवान के श्रीचरण कमल ही हैं।
  • हमारे अंतिम लक्ष्य परमपदधाम के प्रति लगाव नहीं होना जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया है “माग वैकुंठम काणबतर्कु एनमनम एकमेण्णुं” बाधा है। हमें परमपद में पहुँचकर और वहाँ भगवान के दर्शन कि तीव्र लालसा होनी चाहिये। श्रीसहस्रगीति में मालाधर स्वामीजी कहते हैं कि आल्वार को इन संसार में रखने के लिये बहुत दुख होता है। अनुवादक टिप्पणी: इस श्रीसहस्रगीति के पाशुर के लिये श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि इडु व्याख्या स्पष्ट और सुन्दर है। वें श्रीशठकोप स्वामीजी की अवस्था के विषय में समझाते हैं कि आल्वार निरन्तर श्रीवैकुण्ठ जो भगवान नरसिंह का दिव्य धाम है का निरन्तर ध्यान करके मग्न रहते हैं। आल्वार कहते हैं चाहे दिन हो या रात मेरा मन निरन्तर वैकुण्ठ के बारे में हीं सोचता हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी सामान्य जनों के लिये दर्शाते हैं कि उनके लिये दिन और रात्री कि क्रियाएं भिन्न भिन्न रहती हैं – परन्तु आल्वार के लिये समान है – निरन्तर भगवान का स्मरण करना है।
  • इस संसार को जिसे हमें त्यागना है से घृणा नहीं करना जैसे कि श्रीसहस्रगीति में बताया गया है “कोडुवुलगम काट्टेले” बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस लौकिक संसार में इन सांसारियों के मध्य में अपनी उपस्थिती को “कोडुवुलगम” देखते हैं – कठोर दुनिया और कहते हैं “मैं इसे और देखना नहीं चाहता हूँ”। अनुवादक टिप्पणी: जैसे स्वयं के विषय में सही ज्ञान प्राप्त होना प्रारम्भ होना हैं जीवात्मा इस संसार में जो निरन्तर कैंकर्य में व्यस्त रहने के लायक नहीं है, में बहुत सुलभ रूप से रहना प्रारम्भ कर देता है। श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुविरुत्तम  प्रबन्ध के पहिले पाशुर में बहुत दु:ख दर्शाते है “पोय निन्र ज्ञानमुम … इनियाम उरामै” – मैं इस संसार में जो अज्ञानता से भरा हुआ है रहना सहन नहीं कर सकता हूँ। श्रीशठकोप स्वामीजी के लिये इस संसार में रहना जैसे कि गरम रेती पर नंगे पाँव चलना – जिसे कुछ क्षणों के लिये भी सहन करना मुश्किल है। जब तक इस भौतिक संसार से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता है अपने अंतिम क्षणों में इन भौतिक वस्तुओं के प्रति लगाव को त्यागना बहुत ही मुश्किल है।
  • श्रीसहस्रगीति के पाशुर में जैसे कहा गया है “पिन्नुमाक्कै विडुम्पोलुतेण्णे” की अपना शरीर त्यागने की तीव्र लालसा न होना बाधा है। हमें अपने इस नश्वर शरीर छोड़ने की आतुरता होनी चाहिये। जैसे श्रीसहस्रगीति में समझाया गया है कि “कूविक्कोल्लुम कालम इननुम कुरुगातो?”, हमें अपने मृत्यु के दिन का आतुरता पूर्वक प्रतिक्षा करनी चाहिये ताकि हम उस दिव्य धाम को जा सकें। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदयम के २२९ चूर्णिकै में श्रीअलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं कि भगवान बड़े आतुरता से श्रीशठकोप स्वामीजी का इंतजार किये और पूरे ४ प्रबन्धों में २० बार स्मरण कर उन्हें दिव्य धाम परमपद बुलाने के लिये कहा हैं। श्रीनायनार समझाते हैं कि भगवान कई कारणों से उनका इंतजार किये परन्तु मुख्यत: श्रीशठकोप स्वामीजी कि परमपदधाम पहुँचने कि आतुरता और मुमुक्षु कहलाने के लिये पूर्ण रूप से अधिकारी बन जावें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपने व्याख्यानों में ऐसे २० स्थानों की सूची बताई है जहाँ पर श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान को बुलाते हैं और अपने व्याख्यानों में आगे समझाते हैं कि जो एक बार शरणागत हो गया है उसमें श्रीभगवान के साथ परमपद में अनंतकाल तक रहने की सर्वोच्च लालसा होनी चाहिये और ऐसी सर्वोच्च इच्छा शरणागति से पूर्ण होती है अन्यता शरणागति को अधूरी और ऊपरी माना जायेगा।
  • श्रीसहस्रगीति के पाशुरों में जैसे कहा गया है “उन्नै एन्नाळ् वन्दु कूडुवन्” परमपद में बिना भगवान के दर्शन किये रह सकना वह भी भगवान के मिलने की पूर्ण इच्छा होते हुये भी – यह बाधा है। कब मैं स्वयं परमपदधाम आकर भगवान के दिव्य रूप का दर्शन करूँगा? ऐसे भगवान का कब में अनुभव करूँगा? यह सभी श्रीशठकोप स्वामीजी के मार्मिक अनुभव थे जो स्वाभाविक अनुभव की तरह ही था। यह वह अवस्था है जहाँ किसी की इच्छाएं परमपद में भगवान के परत्व स्वरूप की ओर जुड़ना हैं। भक्ति की इस परिपक्व अवस्था को परम भक्ति कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कि पहिले समझाया गया कि किसी का लगाव भगवान के प्रति परिपक्व होकर उसकी अंतिम अवस्था होनी चाहिये। भक्ति तीन स्तर की हैं – पर भक्ति, पर ज्ञान और परम भक्ति। पर भक्ति भगवान के पूर्ण ज्ञान की दशा है – इस स्तर में भगवान के साथ रहना आनन्द प्रदान करता हैं और और भगवान के बिछुड़ना दु:ख प्रदान करता है। परम ज्ञान कि अवस्था यानि भगवान का पूर्ण स्वभाव, नाम, रूप, आदि को देखना। परम भक्ति वह अवस्था है जिसमें भगवान के लिये पूर्णत: भावुक होना है और स्वयं भगवान के बिना रह सकने योग्य नही रहेगा। श्रीनायनारजी आचार्य हृदयम के २३३ चूर्णिकै में इसे दर्शाते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से विस्तृत रूप से समझाते हैं।
  • अर्चावतार भगवान के प्रति लगाव जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया “मरुलोली नी” बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं कि भगवान हमारे इच्छानुसार हमें अंतिम तिरुमाली परमपदधाम में स्थान देते हैं। इस संसार के अर्चावतार भगवान के प्रति हम इतने जुड़ गये हैं वे उससे अधिक परमपद में भगवान के प्रति अनुभव करने की हमारी इच्छा को उत्तेजित करते हैं। इसलिये श्रीसहस्रगीति के अन्त में जब वें आते हैं तो परमपदधाम के निकट आ जाते है और वें अर्चावतार भगवान के लिये “मरुल” (भ्रम) कहते हैं क्योंकि यह अर्चावतार अनुभव इस लौकिक संसार के लिये हैं। परन्तु यही आल्वार सुलवीसुम्बणीमुगिल पादिगम में जहाँ वे अर्चिरादि मार्ग (परमपदधाम कि ओर जाने वाला मार्ग) का अनुभव करते हैं तो वें तिरुक्कुदंतै के आरवमुधन भगवान के प्रति लगाव दिखाते हुये कहते हैं कि “कुदंदै एन कोवलन कुडीयडीयार्क्के”। इस तरह हम समझ सकते हैं कि अर्चावतार भगवान के प्रति अपना लगाव प्राकृतिक स्वभाव के विपरीत नहीं हैं। श्रीपरकाल स्वामीजी भी अपने अन्त क्षणों में तिरुनेडुन्दाण्गम के २९वें पाशुर में “तण कुडन्दैक्किडन्द मालै नेडियानै अडि नायेन निनैन्दिट्टेने” गायन करते समय यह दर्शाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये अर्चावतार भगवान के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। क्योंकि वें अपना पूर्ण जीवन अर्चावतार भगवान कि सेवा करने में बिताते हैं और वें इसके बाहर कुछ सोच भी नहीं सकते हैं। हम यह भी सुनते हैं श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने अंतिम दिनों में कहते है “अगर मैं परमपदधाम में श्रीरंगनाथ भगवान के दर्शन नहीं करूँगा तो मैं परमपदधाम कि दीवार में एक छेद कर वहाँ से छलांग लगाकर पुन: श्रीरंगम आजाऊंगा”। फिर भी हमें नित्य परमपदधाम में जाकर भगवान कि सेवा करने की लगाव को त्यागना नहीं चाहिये। श्रीवैष्णवों के लिये यहाँ पर दिव्यदेश और परमपद के अनुभव में कोई अन्तर नहीं रहता है फिर भी तकनीकि अन्तर है – इस संसार में दिव्यदेशों के कैंकर्य में विराम होता है जब मंदिर के पट बंद होकर भक्त गण घर जाकर विश्राम कर रहे हो। परन्तु परमपद में निरंतर सेवा कैंकर्य हैं, बुढ़ापा, बीमारी, आदि कोई प्रभाव नहीं है। इस लिये जब समय आता है तब श्रीवैष्णवों को चाहिये कि वे इस संसार के अर्चावतार भगवान के प्रति लगाव छोड़कर स्वयं परमपद कि ओर प्रस्थान करने कि तैयारी करें।
  • अंतिम समय में यह विचार करना कि “अब मेरा सहारा क्या है?” इस समर्पण भाव को “भगवान के प्रति हमारा समर्पण जो सहारा है” यही सच्चा सहारा है इसे न मानना बाधा है। जैसे पेरिया तिरुमोझी में समझाया गया हैं कि “उन मनत्ताल एन निनैन्तीरुंताय” – आप मुझे कैसे सुरक्षित रखने की सोच रहे हो?, हमें मोक्ष देना भगवान की ज़िम्मेदारी और इच्छा है। ऐसी इच्छा हमेशा भगवान के हृदय में रहती है। इसलिये हमें स्वयं को कभी भी रक्षक नहीं समझना और स्वतन्त्रता रूप से कार्य नहीं करना चाहिये। स्वतन्त्रता से सोचना “मैं स्वयं को कैसे मुक्त करूँगा?” यह बाधा है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ६९वें सूत्र में “‘अंतिम कालत्तूक्कू तंजम, इप्पोतु तंजमेन एंगीर नीनैवु कुलैगै ‘ एनरु जीयर अरुलिच्चेयवर” – श्रीवेदान्ति स्वामीजी कहते अन्तिम क्षणों का हमारा सहारा है “स्वयं को रक्षक मानने का त्यागना और भगवान को ही पूर्णत: रक्षक मानना”। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के दूसरे प्रकरण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी प्रपत्ति (पूर्णत: भगवान के शरण होना) कि महिमा समझाते है। इस विभाग में ६०वें सूत्र से प्रारम्भ कर श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि प्रपत्ति भी – किसी के समर्पण कि क्रिया उपाय नहीं है और केवल भगवान हीं एक मात्र उपाय हैं। वे प्रमाणित करते हैं कि समर्पण की क्रिया भगवान को रक्षक मानना स्वाभाविक रूप से प्रगट होता है। ६३वें सूत्र में वे समझाते हैं कि जब भगवान जीवात्मा की रक्षा करते हैं तो भगवान जीवात्मा से यहीं आशा करते हैं कि वें भगवान को जीवात्मा की रक्षा करने उन्हें दें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्यानों में समझाते हैं कि जीवात्मा को भगवान द्वारा रक्षा करवाने की इच्छा रहती है और भगवान को रक्षा करने की अनुमती देना सिर्फ निर्देशात्मक है। ६६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि भगवान की इच्छा ही जीवात्मा के रक्षा की चाबी है। अगले सूत्र में वें कहते हैं कि भगवान जीवात्मा की रक्षा के लिये निरन्तर इच्छा और कोशिश करते हैं। ६८वें सूत्र में वें कहते हैं कि जब जीवात्मा परिवर्तित होता है तब ऐसी रक्षा मूर्तरूप लेती है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से यहाँ दर्शाते हैं कि “इच्छा में परिवर्तन” यानि “स्वयं की रक्षा को स्वयं करने के रवैया को भगवान पर पूर्ण रूप से आधारित होने में परिवर्तित करना”। ६९वें सूत्र में यह श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवेदांति स्वामीजी के शब्दों द्वारा स्थापित किये हैं। इस सूत्र में श्रीवेदांति स्वामीजी श्रीवैष्णव को समझाते हैं जो बिमार है और वह श्रीवेदांति स्वामीजी से पूछता हैं कि इस क्षण में उसका रक्षक कौन है। श्रीवेदांति स्वामीजी कहते हैं कि स्वयं की स्वतन्त्रता और स्वयं की रक्षा करने को त्यागकर भगवान ही एक मात्र रक्षक हैं और इसे स्वीकार करना ही एक मात्र राह है। अत: हम समझ सकते हैं कि भगवान को जीवात्मा द्वारा उसके रक्षा की अनुमती देना उसका स्वाभाविक गुण है और और भगवान की इच्छा का दास बनकर रहना जैसे “अधिकारी विशेषणम” में समझाया गया है – शरण हुये व्यक्ति का स्वाभाविक गुण और यह उसके मोक्ष के लिये उपाय हो जाता है। इस सिद्धान्त के विषय में ओर अधिक जानकारी हम विद्वानों के मार्गदर्शन में सुन सकते हैं।
  • पत्थर या लकड़ी के तरह होश/ज्ञान आदि बिना प्रगट किये बिना रहना बाधा है। श्रीवराह भगवान समझाते है “तटस्थम म्रियमाणन्तु काष्ठपाषाण सन्निबम अहम स्मरामी मद भक्तम”, हमें पत्थर या लकड़ी की तरह रहना चाहिये जिसे स्वयं को स्वतन्त्र रूप से स्वयं की रक्षा करने में रूचि न हो। ऐसे व्यक्ति जो मुझ पर पूर्णत: निर्भर हैं मैं उनके विषय में सोचूंगा और उन्हें मोक्ष दूँगा। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में ३ चरम श्लोकों की स्तुति बहुत होती है। चरम श्लोक यानि वह जो अंतिम सर्वश्रेष्ठ तत्त्वों को बताता है। वराह चरम श्लोक हैं जो “स्थिते मनसी … ” से प्रारम्भ होता है। श्रीराम चरम श्लोक है जो “सकृतेव प्रपन्नाय …” से प्रारम्भ होता है। श्रीकृष्ण चरम श्लोक है जो “सर्वधर्मान परित्यज …” से प्रारम्भ होता है। यह सभी चरम श्लोक भगवान कि प्रतिज्ञा को दर्शाते है कि अपने भक्तों के लिये वें हीं एक मात्र अंतिम रक्षक हैं। हमारा कर्तव्य है कि हमें भगवान की पूर्ण रक्षा को स्वीकार करना चाहिये और उनकी इच्छाओं का पालन करना चाहिये।
  • हमारे अंतिम क्षणों में अपने मोक्ष के लिये कोई विशेष आवश्यकता हमारे सिद्ध साधनम (भगवान) हमारे रक्षक हैं को भंग करता है। यह न जानना बाधा है। सिद्ध साधना निष्ठा यानि भगवान पर पूर्ण निष्ठा रखना जो उपाय और उपेय दोनों हैं। कोई आवश्यकता जो स्वयं की मेहनत पर आधारित है हमारे विश्वास को नष्ट कर देता है। अनुवादक टिप्पणी: जब किसी के अंतिम क्षणों में सोचने की प्रक्रिया कि कोई विशेष आवश्यकता होती है तब वह हमें स्वतन्त्र रूप से सोचने को बाध्य करती है और कुछ वस्तु को स्वतन्त्र रूप से कार्य करने का विचार करती है। परन्तु ऐसे व्यवहार जो किसी की स्वतन्त्रता को प्रगट कराते हैं वे जीवात्मा के सही स्वभाव के विपरीत है – जीवात्मा हमेशा पूर्ण रूप से भगवान पर आश्रित है। इस तरह प्रपन्नों के लिये ऐसे तत्त्व त्यज्य हैं जो सिद्धान्त पूर्ण रूपसे उनके सही लक्षणों को सम्पादित करते हैं। परन्तु भक्ति योग निष्ठा और अन्य उपासकों के लिये जैसे कि श्रीमद्भगवत्गीता आदि में समझाया गया है उनके अंतिम क्षणों में ऐसे हालत अस्तित्व में रहते हैं और उनका अगला जन्म इन हालत पर निर्भर करता है।
  • अंतिम क्षणों में किसी के मन में पवित्र विचार आते हैं जिससे भगवान का मुखोल्लास होता है जो हमारे अंतिम लक्ष्य का अंश है – यह न जानना बाधा है। हम इस भाग को जिसमें भगवान की इच्छा किसी को मोक्ष देना या ऐसा कोई स्वयं के प्रयास को ज़ोर देकर समझाते हैं बाधा है। हमें यह जानना चाहिये कि अन्य न छोड़नेवाले भगवान के विचार जो किसी के सही लक्षणों से उत्पन्न होते (निरन्तर भगवद्विषय में रहना) हैं वे हमारे अंतिम परिणाम हो जाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: एक सच्चा प्रपन्न जब होश में रहता है तब अंतिम समय में भगवान का विचार करता है। किसी अन्य वस्तु कि प्राप्ति के लिये इसे उपाय समझने की गलती नहीं करनी चाहिये। भगवत विषय में निरन्तर व्यस्त रहने का और स्वयं भगवान की दिव्य इच्छा ही इनका परिणाम है। हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन में हम देख सकते हैं कि आचार्यों का अंतिम समय बहुत ही सुखद होता है क्योंकि भगवान का उनके हृदय में पूर्ण आर्विभाव होता है। हमारे आचार्य भी अपने अंतिम क्षणों में अपने आचार्य का पूरी तरह ध्यान करते हैं और बहुत सुखद अनुभव करते हैं। यह सभी भगवान के परमपद में निरन्तर कैंकर्य के चरम परिणाम का एक अंश है।
  • अपने अंतिम क्षणों में यह विचार करना कि अपने आचार्य का नामस्मरण करना आवश्यक है – यह बाधा है। यहाँ से प्रारम्भ कर आचार्य के महत्व पर ज़ोर दिया गया है। अपने अंतिम क्षणों में आचार्य का नामस्मरण उपाय रूप में नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कि कृपा से उस क्षण में जो भी होता है उसे स्वीकार करना चाहिये। पहिले कहा जाता था कि ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे उपाय की तरह करना चाहिये।
  • अपने आचार्य के निरन्तर संग में रहने से अपने आचार्य के प्रति स्वाभाविक विचार हमारी परमपदधाम यात्रा के दौरान उपयोगी रहेगी और आवश्यक है। यह न समझना बाधा है। यदि कोई स्वयं के आचार्य को स्मरण करता हैं तो यह उत्तम है। प्रयाणपाधेयम – जब हम लम्बी यात्रा के लिये जाते हैं तो अपने साथ प्रसाद भी लेकर जाते हैं। उसी तरह अर्चिरादि मार्ग से होते हुये परमपद की हमारी यात्रा के समय आचार्य के विचार ही हमारे उस राह के लिये हमारा भोजन है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यता यह कहा गया है कि “पाधेयम पुण्डरीकाक्ष नाम संकीर्तनम” – यात्रा के समय हमें जीवित रखने के लिये भगवान का नामस्मरण संकीर्तन ही भोजन है। उसी तरह यहाँ आचार्य कि स्तुति करना हीं अंतिम यात्रा के समय हमारा भोजन है।
  • यह मानना कि अपने आचार्य के प्रति ऐसे विचार जो उनसे मिलने के पहिले उपाय की तरह मानते है – बाधा है। कुछ प्राप्त करने के लिये यह उपाय नहीं हो सकता है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कि पहिले समझाया गया है पहिले के मिलने के कारण यह एक केवल संयोग मात्र होगा और इसे अंतिम यात्रा का एक हिस्सा मानना चाहिये।
  • “वह” जो सही माने में हमारे हितेशी है जो हमारे इस यात्रा के मार्ग दर्शक है यह न समझना बाधा है। हमें यह जानना चाहिये कि हमारे आचार्य जो सही माने में हमारे हितेशी है वो हीं इस यात्रा में हामारा मार्ग दर्शन करेंगे। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया भगवान की “मार्गबन्धु” ऐसी स्तुति करते हैं – वह जो सही रूप में हमारे यात्रा के साथी हैं। यहाँ पर आचार्य को भी कह सकते हैं। यह तत्व दोनों आचार्य और भगवान पर लागू हैं। तिरुमोगूर के कालमेघ भगवान कि स्तुति वलित तुणऐ/मार्ग बंधु ऐसे कि गई है। श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति “विष्णुलोक मणिमण्डप मार्गदायी” – ऐसे कि गई है – वह जो हमें परमपद का मार्ग दिखाते हैं। इसलिये यह दोनों आचार्य और भगवान को लागू है जो दोनों हमारे हितेशी हैं।
  • अनिष्ट निवृत्ति (अनावश्यक पहलू – अज्ञानता, आदि को मिटाना) और इष्ट प्राप्ति (इच्छाओं को प्राप्त करना – अर्चिरादि मार्ग पर चलना, परमपदधाम पहूंचना, आदि) हमारे स्वयं के परिणाम हैं और यह बाधा है। अविध्या (अज्ञानता) का अर्थ ज्ञान का संकुचित होना – इस लौकिक संसार में शारीरिक पहलुओं का दास होना। जब भौतिक शरीर छूट जाता है तो अज्ञानता दूर हो जाती है और ज्ञान का पूर्ण रूप से विकास होता है। यह एक मुक्तात्मा की अवस्था है। अर्चिरादि गति वह पथ है जो प्रकाश से प्रारम्भ होता है और परमपदधाम जाकर समाप्त होता है। यह नहीं मानना चाहिये कि यह स्वयं का परिणाम है जो स्वयं की मेहनत का परिणाम है।
  • भगवान जो इन सभी बाधाओं को नष्ट करते हैं और हमारी खुशी के लिये आर्शिवाद प्रदान करते है वें हीं ऐसे परिणामों के शुभ चिंतक है। इसे न मानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। यह कहा गया है – “चेतन लाबम ईश्वरनुक्कु” – जब एक बद्ध आत्मा शुद्ध होकर मुक्त हो जाता है तो वह परमपद पहुँचता है और भगवान का नित्य कैंकर्य प्रारम्भ करता हैं। इसलिये भगवान को जीवात्मा की दासता से मुक्ति देनेवाले अंतिम शुभचिंतक माना गया हैं। हालाँकि जीवात्मा का सच्चा लक्षण भगवान की निरंतर कैंकर्य करना है, वह भगवान के बिना शर्त और पूर्ण कृपा से उन्नाती करता है। अत: भगवान सब के मालिक हैं और अंतिम शुभ चिंतक भी हैं। इसे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ७०वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि “प्राप्तावुम प्रापकनुम प्राप्तिक्कु उगप्पानुम अवने” – भगवान एक मात्र हैं जो पिछा करते हैं, वह जो आर्शिवाद देते हैं और वह जो खुशी महसूस करते – उसके अंतिम परिणाम के लिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्यान इस सूत्र के लिये उत्कृष्ट है। वें प्रमाणों द्वारा इस सिद्धान्त को समझाते हैं कि भगवान ही प्राप्ता और प्रापकन हैं है – जीवात्मा स्वयं को परिश्रम में व्यस्त नहीं रहते हैं और क्योंकि भगवान ही ऐसे हैं जो अंतिम परिणाम से प्रसन्नता का अनुभव करते हैं – जीवात्मा स्वयं के आनंद में कभी भी निरत नहीं रहता है।
  • अपनी पसन्द नापसंद में स्वयं का सम्बन्ध होना बाधा है। क्योंकि भगवान आत्मा में निवास करते है इसलिये यह उनको तय करना है कि जीवात्मा के लिये क्या अनुकूल है और क्या प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम भगवान को अंतिम उपाय और उपेय रूप में स्वीकार करते हैं तब हमारा कार्य मूलभूत सिद्धान्त से प्रेरित होना चाहिये। हमें शास्त्रों और शिष्टाचार जो शास्त्र में समझाये अनुसार को हमारे जीवन में पालन करना चाहिये। अनुकूल और प्रतिकूल पहलुओं को शास्त्रों और आचार्य निर्देशानुसार तय करना चाहिये न कि हमारी इच्छानुसार। कई बार लोग कहते हैं “मैं पूरी तरह शरण हुआ हूँ और मेरा रवैया कैसे हो यह भगवान की ज़िम्मेदारी है”। परन्तु उनके कार्यकलाप शास्त्र और शिष्टाचार के विपरीत होते हैं – मूलत: यह पलायन का बहौत ही सरल मार्ग है जहाँ हम कानून कायदों का पालन नहीं करते हैं और फिर भी वे स्वयं को बहुत ईमानदार और ज्ञानी मानते है। ऐसे रवैया उन लोगों के लिये बहुत ही हानिकारक होगा जो अपनी आध्यात्मिक रूप से उन्नती करना चाहते हैं।
  • ऐसी पसंद और नापसंद भगवान के लिये वास्तव में उचित है जो सिर्फ एक मात्र “अहं” हैं जैसे कि समझाया गया है – बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कि भगवान ही गीताजी के चरम श्लोक में घोषित करते हैं “अहम त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षचिश्यामी” – अहम यानि मैं जो स्वयं भगवान बहुतही निडरता पूर्वक घोषित करते हैं। हमें हमेशा “अड़िएन”, “दास”, आदि कहना चाहिये जो भगवान और भागवतों के प्रति हमारा आश्रित होना उजागर करता है। क्योंकि वें हमारे सच्चे स्वामी हैं इसलिये वें हीं अपनी पसंद और नापसंद रख सकते हैं। हमारी पसंद और नापसंद उनकी इच्छानुसार होनी चाहिये। उदाहरण के लिये वे ज्ञानी को पसंद करते हैं – वे जो बहुत शिक्षित हैं और भगवान के प्रति समर्पित हैं जैसे कि भगवान ने गीता में घोषणा किये हैं। वें उनको नापसंद करते हैं जो उनके शास्त्रानुसार दी गई आज्ञाओं का पालन नहीं करते हैं और अधर्म का पालन करते हैं। हमें हमारे जीवन को ऐसी राहमें अग्रसर करना हैं जहाँ हम ज्ञानियों की सेवा कर सकें और स्वयं को अधर्म में व्यस्त होने से बचना चाहिये।
  • हमारे नित्य स्वामी जो हमें सच्चा ज्ञान देते हैं और जो हमें मोक्ष का आर्शिवाद प्रादन करते हैं – इनमें विश्वास न करना बाधा है। आचार्य वे हैं जो जिज्ञासुओं को सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। भगवान स्वयं आचार्य रूप में हैं और हमें स्वीकार करते हैं। इसलिये वें नित्य स्वामी है और जो मोक्ष प्रदान करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम भगवान को मुकुन्द बुलाते हैं – वह जो मोक्ष देता हैं। मोक्ष यानि परमपदधाम में नित्य कैंकर्य। ऐसे मोक्ष के लिये हम में चित्त, अचित और भगवान (तत्वत्रय) का सच्चा ज्ञान होना चाहिये। ऐसा ज्ञान आचार्य हीं शिष्य को प्रदान करते हैं। एक बार सच्चा ज्ञान मिल जाता हैं स्वाभाविक रूप से हमें इस दास रूपी जीवन से मुक्ति पाने कि इच्छा होती है और परमपद में भगवान का शाश्वत कैंकर्य की लालसा होती है। संसार से ऐसी राहत और शाश्वत कैंकर्य का आर्शिवाद भगवान से प्राप्त होता है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४२)

७३) पुम्स्त्व विरोधी – पौरुष विरोधी

श्रीराम – मर्यादा पुरुषोत्तम – आदर्श श्रेष्ठ पुरुष माता सीता और लक्ष्मणजी सहित – श्रीपेरूम्बूतूर

पुम्स्त्वम का अर्थ पौरुष / पुरुषार्थ – पुरुष होना है। दिव्य प्रबन्ध के व्याख्यानों में किसी के शारीरिक स्थिति को देखकर, पुरुषों को “मोवायेलुन्तार” कहते हैं – जिसके ऊँची ठोड़ी है या जबड़े के नीचले भाग जहाँ दाढ़ी होती है और नारी को “मुलैयेलुंतार” कहते हैं – जिसके ऊँचे स्तन हो। यह तो दैहिक / बाहरी विशेष लक्षण हैं जो उसके पूर्व कर्म का फल है। जैसे भगवद गीता में समझाया गया है कि “उत्तम: पुरुष:” – श्रेष्ठ पुरुष जो भगवान हैं वो हीं सर्वोच्च पुरुष हैं। जैसे प्रमाण में समझाया गया हैं कि “स्त्री प्रायम इतरम जगत” – इस ब्रह्माण्ड में बाकी सभी स्त्री वर्ग में हैं दैहिक (नर/मादा) कोई भी स्वरूप क्यों न हो। स्त्री के मुख्य पहलू में पूर्ण रूप से आश्रित, आज्ञाकारी, लज्जा, आदि शामिल हैं। जीवात्मा भी आंतरिक रूप से परमात्मा पर आश्रित है। अब इसकी व्याख्या देखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: प्रणवम में भगवान को “अ” ऐसे दर्शाया गया हैं। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने अष्ट श्लोकी (आठ अत्कृष्ठ और सुन्दर श्लोकों की रचना जिसमें रहस्यत्रय [तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक] के अर्थो को बताया गया है) का प्रारम्भ  ऐसे किया है “अकारार्थों विष्णु:” “अकारम” भगवान है ऐसे गुंजता हैं। अकारम का एक मुख्य स्पष्टीकरण है रक्षकत्वम। रक्षकत्वम का अर्थ अनचाहे पहलुओं को निकालकर इच्छित पहलुओं को प्रस्तुत करना। केवल भगवान श्रीमन्नारायण हीं सर्वश्रेष्ठ स्वतन्त्र पुरुष है और अन्य सभी पूर्णत: उनपर निर्भर हैं। हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन की एक अद्भुत घटना को स्मरण कर सकते हैं। श्रीपेरियवाचान पिल्लै इस घटना को तिरुनेडुंताण्डगम के तीसरे पाशुर के व्याख्या में दर्शाते हैं। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी क्षीरसागर के मंथन की घटना के विषय में बताते हैं। वें समझाते है कि जब श्रीमहालक्ष्मीजी क्षीरसागर से प्रगट होती हैं वे सीधे भगवान श्रीमन्नारायण के पास जाकर उनके वक्षस्थल पर जाती है जो उनका स्थायी निवास है और उन्हें अपने पति रूप में स्वीकार करती हैं। इस समय श्रीवेदांति स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी से पूंछते हैं कि “वहाँ कई देवता मौजूद थे – एक नारी होते हुए वे एक पुरुष के निकट सबके सामने पहुँचने में शर्म नहीं आयी?”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बड़ी चतुराई से उत्तर देते हैं कि “जब पति के साथ सगाई होती है तो क्या पत्नी को अपनी सहेलियाँ जो अपने संग वस्तु, तोफे, आदि को देखकर शर्माती है?”। इसका अर्थ हुआ सभी जीवात्मा जो वहाँ पर उपस्थित थे सभी स्त्री स्वभाव के हैं हालाँकि वे दैहिक रूप से पुरुष रूप में हैं। इस तरह सर्वोच्च स्वतन्त्रता का पहलू पुरुषार्थ से जुड़ा हुआ है और अन्य सब इसके विपरीत नारीत्व वाले हैं।

  • सर्वश्रेष्ठ भगवान जो गरुड वाहन और पुरुषोत्तम है उनके बदले में स्वयं को पुरुष मानना बाधा है। पुरुषोत्तम हीं एक मात्र व्यक्ति हैं जो पुरुष कहलाने के योग्य है। अन्य सभी जीवात्मा स्त्री वर्ग में हैं। स्वयं को पुरुष का स्वरूप होने से पुरुष मानना अज्ञानता है। यह भी एक गलती है। अनुवादक टिप्पणी: सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा को गरुड वाहनत्वम कहना उनके प्रमुख गुणों को दर्शाता है। गरुड को वेदात्मा कहते है – वह जो वेद की आत्मा है। भगवान गरुडजी की सवारी करना और गरुडजी उँगली कि नोक भगवान कि ओर करना यह भगवान श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता का संकेत है। और श्रीमन्नारायण को पुरुषोत्तम भी कहते हैं – पुरुषों में श्रेष्ठ। इसलिये पुरुषार्थ केवल भगवान श्रीमन्नारायण के साथ जुड़ा हैं।
  • देवताओं को जैसे ब्रह्म, रुद्र, आदि को उनके पुरुष स्वरूप होने के कारण पुरुष मानना बाधा है। जैसे पहिले समझाया गया है कि यह तत्व देवताओं पर भी लागू है। जब पुरुषोत्तम से तुलना करते हैं तो सभी अन्य देवता नारी प्रतिरूप है, हालांकि वे दैहिक रूप से पुरुष हैं। इसके विपरीत समझना अज्ञानता है।
  • हममें जो नारीत्व के लक्षण हैं वे स्वाभाविक जय जो कि भगवान के पुरुषार्थ के लक्षण के प्रतिरूप है। इसे न मानना बाधा है। हमारा स्वाभाविक गुण है भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना और उनकी सम्पूर्ण स्वतन्त्रता को संतुष्ट करते हैं।
  • पुरुष देह जो हमें प्राप्त हुआ है वह हमारे कर्म के आधार पर प्राप्त हुआ है और अस्थाई है। यह न जानना बाधा है। पुरुष रूपी जो बाहरी दिखावट है वह हमारे पूर्व कर्मो के आधार पर प्राप्त है। हमें यह जानना जरूरी हैं कि हमारे पूर्व कर्मों के आधार पर हम भिन्न भिन्न दैहिक रूप प्राप्त करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण इस शारीरिक बदलाव के सिद्धान्त को विस्तार रूप से समझाते है। वे समझाते हैं कि जैसे कपड़ा पुराना होने पर बेकार हो जाता है और उसके स्थान पर नया कपड़ा लाते हैं वैसे ही जब जीवात्मा के लिये एक शरीर निष्प्रयोजन हो जाता है वह शरीर का त्याग कर देता है और एक नया शरीर प्राप्त करता हैं। एक और उदाहरण के साथ समझाते हैं – जैसे आत्मा एक नन्हें बच्चे के शरीर में, एक किशोर के शरीर में, एक युवा और एक वृद्ध के शरीर में वास करके जब उस विशिष्ट देह के कर्म समाप्त हो जाते हैं तो आत्मा वह देह को त्यागकर नये देह में प्रवेश करती है। इस तरह हम बहुत सरलता से समझ सकते हैं कि हम प्रत्येक जीवन के पश्चात नया देह प्राप्त करते है और प्रत्येक ऐसे देह अस्थाई हैं।
  • यह न जानना कि पुरुष और स्त्री का देह जिसे अनादिकाल से प्राप्त करते हैं यह नश्वर है – बाधा है। अनन्त काल से हम इस संसार में हैं और कर्मों के फल स्वरूप भिन्न भिन्न देह प्राप्त करते रहे है। इसलिये यह कुछ भी शाश्वत नहीं है। यह सुस्पष्ट है।
  • भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना यह जीवात्मा का शाश्वत गुण है। इसे न जानना बाधा है। भगवद पारतंत्रयम यह जीवात्मा का शाश्वत व मूल भूत गुण है। पारतंत्रयम का अर्थ भगवान के पूर्णत: नियन्त्रण में रहना। अनुवादक टिप्पणी: हमने पहले प्रमाणों में देखा है “स्वत्वम आत्मनि संजातम स्वामित्वम ब्राह्मणी स्तिथम” – जीवात्मा का स्वभाव भगवान की संपत्ति होना है और भगवान के गुण स्वामी के हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि जीवात्मा का स्वभाव भगवान के आश्रित बनकर रहना है।
  • स्वतन्त्रता की झलक पाना और दैहिक स्वरूप पुरुष का होने के कारण स्वयं को समझना यह जानते हुये भी कि हम पूर्णत: भगवान के आश्रित हैं – बाधा है। एक बार यदि हम पारतंत्रीयम (सम्पूर्ण आश्रित) का सही ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो स्वयं को पुरुष मानने का कोइ प्रश्न ही नहीं उठता है चाहे स्वतन्त्रता की झलक ही क्यों न हो जो पुरुष में स्वाभाविक गुण है। अनुवादक टिप्पणी: मूलभूत विषय देहात्मा अभिमानम (आत्मा और शरीर को एक समझना)। इतने कालक्षेप सुनने के पश्चात और इस सिद्धान्त को समान जानकर भी हम आत्मा और शरीर के विषय में भ्रमित हैं। इस महत्त्वपूर्ण मूलभूत अन्तर को समझने के लिये निरन्तर ध्यान मग्न होकर इसे अपने दैनंदिन जीवनी में लागू करने की कोशिश करना चाहिये।
  • स्वयं को स्त्री गुण वाला समझकर भगवान पर पूर्णत: आश्रित रहना और अन्य नारीत्व के सुखों को पाने की इच्छा रखना बाधा है। स्वयं को स्त्री समझने के पश्चात जो भगवान पर आश्रित है स्वयं के दूसरी नारीत्व का आनन्द की इच्छा सिर्फ अज्ञानता (स्वयं को देह के साथ जोड़ना आत्मा के साथ नहीं) है। यह सही नहीं हैं। हमें श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०१वें सूत्र को इस सन्दर्भ में स्मरण करना चाहिये “विहित विषया निवृत्ति तननेररम”। अनुवादक टिप्पणी: ९९, १०० और १०१वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इंद्रिय, सुख और अन्य के सभी इंद्रियों का नियंत्रण से अलग करने के पहलू के विषय में चर्चा करते हैं। पहिले उन्होंने कहा है कि इस भौतिक सुख को अलग रखना यह आध्यात्मिक उत्थान के लिये मूलभूत योग्यता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रमाणों के भावपूर्ण सम्बन्धों को समझाते हैं। ९९वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि जो मनुष्य भौतिक सम्पत्ति, आदि की चाहना रखता है, जो भक्ति योग में व्यस्त रहता है और अन्त में प्रपन्नों के लिये यह अलग रखना आवश्यक है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि यदि कोई मनुष्य बहुत अधिक भौतिक सम्पत्ति की चाहना रखता है और उसे पाने की प्रक्रिया में उसे अपने इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखना जरूरी है। उपासक और प्रपन्न में स्पष्ट रूप से अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है और वे भौतिक आनन्द से पूर्णत: भिन्न हैं। १००वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है कि प्रपन्नों के ३ वर्गों में इंद्रियों पर नियंत्रण अति मुख्य है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बहुत सुन्दर और स्पष्टता पोरवाक दर्शाते हैं कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी प्रपन्नों के अन्य २ वर्ग कोनिर्लिप्ता के महत्त्व को समझाने के लिये शामिल किया है। १०१वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं कि जिसे भौतिक सम्पत्ति कि आस है और उपासकों को शास्त्र में वर्जित चीजों से स्वयं को अलग रखना चाहिये। प्रपन्नों के लिये तो जो शास्त्रों में मान्यता प्राप्त को भी अलग रखना चाहिये क्योंकि वह स्वरूप विरोधी (जीवात्मा के स्वरूप के विपरीत) है। शादी की परिधी में इंद्रियों के सुख की शास्त्र में मान्यता है हालांकि कई शर्तें हैं जैसे कि कब और कैसे शारीरिक सम्बन्ध होना चाहिये। यहाँ प्रपन्नों के लिये श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते हैं कि हमें अपनी पत्नी के प्रति भी वियोग होना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों में इस विषय को बहुत ही अद्भुत तरीके से विस्तृत रूप से समझाते है। आचार्य के मार्ग दर्शन में इसे सुनना अती उत्तम है। किसी की स्पष्ट समझ कि वह स्वयं एक नारी होने से स्वाभाविक रूप से भगवान का दास है और इसलिये उसे दूसरी नारी के प्रति दासता की चाह नहीं रखनी चाहिये चाहे वह शादी के सिलसीले में ही क्यों न हो।
  • भगवान के सन्दर्भ में हम सब स्त्री है और यह न समझना बाधा है। हमें यह जानना चाहिये कि परमपुरुष के दृष्टी से देखेंगे तो सभी जीवात्मा स्वभाव से नारी हैं।
  • स्वयं कि पत्नी के साथ जिसे भगवद और भागवतों के सेवा हेतु स्वीकार किया है के साथ दास बनकर बाधा है। गृहस्थाश्रम – पत्नी के साथ रहना। जैसे श्रीरामायण में कहा गया है “सहपत्न्या विशालाक्षया नारायणमुपाकमत” श्रीराम स्वयं माता सीता से विवाह कर श्रीरंगनाथ भगवान की सेवा किये। यही गृहस्थाश्रम का धर्म हैं। हालाँकि यह पति पत्नी का सम्बन्ध हैं परन्तु भगवान के सन्मुख आने पर दोनों नारीत्व में आजाते है और दोनों भगवान के हीं दास हैं। अनुवादक टिप्पणी: ४ आश्रमों में (ब्रह्मचार्या, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थान और सन्यासाश्रम) गृहस्थाश्रम दूसरों कि सेवा करने पर पूर्णत: केन्द्रित करता हैं। ब्रह्माचार्या के समय वह अध्ययन पर केन्द्रित होता है और कमाने का कोई साधन नहीं होता हैं। वानप्रस्थ जो जंगलों में निवास करता है और ध्यान में अपना समय केन्द्रित रखता है। सन्यासी ज्ञान बाँटने व सिखाने का कार्य करता है और धन संग्रह नही कर सकता है। केवल गृहस्थ ही धन ब्रह्मचारी और सन्यासी के कैंकर्य हेतु कमा सकता हैं। यात्रीगण भी स्थानीय गृहस्थों पर यात्रा के समय आश्रित रहते हैं। अत: गृहस्थाश्रम पूर्णत: भगवान और भागवतों पर पूर्णत: केन्द्रित होते हैं। इसलिये स्वयं की पत्नी के साथ इंद्रियों के सुख के बदले भगवान और श्रीवैष्णवों के कैंकर्य में पूर्ण ध्यान देना चाहिये।
  • स्वयं को पूरुष दास मानना बाधा है। यह पहिले ही समझाया गया है कि स्वयं को पूरुष नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें भगवान और भागवतों का स्त्री रूप में दास समझना चाहिये।
  • यह ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अपनी पत्नी के साथ शयन करने के बजाय अपने साथ शारीरिक रूप से व्यस्त रहने की कोशिश करना उसके लापरवाह स्वभाव के कारण है यह बाधा है। जैसे पत्नी स्वयं को पती को समर्पित करती है वैसे हीं हमें स्वयं को भगवान को समर्पित करना चाहिये। हमारा पूरुष का देह हो तो भी हमें स्वयं को स्वतन्त्र नहीं समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह किसी के सही गुणों को जानना महत्वपूर्ण है। हमें उस स्थिति तक पहूंचना चाहिये कि अगर कोई अपनी पत्नी के साथ शयन कर रहा है तो उसे एक स्त्री दूसरे स्त्री के साथ शयन कर रही है जहां कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं हैं ऐसा महसूस होना चाहिये। किसी को स्वयं कि पत्नी के साथ भी काम भावना नहीं रहना है और यहाँ तक कि करीबी सहवास में भी ऐसे विचारों से दूर रहते हैं। विशेषकर ब्रह्म के विषय में और रागम (इंद्रियों के सुखों के लिये लगाव) – या कोई एक की उपस्थिती में नर और मादा एक दूसरे के शारीरिक सम्बन्धों में व्यस्त हो जाते हैं।
  • आल्वारों का जन्म पूरुष रूप में हुआ था फिर भी वें नारी मनो दशा में रहकर और भगवान के दिव्य स्वरूपों की लालसा करते थे। यह पाशुरों का अध्ययन करने और उनके अर्थों को समझने के पश्चात और अपने पुराने अनुभावों से मतिभ्रम हो कर, शारीरिक सम्बन्धों से लगाव होना और ऐसे शारीरिक सुख की चाह करना सब बाधा है। आलवारों में विशेषकर श्रीशठकोप स्वामीजी और श्रीपरकाल स्वामीजी ने स्त्री भावना में भगवान के दिव्य रूप पर कई पाशुरों की रचना किये हैं। उन्होंने अपने बिछुड़ने के वियोग के दर्द को इन पाशुरों में भरा है। इन पाशुरों के शब्दार्थ और गूढ़ार्थ को सुनने के पश्चात हमें फिर यह नहीं सोचना चाहिये कि “मैं पुरुष हूँ” और इसी तरह इंद्रियों सुखो की लालसा करना जिसे हमें त्यागना चाहिये। श्रीपरकाल स्वामीजी द्वारा रचित तिरूमोही के पाशुर में कहा गया है “आविये अमुधे एन निनैन्तुरुगी अवरवर पणैमुलै तुणैया पावीयेणुणरातु एत्तनै पगलूम पलुतु पोयोलिन्तन नालगल” – मैं पापी हूँ क्योंकि मैं बिना समझे सिर्फ औरतों के विषय में जिनके उभरे हुये स्तन हैं जिन्हें मेरी जिंदगी! मेरी अमृत! आदि कह कर मेरी जिन्दगी के कई दिनों को बर्बाद कर चुका हूँ। फिर वें ज़ोर देकर कहते हैं कि श्रीमन्नारायण की कृपा से ऐसी दयनीय स्थिति से छुटकारा मिल गया है।
  • आस्तिक – नास्तिक बनकर रहना और आचार्य द्वारा त्याग होना बाधा है। सामान्यतया आस्तिक व नास्तिक वह है जिसने भगवान के अस्तित्व को तो माना है परन्तु पूर्ण विश्वास नहीं है और कोई किसी सिद्धान्त का पालन नहीं करता है। अधिक समझने हेतु हमें उपदेश रत्नमाला के ६८वें पाशुर को देखना चाहिये “नास्तिकरूम नर्क्कलैयिन् नन्नेरिशेरास्तिकरुम् आस्तिकनास्तिकरूमामिवरै ओर्त्तु नेञ्जे! मुन्नवरूम पिन्नवरूम मूर्खरेन विट्टु नडुच्चोन्नवरै नालुम तोड़र्”। नुवादक टिप्पणी: आस्तिक का अर्थ वह जो वेद शास्त्र को प्रमाण रूप में स्वीकार करता हैं। शास्त्र प्रमाण है जिसके जरिये हम हम भगवान को समझ सकते हैं जो प्रमेय हैं। यहाँ वेद शास्त्र में उपनिषद, स्मृति, इतिहास, पुराण, पांचरात्रम, आदि शामिल हैं। दिव्य प्रबन्ध, पूर्वाचार्य के स्तोत्र और व्याख्या को  हमारे आचार्यो द्वारा बहुत आदर सम्मान किया गया है क्योंकि वे हमें शास्त्रों का सार दिखाते हैं। नास्तिक आस्तिक के विपरीत है। जिसका अर्थ वह जो वेद शास्त्रों को प्रमाण रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। तीसरा वर्ग हैं आस्तिक-नास्तिक। आस्तिक-नास्तिक यानि वह जो वेद शास्त्रों को प्रमाण की तरह स्वीकार करता हैं परन्तु जब स्वयं के जीवन में उतारना होता हैं तब अनादर करता हैं। इन पाशुर के व्याख्यानों में श्रीपिल्लै लोकम जीयर विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शब्दों को समझाते हैं। इस पाशुर में सबसे मुख्य पहलू है – यह पाशुर आचार्य की पूर्ण शरणागति एक विषय पर केन्द्रित होता है। इस सन्दर्भ मे आस्तिक, नास्तिक और आस्तिक-नास्तिक के उच्चतम पहलू को समझना है यानि क्रमश: से आचार्य के पूर्ण शरण होना, स्वयं के आचार्य के प्रति पूर्ण विश्वास न होना और विश्वास होना पर उनके मार्ग पर न चलना। अगर आचार्य आस्तिक-नास्तिक के कारण अपने शिष्य पर अपनी निर्हेतुक कृपा न करें तो उस शिष्य को दूसरी कोई आशा बाहीं है। ज्ञान और अनुष्ठान दो मुख्य पहलू हैं। उपदेश रत्नमाला प्रबन्ध में स्वयं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आचार्य के इन दो महत्त्वपूर्ण गुणों को दर्शाते हैं। यह सभी श्रीवैष्णवों के लिये लागू होता है।
  • विद्वानों और बड़ों के द्वारा दोषी ठहराना क्योंकि वे सारम और असारम पहलू में भेद नहीं बताते हैं बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य के शरण होने का कारण है उनसे विवेक ज्ञान (सार और बाहरी विषयों में भेद की क्षमता) प्राप्त करना है। हंस को विशेषकर उसके दूध और जल को अलग करने कि योग्यता के लिये स्तुति करते हैं। हमारे पूर्वाचार्यों को भी हंस की तरह स्तुति करते हैं क्योंकि शास्त्रानुसार सार विषय को दर्शाना और बाहरी विषयों को निकाल बाहर फेंकने में समर्थ हैं। हमारे पूर्वाचार्यों के पदचिन्हों पर चलकर विद्वानों से ज्ञान प्राप्त कर हमें सार और बाहरी विषयों में भेद समझने की योग्यता को विकसित करना चाहिये। जो सार हैं उसे बचा कर रखना और जो बाहरी पहलू का त्याग करना चाहिये। ऐसे न करना और बाहरी विषयों के पहलू मे लगे रहे तो विद्वानों द्वारा निन्दा होगी। उदाहरण के लिये विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भी अगर कोई सांसारीक सुख, आदि रखता हैं और आध्यात्मिक उत्थान पर ध्यान केन्द्रित नहीं करता हैं तो विद्वान ऐसों कि निन्दा कर दोषी मानते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४२

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४१)

७२) तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – 3

भगवान श्रीमन्नारायण श्रीमहालक्ष्मी, भूदेवी, नीलादेवी और नित्यसूरियों के संग – श्रीवैकुण्ठ

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पिछले अध्याय से तत्व विरोधी विषय पर आगे चर्चा करेंगे। ऐसे अनेक विषयों को जानने के लिये गहरा ज्ञान होना आवश्यक है जो शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होता है। इसे पूर्ण समझने के लिये इन तत्वों को आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।

  • चित्त और अचित्त जो भगवान के लिये शरीर है, चित्त को देह, इंद्रियाँ, आदि मानना बाधा है। जैसे श्रुति में कहा गया है “जीवध्वारा अनुप्रविष्य” (जीवात्मा द्वारा प्रवेश करना), भगवान अचित्त (अनगिनत निर्विकार पदार्थ) में जीवात्मा के द्वारा प्रवेश करते हैं। जैसे कि कहा गया है “देहेंद्रिय मन: प्राणधिभ्यों अन्य:” – जीवात्मा देह, इंद्रियाँ, मन, प्राण, बुद्धी, आदि से भिन्न हैं, यह सामान्य ज्ञान है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ से प्रारम्भ करते हैं कि जीवात्मा तत्वम का यहाँ पर विस्तृत वर्णन किया गया है। तत्वत्रय में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी चित्त प्रकरणम विषय को विस्तार से समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्या से इस विषय को हम स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। ६ठें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी आत्मा और देह, आदि में बहुत भेदों को समझाते हैं। मुख्य रूप से आत्मा को “मैं” और देह, आदि को “मेरा” ऐसा देखा गया हैं। आत्मा स्वयं के लिये निरन्तर एक वचन महसूस करता हैं (“मैं” – केवल एक) परन्तु स्वयं के देह, आदि के लिये वह अनेक महसूस करता हैं (जैसे शरीर, इंद्रियाँ, मन, आदि)। इससे हम समझ सकते हैं कि देह, आदि से आत्मा भिन्न हैं। ७वें सूत्र में वें एक मुख्य पहलू को दर्शाते है। यहाँ तक की बुद्धिमत्ता पूर्ण दलीलों से इन्हें भी नकार देते हैं, शास्त्रानुसार हमें यह समझना चाहिये कि आत्मा देह, आदि से भिन्न है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वें कहते हैं कि इस सिद्धान्त को नकारना बहुत कठीन है – फिर भी यदि कोई अधिक बुद्धिमान हो ओर ऐसी दलील प्रस्तुत करता हैं जो मैं और मेरा मे जो अन्तर है उसे नकारते हैं परन्तु शास्त्रों द्वारा इसे सरलता पूर्वक प्रमाणित कर सकते हैं कि आत्मा और देह, आदि भिन्न हैं। वें अपने व्याख्या में इस विषय में कई प्रमाण देकर इसे स्थापित करते हैं। अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बहुत ही विश्वास पूर्वक शास्त्रों के आधार पर प्रमाणित करते हैं कि आत्मा के स्पष्ट लक्षणों को कोई भी बुद्दिमत्ता पूर्ण दलील से नकार नहीं सकते हैं।
  • आत्मा केवल ज्ञान है यह समझना और आत्मा का ज्ञान प्रासंगिक संकलन है यह जानकार हैरान होना बाधा है। यह शास्त्र से जाना गया है कि आत्मा ज्ञान स्वरूप है। परन्तु आत्मा को हमेशा ज्ञान का घर मानना चाहिये। आत्मा दोनों ज्ञान और ज्ञानगुणकन (जिसे ज्ञान है) है। अनुवादक टिप्पणी: ज्ञान दो प्रकार के हैं। धर्मी ज्ञान (आत्मा स्वयं ज्ञान है) और धर्म भूत ज्ञान (आत्मा ज्ञान का घर है) हैं। धर्मी ज्ञान वह ज्ञान है जो निरन्तर अपनी मौजूदगी का स्मरण करता है। धर्म भूत ज्ञान वह है जिसके द्वारा हम बाहरी पहलूओं को समझ सकते है। कुछ तर्क शास्त्र जैसे बौद्ध शास्त्र हैं जहाँ आत्मा को केवल ज्ञान ऐसा समझाया गया है और अन्य विशेषताओं को नकारा गया हैं। परन्तु ऐसे तत्व शास्त्र के विपरीत हैं जो आत्मा हीं ज्ञान ऐसा समझाता हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस सिद्धान्त को तत्वत्रय के २६, २७ और २८ सूत्र में समझाते हैं। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुन्दर व्याख्या से समझेंगे। २६वें सूत्र में वें कहते है कि आत्मा ज्ञान का घर हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे एक सुन्दर उदाहरण के साथ समझाते है। जैसे दीप (ज्योति) और प्रभा (प्रकाश) दोनों दीपक के अंग है, दीप प्रकाश का घर हैं। इसी तरह धर्मी ज्ञान और धर्म भूत ज्ञान दोनों ज्ञान हैं, धर्मी ज्ञान (आत्मा) धर्म भूत ज्ञान का घर हैं। वें कई प्रमाणों के साथ बताते हैं कि आत्मा भी ज्ञान का घर है। २७वें और २८वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है “आदि आत्मा केवल ज्ञान है और ज्ञान का घर नहीं है तब हमें कहना चाहिये कि मैं ज्ञान हूँ और न कि मैं जानता हूँ”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है “किसी के बारें में जानना” यह इशारा करता है कि उसे ज्ञान है और इसे प्रत्यक्ष से हीं समझ सकते हैं। वें श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को भी इसी तत्व को स्थापित करने को कहते हैं।
  • स्वाभाविक रूप से निर्भर जीवात्मा को स्वतन्त्र समझना बाधा है। हालाँकि ज्ञान हैं और ज्ञान होना जीवात्मा का स्वभाव है, भगवद शेषत्वम और पारतंत्रयम जीवात्मा के गोपनिय पहलू है। जीवात्मा का स्वयं को स्वतन्त्र समझना सबसे बड़ा पाप है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में समझाया गया है कि सबसे बड़ी चोरी/पाप स्वयं (आत्मा) को स्वतन्त्र मानना और उसके अनुसार कार्य करना – इसे श्रीमहाभारत में ऐसे समझाया गया है “किम तेन न कृतम पापं चोरेण आत्मापहारिणा” – वह जो आत्मा को स्वयं कि सम्पत्ति मानता है वह सभी प्रकार के पाप किया है ऐसा मानना है। स्वयं के बारें में सच्चा ज्ञान का अर्थ समझना यानि स्वयं को जीवात्मा मानना जो भगवान का शेष है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के “अडियेन उल्लान” [8.8.2] पाशुर में अपने पूर्वाचार्य के जीवन कि घटना से समझाया है। श्रीरामानुज स्वामीजी के कालक्षेप गोष्टी में संदेह उत्पन्न होता है – जीवात्मा का मुख्य गुण क्या हैं? क्या वह ज्ञान है या भगवान का दास होना है। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी को इसका उत्तर प्राप्त करने हेतु श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के पास भेजते है। श्रीकुरेश स्वामीजी ६ महिने तक श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कि सेवा करते है और जब अन्त में जब श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी उनके आने का कारण पूछते हैं तो श्रीकुरेश स्वामीजी उन्हें प्रश्न पूछते हैं। उसके लिये श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कहते है “क्योंकि आल्वार कहते है आडियेन उल्लान, जहाँ अड़िएन जीवात्मा को संभोधित करता है और शेषत्वम जीवात्मा का मुख्य गुण हैं”। “अड़िएन” भगवान की दासता को संभोधित करता है – इसलिये श्रीशठकोप स्वामीजी (जिन्हें भगवान ने दिव्य ज्ञान प्रदान किया)  जीवात्मा के सच्चे पहचान को स्थापित करते हैं।
  • जीवात्मा जो भगवान का दास है उसे अन्य किसी का भी दास मानना बाधा है। जीवात्मा स्वभाव से भगवान का हीं दास है। स्वयं को दूसरे का दास मानना बाधा है। यहाँ अन्य का अर्थ अम्माजी या परम भागवत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: केवल भगवान हीं स्वामी हैं अन्य सभी उनके दास है। देवतान्तर का अर्थ अन्य देवता गण। ब्रह्माजी से प्रारम्भ कर इस लौकिक संसार में कई देवता है। यह देवतागण हमारे जैसे जन्म मरण के चक्र में बंधे हुए हैं। परन्तु कुछ पुण्य कर्म के कारण जीवात्मा देवता के जैसे उच्च स्थान पाते हैं। फिर भगवान कृष्ण गीताजी के ८.१६ श्लोक में कहते “आब्रह्माभुवनाल्लोका: …” – ब्रह्म लोक से – सबसे उच्च स्थान से नीचे के स्थान तक निरन्तर जन्म मरण हैं। इसलिये मुमुक्षुओं (जो मोक्ष कि इच्छा करते है) के लिये यह उपदेश किया गया है कि वें केवल भगवान कि पूजा सेवा करें नाकि देवताओं की करें। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी विस्तार से समझाते हैं जब “उ” कार प्रणवम के विषय में समझाते हैं। उकारम स्पष्ट रूप से ज़ोर देकर समझाता है कि जीवात्मा भगवान का एक मात्र दास है। यहाँ ६१वें सूत्र में दूसरों के प्रति दासता को हटा देने का महत्त्व को समझाते हैं। ६२वें सूत्र में वें उदाहरण के साथ समझाते हैं। वें कहते है जीवात्मा का दूसरों के प्रति दासता उसी प्रकार है जिस प्रकार हम यज्ञ आदि में जो कुछ देवताओं को अर्पण करते हैं उसे एक कुत्ते को देते हैं (जिसे देखना भी नहीं और छूना भी नहीं चाहिये)। ६३वें सूत्र में वे कहते हैं कि भगवान के प्रति दासता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं अन्यों के प्रति दासता को दूर करना। ६४वें सूत्र में वें श्रीपरकाल स्वामीजी के नान्मुगन तिरुवन्दादि के ६८वें पाशुर को दर्शाते है कि श्रीवैष्णव कभी भी देवतान्तर की पूजा नहीं करेंगे – “तिरुवडि तन नामम मरन्दुम पुरम तोला मान्दर” – श्रीवैष्णव वें है जो भगवान का नाम भूल सकते हैं परन्तु कभी भी भगवान छोड़ अन्य कि पूजा नहीं करेंगे। अन्त में ६५वें सूत्र में वें कहते हैं कि यह उकारम यह स्थापित करता है कि जीवात्मा स्वयं या किसी का भी दास नहीं है – वह केवल भगवान का दास है। यहाँ अम्माजी और और भागवत जन भगवान के शरण होने के कारण स्वाभाविक स्वामी है। जो भी पूर्णत: भगवान का शरण हुआ है उसे हमारा स्वामी मानना चाहिये।
  • यह न जानना कि जीवात्मा दिव्य युगल जोड़ी का दास नहीं है बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान श्रीमन्नारायण कि मुख्य पत्नी हैं। मिथुनम – युगल जोड़ी। यहाँ भगवान और अम्माजी दिव्य युगल जोड़ी हैं। अनुवादक टिप्पणी: रहस्यत्रयम में पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि अधिक स्तुति करते है। यह इसलिये कि श्रीमहालक्ष्मीजी कि भूमिका स्पष्टता से दर्शाई गयी हैं। द्वय मन्त्र के पहिले खण्ड में श्रीमहालक्ष्मीजी को पुरुषकार भूताई (प्रशंसा करनेवाले अधिकारी) ऐसे समझाया गया है, जो यह सुनिश्चित करती है कि भगवान शरण में आये जीवात्मा को स्वीकार करते हैं। दूसरे खण्ड में यह समझाया गया हैं कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण और माता महालक्ष्मीजी दोनों कि ओर कैंकर्य करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के १६६ सूत्र में यह समझाते हैं कि जब भगवान हीं उपाय हैं तब माता पहिले खण्ड में पुरुषकार हो जाती है और जब भगवान प्राप्यम (लक्ष्य) हैं तब माता दोनों लक्ष्य और जीवात्मा द्वारा की जानेवाले कैंकर्य को बढ़ावा देनेवाली होती हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि जब जीवात्मा उनके प्रति कैंकर्य करता है तब अम्माजी इसे भगवान के समक्ष कई गुणा बढ़ाकर दिखाती है और भगवान का अधिक मुखोल्लास करती हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी १६८वें सूत्र में आगे समझाते हैं कि श्रीलक्ष्मणजी माता सीता और श्रीरामजी का एक साथ कैंकर्य करते हैं। १६९वें सूत्र में वें कहते है ऐसा कैंकर्य होता हैं और आनन्ददायक होता है जब भगवान और अम्माजी साथ में होते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि कैसे श्रीलक्ष्मणजी श्रीरामजी की शरणागति माता सीता के पुरुषकार के द्वारा किये और कैसे श्रीलक्ष्मणजी ने दोनों की सेवा किये। वें एक व्यवहारिक उदाहरण के साथ समझाते हैं – जब एक पुत्र अपने माता पिता दोनों की एक साथ सेवा करता हैं तो वह योग्य है – उसी तरह जीवात्मा दिव्य माता पिता कि सेवा करता है तो वह उसके स्वभाव के लिये अधिक योग्य हैं।
  • जीवात्मा भगवान के भक्तों का दास है यह न समझना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का स्वाभाविक गुण है भगवद दास और पूर्णत: भगवान के आधिन होकर रहना हैं। इससे भी अधिक महत्व – स्वरूप यातात्मयम (सच्चे स्वभाव का तत्व) – भागवत शेषत्वम (भागवतों का दास बनकर रहना)। पेरिया तिरुमोली में श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमन्त्र का तत्व स्वयं भगवान को घोषित किया “निन तिरुवेट्टेळुत्तुम कट्रु नान उट्रदुम् उन्नडियार्क्कडिमै कण्णपुरत्तुरैयम्माने” (तिरुक्कण्णपुरम के प्रिय नाथ! तिरुमन्त्र के तत्व को सिखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं दासों का दास हूँ)। श्रीपरकाल स्वामीजी नान्मुगन तिरुवन्दादि के १८वें पाशुर में दर्शाते हैं कि “एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मट्रवरैच् चार्त्ति इरुप्पार तवम” (भक्तों के प्रति भक्ति भगवान कि भक्ति से भी अधिक महान है)। एत्तियिरुप्पवर – भगवद शेष भूतर – वह जो भगवान के शरण हुआ हो। ऐसे जन जो भगवान के शरण हुये हैं वें अधिक महान हैं। श्रीरामायण में श्रीलक्ष्मणजी और श्रीभरतजी दोनों श्रीराम के शरण हुये थे। श्रीशत्रुघनजी के लिए श्रीभरतजी ही सबकुछ थे। श्रीरामायण में कहा गया हैं कि “शत्रुघनो नित्याशत्रुघन:” (वह जिसने नित्य बाधा को जीता है)। हमारे पूर्वाचार्यों ने समझाया हैं कि “श्रीशत्रुघनजी श्रीरामजी के सुन्दरता और दिव्य गुणों को जीता या अनदेखा कर दिये और श्रीभरतजी कि सेवा किये”। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अवनडियार सिरुमामनीसराय एन्नईयाण्डार”। सिरुमामनीसर – वह जो भगवान की पूर्णत: शरणागति किये हैं जो दीखने में छोटे परन्तु ज्ञान और कार्य प्रणाली में महान हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसे भक्तों को स्वामी ऐसे घोषित करते हैं। जब ऐसे भक्त गण यहाँ विराजमान रहते हैं तो उन्हे अनदेखा कर, कैसे कोई भगवान के चरण कमलों की सेवा कर सकता हैं? जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के लिये भागवत कैंकर्य अधिक योग्य है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ८९वें सूत्र में समझाते हैं कि “उट्रदुम् उन अदियारक्कडिमै एंगिरपड़िये इथिले भागवत शेषत्वमुम अनुसंदेयम” – क्योंकि श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमन्त्र सिखने के पश्चात कहते हैं कि “मैं यह समझ सकता हूँ कि मैं आपके दासों का दास हूँ, नम: पद भागवत शेषत्वम को बताता है”।
  • यह न जानना कि भगवान जो सर्व शरीरि (अन्तर्यामी) है, सर्वेश्वर (सभीको नियंत्रण में करनेवाले) है, बाधा है। यह पहिले ही समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: शरीरि आत्मा है और शरीरम देह है। देह का नियन्त्रक आत्मा है – स्वयं प्रत्यक्षम से हम इसे समझ सकते हैं। जब तक देह के भीतर है तब तक ही देह क्रिया शील है। एक बार नियंत्रण करनेवाली आत्मा शरीर का त्याग कर देती हैं देह मृत और निष्क्रिय हो जाता है। भगवान सभी अस्तित्वों के लिये अन्तरात्मा है। भगवान स्वाभाविक रूप से सब की आत्मा है इसका अर्थ वे सबके नियन्त्रक हैं। अन्तर्यामीत्वम (आत्मा का निवास करने का स्थान) और नियन्तृत्वम / ईश्वरत्वम दोनों साथ साथ चलते हैं।
  • भगवान स्वभाव से स्वतन्त्र है, उनके भक्तों पर उनका आर्विभाव उनकी सर्वोच्च स्वाधीनता / स्वतन्त्रता पर आधारीत है उनके भक्तों पर उनकी निर्भरता निरन्तर है। यह न जानना बाधा है। भगवान सत्यकाम (सभी इच्छा कि पूर्ति करने वाला), सत्य संकल्प (सभी कार्य पूर्ण करने वाला), निरंकुश स्वतन्त्र (अनियंत्रर्णाय ढंग से स्वतन्त्र), आदि माना गया हैं। फिर भी वे आश्रित पक्षपादि (वह जो अपने भक्तों पर अनुग्रह करते है) हैं। जो भगवान के पूर्ण शरणागत हो जाते हैं और उनसे प्रेम करते हैं तो भगवान भी स्वयं को आपको समर्पित करते हैं। क्योंकि यह उनकी इच्छा का परिणाम है यह उनकी स्वतन्त्रता का परिणाम है। यह नित्य है और इसे हम अधिकत्तर अवतारों के समय देख सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सर्वोच्च रूप से स्वतन्त्र है। फिर भी वह स्वयं को ऐसी परिस्थिति में लाते हैं जहाँ वे अपने भक्तों के आधीन है। महाभारत युद्ध के दौरान वे पाण्डवों के दूत बन गये थे। वें अर्जुन के सारथी भी बने। यह सब पाण्डवों के प्रति प्रेम के कारण हुआ जो उनके अनन्य भक्त थे। यह सब उनकी सर्वोच्च इच्छा ही का परिणाम है कि वे अपने भक्तों के प्रति दासता / आश्रित का स्थान लेते हैं। यह गुण उनके अर्चावतार में अधिक स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अपने अर्चकों पर पूर्ण रूप से निर्भर है चाहे अपने प्रसाद, स्नान, वस्त्र, श्रृंगार, आदि के लिये। हमारे पूर्वाचार्यों ने समझाया हैं कि यह उनके सौलभ्य गुण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
  • भक्तों के आधीन रहना यह केवल उनके दिव्य प्रेम का परिणाम है, यह न जानना बाधा है। प्रणायित्वम – भव्य प्यार / लगाव होना। जब किसी के प्रति अधीक प्रेम न हो तब वह अपनी अवस्था के विषय में और किसे प्रेम करना है – नहीं विचार करता है। अनुवादक टिप्पणी: हालाँकि भगवान श्रेष्ठ हैं और जीवात्मा तुच्छ है यह उनके भक्तों के प्रति बहुत दया और प्रेम है वें जीवात्मा के छोटे पन का विचार नहीं करते हैं। वें केवल जीवात्मा में प्रेम देखते हैं और स्वयं जीवात्मा को पूर्ण लगाव के साथ स्वीकार करते हैं। यह गुण जिसमे स्वयं से छोटों के साथ मिलने को सौशिल्य कहते है।
  • यह न जानना कि अपने भक्तों के प्रति ऐसा प्यार केवल श्रीमहालक्ष्मीजी के प्रति प्रेम और लगाव के कारण हैं जो सब की माता है, यह बाधा है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “कोलमलर्प पावैक्कनबागिय एन अनबेयो” – भगवान मुझे अधीक प्रिय हैं क्योंकि वे श्रीमहालक्ष्मीजी के दास हैं और जो आपको अधीक प्रिय है। अनुवादक टिप्पणी: इसके साथ श्रीमहालक्ष्मीजी के गुणों को भी समझाया है। भगवान सर्वोच्च स्वतन्त्र हैं। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान कि दिव्य भार्या हैं जो पूर्णत: उन पर निर्भर है। यह उनकी पुरुषकार के कारण भगवान जो उनकी शरण में आते हैं उनको स्वीकार करते हैं। क्योंकि मनुष्य जो शरण में आता हैं उसके अनगिनत पाप होते हैं और भगवान ऐसे मनुष्य को स्वीकार करने के लिये घबराते हैं। परन्तु अम्माजी यह सुनिश्चित करती हैं कि भगवान की कृपा / करुणा का गुण उनकी स्वतन्त्रता गुण से भी बड़ा है और अम्माजी सुनिश्चित करती हैं कि भगवान जीवात्मा को स्वीकार करते हैं। भगवान का अम्माजी के प्रति अपार प्रेम के कारण जीवात्मा को स्वीकार कर पूर्ण सावधानी से जीवात्मा को देखते हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान को प्रिय है, उनके जैसे सुन्दर हैं, उनके द्वारा भगवान की पहचान होती है, जो कभी उनसे अलग नहीं होती है, जो उनकी पूर्ण दास हैं, उनकी दिव्य मंगलमय पत्नी और सभी जीवात्मा कि माता हैं। यह न जानना बाधा है। यहाँ अम्माजी का स्वभाव स्थापित होता हैं। वें अभिमताई है – वह जो भगवान को बहुत प्रिय है; अनुरूपै – शारीरिक सौन्दर्य में भगवान के समान; निरूपकै – उनके पहचान का एक भाग – उनको श्रिय:पति (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी) ऐसे पहचाना जाता है; नित्यानपायिनी – जो अनन्तकाल तक अभिन्न हैं; शेषभूतै – भगवान का पूर्णत: दास होकर रहना; महिषी – भगवान की पटरानी – श्रुति कहती है “अश्येषाना जागतो विष्णु पत्नी” (वह ब्रह्माण्ड की स्वामी हैं और भगवान विष्णु की पत्नी) – क्योंकी वें एक मात्र भगवान श्रीमन्नारायण की पत्नी हैं वे इस ब्रह्माण्ड की स्वामीनी हो जाती है; जगन माता – ब्रह्माण्ड की माता – क्योंकी भगवान ब्रह्माण्ड में सभी के पिता हैं तो उनकी भार्या सभी की माता हैं। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ श्रीमहालक्ष्मीजी को स्वामी ऐसे समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से मुमुक्षुप्पड़ी के ४४वें सूत्र में समझाते हैं। जब कोई किसी के तिरुमाली में दास होकर रहता है तो उस घर के स्वामी और उस नौकर के मध्य में एक समझौता होता है। परन्तु वास्तव में क्योंकि पूरा दिन घर का स्वामी बाहर रहता हैं तो वह नौकर सारा दिन उस स्वामी के पत्नी की आज्ञा का पालन करता है। इसलिये स्वाभाविक रूप से पति का नौकर पत्नी का भी नौकर हो जाता है। भगवान श्रीमन्नारायण श्रेष्ठ स्वामी है और श्रीमहालक्ष्मी उनकी दिव्य पत्नी। सभी जीवात्मा श्रीमन्नारायण के दास हैं। अम्माजी उनकी श्रेष्ठ और मुख्य पत्नी है इसलिये स्वाभाविक रूप से सभी जीवात्मा अम्माजी के भी दास हैं।
  • हालाँकि अम्माजी भी जीवात्मा है परन्तु वें नित्यसूरिगण, मुक्तात्मा, बद्धात्मा से भिन्न हैं। इसे न जानना बाधा है। सभी जीवात्मा एक ही तत्वों से बने हैं – परन्तु उनके परिस्थिति अनुसार उन्हें नित्य, मुक्त, बद्ध वर्ग में किया गया हैं। बद्ध – हमारे जैसे जो इस लौकिक संसार में बंधे हैं; मुक्त – जो इस लौकिक संसार से भगवान कि कृपा से मुक्त होकर परमपदधाम को प्राप्त करते हैं; नित्य – जो नित्य परमपदधाम में भगवान कि सेवा करते हैं। हालाँकि अम्माजी नित्यसूरियों का हीं एक अंग हैं फिर भी उनसे भिन्न हैं क्योंकि वह भगवान की श्रेष्ठ पत्नी हैं। अनुवादक टिप्पणी: साधारणतया श्रीमहालक्ष्मीजी नित्यसूरियों के वर्ग की एक अंग है। फिर भी भगवान कि दिव्य पत्नी होने के कारण उन्हें जीवात्मा में उच्च माना गया हैं। यहाँ तक की भूदेवी, नीलादेवी और अन्य अनगिनत भगवान की पत्नीयां श्रीमहालक्ष्मीजी के आधीन हैं। अन्य सभी नित्य सूरिगण जैसे अनन्तजी, गरुडजी, श्रीविश्वक्सेन आदि और मुक्तामा सभी श्रीमहालक्ष्मीजी के दास हैं। चतु:श्लोकि के प्रथम श्लोक में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि श्रीमहालक्ष्मीजी कि परमपदधाम में सभी सेवा करते हैं और इस संसार के देवता जैसे ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र, आदि भी सेवा करते हैं – यह सभी इसी कारण से कि वें भगवान श्रीमन्नारायण की प्रिय पत्नी हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी सर्वेश्वरी (सभी कि स्वामी) है जब ईश्वरत्वम (नियन्त्रक स्वभाव) एक से अधिक मनुष्य में नहीं रह सकता है और यह कहना कि उनमें कारणत्वम (सबका कारण)  है जो केवल ब्राह्मण का हीं गुण है कहना बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी के लिये स्वामी होना स्वाभाविक गुण नहीं हैं – परन्तु क्योंकि वें श्रीमन्नारायण की दिव्य पत्नी हैं उसके कारण उन्हें यह गुण प्राप्त है। उसी तरह कारणत्वम (सब कुछ के लिये कारण) यह परमपुरुष का हीं (परब्रह्म) अनूठा गुण है और यह अम्माजी के लिये लागू नहीं हैं। कारणत्वम का अर्थ है जगत व्यापारम में सीधा सह भागिता होना – सृष्टी, स्थिति, संहारम, आदि। अनुवादक टिप्पणी: कभी भी सर्वोच्च तत्व दो नहीं हो सकते हैं। केवल एक ब्रह्म है वों हैं श्रीमन्नारायण। जीवात्मा में अम्माजी सबसे अधिक प्रिय हैं भगवान को क्योंकि वह दिव्य पत्नी है।
  • यह कहना कि श्रीमहालक्ष्मीजी और श्रीमन्नारायण स्वभाव से भिन्न नही हैं और केवल रूप में भिन्न हैं और यह कहना कि भगवद स्वरूप दो रूप (भगवान और अम्माजी) में है बाधा है। क्योंकि अम्माजी जीवात्मा के वर्ग में आती है वह स्वभाव से परमात्मा से भिन्न है। ऐसा न कहना सत्य के अंतर्विरोधी होगा।
  • यह कहना श्रीमहालक्ष्मीजी स्वयं भगवान हैं और कोई अलग नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमहालक्ष्मीजी जीवात्मा के वर्ग की एक हिस्सा हैं और भगवान कि दिव्य पत्नी हैं। इसलिये स्वाभाविक रूप से वें भगवान से कई तरह से भिन्न हैं – सबसे प्रथम – वह हर कार्य में भगवान पर निर्भर हैं। इसलिये श्रीमहालक्ष्मीजी को ईश्वरत्वम, कारणत्वम, आदि से जोड़ने का कोई प्रश्न हीं नहीं आता है जिसे हमने पहिले देखा हैं।
  • अम्माजी में एकही गुण है जब कि वास्तव में वें एक जीवात्मा है जिनमें कई सुन्दर गुण /लक्षण आदि हैं यह कहना बाधा है।
  • भगवान अहम (परमपुरुष) है और अम्माजी अहंता (वह पहलू जिसमे भगवान को विलक्षण ढंग से पहचाना जाता है) है को न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले चर्चा हुई है कि भगवान को विलक्षण ढ़ंग से पहचानते हैं कि वे श्रीमहालक्ष्मीजी के पती हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी अणु स्वरूपम है जो निरन्तर भगवान से जुड़ी हुई है जो विभु स्वरूपम हैं को न जानना बाधा है। क्योंकि अम्माजी जीवात्मा हैं वे एक अनुस्वरूप तत्व हैं। फिर भी क्योंकि वें भगवान से अनपायिनी (अभिन्न) हैं वें निरन्तर भगवान से जुड़ी हुई रहेंगी। यह भगवान की एक विशेष योग्यता है – इसे हम भगवान की अकल्पनीय फिर भी संभवनीय योग्यता समझ सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है [6.10.10] “अगलगिल्लेन इरैयुम एनरु अलर्मेल् मन्गै उरै मार्बा”। यहाँ श्रीशठकोप स्वामीजी अम्माजी के विषय में यह कहकर कहते है कि “अगलगिल्लेन इरैयुम” – मैं आपके वक्षस्थल को एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ूँगी। पुराणों में कहा गया हैं कि जब भी भगवान भूलोक में अवतार लेते है (देव, मनुष्य, त्रियक –पशु, पक्षी, स्थावर –पेड़, पौधे, आदि) अम्माजी भगवान के संग यथोचित्त स्वरूप में अवतार लेती है। इसलिये भगवान किसी भी स्वरूप में हों अम्माजी निरन्तर उनके संग रहेंगी।
  • जिस तरह रसम क्षीराब्धी में सर्वत्र फैला हुआ है उसी तरह अम्माजी भगवान के सभी ओर फैली हुई हैं। जिस तरह खारेपानी के महासागर में नमक व्याप्त है उसी तरह क्षीरसागर में दिव्य स्वाद व्याप्त है। उसी तरह जहाँ भगवान हैं वहाँ अम्माजी अवश्य होंगी। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के ४६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि भगवान सूर्य के समान हैं और अम्माजी सूर्य के किरणों के समान और भगवान पुष्प के समान हैं और अम्माजी उस पुष्प कि सुगन्ध की तरह हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा बताये अनुसार कहते हैं कि जैसे पुष्प और सुगन्ध एक साथ रहते हैं और अलग नहीं हो सकते हैं वैसे ही भगवान और अम्माजी भी अभिन्न हैं।
  • भगवान के साथ अम्माजी का रहने का कारण यह हैं कि वें अपने पुरुषार्थ द्वारा जीवात्मा को भगवान तक पहुँचाने में निरन्तर सहायता करती हैं। यह न जानना बाधा है। श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान के साथ निरन्तर रहकर भगवान को जीवात्मा जो कभी भी किसी भी समय भगवान के निकट आता है उसको स्वीकार करने में सहायता करती हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तत्व द्वय महामन्त्र में बहुत ही सुन्दरता से समझाया गया है। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि “श्री” यानि जो जीवात्मा को सुनते हैं और भगवान तक उनकी प्रार्थना पहुँचाते हैं। वें आगे समझाते हैं कि जीवात्मा भगवान के पास कभी भी जा सकते है। और यदि अम्माजी उस समय उनके निकट न होती तो वें जीवात्मा के असंख्य पापों को गिनाकर अस्वीकार कर देते। ऐसी परिस्थिति से बचने के लिये श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान श्रीमन्नारायण के साथ रहती हैं। पहले के पाशुर में जो कहा हैं “अगलगिल्लेन” उसमें विस्तार से समझाया गया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि “जैसे माता सीता विवाह के पश्चात अपने पिता के घर नहीं गई और जैसे मुक्तात्मा इस संसार में फिर नहीं आते है”, अम्माजी भी भगवान को छोड़ने का विचार भी नहीं करती हैं।
  • श्रीमहालक्ष्मीजी के भगवत स्वरूप को श्रिय:पति की तरह प्रमाणित करने के लिये कार्य में लेना चाहिये, यह न जानना बाधा है। जिस तरह श्रीमहालक्ष्मीजी को अपूर्व ढंग से विष्णुपत्नी के रूप से पहचानते हैं उसी तरह श्रीमन्नारायण को भी अपूर्व ढंग से श्रिय:पति के रूप से पहचानते हैं – हमें इसे दृढ़तापूर्वक समझना चाहिये।
  • भगवान स्वाभाविक रूप से ज्ञान और आनन्द से भरे हैं, सभी दोषों को नाश करनेवाले, सभी पवित्र गुणों के भण्डार, तीनों प्रतिबंधों (समय, स्थान और वस्तु) के नियंत्रण में न रहना, विभु (महान, सब में व्याप्त) है, निरंतर रूप से सृजन, भरणपोषण, विनाश के चक्र द्वारा आनंदित होना हालाँकि इस में उनकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं है और किसी से कुछ अपेक्षा भी नहीं हैं। यह सब न मानना बाधा है। इससे प्रारम्भ कर भगवत स्वरूप को विस्तार से समझाया गया है। जैसे श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं कि भगवत स्वरूप उणरनलम है। उणर ज्ञानम – ज्ञान प्रतिभा और नलम – आनंदम। उनके लक्षण सभी दोषों के विपरीत हैं और दूसरों के अन्दर से इन दोषों का नाश करनेवाले हैं। वें कई पवित्र गुणों से परिपूर्ण है। वें स्थान, समय और वस्तु के नियंत्रण में नहीं है। इसका अर्थ वे सर्वव्यापी है, निरन्तर सभी स्वरूप / पहलुओं में है। अपनी सही गुण के कारण वे सर्वव्यापी हैं और इस गुण को “विभु” कहते हैं। वे अवाप्तसमस्थाकामन है – वह जिसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति हो गयी है और उन्हें न ही कोई नयी इच्छा पूरी करनी है। ऐसे भगवान जो सभी चीजों से पूर्ण हैं – सृजन, भरण, पोषण व विनाश को एक खेल की तरह करने में व्यस्त हैं। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है कि “इंबुरुम इव्विळैयाट्टुडैयान्” – उनके लिये सब कुछ एक खेल की तरह है।
  • भगवान नित्य विभूति में तिरुमामणि मण्डप (हीरे जवाहरात से जड़ा हुआ सभा भवन) में आदिशेष के दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। वे वहाँ अपनी दिव्य पत्नियों के साथ विराजमान हैं जो भगवान के साथ ही बहुत प्रफूल्लित और तेजोन्मय हैं। वें वहाँ से हीं नित्य विभूति और लीला विभूति दोनों पर शासन करते हैं। वें नित्यसूरिगण जैसे श्रीअनन्तजी, श्रीगरुड़जी, श्रीविश्वक्सेनजी, आदि कि सेवा का आनन्द लेते हैं जैसे समझाया गया है “सोष्नुते सारवान कामान”। फिर भी संसार में दु:खी आत्मा कि सहायता करने के लिये तथा जो भगवान की पूजा करते हैं आर्शिवाद देने उनके कार्यपूर्ति के लिये परमपदधाम से क्षीराब्धी में व्यूह वासुदेव के रूप में अवतार लेते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान के पाँच भिन्न स्वरूप (परत्वाधी पंचकम) को विस्तृत रूप से समझाया गया है। इसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रंथ में विस्तृत रूप से समझाया गया है जिसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा दिये गए व्याख्या में भी अध्ययन किया जा सकता हैं। यहाँ पर हम भगवान के परत्व स्वरूप जिसे हम पर वासुदेव के रूप में परमपद में दर्शन कर सकते हैं समझाया गया है। परमपद एक शुद्ध सत्वम से भरा हुआ महल है जिसे हम मण्डप, गोपुर, आदि कह कर व्यक्त करते हैं। यह हम पहिले भी देख चुके हैं। सम्पूर्ण परमपद आनन्द से परिपूर्ण है और भगवान ही उसके एक मात्र सर्वश्रेष्ठ उपभोक्ता हैं और सभी नित्य सूरिगण, मुक्तात्मा इसे अच्छी तरह समझते हैं और उसके अनुसार अपना कैंकर्य करते हैं। पर वासुदेव से अगले व्यूह वासुदेव का प्राकट्य होता है। तीन और स्वरूप – संकर्षण, प्रध्युम और अनिरुद्ध व्यूह वासुदेव से प्रगट होते है। व्यूह वासुदेव में भगवान सामान्यतया क्षीराब्धी में विराजमान होते हैं। यहाँ भगवान अपने भक्तों की सहायता के लिये रहते हैं। सभी देवता ब्रह्म से प्रारम्भ कर अपनी तकलीफ को दूर करने हेतु यहीं आते हैं।
  • संसारी जीवात्मा जो अज्ञानता से ढके हैं उनके उत्थान के लिये स्वयं भगवान कई रूप जैसे मानव, आदि धारण करते हैं और जो साधारण मानव की तरह दु:ख से गुजरते हैं। परम और व्यूह स्वरूप के पहिले यहाँ से प्रारम्भ कर विभव, अर्चावतार और अन्तर्यामी स्वरूपों को समझाया गया हैं। क्षीराब्धीनाथन अलग अलग लोकों में अलग अलग स्वरूप में अलग अलग लक्ष्यों को पूरा करने के लिये जैसे साधु परित्राणम (सही लोगों कि रक्षा करना), धर्म संस्थापनम (धर्म कि रक्षा करना) और पाप का नाश करने के लिये अवतार लेते हैं। अति प्राचीन काल से इस संसार में जीवात्मा जन्म मरण के चक्र तड़प रहा हैं – इसे निद्रावस्था (अज्ञानता) कहते हैं। वह उन्हें उठाते हैं और कई रामकृष्णादि अवतार लेकर उन्हें उत्तेजित करने का कार्य करते हैं। हालाँकि साधारण मनुष्य कि तरह अवतार लेकर भगवान भी सुख और कष्ट को सहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: विभवम – अवतार। अवतारम का अर्थ नीचे अवतरित होना – स्वयं नीचे आना। भगवान समय, स्थान और वस्तु से बंधे हुए नहीं हैं। परन्तु कई अवतार लेकर नीचे आते हैं और वे स्वयं को विशिष्ट समय (जैसे श्रीराम त्रेता युग में थे), स्थान (श्रीराम अब अयोध्या में है) और उद्देश (भगवान श्रीराम के रूप में है) के आधीन हो जाते हैं। भगवान के नैच्छानुसंधान के पहलू को आचार्य और आल्वारों ने बहुत प्रशंसा किये हैं। यहाँ अवतार को दो मुख्य वर्ग में बाँटा गया है – मुख्यावतार – भगवान स्वयं भिन्न भिन्न रूप में प्रगट होते हैं और गौणावतार – भगवान अपने कुछ विशिष्ट गुण / शक्ति को जीवात्मा को प्रदान कर कुछ विशिष्ट कार्यों की पूर्ति के लिये भेजते हैं। मुमुक्षु मुख्यावतार कि पूजा करते हैं और गौणावतार कि पूजा मुमुक्षु नहीं करते हैं।
  • यह देखना कि उनके इच्छा विरुद्ध उनका कोई पीछा तो नहीं कर रहा है वें स्वयं को अन्तर्यामी की तरह छुपाने की कोशिश करता है जैसे किसी ने भी नहीं देखा हो। श्रीसहस्रगीति के पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं “करन्तसिलिदन्तोरुम इदंतिगल पोरुल तोरूम करन्थेंगुम परंतुलन” – जो सर्व व्यापी है – सब जगह व्याप्त रहना और श्रीसहस्रगीति के पाशुर में “कट्किली” (जो हमारे नेत्रों से नहीं दीखता है) – भगवान अन्तर्यामी का रूप धारण करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: अन्तर्यामी भगवान का एक पहलू है जिसमें भगवान प्रत्येक अणु कण में रहते हैं और एक कणों की क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं। भगवान सचेतन व निर्विकार दोनों में व्याप्त हैं और उनका नियंत्रण करते हैं।
  • ऐसे सर्वोच्च भगवान जो अर्चा स्वरूप धारण करके दिव्य देश व अन्य मंदिरों में भिन्न भिन्न मुद्राओं में जैसे खड़े, शयन, बैठे, आदि रहते हैं जैसे मानों एक राजा किसी बगीचे में विश्राम कर रहा हो और उसके दासों से उसकी सेवा हो रही हो। इसे न मानना बाधा है। यहाँ जैसे एक चोर को पकड़ने के लिये पूरे इलाके को पुलिस घेर लेती है भगवान भी जीवात्मा के हृदय को पकड़ने के लिये चारों ओर से मंदिरों में भिन्न भिन्न स्वरूप को धारण करते हैं। और अर्चावतार भगवान अपने प्रसाद, तिरुमंजन, वस्त्र, शयन, आदि सबके लिये अपने अर्चकों पर निर्भर रहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देशों को “उगन्तु अरुलीन निलंगल” कहते हैं – जीवात्मा के उद्धार के लिये तीव्र इच्छा के कारण भगवान द्वारा आधिकृत स्थान हैं। अर्चावतार भगवान दिव्य देशों, अभिमान स्थल, गाँव, शहर, मन्दिर, मठ, तिरुमाली, आदि में भगवान का आर्विभाव होता है, यह भगवान का श्रेष्ठ सौलभ्य गुण है। वें इस भूतल में ऐसी जगह अवतरित होते हैं जो स्थान सबके लिये सुलभ है, अपने सौन्दर्य द्वारा सबको आकर्षित करते हैं। जो भाग्यशाली हैं वे उनके वैभव को जानते हैं और भगवान के प्रति अपने विश्वास को दृढ़ आत्म विश्वास में विकसित कर भगवान का निरन्तर कैंकर्य से अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
  • परत्वम (परवासुदेव स्वरूप) यह जीवात्मा (नित्य, मुक्त, बद्ध) के हर वर्ग के नित्यसूरि व अवतार के आनन्द के लिये हैं। परमपदधाम में भगवान का आनन्द केवल नित्यसूरि व मुक्तात्मा हीं प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु विभव और अर्चावतार के समय इस संसार के सभी जीवात्मा देख भी सकते हैं और आनन्द भी प्राप्त कर सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह एक मनोहर पहलू हम देख सकते हैं कि अर्चावतार भगवान का आनन्द और सेवा नित्यसूरिगण भी करते है। उदाहरण के लिये श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी “इन ओलिविल कालम” पाधिगम में दर्शाते हैं कि नित्यसूरिगण भी परमपदधाम से तिरुमला आकर भगवान श्रीनिवास की सेवा करते हैं। परन्तु जो इस संसार में बंधा है (देवता, ऋषि, मनुष्य, आदि) इस सांसारिक शरीर और वस्तु के लगाव में वों परमपदधाम के अन्दर जाने का विचार भी नहीं कर सकते हैं – केवल भगवान कि कृपा से वह परमपदधाम में प्रवेश कर सकता हैं।
  • मुख्यावतार को भगवान जिस विशिष्ट रूप आदि में अवतरित हुये थे उसका सिर्फ अवशेष मात्र समझना बाधा है। मुख्य अवतार में भगवान कि श्रेष्ठता पूर्ण स्पष्ट प्रगट होती हैं। हमें भगवान को सिर्फ मत्स्य, कछुवा, वराह, मनुष्य, आदि नहीं मानना चाहिये। ऐसे रूप लेने के समय भी उन्होंने अपनी श्रेष्ठता बनाये रखे जैसे पुण्डरीकाक्षत्वम (जैसे सुन्दर कमल नयन), आदि सभी समय में स्पष्ट हो जाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान प्राणी, मानव, आदि का मिलता हुआ स्वरूप धारण किया हैं इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वे भी नश्वर हैं। जो भी स्वरूप हो वह दिव्य और सांसारियों से भिन्न हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाते हैं कि ऐसे स्वरूप में शारीरिक तृटियों को देखना स्वयं में भगवद अपचार हैं।
  • गौणावतारम को पूजनीय मानना बाधा है। गौणावतारम में आवेश अवतार (भगवान के उच्च शक्तियों को कुछ जीवात्माओं पर प्रभाव डालना) शामिल है जैसे श्रीपरशुरामजी, श्रीकार्तवीर्यार्जुन, आदि। यह अवतार मुमुक्षुओं द्वारा पूजनीय नहीं हैं। उन्हें केवल भगवान के अवतार हैं इसलिये सम्मान करना चाहिये। श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ५६वें पाशुर “कोक्कुल मन्नरै मूवेलुकाल” के व्याख्या में हम देख सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान अपनी कुछ शक्तियां कुछ जीवात्माओं को देते है ताकि कुछ निश्चित कार्यों को कर सके परन्तु जरूरी नहीं ऐसे जीवात्मा पूर्ण रूप से सात्विक गुणों के हो, मुमुक्षुओं को इनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह प्रश्न एक व्याख्या में उठाते हैं और समझाते हैं कि ऐसे अवतार पुरुषों को पूर्ण मर्यादा देनी चाहिये उनके द्वारा किये गये कार्य के लिये परन्तु पूजा नहीं करनी चाहिये। वें अन्य आल्वारों के पाशुरों को दर्शाते है जो परशुरामजी कि स्तुति अपने पाशुरों में करते हैं।
  • अर्चावतार भगवान को असमर्थ समझना बाधा है। अर्चावतार रूप में भगवान कई सन्निधियों में विराजमान रहते हैं, वें प्रतिज्ञा किये हैं कि वें पूर्ण रूप से अपने अर्चक पर निर्भर रहेंगे। यह उनकी प्रतिज्ञा को उनकी असमर्थतता नहीं समझनी चाहिये। हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते हैं कि भगवान की सर्वोच्चता पूर्ण रूप से अर्चावतार स्वरूप में भी हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम यह पहिले भी देख चुके हैं कि भगवान कि इच्छा हैं कि वें अर्चा स्वरूप में रहकर सबकी उन्नति करें। क्योंकि भी वें सीधे किसी से वार्तालाप नहीं करते हैं और अपनी इच्छा को प्राकृतिक ढंग से व्यक्त करते हैं, इसलिये हमें यह नहीं विचार करना चाहिये कि वे असमर्थ हैं। कई उदाहरण हैं जहाँ अर्चावतार भगवान महान भक्तों से वार्ता करते हैं। श्रीवरदराज भगवान का निरन्तर श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से बात करना यह एक इतिहास का आधारीत तथ्य है।
  • अपने आचार्य में भगवान के अवतार की तरह आस्था नहीं रखना बाधा है। जैसे कहा गया है “आचार्यास स हरी: साक्षात” हमें यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि आचार्य स्वयं भगवान के अपरावतार हैं। भगवान के पाँच प्रकारम में आचार्य को छठा स्वरूप समझा गया है। अनुवादक टिप्पणी: इसे समझने के लिये “अन्तिमोपाय निष्ठा” (http://ponnadi.blogspot.in/p/anthimopaya-nishtai.html) पढना चाहिये।
  • अवतार परत्वम से उच्च है। यह न जानना बाधा है। परमपदधाम में केवल उनकी श्रेष्ठता ही सर्वत्र दिखाई देती है। परन्तु जब भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, आदि का अवतार लेते हैं तो उनके सभी दिव्य गुण चमकते हैं। इस तरह हम परत्वम से अधिक अवतार की महानता समझ सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: दु:खी जीवात्माओं की सहायता के लिये भगवान इस संसार में बिना किसी कारण के दया दिखाते हुये अवतार लेते हैं। इसलिये ऋग्वेद में कहा गया हैं कि “स उ श्रेयान भवति जायमान:” – भगवान जब इस संसार में अवतार लेते हैं तो वें अधिक प्रशंसनीय हो जाते हैं। और जब वें परमपदधाम से इस संसार में अवतरित होते हैं वे अपनी किसी भी दिव्य गुणों को कम नहीं करते हैं और उसी दिव्य स्वरूप (जीवात्माओं के भौतिक देह के तत्वों से भिन्न) में प्रगट होते हैं। इस तत्व को श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते हैं – “आधियम चोटी सोदि उरुवै अन्गु वैत्तु इंगुप पिरन्तु” – भगवान जो नित्य है इस संसार में अपने सबसे अधिक मोहित करनेवाले और दिव्य स्वरूप जिसे हम परमपदधाम में देखते है में अवतरित होते हैं।
  • आचार्य के दिव्य शरीर / स्वरूप को भौतिक मानना, यह समझाने के पश्चात कि वें भगवान के अवतार है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना आवश्यक हैं कि आचार्य हीं शिष्य को भगवान के चरण कमलों तक पहुँचा सकते हैं। अपनी महान अनुकम्पा से ही आचार्य सही ज्ञान को अपने उपदेशों और व्यवहार द्वारा सबको समझाते हैं। ऐसे आचार्य के शिष्यों को सबसे अधिक आदर और स्तुति करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-42.html

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