विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २१

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

५२) गृह विरोधी – गृह स्थान में विरोधी।

परुत्तिक कोल्लै अम्माल के तिरुमाली में आकर जब श्रीरामानुज स्वामीजी यह देखते है कि अपने फटे हुए वस्त्र में बाहर आने में अम्माल लज्जा अनुभव कर रही है तब वे कृपा कर उन्हें अपना प्रपन्न पाकै (अपना वस्त्र) प्रदान करते है। अपनी तिरुवेंकट यात्रा में श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं उन साध्वी स्त्री के सात्विक गुणों को देखकर उनके तिरुमाली में पधारते है – यह घटना श्रीपिल्लै लोकम जीयर स्वामीजी के रामानुजार्य दिव्य चरित्र में दर्शाया गया है।

इस भाग में प्रपन्नों के निवास गृह कि बनावट को विस्तार से समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: हमारे पूर्वाचार्य दिव्य देश, अभिमान स्थल, आचार्य/आल्वार आदि के अवतार स्थान पर रहने को केन्द्रीत रहते थे। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में समझाते है कि “उन कोयिलील वालुम वैट्टणवन एन्नुम वनमै कण्डाये”- श्रीवैष्णव के लिये अंतिम लक्ष्य तो भगवद और भागवतों के कैंकर्य में व्यस्त रहना और उस स्थान पर निवास करना है जो भगवान को प्रिय है। दिव्य देशों कि “उगन्थरुलिन निलंगल” ऐसी स्तुति होती है – वह स्थान जहाँ पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा होती है। दिव्य देश आदि में रहने का उद्देश्य भगवद विषय में शिक्षीत होकर श्रीवैष्णवों से चर्चा कर अपने ज्ञान को बढ़ाना और निरन्तर भगवद – भागवतों के कैंकर्य में रहना। भागवतों कि संगत में रहने से हम स्वतः ही संसारी जीवों से दूर हो जाते है। इस तत्व को इस अंश में पूर्णत: समझाया गया है।

  • उस स्थान पर अपना गृह (निवास स्थान) का होना, जो देवतान्तर (अन्य देव जैसे ब्रम्हा, रुद्र, आदि) से सम्बन्ध के कारण निन्दक है। यह बाधा है।
  • उन गलियों में रहना, जहाँ पाषण्डी जन निवास करते है बाधा है (बाह्य – वह जो वेदों को स्वीकार नहीं करते है और कुदृष्टि – वह जो वेदों को स्वीकार तो करते है परन्तु उसका गलत अर्थ करते है)।
  • सांसारी जनों के निकट में रहना बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना रहना जहाँ भगवान के दिव्य चिन्ह जैसे ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, शङ्ख, चक्र आदि नहीं है, यह बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना जो सांसारियों का या उनके प्रियजनों का है, यह बाधा है।
  • हमारे आचार्य को जो स्थान प्रिय नहीं है, उस स्थान में निवास करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि जब भी एक घर का निर्माण होता है, उसे पहिले अपने आचार्य को समर्पित करना चाहिये तत्पश्चात उनकी अनुमती और आशीर्वाद से उस तिरुमाली का उपयोग करना चाहिये। यह आज भी गृह प्रवेश के रस्म के समय यह देखा जाता है कि आचार्य को बुलाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। आचार्य हृदयम में एक सुन्दर घटना ८५वें चूर्णिका में देखी गयी है जिसका प्रारम्भ “म्लेच्चनुम् भक्तन आनै” से होता है। भागवतों कि कीर्ति को समझाते हुए अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार यह दर्शाते है कि जब नदुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर ने नव तिरुमाली का निर्माण किया तब उन्होंने सिर्फ पिल्लै वानमामलै दासर से प्रवेश करने और अपने चरणों को सभी कक्षों में रखने कि प्रार्थना की। यह इतना ही नव तिरुमाली को पवित्र करने के लिए प्रयाप्त है।
  • उस निवास स्थान में रहना जहाँ भागवतों के प्रवेश और किसी भी समय उनका रहने को पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने तिरुमाली को ऐसे निर्माण करना चाहिये कि भागवत किसी भी समय पूर्ण स्वतन्त्रता से प्रवेश कर सके (जैसे स्वयं ही उस तिरुमाली के स्वामी हो) और जीतने दिन उनको रहने कि इच्छा हो उतने दिन रह सके। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में श्रीवैष्णवों के स्वागत और उनके आगमन पर उनकी अच्छी तरह देखभाल करने में निपुण ऐसे तिरुक्कोष्टीयूर के जनों कि बहुत बढाई करते है।
  • उस निवास स्थान पर विराजमान होना जहाँ सांसारिक विषयों पर केन्द्रित संबंधी आते है, यह बाधा है। जब कोई सम्बन्धी श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की तिरुमाली में आते थे, तब वे उन संबंधियों द्वारा उपयोग किये गए मिट्टी के सभी पात्र तोड़ देते थे और श्रीदाशरथी स्वामीजी द्वारा प्रयोग किये गये पात्र ले आया करते थे। अनुवादक टिप्पणी: गुरु परम्परा प्रभावम ६००० पड़ी में श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि स्तुति कि गयी है। उसमें इस घटना को भी दर्शाया गया है। एक बार श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के सम्बन्धी (जो श्रीवैष्णव नहीं थे) उन्हें मिलने आते है। उनके जाने के पश्चात श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी सभी पात्रों को नष्ट कर उस स्थान को शुद्ध करते है। फिर वे श्रीदाशरथी स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर उन पात्र को लेकर आते है, जिन्हें उन्होंने त्याग दिया है और वह उन पात्रों का प्रयोग करते है। अत: उन्होंने यह स्थापित किया कि जिनका शुद्ध आचार्य सम्बन्ध है उनसे संबंधित (उनके द्वारा त्यागा हुआ भी) सब कुछ पवित्र और स्वीकारनीय है और जो संसारी द्वारा उपयोग किया गया हो, उसका त्याग कर देना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ अर्चावतार भगवान (सालग्राम श्रीमूर्ति, विग्रह भगवान आदि) तिरुवाराधन कक्ष में न विराजे हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पञ्च संस्कार के एक भाग के अनुसार शिष्य अपने आचार्य से तिरुवाराधन करने कि विधि सिखता है। यह सीखने के पश्चात हमें अर्चावतार भगवान कि अराधना अपने तिरुमाली में करनी चाहिये जो कृपा कर हमारे तिरुमाली में पधारे है। अर्चावतार भगवान कि हमारे पूर्वाचार्यों ने बहुत स्तुति की है।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसके प्रवेश द्वार पर शंख हो बाधा है। यद्यपि शंख भगवान के पवित्र शस्त्र और चिन्ह है, परंतु इनका बहुतेरे जन स्वतन्त्रता पूर्वक प्रयोग करते है। केवल शंख का प्रयोग करने कि यहाँ निन्दा कि गयी है।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ श्रीआचार्य का श्रीपाद तीर्थ न हो बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सभी तिरुमाली में आचार्य श्रीपाद तीर्थ और भगवान का तीर्थ होना ही चाहिये। यह सामान्य अभ्यास है कि कुमकुम या चन्दन का लेप आचार्य के चरण कमलों को लगाकर उसकी छाप एक सफेद नये कपड़े पर लेकर और उसे बड़े आदर के साथ अपने तिरुमाली में रखा जाता है। कभी कभी आचार्य कि चरण पादुका को भी रखते है। श्रीपाद तीर्थ इन दोनों – कपड़े पर आचार्य के चरण पादुका कि छाप या चरण पादुका से बनाया जा सकता है। एक और शैली है श्रीपाद तीर्थ बनाने की – तुलसी के पेड़ के नीचे कि मिट्टी को एक बार आचार्य के श्रीपाद तीर्थ के साथ मिलाकर एक ठोस खण्ड बनाया जाता है। जब वह सुख जाता है तो इसे “तीर्थवड़ी” कहा जाता है – सादे जल को इसमें मिलाने से श्रीपाद तीर्थ बन जाता है। किसी भी परिस्थिती में शिष्य को प्रतिदिन श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करना ही चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक कि सामग्री और भगवान का प्रसाद न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह सामग्री श्रीवैष्णव के नित्य प्रति दिन के लिये आवश्यक है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ मन्त्र जपने कि माला लटकी हुई है, बाधा है। अगर हमें केवल अपने मन्त्र उच्चारण का हिसाब रखना हो तो वह हम अंगूली के लकीरों से भी रख सकते है। अनुवादक टिप्पणी: अन्य सम्प्रदाय में मन्त्र उच्चारण के लिये कहा गया है परन्तु हमारे सम्प्रदाय में मन्त्र (मूल मन्त्र, द्वय मन्त्र आदि) के अर्थानुसन्धान पर केन्द्रीत रहने के लिए कहा गया है। हमारे सम्प्रदाय में इतनी गिनती की माला जपना है, ऐसा कोई नियम नहीं है केवल गायत्री मन्त्र जो संध्या वन्दन का एक अंग है जो प्रथम ३ वर्णआश्रम (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य) के लिये है।
  • कुत्ते, लोमड़ी, भेड़िया, पाषण्ड के समीप के तिरुमाली में रहना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ शैव, बौद्ध, जैन, शार्वाक (बाह्य और कुदृष्टी) सम्प्रदाय के ग्रन्थ हो बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ७वें पाशुर में कहते है “काण्बरो केटपरो ताम” – क्या वें कभी अन्य सम्प्रदाय के ग्रन्थ को देखेंगे या सुनेंगे। इस पाशुर के व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै समझाते है कि कैसे श्रीकुरेश स्वामीजी की बाल्यावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें अन्य सम्प्रदाय के विषय में सुनने पर सजा दी थी।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसे केवल शुक्रवार, अमावस आदि के दिन ही गाय के गोबर से साफ किया हो, बाधा है। यह समझना चाहिये कि सभी का घर प्रतिदिन साफ और पवित्र करना चाहिये। यही तथ्य अर्जन विरोधी में भी समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान सभी के तिरुमाली में विराजमान है इसलिये उसे भगवान का मन्दिर यह सोचकर हमें अपने तिरुमाली को प्रतिदिन साफ और पवित्र रखना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में विराजमान होना जहाँ रसोई घर में पका हुआ प्रसाद सामान्य जनों कि दृष्टी में आता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार प्रसाद बनाने के पश्चात भगवान को निवेदन करने से पूर्व किसी को भी उस भोजन को देखना/ सूंघना/ चखना नहीं चाहिये। इसलिये पके हुए प्रसाद को ढककर सुरक्षीत रखना चाहिये। इसलिये हम देखते है कि भगवान को जो भोग लगता है उसे ढककर ले जाया जाता है। इसे हमें अपने तिरुमाली में भी पालन करना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ बहुत राख़ छलकाया गया है, बाधा है। राख़ सामान्यत: शैव अपने ललाट पर लगाते है और श्रीवैष्णवों को उसे स्पर्श करना पूर्णत: गलत है। अनुवादक टिप्पणी: पुनः यह विषय घर कि स्वछता और पवित्रता को सही तरीके से रखने को प्रदर्शित करता है।
  • जहाँ पके हुए चावल को कोने में रखते है उस तिरुमाली में निवास करना बाधा है। इसे सामान्यत: उत्तर-पूर्वी (इशान्य) कोने में रखते है। अनुवादक टिप्पणी: जब पके हुए चावल उस ही दिन संपन्न न हो तब उसे एक घड़े में जल मिलाकर रात भर रखते है। इससे चावल सुरक्षीत रहते है और अगले दिन के लिये एक पौष्टीक आहार भी रहते है। पुराने जमाने में (१५ वर्ष पूर्व भी) कई परिवार (कई श्रीवैष्णव परिवार भी) इस तरह चावल को सुरक्षित करते थे और अगले दिन सवेरे उसे वैसे ही अथवा दही में मिलाकर पाते थे। इस प्रथा कि यहाँ निन्दा कि गयी है। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में समझाते है कि किसी को भी वह भोजन नहीं पाना चाहिये जो पहिले बना हुआ है जैसे रात के समय सवेरे का भोजन और सवेरे के समय रात का भोजन क्योंकि ऐसे भोजन बासी हो जाते है और हमारे सात्विक स्वभाव के लिये सही भी नहीं है। परन्तु आजकल लोगों को भोजन का कोई मोल नहीं है इसलिये जो भी बचा है उसे फेंक देते है – यह भी बहुत गलत है क्योंकि शास्त्र कहता है “अन्नं न निन्द्यत” (भोजन को व्यर्थ न करो)। इसलिये भोजन को नष्ट किये बिना हमें अधिक भोजन नहीं बनाना चाहिये और जब अधिक हो तो उस प्रसाद को जिसे जरूरत है उसे दे ताकी प्रसाद का अपमान न हो।
  • उस घर में रहना जहाँ विश्राम करते समय हाथ, पैर आदि में धागे बांधते है।  अनुवादक टिप्पणी: यह तो आजकल के जमाने कि चाल हो गयी है श्रीवैष्णव परिवारों में भी हाथ, पैर, गले आदि में धागे बांधते है जो कि देवतान्तर से सम्बंधित होता है। कभी लोग उसे हनुमानजी या वेंकटेश भगवान का कहते है। जो कुछ भी हो वह हमारे सम्प्रदाय के विरुद्ध है। श्रीवैष्णवों के लिये सबसे प्रमुख रक्षा कवच तो उनका ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक है। सामान्यतः जो श्रीवैष्णवों को धारण करना है वह है:
    • ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य के लिये यज्ञोपवित।
    • अरै नाण कयिरु (कटी सूत्र) – कमर में बाँधने का सूत्र (सभी के लिए अनिवार्य) – यह आवश्यक है क्यूंकि कौपिनम (कोवणम – कौपिन वस्त्र – परंपरागत भीतरी परिधान) इसमें अवश्य बंधा जाना चाहिए
    • रक्षाबन्धन – रक्षा कवच जो यज्ञ, दीक्षा आदि के समय बांधे जाते है। सामान्यत: सफेद या पीला रंग
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ भगवान के लिये जिन पात्र में प्रसाद बनता हो उस पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो। सभी बर्तन को भगवान के चिन्ह से सजाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमहद्योगी स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में यह बताते है कि “एन्नैयुम एन उदैमैयैयुं उन चक्करप पोरी ओट्रिक्कोन्डू” – आपके चक्र के चिन्ह को मेरे आत्मा और मेरी संपत्ति (शरीर, धन आदि) पर लगाए। यह सभी श्रीवैष्णवों का कर्तव्य है कि अपने सभी वस्तु पर भगवान का चिन्ह लगाये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जो अभी तक भागवतों के चरण स्पर्श से पवित्र नहीं हुई है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम नडुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर और पिल्लै वानमामलै दासर के उदाहरण को आगे देख चुके है।
  • पाषण्डी जनों के जाने के पश्चात उस घर को पवित्र कर के ही वहाँ निवास करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ पशु को देवता का चिन्ह माना जाता है, बाधा है। पशुओं को गावों में विशेष चिन्ह से पहचानना एक सामान्य रिवाज है। यह स्पष्ट कर लेना की यह कोई देवतान्तर का चिन्ह नहीं है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ के लोग उन धार्मिक श्लोक का उच्चारण करते है जिन्हें हमारे पूर्वाचार्य नहीं गाते थे। वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सम्प्रदाय को सत सम्प्रदाय या शुद्ध सम्प्रदाय कहते है। हमारे पूर्वाचार्य आल्वारों के पाशुर, पूर्वाचार्यों के स्तोत्र, व्याख्या और रहस्य ग्रन्थों पर केन्द्रीत थे – यह सब देवतान्तर भजन, उपयान्तर निष्ठा आदि रहित है। हमारे आचार्यों द्वारा जो भी स्वीकार किया गया है, उसके अतिरिक्त कुछ भी करना चाहे वह आचार्यों/ आलवारों के कार्यों के अनुरूप हो अथवा न हो। इसलिए इस तरह के कार्यों में संलग्न होने से बचना ही उत्तम है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ तुलसी नहीं लगायी जाती, वह बाधा है। घर के भगवान के तिरुवाराधन के लिये अगर अपने घर में ही तुलसी लगायी जाये तो अच्छा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ दिव्य प्रबन्ध के पाठ के गान को न सुन पाये वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: घर में भी हमें दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र पाठ, रहस्य ग्रन्थ आदि का पाठ नियमित रूप से करना चाहिये। इस तरह परिवार के सभी सदस्य भगवद गुणानुभाव और कैंकर्य कर सकते है।

५३) क्षेत्र विरोधीहमारी जो भूमि है, उस से सम्बंधित बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीअनंताल्वान स्वामीजी का बगीचा देखते हुए जो तिरुवेंकट भगवान के लिये बनाया गया है

इसे पिछले भाग का अविराम कहा जा सकता है। गृह विरोधी में किसी के तिरुमाली सम्बंधीत विषय को समझाया गया है। इस विषय का स्थान जहाँ तिरुमाली का निर्माण किया जाता है उसको बताया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्षेत्र का सामान्यता अर्थ है उपजाऊ भूमि। इसका एक और अर्थ कोई भी भूमि जो खेती, कृषी या अन्य काम के लिये प्रयोग होती है। पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में सामान्यतः गृह और क्षेत्र की चर्चा एक साथ होती है।

  • उस भूमि पर अपन स्वामित्व जताना जो देवतान्तरों की है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ भूमि अन्य देवता या उनके मन्दिर के भी हो सकते है। श्रीवैष्णवों को उसका उपयोग स्वयं के लिये नहीं करना चाहिये।
  • उस भूमि को लेना जिस पर देवतान्तर का चिन्ह हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: देवतान्तर के कई चिन्ह है जैसे त्रीयाक पुण्ड्र, त्रीशुल, आदि। ऐसे चिन्ह के भूमि पर कभी भी समझौता करने से बचना चाहिये।
  • उस स्थान पर भूमि लेना जो भगवान को प्रिय नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले देखा गया है दिव्य देश, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल, आदि भगवान को प्रिय है और हमें इन्हीं स्थानों पर भूमि लेनी चाहिये।
  • उस भूमि पर अपना कब्जा करना जो भगवान से चोरी/ छीनी गयी है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग मन्दिर कि भूमि आदि को चुरा लेते है। ऐसे भूमि से तो बचना चाहिये क्योंकि यह हमारे स्वरूप विरुद्ध है। ऐसे भूमि से अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
  • दूसरों कि भूमि को चुराना/कब्जा करना बाधा है।
  • उस भूमि पर दावा करना यह सोचकर कि “यह मेरी भूमि है” बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि सब कुछ भगवान का है हमें तो केवल एक अवसर मिला है उस संपत्ति का उपयोग करने हेतु।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो आचार्य कि सेवा हेतु उपयोग में न आवें। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ती स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना बताई गयी है। एक बार जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने परिवार सहित कूरकुलोत्तम गाँव में थे तो श्रीवेदान्ती स्वामीजी के बगीचे को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के कोई परिवारवालों ने नुकसान पहूंचाया। श्रीवेदान्ती स्वामीजी के गृह कार्य करनेवाले उदास होकर कुछ अपशब्द कह दिये। यह सुनकर श्रीवेदान्ती स्वामीजी उदास हो गये और अपने परिचारकों को समझाते हुए कहे कि यह बगीचा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के संतुष्टी के लिये है न की नम्पेरुमाल के लिये है। इससे हम यह समझ सकते है कि हमारा धन सबसे पहिले आचार्य कैंकर्य हेतु उपयोग करना हैं।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो पूर्णत: भगवद, भागवत, आचार्य के लिये समर्पित न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीअनंताल्वान स्वामीजी कि निष्ठा देख सकते है उन्होंने केवल श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा सुनकर तिरुमला में भगवान वेंकटेश के लिये एक सुन्दर बगीचा और तालाब बनाया।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १९

वैत्तमानिधि (महान निधि) – तिरुक्कोलुर – हमारी सच्ची सम्पदा

५१) अर्जन विरोधी – धन कमाने में बाधाएं

अर्जन का अर्थ धन कमाना है। यह विषय बहुत बड़ा है। कुछ पहलु स्पष्ट भी नहीं है। बड़ों से पुछने पर भी मुझको (व्ही॰व्ही॰रामानुजन स्वामी) संतोषजनक उत्तर नही मिले। मैंने जितना समझा है उतना लिखा है। सामान्यत: धन कमाना, धर्म मार्ग की सीमाओं में होना चाहिये। हमें अपने वर्ण और आश्रम के मर्यादा के भीतर रहकर धन कमाना चाहिये। जैसे पुराने तमिल में कहावत है कि “पोतुमेनर मनमे पोन् चेय्युम मरुन्तु” जितना चाहिये उतने में संतुष्ट रहना उत्तम दवा है, हमें अपने मन को जो उपलब्ध है उसके लिये तैयार करना चाहिये। सभी शास्त्र विरुद्ध तरीके से बचना चाहिये। दूसरों को धोका देकर, झूठ बोलकर, अपहरण कर आदि से धन कमाने से दूर रहना चाहिये। लालच से तो पूरी तरह दूर रहना चाहिये। जल्दी धन कमाना, गलत तरीके से धन कमाना, अपने विवेक के विरुद्ध धन कमाना आदि पुराने जमाने में भी होता था। मैं (व्ही॰व्ही॰रामानुजन स्वामी) यह निर्धारित करता हूँ कि भ्रष्टाचार कि राशी राजनीति और अन्य धन कमाने के तरीके पुराने जमाने में नहीं थे। इसे हमे ध्यान में रखना चाहिये। अब हम इसमें बाधाएं देखेंगें। अनुवादक टिप्पणी: धन कमाने का सामान्य तत्व यह देखा गया है कि कुछ भी सेवा के बदले में उसका मोल मांगना। जो कुछ भी इच्छापूर्वक दिया गया हो उसे संतुष्ट होकर अपनाना चाहिये और अपने शरीर के लिए जरूरत से अधिक धन कमाने का लालच नहीं करना चाहिये। और श्रीवैष्णवों के लिये सच्चा धन तो भगवान के चरण कमल हीं है। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न में यह घोषणा भी करते है “धनं मदीयं तव पाद पङ्कजं” – आपके चरण कमल हीं मेरा धन है। भगवान और भागवतों कि सेवा कैंकर्य को भी धन कहा गया है। हमारे आल्वार और आचार्य पूरी तरह सांसारिक धन से दूर रहे और केवल भगवान और भागवतों कि सेवा पर हीं केन्द्रीत रहे। इसलिये हमें भी सच्चे धन कि ओर पूरी तरह केन्द्रीत रहना चाहिये नाकि सांसारिक धन कमाने में।

  • वैष्णव होने के पश्चात भी दान स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: धर्म शास्त्र में ब्राह्मणों को दान देना और और उसे स्वीकार करना दोनों अधिकार प्राप्त है। यहाँ हमें यह समझना चाहिये कि दान एकत्रित करना और बटोरना दोनों अपराध है। जब कोई दान स्वीकार करता है तो जिसे जरूरत हो उसे दे देना चाहिये।
  • अगर कोई गलती करता है तो उसे उस गलती के लिये दान देने कि सलाह करना और ऐसे दान हितकारी होगा ऐसा कहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आज कल देखा जाता है कि कई लोग गलती के लिये साधक को उस दुख से दूर करने हेतु दान देने कि परामर्श देते है। कभी कभी जो परामर्श देते है उन्हे हीं उस दान का लाभ मिलता है। ऐसे कार्य से निश्चित रूप से बचना चाहिये। हमारे भगवान, आल्वार और आचार्य सांसारिक दुखों को दूर करने हेतु को उपचार नहीं बताते है। उनकी उपस्थिती का कारण सभी को संसार बन्धन से मुक्त करना है। सभी को यह समझना चाहिये और दूसरों को यह सलाह देना चाहिये कि सिर्फ भगवान, आल्वार और आचार्य कि पूजा कर पूरी तरह उनकी शरण हो जाये।
  • दान द्वारा दूसरों से धन स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: जब भी दान दिया जाता है दान देनेवाला हाथों में जल लेकर उसे जमीन पर छोड़ता है और यह निश्चित करता है कि वह धन दान लेनेवाले का है। इसे तमील में ऐसे समझाया गया है धारै वार्त्तुक कोदुत्तल। वैदीक धर्म में दान करने पर “श्रोतृीयाय श्रीवैष्णवाय साम्प्रदते नमम” यह उच्चार करते है कि वह वस्तु अब दान देनेवाले कि नहीं है। भगवान वामन अवतार लेकर धरती पर आये और बली राजा से दान स्वीकार किये – इस घटना की आल्वारों ने अपने पाशुरों में बड़ी स्तुति कि है। उन्होंने यह काम अपने भक्तों कि रक्षा हेतु अपनी महानता को कम करके भी किये है। यह भगवान का निस्वार्थ चरित्र है। परन्तु यह कहा गया है कि इस तरह हमें अपने स्वार्थ के लिये दान को स्वीकार नहीं करना चाहिये।
  • अपने जीवन के अंतिम साँस लेनेवाले लोगों से दान स्वीकार करना बाधा है। काल दानं – वह जो अपने शरीर का त्याग करते समय अपने पापों को मिटाने हेतु दान करता है। कुछ अनाज, सोना आदि दान में देते है। परन्तु किसी भी लालच में इसे स्वीकार नहीं करना चाहिये। यह श्रीवैष्णवों के सच्चे स्वभाव को नष्ट कर देता है।
  • श्राद्ध में भोजन कर धन एकत्रीत करना बाधा है। श्राद्ध का अर्थ वह वैदीक कर्म जो माँ, पिताजी आदि के मृत्यु के तिथी के दिन प्रति वर्ष करते है। वह जो पितृ के प्रति भी किया जाता है उसे भी श्राद्ध कहते है। इसमें वह जो यह कर्म करता है ३ ब्राह्मणों को आमंत्रित करता है जिनको पितृ (जिनके लिये हम श्राद्ध करते है), विश्वदेवर और विष्णु का स्थान मानते है, उन्हें कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाते है और अन्त में संभावना और ताम्बूल देते है। पुराने जमाने में जब भी किसी को निमंत्रण दिया जाता था श्रीवैष्णव उसे स्वीकार कर उस वैदीक कर्म को पूर्ण करते थे। श्रीवैष्णवों को निमंत्रण देने का अभ्यास था। परन्तु आजकल देखा जाता है कई जन श्राद्ध में भोजन करने को रोजगार बना लिये है और उससे धन कमाते है। यह आसानी से समझा जा सकता है कि यह क्रिया घृणा योग्य है।
  • दूसरों को कोई रस्म बताकर धन कमाना बाधा है। सरल और अज्ञानी जनों को उनके सेहत, धन आदि के विषय में कुछ रस्म बताकर धन कमाना पूरी तरह धोखा देना है और इससे बचना भी चाहिये।
  • किसी के घर आदि के विषय में ज्योतिष सलाह देकर धन कमाना बाधा है।
  • गाँव के मुखिया होने कि वजह से (सांसारिक विषय, जमीन कि लड़ाई आदि को सुलझाने के लिये) धन कमाना बाधा है। श्रीरामायण के उत्तर काण्ड के ६९वें सरगम में एक घटना बतायी गयी है। एक ब्राह्मण एक कुत्ते को क्रोध के कारण चोट पहूंचाता है। वह कुत्ता श्रीराम के दरबार में वैसे ही घायल अवस्था में आकर उस ब्राह्मण कि शिकायत करता है। श्रीराम उस ब्राह्मण को दरबार में बुलाकर विषय के बारें में उससे पूछते है। वह ब्राह्मण कहता है “मैं बहुत भूखा था, भोजन के लिये भीख माँग रहा था और बहुत थका हुआ था। क्योंकि यह कुत्ता उस समय मुझे परेशान कर रहा था मुझे क्रोध आया और मैंने उसे चोट पहूंचाई। मुझे जो भी सजा मिले मैं स्वीकार करूँगा”। श्रीराम उस कुत्ते के निकट जाकर उसे उचित दण्ड देने को कहते है। वह कुत्ता उस ब्राह्मण को एक गांव का मुखिया बनाने को कहता है और श्रीराम भी यह आज्ञा कर देते है। ब्राह्मंड उस कुत्ते से पूछता है ऐसा दण्ड क्यों? वह कुत्ता उत्तर देता है “मेरे पिछले जन्म में मै भी एक गाँव का मुखिया था। जहाँ तक मुझे स्मरण है मैंने सभी को समान-रूप से देखा, सभी से सभ्य तरीके से व्यवहार किया और सभी गांववालों का पूर्ण ध्यान रखा। फिर भी मैंने इस तुच्छ योनी में अगला जन्म पाया। मुझसे कोई अन्याय/ अपराध बना तों होगा यद्यपि वह अनजाने ही हुआ हो। या मेरे सहायको से कोई अपराध हुआ होगा। जिसके कारण मैं इस परिस्थिति में हूँ”I अत: हम यह समझ सकते है कि किसी गाँव कि मुखिया होना भी कठीन कार्य है और इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह स्मरण रखना है कि किसी भी देश के राजा को उसके प्रजा के पापों के लिये दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसे ही तत्व गाँव के मुखिया होने पर भी समझा जा सकता है। गलत तरिके से धन कमाने से बचना चाहिये।
  • बच्चों को मूलभूत शिक्षा देने में धन कमाना भी बाधा है। हमें शिक्षा से धन कमाने पर ध्यान केन्द्रीत नहीं करना चाहिये – अगर शिष्य स्व-इच्छा से गुरु दक्षीणा अपने गुरु को देता है तो उसे खुशी से स्वीकार कर सकते है और शिक्षक भी जितना दिया गया है उसमें संतुष्ट होना चाहिये।
  • अपने पांडित्य/ ज्ञान की बढाई कर धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह कहा गया है कि “विद्या ददाति विनय:” – ज्ञान से विनम्रता आती है। जब कोई ज्ञानी हो तो उसे अपने ज्ञान कि बढाई धन कमाने के लिये नहीं करनी चाहिये। अपितु वे ज्ञान से अधिक विनम्र होंगे और निस्वार्थ शिक्षा और व्यवहारिक उदाहरण से दूसरों को भी सिखायेंगे।
  • दूसरों कि बढाई कर के धन कमाना बाधा है। सहस्रगीति के पाधिगम “चोन्नाल विरोधं”, के पहिले पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “एन नाविलिंकवि यान् ओरुवर्क्कुम कोडुक्किलेन्” – मैं अपनी प्रिय कविता भगवान को छोड़ अन्य किसी को भी नहीं दूँगा। श्रीशठकोप स्वामीजी आगे कवियों को यह परामर्श भी देते है कि धनी लोगों कि प्रशंसा कर धन मत कमाओं, जिस के फलस्वरूप नीचे गिर जाओ। अनुवादक टिप्पणी: पुराने जमाने में कवि जन बहुत गरीब होते थे और वे राजा या कोई अमीर व्यक्ति के पास जाकर उनकी कविता द्वारा स्तुति करते थे। खुश होकर अपनी बढाई सुनकर राजा/ अमीर व्यक्ति उन्हें तोफे देते थे। आजकल के जमाने में भी कई जन धनी लोगों कि बिना वजह गुण गान कर उनसे धन प्राप्त करते है और इस संसार से पूरी तरह बन्ध जाते है। इस तरह के व्यवहार की हमारे आल्वारों और आचार्यों से निन्दा कि है क्योंकि यह स्वभाव भगवान के दासों के स्वभाव से बिल्कुल विपरीत है।
  • दूसरों का धन/संपत्ति चुराकर धन कमाना बाधा है।
  • दूसरों को धोखा देकर, छल-कपट से धन कमाना बाधा है।
  • जो यात्रा पर है उनका धन चुराना भी बाधा है।
  • दूसरों को अप-शब्द बोलकर धन कमाना बाधा है। श्रीगोदम्बाजी तिरुपावै के दूसरे पाशुर में कहती है “तीक्कुरलैच्चन्रोदोम” जिसका अर्थ है “हम किसी भी कीमत पर दूसरों को अप शब्द नहीं बोलेंगे”। अनुवादक टिप्पणी: पेरियवाच्चान पिल्लै और अळगिय मणवाल पेरुमाल नायनार अपने व्याख्यान में माता सीता कि महिमा को दर्शाते है जब वे अशोक वन में थी, राक्षसीयों द्वारा कष्ट देने पर भी उन्होंने भगवान राम को एक शब्द नहीं कहा। आय जनयाचार्य बड़ी सुन्दरता से दर्शाते कि हमें श्रीवैष्णवों कि गलतीयों को अपने मन में भी नहीं लाना चाहिये क्योंकि हृदय में अन्तरयामी भगवान विराजमान होते है – हृदय में लेने से भगवान को पता चल जायेगा – इसलिये दूसरों कि भी गलतियां लाने से बचना चाहिये।
  • दूसरों को यह अहसास दिलाना कि हम बहुत महान है और उन्हें हमारी अधीन होकर रहना है और उनसे धन आदि कमाना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग अपनी पहचान बड़े लोगों से है उसकी ढींगे मारते है और दूसरों को यह विश्वास दिलाते है कि वह बहुत ताकतवर है। जब लोग उन पर विश्वास करते है तो सांसारिक सुख के लिये वें उन्हें धन आदि देना प्रारम्भ कर देते है। ऐसे स्वभाव कि यहाँ निन्दा की गयी है।
  • पुराण पढ़कर और पुराणों पर प्रवचन कर कमाना बाधा है। पुराण पढ़कर प्रवचन देना गलत नहीं है परन्तु उससे धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहले समझाया गया है जो अपनी खुशी से देता है उसे लेना गलत नहीं है।
  • ग्रन्थों को चुराकर धन कमाना बाधा है। पुराने जमाने में साहित्य को ताड़ के पत्तों पर लिखा जाता था। वह सभी हाथ से लिखते थे जो वे बहुत कष्ट लेकर लिखे है। वह अनमोल धन है। उसे चुरा कर बेचना बहुत बड़ा पाप है। अनुवादक टिप्पणी: आज के दिनों कि परिस्थिती में हम यह देख सकते है कि लोग दूसरे के काम को चुराते है, प्रकाशित करते है और धन कमाते है और मूल लेखक को उसके हक का कुछ भी नहीं देते है।
  • कान के बाली को उठाकर धन कमाना बाधा है। इसका अर्थ स्पष्ट नहीं है।
  • उच्च परिवार/ जाति में जन्म लेने के लिये किसी कि प्रशंसा कर धन कमाना बाधा है। कुलाधिकम – अभिजात्यम – उच्च परिवार में जन्म लेना। हम यह देख सकते है कुछ जन लोगों से कहते है कि “यह व्यक्ति का जन्म उच्च परिवार में हुआ है, आप इनका सन्मान/पूजा करें और इन्हें धन दे” और फिर ऐसा धन ग्रहण करते है। ऐसे व्यवहार कि निन्दा होती है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा को स्मरण कर सकते है। – उनकी “मुक्कूरुम्बु अरुत्तवर” कहकर स्थिति कि गयी है – वह जो पूर्ण रूप से तीनों दोषों से मुक्त है यानि यह सोचना कि मैंने बड़े परिवार में जन्म लिया है, मैं बहुत धनी हूँ, मैं बहुत ज्ञानी हूँ – यद्यपि श्रीकुरेश स्वामीजी बड़े परिवार में जन्म लिये, धनी थे और शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने कभी स्वयं अपनी बढाई नहीं कि – श्रीवैष्णवों का यही सच्चा स्वभाव है।
  • स्वयं के परम्परागत स्वभाव कि बढाई करना कि मै इन सब का पालन करता हूँ और धन कमाना बाधा है।
  • सब को यह विश्वास दिलाना कि “अहं ब्रम्हा” और उससे कमाना। “अहं ब्रम्हा” अद्वैत तत्व है। अद्वैतों (कुदृष्ठी – जिसकी आँखों कि रोशनी खराब हो) ने इसका अर्थ इस तरह निकाला है कि जीवात्मा और ब्रम्हा समान है। यह तत्व श्रीरामानुज दर्शन से बिल्कुल विपरीत है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि “मैं महान हूँ” और ऐसे शिक्षा से धन कमाता हूँ। ऐसे कार्य कि भी यहाँ निन्दा की गयी है।
  • शास्त्र आदि में अपने ज्ञान कि बढाई करना बाधा है। हमें अपने स्वयं के ज्ञान के प्रचार में कभी नहीं लगना चाहिये और उससे धन नहीं कमाना चाहिये।
  • अपनी बहादुरी कि बढाई कर धन कमाना बाधा है। आज कल हम देखते है चोर आदि यह काम करते है।
  • जादु आदि दिखाकर धन कमाना बाधा है।
  • अज्ञान जनों को अपनी ओर आकर्षित कर धन कमाना बाधा है। मन्त्र, काला टीका, सम्मोहित करना आदि से दूसरों से धन लुटा जाता है। ऐसे कार्य निन्दनिय है।
  • वैद्य होकर धन कमाना बाधा है। चिकित्सा संबंधी व्यवसाय में दूसरों कि सहायता करना चाहिये नाकि धन कमाना।
  • धन का खजाना दिखाने का वचन देकर धन कमाना बाधा है।
  • निम्न जनों (सांसारी – वह जो सांसारिक खुशी कि ओर लगे हुए है) के लिये काम कर धन कमाना बाधा है।
  • कीमियागर बनकर धन कमाना। यह एक रसायन विद्या है जिसमें लोहे, ताम्बे आदि को सोने में परिवर्तित करते है। यह आज के जमाने में करना सम्भव नहीं है। परन्तु दूसरों को यह भरोसा देना कि यह किया जा सकता है और उन्हें धोखा देना बाधा है।
  • राजा कि बढाई कर धन कमाना बाधा है। इसे अधीक समझाने कि आवश्यकता नहीं है। यह आज कल सामान्य है।
  • सांसारिक समाचार आदि दिखाकर धन कमाना बाधा है। कुछ लोग केवल दूसरों कि गप्पे लगाकर जीते है – ऐसा व्यवहार निन्दनिय है।
  • जानवरों के काटने से जहर निकालने में निपुण होकर उससे धन कमाना बाधा है। साँप, बिच्छु आदि काटने से मनुष्य के शरीर में जहर फैलता है। कुछ दवा और मन्त्र द्वारा इसको ठीक किया जा सकता है। इसे दूसरों कि मदद के उद्देश से करना चाहिये नाकि व्यापार करना चाहिये।
  • भगवद विषय सिखाकर धन कमाना। यद्यपि श्रीसहस्रगीति और उसके व्याख्या दोनों को मिलाकर भगवद विषय कहते है, वह भगवान के विषयों में एक सामान्य शब्द है। उसे कोई सांसारिक लाभ के लिये नहीं दूसरों के उद्धार के लिये कहना चाहिये।
  • किसी की भगवान के प्रति श्रद्धा की बढाई करना बाधा है। हमें भगवान के प्रति श्रद्धा कोई लाभ हेतु नहीं करना चाहिये। उसका प्रचार नहीं करना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध का अनुसंधान कर धन कमाना बाधा है। किसी को भी दिव्य प्रबन्ध गाकर सांसारिक लाभ नहीं पाना चाहिये।
  • अपनी या दूसरों कि स्तुति कर धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आल्वार इस तरह कि स्तुति कर धन कमाने कि कड़ी निन्दा करते थे। उन्होंने पक्की तरह यह स्थापित किया कि हमारी जीभ (बोली) भगवान और भागवतों कि स्तुति करने हेतु है और उसे कोई दूसरे कार्य हेतु उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • बलिदान करके कमाई से अर्जित करना एक बाधा है। हमेशा यह देखा जाता है की जब धन का प्रस्ताव आता है तब कुछ लोग मौखिक रूप से “ना” बोलते है परंतु उनके हाथ उसे स्वीकार करने हेतु पूरी तरह खुले रहते है, ऐसे बर्ताव की यहा निंदा की गयी है। दूसरों के प्रति विश्वास / दयालु होने का दिखावा करना बाधा है।
  • अपनी असहाय परिस्थिती दिखाकर धन कमाना बाधा है।मेरा कोई और रक्षक नहीं है यह बताकर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान / आचार्य के कैंकर्य के नाम पर धन कमाना और इस तरह के पैसे को निजी परिस्थिती के लिये उपयोग करना बाधा है।
  • सन्यासी होने का दिखावा कर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान के लिये पुष्प वाटिका आदि है ऐसा बताकर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान को पुष्प हार अर्पण करने का दिखावा कर धन कमाना बाधा है।
  • तिरुपति जैसे दिव्य देशों कि सहायता करता हूँ ऐसा बहाना कर धन कमाना बाधा है। आज कल यह सामान्यत: देखा जा सकता है दिव्य देशों के कैंकर्य के नाम पर धन जमा करते है। इसकी यहाँ निन्दा कि गयी है।
  • उत्सवों के समय श्रीवैष्णवों के लिये रहने, भोजन आदि कि व्यवस्था के नाम पर धन कमाना बाधा है।
  • उत्सवों में विशेष पूजा आदि करवाने का वादा करना बाधा है। सामान्यत: यह देखा जाता है कि कुछ पाशुर जैसे “पोलिग पोलिग” (सहस्रगीति), “उलगमुंड पेरुवाया’” (सहस्रगीति), “कंगुलुम पगलुम” (सहस्रगीति), “नारु नरुम पोळिल” (नाचियार तिरुमौली), आदि गाया जाता है, तब भगवान को विशेष भोग लगाया जाता है। यह भी देखा जाता है कि जब स्थल पाशुर (जहाँ उत्सव हो रहा है उस विशेष दिव्य देश से संबन्धित पाशुर) विशेष भोग चढ़ाया जाता है। इस परिस्थिती का कोई लाभ लेकर धन नहीं कमाना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध के शातुमोराई कर धन कमाना बाधा है।
  • तिरुवद्यनम करने का वादा कर धन कमाना बाधा है। तिरुवद्यनम यानि दोनों उभय वेद पारायण (संस्कृत वेद और द्राविड वेदों का उच्चारण करना) और पितृ कैंकर्य (श्राद्ध)।
  • भगवान का तिरुवाराधन कर धन कमाना बाधा है। आजकल स्वयं के तिरुमाली के भगवान के तिरुवाराधन करने हेतु लोग दूसरों को नियुक्त करते है। यह सही व्यवहार नहीं है। हमें अपने तिरुमाली में स्वयं ही तिरुवाराधन करना चाहिये। जैसे हम अपना संध्यावंदन स्वयं करते है वैसे ही भगवान कि तिरुवाराधन हमें हीं करनी चाहिये – इससे कोई बच नहीं सकता है।
  • खेतों में शारीरिक मेहनत कर धन कमाना बाधा है। हमारे वर्ण और आश्रम के अनुसार हमारे लिये जो सही है वों ही करना चाहिये।

इस विषय से प्रारम्भ कर एक छोटी सी चर्चा मुष्टि कूडै पर हुई। क्योंकि अधीक विषय कई समय से चलन में नहीं है इसीलिए कुछ विषय हमने बड़े ही विस्तार से चर्चा नहीं किये है। मैं श्री व्ही॰व्ही॰रामानुजम स्वामी अपने समझ के अनुसार लिख रहा हूँ। इस समझ में कुछ कमीयाँ भी हो सकती है। चर्चा में कई जगह “मुष्टि”, “मुष्टि पुगुरुगै”, “मुष्टि कूडै”, “मौष्टिका व्यावृत्ति” आदि का उपयोग हुआ है। मुष्टी यानी सामान्यत: मुठ्ठि – मुख्यत: यह हाथ भर चावल पर केन्द्रीत है। हम श्रीवेदान्तचार्य स्वामीजी कि श्रीसूक्ति को फिर से पढ़ सकते है “यो सौदयालु: पूरादाना मुष्टिमुचे कुचेलमुनये धत्तेस्म”– अपने स्वाभाविक कृपा से भगवान कुछ समय पहिले ही कुचेला के एक मुट्ठी टूटे हुए चावल के बदले में कुचेला को बहुत धन प्रदान किये है। यह दान माँगने का पहलू ब्राम्ह्णों के वर्ण धर्म में है। सुबह अपने नित्य अनुष्ठान के पश्चात उन्हें कुछ चुने हुए घरों में जाकर भगवान का नाम लेकर भिक्षा “भवाती भिक्षाम देही” यह कहकर मांगना है। थोड़ा चावल माँगकर उन्हें अपना जीवन व्यतित करना है। महाभारत में जब पाण्डव अज्ञात में ब्राम्ह्ण वेष धारण किये तो वे दान स्वीकार कर के ही रहते थे। श्रीकुरेश स्वामीजी जो बहुत धनवान शासक थे अपना सारा धन दान कर श्रीरंगम में आकार श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण आ गये और भीक्षा माँगकर अपना जीवन व्यतित करते थे। एक दिन बारीश के कारण वह भिक्षा ग्रहण करने नहीं जा सके। उस समय आण्डाल (उनकी धर्मपत्नी) को अपने पति को भूखा देखकर बहुत दुख हुआ और उन्होने श्रीरंगनाथ भगवान से प्रार्थना की। श्रीरंगनाथ भगवान उसी समय अपना प्रसाद भेजे जिसकी कृपा से श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल को दिव्य पुत्र हुए जिन्हें हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और वेदव्यास भट्टर स्वामीजी के नाम से जानते है। भिक्षा को यहाँ “मुष्टी” कहते है। भिक्षा पात्र को “मुष्टी कूडै” कहते है। प्रतिदिन सभी को भिक्षा मांगकर दान स्वीकार कर जीना चाहिये। उस दान को भगवान के तिरुवाराधन के लिये, श्रीवैष्णवों के सत्कार आदि के लिये उपयोग मे लाना चाहिये और अन्त में प्रसाद स्वीकार करना चाहिये। ब्राम्हणों को कभी भी भविष्य के लिये धन एकत्रीत नहीं करना चाहिये। पुराने जमाने में ऐसे बहुतसी पाबंदीया थी और उसे बड़ी कठोरता से पालन किया जाता था।

  • श्री विष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में कहते है “पिच्चै पुक्कागिलुम एम्पिरान् तिरुनाममे नच्चुमिन्” – अगर आप को भिक्षा भी मांगनी पड़ी तो भी आप मेरे प्रिय भगवान श्रीमन्नारायण का नाम प्रेम से स्मरण करें – परन्तु कभी भी भगवान का नाम चिल्लाकर लेना और धन कमाना बाधा है। यहाँ हम समझ सकते है की “धन अर्जन के लिए जबरदस्ती जोर देकर भीक मांगना” और इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह पाशुर “कासुम् करैयुदै” पाधिगम का एक भाग है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्या में समझाते है कि आल्वार सभी को यह प्रेरणा देते थे कि सभी अपने बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे और आगे यह भी कहते है कि हमें अपनी जीविका भिक्षा मांगकर करना चाहिये नाकि कोई सांसारिक व्यर्थ नाम रखकर। अपने बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे तो हम उनको पुकार कर निरन्तर भगवान का स्मरण कर सकते है। बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे तो हम उनकी माता को नरकीय स्थानों पर जाने से रोक सकते है। विशेषकर ३रे पाशुर में श्रीवरवरमुनी स्वामीजी श्रीतिरुवैमोलि पिल्लै द्वारा बताई गयी श्रीनालूराचान पिल्लै से सम्बंधित एक घटना का वर्णन करते है। एक बार एक ब्राम्हण कि पत्नी एक बच्चे को जन्म देती है। उस ब्राम्हण को उसका नाम किसी देवता पर रखने कि इच्छा थी जिससे उसकी समृद्धि हो। कोई कहता है वैश्रवणन (कुबेर का नाम जो धन का देवता है)। वहाँ एक आस्तिक था वो कहता है “ऐसा कोई अर्थ रहित नाम मत रखिये। इसका नाम श्रीमन्नारायण के नाम पर रखे – उसको अगर उसकी जीविका के लिये भीख भी मांगना पड़े तो भी अच्छा है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि जब उस बच्चे का नाम भगवान के नाम पर होगा तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करेंगे ताकि उस बच्चे को भीख भी न मांगना पड़े – हमें भगवान पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि वो हमारी रक्षा करेंगे। इस भाग मे भिक्षा मांगने पर अधीक चर्चा कि गयी है (जो ब्राम्हणों के जीविका के लिये जरूरी है), इसमे हम यह भी समझ सकते है कि वह दान जो हमें धन/संपत्ति दूसरों से दान में प्राप्त हुई है।
  • श्रीवैष्णव होकर दान के लिये भिक्षा मांगने से घबराना बाधा है। अपने वर्णाश्रम धर्म (ब्राम्हण/ ब्रम्हचारी/ सन्यासी) के अनुसार दान के लिये भिक्षा मांगना सही है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीकुरेश स्वामीजी को स्मरण कर सकते है जिन्होंने दान हेतु भिक्षा मांगी। श्रीरामानुज स्वामीजी ने भी तब तक सन्यासी होकर स्वयं भिक्षा मांगी जब तक उन्हें जहर देकर मारने का प्रयास हुआ। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के आदेशानुसार किदाम्बी आचान को उनके लिये भिक्षा मांगने के लिये नियुक्त किया गया। पुराने जमाने में ब्रम्हचारी को गुरुकुल में भिक्षा मांगकर गुरु को देने कि प्रथा सामान्य थी।
  • पेट भरने के लिये भिक्षा मांगना और उससे धन कमाना बाधा है। उसे बुनियादी कार्य के लिये ही और कैंकर्य करने हेतु करना चाहिये।
  • भिक्षा अपने वर्णाश्रम के धर्म को समझते हुए मांगना चाहिये। यह समझ न होना बाधा है।
  •  भिक्षा यह समझ कर मांगना चाहिये कि हमारे पूर्वाचार्यों ने भी इसे किया है और यह हमारे शारीरिक सुविधा के लिये योग्य है। यह समझ न होना बाधा है।
  • जो दान में दिया है उससे संतुष्ट न होकर अपनी नाराजगी प्रगट करना बाधा है। हमें कुछ हीं स्थानों पर कुछ हीं समय पर मांगना और जो मिला है उससे संतुष्ट होना चाहिये।
  • दान में अधीक मिलने में अधीक संतुष्ट होना बाधा है। हमें यह सोचना चाहिये कि भगवान हम पर आज अधीक प्रसन्न होकर अधीक दिये है और हमें उसी दिन जरूरत जनों को दे देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद गीता के २.१४ में भगवान कहते है “ मात्र स्पर्शस तु कौन्तेय सितोष्ण सुक धुक्क ध: आगमापायिनो नित्यास् तां तिथिक्षव भारत” – “हे कौंतेय (कुन्ती पुत्र अर्जुन) हमें गर्मी/सर्दी, खुशी/गम आदि जो इंद्रीयों से समझे जाते है उनसे घबराना नहीं चाहिये। हे भरत (भरत के वंशज) तुम्हें इस भेद-भाव को सहन करना सिखकर उससे ऊपर उठना चाहिये”। इसलिये तात्पुर्तिक खुशी या गम को कुछ समय सहन करना चाहिये।
  • पिछले बात की तरह हमें थोड़े से दान से भी संतुष्ट रहना चाहिये – हमें अधीक के लिये कभी भी लालच नहीं करनी चाहिये।
  • हमें भगवान का नाम ज़ोर से लेना चाहिये जैसे “गोविन्दा! गोविन्दा!” ताकि दान देनेवाला भगवान का नाम सुन सके। ऐसा न करना बाधा है।
  • भगवान का नाम शिष्टाचार के अनुसार लेना चाहिये और उसे उसी भावना से लेना चाहिये।
  • हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि भगवान का नाम लेना दान लेने का एक जरिया है। यह हमारे आगमन का सूचक है इससे लोगों को दान देने के लिये मजबूर नहीं करना है।
  • उस घर से दान कि भिक्षा मांगना जहाँ अन्य देवी देवता कि पूजा होती हो बाधा है। हमें देवता कि पूजा करनेवालों से दान ग्रहण नहीं करना चाहिये।
  • हमें उस घर से दान नहीं लेना चाहिये जहाँ भगवद तिरुवाराधन को नीचा देखा जाता है।
  • उस घर से दान ग्रहण करना जहाँ शुक्रवार को पोछा लगाया जाता है बाधा है। प्रति दिन पोछा न लगाकर केवल केवल शुक्रवार को पोछा लगाने वाले निंदा के पात्र है। अनुवादक टिप्पणी: यह शास्त्र मत हो सकता है कि शुक्रवार को पोछा नहीं करना चाहिए।
  • उस घर से दान लेना जहाँ के लोग भगवान का नाम सुनने से संतुष्ट न हो। यह बाधा है।
  • भगवान/भागवतों का जहाँ अपमान हो उस घर से दान लेना बाधा है।
  • उस घर से दान लेना जहाँ घरवाले भिक्षा मांगना एक श्रीवैष्णव कार्य है यह नहीं समझते है और ऐसे श्रीवैष्णव का अपमान करना बाधा है। भिक्षा श्रीवैष्णव धर्मानुष्ठान है – इसे निम्न नहीं जानना चाहिये।
  • उस गाँव में जाना जो देवतान्तर को प्रिय हो या वहाँ के जन देवतान्तर कि पूजा को अधीक महत्त्व देते है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: ऐसे बहुत से गाँव है जो देवतान्तर के लिये विख्यात है – श्रीवैष्णवों को इससे बचना चाहिये।
  • उस गाँव में दान लेना जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण का कोई मन्दिर न हो बाधा है।
  • उस घर से दान नहीं लेना जहाँ भगवद तिरुवाराधन नियमित रूप से नहीं होता है।
  • प्रपन्न होकर दिव्य प्रबन्ध का उच्चारण किसी विशेष उत्सव के दिन दान लेने जाते समय करना बाधा है। दिव्य प्रबन्ध प्रति दिन अर्थ के साथ उच्चारण याद करना चाहिये – इसे सिर्फ किसी विशेष दिन नहीं करना चाहिये।
  • जब भी किसी को समय मिले दिव्य प्रबन्ध को पाठ करना चाहिये और उसके अर्थ को स्मरण करना चाहिये। हमारा कीमती समय सांसारिक चर्चा में व्यर्थ हो रहा है। श्रीशठकोप स्वामीजी पेरिय तिरुवन्दादि में आश्चर्य करते है कि “कैसे लोग अपना समय भगवान और उनके विशेष गुणों को स्मरण किये बिना बिताते है?”
  • रहस्य मन्त्र/ग्रन्थों का सार्वजनीक स्थानों पर बात करना बाधा है। रहस्य यानी वह जो केवल आचार्य से हीं सुनना चाहिये और अनजाने मे उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये।
  • गलत संगत होना बाधा है। गलत संग यानी बुरे दीमाग वाला, मूर्ख, जो किसी का सच्चा स्वभाव को नहीं समझता आदि। उपनिषद घोषणा करता है कि “असन्नेव सा भवतिअसत ब्रह्मेधि वेदाचेत” – जो भगवान के होने को नहीं मानता वह असत्य के समान हीं है।
  • सांसारिक सुखो से अपनी आंखों को नहीं हटाना बाधा है। हमें भगवद/भागवत विषय पर केन्द्रीत होना चाहिये और सांसारिक विषयों से बचना चाहिये जैसे स्त्री, नेतागीरी आदि। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी अपने तिरुमालै में सांसरिक सुख कि ओर लगे हुओं कि कड़ी निन्दा करते है।
  • हमें सावधानी से कदम रखना चाहिये और अपने लक्ष्य कि ओर पूर्ण केन्द्रीत रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • दान मांगने जाते समय शान्त न रहना बाधा है।
  • आचार्य से अमुधु पड़ी कूङै (दान एकत्रित करने के लिए दिया गया बर्तन) को स्वीकार न कर उनकी सेवा न करना बाधा है।
  • ऐसी टोकरी खुशी से अपने सिर पर उठाना चाहिये और इसे किरीट समझना चाहिये। यह दान की टोकरी उठाना कोई छोटा काम नहीं है। ऐसा न करना बाधा है।
  • दान स्वीकार करने हेतु जाते समय हमें निरन्तर द्वय महा मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये। श्रीवैष्णवों के लिये निरन्तर द्वय मन्त्र का उच्चारण करना स्वाभाविक है। द्वय मन्त्र को अर्थानुसंधान कर स्मरण करना चाहिये। श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम में रहकर द्वय मन्त्र को स्मरण करने कि आज्ञा किये है – “द्वयं अर्थानुसंधेन सह यावच्चरीर पादम अत्रैव श्रीरंगे सुकमास्व” – द्वय मन्त्र को उसके अर्थ सहित स्मरण कर अपना शेष जीवन श्रीरंगम में व्यतित करों।
  • जिनका पञ्च संस्कार न हुआ है उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। पञ्च संस्कार वह क्रीया है जो एक व्यक्ति को श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय कि ओर अग्रेसर करता है। जब तक कोई इस प्रक्रीया से नहीं होता हम उनसे कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकते है।
  • जो साँप के आकार कि बाली कानों में पहनता है उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: श्रीवैष्णव सादी कान कि बाली पहनते है या फिर भगवान के जो शंख और चक्र है उसकी।
  • जिनमें अहम और गर्व का भाव हो उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। हमें अपने आप को दास समझना चाहिये।
  • जब भी दान स्वीकार करते है उसमें एक भाग आचार्य, एक श्रीवैष्णवों का और एक भाग भगवान के लिये स्वीकार करना चाहिये। केवल अपने जरूरत के लिये ग्रहण करना सही नहीं है।
  • जो भी दान संग्रह किया जाता है उसे पहिले आचार्य के पास लाकर और तत्पश्चात उनकी आज्ञा हो तो अपने घर ले जाना चाहिये।
  • दान (कच्ची वस्तु) जो भी संग्रह करते है उसे सभी को दिखाना नहीं चाहिये। उसे बन्द डब्बे में घर ले जाकर, पकाकर, भगवान को भोग लगाकर फिर प्रसाद रूप में पाना चाहिये।
  • सांसारिक जनों कि प्रशंसा कर दान संग्रह नहीं करना चाहिये।
  • कुछ कमाते समय श्रीवैष्णवों पर दबाव नहीं डालना चाहिये।
  • आचार्य के धन/संपत्ति को चुराकर कमाना बहुत बड़ा पाप है।
  • भगवान के धन/संपत्ति को चुराकर कमाना बाधा है। मन्दिर के धन, संपत्ति आदि को नहीं चुराना चाहिये और ऐसे कार्य को बहुत बड़ा पाप समझा जाता है।
  • उन जनों से भिक्षा माँगना जो भगवान कि संपत्ति/धन को हीं चुराते है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भिन्न भिन्न प्रकार के अपचार के बारें में समझाते है – भगवद अपचार, भागवत अपचार और असह्य अपचार। वह भगवान के धन को चुराने को भगवद अपचार समझाते है। यह भी नहीं दूसरों को भगवान के धन को चुराने में मदद करना और उसे भिक्षा माँगकर स्वीकार करना भी भगवद अपचार है। इससे पूर्णत: बचना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: इस लम्बे विषय को समाप्त करने के लिये यह मुख्य है कि धन कमाते समय हमें सावधान रहना चाहिये। शास्त्र के दिखाये आदर्श को देखते हुए आज के पटकथा में जहाँ पूरी प्रणाली बिगड़ी है अभी हम बड़े कठीन परिस्थिती में है। शास्त्र विरोधी कमाया हुआ बहुत सारा धन अभी भी प्रचलन मे है। हमारे जरूरतों को कम करने हेतु यह ओर एक निर्देशन है। भगवान से निरन्तर प्रार्थना करता हूँ इस सांसारिक सोच और जीवन शैली से हमारी रक्षा करें।

अगले अंक में हम अन्य विषय में चर्चा करेंगे।

हिंदी अनुवाद- अडियेन केशव रामानुजदास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2014/04/virodhi-pariharangal-20.html

संग्रहण – https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १९

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १८

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कालक्षेप गोष्ठी – सबसे अधिक मोहित करनेवाले विद्वान जो अपने सहस्रगीति के व्याख्यान के माध्यम से भगवान की स्तुतियों को सुनने के लिये कई शूरों को रोक कर रखते थे

५०) कालक्षेप विरोधी – अपना समय व्यतित करते हुए आने वाली बाधाएं

सामान्यत: कालक्षेप का अर्थ है- समय गुज़ारना। हमारा समय व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। समय व्यतित करने के दो पक्ष है – देह यात्रा (देह के लाभ के लिये समय बिताना) और आत्मा यात्रा (आत्मा के लाभ के लिये समय बिताना)। देह यात्रा में वह सभी समय सम्मिलित है जो शरीर और शरीर संबंधियों के लाभ के लिये व्यतीत किया गया हो। आत्मा यात्रा अर्थात आत्मा के पोषण और कल्याण हेतु समय बिताना। हमारा समय इस जीवात्मा के उज्जीवनार्थ केन्द्रीत होना चाहिये। हमें देहिक आवश्यकताओं का भी सही तरीके से ध्यान रखना चाहिए – इसे नकारा नहीं जा सकता है, परन्तु केवल भोजन, छत, कपड़े और शारीरक भोग पर ही ध्यान केन्द्रीत नहीं करना चाहिये। श्रीभक्तिसार स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस बात को समझाया है कि हमें अपना समय किसप्रकार व्यतित करना चाहिये – उसे समझना, मनन करना और अभ्यास करना चाहिये।

श्रीभक्तिसार स्वामीजी नान्मुगन तिरुवंदादि के ६३वें पाशुर में कहते है:

तेरित्तलुदि वाशित्तुम केट्टुम वणङ्गि वलिपट्टुम पूशित्तुम पोक्किनेन पोदु ।।

अर्थात मैं अपना समय भगवान के विषय में सोच कर /चिन्तन कर, उनके विषय में लिखकर, उनके विषय में पढ़कर, उनके विषय में दूसरों से सुनकर, उनकी अभिमान रहित पूजा कर, उनका तिरुवाराधन कर व्यतित करता हूँ।

आर्ति प्रबन्ध के २६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है:

पण्डू पल आरियरुम पारुलगोर उय्यप परिवुडने चेय्दु अरुलुम पल्कलैगल तम्मैक कण्डथेल्लाम एलुदी, अवै कट्रु इरुन्थुम पिरर्क्कुक कातलुडन करपित्तुम कालत्तैक कलित्तेन – अर्थात मुस्लिम हमले के समय पूर्वाचार्यों के जो ग्रन्थ लुप्त हो गये, मैंने उनको ढूंढकर एकत्रीत किया है। हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा बड़ी करुणा से भविष्य की पीढ़ी के हितार्थ यह ग्रन्थ लिखे गये थे। जो भी ग्रन्थ मुझे प्राप्त हुए है, मैंने स्वयं उन्हें ताड़ के पत्ते पर लिखा है। मैंने अपने आचार्य (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी आदि) से सिखा, उनके अनुसार जीवन व्यतित किया और अपने शिष्यों को भी यही सिखाया।

यद्यपि कालक्षेप को सामान्यत: “समय बिताना” ऐसा समझा जाता है परंतु हम यहाँ यह समझ सकते है कि हमें पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों को शब्दश: समझ कर उन्हें आत्मसात करने पर केन्द्रीत होना चाहिए और दूसरों को उपदेशों के जरिये सिखाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इसे श्रीवैष्णव दिनचर्या श्रीवैष्णव-लक्षण-10  और श्रीवैष्णव-लक्षण-11 में विस्तार से समझाया गया है।

  • कालक्षेप के समय तमो गुण के कारण निद्रा लेना बाधा है। श्रीभक्तांघ्रीरेणु स्वामीजी तिरुमालै पाशुर 3 में कहते है “वेद नूल पिरायम नूरु मनिशर ताम पुगुवरेलुम पादियुम उरंगिप्पोगुम” – यद्यपि जीवात्मा मनुष्य देह को स्वीकार करता है, जिसे सौ वर्ष की आयु दी गई है, उसमें से आधी आयु तो सोने (विश्राम) में ही बीत गयी। यह विश्राम करना तमो गुण का परिणाम है। यद्यपि उचित विश्राम अनुगामी है (२४ घण्टे में ६ घण्टे पर्याप्त है) अधिक विश्राम करना भी हानीकारक है। अनुवादक टिप्पणी: कालक्षेप सुनते समय हमें बहुत सतर्क रहना चाहिये और जो वहाँ कहा गया है उन तत्वों पर केन्द्रीत रहना चाहिये।यह समझना चाहिये कि नमस्कार करने हेतु कोई समय की पाबंदी नहीं है और नमस्कार करने हेतु कोई अच्छा समय आदि नहीं देखना चाहिये।
  • सुबह उठते ही सांसारिक विषयों के बारे में सोचना और समय गँवाना बाधा है। जब हम जाग रहे हो तब समय को अच्छी तरह उपयोग करना चाहिये। केवल दूसरों के बारे में बुरा सोचना/चाहना बहुत बड़ा पाप है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीभागवत में यह कहा गया है कि एक भागवत कई कैंकर्य में नियुक्त हो सकता है जैसे श्रवण (भगवान के विषय पर सुनना), किर्तन (भगवान कि स्तुतियों को गाना), विष्णु स्मरण (भगवान के कैंकर्य को स्मरण करना), श्रीपाद सेवा (भगवान के चरण कमलों कि सेवा करना), अर्चना (भगवान कि पूजा करना), वंदना (भगवान कि स्तुति करना), दास्यम (भगवान कि सेवा करना), सख्यम् (भगवान के सखा होना) और आत्म निवेदन (स्वयं को पूरी तरह भगवान को समर्पित करना)। जब इतने शुभ कैंकर्य में हम निरत हो सकते है तो अशुभ काम में समय क्यों गवाना? श्रीशठकोप स्वामीजी पेरिय तिरुवंदादि में कहते है “कार कलन्द मेनियान कै कलन्द आलियान पार कलन्द वल्वयिट्रान पाम्पणैयान शीर कलन्द शोल निनैन्दु पोक्कारेल शूल विनैयिन आल तुयरै एन निनैन्दु पोक्कुवर इप्पोदु” – जब बादल के समान श्याम वर्ण वाले, जिनके हस्त कमलों में सुदर्शन चक्र है, जो प्रलय के समय में इस संसार कि रक्षा उन्हें अपने उदार में स्थान प्रदान कर करते है और जो शेष शैय्या पर लेटे है, ऐसे भगवान के दिव्य गुणों के बारे में बात करने हेतु इतने सुन्दर विषय है, तो कैसे हम भगवान के विषय में ध्यान मनन न करते हुए अपना समय व्यतित कर सकते है? आल्वार अपने दृष्टिकोण से विचार करते है और वे नहीं जानते कि भगवान के विषय में मनन किये बिना अपना समय कैसे व्यतीत करे।
  • स्त्रियों के साथ आनन्द लेते हुए अपना समय व्यतित करेंगे, यह सोचना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भौतिक आनंद में चरम आनंद स्त्री-पुरुष में संभोग है। अपने तरुण अवस्था के प्रारंभ से ही स्त्रियों और पुरुषों का ध्यान केवल आनंद प्राप्त करने पर होता है। हमारे पूर्वाचार्य ने इसे “विषयान्तर प्रावण्यम्” कहकर समझाया है– अर्थात सांसारिक आनन्द में प्रवृत्ति। श्रीमहद्योगी स्वामीजी ऐसी इच्छाओं को मन से निकालने के लिये एक साधारण उपचार देते है। वह मून्राम तिरुवंदादि के १४वें पाशुर में कहते है “मार्पाल मनम शुलिप्प मंगैयर तोल कैविट्टु” – जब हम अपने मन और इच्छाओं को भगवान पर केन्द्रीत करेंगे तो सांसारिक आनन्द के प्रति हमारा लगाव स्वतः ही लुप्त हो जायेगा। भगवान को “शुभाश्रयम्” ऐसा समझाया गया है अर्थात कल्याण गुण सागर रूप जिन्हें मनन करना चाहिए – जब हम ध्यान भगवान पर केन्द्रीत करते है तो स्वतः ही सभी पवित्रता स्पष्ट रूप से हम में भी आ जाते है और सभी अपवित्रता अदृष्ट हो जाती है।
  • करियान कळल (श्याम वर्ण भगवान के चरण कमल) के विषय में सोचे बिना समय बिताना बाधा है। भगवान को नील मेघ श्यामल (वह जो श्याम रंगवाले बादल को संबोधित करता है) ऐसा समझाया गया है। हमें भगवान के चरण कमलों पर केन्द्रीत रहना चाहिये जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते है “अनरू थेर कडविय पेरुमान कनै कलल काण्बथेन्रुकोल कणगले” – मैं कब भगवान के चरण कमलों का दर्शन करूँगा जिन्होंने रथ (अर्जुन के लिये) को चलाया? और श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में भगवान को देखने के लिये दिव्य चाहना करते है और यह कहकर स्पष्ट करते है कि “उन्नै मेय्कोल्लक काण विरुमबुमेन कणगले” – मेरे नेत्र आपके दिव्य दर्शन की चाहना करते है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में और भी कहते है “ओरु नाल कान वाराये” – कृपया एक बार आईये ताकि मैं आपके दर्शन कर सकूँ।
  • अपना समय केवल सामान्य कर्मों में व्यतित करना जो वर्णाश्रम धर्म के अनुसार बतलाया गया है। इसे वैदीक कर्मों कि निन्दा करना ऐसा अर्थ नहीं लेना चाहिये। इसे भगवद आज्ञा कैंकर्य (यह जो भगवान कि आज्ञा है,इसे कैंकर्य समझकर करना चाहिये) ऐसा लेना चाहिये। इसे “सामान्य धर्म” कहते है। कुछ कर्म (जैसे नित्य संध्यावन्दन आदि, नैमित्तिक (तर्पण, आदि कर्म) “अकरणे प्रत्यवायं” ऐसा पहिचाना गया है – जब ऐसे कर्मों को नहीं किया जाता है तो वह हमारे पापों को बढा देता है। इन कर्मों को करना ही चाहिये। परन्तु हमें केवल इन कर्मों पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये। हमें तोण्डक्कुलम (दास कुल – भगवान और भागवतों के सेवक) भी कहते है। हमारा कार्य इसी स्थिति पर केन्द्रीत रहना चाहिये और हमारा समय भगवान और भागवतों कि सेवा में ही लगना चाहिये।
  • द्वय महा मन्त्र का ध्यान किये बिना समय बिताना विरोधी है। अपने समय का सबसे सही सदुपयोग द्वय महा मन्त्र का उच्चारण कर और उसके दिव्य अर्थों का ध्यान करके करना चाहिये। शरणागति गद्यम में श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी को आज्ञा करते है कि “द्वयमर्त्तानुसंधानेन सह यावच चरीरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” –  आप श्रीरंगम में अपने इस जीवन के अन्त तक रहिये और निरन्तर द्वय महा मन्त्र के अर्थों का ध्यान कीजिये। वरवरमुनि दिनचर्या में श्रीदेवराज गुरु (एरुम्बी अप्पा) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य दैनिक गतिविधियों को प्रणाम करते है। ९वें श्लोक में यह दर्शाते है “मंत्र रत्न अनुसंधान संतत स्फुरिताधरम; तदर्थ तत्व निध्यान सन्नध्द पुलकोध्गमम” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ओष्ट निरन्तर द्वय महा मन्त्र का उच्चारण करते है (जिसे मन्त्र रत्न कहते है – मंत्रों में मणि)। उनका शरीर द्वयम के अर्थों को निरन्तर जपने से स्पष्ट दिव्य प्रतिक्रिया करता है (जो और कुछ नहीं श्रीसहस्रगीति है)। अनुवादक टिप्पणी: यह ध्यान रखना चाहिये कि द्वय महामन्त्र को कभी स्वतन्त्रता से नहीं उच्चारण करना चाहिये – हमें पहिले गुरु परम्परा मन्त्र का ध्यान कर फिर द्वय महा मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये।
  • देवतान्तरों के भजन में समय बिताना और भगवान कि पूजा कभी न करना बाधा है। हमें अपना पूर्ण समय भगवान कि पूजा में ही व्यतित करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीभक्तिसार स्वामीजी यह समझाते है कि श्रीवैष्णव वह है जो “मरंतुम पुरम तोला मांतर” – अर्थात वह जो किसी भी कीमत पर कोई देवताओं कि पूजा नहीं करते है। जब हम अपने आचार्य से पञ्चसंस्कार कि दीक्षा लेते है तो आचार्य हमें हमारे भगवान के साथ सम्बन्ध कि पूर्णत: सत्यता बताते है। जैसे एक पत्नी पूर्णत: अपने पति पर ही निर्भर रहती है और किसी से कोई लगाव नहीं रखती है उसी तरह श्रीवैष्णव भी पूर्णत: भगवान पर ही निर्भर रहते है और किसी पर नहीं।
  • सामान्य शास्त्र (वेदों पर सामान्य मार्गदर्शक) में समय बिताना और तात्पर्य शास्त्र (वेदों का तत्व जो तिरुमन्त्र आदि है) को सुनने या ध्यान करने में समय न बिताना बाधा है। सामान्य शास्त्र सत्य कहने को कहता है, धर्म (सही रहना), प्रसाद से पहिले स्नान करना, नित्य कर्मानुष्ठान करना आदि। यह जरूरी है परन्तु अन्तिम लक्ष्य नहीं है। अन्तिम लक्ष्य तो वैष्णव धर्म को समझना और उसका पालन करना है। हम इसी ग्रन्थ में कई पहलू आगे देख चुके है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदयम के कई चूर्णिकाओं में अळगिय मणवाल पेरुमाल नायनार बहुत सुन्दरता से वर्ण धर्मी (वह जो वर्णाश्रम धर्म पर केन्द्रीत है) और दास्य वृत्ति (वह जो भगवान और भागवतों के कैंकर्य पर केन्द्रीत है) के मध्य में भेद समझाते है। वर्ण धर्मी केवल वेद पर केन्द्रीत रहता है और शास्त्र के सबसे उच्च तत्व को नहीं समझता है। दास्य वृत्ति पूर्णत: तिरुमन्त्र (द्वयम और चरम श्लोक भी) पर केन्द्रीत रहता है और शास्त्र के उच्च तत्व को समझता है जो कि भगवान और भागवतों कि नित्य सेवा है। नायनार दास्य वृत्ति को साराग्य (वह जिसने तत्वों को ग्रहण किया है) कहकर बुलाते है, आदियार / तोण्डर (दास), मण्डिनार (जिसे दिव्य देशों के प्रति पूर्ण लगाव है), मिक्का वेधियार (जो शास्त्र में बहुत बड़ा ज्ञानी है) आदि। वह वर्ण धर्मी को शास्त्री (जिसका सामान्य शास्त्र के प्रति लगाव हो) बुलाते है, अन्तणर / मरैयोर (ब्राह्मण / वैधिक), मट्रैयोर (वह जो दिव्य देशों के प्रति अधिक केन्द्रीत न हो), वेधावित (वह जो सामान्य शास्त्र को पढा हो) आदि।
  • सांसारिक आनन्द को कमाने के लिये समय बिताना और व्यर्थ विषयों को सिखना बाधा है। और आत्म कल्याण के लिये समय व्यतित न करना बाधा है। आत्मा के स्वभाव भगवद भागवतों कि सेवा पर केन्द्रीत होना है परंतु सांसारिक धन पर ध्यान केन्द्रीत होना विनाशकारक है।
  • दूसरों को दुख पहूंचाने हेतु समय बिताना परंतु दूसरों कि सहायता करने के लिये समय नहीं देना। “न हिमस्याथ सर्वभूतानि” – शास्त्र का आदेश दूसरों को तकलीफ नहीं पहूंचाना। हमें अपने जीवन को इस तरह प्रबन्ध करना चाहिये कि वह दूसरों को विघ्न न पहूंचाये। यह भी कहा गया है कि “परोपकारार्थम इदं शरीरं” – यह शरीर दूसरों कि सहायता के लिये है। इसे हम कपोत उपाख्यान (कबूतर कि कहानी) जिसे श्रीरामजी ने विभीषण कि शरणागति के समय श्रीरामायण में समझाया था। अनुवादक टिप्पणी: जब विभीषणजी श्रीरामजी के पास समर्पण करने हेतु आए थे तो सुग्रीवजी और अन्य सभी ने श्रीरामजी से विरोध जताया और उन्होंने विभीषणजी को स्वीकार न करने की सलाह दी। उस समय श्रीरामजी ने एक घटना को समझाकर इस बात को स्थापित किया कि अगर विभीषण दुष्ट इरादे से भी उन्हें हानी पहुंचाने के लिये आये है फिर भी कि वह विभीषण को स्वीकार करेंगे। एक जंगल में एक पेड़ पर दो कबूतर रहते थे। वर्षा के दिन एक शिकारी उसी पेड़ के नीचे आ गया जहाँ वे रहते थे। भारी वर्षा के कारण वह शिकारी बहुत समय के लिये उस पेड़ के नीचे फंस गया। बहुत भूख लगने पर वह पेड़ पर उस कबूतर पर निशाना लगाता है। वह उस मादा कबूतर को तीर से मार देता है, और आग में उसे पका कर खा लेता है। वह उस स्थान पर कुछ और समय के लिए फंस जाता है और उस स्थान से जा नहीं सकता है। नर कबूतर जो अपने साथी के खो जाने पर बहुत दुखी था, ऊपर से यह सब देखता है और यह सोचता है “यहाँ मेरे पास एक अतिथी है और भूख से तड़प रहा है, मुझे किसी तरह उसका स्वागत कर उसे कुछ भोजन देना है”। वह कुछ सुखी पत्ती, आदि लाकर उस शिकारी के लिये अग्नि बनाकर और स्वयं उस अग्नि में गिर जाता है और उसे समर्पण कर देता है। हम यह समझ सकते है कि उस कबूतर ने अपना त्याग उस शिकारी कि भूख मिटाने के लिये कर दिया जिसे वह अतिथी समझता था। श्रीरामजी फिर कहते है “अगर में विभीषण को नहीं अपनाता हूँ जो इतने दूर से मेरे शरण में आया है तो यह संसार मुझे उस नर कबूतर से छोटा नहीं समझेगा जिसने यह जानकर के भी कि उस शिकारी ने उसके साथी को मारा उसे अपना अतिथी मानकर स्वयं का बलिदान दिया”। सुग्रीव और अन्य सभी श्रीराम से संतुष्ट होकर विभीषण का स्वागत किया।
  • दूसरे के घरों में भोजन में समय गँवाना और स्वयं के स्थान में नहीं बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: स्वयं के घर के बाहर कुछ भी खाने से पहिले हमें बहुत सावधान रहना चाहिये। अपने घर में हम यह सुनिश्चित कर सकते है कि भोजन पहिले भगवान, आल्वार और आचार्य को अर्पण किया हुआ है। परन्तु बाहर इसको सुनिश्चित करना संभव नहीं है। इसलिये हमारे पूर्वज परान्न नियम का पालन करते थे – दूसरों के हाथों से बनाया हुआ भोजन ग्रहण नहीं करना। केवल एक छुट यह है कि सामान्यत: मन्दिर, मठ, आचार्य तिरुमाली आदि में बना हुआ प्रसाद जो सही नियम से बना हुआ है और भगवान को भोग लगाने के बाद दिया गया है उसे ग्रहण करे।
  • पर-स्त्री के विषय में विचार करने में समय बिताना और स्वयं कि स्त्री के विषय में सोचना भी नहीं बाधा है। सामान्य शास्त्र स्वयं कि स्त्री के साथ समागम समझाता और स्वीकार भी करता है इस भाव से कि सही संतान की प्राप्ति हो सकती है (शास्त्र में समागम के लिये भी बहुत नियम और कानून है)। फिर भी सत सम्प्रदाय के ग्रन्थों जैसे श्रीवचन भूषण में स्वयं की स्त्री के साथ आनन्द से रहना भी अस्वीकार किया गया है – क्योंकि केवल भगवान के सुख के प्रति केन्द्रीत रहना चाहिये, सांसारिक सुख भोगना भी जीवात्मा के सत्य स्वभाव से प्रत्यक्ष विरुद्ध है।
  • दूसरों कि सम्पत्ति चुराने में समय बिताना और स्वयं की संपत्ति को दान न देना बाधा है। हमें जिसको जरूरत है उसको दान देना चाहिये आदि।
  • किसी भी प्रकार का जुआ खेलने में समय व्यतित करना बाधा है।
  • भगवान के विषय में जानकारी लेने में समय नहीं बिताना, उनके स्तुति को नही लिखना, उनके विषय में नहीं पढ़ना, उनके बारें में नहीं सुनना, पूजा नही करना आदि बाधा है।
  • अपने स्वयं कि तिरुमाली में भगवान कि पूजा के लिये सहीं अनुष्ठान के साथ समय नहीं देना, जब भी मौका मिले श्रीवैष्णवों कि सेवा नही करना और दूसरों के घर जाकर गप्पे लगाना आदि बाधा है।
  • बागीचा, पुष्प वाटिका आदि को सही बनाने में समय बिताना और उसकी देख-रेख करना। आधारभूत वस्तु कि आवश्यकताओं का ध्यान रखना एक मात्र लक्ष्य होना चाहिये।
  • हमें उद्यान आदि को अपने आचार्य कैंकर्य के लिये संभाल कर रखना चाहिये। जो आचार्य को आनन्द प्रदान करता है उसे हमें आचार्य कैंकर्य अर्थात भगवद कैंकर्य समझना चाहिये। उदाहरण के लिए श्रीअनन्तालवान स्वामीजी अपने आचार्य निर्देशानुसार तिरुमाला में एक उद्यान का निर्माण कर उसकी देख-रेख कर उसके पुष्प भगवान श्रीवेंकटेशजी को नियमित रूप से अर्पण करते थे। हमें आचार्य तिरुमाली में भी पुष्प आदि अर्पण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ती स्वामीजी जो कि श्रीपराशरभट्टर स्वामीजी के शिष्य है एक उद्यान का ध्यान रखते थे। एक बार श्रीवेदान्ती स्वामीजी की अनुपस्थिती में श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के परिवार से किसी ने उद्यान में आकर कुछ पुष्प माँगे। जो उस उद्यान कि देख-रेख कर रहा था उसने यह पुष्प भगवान के लिये है यह कहकर पुष्प देने से इंकार कर दिया। जब श्रीवेदान्ती स्वामीजी को इस विषय का पता चला तो उसी समय उस उद्यान कि देख-रेख करनेवाले को दण्ड देकर कहा यह उद्यान आचार्य और उनके परिवारवालों के आनन्द के लिये बनाया गया है और उनकी इच्छा को हमेशा पूर्ण करना चाहिये। इस घटना को पिन्भळगिय पेरुमाल जीयर के ६००० पदि गुरूपरम्परा प्रभावम में दर्शाया गया है।
  • सभी को आचार्य और उनकी तिरुमाली कि देख-रेख करनी चाहिये – ऐसा न करना बाधा है। आचार्य की शारीरिक आवश्यकता का ध्यान रखे यह शिष्य का कर्तव्य है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारे आचार्य शारीरिक आवश्यकता के लिये कहीं जाना ना पड़े – शिष्य हमेशा आचार्य के लिए सुलभ हो ताकि उनका ध्यान शिष्य के आध्यात्मिक आवश्यकता कि ओर केन्द्रीत रहे। अनुवादक टिप्पणी: यह तथ्य श्रीपिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला में इस तत्व को समझाते है।
  • केवल स्वयं के परिवार के पालन पोषण के बारे में समय बिताना और आचार्य के परिवार को अनदेखा करना बाधा है। हमें आचार्य परिवार को स्वयं का परिवार समझना चाहिये और उनकी आवश्यकता को पूर्ण करना चाहिये।
  • अपने स्वयं के शरीर कि ओर अधिक ध्यान देने में समय बिताना और आचार्य के शरीर कि ओर ध्यान न देना। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला के ६५वें पाशुर में शिष्य लक्षण को समझाते है “तेशारूम शिष्यनवन शीर्वडिवै आशैयुडन नोक्कुमवन्” – समझदार शिष्य अपने आचार्य के दिव्य रूप का बड़े प्यार से ध्यान रखेगा।
  • स्वयं के स्नान में समय बिताना और अन्य श्रीवैष्णवों को स्नान आदि करने में सहायता नहीं करना। यह श्रीवैष्णवों कि सेवा करने का महत्त्व कई प्रकार से दर्शाता है।
  • उच्च स्तर का प्रसाद (जैसे दूध, घी आदि) पाने में समय बिताना और ऐसा प्रसाद श्रीवैष्णवों को अर्पण न करना।
  • स्वयं के लिये अच्छे वस्त्र, इत्र आदि लगाने में समय बिताना और भगवान को अर्पण किया हुआ चन्दन का लेप न लगाना, भगवान को अर्पण किया हुआ पुष्प धारण नहीं करना, भगवान को अर्पण किया हुआ वस्त्र धारण नहीं करना आदि बाधा है। हम जिस भी वस्तु का उपयोग करें उसे पहिले भगवान और आचार्य को अर्पण करना चाहिये – हमें केवल उनका प्रसाद स्वीकार कर ग्रहण करना चाहिये।
  • संसार सत्कार में समय बिताना और भगवान के दिव्य घटनाओं का आनन्द न लेना बाधा है। भगवान को मायान् कहते है – उनकी लीलायें हृदय को बहुत अच्छी लगती है। हमें अपना समय ऐसे चरित्र को पढ़ने / सुनने में लगाना चाहिये नाकि सांसारिक आनन्द में समय गवाना चाहिये।
  • देवेतान्तरों कि स्तुति करने में समय बिताना और गलत बाते करना और आल्वार और आचार्य के दिव्य पाशुरों के जरिये भगवान कि स्तुति न करना बाधा है।
  • सामान्य पवित्र नदियों में जाकर समय बिताना और श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ (चरणामृत – चरण कमलों को धोया हुआ जल) न लेना बाधा है। यहाँ सामान्य पवित्र नदियां अर्थात गंगा आदि। यह बहुत पवित्र नदियां है। परन्तु श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ सबसे पवित्र है। श्रीसहस्रगीति को भी तीर्थ जैसे ही दर्शाया गया है। श्रीसहस्रगीति के पाशुर 7.10.11में कहा गया है कि “जो श्रीसहस्रगीति के पाशुरों का गान करता है उसे देवता भी पूजते है”। इससे प्रारम्भ कर सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र के मध्य में भेद कर सकते है। सामान्य शास्त्र का पालन करना जरूरी है। परन्तु विशेष शास्त्र अधिक सूक्ष्म है। हमें यह अपने बड़ों से सही तरिके से ग्रन्थ वाचन कर और उसे कैसे पालन करना है यह सिखना चाहिये। समय समय पर सामान्य शास्त्र/अनुष्ठान का महत्त्व लुप्त होता दिखता है। परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि इसका पूर्णत: त्याग करना चाहिये। इसका उद्देश केवल विशेष शास्त्र का महत्त्व दर्शाना है।
  • केवल पुण्य क्षेत्रों (जैसे काशी, गया आदि) में जाने में समय बिताना और भगवद क्षेत्रों में न जाना बाधा है। श्रीरंगम, तिरुमाला, काञ्चीपुरम, तिरुनारायणपुरम आदि विशेष क्षेत्र है जो अपने आल्वार और आचार्य को प्रिय है। श्रीरंगनाथ भगवाम स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना शेष जीवन श्रीरंगम में बिताने को कहते है हम इस बात को स्मरण कर सकते है।
  • सामान्य कविता, नाटक आदि जो केवल बुनियादि इतिहास है उसमें समय बिताना और श्रीरामायण जो भगवद पवित्र काव्य है में समय नहीं बिताना। सामान्यत: सामान्य कविता ज्ञान का स्वामी होने के लिये शिक्षा ली जाती है। परन्तु श्रीरामायण को आदि काव्य (पहली ऐतिहासिक कविता) कहते है। श्रीरामजी का जीवन जैसे है वैसे ही लिखने कि दिव्य कृपा वाल्मीकि ऋषि पर हुई थी। इसे विशेष शास्त्र भी कहते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण को शरणागति शास्त्र कहते है – जिसके कई उदाहरण है। हमारे पूर्वाचार्यों ने श्रीरामायण के व्याख्यान से कई उदाहरण लेकर कई तत्वों को स्थापित किया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी, विशेषकर श्रीरामायण के महान विद्वान थे। श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै ने श्रीरामायण के मुख्य श्लोकों पर बडी गहराई से व्याख्या लिखी है और इन श्लोकों को श्रीरामायण तनिश्लोकं कहते है।
  • इतिहास और पुराण के ग्रन्थों को पढ़ना या चर्चा करने में समय बिताना और दिव्य प्रबन्धों को नही पढ़ना और उनकी चर्चा नहीं करना बाधा है। इतिहास (श्रीरामायण, महाभारत) और पुराण (विष्णुपुराण, श्रीभागवत आदि) को पढ़ना चाहिये परन्तु वहाँ रुकना नहीं चाहिये। हमें आल्वार और उनके दिव्य प्रबन्धों समझना चाहिये और उसे पूर्ण समय देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि बढाई अपार है। श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै (जिन्हें व्याख्यान के चक्रवर्ती कहते है) पेरिय तिरुमोलि के व्याख्यान में “ओथुवाय्मैयुं” में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि बड़ी सुन्दरता से बढाई करते है। यहाँ श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै के स्वयं के शब्द है: मुरपड द्वयत्तैक केट्टू, इतिहास पुराणन्गलैयुं अधिकरित्तु, परपक्ष- प्रतिक्षेपत्तूक्कुदलाग न्याय मीमांसैगलै अधिकारित्तु, पोतु पोक्कुम अरुलिच्चेयलिलेयाम्पडि पिल्लैयैप्पोले अधिकरीप्पिक्क वल्लनैयिरे ‘ओरुत्तन’ एन्बतु। यहाँ इस पाशुर में श्रीपरकाल स्वामीजी सांदीपनी मुनि कि बढाई करते है जो भगवान कृष्ण के आचार्य है। आचार्य कैसे हो यह समझाने के लिये श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के गुणों को दर्शाते है और यह दिखाते है कि वे निपुण आचार्य है। एक सच्चे आचार्य को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के जैसे होने चाहिये जो अपने शिष्य को पूरी तरह शिक्षा प्रदान कर सके – पहिले द्वय महामन्त्र का अर्थ सुनकर, फिर इतिहास और पुराण को सिखकर, फिर न्याय, मीमांसा सिखकर आदि अन्य सिद्धान्तों को समझकर और अपना स्वयं का सिद्धान्त को स्थापित करना और स्वयं का समय आल्वारों के दिव्य प्रबन्ध और उनके अर्थों के बारें में चर्चा करने में बिताना। उसी तरह श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीभाष्य को एक बार सिखने कि और पूर्ण जीवन श्रीसहस्रगीति और उसके व्याख्या के प्रचार प्रसार करने कि आज्ञा करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पूरी निष्ठा के साथ अपने आचार्य कि आज्ञा का पालन करते है और अन्त में “इट्टुप् पेरुक्कर” यह नाम पाते है – वह जिन्होंने श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचित तिरुवाय्मौली के इदु व्याख्यान का प्रसार किया।
  • पूर्व पक्ष के ग्रन्थों में समय व्यतित करना और अपने सिद्धान्त के ग्रन्थों पर थोड़ा समय भी न देना बाधा है। पूर्व पक्ष के ग्रन्थ अर्थात अन्य मतों के ग्रन्थ। उन्हें सिखना भी जरूरी है और दूसरों के तर्क को सिखना और समझना जरूरी है ताकि हम स्पष्टता से अपने सिद्धान्त को स्थापित कर सके। परन्तु अपने सत सम्प्रदाय को छोड़ निरन्तर केवल अन्य सिद्धान्तों के ग्रन्थ का वाचन करना बहुत बड़ी गलती है। हमें जो विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त को संबोधित करता है ऐसे श्रीरामनुज दर्शन में डुब जाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमने यह देखा कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने पूर्व पक्ष को यादव प्रकाश के सन्निधी में पढ़ा – परन्तु अन्त में विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त को स्थापित किया और यादव प्रकाश को समझाकर और अपने शिष्य रूप में स्वीकार किया। हमने यह घटना भी देखी जहाँ श्री कुरेश स्वामीजी (उनके बचपन में) थोड़े समय के लिए बाह्य ग्रंथ (जो वेद को प्रमाण नहीं मानते) का व्याख्यान सुनते है और उसी वजह से घर देरी से पहुंचते है तब उनके पिताजी श्रीकुरेश स्वामीजी को श्रीपाद तीर्थ से शुद्ध करके ही अंदर आने की अनुमति देते है।
  • बिना अपने सदाचार्य कि सेवा किये केवल भगवद सेवा में समय बिताना यह बाधा है। भक्ति और कैंकर्य भगवान के प्रति प्रथम नियम है। यही आचार्य के प्रति अन्तिम नियम है। इस प्रशंसा को मधुरकवि निष्ठा (मधुरकवि आलवार अपने आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे) और श्रीआन्ध्रपूर्ण पड़ी (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी जो हमेशा अपने आचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी कि सेवा करते थे) कहते है। इसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेशरत्नमाला के ६० और ६६ पाशुर में विस्तार से समझाते है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य निष्ठा को समझने के लिये कृपया अंतिमोपाय निष्ठा (http://ponnadi.blogspot.in/p/anthimopaya-nishtai.html) और चरमोपाय निर्णय (https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/charamopaya-nirnaya/) को पढे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/03/virodhi-pariharangal-19.html

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार्

71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।

 भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार्

भक्त की भक्ति भक्ति-योग (भक्ति-शास्त्र) के नियमों के अनुसार ही होती है । परन्तु प्रपन्न के लिए भगवद्विषयोत्पन्नासक्ति ही भक्ति कहलाती है । साधना-भक्ति से भक्तिमान भगवान् को प्राप्त करता है । प्रपन्न के लिए, भक्ति का उपयोग स्वरूपानुरूप जीवन व्यापन मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे इन तत्त्वों को बहुत सुन्दर रूप से समझाया है । सूत्र 271 मे स्वामी कहते है ः- प्रपन्न के लिए भक्ति भगवद्विषयासक्तिरूप धारण करती है । श्रीवरवरमुनि स्वामी इस सूत्र व्याख्या मे कहते है जिस प्रकार अत्यन्त भूखा जैसे अन्नादि ग्रहण करता है ठीक वैसे ही भक्ति से ही एक प्रपन्न भगवद्कैङ्कर्य को यथारूप  से कर सकता है ।

72) भक्तिमानुक्कु पलत्तिल् स्रद्दै इल्लातपोतु तविरलायिरुक्कुम्, प्रपन्नुक्कु स्वरूप-प्रयुक्तमाय् वरुमतागैयाले ओरुकालम् तविरातायिरुक्कुम्

तिरुप्पाणाऴ्वार – पूर्णतया पेरियपेरुमाऴ् के प्रति आसक्त

भक्तिमान जब उपेय (लक्ष्य) के प्रति निरुत्साहित या रुचि या इच्छा को खोता है तो उसकी भक्ति मे रुकावट होती है अतः भक्ति सफलीकृत नही होती । चूँकि प्रपत्ति जीव के स्वरूपानुरूप है अतः एक बार करने से उस जीव की रुचि (मे रुकावट) प्रतिबंधित नही होती ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भक्तियोगानुयायी को प्रतिक्षण भगवद्चिन्तन करते रहना है । अगर गलती से भी एक क्षण के लिए भगवद्विस्मृति हो तो उसकी भक्ति मे बाधा आती है और अन्ततः रुक जाती है । चूँकि प्रपत्ति सिद्धोपाय (भगवान् ही उपायोपेय है और भगवान् अपने शरणागत की रक्षा करने मे सक्षम है) है अतः भगवान् को उपायोपेय स्वीकृति ही जीव (जो नित्य भगवद्दास है) का यथार्थ स्वरूप है ।

73) अवन् गुण निबन्धनमन्रु, अवनोट्टै सम्बन्धम् सत्ताप्रयुक्तमेङ्गै

जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भगवद्गुणों पर आधारित नही है अपितु यह स्वाभाविक सम्बन्ध भगवच्छेषत्व (जो स्वरूपानुरूप) है के आधार पर है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः नम्माऴ्वार  तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ “कडियन् कोडियन्  . . . आगिलुम् कोडिय एन् नेन्जम् अवन् एन्रे किडक्कुम् ” पासुर मे कहते है भगवान् पाषाण-हृदयी है फिर भी इस दास का मन आप पर ही केन्द्रित है और सदैव आप के ही मनन चिन्तन मे है । नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे अनसूया और श्री सीता देवी के संवाद का उदाहरण देते है । जब अनसूया कहती है कि ” एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति साक्षात् भगवान् है ” तो भगवती सीता कहती है –  सभी का ऐसा विचार है कि मै भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य गुणाधार पर उनके प्रति आसक्त हूँ । अगर मेरे स्वामी स्वगुणों को त्याग दे और बदसूरत भी हो जाए फिर भी उनके प्रति मेरी आसक्ती को नही त्यागूँगी । पर मै स्वकथन का निरूपण नही कर सकती क्योंकि मेरे प्रिय स्वामी कदाचित भी स्वगुणों का त्याग नही करेंगे । पिळ्ळै लोकाचार्य इसी तत्त्व को श्रीवचनभूषण के 111वें सूत्र मे कहते है ” गुण कृत दास्यत्तिलुम् काट्टिल् स्वरूप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानम्” अर्थात् स्वरूपारूप भगवच्छेषत्व, गुणानुरूप भगवच्छेषत्व की तुलना मे श्रेष्ठ है । अगर मान लिया जाए कि यह भगवच्छेषत्व गुणानुरूप है तो जिस दिन यह गुण नज़र नही आयेंगे उस दिन (समय) दासत्व को छोड़ देंगे और इसी को वास्तविक आत्महत्या कहते है । परन्तु यह स्वाभाविकानुरूप (जो अपरिवर्तनशील है) है तो हम इसका (भगवच्छेषत्व का) परित्याग कदापि नही करेंगे ।

74) भगवद्विषयत्तिलोरडिवर निन्रवर्गळ् स्लाकनीयर्

जो कोई भी भगवान् के प्रति छोटा सा कार्य (करता) (कदम उठाता) है वह सदा कीर्तन (प्रशंसा) के योग्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः इस भौतिक जगत् मे जीवों के लिए जब इन्द्रिय तृप्ति के अनेकानेक साधन है तो उन जीवों मे अगर एक भी जीव भगवान् के प्रति आसक्त हो, वह सदा प्रशंसा के योग्य है । ऐसे आसाक्त अगर किसी श्रीवैष्णव का नित्य मार्गदर्शन प्राप्त हो तो वह अतीव शीघ्रता और सरलता से स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त करता है और सद्व्यवहार से स्वस्वरूप को समझता है ।

75) अत्तलैयाले वरुमतोऴियत् तान्तामोन्रै आशैयप्पडुगैकूडप्पऴि

सब कुछ भगवदेच्छा (भगवान् की इच्छा) अनुसारेण होना चाहिए । स्वमनोरथ पूर्ती भगवान् से याचना करना स्वदोष है । सदैव भगवद्मुखोल्लास से कार्य करना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् शेषी (स्वामी) है और जीव शेष (किंङ्कर) है । स्वामी को इच्छा कर आशीर्वाद देना चाहिए जो उस (दास) (सेवक) के लिए अनुकूल हो । शेषी होने की वजह से जीव का स्वतन्त्र इच्छा होना दोषयुक्त है और स्वरूप नाश कारक है ।

76) उडैयवने नम् कार्यत्तुक्कुक्कडवन्

भगवान् स्वामी है और जीवात्मा उनका सेवक है । शरणागतों का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः आत्मा देह द्वारा कार्य करता है और इन्हीं कार्यों को करने का मार्गदर्शन आत्मा देता है । भगवान् जीवात्मा का आन्तरिक आत्मा के रूप मे आवास करते है और यही जीव उनका शरीर । अतः शरीर रूपी जीव का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है । पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के चरमश्लाक विवरण 258 वें सूत्र इसी विषय को समझाते हुए कहते है ःः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है – “मोक्षयिष्यामि” अर्थात् ” उद्धार करूँगा ” “मै रक्षा करूँगा” । सूत्र मे स्वामी कहते है – ” इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित्तरेन् एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक् कोळ्ळेनो ” । इस सूत्र व्याख्या मे श्रीवरवरमुनि कहते है – अब तक तुम (अर्जुन) स्वयं को स्वतन्त्र मानते थे ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा । परन्तु अब तुम परतन्त्र मानकर (जैसे देह आत्मा पर निर्भर होता है उसी प्रकार) मुझ मे शरणागति किये । वरवरमुनि स्वामी कहते है यहाँ अर्जुन का भ्रम (दोष) निवारण कर्तव्य भगवान् का है और अर्जुन का शुद्धी एवं उद्धार का फलस्वरूपी भगवान् ही हैं।

77) वस्तुवुक्कु गुणत्तालेयिरे उत्कर्षम्  । अन्द गुणाधिक्यमेङ्गेयुण्डु, अङ्गेयिरेयेत्तम् (अङ्गेयिरेयेट्रम्)

एक वस्तु के प्रति उत्कर्ष का कारण उस वस्तु मे उपलब्ध विशेष गुण ही है । जब ऐसे गुणाधिक्यता हो तो ऐसे गुण उत्कृष्टता (विशिष्टता) प्राप्त करते है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् मे मुख्यतः दो विशेष गुण है – पहला कि वह विशिष्ट असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार राशि है और दूसरा असद् गुणों के विपरीत है वह । इसी कल्याण गुणों के सान्निध्य की वजह से उनकी वन्दना (स्तुति) सभी करते है ।

78) शेषभूतन् स्वरूपम् पेट्ट्रडिमै सेइगै शेषिक्कु पेट्ट्रिरे

जैसा कहा गया है “मेय्याम् उयिर् निलै” (तिरुवाय्मोऴि तनिया) – अर्थात् भगवद्मुखोल्लास तभी होता है जब जीव भगवच्छेशत्व को स्वीकार कर भगवद्सेवा करें । ऐसा करने पर भगवान् को अत्यन्तहर्ष प्राप्त होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः कहा गया है – “चेतन लाभं ईश्वरनुक्कु” अर्थात् जब भगवद्सम्पत्ति जीव भगवद् निष्ठा मे परिपूर्ण रूप मे सिद्ध होता है, भगवान् ही इससे लाभ प्राप्त करते है ।

भगवान् ही जीव को मोक्ष प्राप्ति के सम्मुख लाने के लिए नित्य संसार की सृष्टि कर, विभिन्न अवतार लेकर, आऴ्वार एवं आचार्य रूप मे इस दिव्य ज्ञान का प्रसार करते है । अन्ततः यह कार्य से जब उनकी सम्पत्ति की शुद्धि होती है तो यह उनके लिए ही श्रेयस्कर है ।

79)  स्वनिकर्षम् सोल्लुगै ज्ञानकायम् । ईश्वरोऽहं एन्रिरुक्कै अज्ञान कार्यम् ।

जैसे अमुदानर (तिरुवरङ्ग स्वामी) रामानुज नूत्तन्दादि के 48वे पासुर मे कहते है – –  स्वदोष गुणानुसन्धान ही असली पहचान है सच्चे आत्मज्ञान की । अर्थात् मुझ समान कोई तुच्छ नही है ।

मै ईश्वर हूँ कहना अज्ञानता और अहं कारणोत्पन्न है ।

80) तीर्थङ्गळिळे वर्त्तिक्किर सत्त्वङ्गळुक्कु पापम् पोगिरतिल्लैयिरे ज्ञानमिल्लामैयाले

कहते है की तीर्थ स्थलों के जलों मे रहने वाले विभिन्न जीवों का आत्मोद्धार नही होता है क्योंकि उनको स्वरूपानुरूप ज्ञान नही होता है अतः दोष निवारण नही होता है । केवल और केवल स्वरूपानुरूप ज्ञान से ही जीव दोषों से मुक्ति पाता है । अतः केवल तीर्थ जल मे स्नान मात्र से उद्धार नही होता ।

अनुवादक टिप्पणी ःः उदाहरणार्थ गङ्गा मे कोई स्नान करता है तो उसको यह ज्ञान होना चाहिये कि यह दिव्य गङ्गाजल का उद्भव भगवान् श्रीमन्नारायण के दिव्य चरणारविन्दों के चरणामृत से हुआ है जो इस सम्पूर्ण जगत् के सर्वरक्षक है । जब तक ऐसा ज्ञान वर्धन विचार नही होता है और केवल सोचता है कि यह सिर्फ दिव्य नदी जल है तो कोई उद्धार नही होता है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-8.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १८

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

४९) अंजली विरोधी – अंजली/ प्रणाम/ नमस्कार करते समय बाधाएं (दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करना)।

अंजली का अर्थ दोनों हथेली को जोड़ नमस्कार करना। यह ४८वें विषय (“वन्दना”- प्रणाम) से संबंधित है। साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात हमें उठकर नमस्कार करना चाहिये। बहुत से समय यह भी देखा गया है कि बिना पूर्ण अभिवादन/ साष्टांग के केवल नमस्कार ही किया जाता है। नमस्कार दोनों हाथों को जोड़कर छाती के करीब लाकर किया जाता है। प्रायः यह भी देखा जाता है कि हाथो को अंजलि मुद्रा में सिर पर भी रखा जाता है। अंजली यानी “अम् जलयती इति अंजलि:” वह जो भगवान को पिघला दे, जिन्हें “अ” –अकार कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि “अंजलि: परमामुद्रा क्षिप्रं देवप्रसादिनी” – अंजली अन्तिम और उच्च स्तर की मुद्रा है, जिससे भगवान कि कृपा तुरन्त प्राप्त हो जाती है।

  • भगवान के चरण कमलों पर अपना ध्यान केन्द्रीत कर अंजली मुद्रा को करना चाहिये। देवतान्तर, सांसारिक अमीर जनों आदि अन्य तत्वों पर ध्यान केन्द्रीत कर अंजलि नहीं करना चाहिये।
  • यह समझना चाहिये कि नमस्कार करने हेतु कोई समय की पाबंदी नहीं है और नमस्कार करने हेतु कोई अच्छा समय आदि नहीं देखना चाहिये।
  • यह किसी भी श्रीवैष्णव द्वारा और किसी भी श्रीवैष्णव के प्रति किया जा सकता है (किसी योग्यता की जरूरत नहीं है), यह तथ्य न समझना बाधा है। उसी तरह यह विचार करना कि अंजली करने के लिये कोई विशेष ज्ञान कि आवश्यकता है यह सही नहीं है। जिसे भी भगवद सम्बन्ध प्राप्त हो वह नमस्कार कर सकता है। हम श्रीपरकाल स्वामीजी के तिरुनेडुन्दाण्डगम के १४वें पाशुर में देख सकते है कि “वलरत्तदनाल पयन पेट्रेन वरुगवेन्रु मडक्किलियैक कैकुप्पि वणङ्गिनाले” – अर्थात यद्यपि वह तोता परकाल नायकी (श्रीपरकाल स्वामीजी का स्त्री भाव) द्वारा उत्थापित किया गया था, परंतु जब वे तोते को भगवान का नाम उच्चारण करते हुए सुनती है तो बहुत आनंदित होती है और स्वयं अपने ही तोते को दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करती है।
  • कोई किसी भी परिस्थिति में नमस्कार कर सकता है, यह न समझना बाधा है। शरणागति गद्यम में श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है “ऐनकेनाबि प्रकारेण द्वयवक्ता” – जिस प्रकार किसी भी परिस्थिति में द्वय महा मन्त्र का अनुसन्धान किया जा सकता है – उसी तरह किसी भी परिस्थिति में नमस्कार किया जा सकता है, जिससे भगवान द्रवित हो जाते है।
  • एक अंजली प्रर्याप्त है ऐसा न समझकर सब ही को कई अंजली करना, यह सोचना बाधा है। सकृत- एक बार। असकृत- अनेक बार। स्तोत्र रत्न में आल्वंदार स्वामीजी भगवान से कहते है “तवदडिघ्रमुद्दिश्य कदापि केनचित् यथातथा वापि सकृत्कृतोञ्जलि: तदैव मुष्णात्यशुभान्यशेषतः शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते” – किसी के द्वारा किसी भी समय किसी भी तरीके से आपके चरण कमलों कि ओर किया गया एक नमस्कार उसी क्षण उसके सारे पाप मिटा देगा और उस व्यक्ति का कल्याण होगा और उसकी वह अच्छाई कभी कम नही होगी। इसलिये एक बार नमस्कार करना पर्याप्त है उसे बार बार करने कि कोई अवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने श्रीगुण रत्न कोष में बड़ी सुन्दरता से ५८वें श्लोक में पेरिय पिरट्टियार कि स्तुति करते है “ऐश्वर्यम अक्षर गतिम् परमं पदम् वा कस्मैचित्त अंजलि परम वहथे विधिर्य अस्मै न किंचित उचित्तम कृतं इति अथ अम्ब त्वं लज्जसे कथय क: अयं उदारभाव:” – अर्थात प्यारी माँ! अगर कोई एक बार आपके सन्मुख नमस्कार करता है, तो आप उसे सांसारिक धन, परमपदधाम और परमपदधाम का कैंकर्य देकर कृपा करती हो। सबकुछ देने के पश्चात भी आप यह सोचती हो कि ‘क्या मैंने पर्याप्त प्रदान किया?’ और संकोचवश अपना सिर झुका देती हो। इससे भगवान और अम्माजी के भावों का पता चलता है कि भक्त के उनके पास पहूंचने के सबसे न्यूनतम प्रयास को भी अत्यंत बड़ा जानकार, वे उस पर एक ही क्षण में कृपा बरसाते है। इसलिये अधिक प्रयास के बारे में तो क्या कहना?
  • नमस्कार से भविष्य में उसका फल प्राप्त होगा और उसका परिणाम तुरन्त नहीं मिलेगा, ऐसा विचार करना बाधा है। जैसे कहा गया है “क्षिप्रं देव प्रसादिनी” कि जब कोई एक ही बार अंजली अर्पण करता है, तो भगवान एक ही क्षण में उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है। यह पिछले बात कि चर्चा से समझाया जा चुका है।
  • प्रत्येक अपचार के लिये पृथक प्रणाम करना अथवा सभी अपचार के लिये एक ही प्रणाम पर्याप्त नहीं है, यह सोचना बाधा है। केवल यह कहना कि “अपराधानिमान् सर्वान् क्षमस्व पुरुषोत्तम!” – हे आत्माओं में श्रेष्ठ (भगवान)! कृपा कर मेरी सारी गलतियों को क्षमा करना ऐसा कहकर केवल एक अंजली करना प्रयाप्त है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्लोक “उपचारापदेशेन……” के भाग से संबंधित है। यह श्लोक तिरुमाली में तिरुवाराधन के अन्त में गाया जाता है। इसका अर्थ “हे भगवान! मैंने यह तिरुवाराधन आपका लाड़ लड़ाने और सेवा करने हेतु प्रारम्भ किया। परन्तु मैंने इसको समाप्त करते समय सेवा कम और गलतियाँ अधिक की है। इसलिये कृपया आप मुझे मेरी गलतियों के लिये क्षमा करें”। भगवान की महानता को देखते हुए कोई भी उनकी सम्पूर्ण सेवा नहीं कर सकता है। और इस संसार बन्धन में बंधे हुए जीवात्मा और उसकी मानसिक स्थिति को सोचते हुए भगवान की सेवा करते समय भी भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीत करना और सही तरिके से उनकी सेवा करना कठीन है। इसलिये भगवान की महानता और जीवात्मा में दोष (कमी) के कारण जीवात्मा के दृष्टीकोण से तिरुवाराधन असंतोषजनक ही होगी। परन्तु भगवान सौलभ्य के सारसंग्रह है इसलिए जो भी कैंकर्य भक्त जन करते है, वे उसमें दोष न देखते हुए बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करते है।
  • अंजली थोड़े नहीं बल्कि सम्पूर्ण पाप को मिटा देती है। इसे “सर्वपापनिवारणी” (वह जो सभी पापों को निकाल देती है) कहते है। परन्तु जो जानकर पाप करके विचार करते है कि भगवान को नमस्कार करने से सभी पाप समाप्त हो जायेंगे उनके लिये कोई आशा नहीं है।
  • यह विचार करना कि प्रणाम से थोड़ा शुभ होगा और पूर्ण शुभ नहीं होगा, यह बाधा है। जैसे स्तोत्र रत्न के २८वें श्लोक में चर्चा की गयी है कि यह पूर्ण शुभ करता है।
  • केवल इच्छा फल प्राप्ति हेतु प्रणाम करना और यह न जानना कि फल प्राप्ति के पश्चात भी प्रणाम करते रहना चाहिए, यह बाधा है। इसके परिणाम स्वरूप यह भगवद अनुभव पर केन्द्रीत है। परमपद में नित्य और मुक्तजन भी प्रणाम करते है। जैसे “नम इत्येव वादिन:”। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्रगीति में कहते है “कैकलालारत थोलुत्तु थोलूतुन्नै” – मैं प्रणाम कर निरन्तर आपकी पूजा कर रहा हूँ। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि व्याख्यान इसके लिये बहुत श्रेष्ठ है – उनका तेज जो चमकदार सूर्य कि तरह चमकता है, वह आल्वारों के दिव्य मनोभाव को दर्शाता है। वह कहते है श्रीशठकोप स्वामीजी कि प्रणाम करने की प्रवृत्ति उन्हें अत्यधिक प्रिय है। वह कहते है “वह जो सांसारिक लाभों पर केन्द्रीत है, वह एक बार उसकी इच्छा पूर्ण होने पर आराधना करना छोड़ देता है। वह जो साधन भाव से अपनी इच्छाओं के लिये पूजा करता है, उन इच्छाओं कि पूर्ति होने पर उसे बन्द कर देता है। परन्तु जैसे ‘नित्यांजली पुड़ा’ में कहा गया है कि वह जो इसे यात्रा (जीवन पोषक कार्य) मानता है, और श्वेत द्वीप वासिस (दूध के समुन्द्र के निवासी), नित्य और मुक्त जन परमपद में भी निरन्तर प्रणाम करते है जैसे पहिले देखा गया है ‘नम इत्येव वादिन:’”। वह निरन्तर यह समझाते है कि इन महान भक्तों से उनके प्रति प्रणाम करवा कर भगवान स्वयं पोषण करते है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि भगवान के प्रति प्रेम और स्नेह से जनित कैंकर्य के रूप में प्रणाम करते रहना चाहिए।
  • यह नहीं समझना कि जिसप्रकार गरुड मुद्रा साँप के जहर को नियंत्रण करती है उसी प्रकार, यह प्रणाम मुद्रा भगवान के स्वातंत्रीयं (सम्पूर्ण मुक्तता) को नियंत्रित और जीतती है। हमें इस तत्व पर विश्वास होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण के श्लोक में “च चाल चापं च मुमोच वीर” – जब रावण धनुष हाथ में लिये भगवान राम पर बाण चला रहे थे, तो भगवान राम भी उनका उत्तर बाण चला कर दे रहे थे – परन्तु जब भगवान ने रावण का धनुष तोडा, रावण ने उस टूटे धनुष को नीचे गिरा दिया (यह सोचकर कि भगवान राम उस पर वार नहीं करेंगे, क्योंकि उसके हाथ में शस्त्र नहीं है) भगवान राम ने तुरन्त उस पर वार करना छोड़ एक और जीवन दान दिया। हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते है कि अगर रावण उस वक्त हाथ जोड़ लेता, तो वह भगवान राम पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेता – क्योंकि भगवान एक ही श्रेष्ठ मुद्रा से नियंत्रण में आते है, वह है प्रणाम की मुद्रा।
  • हमें यह दृढ़ता से समझना चाहिये कि जैसे अभय हस्त (रक्षण अवस्था), शेषी (स्वामी) के लिये योग्य है, वैसे ही अंजली हस्त (हथेलियाँ जोड़ी हुई स्थितिमें), शेष-भूत (सेवक) के लिये योग्य है। ऐसा विश्वास न होना बाधा है। शेषी अर्थात भगवान। वह अपने हस्त अलग अलग प्रकार से धारण करते है जैसे अभय हस्त (रक्षा प्रदान दशा), वरद हस्त (आशीर्वाद प्रदान करना), आह्वान हस्त (निमंत्रण देना) आदि। उसी तरह जीवात्मा के लिये अंजली हस्त ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह जीवात्मा के अनन्य गतित्व और आकिंचनयं को प्रगट करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति के पाशुर के व्याख्या में हम यह देख चुके है, भगवान भक्तों की रक्षा करके स्वयं को प्रमाणित करते है और जीवात्मा भगवान द्वारा की गयी रक्षा को स्वीकार करके स्वयं को प्रमाणित करते है।

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  • स्वयं के रक्षा हेतु प्रणाम मुद्रा को करना बाधा है। नमस्कार करने से हम यह स्पष्ट कर देते है कि हमारी रक्षा हम स्वयं नहीं कर सकते है। जिस प्रकार अन्य कोई रक्षा प्रदान नहीं कर सकता, वैसे ही हम स्वयं कि रक्षा नहीं कर सकते है। जैसे तिरुक्कोलुर पेण पिल्लै वार्ता ग्रन्थ में कहा गया है कि “इरु कैयुम विट्टेनो द्रौपदीयैप पोले”– क्या मैं अपने दोनों हाथों को ऊपर करके स्वयं की रक्षा करना छोड़ दू और संपूर्णत: भगवान की शरण हो जाऊ, जैसे द्रोपदी ने किया था? जब द्रोपदी स्वयं का सम्मान खो देने की भयावह स्थिति में थी, उसने स्वयं को बचाने के सभी प्रयासों को छोड़ दिया, “हे कृष्ण! हे द्वारकानाथ!” ऐसे भगवान को पुकारा और तुरंत भगवान ने उसका रक्षण किया। इसी तरह हमें भी स्वयं की रक्षा के विश्वास का रंग चढ़े बिना सिर्फ मुखौल्लास हेतु प्रणाम करना चाहिए।

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  • कैंकर्य को छोड़ अन्य लाभ के लिये प्रणाम करना। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का इस जीवन में एक ही कार्य है भगवान और उनके भक्तों कि सेवा। ओर कोई आशा नहीं होनी चाहिये। जीवात्मा और भगवान के मध्य में यह कोई व्यापार सम्बन्ध नहीं है जो किसी लाभ से प्रणाम करें। हमने पहिले यह श्रीसरोयोगी स्वामीजी के मुदल तिरुवंदादि के २६वें पाशुर में देखा है “एलुवार विडैगोल्वार ईन तुलायानै वलुवा वगै निनैन्दु वैगल तोलुवार …” – वह जो सांसारिक धन को देखता है और वह जो कैवल्य को देखता है अपनी इच्छा पूर्ण होते ही भगवान को छोड़ देगा, परन्तु जो शुद्धता से भगवान कि सेवा करना चाहता है वह बिना कोई चाह के भगवान कि निरन्तर सेवा करेगा।
  • मन्दिर में देवतान्तर के सामने शठारी (श्रीशठकोप स्वामीजी) लेना बाधा है। यह सामान्य चलन है कि जब भी श्रीसहस्रगीति को गाते है हर पाधिगम (१० पाशुर को) के अन्त में जब ११वें पाशुर को गाते है और श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते है, तो तुरन्त प्रणाम करना चाहिये और श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति आभार प्रकट करना चाहिये कि उन्होंने हम पर बहुत कृपा की। यह भी कहा जाता है कि श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम किसी भी समय कहीं भी सुने तो हमें प्रणाम करना चाहिये। परन्तु हम किसी देवताओं के मन्दिर में या निकट भी हो तो ऐसा करना नही चाहिये (उसे भूलवश, उन देवताओं को प्रणाम समझा जा सकता है)। इस संदर्भ में यह कहा जाता है कि “शठगोपनुम त्याज्यं ” – ऐसी परिस्थिति में शठारी का प्रणाम भी त्याग किया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि श्रीसहस्रगीति को पुरप्पाडु (सवारी) के समय ज़ोर से नहीं गाया जाता परन्तु महान भक्त इन पाशुरों को अपने हृदय में उनके अर्थ का स्मरण करते हुए गाते है। ऐसी दशा में सावधान रहना चाहिये और देवतान्तरों को आदर देने से बचना चाहिये।
  • जब कोई अवैष्णव नमस्कार करता है तो उनके प्रति ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिये। इसके प्रतिकूल किसी भागवत को देखकर उनके नमस्कार करने के पूर्व हमें प्रणाम करना चाहिये।
  • आचार्य को देखते ही हमें न केवल प्रणाम अपितु साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात उठकर फिर प्रणाम करना चाहिये।
  • प्रणाम को अशुद्ध हृदय से अथवा बनावट (फैशन) से नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रणाम को पूर्ण प्रसन्नता से सही प्रकार से करना चाहिये। शास्त्र में किसी को भी एक हाथ से प्रणाम करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते ही अपने सर पर हाथ रखकर प्रणाम नहीं करना बाधा है। इसकी पहिले भी चर्चा की गयी है। गोष्ठी में पाशुरों का गान करते समय, हम लोगों को हाथ को शीष पर रखकर अंजली करते नहीं देखते। भगवान की पादुका (चरण कमल) को ही श्रीशठकोप कहते है। गोष्ठी में या कहीं भी जब हमें श्रीशठकोप स्वामीजी से आशीर्वाद मिल रहा है, तब हमें आदरतापूर्वक शीष झुकाना चाहिये और उस आशीर्वाद को प्रणाम के साथ स्वीकार करना चाहिये।

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श्रीशठारी में विराजे श्रीशठकोप स्वामीजी – वानमामलै

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ७

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

६१) एम्पेरुमानार् दर्शनस्तरिल् एत्तनैयेणुम् कल्वियिल्लात स्त्रीप्रायरुम् देवतान्तरगळै अडुप्पिडु कल्लोपादियाग निनैत्तिरुक्कुम्

श्रीरामानुज दर्शनान्तर्गत अनुयायियों मे, एक अशिक्षित स्त्री (जिसको प्राथमिक शिक्षा भी अप्राप्त हो वह) भी जानती है कि परतत्त्व, परमेश्वर, परब्रह्म श्रीमन्नारायण ही है और अन्य देवतान्तर (देवी-देवता) उस पत्थर (ईंट) की भाँति है जिसका प्रयोग व्यन्जन बनाने मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व परमेश्वर परब्रह्म है । ब्रह्मा,रुद्रादि देवी-देवता गण श्रीमन्नारायण के सेवक हैं । वह सभी कर्म से लिप्त (कर्म से बन्धित) हैं और रजो तमो गुण से पूरित हैं । तोण्डरडिप्पोडि आल्वार तिरुमालै दिव्य-प्रबन्ध के दसवे पासुर मे कहते हैं ” भगवान्  श्रीमन्नारायण अकारणकरुणालय अहैतुकी कृपा से, अन्य देवी-देवताओं को उन सभी के लिए स्थापित करते हैं जो पूर्ण रूप से भगवान् के प्रति शरणागत नहीं हो सकते ” । ऐसे सामान्य जन इन देवी-देवताओं के प्रति समर्पित होकर भक्ति भावना मे प्रगतिशील होते हैं और अन्ततः विष्णु भक्ति का बीज उगता है । अगर ये भी नही होते तो सामान्य जन सभी नास्तिक हो जाते और उनका पूर्णतः पतन हो जायेगा । अतः श्रीरामानुज दर्शन के अनुयायी जन उपरोक्त कथन तत्त्व ” देवतान्तर गण विशेष कार्यार्थ रत (अन्यकों के हितकारी) हैं ” को भलीभाँति जानकर इनके प्रति कोई विशेष लगाव (रुचि) नही होता जैसे व्यंजन बनाने मे ईंट का केवल मात्र उपयोग होता है और उसके प्रति कोई आसक्ति (रति) नहीं होती ।

६२) मोक्षपलम् (मोक्षफलम्) सिद्दिक (सिद्धिक) वेणुम् एन्रिरुक्किरवर्गल् क्षुद्र देवतैगलैप् पिन् चेल्लार्गलिरे 

वह (जो) मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रतिक्षण स्थिरचित्त है (वह) क्षुद्र देवी देवताओं के शरणागत नहीं होता ।

परमपद – नित्य आनंद का निवास और मुमुक्षुयों का परम लक्ष्य

अनुवादक टिप्पणी :

उपेय (लक्ष्य) पुरुषार्थ है – – पुरुष की इच्छा (कामना) है । पुरुषार्थ चतुष्टय 1) धर्म [शास्त्र वचन का पालन] 2) अर्थ [लक्ष्मी – धन] 3) काम [विपर्य लिंग के प्रति आकर्षण (काम वासना) ] 4) मोक्ष (मुक्ति) है । श्रीमन्नारायण को मुकुन्द कहते हैं – – जो मोक्ष दाता है । अन्य देवी देवता स्व अनुयायियों के लौकिक तुच्छ इच्छापूर्ति कर सकते हैं लेकिन मोक्ष प्रदान करना केवल श्रीमुकुन्द ही कर सकता है । अतः मुमुक्षु जन भगवान् श्रीमन्नारायण का ही शरण लेते हैं । ऐसे अन्य कर्म बन्धित देवतान्तरों के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती ।

६३) गरुड़ध्वज, गरुड़वाहन एन्रु चोल्लप्पडुमवनायित्तु मोक्ष प्रदनावान् 

मोक्ष प्रदाता (वह) भगवान् है (जिसका) वाहन गरुड़ (जी) है और (जिसके) विजय पताका पर गरुड़ (जी) विद्यमान हैं । वह भगवान् श्रीमन्नारायण (विष्णु) हैं ।

गरुड़ वाहन में श्रीरंगनाथ 

अनुवादक टिप्पणी : गरुड़ जी वेदात्मा के नाम से जाने जाते हैं । भगवान् श्रीमन्नारायण को वहन करने के कारण वेदुद्देश्य परमात्मा भी वह ही है ।

६४) ” कारणन्तु ध्येयः ” एङ्गिरपडिये जगत्कारण वस्तुवेयिरे उपास्यमावतु

शास्त्र कहता है “कारणम् तु ध्येयः”। वह जो इस सृष्टि का मूल कारक, सृष्टि संहारक, सृष्टि पोषक है (सृष्टि, स्थिति, संहार कारक है) (वह) ही ध्येय वस्तु है ।


अनुवादक टिप्पणी :

तैत्रीय उपनिषद् कहता है – -” यतो वा इमानि भूतानि,  येन जातानि जीवन्ति, तद् विजिज्ञास्य, यत् प्रयन्त्याभिसम्विसन्ति, तद् ब्रह्मेति ” अर्थात्  (वह) जिससे सकल चित-अचित पदार्थ प्रकट होते हैं, जो सकल पदार्थ का निवास स्थान है, अन्ततः सकल पदार्थ समा जाते हैं – – वह सदा अनुसन्ध्येय ब्रह्म है । श्रीमन्नारायण ही सर्व सृष्टि कारण कारक है (पंच भूत निर्माण तक) तदुपरांत ब्रह्मा को निर्दिष्ट शक्ति से व्यष्टि सृष्टि का निर्माता बनाते हैं । वह परब्रह्म ही महाविष्णु रूप मे सकल पदार्थों मे स्वयं विद्यमान होकर पोषण धर्ता के रूप मे विराजमान है । वह ही रुद्रादि देवतान्तरों को यथा शक्ति प्रदान कर सृष्टि संहारेत्यादि संपन्न कर अन्ततः सभी का संहार करते हैं । अतः भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व और सर्व कारण कारक हैं ।

६५) मोक्ष प्रदानुमाय सर्वनियन्तावुमान सर्वेस्वरनुक्कु अडिमै पुगुवाते कर्त्तव्यम् 

जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह उस सर्वेश्वरेश्वर की सेवा करें जो मोक्ष प्रदाता है ।

आदिशेष जो निरंतर भगवदकैंकर्य में तल्लीन हैं – जीवात्मा की स्वरूप का प्रधान उदाहरण

अनुवादक टिप्पणी : श्रीमन्नारायण ही परात्पर परतत्त्व हैं जो सर्व चेतनाचेतन वस्तुओं के शेषी (स्वामी) हैं । स्वाभाविक रूप से प्रत्येक चेतन का कर्तव्य है की वह स्वाभाविक स्वामी की सेवा करे न कि अन्यों की।

६६) सेय्य (शेय्य) वेण्डुवतोन्रिल्लै. अवनडुमैयै अवनुकाग इसैय (इशैय) अमैयुम्

जीवात्मा को कुछ करने की जरूरत नही है । उसे तो केवल सत्य को स्वीकारना है कि वह भगवान् का है ।

अनुवादक टिप्पणी :

सभी चेतनाचेतन वस्तुएं भगवान् के हैं अर्थात् भगवत्सम्पत्ति है । जीवात्माओं को इस सत्य को स्वीकरना है । इस स्वीकृति से भगवद् कृपा का दिव्यानुभव का प्रभाव दिखता है और तुरन्त भगवद् कृपा की वर्षा स्वकार्य करती है । इस सन्दर्भ मे पूर्वाचार्य एक सुन्दर उदाहरण देते हैं – – एक समय की बात है –  एक राजा और उसका पुत्र राजकुमार शिकार हेतु जंगल गये । पर दुर्भाग्यवश वह राजकुमार जंगल मे खो गया और दुःखित राजा स्वराज्य को लौट गया । इस दौरान एक शिकारी ने इस खोये नन्हे राजकुमार को प्राप्त कर उसका देखभाल करने लगा । तदुपरान्त वह राजकुमार स्वयं को शिकारी का ही बेटा मानकर शिकारी की तरह व्यवहार करने लगा और इस प्रकार शिकारी बन गया । पर एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे पहचाना और उसके राजकुमार होने का सत्य प्रकाशित किया । अब उसे उसके राजकुमारत्व को स्वीकारना है और इस प्रकार से खोये राज गद्दी को पुनः प्राप्त करना है । अतः इसी प्रकारेण जीवात्मा भी इस जन्म मृत्यु जाल चक्र मे बंधा सोचता है कि वह स्वतंत्र है या केवल देहाभिमान से युक्त जीवन व्यतीत करता है । पर जब वह अपने भगवद्परतन्त्र स्वरूपानुरूप स्थिती को स्वीकारता है तो तत्क्षण भगवदानुग्रह का मंगल पात्र हो जाता है और भगवद् कृपा का प्रवाह उसमे होता है ।

६७) अवन् कोडुत्त उपकरणगळैक् कोण्डु अप्राप्त विषयङ्गळिल् पोगाते, ” तन्तनी कोण्डाक्किनै ” एङ्गिरपडिये वागुत्त विषयत्तुक्के शेषमाक्किक् कोण्डु कित्तुगै 

उस परब्रह्म द्वारा प्रदत्त उपकरण (जीवात्मा के लिए इन्द्रिय और देह) का सही उपयोग करना चाहिए अर्थात् भगवद्-सेवा और भागवत-सेवा मे ही होना चाहिए न कि इन्द्रिय तृप्ति मे |

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् ही शेषी (स्वामी) है और चेतन तत्त्व शेष (भगवद्दास) है| अतः जीवात्मा का स्वाभाविक रूप से स्व इन्द्रियों से नित्य भगवद्-सेवा करना ही परम उद्देश्य है. भगवान् जीवात्मा को देह और इन्द्रिय प्रदान इसी लिए करते हैं ताकि (वह) जीव उनकी सेवा करें| भगवद्-पार्षद भगवद्भक्त श्रीनम्माळ्वार (शठकोपसूरि) स्व पासुर मे “तन्तनी कोण्डाक्किनै” (तिरुवाय्मोळि 2.3.4) कहते हैं वह भगवद्-कृपा से भगवान् के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ हैं । वह कहते हैं, “अनन्त काल से मैं इस भौतिक जाल चक्र मे बंधा था और आपकी अहैतुकी कृपा से आप बहुत समीप आकर मेरे हृदय मन्दिर मे विद्यमान और प्रकाशवान है । इस कृत्य के लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ । इस कृतज्ञता को कैसे व्यक्त करूँ ? मैं अपने आप को समर्पित करता हूँ । लेकिन यह भी कैसे हो सकता है क्योंकि मैं आपकी सम्पत्ति हूँ और मेरी मान्य सम्पत्ति भी असल में आपकी ही सम्पत्ति है । आपकी देन ही यह मेरा देह है और आप स्वयं ही मुझसे आपकी सेवा करवा रहे हैं । ” लोकाचार्य स्वामीजी (नम्पिळ्ळै) ईडु व्याख्या मे कहते हैं कि आत्मसमर्पण करने का कारण सर्व मुक्ति प्रसंग से बचने के लिए किया जाता है । “सर्व मुक्ति प्रसंग” – –  सभी जीवों का परमपद मे होना भगवदेच्छा (भगवान् का निर्वाचन) है क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि सभी जीव परमपद का आस्वादन करे (नित्य उनके साथ ही रहे) । परन्तु यह जीव के लिए स्वाभाविक (स्वरूपानुरूप) नहीं है और ऐसा कदाचित भी नहीं करना चाहिए । मोह वश जीव आत्मसमर्पण करता है और स्वरूपानुरूप ज्ञान प्राप्त कर यह कृत्य अनुचित मानकर ऐसे सोचता है ” मैं जो भगवद्सम्पत्ति ही हूँ अपने आपको पुनः कैसे उस भगवान् को समर्पण करूँ जैसे कुछ नया वस्तु समर्पण कर रहा हूँ ” और उसके लिए प्रायश्चित करता है । वास्तव मे यह छल है ।

६८) एकान्त भोगत्तुक्कागप् पोन्त (पोन्द) पिराट्टि अशोकवनिकैयिळे इरुन्ताप्पोले तोट्रा निन्रतायित्तु स्वरूप ज्ञानम् पिरन्त (पिरन्द) पिन्बु देहत्तिले इरुक्क इरुप्पु

भगवती सीता देवी ने भगवान् श्रीरामचन्द्र के साथ एकान्त मे भोग करने की इच्छा से ही उनके साथ वनवास किया परन्तु यह इच्छा प्रतिकूल हुई और अन्ततः अशोक वन मे विरह भावना से रही । इसी प्रकार जब जीवात्मा को स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त होता है (भगवद् सम्बन्ध) तब इस देह मे रहना शोक पूरित होता है ।

६९) तिरन्तुकिडन्त वासल्तोरुम् नुळैन्तु तिरियुम् पदार्त्तम् पोले, कर्मानुगुणमाग देवादि सरीरङ्गळ्तोरुम् प्रवेशित्तुत्तिरियुम्

जैसे खुले घर मे कुत्ता प्रवेश करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी देव, मनुष्य, पक्षी, जानवर, पेड़, इत्यादि शरीरों मे स्वकर्मवश प्रवेश करता है और इस संसार चक्र मे फँसता है ।

अनुवादक टिप्पणी : स्वकर्मवश जीव देह (मे प्रवेश) प्राप्त करता है । इस संसार मे अनेकानेक वर्ण दृश्य हैं । भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता मे कहते है अन्त काल मे जीव जैसा इच्छा करता है उसी प्रकार अगला देह प्राप्त होता है । मनु स्मृति मे कहा गया है – जब जीव मन से अपराध करता है तो अगले जन्म मे चण्डाल रूप (इस रूप मे कोई उच्चतम सोच विचार नही होता है) धारण करता है, वाचिक अपराध से तिर्यक (पक्षी) रूप मे (इस रूप मे वाक् का कोई प्रयोजन नही होता) जन्म लेता है, कार्मिक अपराध से पेड़ के रूप मे जन्म लेना पड़ता है (क्योंकि इस देह मे कुछ कर्म नही कर सकता है) ।

७०) भक्तिमानुक्कुम् भक्तियुण्डु । प्रपन्नुक्कुम् भक्ति उण्डु । रुचियै ओऴिय प्रपत्ति पण्णकूडाते

भक्तिमान (भक्तिमार्गानुयायी) और प्रपन्नों (शरणागत मुमुक्षुओं) दोनों में भक्ति होता है । बिना भक्ति के (भक्ति को छोड़कर) शरणागति नहीं करना चाहिए ।

भक्ति भगवान् के प्रति प्रेम या आसक्ति है। दोनों – भक्तिमान (भक्तियोग अनुयायी) और प्रपन्न (भगवान् का शरणागत) मे भक्ति होती है । बिना भक्ति के जीव शरणागति नही कर सकता है । अगर बिना भक्ति के जीव शरणागति कर भी लें तो कोई प्रयोजन नही होता है ।

अनुवादक टिप्पणी : भक्तिमान (भक्तियोग निष्ठ) और प्रपन्न (शरणागत निष्ठ) की भक्ति मे यही भेद है कि भूतपूर्व के लिए भक्ति उपाय है और उत्तरवर्ती के लिए भगवान् सिद्धोपाय (उपायोपाय) है अर्थात् भगवद्कैङ्कर्य मे आसक्ति (रति) ही भक्ति है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-7.html

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कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:
श्रीवानाचल महामुनये नम:

यह हिन्दि लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे कृष्णस्वामी य्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन है ।

यह लेख “श्रीमन्नम्पाडुवान्” के जीवन का वर्णन करती है जो तिरुक्कुरुन्गुडि एम्पेरुमान् (भगवान्) – नम्बि पेरुमाळ् (भगवान्) के परम पावन भक्त थे । इसी वर्णन मे एकादशि कि रात को इनका एक ब्रह्म राक्षस से वार्तालाप भी उपलब्ध है ।

ब्रह्म राक्षस — वह सद्ब्राह्मण जो पूर्व जन्म मे यागेत्यादि मे गलति कर राक्षस रूप मे पैदा हुआ हो ।

बहुत समय पहले, पृथ्वी (धरती) प्रलयजाल (कारणजल) मे डूब गयी थी । उस समय, धरती को बचाने भगवान् श्रीमन्नारायण ने वराह रूप धारण कर, इस कारणजल मे कूद गये । ब्रह्माण्ड के दीवारों मे फसी धरती को अपने तेज़ दन्तों (जो गजदन्त समान दिखे) से रक्षा कर, धरती को यथारूप व्यवस्थित करने के लिये योग्य क्षक्ति प्रदान कर, श्रीभूमि पिराट्टि (भगवान् कि मुख्य पत्नी जो धरती कि मुख्य देवी है) को सराहते हुए आलिङ्गन किये । उस समय श्रीभूदेवी धरती पर त्रस्त समस्त चेतनों के प्रति कृपा दर्शाते हुए अपने स्वामी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीवराह रूपावतार से नम्र निवेदन की – हे भगवन् ! आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ दासी की रक्षा की है । इस धरातल पर रहने वाले समस्त चेतनों (मेरे पुत्रों / पुत्रियों) का सुगम उद्धार हेतु मार्ग दर्शन करावें । भगवान् तुरन्त बोले – हे देवी ! मेरा नामोच्चारण ही सरल और सुगमोपाय है । इसी से इनका समस्त कल्याण व उद्धार होगा । इस उपलक्ष मे, मै तुमको एक सरल सद्भक्त नम्पाडुवान् की महिमा प्रस्तुत करूँगा जिससे नामोच्चारण (नाम-सङ्कीर्तन) कि महिमा प्रकाशित स्वत: होगी ।

यह दिव्य चरित्र गाथा भगवान् ने इस प्रकार से बताया :

भगवान् तिरुक्कुरुन्गुडि नामक दिव्यदेश मे स्वपत्नी समेत (श्री-भू सहित) अर्चारूप मे कृपावशात वास कर रहे है । इस दिव्यदेश के भीतर प्रान्त मे, एक चाण्डाल वंश (यह चातुर्वर्ण के अन्तर्गत् नही है) मे जन्मे भगवान् के महद्भक्त । इनको बचपन से ही भगवान् का नाम-सङ्कीर्तन करने का बहुत बडा शौक था । अत: इस प्रकार से प्रेरित भगवद्भक्त, प्रतिदिन रात्रि समय मे, इस दिव्य देश के अर्चारूप भगवान् को वीना-गान संयुक्त अपनी भक्ति को भगवन्नाम सङ्कीर्तन के जरिये, शास्त्र सम्मत दूरी से, दिव्य देश के वासियों के उठने से पहले स्वकैङ्कर्य (नाम-सङ्कीर्तन) कर चले जाते थे । अत: इस प्रकारेण आप श्री पाडुवान् के नाम से विख्यात हुए । पाडुवान् — जो मधुर गान गाता है । भगवान् ने स्वयं आप श्री को नम्पाडुवान् कि उपाधि देकर आपके नाम-सङ्कीर्तन के स्वारस का अनुभव करने लगे । अत: इस प्रकार से बहुत समय तक नित्य रात्रि समय मे भगवद्-कैङ्कर्य मे अपने आप को सम्लग्न किया ।

एक समय, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात मे, जागरण-व्रत हेतु तिरुक्कुरुन्गुडि भगवान् के प्रति प्रगतिशील नम्पाडुवान् की भेंट एक ब्रह्मराक्षस से हुई । यह ब्रह्मराक्षस अपनी भूख मिताने के लिये इन्तेज़ार कर रहा था । अचानक आप श्री को देखकर वह सन्तुष्ट हो गया कि उसको उसका आहार स्वयं चल कर आया है । अत: यही निवेदन ब्रह्मराक्षस ने आप श्री के समक्ष रखा और आप से परस्पर चर्चा कर अपना जीवन वृत्तान्त बताया कि वह पिछले जन्म मे सोम शर्मा नाम का ब्राह्मण था और जिसने यज्ञ-यागादि मे त्रुटि कर ब्रह्मराक्षस रूप धारण किया । तब आप श्री ने उसको सराहते हुए कहा – हे ब्रह्मराक्षस ! आपकी बातों से बहुत प्रसन्न हुआ । आपकी महती कृपा से आज मै अपने प्राण त्याग सकता हूँ । लेकिन एक बात है कि मै अभी आपकी इच्छा पूर्ति नही कर सकूँगा । मै नित्य रात्रि को समीप मे स्थित भगवान् के मन्दिर जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन करता हूँ । मेरा यह सुवसर छोडने पर मजबूर न करें और मुझे जाने की आज्ञा दे । मुझे मेरा स्वगान से जागरण-व्रत सम्पूर्ण कर, भगवान् को सन्तुष्ट कर आने दे । मै अवश्य आवूँगा । यह मेरा वचन है । ब्रह्मराक्षस ने कहा : हे नम्पाडुवान् ! यह तुमहारा कोई छल लग रहा है । अगर तुमको छोड दूँ तो तुम मुझसे छुटकारा प्राप्त कर सकते हो और पुनः लौटोगे नही । यह सुनकर आप श्री ने इस ब्रह्मराक्षस को आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहा :

अगर मै नही लौटा तो निम्नलिखित पापों के फल का अधिकाधिक फल मुझे प्राप्त हो :

१) असत्यता का पाप (श्लोक ३३)
२) कामवासना से आवृत अन्यों कि पत्नियों के साथ अवैध सम्बन्ध का पाप (श्लोक ३४)
३) जब मै और कोई अन्य भोजन करते समय भोजन मे भेदभाव दिखाने का पाप (श्लोक ३५)
४) ब्राह्मण को दान मे स्थल दे कर पुनः उससे छीनने का पाप (श्लोक ३६)
५) युवनावस्था कि लडकी का सम्भोग करना और बुढापे उसमे दोष देखकर उसका परित्याग करने का पाप (श्लोक ३७)
६) पित्रु-तर्पण के दिन स्वपत्नी का सम्भोग का पाप (श्लोक ३८)
७) उस व्यक्ति का अपमान करना जिसने भोजन प्रदान किया है वह पाप (श्लोक ३९)
८) अपनी बेटी का विवाह करने का वचन देना और तत्पश्चात् उस व्यक्ति से उसका विवाह न करना का पाप (श्लोक ४०)
९) षष्ठी, अष्टमी, अमावास्य, चतुर्दशि के दिन बिना स्नान किये भोजन ग्रहण करने का पाप (श्लोक ४१)
१०) दान करने का वादा कर दान नही करने का पाप (श्लोक ४२)
११) स्वयं के मित्र की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखना जिसका बहुत बडा एहसान स्वयं पर हो का पाप (श्लोक ४३)
१२) स्वाचार्य एवं राजा की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने का पाप (श्लोक ४४)
१३) दो स्त्रियों से विवाह करना और तदुपरान्त एक का पक्षपात करने का पाप (श्लोक ४५)
१४) एक पतिव्रता स्त्री का यौवनावस्था मे त्यागना (जो पूर्णतया निर्भर है) का पाप (श्लोक ४६)
१५) उस गोवृन्द को रोकना का पाप जो जल पीने के लिये जा रहे है (श्लोक ४७)
१६) ऐसे पूर्वपीढी कृत पञ्च महापापों (जैसे ब्राह्मण हत्या) का फल (श्लोक ४८)
१७) अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने का पाप (श्लोक ४९)
१८) अन्य देवी-देवताओं को श्रीमन्नारायण के तुल्य मानने का पाप (श्लोक ५०)

जब तब अठारहवाँ पाप के बारे मे नही बताया, तब तक ब्रह्मराक्षस पूर्वोक्त पापों को नही माना । जब आप श्री ने अठारहवाँ पाप के बारे मे बताया, ब्रह्मराक्षस को पूर्ण विश्वास हुआ क्योंकि यह ऐसा महामहापाप जिसे करने से हर एक जीव इस सम्सार चक्र मे नित्य बन्धित हो जाता है । ऐसे विश्वास से ब्रह्मराक्षस ने आप श्री को छोडकर आपके वापसी की प्रतीक्षा करने लगा ।

अनुवादक टिप्पणी : अठारहवाँ पाप – अन्य देवतान्तरों को भगवान् श्रीमन्नारायण के तुल्य मानना महद्पाप है । इस पूराण का महदुदेश्य यही है कि ज्ञानी जन इसको जानकर इसका पूर्ण परित्याग करे ।

अत: इस प्रकारेण वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् अपने प्रिय भगवान् के समक्ष जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन कर, भगवान् को प्रसन्न किये और स्वदेह त्याग की अन्तिम इच्छा से ब्रह्मराक्षस की ओर अति शीघ्रता से चले । पुनः स्वाहार को देखकर प्रसन्न ब्रह्मराक्षस ने आप श्री की महिमा को जान गया । ब्रह्म राक्षस ने वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् से उनके मधुर गान के फल को माँगा । श्रीमन्नम्पाडुवान् ने यह सुनकर उत्तर दिया – यह तो असम्भव है श्रीमन् ! मुझे पता नही आपको इसका फल भी दे पावूँगा कि नही क्योंकि वह स्वकैङ्कर्य के प्रति किछु भी नही चाहते थे । पुनः पुनः निवेदन करने पर उनके एक गान का फल देने के लिये राज़ी हो गये आप श्री । इस प्रकार कैशिक छन्द मे गान का फल प्राप्त कर यह ब्रह्म राक्षस मुक्त हो गया । इस स्थिति से मुक्त ब्रह्मराक्षस ने राक्षस देह त्यागकर, परलोक प्राप्त किया । तदनन्तर पुनः स्वकैङ्कर्य प्राप्त कर श्रीमन्नम्पाडुवान् भगवन्नाम-सङ्कीर्तन सेवा मे सम्लग्न हुए और अन्तत: भगवद्धाम प्राप्त किये ।

यह दिव्य चरित्र का वर्णन श्रीमन्नारायण (वराह भगवान्) ने स्वपत्नी श्रीभूदेवी को किया । अत: इस प्रकारेण यह सङ्क्षिप्त वर्णन सम्पूर्ण हुआ ।

इस पुराण का पाठ अनेक दिव्यदेशों मे इस दिन किया जाता है । तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्य देश मे नाटक रूप मे यह दिव्य चरित्र दर्शाया जाता है ।

इस पुराण का मङ्गल श्लोक :

नमस्तेस्तु वराहाय लीलोद्धराय महीम् ।
कुरमध्यतोऽयस्य मेरु:गणगणायथे ॥

अर्थात् : मै उन वराह भगवान् को भजता हूँ, जिनने इस भू (धरातल) को बिना विशेष प्रयास से उठा लिया और जिनकी तुलना मे मेरुपर्वत तिनके के समान है ।

यही भाव पेरिय तिरुमोऴि ४.४.३ – ” शिलम्बिनिडैच् चिरु परैपोल् पेरिय मेरु तिरुक्कुरुळम्बिल् कणकणप्पा ” मे है ।

प्रलयोदन्वदुत्तीर्णम् प्रपद्येऽहम् वसुन्धराम् ।
महावराह दम्श्ट्राग्र मल्लीकोसमधुव्रतां ॥

मै उन भूदेवी के शरणागत हूँ जिनको महावराह भगवान् ने कारणजल से उठाया, और उनके (भगवान् के) मल्लिका पुष्प तुल्य दन्तों मे कृष्णवर्ण भौंरे के समान है ।

श्रीपराशर भट्ट ने इस पुराण की व्याख्या लिखी है और इस महद्कार्य के लिये उनको भी प्रणाम करते है :

श्रीपराशर भट्टार्यः श्रीरङ्गेश पुरोहित: ।
श्रीवत्साङ्कसुत: श्रीमान् श्रेयसेऽमेस्तु भूयसे ॥

(वह) श्रीपराश्रभट्ट स्वामी मुझे सभी शुभ प्रदान करे, (जो) श्रीरङ्ग भगवान् के पुरोहित है, (जो) श्रीवत्साङ्क (कूरेश) के सत्पुत्र है और जो कैङ्कर्यश्री भाव से सर्वदा पुरित है ।

आऴ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं
जीयर् तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन् सेट्टलूर कार्तीक श्रीहर्ष रामानुज दास

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