विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४१

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४०)

७२) तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – 2

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – श्रीभूतपुरी

पिछले अध्याय से हम तत्व विरोधी विषय पर आगे की चर्चा करेंगे। ऐसे अनेक विषयों को जानने के लिये हमें गहरा ज्ञान होना जरूरी है जिसे हम शास्त्रों के सुव्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त कर सकते हैं। विषय कि सम्पूर्ण वह गहरी ज्ञान के लिये आचार्य के मार्गदर्शन में इन सिद्धान्तों का अध्ययन करना चाहिये।

  • पदार्थ का परिवर्तन अपने ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड से बाहर दूसरे ब्रह्माण्ड में चेतन की इच्छा से होता है, यह न समझना बाधा है। सभी अचित्त हमारे और दूसरे ब्रह्माण्ड में जो हमारे ब्रह्माण्ड से बाहर हैं (सभी भांति के ब्रह्माण्ड को मिलाकर लीलाविभूति – संसार कहते हैं) में जो परिवर्तन होता है वह परम चेतन (भगवान – श्रीमन्नारायण) की इच्छा से होता है। चांदोग्य उपनिषध कहता है “तधऐक्षत – बहुस्याम प्रजायेयेती” – मुझे मेरे रंग बिरंगे आविर्भाव को देखने दो। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टी जो भगवान के सर्वोच्च चेतानन है (ज्ञान पुरुष) भगवान के संकल्पानुसार होती है। श्रुति कहती है “नित्यो नित्यानाम चेतनश चेतनानाम” – शाश्वतों में शाश्वत और ज्ञानियों में ज्ञानी। अन्य कई स्थानों में “बहु श्याम” से सम्बोधित करते हैं और प्रमाणित करते हैं कि सृष्टि भगवान के संकल्प का परिणाम है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “मुन्नीर् ज्ञालम पडैत्त एम मुगिल्वन्णने” – जो बादल कि तरह है (शाम वर्ण और दयालु स्वभाव)! – आपने इस ब्रह्माण्ड कि रचाना किये है जिसमें तीन प्रकार के जल हैं। यहाँ पर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी की दैविक भावनाओं को दर्शाते हैं। वें कहते हैं कि भगवान द्वारा इस ब्रह्माण्ड कि रचना के लिये श्रीशठकोप स्वामीजी उनको धन्यवाद देते है, इसलिये सभी जीवात्मा (स्वयं के सहित) को उपयुक्त शरीर, इंद्रियाँ, आदि हैं जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं और अन्त में वे ऊपर उठाये जाते हैं। फिर भी श्रीशठकोप स्वामीजी दर्शाते हैं कि ऐसा अवसर व्यर्थ हो जाता है क्योंकि इस शरीर का हम भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये ही प्रयोगे में लेते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि केवल भगवान की दैविक ईच्छा ही है जो इस सृजन के द्वारा जीवात्मा की उन्नति में सहायता करती है।
  • यह न मानना कि ब्रह्माण्ड परिणाम अद्वारक भगवद संकल्प अधिनम (भगवान के दिव्य ईच्छा के अधीन है) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहले समझाया गया है यहाँ दो प्रकार की सृष्टी है – अद्वारक सृष्टी और सद्वारक सृष्टी। अद्वारक सृष्टी सूक्ष्म द्रव्य से पूर्ण द्रव्य के रूप में बदलाव है और यह सीधे भगवान द्वारा किया जाता है। इसके पश्चात जो रंग बिरंगी स्वरूप आदि का उत्पत्ति स्वयं भगवान ब्रह्माजी, आदि द्वारा उत्पन्न करवाते हैं। उसी तरह विनाश के समय भगवान पहिले रंग बिरंगी स्वरूप का विनाश रुद्र, अग्नि, आदि के द्वारा करवाते हैं। अन्त में वें सभी पदार्थ को ग्रहण करते है और उसे सूक्ष्म पदार्थ में परिवर्तित करते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है।
  • यह न जानना कि सभी तत्व भगवद आत्मकम (भव्य आत्मा की तरह वास करना जो भगवान द्वारा सर्व व्यापी है) हैं वाधा है। नारायण सूक्त से यह स्पष्ट है कि “अंतर बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणस्थित:” – नारायण सबके अन्दर और बाहर व्याप्त हैं और सबको एक साथ बाँधकर रखते हैं। “सर्वभूतांतरात्मा” सभी के तत्त्वों के अन्दर निवास करनेवाली आत्मा। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्म (भगवान) इस संसार में रहनेवाले सभी जीवों की आत्मा में निवास करते हैं। भूत शब्द का मूल है “भू सततायाम” – वह जिसका अस्तित्व है। जिसका भी अस्तित्व है वह भगवान द्वारा है। यह भगवान की अंतर्यामी रूप में विध्यमानता है जो पदार्थ के अस्तित्व को बनाये रखते हैं। शास्त्र कहते हैं “यस्य आत्मा शरीरम, यस्य पृथ्वी शरीरम, …” – जीवात्मा भगवान के लिये शरीर है, पृथ्वी भगवान के लिये शरीर है, आदि। यहीं तत्व श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “परंध तण परवैयुल नीर तोरूम परंधुलन परंध अण्डम इधेन नील विसुम्बु ओलिवर करंध सील इडं थोरूम इडं थिगल पोरुल थोरूम करन्धेंगुम परंधुलन ईवै उण्ड करने” – भगवान सागर के ठण्डे जल के छोटी से बूँद में जिस तरह आराम से व्याप्त हैं उसी तरह इस विशाल ब्रह्माण्ड में भी स्वयं आराम से निवास करते हैं।
  • सभी तत्व हमारे लिये अनुकूल हैं क्योंकी उनमें स्वयं भगवान व्याप्त है इसलिये वें अनुकूल हीं हैं।
  • कुछ तत्व देखने में हमारे लिये अनुकूल नहीं होते हैं क्यों कि स्वयं को उस वस्तु की तरह संभ्रम समझते हैं यह बाधा है। यह केवल हमारी अज्ञानता दशा है कि हम अपने शरीर को ही आत्मा मानते हैं और यह विचार करते हैं कि वह हमारे प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: यह और इससे पहिले कि बात एक दूसरे से सम्बंधीत है। इसे थोड़ा हम समझें। जिसने जीवात्मा के लक्षणों को सही तरीके से समझा है, वह यह समझात है कि प्रतिकूल रूप से जीवात्मा सुखद है। यह तत्व तत्वत्रय के ७३ से ७६ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने बहुत ही सुन्दरता से समझाया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपनी व्याख्या में बड़े विस्तार से समझाया हैं। ७३वें सूत्र में कहते है कि सच्चे ज्ञान को पूर्ण विस्तार से देखेंगे तो लगेगा कि सुख खुशी का ही परिणाम है और यह जीवात्मा के सही लक्षणों के अनुकूल है। अगले सूत्र में वे समझाते हैं कि विष, हथियार, आदि दिखने में प्रतिकूल लगते हैं क्योंकी हमें शरीर और आत्मा के विषय में भ्रम है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि किसी को भी विष, आदि से ३ कारणों से भय लगता है – अ) यह समझना कि शरीर और हम स्वयं एक ही हैं और यदि कोई शरीर को प्रभावित करती है तो हमें स्वयं को भी प्रभावित करती है; आ) हमारे स्वयं के कर्म जो विचारों की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और इ) यह सच्चा ज्ञान न होना की विष, शस्त्र, आदि में वही भगवान व्याप्त हैं जो स्वयं में और शरीर में व्याप्त हैं। अगले सूत्र में वें समझाते हैं कि क्योंकि सभी तत्वों में भगवान व्याप्त हैं तो स्वाभाविक रूप से वे सहायक ही होंगे और उन्हें प्रतिकूल समझना यह अवधारणा संयोगवश ही है। इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई प्रमाण दिये हैं। अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। ७४वें सूत्र में वें कहते हैं “यदि कोई वस्तु अपने लिये अनुकूल है उसके लिये कोई दूसरा कारण भी हो सकता है (वह कारण जो भगवान में व्याप्त है उसे छोड़), एक निश्चित समय में वहीं चन्दन का लेप, पुष्प, आदि, किसी के लिये अनुकूल हो सकते हैं लेकिन कोई दूसरी जगह या समय में उसी के लिये यह प्रतिकूल हो सकती है या किसी ओर के लिये उसी स्थान या समय में पदार्थ प्रतिकूल हो सकती है – यह ऐसा नहीं होना चाहिये”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे अच्छी तरह समझाते हैं। किसी व्यक्ति के लिये चन्दन का लेप गर्मियों में अनुकूल है परन्तु वहीं चन्दन का लेप उसी व्यक्ति के लिये ठंड में प्रतिकूल है। उसी तरह एक तंदूरस्त व्यक्ति को गर्मियों में चन्दन का लेप अनुकूल रहता है लेकिन उसी गर्मी के मौसम में यदि कोई दूसरे व्यक्ति को बुखार है उसके लिये चन्दन का लेप प्रतिकूल हैं। इसलिये चन्दन के लेप का ठण्डक का लक्षण स्वयं यह तय नहीं कर सकता है कि वह किसी के लिये अनुकूल है या नहीं – परन्तु यह जिस व्यक्ति के शरीर को लगाना है उसके शरीर कि दशा तय करती है। इसलिये सच्चा अनुकूल चन्दन के लेप में व्याप्त है और कल्पित अनुकूल लक्षण उसके शरीर के सहयोग पर आधारीत है। और जब किसी को सही जानकारी हो जाती है कि यह शरीर भगवान का है – उस पर भगवान की कृपा होगी चाहे वे किसी भी शारीरिक अवस्था में क्यों न हो।
  • यह न जानना कि नित्य विभूति नित्य है भगवान के नित्य इच्छा के कारण – बाधा है। नित्य विभूति – श्रीवैकुण्ठ। इसके विपरीत लीला विभूति जिसका इस भौतिक क्रिया के एक हिस्से के रूप में निरन्तर सृजन और विनाश होता रहता है और जो बिना किसी भौतिक बदलाव के निरन्तर है उसे नित्य कहते हैं। इसका मूल भूत कारण भगवान का संकल्प है। अनुवादक टिप्पणी: नित्य विभूति – परमपदधाम के लक्षणों को पहिले कई ग्रन्थ में समझाया गया है। विष्णु सूक्तम कहता है “तद विश्णोर परमं पदम सदा पश्यंती सुरय:” – भगवान विष्णु के श्रेष्ठ महल में निरन्तर नित्य सूरिगण इनका दर्शन करते हैं। लिंग पुराण कहता है “वैकुंठेतु परे लोके … आस्ते विष्णुरचींत्यात्मा” – वैकुण्ठ में भगवान श्रीमन्नारायण और अम्माजी के सेवा कई भक्त करते हैं। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न में वैकुण्ठ का बड़ी सुन्दरता से वर्णन करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीवैकुण्ठ गध्य में भी इसको समझाते है। यह परमपदधाम को भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य और आध्यात्मिक तिरुमाली ऐसा समझाते हैं।
  • अप्राकृत अचित्त (पवित्र पदार्थ) में बदलाव शुद्ध रूप से भगवान की ईच्छा के आधार पर होता है यह न जानना बाधा है। अचित्त जिसे परमपद में देखते है वह उसी तरह इस भौतिक संसार में नहीं दिखता है। यह पवित्र पदार्थ है जो शुद्ध सत्वम हैं। भगवान के इच्छानुसार वह कई रूप धरण करता हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में विस्तार से परमपदधाम के तत्वों को समझाते हैं। इसे सही आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।
  • पवित्र पदार्थ में सूक्ष्म और स्थूल अवस्था जो इस भौतिक संसार में पाँच तत्वों से है इसे न समझना बाधा है। यह पवित्र पदार्थ पंच उपनिषध (जैसे भौतिक संसार में यह पदार्थ पाँच तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश से बने है) से बने हैं ऐसा कहा गया है। इसलिये वे जैसे भौतिक संसार में दिखते हैं वे वैसे पदार्थ नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: सांसारिक पदार्थ जीवात्मा के सही लक्षणों को ढक देता हैं और अज्ञानता से जीवात्मा को उत्तेजित करते हैं। परन्तु परमपद के दिव्य पदार्थ ज्ञान बढ़ाने में सहायक होते हैं और जीवात्मा जो वहाँ हैं इनके लिये अधिक सुख वह आनन्द देते हैं।
  • भगवान के दिव्य रूप इन दिव्य पदार्थ (जो पंच उपनिषध से बनी है) से बनी है यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया भगवान के दिव्य रूप पाँच विभाग के भीतर समझाये जाते हैं – पर, व्यूह, विभव, अर्चा, अन्तर्यामी। इन सभी स्थितियों में जहाँ कहीं भी भगवान का स्वरूप है वहाँ हमें यह समझना आवश्यक है कि यह सभी भगवान के दिव्य पदार्थ से बना है। यहाँ से प्रारम्भ कर हमारा ध्यान ईश्वर तत्व, उनके रूप और दिव्य सहायक पर केन्द्रित होता है।
  • भगवान के यह रूप उनके ६ गुणों को दर्शाते हैं, यह न जानना बाधा है। भगवान के यह सभी स्वरूप भगवान के दिव्य पदार्थ से बने हैं जो भगवान के सच्चे गुणों को दर्शाते हैं और अपनी ज्ञान को बढ़ाते हैं। मुख्य ६ गुण हैं ज्ञान, बल, वीर्य, ऐश्वर्य (धन, सभी को नियंत्रण करने योग्य), शक्ति, तेज। शेष भगवान के गुण इन्हीं मुख्य गुण से उत्पन्न होते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान का अक्षरश: अर्थ है वह जो इन ६ गुणों से परिपूर्ण हैं। इसलिये श्रीमन्नारायण ही हैं जो इन ६ गुणों के पूर्ण रूप से स्वामी हैं वे ही एक मात्र योग्य है जिन्हें भगवान कह सकते हैं। और किसीको जिन्हें भगवान कहते हैं (श्रीपराशर, श्रीव्यास, आदि) यह उनके प्रशंसा मात्र के लिये – सत्य में नहीं – क्योंकि दूसरे किसी में भी यह ६ गुण नहीं पाये गये हैं। भगवान के दिव्य स्वरूप उनके गुणों को स्पष्ट करते हैं।
  • हालाँकि भगवान और नित्य सूरिगण दोनों एक श्रेणी में हैं, फिर भी भगवान का स्वरूप एक विशेष है जो उनके तेजस्वी गुण के कारण है। यह न जानना बाधा है। श्रीअनन्त, श्रीगरुड़जी, श्रीविश्वकसेनजी, आदि नित्य मुक्त हैं। इनमे कोई भेद नहीं जैसे सांसारिक दुनिया के वर्णों में देखा जाता है। उनके स्वरूप भी विशेष हैं। क्योंकि उनका स्वरूप दिव्य पदार्थ से बना है उनका रूप उनके द्वारा किये गये कैंकर्य पर आधारित है। उदाहरण के लिये श्रीअनन्त शेष रूप धारण करते हैं, श्रीगरुडजी पक्षी का रूप और श्रीविश्वकसेनजी  मनुष्य रूप धारण करते हैं। यहाँ गजमुख (हाथी के सिर वाला मानव), सिंहमुख (सिंह के सिर वाला मानव), पुरुष नौकर, महिला नौकर, आदि। परन्तु हमें यह जानना चाहिये कि संसार कि तरह परमपदधाम में स्त्री-पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: विशिष्ट कैंकर्य के लिये नित्यसूरि विभिन्न रूप धारण कर सकते हैं और करते भी हैं। जैसे हमने पहिले देखा हैं परमपद में सभी पदार्थ दिव्य हैं और जैसे कि हम भौतिक संसार में देखते है वे पदार्थ बहुत ही भिन्न हैं। यह भी जानना आवश्यक है कि नित्यसूरि भगवान से स्पष्ट रूप से अलग हैं – जैसे नित्यसूरि जीवात्मा हैं और भगवान परमात्मा हैं। यह भी भगवान की दिव्य इच्छा है जिसके कारण नित्यसूरि अनन्तकाल तक मुक्त हैं। चांदोज्ञ उपनिषद में बताया गया है कि भगवान का स्वरूप तेजोन्मय बहुत ही प्रफुल्लित और आश्चर्य चकित करनेवाला स्वर्णिय स्वरूप है।
  • यह न जानना कि भगवान के रूप उनके अवतार के समय परमपदधाम में जो दिव्य पदार्थ हैं से बने हैं और यह न जानना कि शिवजी, आदि ने अपना रूप भगवान कि दिव्य इच्छा से प्राप्त किये हैं और यह सोचना कि भगवान का दिव्य रूप “सामान्य पदार्थ” से बना है। यह सभी बाधा है। उनके अर्चावतार रूप को इच्छगृहित अप्राकृत दिव्य मंगल विग्रह कहते है – वह दिव्य स्वरूप जिनको भगवान ने अपनी स्वयं की इच्छा से धारण किये हैं। हालाँकि यह रूप दिखने के लिये मनुष्य कि तरह है लेकिन वह उस पदार्थ से नहीं बना है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ४ अध्याय में हमने देखा हैं कि स्वयं भगवान अपने अवतार रहस्य को कई श्लोकों में दर्शाते हैं। भगवद्गीता के ४.९ में वें स्वयं कहते हैं – “जन्म कर्म च दिव्यमेवं” – मेरा जन्म और कार्य दोनों दिव्य हैं। गीता में स्वयं भगवान ९.११ में कहते हैं – “अवजानन्ति मां मूढा” – अज्ञानी जन मेरे अवतार के समय मेरी श्रेष्ठता को नहीं समझते है और मेरी निन्दा करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में ३०३ और ३०४ सूत्र में विस्तार से भगवत अपचार को समझाते हैं। इनमें से जो भगवान के अवतार को मात्र एक नश्वर मानव रूप समझना अपचार है। जब कि भगवान यह पवित्र रूप अपनी इच्छा से धारण करते हैं और अन्य देवता जैसे ब्रह्माजी, शिवजी, इन्द्र, आदि ऐसे पद हैं जिन्हें जीवात्मा इन रूप को धारण करके कई अन्य क्रियायें करते हैं। इसलिये इन संसार में जीवात्मा अपने कर्म के आधार पर और भगवान की इच्छा से ऐसे महत्त्व पूर्ण पदों को पाते हैं।
  • सभी चित्त और अचित मिलकर भगवान का शरीर बनाते हैं, यह न जानना बाधा है। जैसे “सर्वं विष्णुमयम जगत” में समझाया है – इस भूमण्डल में सबकुछ विष्णु में व्याप्त है – जो कुछ हम देखते सुनते हैं, भगवान अन्तर्रात्मा है – सब कुछ भगवान श्रीमन्नारायण के अंश है। अनुवादक टिप्पणी: हमने नारायण सूक्तम में देखा है “अंतर बहिश्च तत सर्वं व्याप्य नारायण स्तिथ:” और श्रीरामायण का श्लोक हैं “जगत सर्वं शरीरम ते”। विष्णु का अर्थ है जो सर्वव्यापी है इसलिये श्रीमन्नारायण ही सभी तत्त्वों में सर्वोच्च आत्मा के रूप में निवास करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-41.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३९)

७२)तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – १श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

ऐसे अधिकतम विषयों का गहरा ज्ञान होना चाहिये जो हमें शास्त्रों के अध्ययन करने से प्राप्त होगा। सम्पूर्ण व गहरे ज्ञान प्राप्ति के लिये हमें इन सिद्धान्तों को अच्छे आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करने से प्राप्त होगा।

  • तत्व त्रयम (भोक्तृ – आनंद प्राप्त करनेवाला – आत्मा, भोग्य – आनंद प्राप्त किया हुआ – पदार्थ और नियंत्रु – निर्वाहक – भगवान) को छोड़ अन्य कोई तत्व नहीं हैं – यह न जानना बाधा है। श्रुति कहती है “भोक्ता, भोग्यं, प्रेरितारम च मत्वा”। भोग्यम – वह जिसका आनन्द प्राप्त किया गया है। भोक्ता – वह जो आनन्द प्राप्त करता है। प्रेरिता – वह जिसकी भोग्य और भोक्ता दोनों उसकी सम्पत्ति है और वह जो इन दोनों को नियंत्रित रखता है। अत: यह ३ सत्य हैं। श्रीरामानुज दर्शन के मूल सिद्धान्तों को हमें मानना चाहिये कि तत्वत्रय हीं एक मात्र नीति है। शरीर अचित्त है – पदार्थ – जिससे आनन्द प्राप्त कर चुके हैं। वह जो शरीर में विराजमान हैं और जो सुख और दु:ख का अनुभव करता है उसे चित्त – जीवात्मा – आत्मा कहते है। वह जिसका शरीर दोनों चित्त और अचित्त हैं और उस पर नियंत्रण करता है वे ही सर्वेश्वर (श्रीमन्नारायण) हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इन तीन सत्य के आगे और कुछ भी नहीं है। जिसे इस तत्त्व पर स्पष्टता व दृढ़ विश्वास है वह दूसरे सिद्धान्तों को कभी नहीं मानेगा। और नहीं दूसरे के सिद्धान्तों को सुनकर हैरान होगा। आगे आगे भिन्न भिन्न मतों के सिद्धान्तों को समझाया है और यह भी समझाया गया है कि ऐसे सिद्धान्तों से भ्रमित होना हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदान्त के सार को श्रीभाष्य और अपने अन्य ग्रन्थ जैसे वेदार्थ संग्रह, वेदान्त दीपम, आदि में समझाया है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध में वेदान्त के सार कि स्तुति कि गयी है। इनमें श्रीसहस्रगीति सबसे अधिक प्रसिद्ध है। श्रीसहस्रगीति के लिये ५ व्याख्या हैं – वो है श्रीतिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान द्वारा ६००० पडि, श्रीवेदांति स्वामीजी द्वारा ९००० पडि, श्रीपेरियावाचान पिल्लै द्वारा २४००० पडि, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के व्याख्यानों को सुनकर श्रीवडक्कु तिरुविधि पिल्लै द्वारा लिखे गये ईडु ३६००० पडि, श्रीवादि केसरी अलगीय मणवाल जीयर द्वारा रचित १२००० पडि। इनमें से ईडु ३६००० पडि हीं अत्यंत विस्तृत और व्यापक टिप्पणी मानी गई है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईडु व्याख्या के दो अरुमपधम हैं अप्पु अरुमपधम और जीयर अरुमपधम। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने इस ईडु व्याख्या के लिये ३ प्रस्तावना दिये हैं जिसमें हर प्रस्तावना में कई अद्भुत सिद्धान्त को शामिल किया है। प्रथम प्रस्तावना का नाम “मुदल श्रिय: पति” जिसमें पहिले वें समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं भगवान के कृपा पात्र थे जिन्हें सत्य का दिव्य ज्ञान भगवान ने दिया। अपने सिद्धान्तों को समझाने के पहिले उन्होंने अन्य सिद्धान्तों के विषयों में समझाते हैं और फिर उनकी त्रृटियों को समझाते हैं। अन्य सिद्धान्त के लोग तत्त्वों को कैसे समझते है यह कहकर वें प्रारम्भ करते हैं। वे ऐसे १७ सिद्धान्तों की चर्चा करते हैं और अन्त में वेदों के विपरीत के कारण सभी को अमान्य करते हैं। अन्त में इस बात कि पुष्टी करते हैं कि वेद हीं तत्वत्रय को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इन ३ तत्व (चित, अचित, ईश्वर) को एक रहस्य ग्रन्थ “तत्वत्रय” में बड़े विस्तार से समझाते हैं। इस ग्रन्थ को “कुट्टी भाष्यम” (छोटा श्रीभाष्यम) कहते हैं क्योंकि इसमें श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य के मुख्य पहलू समझाये गये हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ के लिये सुन्दर व्याख्या लिखे हैं जिसमे उन्होंने वेद के पेचिदे विषयों को बहुत ही भावपूर्ण तरीके से लिखा हैं। इस विषय के अध्ययन के दौरान हम श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रथम श्रिय: पति वह श्रीलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यानों के साथ चर्चा करेंगे।
  • वैशेषिका में समझाये अनुसार यहाँ ६ तत्व (द्रव्य से प्रारम्भ होकर) है – इससे घबराना बाधा है। हम यह पहिले हीं देख चुके हैं कि हमारा सिद्धान्त तत्वत्रय पर आधारित है। सांक्य, वैशेषिका, पासुपथ, चार्वाक, बौद्ध, जैन विभिन्न सिद्धान्तों के विध्यालय हैं। हमें इन सिद्धान्तों को नहीं सुनना चाहिये और “क्या यह सही तत्व हैं?” इस तरह सुनकर घबराना नहीं चाहिये। जिसने भी श्रीरामानुज सम्प्रदाय को अच्छी तरह समझ लिया है वे इन दूसरे सिद्धान्तों को सुनकर या देखकर घबड़ायेंगे नहीं। सभी अन्य सिद्धान्तों को निकाल फेंकने की आवश्यकता है। हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति ऐसी हुई है “अरुसमयच चेडियतनै अडियारुत्तां वालिये, अदर्नतुवरुम  कुधरुत्तिगलै अरत्तुरंतान वालिये” – जुग जुग जीवो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने षण मथम (६ सिद्धान्त – जो वेद के बाहर और विपरीत है) नामक पेड़ का सर्वनाश किया, जुग जुग जियो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने घास फूस आदि लताओं का विनाश किया – कुदृष्टि मथम (वह तत्व जो वेद को स्वीकार कर गलत तरीके से पेश करते हैं)। उनके तिरुनक्षत्र दिन कि स्तुति ऐसे होती है “शंकर भास्कर यादव भाट्ट प्रभाकरर् थंगल मतम चाय्वुर वादियर  माय्गुवरेनरु चतुमरै वालनदिडु नाल” – वह दिन जब चारों वेद यह देख खुश हो रहे थे कि श्रीशंकरजी, श्रीसूर्य, श्रीयादव प्रकाश, श्रीभाट्टा, श्रीप्रभाकर, आदि पूरी तरह से परास्थ हो गये और विवादी गण भी परास्थ हो गये। हमें इन सिद्धान्तों के विषय में चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिन्हें पहिले ही निकाल दिया गया है।
  • नैयायिक में (न्याय विध्यालय) जैसे समझाया गया है कि १६तत्व (प्रमाण से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • सांख्य में जैसे समझाया गया है कि २५तत्व (मूल प्रकृति से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • पतंजली में जैसे समझाया गया है कि २६तत्व है, इससे घबराना बाधा है।
  • पासुपथन में जैसे समझाया गया है कि ३६तत्व है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पासुपथ, पासुपथ आगमा पर आधारित है जो रुद्र पर केन्द्रित है।
  • चार्वाकों में समझाया गया है कि ४ भूत पृथ्वी से प्रारम्भ होकर तत्व हैं, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: चार्वाक केवल ४ तत्वों को (पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु) को हीं सत्य मानता हैं। मूलत: इस अवधारणा के आगे कुछ नहीं है। चारु वाक का अर्थ सुन्दर अलंकृत शब्द हैं। वे समझाते है की कोशिश करें कि इस जीवन को हुआ इतना सुखमय से जीयों क्योंकि यही सत्य है। उन्हें लोकायथ से भी जाना जाता है – पूर्णत: भौतिकता वादि व नास्तिक सिद्धान्त वाले हैं।
  • बौद्ध मत के अनुसार सच्चाई पाँच स्कन्ध, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया बौद्ध के ४ सिद्धान्त को समझाया गया है। वैभाषिका, सौत्रांतिका, योगाचर और माध्यमिक यह बौद्ध सिद्धान्त में ४ विध्यालय हैं। मूलत: यह सून्यवाधम यानि सबकुछ कुछ भी नहीं है।
  • जैन धर्मानुसार सत्य धर्म, अधर्म, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैन धर्म अहिंसा, त्याग पर केन्द्रित है। वेद और उसके सिद्धान्त के लिये कोई आदर सम्मान नहीं है।
  • मायावादियों के अनुसार जीवात्मा ही एक मात्र तत्व है इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: मायावादि एक मात्र आत्मा जिसका कोई नाम, रूप, सहायक, आदि नहीं है की उपस्थिति और आत्मा जो अज्ञानता से ढकी हुई है इस मायावी संसार को हीं सत्य मानता है। जैसेहीं अज्ञानता का नाश होता आत्मा अपने सच्चे स्वरूप में आती है और उसे ही मोक्ष कहते हैं।
  • भाट्टा और प्रभाकर के सिद्धान्त से घबराना और यह मानना की जीवात्मा के आगे ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुमारीला भट्ट और प्रभाकर यह दो अद्वैत वेदान्त सिद्धान्त के कट्टर दार्शनिक थे।

अब प्रारम्भ करते हैं अचित्त तत्व (पदार्थ – निर्विकार), जिसके विषय में बहुत संभ्रम थी जिनका स्पष्टीकरण किया गया है और जिन्हें गलत तरिके से पेश किया गया है उन्हें भी समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रन्थ में अचित तत्व के सिद्धान्त के विषय में जो बाते स्थापित की गई हैं पहिले उन विषय को समझायेंगे। एक बार इसे समझने से बाधाएं स्वयं दूर हो जायेगी। प्रत्येक को अलग से समझाने कि आवश्यकता नहीं है।

अचित तत्व श्रेणी के हैं। शुद्ध सत्वम, मिश्र सत्वम और सत्व सून्यम। अनुवादक टिप्पणी: सभी निर्विकार वस्तु में तीन गुणों में से एक से अधिक लक्षण जैसे सत्व, रजस और तमस गुण होते है। यहाँ पदार्थों को शुद्ध सत्वम कहते हैं क्योंकि उनमें पवित्र सत्व ही उनका गुण है। पदार्थ से उसके गुण हीं भिन्न होते हैं परन्तु पदार्थ को उसके गुणों से जाना जाता है इसलिये जब हम शुद्ध सत्वम गुण कहते यानि वह पदार्थ जो अच्छाईयों से भरा हुआ है।

  • शुद्ध सत्वम केवल परमपदधाम में ही देखा जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: परमपदधाम में सभी पदार्थ शुद्ध सत्व वर्ग के होते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि शुद्ध सत्वम राजस और तामस गुणों के बगैर है और पूर्ण रूप से शुद्ध है। वे समझाते हैं कि यह पवित्र पदार्थ स्वयं को कई रूपों में बदलते हैं जैसे कि मण्डप, गोपुरम, विमान, प्रसाद, आदि और भगवान नित्य और मुक्त जीवों को अपार आनन्द प्रदान करते है। इस भौतिक संसार में भगवान का जो दिव्य अर्चा स्वरूप है उसका हम दर्शन करते हैं और वह शुद्ध सत्वम वर्ग में आता है।
  • मिश्र सत्वम- रजस और तमस का मिश्रण है जिसे हम इस भौतिक संसार में देखते हैं। हालाँकि अचित्त नित्य है फिर भी निरन्तर समान रूप से बदलता है। इसलिये उसे तात्कालिक कहते हैं। हालाँकि चित्त जो ज्ञान से भरा हुआ है और जब भौतिक शरीर में विवश है, ज्ञान और आनन्द जो जीवात्मा के लिये मूलभूत है अचित्त से ढ़क जाता है। यह अचित विपरीत ज्ञान को उत्तेजित कर सकता है। कुछ समय बाद हम इसे विस्तृत रूप से देखेंगे।
  • सत्व शून्यम यह काल (समय) है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में यह समझाते है कि कुछ दार्शनिकों ने काल का तिरस्कार कर दिया है। परन्तु क्योंकि हम काल कि अस्तित्व सीधे तौर पर अनुभूति और शास्त्रों द्वारा महसूस कर सकते हैं, इसलिये काल को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं आता है। काल एक ऐसा घटक है जो अचित्त को निरन्तर बदलाव के लिये सरल बनाता है। काल को भगवान के भूतकाल के उपकरण की तरह समझाया जाता है। काल का दोनों परमपदधाम और इस संसार में अस्तित्व है – जब कि परमपद में पूर्णत: आज्ञाकारी है (भगवान के पूर्णत: मुखोल्लास के लिये) और इस संसारके कार्य को नियंत्रण करने हेतु एक विशिष्ट भूमिका है।

मिश्र सत्वम के विषय पर अधिक जानकारी:

  • मूल प्रकृति (आदिकालीन विषय) एक ऐसी परिस्थिति हैं जहाँ पर सभी तीनों गुण –सत्व, रजस और तमस पूर्णत: संतुलित है। यह एक सूक्ष्म अवस्था है और यह तत्व जो भगवान का शरीर है। सृष्टि उत्पत्ति के समय जब गुणों का संतुलन बदल जाता है तब सूक्ष्म अवस्था टोस पदार्थ बनकर रंग बिरंगे नाम व रूप में बदल जाता है। सृष्टि के समय प्रकृति उपाधान कारणम है। भगवान के दिव्य संकल्प से सूक्ष्म स्थिति सकल बन जाती है। ऐसी अवस्था के इस तरह के बदलाव से २४ तत्त्वों का प्रार्दुभाव होता है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते है कि “पोंगैम्पुलनुम पोरियैंन्थुं करुमेन्द्रियम ऐम्भूतं इंगीव्वुयीरेय पिरकिरुति मानान्गार मनंगले”। अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रुति में बताये गये अनुसार भगवान घोषणा करते हैं “बहु स्याम” – मैं अनन्त हूँ। इस प्रतिज्ञा के साथ जटिल पदार्थ को तत्क्षसृष्टिण रंग बिरंगी पूर्ण स्वरूप में बदल देते हैं। इन पदार्थ के २४ तत्त्वों को इस तरह समझाया जाता है।
    • पोंगैम्पुलन – वह जो हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है – पञ्च तनमात्रा – इंद्रियाँ के ५ उद्देश – शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद, गंध।
    • पोरियैंन्थुं – वह जो हमें इच्छाओं के जाल में फँसाता है – पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञान के ५ इंद्रियाँ – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक।
    • करुमेन्द्रियाँ – वह जो हमें इन इच्छाओं में निरत करता है – पञ्च कर्मेन्द्रियाँ – ५ कार्य करने के इंद्रियाँ – मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ।
    • ऐम्भूथम – पञ्च तन्मात्रा कि तिरुमाली – पञ्च भूत – ५ महान तत्व – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
    • मानस – मन
    • अहंकार – अहम
    • महान – पदार्थ जो स्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
    • मूल प्रकृति – पदार्थ जो अस्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
  • शब्द, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श ५ भिन्न अनुभव हैं। इन अनुभवों से आकर्षित होनेवाले ज्ञानेन्द्रियाँ भी पाँच हैं – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक। कर्मेन्द्रियाँ जो इन इच्छाओं को रूप देता है वह भी पाँच है मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ। कोई भी स्वरूप पाँच तत्वों से बनता हैं – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। अब तक हमने २० तत्व को देखा हैं। महान एक सिद्धान्त हैं जो जीवात्मा के परिश्रम को गती देता है। अहंकार – घमण्ड / आदर को गती देता है। मानस इच्छाओं को गती देता है। अन्त में मूल प्रकृति इस तरह २४ अचित्त तत्त्व हुये। २५वां तत्व जीवात्मा है और २६वां तत्व ईश्वर है।
  • जब पदार्थ के गुण सत्व, रजस और तमस गुण में समान मात्रा में वितरित होते हैं तब उस अवस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। जब वह असंतुलित हो जाता है तब उसका असर प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। जब ऐसा संतुलन खो जाता है तब पहिले महान प्रगट होता है। इसे महत तत्वम भी कहते हैं। जिस तरह किसी बीज को पानी में भिगोकर रखने के बाद जब बीज अंकुरित होता है ठीक उसी तरह हम इन तत्वों का वर्णन कर सकते हैं। यह महत तत्वम ३ अवस्थाओं में है – सात्विक, राजस और तामसिक। इन ३ महान अवस्थाओं से तीन प्रकार के अहंकार – वैकारिकम, तैजसम, भूताधि होते हैं। अहंकार एक ऐसा सिद्धान्त है जो वास्तविकता को घटाता है और भ्रम फैलाता है। उदाहरण के लिये शरीर और आत्मा को समान मानना एक ऐसी गलत फैमी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे तत्वत्रय में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्याओं में पदार्थ के भिन्न भिन्न पहलुओं के लक्षणों के विषय में प्रमाण देकर समझाते हैं। सामान्यतया मूल प्रकृति को प्रधानम (प्रमुख अवस्था), अव्यक्तम (अस्पष्ट स्थिति) की तरह समझाते है। जब मूल प्रकृति को महत तत्वम में बदलते हैं – पदार्थ स्पष्ट अवस्था में आजाता है और उसका नाम, स्वरूप, आदि आजाते हैं। माहन से प्रारम्भ होकर प्रकृति २३ अन्य तत्वों में फैलती है।
  • वैकारिकम से दोनों कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती है और वे सूक्ष्म अवस्था में ही रहती हैं। मन भी वैकारिकम का एक उत्पादन है। भूताधि, पंचभूतम आदि जन्म लेते हैं। तैजसम वैकारिकम और भूताधि को अनेक बलाव में मदद करते हैं।
  • भूताधि से पंचतनमात्रा (ज्ञान का अनुभव करनेवाले पदार्थ) जो पंचभूत के सूक्ष्म पहलुओं के निर्माण होते है और यहाँ उनका अनुक्रम समझाया जायेगा। भूताधि से प्रथम शब्द तनमात्रम प्रगट होता है। यह आकाश (रंग रहित द्रव्य) कि स्पष्ट स्थिति है। शब्द तनमात्रम से आकाश और स्पर्श तनमात्रम प्रगट होते है। स्पर्श तनमात्रम से वायु और रूप तनमात्रम प्रगट होते है। रूप तनमात्रम से अग्नि और रस तनमात्रम प्रगट होते है। रस तनमात्रम से गन्ध तनमात्रम और जल प्रगट होते है। गन्ध तनमात्रम से पृथ्वी प्रगट होते है। अनुवादक टिप्पणी: तैत्रिय उपनिषध में इसे इस तरह समझाया है “आकाशात वायु:, वायोर अग्नि:, अग्नियैर आप:, अभय: पृथ्वी …” – आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी और इस तरह आता है। इस प्रक्रिया को सामान्यतया पंचीकरणम (पाँच तत्वों का मिश्रण) कहते हैं।
  • इस तरह सृष्टी के एक अंश अनुसार भगवान २४ तत्वों का प्रयोग कर पहिले कई ब्रह्माण्डों का निर्माण करते है और एक बार इन ब्रह्माण्डों का निर्माण हो जाता है तब अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माजी द्वारा कई प्रजातियों का निर्माण करवाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टि को ब्रह्माजी द्वारा इन भागों में विभाजित किया जाता है जैसे अद्वारक सृष्टि – स्वयं भगवान द्वारा निर्मित और सध्वारक सृष्टि – ब्रह्माजी, ऋषि, आदि द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भगवान द्वारा निर्मित। जब तक ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है यह स्वयं भगवान के द्वारा होता है। एक बार ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है तब वे हर प्रत्येक ब्रह्माण्ड के लिये एक ब्रह्म को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माण्ड में आगे कि उत्पत्ति के लिये उनकी सहायता करते है। ब्रह्मा, सप्त ऋषि, मनु, आदि सभी को प्रजनन की क्रिया में व्यस्त कर ब्रह्माण्ड में विविध रंग बिरंगी जातियों और रूपों में उत्पत्ति करते हैं, उन्हें ब्रह्माण्ड में देखा जा सकता है। यह समझाया गया हैं कि ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं और सभी ब्रह्माण्ड को एक ब्रह्मा का नेतृत्व प्राप्त है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि यह भौतिक संसार खुद ही बहुत विस्तृत है और हमारी कल्पना के बाहर है। परमपदधाम को सामान्यतया त्रिपाद विभूति (संसार से ३ गुणा बड़ा) ऐसा समझाया गया है। साथ ही सृष्टी जो हम देखते हैं वह आवर्ती मात्र है। वहाँ पर सृष्टी, स्थिति और संहार है। इस तरह के अनंत चक्र काल से है जिसका न प्रारम्भ है और न अन्त है।

इस प्रस्तावना के साथ ही हम शेष बाधाओं के इस विभाग में विस्तृत रूप से जानेंगे।

  • आकाश (रंग रहित द्रव्य) एक आवरण अभावम (जिसकी कोई सीमा नहीं है) और शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य और सर्वव्यापी है ऐसा समझकर घबराना बाधा है। आकाश पंचभूतों में से एक है जिसका निर्माण सृष्टी के एक भाग के रूप में सृष्टी के संग ही हुआ है। इसलिये उसे शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य नहीं समझ सकते हैं।
  • दिशा एक अलग पदार्थ है और इससे घबराना बाधा है। दिशाएँ जैसे पूरब, पश्चिम, आदि भिन्न पदार्थ नहीं है। चेन्नई में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम दक्षिण में है। परन्तु आल्वार तिरुनगरी में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम उत्तर में है। इसलिये यह तुलनात्मक है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२७वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि वैशेषिका, आदि दिशा एक अलग पदार्थ जैसे पृथ्वी ऐसा नहीं समझाते है। इस विषय पर विद्वानों से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • काल का अलग से कोई अस्तित्व नहीं हैं इससे घबराना बाधा है। काल निमिष, मणि, मुहूर्तम, आदि के नाम से जाना जाता है। यह सभी समय के परिवर्तन पर आधारित है, इस संसार में सब कुछ परिवर्तन शील है। “कालो ही धुरतिक्रम:”- (समय का प्रभाव अवश्यभावी है) यह प्रसिद्ध पद है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२५वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि बौद्ध, आदि काल के उत्पत्ति को स्वीकार नहीं करते है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते है कि क्योंकि काल दोनों अनुभूति और शास्त्र से समझा जा सकता है, ऐसे तत्त्व जो काल के अस्तित्व को ही नहीं मानते हैं उन्हें हम कैसे स्वीकार कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के व्याख्यान में बहुत ही सुन्दर उदाहरण से इस सिद्धान्त को स्थापित करते हैं।
  • वायु को देख नहीं सकते हैं, इससे घबराना बाधा है। हालाँकि वायु को देख नहीं सकते है लेकिन उसकी उपस्थिती को स्पर्श द्वारा महसूस किया जा सकता है, इसे अप्रत्यक्ष के तरह समझा नहीं सकते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-40.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३८)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – ३ (समापन भाग)

 श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीपेरुमबदुर – वह जिन्होंने हमारे सिद्धान्त का प्रचार सही रीति से किया

हम इस विषय पर चर्चा जारी रखेंगे। इनमें से कई विषयों को जानने के लिये अधिक ज्ञान की आवश्यकता है जिसे हम शास्त्रों का सही अध्ययन करके प्राप्त कर सकते हैं। इस विषय के बारें में सम्पूर्ण वह गहरी समझ प्राप्त करने हेतु इन सिद्धान्तों को आचार्य के मार्गदर्शन में हीं अध्ययन करना उत्तम है।

  • मोक्ष जिससे परमपदधाम में नित्य कैंकर्य का मार्ग प्रशस्त होता है की चाहना न करना बाधा है। पिछले भाग में हमने अस्थाई व गौण सांसारिक सुख से सम्बन्ध को त्यागने की आवश्यकता के विषय में देखा है। यहाँ मोक्ष को अनन्त व स्थिर परिणाम कहा गया है। ऐसे लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा न रखना बाधा है। जैसे “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” में समझाया गया है कि मोक्ष असीम और परम आनन्द है। जिसको एक बार जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त हो जाता है उसका फिर पुर्नजन्म नहीं होता है। अनुवादक टिप्पणी: चांदोग्य उपनिषद में घोषणा की गई है कि “न च पुनर आवर्त्तते, न च पुनर आवर्त्तते” – वापिस नहीं आना है। दो बार कहने से यह महत्त्वपूर्ण वार्तालाप यह सिद्धान्त ओर अधिक ताकतवर हो जाता है। भगवान कृष्ण गीता के ८.१६ में कहते है “अ ब्रह्मा भुवनाथ लोका:” – ब्रह्म लोक से – सर्वश्रेष्ठ स्थान से न्यूनतम स्थान तक बारम्बार जन्म मरण होगा परन्तु जिसने मुझे प्राप्त कर लिया है उसके लिये इस भौतिक संसार में पुर्नजन्म नहीं है। यह विशिष्ट लक्षणों वाला परमपदधाम है – एक बार जीवात्मा वहाँ पहुँचते ही वह पूरी तरह पवित्र होकर और उसके ज्ञान का पूर्ण विस्तार होता है। इसलिये इस संसार में पुन: आने का कोई सम्भावना हीं नहीं है। परमपद में जीवात्मा कई स्वरूपों से भगवान के भांति भांति कैंकर्य निरत रहते है। इसे चांदोग्य उपनिषद में समझाया गया है “स एकता भवति, थ्रिता भवति …” – वों एक, तीन, आदि स्वरूप धारण कर सकता है। वहाँ इस तरह के परमानंद का कोई अन्त नहीं है और जीवात्मा का इस संसार में पुन: आने कि कोई संभावना नहीं है, वों भी ऐसे परमानंद का स्वाद चखने के पश्चात जो उसके लिये स्वाभाविक है। भगवान स्वयं जीवात्मा को वापिस संसार सागर में नहीं भेजेंगे क्योंकि उन्होंने जीवात्मा को परमपद में लाने के लिये बहुत परिश्रम किया है। इसलिये हमें भगवान के परमपदधाम में निरन्तर नित्य कैंकर्य की चाहना करनी चाहिये।
  • मुमुक्षु को लौकिक संसार में रुचि होना बाधा है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि चाह करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित तिरुविरूत्तम के प्रथम पाशुर में वर्णन किया गया है “इन् निन्र नीर्मै इन याम उरामै” – मैं इस संसार में फँसे होने की मेरी अभी की स्थिती को सहन नहीं कर सकता क्योंकि इस लौकिक संसार में जीवन के लिये मुझे अरुचि होनी चाहिये। ऐसी स्थिती से बाहर आने के लिये हमें परमपद प्राप्ति कि इच्छा होनी चाहिये। इसे “संसारत्तिल अडिक्कोधिप्पु” – ऐसे समझाया गया है यानि भौतिक संसार में रहना यानि गरम रेत पर चलाने के समान है। अनुवादक टिप्पणी: जब कोई गरम रेत पर चलते हुये फँस जाता है तो वह बड़ी आतुरता से छाया की ओर देखता है। संसार को गरम रेत और परमपदधाम को ठंडी छाव से तुलना की गयी है। स्वयं भगवान को ऐसे समझाया गया है “वासुदेव तरुछ्छाया” – वसुदेव छाँव देनेवाला वृक्ष। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ११६ सूत्र (द्वय प्रकरणम का पहला सूत्र) में श्रीवैष्णव लक्षणम को समझाते है। कई लक्षणों में एक को चिन्हित करते हैं कि श्रीवैष्णवों को परमपदधाम पहुँचकर नित्य कैंकर्य करने का पूर्ण विश्वास होना चाहिये। इसके साथ उस लक्ष्य की पूर्ति के लिये निरन्तर लालसा होनी चाहिये। हम जिस अवस्था में हैं उसीमे हीं संतुष्ट नहीं होना चाहिये और आनन्दपूर्वक अपना जीवन निर्वाह करना चाहिये। बजाय इसके कि इस भौतिक संसार से मोक्ष पाने की निरन्तर लालसा होनी चाहिये ताकि परमपदधाम में निवास कर भगवान का नित्य कैंकर्य कर सकें। ऐसी चाहना न होना ही बाधा है।
  • यह न समझकर कि हमने जो कुछ भी प्राप्त किया है वह हमारे कर्मों का फल है जो अस्थायी आर नगण्य व तुच्छ है और ब्रह्म सकारात्मक है के विषय में जानने की इच्छा न रखना बाधा है। कर्म साध्य फलम – हमने यज्ञ, याग्य, आदि से जो कुछ प्राप्त किया है जैसे कि सांसारिक धन, स्वर्ग, आदि का सुख। यह अस्थाई हैं – हमारे पुण्य समाप्त होते ही यह समाप्त हो जायेंगे। वे शाश्वत नहीं हैं। परमपदधाम की निरन्तर कैंकर्य के आर्शिवाद से तुलना की जाये तो यह सब नगण्य, तुच्छ है। ऐसे सांसारिक आनन्द की कमियों को जानते हुये भी यदि कोई भगवान के नित्य कैंकर्य की चाहना नहीं करता है तो उसकी यह बहुत ही दयनीय दशा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण भगवद्गीता के ८.१५ श्लोक में समझाते हैं कि “मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयम शाश्वतम् …” – मुझे प्राप्त करके जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत में नहीं लौटते जो दुख और शाश्वत का घर है, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है। इस भौतिक संसार में चाहे पाताल लोक हो, ब्रह्म लोक हो, जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापा, आदि रहेंगे। इन चार समस्याओं के रहते दु:ख की सम्भावना रहती है। अत: हमें तुच्छ सांसारिक पहलुओं से सम्बन्ध त्याग कर परमपदधाम में भगवान का नित्य कैंकर्य और अपना लक्ष्य केन्द्रित करना चाहिये।
  • यह न जानना कि नारायण जिसे नारायण अनुवाकम प्रगट किया गया है वे ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं बाधा है। नारायण सूक्त में देखा जाता हैं कि “नारायण परम ब्रह्म तत्वम नारायण: परा: नारायण परोज्योति: आत्मा नारायण: परा:”। यहाँ श्रृति में घोषणा की गई है कि सर्वश्रेष्ठ भगवान जो नारायण है वही परब्रह्म हैं जिनके बराबर कोई नहीं है। इसका सभी को अध्ययन करना चाहिये और समझना चाहिये।
  • यह न समझना कि शास्त्रों के कर्म भाग स्वयं भगवान ने ही प्रतिस्थापित किया है जिसे सबको पालन करना चाहिये – बाधा है। वेदों को दो भागों में बाँटा गया है। कर्म भाग हमें यागम (त्याग), यज्ञम (पूजा), आदि समझाता हैं। कर्म दो प्रकार के हैं। आज्ञा कर्म – नित्य, नैमित्तिक कर्म। यह नित्य / नैमित्तिक कर्म हमें करना चाहिये। अकारणे प्रत्यवायम – जब ऐसे कर्म नहीं किये जाते हैं तो वह पाप कि ओर ले जाता है। एक और प्रकार का कर्म है काम्य कर्म – यह वैकल्पिक है और सामान्यता सांसारिक लाभ कि ओर केन्द्रित है। हम अपने नित्य कर्म यह संकल्प के साथ करते है “श्री भगवद आज्ञा भगवत कैंकर्यं रूपं” – कर्म जो भगवद आज्ञा है और भगवद कैंकर्य का एक अंश है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वेदों के दो भाग करने के तत्त्व को समझाते हैं – श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के पहले सूत्र पर व्याख्या में पूर्व भाग और उत्तर भाग को समझाते हैं। वे आगे कहते हैं कि पूर्व मीमांसा (जैमिनी सूत्रम) के साथ में “अथातो धर्म जिज्ञासा” उत्तर मीमांसा (वेद व्यास ब्रह्म सूत्रम) जो “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” से प्रारम्भ होता है। इसलिये पूर्व भाग में कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान की विविध पूजा पद्धत्ति को समझाने पर केन्द्रित किया गया हैं और उत्तर भाग में ऐसे भगवान जिनकी पूजा की जाती है उनके गुणों को समझाया गया है। तैत्रीय उपनिषद में भी यह दर्शाया गया हैं कि “स आत्मा, अङ्गान्यन्या देवता:” – सभी देवता भगवान के अंश है और भगवान द्वारा अनवरत हैं। इसे जानने के लिये विद्वान जन स्वयं को कर्मानुष्ठान से भगवान की पूजा में व्यस्त रखते हैं (स्वयं भगवान की आज्ञा द्वारा)। इस विषय पर उनकी व्याख्या वास्तव में विस्तृत है – परन्तु यह सुन्दर विश्लेषण / प्रस्तुति अपने सत सम्प्रदाय के मूलभूत सिद्धान्त जिसे आचार्य के सही मार्गदर्शन में अध्ययन करने की आवश्यकता है।
  • यह न जानना कि वेदों के ब्रह्म भाग भगवन के स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि को विस्तार से समझाता है और भगवान को पूर्णत: प्राप्त करने में समाप्त होता है – बाधा है। ब्रह्म भाग – उपनिषद है। यह भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, अवतार, आदि को समझाता हैं। स्वरूप का अर्थ सच्चा स्वभाव है – सर्वश्रेष्ठ, अन्तर्यामी, आदि। रूप का अर्थ है भगवान के दिव्य स्वरूप की सुन्दरता, मृदु स्वभाव, आदि। गुण में उनके सभी पवित्र लक्षण शामील है – गुण जो उनके श्रेष्ठता को दर्शाता है जैसे ज्ञान, शक्ति, आदि और गुण जो उनके सादगी जैसे मिलनसार, मातृत्व की तरह सहिष्णुता आदि। वैभव, आदि – उनके अवतार, अपार सम्पत्ति, आदि शामील हैं। एक बार यदि कोई इनको (स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि) समझ जाता हैं तो स्वयं उसमें भगवतप्राप्ति की लालसा जागृत होती है और वह उन्हें प्राप्त करने के तरीकों कि खोज करता है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ ब्रह्म भाग में उपनिषद और ब्रह्म सूत्र शामील हैं। वेदान्त सूत्र एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण साहित्य है जो ब्रह्म के लक्षणों को स्थापित करते हैं। बोधायन ऋषि ने सर्व प्रथम ब्रह्म सूत्र की व्याख्या की थी जिसे काश्मीर में सुरक्षित रखा गया था। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी की इच्छा पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीविशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की स्थापना के लिये इस सूत्र की विस्तृत व्याख्या लिखने की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ काश्मीर तक प्रयाण किया और बोधायन वृत्ति ग्रन्थ लेकर पुन: श्रीरंगम की ओर प्रस्थान किया। कुछ बदमाशों ने जब इस विषय के बारें में सुना तो उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी का पीछा किया और उनसे ग्रन्थ को पुन: छीन लिया। श्रीरामानुज स्वामीजी बहुत दु:ख और शोक में डूब गये, लेकिन श्रीकुरेश स्वामीजी ने उन्हें बताया कि जब आप विश्राम कर रहे थे उस समय आपने सम्पूर्ण ग्रन्थ को कंठस्थ कर लिया है। वे श्रीरंगम लौट आते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी की सहायता से श्रीभाष्य (ब्रह्म सूत्र पर विस्तृत व्याख्या) ग्रन्थ कि रचना किये। श्रीरामानुज स्वामीजी पुन: काश्मीर जाते हैं और वहाँ सरस्वती देवी शारदा पीठ में उनका हर्षोल्लास के साथ स्वागत करती हैं। वे श्रीरामानुज स्वामीजी से श्रीभाष्य स्वीकार कर उसका अवलोकन करती हैं। साहित्य की महान स्पष्टता को देखकर वे अति प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी को “श्री भाष्यकार” की उपाधि से सम्मानीत करती हैं। उपनिषद के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने अलग से कोई व्याख्या नहीं लिखी हैं। श्रीवेंकटेश भगवान के सन्मुख उन्होंने स्वत: वेदार्थ संग्रह पर व्याख्या प्रस्तुत किया। इस वेदार्थ संग्रह में वें विशेषकर उपनिषद के ऐसे पहलुओं पर ज़ोर देकर समझाया है जिन्हें अद्वैत गलत तरीके से पेश करते हैं। कुछ व्याक्यांश जैसे “तत्वमसी, अहं ब्रह्मासमी, आदि” अद्वैती गलत तरीके से समझाते है और ऐसे व्याक्यांश बहुत साफ तरीके से, सही सन्दर्भ के साथ और कई प्रमाणों के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदार्थ संग्रह में समझाया हैं। इस तरह भगवान के अद्भुत पहलुओं को श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं के जरिये मूल तरीके से बिना किसी संशय भ्रम के हम समझ सकते हैं।
  • परमपद में नित्य सेवा कैंकर्य ही अन्तिम लक्ष्य है यह न मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण के निकट पहुँचना ही परमपुरुषार्थ (श्रेष्ठ लक्ष्य) है। इस लक्ष्य में भगवद अनुभव सर्व प्रथम कदम है। ऐसा अनुभव हमें प्रीति के मार्ग में अग्रसर होकर भगवान के अद्भुत गुणों को समझाते हैं। ऐसा प्रेम हमें उनके कैंकर्य जो उनके आनन्द के लिये हो की ओर आगे बढ़ाता है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे “अकिञ्चितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” में कहा गया हैं – किसीके दासत्व का सच्चा स्वभाव छोटे छोटे कैंकर्य कर अनवरत रख सकते हैं। वेदान्त हमें दासत्व के सही स्वरूप में रहकर मोक्ष प्राप्ति समझाते हैं। शेषत्व आत्मा का मुख्य गुण हैं। वह शेषत्व हमें भगवान के आनन्द के लिये निस्वार्थ कैंकर्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। इस अन्तिम लक्ष्य के विषय में कोई दूसरा ज्ञान केवल एक मिथ्याबोध है।
  • साम्यापत्ति (जीवात्मा का ब्रह्म के बराबर स्तर तक पहुँचना) सामरस्यम (समान आनन्द होना) कि इंद्रिय को प्रगट करता है, यह न जानना बाधा है। श्रृति में मोक्ष को “परमं साम्यमुपैती”, “सोस्नुते सर्वान्कामान सहब्रह्मणा”, आदि ऐसे समझाया गया है। विशेषकर भगवान, नित्यसूरीगण और मुक्तामा में समान ज्ञान और आनन्द होता हैं। फिर भी भगवान स्वामी है और जीवात्मा उनके दास हैं। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा के लिये भगवान के चरण कमलों तक पहुँचना ही वास्तविक आर्शिवाद है। वह जो भगवान के निकट पहुँचता है उसे साम्यापत्ति मोक्ष से आर्शिवाद प्रदान करते है जिसे श्रीपरकाल स्वामीजी अपने पेरिया तिरुमोझी में इस तरह पहचानते हैं – “थम्मैये ओक्क अरुल चेयवर” – भगवान मुक्तामा को अपने गुण प्राप्ति का आर्शिवाद प्रदान करते हैं। साम्यापत्ति मोक्ष का अर्थ मुक्तामा भगवान कि निर्हेतुक कृपा से आठ गुण प्राप्त करना हैं। यह गुण भगवान में पूर्णत: हैं। इन आठ गुणों से भी आगे कुछ गुण जैसे श्रिय:पति, शेष सायित्वम (वह जो आदि शेष पर विश्राम कर रहा हो), उभय विभूति नाथम (नित्य विभूति और लीला विभूति के निर्वाहक), आदि भगवान में हीं हैं। आठ गुण हैं: अपहठपाप्म – सभी पापों से मुक्त, विजरा: – बुढ़ापे से मुक्त, विमृत्यु: – मृत्यु से मुक्त, विशोक: – दु:खों से मुक्त, विजिगत्सा: – भूख से मुक्त, अपिपासा: – प्यास से मुक्त, सत्यकामा: – सभी इच्छा पूर्ण करने योग्य, सत्य संकल्प: – कोई भी कार्य पूर्ण करने योग्य।
  • यह कल्पना करना कि स्वरूप ऐक्यम (परमात्मा और जीवात्मा का मिलन) है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है कि अद्वैत जन ऐसा भ्रम फैलाते हैं कि जीवात्मा ही ब्रह्म बनते है।
  • यह न जानना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात भगवान के कैंकर्य के लिये कई स्वरूप धारण करते हैं और इस भ्रम में रहना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात कोई स्वरूप / शरीर नहीं रहता है – यह बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि मुक्तात्मा के लिये कैंकर्य हीं अन्तिम लक्ष्य है। कैंकर्य करने हेतु जीवात्मा को एक शरीर या रूप कि आवश्यकता है। श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवन्दादि के ५३वें पाशुर में समझाते है “शेन्राल् कुडैयाम् इरुन्दाल् शिङ्गशनमाम् निन्राल् मरवडियाम्…” – जब भगवान भ्रमण करते है तो आदिशेषजी छत्र का रूप धारण करते हैं, जब वें बैठते हैं तो आदिशेषजी सिंहासन का रूप धारण करते हैं, जब भगवान खड़े हो जाते हैं तो आदिशेषजी खड़ाऊ का रूप धारण करते हैं, आदि। इस तरह आदिशेषजी (जो नित्यसूरी हैं – नित्य मुक्त जीवात्मा) छत्र, खड़ाऊ, सिंहासन, आदि रूप धारण कर कई कैंकर्य करते हैं। उसी तरह मुक्तात्मा भी कई रूप लेकर बहुत कैंकर्य करते हैं। कैसे कोई बिना शरीर के कैंकर्य कर सकता हैं? अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर की व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाते हैं कि श्रीअम्माजी और श्रीमन्नारायण के मुखोल्लास के लिये श्रीआदिशेष कोई भी रूप धारण करते हैं। वे और कहते हैं कि इस पाशुर में केवल आदिशेषजी कि चर्चा हुई है परन्तु सभी जीवात्मा का परमपद में यहीं होता है जिसे उपलक्षणम (उदाहरण / बराबरी) कहते हैं। चांदोग्य उपनिषद में इन प्रमाणो को देख चुके हैं “स एकता भवति, थ्रिता भवति …”।
  • मुक्ति का अर्थ अर्चिरादि मार्ग से जाना (वह राह जो अर्चि से प्रारम्भ होता है) जो अन्त में परमपद को पहुँचाता है और जीवन मुक्ति (इस जीवन और संसार से मुक्ति पाना) से भ्रम होना – यह न मानना बाधा है। सच्चा मोक्ष / मुक्ति का अर्थ इस संसार के जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाना, परमपद पहुँचना, भगवान परवासुदेव का अनुभव करना और अनन्तकाल तक उनका कैंकर्य करना और उनका पूर्ण मुखोल्लास के लिये बिना किसी त्रुटि के निरन्तर सेवा करना। जीवात्मा (जो मुक्त हो गया हो) मृत्यु के समय अपना शरीर त्यागकर अर्चिरादि मार्ग से जो प्रकाशित राह हैं स्वयं भगवान उसकी मदद करते है और परमपद पहुँचाते हैं। इस अन्तिम दशा को “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” कहते हैं – सुखद मोक्ष। श्रीशंकराचार्यजी के अद्वैत सिद्धान्त में, वेदान्त के वाक्यों का अध्ययन करना व समझना जैसे कि “तत्वमसि” और समझना कि मैं ही ब्रह्म हूँ और उसे ही मुक्ति मानते हैं। अद्वैत सिद्धान्त अनुसार इसी जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है। परन्तु ऐसी समझ अस्पष्ट व भ्रम करनेवाली है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में अर्चिरादि मार्ग को समझाते है “सूळ्वीसुम्बणीमुगिल”। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “अर्चिरादि” नामक रहस्य ग्रन्थ में अर्चिरादि मार्ग व परमपद में सुखद अनुभावों को विस्तार से समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी स्वयं मुमुक्षुप्पड़ी के २७वें सूत्र में दर्शाते हैं कि परमपद में भगवान का कैंकर्य करना, जो हमारा अन्तिम लक्ष्य है इसे “प्रमेय शेखर” और “अर्चिरादि गति” (उनके १८ रहस्य ग्रन्थों में से २ ग्रन्थ) में समझाया गया है। श्रीनायनार बताते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी अपनी दिव्य भावनाओं से भगवान को तिरुमोगुर आप्तन ऐसा कहते है जिसका अर्थ भगवान जो जीवात्मा के अर्चिरादी गति में साथ हो – राह जो जीवात्मा को मोक्ष भूमि कि ओर ले जाता है। आप्तन का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति – उनमें विश्वास करना चाहिये कि वे हमें परमपदधाम को सुरक्षित पहुँचायेंगे।
  • प्रपन्नों के इस जीवन के अन्त में उनके कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसका सूक्ष्म शरीर जीवात्मा के संग जाता है और विरजा नदी में स्नान करने के पश्चात पूर्ण रूप लेता है और इसमें सन्देह करना बाधा है। हालाँकि भगवान कि कृपा से किसी के कर्म (सद्कर्म / अपकर्म) उसके जीवन के अन्त में मिट जाता है और अर्चिरादि मार्ग द्वारा आगे बढ़ता है तथापि जीवात्मा का सम्बन्ध अचित से पूरी तरह नष्ट नहीं होता है क्योंकि उसका सूक्ष्म शरीर अब तक जीवात्मा के साथ जुड़ा रहता है। यह सब भगवान के संकल्प मात्र से होता है। परमपद की सीमापर एक दिव्य नदी है विरजा। जैसे हीं जीवात्मा इस नदी में स्नान करता है भगवान जीवात्मा का “अमानवन” के रूप में हाथ पकड़कर ऊपर उठा लेते हैं। भगवान के इस कृपा के स्पर्श से सूक्ष्म भौतिक शरीर पूर्णत: कट कर अलग हो जाता है तब तक जीवात्मा का इस भौतिक संसार से सम्बन्ध रहता है। “भौतिक पहलुओं के सम्पूर्ण नष्ट होने से उसकी अज्ञानता भी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है” और इसके बाद ही जीवात्मा के पूर्ण ज्ञान का विस्तार हो जाता है। अनुवादक टिप्पणी: स्थूल शरीर – पंच भूतों (पाँच तत्त्व – भूमि, जल, हवा, अग्नि और आकाश) से बना हुआ है। सूक्ष्म शरीर – मन, वासना / रुचि यह हमें अपने पिछले अनुभव से प्राप्त होता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आचार्य हृदय के १०४वें चूर्णिकै के अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से समझाते है। यह चूर्णिकै बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करता है कि कैसे भगवान जीवात्मा जो इस संसार में पूर्णत: डूबा हुआ है को परमपद प्राप्ति कर वहाँ कैंकर्य के लिये कष्ट सहते हैं। इस चूर्णिकै में नायनार एक किसान का उदाहरण देते हैं कि कैसे किसान मेहनत कर अपनी मन पसन्द फसल तैयार करने के लिये कष्ट उठाना पड़ता है। इस पहलू को उसी चूर्णिकै में आगे श्रीनायनार समझाते हैं कि “सूक्ष्मवोट्टुम नीरिले कलुवि” – वें समझाते है “जैसे धान कि गंदगी को निकालने के लिये जल का प्रयोग होता है” उसी तरह श्रीविरजा नदी के पवित्र जल से जीवात्मा को स्नान कराकर उसके सूक्ष्म शरीर को निकाल देते हैं। यहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी एक सुन्दर प्रश्न करते हैं – जब जीवात्मा के सम्पूर्ण कर्मों को निकाल देते हैं तो फिर सूक्ष्म शरीर में वासना, (भौतिक इच्छाओं के कण) आदि का क्या आवश्यक है? इसका वें स्वयं जवाब देते हैं कि यह भगवान का एक संकल्प मात्र है कि जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक ले जाना है और जीवात्मा का वहाँ तक जाने के लिये एक शरीर की आवशयकता होती है। इसलिये स्वयं भगवान ही जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक पहुँचने तक रखते हैं। इस सिद्धान्त को स्थापित करने हेतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पूर्वाचार्यों कि आज्ञाओं को प्रस्तुत करते हैं। जैसे कि जीवात्मा विरजा नदी में स्नान करता है उसका सूक्ष्म शरीर धुल जाता है और अमानवन भगवान स्पर्श मात्र से वह आध्यात्मिक शरीर का स्वरूप धारण करता है (उसी चूर्णिकै में श्रीनायनार स्वामीजी ने भी इसे समझाते है)। यहाँ श्रीएरुम्बी अप्पाजी के पाशुर को स्मरण करना चाहिये “मन्नुयिरगाल इंगे मणवाल मामुनिवन पोन्नडियां सेंगमलप पोधुगलै उन्निच चिरत्ताले तीणडील अमानवनुम नम्मैक करत्ताले तिणडल कदन” – वह जो यहाँ दृढ़ता से हैं, वह जो निष्ठा से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों को पकड़े हैं, अमानव अपने कर्तव्य से बाध्य होकर उनका स्पर्श करते हैं। इस पाशुर का पठन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी विरचित उपदेश रत्नमाला के अन्त में करते हैं।
  • एक विस्मयपूर्ण भक्ति योग में रहना जो इस संसार चक्र से मुक्ति पाकर भगवान के पास जाने का साधन है और प्रपत्ति हीं भगवद्प्राप्ति का वास्तविक साधन है यह न मानना बाधा है। शास्त्र में मुक्ति (परमपद में नित्य कैंकर्य) के कई साधन बताये गये हैं। भगवद्गीता में समझाया गया है कि भक्ति योग जिसे शास्त्रों में भगवान तक पहुँचने के लिये सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है। परन्तु यह भक्ति योग मूलत: जीवात्मा के स्वयं के परिश्रम पर निर्भर करता है फिर भी वह जीवात्मा के सही स्वभाव के विपरीत है जैसे कि स्वाभाविक लक्षण शेषत्व और पारतंत्रय आदि है। इसलिये हमारे आल्वारों और आचार्यों ने भक्ति योग ही उपाय है इसे अस्वीकार करके प्रपत्ति जो जीवात्मा के लिये सहज है को उपाय माना है। यह हमारे लिये उचित होगा कि हम अपने पूर्वाचार्यों के पद चिन्हों का पालन करें।
  • प्रपत्ति शब्द सीधा भगवान कि ओर संकेत करता हैं इसे स्पष्ट रूप से न समझना बाधा है। प्रपत्ति शरणागति है – पूर्णत: भगवान के शरण होना और उनके हीं सहारे को मानना। हालाँकि ऐसे दिखता है कि “हमने” उन्हें पकड़ रखा है लेकिन यह सत्य नहीं है। शरणागति का वास्तविक अर्थ है “त्वमेव उपाय भूतो मे भव – इति प्रार्थना मति:” – यह प्रार्थना करने की मानसिक स्थिति है “आप केवल मेरा उपाय हो जाओं”। यानि प्रपत्ति में स्वयं भगवान उपाय हो जाते हैं। क्योंकि वें उपाय है हमारी यह सोच कि “मैं शरण हो रहा हूँ” उपाय नहीं हैं। वों एक हीं उपाय और उपेय हैं। अत: यह कहा जा सकता हैं कि प्रपत्ति हीं भगवान को दर्शाता हैं। अनुवादक टिप्पणी: गीताजी के चरम श्लोक में भगवान अर्जुन को आज्ञा देते हैं कि सभी धर्मों को त्याग कर सिर्फ मेरी शरण में आवो मैं तुम्हें सारी चिन्ताओं से मुक्त कर दूँगा। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी में इस चरम श्लोक को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। यहाँ भगवान कृष्ण कहते “मामेकं शरणम्” – मुझे हीं सिर्फ उपाय मानो। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “एक” शब्द की विस्तृत व्याख्या करते हैं। यहाँ वे पहचानते हैं कि “एक” शब्द प्रमाणित करता है कि केवल शरणागत होना उपाय नहीं है और भगवान ही उपाय हैं। हमारे सत सम्प्रदाय के इस सूक्ष्म सिद्धान्त को समझना कि यह सिद्धान्त बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई सूत्रों में “एक” को विस्तार से समझाया गया है। इस सिद्धान्त को अच्छी तरह से समझने के लिये हमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मुमुक्षुप्पड़ी के कालक्षेप के सुन्दर व्याख्या को श्रवण करना चाहिये।
  • शरणागति जो अधिकारी विशेषण है (योग्यता प्राप्त व्यक्ति का सहायक) को उपाय समझना बाधा है। जैसे समझाया गया है कि समर्पण कि प्रक्रिया मोक्ष चाहनेवाले व्यक्ति का सिर्फ एक गुण है – अधिक कुछ नही। इस उपाय से भ्रमित होना सही नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: अधिकारी विशेषण का अर्थ वह सहायक जो मनुष्य की विशिष्ट पहचान करता है। यहाँ अधिकारी वह है जो मोक्ष कि “चाहना” करता है – ऐसे जीवात्मा के लिये शरणागति एक प्राकृतिक है क्योंकि भगवान की शरणागति ही जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। मुमुक्षुप्पड़ी के ५५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी घोषणा करते हैं कि “शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपं” – भगवान का दास बनकर रहना जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से प्रमाणों से स्थापित करते है कि जीवात्मा दास है और श्रीहरी स्वामी है। अगले सूत्र में कहते है कि “शेषत्वमिल्लाधपोधु स्वरुपमिल्लै” – जब शेषत्व नहीं है तो उसका सच्च स्वभाव नष्ट हो जाता है। इसलिये जीवात्मा के सच्चे स्वभावनुसार भगवान के शरण होना एक स्वाभाविक क्रिया है – उसे कोई विशेष साधन नहीं मानना चाहिये। कालक्षेप में इस सिद्धान्त को समझाने के लिये एक अच्छा उदाहरण सुना है। एक परोपकारी मनुष्य अपने तिरुमाली में सबको प्रसाद बाँट रहा है। वहाँ एक व्यक्ति आता है और उसे पाने की इच्छा करता है। यहाँ पर प्रसाद के लिये उपाय है परोपकारी मनुष्य का सभी को खिलाने का करुणामय भाव है। परन्तु जिसे वहाँ पाना है उसे “भूख” होनी चाहिये – यही भूख अधिकारी विशेषण है – बिना भूख के वह प्रसाद नहीं पा सकता है जो वहाँ बाँटा गया है। परन्तु यह भूख उपाय नहीं है – यह तो केवल प्रसाद पानेवाले के लिये एक मूलभूत सहायक है।
  • बिना पुरुषकार के शरण होना बाधा है। सामान्यता पुरुषकार का अर्थ सिफारिश है। जीवात्मा को ऊपर उठाने के लिये भगवान को समझाना कि आप ही उपाय हैं। क्योंकि हम कृत्य अकरणम् (शास्त्रों की आज्ञा का पालन नहीं करना), अकृत्य अकरणम् (शास्त्रों द्वारा वर्जित कार्यों में निरत रहना), भगवद अपचार (भगवान के प्रति अपराध करना), भागवत अपचार (भागवतों के प्रति अपराध करना), आदि से भरे हुये हैं, भगवान हमारा तिरस्कार कर सकते हैं। हमारे में इतने अवगुण होते हुये भी माता श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान को समझाती हैं कि वे इन्हें स्वीकार करें और इनकी रक्षा करें। पुरुषकार का यही मुख्य अर्थ हैं। यह कहा गया हैं कि बिना पुरुषकार के शरणागति असफल हैं। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वाचार्यों ने श्रीमहालक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार की भूमिका को विस्तार से समझाया हैं। शरणागति गध्य में श्रीरामानुज स्वामीजी पहिले अम्माजी के पास जाते हैं और फिर भगवान के शरण होते हैं। हमारे सत सम्प्रदाय में द्वय महामन्त्र की बहुत स्तुति होती है क्योंकि यह अम्माजी की भूमिका को पूर्णत: प्रकाशन करता है। द्वयम के पहिले खण्ड में यह समझाया गया हैं कि अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण के शरण होना चाहिये और सिर्फ भगवान को हीं उपाय मानना चाहिये। द्वयम के दूसरे खण्ड में यह समझाया गया है कि इस दिव्य युगल जोड़ी की हमें एक साथ सेवा करनी चाहिये जिससे भगवान का मुखोल्लास होगा। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अम्माजी के भूमिका और पुरुषकार को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी १३५वें सूत्र में समझाते है कि काकासुर (कागभुसण्डी) ने गलत इरादे से माता सीता जो प्रभु श्रीराम के संग थी को दु:ख पहुँचाया लेकिन अन्त में माता सीता हीं के पुरुषकार से काकासुर को अभयदान दिया। परन्तु दूसरी तरफ रावण श्रीराम के हाथों मारा गया क्योंकि माता सीता उस वक्त श्रीराम के संग नहीं थी। इसलिये जब हम भगवान के शरण होते हैं और यदि अम्माजी भगवान के साथ हैं तो भगवान जीवात्मा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं और यदि अम्माजी के पुरुषकार को अनदेखा करेंगे तो अपने इच्छा के विरुद्ध परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • आचार्य के विषय में यह विचार करना कि वे केवल पुरुषकार हैं नकि स्वतन्त्र उपाय है बाधा है। सामान्यतया आचार्य को अम्माजी का सहायक/दास समझा जाता है। आचार्य अम्माजी की तरह ही दयालु, बिना किसी भेदभाव के सभी के प्रति करुणामय हैं। परन्तु श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ९५वें पाशुर में समझाया गया हैं कि “विण्णिन् तलैनिन्नु वीडलिप्पानेम्मिरामानुजन्” – समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्रीरामानुज स्वामीजी पधारे हैं, आचार्य भी स्वतन्त्र उपाय हो सकते हैं। यह श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें पाशुर का भी सार है “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – हमारे उज्जीवन के लिए आचार्य की कृपा ही सर्वश्रेष्ठ आर्शिवाद है। अनुवादक टिप्पणी: अंतिमोपाय निष्ठा में आचार्य को स्वयं भगवान का अपरावतार समझाया गया है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४२७वें सूत्र में समझाते हैं कि सीधे भगवान के पास पहुँचने का अर्थ है भगवान का हाथ पकड़ने के लिये सहायता मांगना और आचार्य के द्वारा भगवान के निकट पहुँचने का अर्थ है भगवान के चरण कमलों को पकड़ना। आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। भगवान के चरण कमलों के जैसे आचार्य भी बहुत दयालु हैं। अत: उन्हें स्वतन्त्र उपाय माना गया है।
  • उपाय और उपेय को दो भिन्न भिन्न तत्त्व समझना बाधा है। अन्तिम लक्ष्य तो परमपदधाम में भगवान के निकट पहुँचना और उनके आनंद के लिये नित्य कैंकर्य करना है। इस अन्तिम लक्ष्य प्राप्ति के लिये वों हीं एकमात्र साधन है। अत: उपाय और उपेय भगवान हीं हैं।
  • अन्य सिद्धान्तों के विध्यालय के जनों से सम्बन्ध रखना जो भगवान को जगत शरीरत्वम (पूर्ण ब्रम्हाण्ड में निवास करनेवाली अकृष्ट आत्मा), आदि सिद्धान्त को नहीं मानते हैं – बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “उडन्मिसै उयिरेनक् करनथेंगुम परनतुलन” – जैसे आत्मा सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई है (ज्ञान के द्वारा), स्वयं भगवान भी सर्वत्र व्याप्त हैं। यहाँ पर भगवान हर ब्रह्माण्ड के हर तत्त्व में व्याप्त है और सबकुछ उनका शरीर है – यही विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है। रावण को परास्त करने के पश्चात ब्रह्माजी भगवान श्रीराम कि बहुत स्तुति करते हैं। वें श्रीराम की श्रेष्ठता को “सीता लक्ष्मी भवान विष्णु:” कहकर स्थापित करते हैं – श्रीसीताजी श्रीमहालक्ष्मीजी हैं और आप विष्णु है और “जगत सर्वं शरीरं ते” – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। परन्तु कुदृष्टिवाले (जो शास्त्र को गलत ढंग से पेश करते हैं) इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं करते हैं। अत: हमें ऐसों से मित्रता नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी:  विष्णु का अर्थ है जो सर्व व्यापी है। वासुदेव का अर्थ जो सर्वत्र रहते हैं। नारायण का अर्थ है जो स्वयं सबके निवास स्थान हैं और वे स्वयं भी सब में व्याप्त हैं। भगवान के यह तीन नाम उनके सर्वत्र व्यापी गुण को दर्शाते हैं। वे सब वस्तुओं की आत्मा है यह जगत शरीरत्वम की पुष्टी करता है। यह बहुत साधारण विचार है। आत्मा की तरह आत्मा का भी एक शरीर है, परमात्मा के लिये सबकुछ उसके शरीर जैसे है। इस मतभेद में केवल एक समानता है – आत्मा शरीर के एक निश्चित अंग पर है और वह पूर्ण शरीर में ज्ञान के द्वारा फैली हुई है (यानि आत्मा शरीर के सभी अंगों में प्राकृतिक रूप में उपस्थित नहीं है) – क्योंकि आत्मा स्वभाव में अणु है। परन्तु परमात्मा विभु है – इसलिये इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण कण में वे शारीरिक रूप से व्याप्त हैं। वेद के इस तत्त्व को अन्य विध्यालय के विद्वानों को मान्य नही है और ऐसों से मित्रता हमारे ऊपर विपरीत परिणाम कर सकता है यदि हम स्वयं इस मूल सिद्धान्तों में दृढ़ नहीं है। इसलिये ऐसे लोगों से मित्रता से बचने की सिफारिश की जाती है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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तिरुप्पावै अनुभव – तिरुप्पावै – अर्थपञ्चकम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पराम्बा माँ गोदाम्बाजी (आण्डाळ् देवी) द्वारा रचित तिरुप्पावै उभय वेदांत का सार है| इस तिरुप्पावै के गूढ़ रहस्यार्थ को आत्मसात करने पर , परमपद प्राप्ति में आने वाली सारी बाधाएं , अड़चने ,स्वयमेव समाप्त हो जाती है| परमपद का मार्ग सुगम और सुलभ हो जाता है|

आण्डाळ् – रन्गमन्नार्, श्रीविल्लिपुतूर्

आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने अपनी मुमुक्षुप्पडि में  कहा है की,  एक मुमुक्षुको ( इस संसार के बंधनो से मुक्त हो, मृत्यु लोक में आवागमन से मुक्त हो , परमपद में भगवान् के नित्य कैङ्कर्य में सलंग्न रहने की आकांक्षा रखने वाला) को  “अर्थ पञ्चकम्” (पञ्च भाव ) का पूर्ण रूपेण ज्ञान होना अति आवश्यक है  |

अर्थ पञ्चकम् के यह पांच भाव कुछ इस प्रकार है:

१.  परमात्म स्वरूपम्| (भगवान् के स्वरूप का ज्ञान) |

२.  जीवात्म स्वरूपम्| (स्व-स्वरूप/ पृथक आत्म स्वरूप/जीव का स्वरूप का ज्ञान) |

३.  उपाय स्वरुपम्| (भगवत प्राप्ति के साधन का का ज्ञान ) |

४.  उपेय स्वरूपम्|  (जीव के अपने लक्ष्य याने भगवत प्राप्ति के पश्चात की गतिविधियां का ज्ञान) |

५.  विरोधि स्वरूपम्| (लक्ष्य की प्राप्ति याने भगवत प्राप्ति में आने वाली बाधाएं \ रुकावटों का ज्ञान   होना) |

तिरुप्पावै के पहले पासुरम् में ही आण्डाळ् देवी संक्षेप में अर्थ पञ्चकम् बतलाकर समझाती है | यहां आण्डाळ् देवी कहती है  “नारायणने नमक्के परै तरुवान्”, पूर्वाचार्यों के अनुसार आण्डाळ् देवी की इस पंक्ति के भाव कुछ इस प्रकार है|

  • “नारयाण”  भगवान नारायण को सम्बोधित करने वाला यह नाम , यहाँ भगवान के परमात्म स्वरुप को दर्शाता है|
  • इस पंक्ति में नारायण नाम के दो अर्थ है, जो इस प्रकार है:
      • परत्व (स्वामित्व) – भगवान् के स्वामित्व को जतलाते हुये, इस चराचर जगत में जीवात्मा के आधार (अवलम्बन) हैं , दर्शाता है|और सभी जीवात्मा के नारायण ही आधेय है| , दर्शाता है (आधार \ अवलम्बन पर आश्रित है) |
      • सौलभ्य (भगवान का सुलभ गुण , उपगम्य-सर्व व्यापी) – भगवान के सौलभ्य गुण को दर्शाते हुये, इस का आभास करवाता है की , जीवात्माओं को भगवान बड़ी सरलता से मिल जाते है,  इसका अर्थ यह भी ले सकते है की ,भगवान अंतर्यामी रूप में सभी जीवात्माओ में विराजमान है |
  • “नमक्कु” यह शब्द, जीवात्म स्वरूप (स्व स्वरुप) को स्पष्ट रूप से सम्बोधित करता है|”ए” कार से यह शब्द (नमक्के) हुआ, देवी आण्डाळ् जीव को (स्वयं को) इंगित करते हुये कहती है,  जो  जीवात्मा स्वयं को, भगवान् को आत्म समर्पण करने के लिए तत्पर है अर्थात् जो अपना ” अकिंचनत्व ” (जिसके पास भगवान् को अर्पण करने के लिए स्वयं के आलावा कुछ नहीं), “अनन्य गतित्व” (उसका और कोई आश्रय नहीं) और  वह भगवान् का पूर्ण रूपसे शरणागत है |
  • “नारयणने तरुवान्” उपाय स्वरूप को स्पष्ट करता है – ” नारायणने तरुवान् “ का अर्थ है कि केवल नारायण ही मात्र जीवात्मा पर परम उपकार कर सकते हैं |
  •  “परै”  उपेय स्वरूप को दर्शाता है – परै का अर्थ है निस्वार्थ भाव से भगवत् कैङ्कर्य करना |
  • “विरोधी स्वरूपम्” अन्तर्निहित हमारे स्वतन्त्र्य भाव, जो हमें भगवान से विमुख कर ,भगवान् को हमारी सहायता करनेसे रोकता है|

हमारे संप्रदाय के अनेक पुर्वाचार्यों ने अपने व्याख्यानों में इस को और भी स्पष्ट रूपसे समझाया है |  

तिरुप्पावै व्याख्यान कर्ता (टीकाकार)


पेरियवाच्चान् पिळ्ळै- ३००० पडि


अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नयनार्-६००० पडि

आयि जनन्याचार्यर् – २०००पडि, ४००० पडि


पोन्नडिक्काल् जीयर्- स्वापदेशम्

भगवान के परमात्म स्वरूप को आण्डाळ् देवी द्वारा पुनः कई पदों में समझाया गया:

    • “पार्कडलुळ् पैय तुयिन्र परमन्” – परम पुरुष पुरुषोत्तम भगवान् श्रीमन्नारायण जो क्षीर सागर में शयन कर रहे हैं|
    • “ओंगि उलगळन्द उत्तमन्” -परम पुरुष पुरुषोत्तम, जिन्होंने अपने तीन पगों में तीनों लोकों को माप लिया|
    • “पर्पनाभन्” – जिनके नाभि से , कमल पर ब्रह्मा जी का आविर्भाव हुआ|
    • “तूय पेरुनीर् यमुनै तुरैवन्” – जो यमुना तट पर रहते है|
    • “गोविन्दन्” – धेनुओं (गायों) को पालने वाले, धेनुओं को आनन्द प्रदान करने वाले, धरती माता को सुख प्रदान करने वाले|

जीवात्म स्वरूपम् :

आण्डाळ् देवी अपने तिरुप्पावै के छठवें से पन्द्रहवें पासुरम् में और भी स्पष्ट रूप से जीवात्मा के स्वाभाव और गुण का वर्णन कर रही है. इन पासुरम् में देवी आण्डाळ्, यह उपदेश देती हुई प्रमाणित कर रही है कि, जीवात्मा को सदा श्रीवैष्णवों के सङ्ग का जिज्ञासु होते हुये उन्ही के सहयोग और मार्ग दर्शन में भगवत प्राप्ति,परमपद प्राप्ति की और अग्रसर होना चाहिये |

अपने १६ वे और १७ वे पाशुरम में पराम्बा माँ गोदाम्बाजी भगवान को पाने , अपने व्रत पालन के लिये , सखियों के स्वरुप में नित्य सुरियों का संग लेने स्वयं इन उपदेशों पालन करते हुये , इस उपदेश को सिद्ध करती है की जीवात्मा को , भगवान के अति प्रिय उनकी सेवा में लीन नित्य सुरियों की शरण ले उनकी महिमा को गौरवान्वित करते हुये गुणगान करना चाहिये |

अठारवें से बीसवें पासुरम् में माँ गोदाम्बाजी  पुरुष्कार रूपा (नप्पिन्नै नाचियार्- नीला देवी का अवतार और वृन्दावान में भगवान् कृष्ण के प्रिय महिषी) को गौरवान्वित करते हुये , प्रमाणित करती है की भगवद प्राप्ति पुरुष्कार स्वरूपा माँ की कृपा से ही प्राप्त की जा सकती है |  

विरोधी स्वरूपम् का वर्णन माँ गोदाम्बाजी तिरुप्पावै के दूसरे पासुरम् में “नेयुण्णोम् पालुण्णोम्” कहते हुये उद्घृत करती है, अर्थात् जब हम भगवान् की प्राप्ति को ही लक्ष्य बनाकर चलते है, तब उनके सिवा और कोई वस्तु हमारे लिये भोग्य नहीं समझेंगे | आण्डाळ् यह भी कहती है “चेय्याधन चेय्योम”, जिसका अर्थ है हम वह निषिद्ध कार्य नहीं करेंगे जो हमारे पूर्वाचार्यों ने नहीं किया |  

मुख्यतः  उपाय स्वरूप और उपेय स्वरूप को समझना हमारे लिये अत्यंत आवश्यक है |  
देवी आण्डाळ्  तिरुप्पावै के अट्ठाईसवें और उन्तीसवें पासुरम् में “गोपी और गोप भाव” लेकर इसकी बहुत ही सुन्दर व्यख्या करती है |   

आचार्य पेरिय वाच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी और आचार्य नायनार् स्वामीजी ने इन दोनों पासुरम् पर बहुत ही सुन्दर, अद्भुत व्याख्यान (टीका) लिखें है |  
आचार्य नायनार् स्वामीजी का विस्तृत व्याख्यान अनेक उत्कृष्ट विवरणों से भरा हुआ है | इन पासुरम् के आचार्य द्वारा तत्व निष्कर्ष कुछ इस तरह है |  

उपाय स्वरूप  – तिरुप्पावै का अट्ठाईसवां पासुरम् “करवैगळ् पिन्चेन्रु” (கறவைகள் பின்சென்று):

देवी आण्डाळ्, इस पासुरम् में प्रामाणित करती है, कि भगवान ही “सिद्ध साधन” हैं (स्थापित उपाय जिसे हमारे व्यक्तिगत प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं हैं) |

देवी आण्डाळ् आरम्भ में ही बताती हैं कि, उनका कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग में कोईअन्वय  (संबंध) नहीं है |  माँ गोदाम्बाजी इस पाशुर में भगवान की जीवो पर निर्हेतुक कृपा भी सिद्ध करती है|

    • देवी आण्डाळ् कहती है कर्मयोग हमारे लिए नहीं है क्योंकि कर्मयोग की आवश्यकताओं का पालन हम नहीं कर सकते, जैसे:
      • मनुष्य को महान पण्डितों / विद्वानों का अनुसरण करना चाहिये, परन्तु हम इनकी जगह गायों के पीछे जा रहे हैं |  
      • मनुष्य को दिव्यदेश के दर्शन करने जाना चाहिये, पर यहाँ हम वन में जा रहे है , वन में भी जाकर तपस्या करना कर्मयोग का अङ्ग है, पर हम वन में केवल धेनु चराने जाते हैं ,  धेनु चराना भी वर्ण-धर्म में मान लें , पर हम तो केवल उन धेनुओं को चराते हैं जो दूध देती हैं (दुधारू है) और अन्य पशुओं की उपेक्षा करते हैं |
      • भोजन में भी अनेक नियम हैं, पर हम किसी भी नियम का पालन नहीं करते |हम बिना स्नान किये भोजन करते हैं, हम किसी भी हाथ से भोजन कर लेते है ( बगैर धोये , उच्छिष्ट हाथों से भी,, हम चलते- फिरते भी भोजन कर लेते हैं |  
  • हम ज्ञानयोग नहीं जानते क्योंकि हम “अरिवोन्रुं इल्लाद आय्क्कुलम् ” (अनपढ/अज्ञानी ग्वाले) ग्वाल कुल के लोग हैं, अर्थात हम में सच्चा ज्ञान नहीं है |  
  • भक्ति ज्ञान-विशेष (ज्ञान की विकसित स्थिति) | चूंकि हमें ज्ञान ही नहीं, भक्तियोग करनेका प्रश्न ही नहीं उठता |
  • भगवान भागवतों पर निर्हेतुक कृपा कर , स्वयं के लालन पालन का अवसर प्रदान करते है , जैसे माता कौशल्या और माता यशोदा को प्रदान किया था | हम को यह सौभाग्य भी भगवान स्वयं प्रदान करते है, और यह जीवों का मौलिक धर्म है  (“कृष्णं धर्मं सनातनम्” – भगवान् कृष्ण शाश्वत धार्मिक सिद्धान्त हैं)  | यह स्व-प्रयास से नहीं हुआ है, भगवान स्वयं हम जीवो पर कृपा कर हमारे साथ रहने आते है  | अतः न तो हमारे बाह्य शत्रु हैं (कर्म/ज्ञान/भक्ति योग)  और न ही आन्तरिक शत्रु हैं (“स्वागत स्वीकारम्”- हम स्वयं भगवान् की ओर उपगमन कर, इस प्रयास को “उपाय” ) समझते रहना चाहिये |
  • जिस तरह हमारे पास कोई ज्ञान नहीं है,  वैसे ही भगवान “दोष” रहित है | भगवान मङ्गलमय गुणों से परिपूर्ण है | भगवान का यह मङ्गलमय गुण पूर्णतया उनके ग्वालों के साथ “गोविन्द” के स्वरुप में रहते  प्रकट होता हैं | जब नित्यसूरियोंके के साथ रहते है तब भगवान का “प्रभुत्व” पूर्णतया प्रकट होता है, और  गोप गोपियों के साथ रहते है तब भगवान का “सौलभ्य”  पूर्ण रूपेण प्रकट होता है|
  • भगवान न केवल मङ्गलमय गुणोंसे परिपूर्ण है, बल्कि सिद्ध-साधन भी है (स्थापित उपाय है, जीव को  विशेष प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती) | भगवान का हर जीवात्मा से सम्बन्ध है | भगवान अन्तर्यामि है , हर जीवात्मा के मूल है | भगवान द्वारा प्रसादित “तिरुमन्त्र”, परमात्मा और जीवात्मा के बीच नौ प्रकार के सम्बंधों को दर्शाता है | पिता-पुत्र, रक्षक-रक्ष्य, शेषी-शेष, भर्ता-भार्या, ज्ञेय-ज्ञाता, स्वामि-स्वम्, आधार-आधेय, आत्मा-शरीर और भोक्ता-भोग्य | अतः शरण में आये शरणागत की रक्षा करने का उत्तरदायित्व भी भगवान का है |
  • माँ गोदाम्बाजी कहती है , हे गोविन्द आप हम जीवो पर निर्हेतुक कृपा कर , अपने सरल सुलभ स्वभाव वश ,  आप हमारे अपने सखा बन हमारे मध्य , हमारे ही साथ रहने आते है, जिसका अहसास हम नहीं कर पाते , हम अज्ञानी अज्ञानतावश , प्रेमवश आपको सखा न मान , सर्वे सर्वा मान  “नारायण” नाम से सम्बोधन करते है , पर हे गोविन्द हमारी इस भूल को क्षमा करना | यहाँ हमारी गुरु परंपरा के आचार्य नायनार कहते है की, शरणागति में हमेशा क्षमा याचना करते रहना चाहिये, कारण की जीवात्मा गलतियों का पुतला है, और गलती और भूल इसका स्वाभाव है|
  • पराम्बा माँ गोदाम्बाजी बतला रही है , भगवान स्वयं परमपद प्राप्ति के परम उपाय है , जीव मात्र अकिञ्चन है, जिसको कोई और शरण नहीं है (अनन्यगतित्वं), भगवान से परम कैंकर्यं की प्रार्थना करते हुये कहती है की , वह भगवान को स्वयं की रक्षा करने से रोक नहीं  सकती | (“विलक्कामै”) |
  • इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् भगवान् का निरपेक्ष उपायत्व (अनपेक्षित हमारी रक्षा करना) को दर्शाती है | यह स्मरण रहे कि भगवान् को हमारी रक्षा करने के लिए, हममें आकिञ्चन्य भाव, अनन्य गतित्व और विलक्कामै होना आवश्यक है – ये उपाय के अंश नहीं हैं, बल्कि केवल अधिकारी विशेषण (मुमुक्षुके गुण) हैं | ये गुण ही अन्तर है एक जीवात्मा में जो भगवान् को शरणागति करना चाहता है और जो नहीं चाहता |

उपेय स्वरूपम् -उन्तीसवां पासुरम्- चिट्रम् चिरुक्काले

इस पासुरम् में आण्डाळ् समझाती हैं कि भगवत् कैङ्कर्य जो भगवान् को तुष्ट करता है वही अन्तिम ध्येय है |

  • बडे सवेरे हम सब आपकी शरण में आये हैं | नायनार् उषा काल की तुलना मुमुक्षु बनने की प्रारम्भिक अवस्थासे कर रहे हैं –  यह वह स्थिति हैं ,जब हम अज्ञानता से मुक्त हुये हैं , परन्तु भगवान् से प्रेम , लगाव , उनमें आसक्ति पूर्णतया विकसित नहीं हुयी है, प्रातःकाल की बेला में उठकर भगवान की शरणागति करना ज्ञानमय अवस्थाका प्रतीक है |
  • आप स्वामी है, हम पर आपका स्वामित्व है, आपको हमारी रक्षा के लिए आना था, पर हम आपसे मिलने आ गये| भगवान रामजी के वनवास के समय दंडकारण्य में, जब सारे ऋषि मुनि उन्हें मिलने उनके आश्रम पहुँच अपनी व्यथाएँ बतलायी  , तब भगवान श्री रामजी को बड़ा क्लेश हुआ की ,  जहाँ मुझे उनके पास जाकर उनके कुशलक्षेम पूछना चाहिये था , ऋषि मुनियों को कष्ट उठा कर स्वयं मेरे पास आना पड़ा | ऐसे जिससे भगवान को क्लेश हो, उसे स्वागत स्वीकाराम संज्ञा दी गयी, कारण की यह स्थिति अस्वाभाविक है|
  • इस में यह भाव भी बतलाया गया, भागवत आपके सम्मुख आकर दंडवत प्रणाम कर श्रद्धा से आपकी आराधना भी कर रहे है|  भगवान इतने स्वराध्य है की , वह भक्तों से प्रणाम की अपेक्षा भी नहीं रखते| भक्त को स्वयं की और आता देखकर ही आनन्दित हो जाते है| जैसे पिता बिना किसी अपेक्षा के पुत्र को देखते ही हर्षान्वित हो जाता है| जबकि देवतान्तर में अन्य देवता अपने उपासको से सदा उपासना  की कामना रखते है|
  • हमनें आपके स्वर्ण से भी बहुमूल्य पाद पद्मों का गुणगान कर रहे है, जो सभी वैदिकों को अति प्रिय है | हम आपकी और आपके चरणकमलों का महिमा मंडन किसी अपेक्षा से नहीं किये है – हमारा ध्येय केवल उनका गुणगान करना है, और आपके चरणों की शरणागति ही हमारा ध्येय है |
  • देवी आण्डाल कह रही है , हम आपको हमारा व्रत क्या है बतलाती है  | आपका वृन्दावन में अवतरित होना ही पर्याप्त नहीं है | आप अपनी मर्जी से हम गोप गोपियों के कुल में अवतरित हुये है|  आप हमारे मनो को निर्मल करते हुये अपने प्रति हमारा लगाव , आसक्ति बढ़ाई है| इसलिए अब आपको, हमारी इच्छाओं की पूर्ति करते हुये,  हम सभी को अपने यथोचित निज कैंकर्य में सम्मिलित करना होगा|
  • भगवान देवी आण्डाल को आश्वासन देते है की “व्रत का फल जरूर प्रदान करेंगे”, तब देवी आण्डाल कहती है की , हम ने व्रत, फल के लिये नहीं किया, व्रत आपकी सेवा – स्मरण में रत रहने के लिये किया है , हमें आपके निज कैंकर्य के सिवाय और कोई अभिलाषा नहीं है |
  • देवी आण्डाळ् कहती हैं कि भगवान् जहाँ कहीं भी हों- परमपद में या इस भौतिक चराचर जगत में – वह सदा उनके साथ ही रहना चाहती हैं | ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मणजी “इळैय पेरुमाळ् ” , भगवान् श्री रामजी का विरह सहन नहीं की स्थिति में, भगवान रामजी के साथ ही वन गमन को गये थे | उसी प्रकार देवी आण्डाळ् भी कहती है कि, भगवान् स्वामी हैं और वह स्वामी की संपत्ति है, इसलिये सदा भगवान कृष्ण के साथ ही रहना चाहती है | कहती है की , यह सम्बन्ध शाश्वत है, और चाहती है की, यह सम्बन्ध स्पष्ट रूपसे प्रकट हो |
  • अन्त में देवी आण्डाळ् स्थापित करती हैं कि, उनका परम ध्येय भगवान् की प्रसन्नता के लिये, भगवत कैंकर्य में रत रहना है | वह लक्ष्मणजी की तरह, सदा भगवान् का कैङ्कर्य करते रहना चाहती है,  न कि भरताळ्वान् (भरतजी) की तरह जो श्रीरामजी से कुछ समय के लिये दूर रहे थे |”मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” अर्थात् भगवान से प्रार्थना करती है की, हमारी सभी कामनाओं को मिटा दे, यहाँ देवी आण्डाल स्पष्ट करती हैं कि,  उन्हें स्वयं के आनन्द की कोई कामना नहीं  है,  साथ यह भी कहती है की  भगवान् को भीलगना चाहिये की, वहकोई कामना नहीं रखती है |इसी अवधारणा को तिरुवाय्मोळि में नम्मळ्वार् “एम्मा वीडु” (२.९) दशक “तनक्केयाग एनैकोळ्ळुमीदे” में स्पष्ट किये है अर्थात् भगवान् अपने ही आनन्द के लिए आळ्वार् संत को कैङ्कर्य में रखें |

इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् परम लक्ष्य को प्रकट कर स्थापित करती हैं | इसके अतिरिक्त “मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” विरोधी स्वरूप को स्पष्ट करता है – अपने स्वार्थ के लिये ,भगवान् के निजी आनन्द के बजाय, स्वयं के आनंद के लिये भगवान् का कैङ्कर्य करना |

इस प्रकार हम “अर्थ पञ्चकम्” को आण्डाळ् के तिरुप्पावै की दिव्य वाणि और अनेक आचार्यों के इस दिव्य प्रबन्ध के व्याख्यानों में दिये गये उत्कृष्ट व्याख्यान  उपदेश द्वारा समझ सकते हैं |

अडियेन विजयकुमार रामानुज दासन्
अडियेन श्याम्सुन्दर् रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/01/thiruppavai-artha-panchakam.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १२

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

 

१११) मुक्तात्मानुक्कु लीलाविभूति तदीयत्वाकारत्ताले उद्देश्यमाग निन्रतिरे

मुक्तात्मा के लिए, लीलाविभूति (यह भौतिक संसार) भोग्य वस्तु ही है क्योंकि यह भी भगवान् की ही सम्पत्ति है । यह हमने १०५ वें  सूत्र मे विस्तारपूर्वक देखा है ।

११२) उरङ्गिनानागिल् परक्क्षणत्तुक्कु उडलायिरुक्कुम् । उणर्तिरुन्तानागिलुम् अप्पडिये ।

 

जैसे कहा गया है — उरङ्गुवान् पोल् योगु शेय्द परुमाळ् अर्थात् वह परब्रह्म भगवान् जो शयन (योग-निद्रा) का छल कर निरन्तर सभी चिदाचित वस्तुओं का संरक्षण और श्रेय का चिन्ता कर रहे है। यथारूप वही भगवान् सबका संरक्षण जागृक अवस्था मे भी करते है ।

अनुवादक टीका: इस पासुर व्याख्यामे, श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी कहते है – भगवान् स्वनेत्र बन्द (योग-निद्राका छल कर) करते है ताकि वह विभिन्न योजनाओंसे जीवोंका संरक्षणेत्यादि कार्यों पर दीर्घ आलोचन कर सकें (जैसे हम सभी किसी कार्य के सन्दर्भ में स्वनेत्र बन्द कर दीर्घ आलोचन करते है)। आऴ्वार नित्य इंगित करते है कि सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने वाले एक मात्र भगवान् ही है। भगवान् के इस दिव्य गुण से प्रभावित आऴ्वार परम श्रद्धा से अपना निर्वाह कर रहें है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् छल (योग-निद्रा) अवस्था और जागृक अवस्था दोनों अवस्थाओं में सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने में तत्पर रहते है। यह प्रतिपाद्य विषय श्रीमद्रामायण की लीलाओं में दृग्गोचर है। भगवान् श्रीरामचन्द्र का शिविर समुद्रतट के किनारे पर था। हर रात्रिमे भगवान् के शिविर के चारों ओर तैनात वानर सेना टहलते है। भगवान् के शिविरके चारों ओर टहलते वानर सेना में प्रत्येक वानर बारी-बारी मे थक कर विश्राम करने चले जाते और अन्तोगत्वा शिविर की रक्षा करने मे कोई भी तैनात नही बचता। शिविर के अन्दर से यह दृश्य देखकर भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वयं शिविर के भीतर आकर विश्राम करते हुए वानर सेना के चारों ओर स्वयं चलकर उनका संरक्षण करते थे।  देखिए यह कितना सुन्दर दृश्य है। हमारे पूर्वाचार्य अतः बारम्बार कहते है की भगवान् ही जीवके परमकल्याण कारक और श्रेयोभिलाषी है क्योंकि जीवके जागृक-अवस्था और निद्रावस्था दोनों अवस्थाओं मे भगवान् जीवका संरक्षण करते है।

११३) चक्करवर्ति तिरुमगनुक्कु विल्लुकैवन्दिरुक्कुमापोलेयायिट्रु कृष्णनुक्कु कऴल् कैवन्दिरुक्किपडि

जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रको उनके शार्ङ्ग धनुष पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे धनुषका प्रयोग करते है, ठीक उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को भी उनकी मुरली पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे मुरली का प्रयोग सुन्दर मधुर वेणु-ध्वनि का है।

अनुवादक टीका: यथा श्रीमद्रामायण मे उल्लिखित है – भगवान् श्रीरामचन्द्र का शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी तिरुप्पल्लाण्डु दिव्य-प्रबंध के अन्तिम पासुर ‘शार्ङ्गमेन्नुम् विल्लाण्डान्मे यही दर्शाते है की वह जो स्व धनुष का पूर्ण नियंत्रण करता है अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्रका शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। इस पासुर टीका मे टीक कर (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामाजी) यह दर्शाते है की भगवान् का शार्ङ्ग धनुष सभी आयुधों का प्रतिनिधि है। इसका यह अर्थ हुआ की भगवान् सभी जीवों (नित्यसूरिगणों, मुक्तात्माओं, अन्य जीवात्माओं) के एक मात्र नियंत्रक है। यहां आण्डान् शब्द का केवल यह अर्थ नही की भगवान् यह दिव्यायुध को धरे है परन्तु भगवान् के परिपूर्ण नियंत्रण को भी दर्शाता है यथा एक राजा स्वप्रजा को परिपूर्ण नियंत्रण मे रखता है।

भगवान् श्रीरामचन्द्र

श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ३.६ ‘नावलम् पेरियतीविनिल् पदिग‘ मे श्रीकृष्ण भगवान् की वेणु माधुर्य कुशलता और वेणुधुण के आकर्षक प्रभाव का वर्णन अति सुन्दरता से करते है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामाजी, श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य शरीर के अंगों का वर्णन आकर्षक ढंग से करते है (जैसे उनके दिव्य करकमलों का सुन्दर स्थान/स्थिति, उनकी वेणु को स्पर्श करते हुए उनके अधर ताकि वेणु को बजा सकें, उनका एक तरफ़ा दिव्य अर्गभाग, वायु उच्छश्वसन और निश्वसन के कारण भगवान् के कोष्ठ का विस्तार और निपात होना)। श्रीकृष्ण भगवान् की दिव्य वेणुधुण के श्रवण से मन्त्रमुग्ध वृन्दावन की गोपिकाएँ, गाएँ और अन्य पशु, देवलोक के नृत्यक ऐसे खडे है जैसे उनके सभी के नेत्रों की गतिविधि प्रतिबन्धित है। इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् का उनकी वेणु पर नियंत्रण और प्रभुत्व है।

 

११४) गणत्तारुण्डायिरुक्कच् चेय्देयुम् भारमिल्लैये अहङ्कार स्पर्शमुडैयार् इल्लामैयाले


श्रीभगवान् के दिव्य धाम (परमपद) मे ऐसे अनेक दिव्यसूरिगण है जो परिपूर्ण ज्ञानी (सुविज्ञ) है परन्तु उनमे स्वल्प मात्रा मे अभिमान व गर्व नही है। अतः ऐसे दिव्यसूरिगण को भार नही माना जाता है।अनुवादक टीका: श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ४.४.६ पासुर मे कहते है की जो सुदर्शनचक्र से सुशोभित तिरुक्कोष्ठियूर के अर्चाविग्रह भगवान् का ध्यान नही करता और भगवान् को नही भजता,वह केवल भू-भार है। इसी प्रकारेण तिरुप्पावै के मंगलाचरण पासुर – ‘पातङ्गळ् तीर्क्कुम्’ मे पासुर रचनाकार कहते है – वह सभी जो तिरुप्पावै के (३०) तीस पासुरों के ज्ञाता नही है वह भूमि के द्वारा कदापि स्वीकृत नही है। इनकी तुलना मे परमपद के दिव्यसूरिगण पूर्णतया सिद्ध और सुविज्ञ है अतैव किसी के लिए भी भार नही माना जाता है।

११५) शेषिक्कुपायभावम् स्वरूपानुबन्धियान पिन्बु शेषत्वनुक्कुम् प्रावण्यम् स्वरूपानुबन्धियागक् कडवदु

जैसे भगवान् (शेषि) का मोक्षोपाय (जीवका संरक्षण कर जीवको मोक्ष प्रदान करना) होना स्वाभाविक है वैसे ही जीवात्मा (शेष) का भगवान् मे रति होना भी स्वाभाविक है।

आऴ्वारों को भगवान् मे अत्यन्त रति का दृश्य

अनुवादक टीका: मोक्ष का एक मात्र उपाय भगवान् ही है। जीवों का संरक्षण करना भगवान् का स्वाभाविक गुण है। अतः इस प्रकारेण जीवात्मा का भगवद्-कैङ्कर्य (स्वस्वामी का कैङ्कर्य) करना स्वाभाविक है। भगवान् के प्रति इस स्वाभाविक-कैङ्कर्य को अत्यन्त प्रेम, भक्तिभाव, और रतियुक्त से करना चाहिए। इस विषयको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्रके ८०वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में बहुखूबी से समझाते है।

सर्वप्रथम, भगवद्-कैङ्कर्य विषय मे, इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी), पेरिय-उडयार् (जटायु), पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामीजी और चिन्तयन्ती को प्रेरणास्तोत्र मानकर श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उनका वर्णन ८०वें सूत्र मे करते है।

श्रीमद्रामायण से अभिज्ञात है की इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) सदैव श्रीरामचन्द्रजी के साथ ही रहते थे। श्रीरामचन्द्र की सन्निकटता मे इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) ने उनकी सेवा विभिन्न प्रकार और अवस्थाओं मे की है। पेरिय-उडयार् (जटायु) और पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी के विषयमे कहते है की इन दोनों ने स्वदेहकी चिन्ता छोड़कर भगवान् के लिये शरीर को त्याग दिया। चिन्तयन्ती नामक गोपी ने भगवद्-विप्रलम्ब भावमे शरीर को त्याग दिया।

८० वें सूत्रकी व्याख्या मे, पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्यचरित्र का वर्णन विस्तार पूर्वक है। पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्य जन्म श्रीरङ्गम के कुछ कोस दूर तोट्टियम् तिरुनारायणपुरम नामक दिव्य क्षेत्र मे हुअा था। एक बार कुछ भगवद्-विरोधि भगवद्विग्रह को आग लगाने की कुचेष्टा करते है। यह जानकर पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी तुरन्त जलते भगवद्विग्रह को आलिंगन कर और इसके पारिणाम स्वरूप शरीर को त्याग देते है। यहां एक प्रश्न उठता है – क्या भगवान् के लिये शरीर को त्यागना क्या उपाय है ? – श्रेष्ठ एवं सिद्ध भगवान् ही उपायोपाय तत्त्वमे परम निष्ठ पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का इस प्रकार के कार्य मे संलग्नता कितना उचित है।

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी ८० वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में इस तत्त्व का वर्णन करते है जिसकी अभूत पूर्व व्याख्या श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने हम भगवद्-बन्धुओं के लिये प्रेषित किया है यथा :

  • सूत्र ८६ – भगवद्-प्रेम से येन-केन प्रकारेण किया गया कार्य कदाचित भी उपाय नही माना जाता है। इस प्रकार का व्यक्तिकरण भगवद्प्रपन्नों मे भगवद्-प्रेम का ही परम स्वरूप है।
  • सूत्र ८७ – उपाय भावना से किए गए कार्य त्याज्य है और कैङ्कर्य भावना से किए गए कार्य सर्वदा स्वीकृत है।
  • सूत्र ८८ – भौतिक वस्तुओं मे रुचि रखने वाले भौतिकवादि, उन भौतिक वस्तुओं को पाने के लिये जिस प्रकार स्वप्राण त्यागने के लिये सदैव तत्पर रहते है ठीक उसी प्रकार भगवद्-प्रेम से ओत-प्रोत भगवद्प्रपन्नों के विभिन्न कार्य भगवद्-प्रेम के कारण स्वाभाविक है।
  • सूत्र ८९ – ऐसे भगवान् से अत्यन्त आसक्त एवं अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्नजनों का अनुष्ठान (शास्रविधि) और अननुष्ठान (अशास्रविधि) उपाय (अन्य मार्ग के माध्यम और स्वप्रयासों से भगवान् को प्राप्त करना) के भाग नही होते है।
  • सूत्र ९० – ऐसे कार्य जैसे भगवान् के प्राकट्य अप्राकट्य मे विलम्ब होने से उत्पन्न मनोवेदना को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना ,भगवान् को संदेशवाहकों के द्वारा संदेश भेजना इत्यादि आऴ्वारोंमे द्रष्टव्य है परन्तु यह केवल भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम और भक्ति का ही व्यक्तिकरण है।
  • सूत्र ९१ – ऐसे कार्य जो विशेष और महान व्यक्तित्वों मे द्रष्टव्य है, वह सदा स्मरणीय और कीर्तनीय है क्योंकि आप सभी सर्वज्ञ है तथापि भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम से संभ्रांत है।
  • सूत्र ९२ – ऐसे कार्य भगवदनुभव और कैङ्कर्य के अङ्ग है। भगवान् स्वयंकी सम्पूर्ण हर्षता के लिये नियुक्त अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्न जनों को दिव्यानुग्रह से आऴ्वारों मे परिवर्तन करने का स्वप्रयत्न का प्रतिफल ऐसे कार्य होते है।

११६) प्राप्त विषयप्रावण्यम् स्वरूपमागैयाले अवध्यकरमन्रु । सीआज्ञमामित्तनै ।

चूंकि भगवान् के प्रति रति (जो जीव के स्वाभाविक रति विषय वस्तु है) जीव के लिये स्वाभाविक है और तुच्छ नही है।  वास्तव मे यह सराहनीय है।

अनुवादक टीका: भगवान् के प्रति रति और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने की लालसा जीव के लिये स्वाभाविक है। इस तत्त्वको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे सुन्दर ढंग से समझाया है और इन सूत्रों पर श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने अभूतपूर्व व्याख्या लिखा है यथा :

  • सूत्र ५२ – शेषत्वम् दु:खरूपमागवन्रो नात्तिल् काण्गिरदु एन्निल् – ऐसा माना जाता है की इस भौतिक जगत् मे किसी व्यक्ति की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है। श्रीवरवरमुनि स्वामाजी मनुस्मृति के श्लोक ‘सर्वम् परस्वं दु:खम्‘ – (अर्थात् किसी की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है) और ‘सेवा श्व वृत्ति‘ (अर्थात् सेवा श्वान की वृत्ति है अत: त्याज्य है) का उदाहरण से समझाते है की शेषत्व दु:ख पूरित है ।
  •  सूत्र ५३ – अन्द नियमम् इल्लै; उगन्द विषयत्तुक्कु शेषमायिरुक्कुम् इरुप्पु सुखमागक्काणगैयाले – सेवा वृत्ति दु:ख पूरित है यह असत्य है। आत्मीय जनों का भृत्य बनना सदैव सुखदायक और आनन्दप्रद है।
  •  सूत्र ५४ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। प्रणव मे अ-कार वाच्य शब्द भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के निधित्व का प्रतीक है। हमारा (जीवों) का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है और उनकी सेवा करने का फल सदैव आनन्दप्रद और सुखदायक है।
  •  सूत्र ५५ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। यह पूर्ववर्ति सूत्र मे संशय प्रश्न का उत्तर है।  अगर जीवों का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है तो क्या यह स्वाभाविक है या अस्वाभाविक है। क्या यहां यह कहना उचित होगा की भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के अभाव मे जीव स्वशेषत्व त्याग देगा ? इसका उत्तर यह है -भगवान् का शेष होना जीव का वास्तविक और स्वाभाविक रूप है जैसा शास्त्रों मे निर्देषित है।
  •  सूत्र ५६ –  शेषत्वम् इल्लादपोदु स्वरूपमिल्लै – जब शेषत्व नही है तो जीवात्मा स्वस्स्वरुप को त्याग देता है।

११७) जीवपरङ्गळ् इरुवरुक्कुम् अपहतपाप्मत्वादिगळ् उण्डायिरुक्कच्चेय्तेयुम् जीवात्मावुक्कु हेयमुण्डाय् भगवदनुग्रहत्ताले कऴियुम् परमात्मा हेय सम्सारग्गनर्हनाये इरुक्कुम्

भगवान् स्वत: विशुद्ध और निष्कलंक है

अपहतपाप्मा गुण से शुरूवात होकर जीवात्मा और परमात्मा दोनों मे आठ गुण समान है। यह गुण जीवात्मा मे तभी प्रकट होते है जब जीवात्मा देह को त्यागकर भगवान् की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। इसे स्वरूपाविर्भाव कहते है। भगवान् का कोई भौतिक शरीर नही है जो उनके कल्याण गुणों को गुप्त रखता है अर्थात् भगवान् का स्वरूप विशुद्ध और पारलौलिक है। आठ समान गुण है –

  • अपहतपाप्मत्वम् –  अपराधों और दोषों से असम्बन्धित या मुक्ति
  • विरजत्वम् –  वृद्धावस्था से मुक्ति
  • विमृत्यत्वम् – मृत्यु से मुक्ति
  • विशोकत्वम् – शोक से मुक्ति
  • विजिगत्सत्तवम् – क्षुधा से मुक्ति
  • अपिबासत्वम् – पिपासा से मुक्ति
  • सत्यकामत्वम् – दिव्य गुण जो रसास्वादनीय है
  • सत्यसङ्कल्पत्वम् –  स्वसङ्कल्पों को पूरा करने की क्षमता

अनुवादक टीका : जीवात्मा स्वाभाविक रूपसे विशु्द्ध और सत्त्वगुणों से सम्पन्न है। भौतिक जगत् मे कर्मसे बन्धित जीवोंका ज्ञान और आनन्द प्रतिबन्धित होता है। भगवान् की कृपासे उन जीवोंका उद्धार होता है अर्थात् कर्म के बन्धन से मुक्त होता है तो मुक्तात्मा कहलाते है और अन्ततोगत्वा परमपद को पहुँचते है। उस समय, मुक्तात्मा सम्पूर्ण ज्ञान, आनन्द और भगवान् की कृपासे प्राप्त आठ सत्त्व गुणों को भली-भाँती समझता है।

भगवान् कदापि कर्म से बन्धित नही होता है। वास्तविकता मे, जीवोद्धार हेतु भगवान् इस भौतिक जगत् मे निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है। अत एव ऋगवेद कहता है – ‘ स उ श्रेयान् भवति जायमान: ‘ – अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् के प्राकट्य से भगवान् स्वयं  प्रशंनीय हो जाते है। जब भगवान् परमपद से भौतिक जगत् मे प्रगट होते है तो वह अपने सत्त्वगुणों को यथारूप और दिव्य पारलौलिक शरीर सहित पधारते है। उनका शरीर जीवात्माओं के शरीर से भिन्न है। इस विषय को अति उत्तम से श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ – ‘ अदियम् शोदि उरुवै अङ्गु वैत्तु इङ्गुप् पिरन्दु ‘ पासुर मे समझाते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस पासुर मे यह कहते है की परमपदमे भगवान् (जो नित्य है) का जो दिव्य मंगल आकर्षक स्वरूप द्रष्टव्य है वही स्वरूप इस भौतिक जगत् मे प्रगट होता है।

११८) नीर्मैक्केल्लैयान तिरुमलै अाश्रयणीयस्थलम् ; मेन्मैक्केल्लैयान परमपदमनुभवस्थानम्

नीर्मै – सरलता, सौलभ्यता – अर्थात् सरलता से कोई भी भगवान् की सन्निकटता (का सान्निध्य) प्राप्त कर सकते है। ऐसी सरलता केवल तिरुमला (श्रीनिवास भगवान्) मे दृश्यमान है। परत्व की पराकाष्ठा परमपद मे दृश्यमान है जहां जीव भगवान् के गुणों का नित्य रसास्वादन करता है।

अनुवादक टीका : श्रीनिवास भगवान् सरलता और सौलभ्यता के प्रतीक है। तिरुमऴिशै आऴ्वार नान्मुगन् तिरुवन्दादि ४५ पासुर मे कहते है की श्रीनिवास भगवान् नित्य सूरियों और संसारियों के लिये समान है। उत्तरवर्ति पासुर मे तिरुमऴिशै आऴ्वार कहते है की तिरुमला मे जन्तु (जानवर) भी श्रीनिवास भगवान् की सौलभ्यता का लाभ उठाते है। कुलशेखराऴ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि ४.५ – अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडन्तियन्गुम्  पासुर मे कहते है सभी प्रकार के जीव तिरुमला मे रहकर तिरुमला के अधिपति श्रीनिवास भगवान् की सेवा और वन्दना करते है। पूर्वाचार्य आगे कहते है यह जीव त्रिश्रेणी के होते है – १) अनन्य प्रयोजनपरर जीव – अन्याभिलाषा रहित अनन्य भक्त जिन्हें अडियार् कहते है। २) प्रयोजनान्तरपरर जीव व वानवर् — वह सारे देव जो साम्सारिक सुखों की अभिलाषा रखते है। ३) अन्यशेषपरर व अरम्बै – रम्भा, ऊर्वशी इत्यादि जो अन्य देवों की सेवा करते है।

परमपद आनन्दप्रद और हर्षमय है। वहां आनन्द की कोई सीमा नही होती है। वहां भगवान् ही पूर्ण केन्द्रबिन्दु है और भगवान् का परत्त्व पूर्णतया दृष्टिगोचर है।

119) स्वरूपानुरूपमान प्राप्यानुसन्धानम् पण्णिनाल् पोय्प्पुक्कल्लन्दु निर्क वोण्णादु

जीवात्मा भगवान् के प्रति स्वदासत्व तत्त्व को समझकर तथा (स्वस्वरूपानुरूप ज्ञान के फलसे प्राप्त) स्वस्वरूपानुरूप कैङ्कर्य की अभिलाषा, का नित्यानुसन्धान करते रहने से, वह (जीवात्मा) अवश्य भगवद्धाम को पहुँचता है।

अनुवादक टीका : श्रीशठकोप स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ३.३ पासुर ‘ओऴिविल् कालम्’ मे कैङ्कर्य प्राप्तिकी अत्यन्त इच्छा को व्यक्त करते है। भगवान् की निर्हेतुक कृपासे जीवके वास्तविक स्वरूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है इस सिद्धतत्त्वको समझकर श्रीशठकोप स्वामीजी स्वरुपानुरूप कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना ३.३ पासुर मे करते है। इस पासुर मे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की दोषरहित वह भगवान् की सेवा हर अवस्था, हर समय, हर रूप और भगवान् की सन्निकटता मे सेवा करते है। हमारे पूर्वाचार्य कहते है हम प्रपन्नजनों को सदैव कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना भगवान् से करते रहना चाहिए जो भगवान् को आनन्ददायक है।द्वयमहामन्त्र जाप का प्रतिफल और ध्येय (लक्ष्य) यही तो है। द्वयमहामन्त्र के दो खण्ड (भाग) है – प्रथम भाग मे हम पहले श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से भगवान् के दिव्य चरणों को उपाय मानते है। दूसरे भाग मे अन्याभिलाषा रहित केवल दिव्य दम्पति के परमसुख के लिये दिव्य दम्पति के प्रति हम विशुद्ध सेवा की प्रार्थना करते है। एरुम्बियप्पा स्वामीजी, पूर्वदिनचर्या स्तोत्र मे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या का सुन्दर वर्णन लिपिबद्ध किये है। इस स्तोत्र मे, एरुम्बियप्पा स्वामीजी कहते है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अधर सदा द्वयमहामन्त्रका जाप करते है और उनका मन सदा द्वयमहामन्त्र के अर्थांका (अर्थात् तिरुवाय्मोऴि का) अनुसन्धान करता है। इस प्रकिया से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को दिव्यानुभूति होती है और उनके दिव्य शरीर मे अनेकानेक रूपान्तरण जैसे रौंगटे खडे होना इत्यादि द्रष्टव्य है।


१२०) नम् मुदलिगळ् गुरुपरम्परै मुन्नाग द्वयानुसन्धानम् पण्णुगिरदु

गुरु परम्परा

द्वयमहामन्त्र (मन्त्ररत्न – मन्त्रों मे रत्न मन्त्र) का विषय – श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् – जीवों का एकमात्र शरण

 

अनुवादक टीका : हम सभी इस विषय से परिचित है की हमारे पूर्वाचार्य सदा द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करते थे। इससे यह बात और भी सुस्पष्ट होती है की द्वयमहामन्त्र का उच्चारण व जाप स्वतंत्र भाव से कदापि नही किया जा सकता है अर्थात् गुरुपरम्परा का अनुसन्धान किये बिना द्वयमहामन्त्र का उच्चारण करना वर्जित है। जीव कदापि द्वयमहामन्त्र के विषय अर्थात् श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्वतंत्र भाव से उनकी शरण नही लेता परन्तु केवल गुरुपरम्परा के माध्यम से ही उभय का शरण लेता है। अत एव हमारे पूर्वाचार्य सदैव द्वयमहामन्त्र जाप के पहले सर्वप्रथम गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करते थे।

अस्मद्गुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य )  
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य के आचार्य – परमाचार्य )
अस्मद् सर्व गुरुभ्यो नम:  (सभी पूर्वाचार्य और वर्तमानाचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुश दासाय नम: (श्रीपेरियनम्बि – श्रीपराङ्कुशदास स्वामीजी)
श्रीमद्यामुनमुनये नम: (आळवन्दार – श्रीयामुनमुनि स्वामीजी)
श्री राम मिश्राय नम: (मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (उय्यकोण्डार् – श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन् नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनिगळ् – श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (नम्माऴ्वार – श्रीशठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वकसेनाय नम: (सेनै मुदलियार् – श्रीविष्वकसेन)
श्रियै नम: (पेरिय पिराट्टि – श्रीमहालक्ष्मी)
श्रीधराय नम: (पेरिय पेरुमाळ् – श्रीरङ्गनाथ भगवान्)

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उपरोक्त विषय का विवेचन श्रीवचनभूषण २७४ सूत्र मे अती सुन्दर ढंग से करते है। वह कहते है – जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – प्रत्येक प्रपन्न को नित्य गुरुपरम्परा सहित द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिए।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-12.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३७)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – २

 श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीपेरुमबदुर – वह जिन्होंने हमारे सिद्धान्त का प्रचार सही रीति से किया

हम पिछले विषय को जारी रखेंगे। अधिकत्तर विषय में ज्ञान कि आवश्यकता है जो शास्त्र के सही अध्ययन से प्राप्त कर सकते हैं। सम्पूर्ण और गहरी समझ के लिये इन सिद्धान्तों को आचार्य और विद्वानों के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।

  • सामानाधिकरण्यम (जो एक विषेय/वस्तु को अनेकों विशेषणों/सहजगुणों से समझाता है) के अनुसार विशेषणों की उपेक्षा करना और सिर्फ अंतर्निहित तत्त्वों को मानना बाधा है। शुक्ल पत अर्थात सफेदवस्त्र। यहाँ पदार्थ अर्थात वस्त्र है। सफेदी जिसे वस्त्र से अलग नहीं किया जा सके ऐसी एक विशेषता है। ऐसी अभिन्न विशेषताओं को विशेषणम् कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सामानाधिकरण्यम को “बिन्न प्रवृत्ति निमित्तानाम शब्दानाम एकस्मिं अर्थे वृत्ति:” ऐसे परिभाषित किया जाता है – ऐसे वस्तु कि पहचान करना जिसके अनेक शब्द हो (विशेषता/अर्थ)। उदाहरण के लिये सफेद वस्त्र के विषय में सफेदी और वस्त्र दोनों वस्त्र की विशेषता है। इसलिये किसी एक पदार्थ को अनेक पहलूओं की ओर अंकित करना ही सामानाधिकरण्यम है। यह समझने के लिये एक मुख्य तत्त्व है। यह हमारे विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के लिये एक मुख्य तत्त्व है। ब्रह्म एक विशेष्य (पदार्थ) है और वही आधार (सहारा/नीव) है। चित्त और अचित्त यह विशेषण है और अधेय हैं। पदार्थ और विशेषताएं दोनों अभिन्न हैं। यहाँ कुछ सिद्धान्त चित्त और अचित्त को र्निलक्ष्य करते हैं और केवल ब्रह्म पर हीं केन्द्रीत होते हैं। पर यह सही नहीं है। श्रीरामानुज स्वामीजी वेदार्थ संग्रह में इन सिद्धान्तों को बड़ी सुन्दरता से विस्तार से व्याख्या किये है। इसे पूर्ण समझने के लिये आचार्य के कालक्षेप के जरिये सुनना चाहिये।
  • यह न समझना कि एक मात्र ब्रह्म हीं (विशेषताओं के साथ) सिर्फ ब्रह्मा के अनूठे लक्षणों को दर्शाता हैं (ब्रह्म का अर्थ – आत्मा और पदार्थ अमान्य/अवास्तविक नहीं बनाना) यह बाधा है। एक विशेषण विशिष्ट ऐक्यार्त्ता परम – एक पदार्थ जिसकी विशेषताओं से वह जुड़ा हो। श्रृति कहती है “स  ब्रह्मा, शशिव: सेंध्र:”। सा का अर्थ – “वह” – “जो एक श्रेष्ठ पुरुष है”। वह ब्रह्मा है, वह शिव है, वह इन्द्र है। यहाँ इसका अर्थ ब्रह्म, शिव, इन्द्र शरीर विशेषण है और श्रीमन्नारायण शरीर विशेष्य है। अनुवादक टिप्पणी: वेदों में तीन भाग पहचाने गये हैं – भेद श्रृति (वह जो भिन्न तत्त्वों के विषय में बताते हैं), अभेद श्रृति (वह जो एक मात्र ब्रह्म के बारे में बताते हैं) और घटक श्रृति (वह जो ब्रह्म और चित्त/अचित्त आदि विशेषताओं के सम्बन्ध विषय में बताते हैं)। अन्य सिद्धान्त भेद या अभेद श्रृति में केन्द्रित होते है और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त भेद और अभेद श्रृति को घटक श्रृति के साथ मिलाकर इनमें समंजस स्थापित करते है। जहाँ एक मात्र ब्रह्म के लिये ज़ोर दिया जाता है उसे घटक श्रृति के सन्दर्भ में समझना चाहिये जो शरीर/शरीरी के सम्बन्ध के बारे में और विशेषण/विशेष्य के सम्बन्ध चित्त/अचित्त व ब्रह्म के बारे में ज़ोर देकर बताते हैं। इन दोनों विषयों में मुख्यत: मायावाद (वह सिद्धान्त जो सिर्फ ब्रह्म को स्वीकार करता हैं और अन्य सभी को मायावी मानते हैं) को अस्वीकार करते हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी इसे श्रीसहस्रगीति के – “कूडिट्रागिल् नल्लूरैप्पू” पाशुर में समझाते हैं। सभी व्याख्यानों में इसी तरह के सिद्धान्तों को समझाया गया है। जीवात्मा ब्रह्म के समान हैं ऐसा कोई राह नहीं हैं। क्योंकि एक वस्तु दूसरे के लिये नहीं होता है – जीवात्मा जीवात्मा ही रहेगा और परमात्मा परमात्मा ही रहेगा।
  • यह न जानना कि विविधता जो यह स्थापित करें कि भगवान से स्वतन्त्र कुछ नहीं है को नकारना बाधा है। नानात्व विषेधम – विविधाओं को नामंज़ूर करना। “एकमेव अधविधियम, नेहनानास्ति किञ्चन:” श्रृति में मौजूद है। केवल एक तत्त्व है – दूसरा कोई नहीं है। यहाँ विविधता को नकारा गया है। परन्तु यह नकारना केवल उन तत्त्वों के लिये हैं जो ब्रह्म से स्वतन्त्र है। क्योंकि ब्रह्म हीं सबका अन्तरात्मा है और सबकुछ ब्रह्म में व्याप्त है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो ब्रह्म में व्याप्त न हो।
  • यह न जानना कि सम्हार के समय चित्त और अचित्त को नकारना उनकी सूक्ष्म उपस्थिती को दर्शाता है बाधा है। ब्रह्माण्ड से संबन्धित सामान्य कार्यों में विनाश एक तीसरा पहलू है। सृष्टि (निर्माण करना), स्थिति (भरण पोषण) और संहार (विनाश) ये तीन पहलू हैं। संहार के समय चित्त और अचित्त दोनों पूर्ण नष्ट नहीं होते हैं। वे शाश्वत तत्त्व हैं। वे अपनी विशाल अवस्था से सूक्ष्म रूप में परिवर्तित होते हैं और ब्रह्म उन्हें पा लेते हैं। सृष्टि के समय भगवान पुन: उन्हें अपना विशाल रूप प्रदान करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस तत्त्व को श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ६९वें पाशुर में अच्छी तरह समझाते है। “चिन्तैयिनोडु करणंगल् यावुम् शिदैन्दु मुन्नाल अन्दमुत्तालन्ददु कण्डु” – प्रलयकाल से पहले जब मन, दूसरी इंद्रियाँ और शरीर स्थूल रूप छोड़कर उपसंहृत हुए थे और आत्मा अचेतन सा रह गया। उस स्थिति में चित्त जो प्राकृतिक रूप से सूक्ष्म है और अचित्त जिसने सूक्ष्म रूप धारण किया है वह अविभेध्य हो जाते हैं। फिर भी उनका अस्तित्व है। तीनों तत्त्व – चित्त, अचित्त और ईश्वर यह सभी बाहरी हैं। चित्त को स्वभाव विकारम है (लक्षण को बदलने का ज्ञान जैसे फैलना और सिकुड़ना अवस्था)। अचित्त में स्वरूप विकारम है (स्वयं के स्वभाव को बदलना जैसे विशाल से सूक्ष्म और विशालता में भिन्न भिन्न स्वरूप, आदि)। ईश्वर जो सभी विकारों के रहित है।
  • यह न समझना कि शोधक वाक्य में नकारने के गुण अशुभ गुणों को नकारने की ओर पृवत करते हैं – बाधा है। कुछ वाक्य हैं जो ब्रह्म को निर्गुण बताते हैं। इनका अर्थ है ब्रह्म अशुद्ध गुणों के रहित है। क्योंकि ब्रह्म प्रारम्भ से ही प्रमाणित है कि “अखिल हेय प्रतिपत कल्याण गुणेक तान” – वह सभी अभद्र गुणो के रहित हैं और अच्छे गुणों का भण्डार हैं। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्म का दो प्रकार से वर्णन किया गया है – कारण वाक्य (वह वाक्य जो ब्रह्म हीं सभी कार्यों के कारण है चर्चा करता हैं) और शोधक वाक्य (वह वाक्य जो ब्रह्म के सभी विशेष गुणों कि चर्चा करता हैं)। “यतो वा इमाणी भूतानि जयते, येन जाथाणी जीवन्ति, यत्प्रयन्ति अभीसमविचन्ति, तत विजीजन्यासस्व, तत ब्रह्मेति” कारण वाक्य का एक उदाहरण है। यह समझाता है कि – वह जहाँ से इस ब्रह्माण्ड और जीवों का उत्पन्न हुआ, जिसके द्वारा पूरे ब्रह्माण्ड का निर्वाहण होता है, विनाश के समय जिसमें वह मिल जाता है, जिसे प्राणी मोक्ष के समय प्राप्त करता है, उसे समझे और ब्रह्म को समझाये। अत: जगत कारणत्व (ब्रह्माण्ड का कारण होना), मुमुक्षु उपास्यत्व (मोक्ष पाने के इच्छुक के लिये पूजा करने का बहाना) और मोक्ष प्रदत्व (जीवात्मा को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम) यह श्रेष्ठ होने के मुख्य गुण पहचाने गये हैं। “सत्यम ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म” यह शोधक वाक्य का उदाहरण हैं। यह ब्रह्म नित्य, सर्वज्ञ और अनन्त (समय, स्थान और पदार्थ से) हैं को समझाता है। अत: शोधक वाक्य को अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • जो वाक्य भगवान के पवित्र गुणों को दर्शाते हैं उन्हें अनदेखा करना बाधा है। जैसे समझाया गया है “य:  सत्यकाम: सत्य संकल्प:” – वह पवित्र गुणोंवाला है। उन्हें अनदेखा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति का प्रारम्भ “उयरवरु उयर नलं उदैयवन यवन” से करते है – वह जो पूरी तरह पवित्र गुणोंवाला है। श्रीकुरेश स्वामीजी अपने शिष्य पिल्लै आल्वान को समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी पवित्र गुणों की घोषणा से प्रारम्भ करते हैं और इससे वे कुदृष्टि की जीवन रेखा पर सीधे प्रहार करते हैं (कुदृष्टि – जो वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं) जो निरन्तर कहते हैं कि ब्रह्म गुणों के रहित है।
  • यह न समझना कि ब्रह्म के रूप के लिये असहमती बताना जो यह दर्शाता है कि ब्रह्म अपने पूर्व कर्मों से कोई रूप धारण नहीं करता (बजाय इसके कि ब्रह्म अपनी इच्छा से रूप धारण करता है) – यह बाधा है। “नाथे रूपम नचाकार:” – उनका कोई रूप, कद, आदि नहीं है, जो सांसारिक शरीर पर केन्द्रित है जो उसके कर्मों द्वारा प्राप्त होता है। हमें यह समझना चाहिये कि भगवान अपने इच्छा से विभिन्न रंग बिरंगे रूप को धारण करते हैं।
  • भगवान के रूप के वाख्याओं को अनदेखा करना बाधा है। हमें यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि परमपुरुष का रूप सबसे अधिक सुन्दर हैं। चांदोज्ञ उपनिषद में एक प्रसिद्ध पद है “अंतराधीत्ये हिरणमय: पुरुषोदृश्यते – तस्ययता कप्यासम पुण्डरीकमेवमाक्षिणी” – सूर्य गृह के मध्य में एक व्यक्ति जो तेजस्वी सूर्य के समान चमकता है नजर आता हैं। उसके दोनों नेत्र कमल पुष्प को संभोधित करते हैं जो सूर्य की तरह यौवन हैं। ऐसे विषयों को न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: ऋग वेद में घोषणा किया गया हैं कि “स यु श्रेयां भवति जायमान:” – भगवान जब इस संसार में अवतार लेते है तब वें अधिक सराहनीय हो जाते हैं। भगवद्गीता के ४थे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतार का रहस्य (अपने अवतार की गोपनियता को विस्तृत रूप से बताना) के विषय में बताते हैं। ५वें श्लोक में वें अर्जुन को समझाते हैं कि “मैं और तुम हम दोनों कई बार जन्म ले चुके हैं। हालाँकि तुम्हें अपने पूर्व जन्मों की कोई जानकारी नहीं है लेकिन मैं तो अपने पूर्व जन्मों के विषय में पूर्ण जानता हूँ”। अगले श्लोक में वें कहते है “हालाँकि मैं अजात हूँ, परिवर्तन/विनाश के लिये मैं उत्तरदायी नहीं हूँ और सबका स्वामी हूँ, अपने संकल्प से बारम्बार जन्म लेता हूँ”। अगले श्लोक में वें कहते हैं कि “जब भी धर्म का नाश होता है और अधर्म बढ़ता हैं तब उस समय मैं स्वयं अवतार लेता हूँ”। अगले श्लोक में वें घोषणा करते हैं कि “समय समय पर मैं अपने विभिन्न रूपों में लोगों की रक्षा के लिये, पाखंडियों के सर्वनाश के लिये और धर्म की स्थापना के लिये अवतार लेता हूँ”। अंत में ९वें श्लोक में अर्जुन से कहते है “जो मेरे दिव्य जन्मों का ध्यान करते हैं और मेरे दिव्य कार्यों को सही रूप में समझते हैं वे इस संसार से इस जन्म के अन्त में मुक्त होकर मुझे प्राप्त करते हैं”। इससे हम समझ सकते हैं कि ब्रह्म के कई दिव्य रूप हैं जो किसी कर्म के द्वारा बंधा हुआ नहीं है।
  • यह न जानना कि ब्रह्म जिन्हें उभय लिंग विशिष्टान (वह जिसके दो अपूर्व पहचान हो), विलक्षण विग्रह विशिष्टान (वह जिसका अपूर्व रूप हैं), श्रिय:पति (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी), अकार वाच्यन (वह जो “अ” से जाने जाते हैं) वह सर्वश्रेष्ठ भगवान है (सभी के उपर) ऐसे पहचाना जाता हैं वह बाधा है। अकार वाच्यन – प्रणवम (ॐ) सभी वेदों का सार है। वह “अ”, “उ” और “म” कार का मिश्रण है। इस अकार में “अ” भगवान श्रीमन्नारायण को सम्भोधित करता है जो सर्वश्रेष्ठ है। सर्वस्माथपरन – वह न कोई इनसे उपर यह उच्च है। उभय लिंग विशिष्टान – वह जिसके २ विशिष्ट पहचान है अकिल हेय प्राथ्यनिकन (वह जो सभी अपवित्र गुणों के विरुद्ध है) और कल्याण गुण पूर्णन (वह जो पवित्र गुणों से भरा हुआ है)। वह सबसे अधिक पवित्र है और सभी को पवित्र करने कि उसमे योग्यता हैं। उसमें दोनों परत्वम् और सौलभ्यम् गुण हैं। अकारम कारणत्वम् (सबका कारण होना) और रक्षकत्वम् (सभी का रक्षक) को अधिक महत्व देता है।
  • यह न जानना कि भगवान श्रीमन्नारायण जगतकारणन हैं (सबके कारण) बाधा है। चांदोज्ञ उपनिषद में समझाया गया हैं कि “सदैव सौम्य! इधमग्र आसीत, एकमेव, अधविधियम”। यही ब्रह्म को सुभाल उपनिषद “एकोहवै नारायण आसित, नब्रह्मा, नेसान:” इस तरह समझाया गया हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान नारायण ही सर्वोच्च कारण है। अनुवादक टिप्पणी: सर्व प्रथम चांदोज्ञ उपनिषद में उद्धालकर अपने बच्चे को समझाते हैं कि श्रुष्टि के पहिले सत ही था और कोई नहीं था। यह ब्रह्म को छोड़ ३ अन्य महत्त्वपूर्ण असहमतियों (सदेव, एकमैव, अदिद्वियम) का वर्णन इस तरह है ३ अलग अलग कारण जैसे कि उपाधान कारण (सांसारिक कारण), निमित्त कारण (सक्षम कारण), सहकारिका कारण (सहयोगी कारण)। उदाहरण के लिये मटकी बनाने के लिये मिट्टी उपाधान कारण है, कुम्हार (और उसकी मटकी बनाने की इच्छा) निमित्त कारण है और लकड़ी, चाक, आदि सहकारिका कारण हैं। सृष्टि के लिये चित्त और अचित्त उपाधान  है – यह ब्रह्म के शरीर हैं। ब्रह्म का संकल्प निमित्त है। ब्रह्म का ज्ञान, शक्ति, आदि सहकारिका हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के पाशुर में भी इसी सिद्धान्त को समझाया है कि “वेर मुधलाय वित्ताय्” – वेर (जड़) सहकारी है, मुधल निमित्त है और विथ्थू (बीज) हैं। यहाँ स्वयं भगवान इन ३ कारणों के कारण पहचाने गये हैं। सुभाल उपनिषद में यहीं ब्रह्म नारायण के रूप में पहचाने गये है। वहाँ समझाया गया है कि केवल नारायण का हीं अस्तित्व है और ब्रह्माजी, शिवजी, आदि कोई नहीं हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं कि भगवान नायारण हीं सभीके सर्वश्रेष्ठ कारण हैं।
  • वह सिद्धान्त जो बताते हैं कि प्रधानम (माया), परमाणु (अणु) आदिकालीन सिद्धान्त हैं के प्रति भ्रांतिमान होना बाधा है। प्रधानम प्रकृति है अर्थात अचित्त है। मिट्टी स्वयं मटकी नहीं बन सकती है। माया स्वतन्त्र नहीं है और आदिकालीन कारण नहीं है। परमाणु जो एक कारण है उसे कणाधा ने प्रस्तुत किया है। इसे भी स्वीकार नहीं कर सकते है। सर्वेश्वर श्रीमन्नारायण जो इस ब्रह्माण्ड में सर्व व्यापक अन्तरयामि है वही एक मात्र कारण है जिसे “वेर मुधलाय वित्ताय्” में समझाया गया है। इसमे कोई शंखा नहीं होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने तत्त्वत्रय के १५३ से १५६वें सूत्र में प्रधानम और परमाणु एक कारण हैं के विचार को अस्वीकार करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इन सूत्रों के लिये एक बहुत ही सुन्दर व्याख्या देते है। परमाणु (अणु) यह कारण है इसे बौद्ध, जैन, वैसेशिका आदियों ने प्रतिपादित किया है। प्रधानम (प्रकृति – अचित्त – माया) यह कारण हैं इन्हे कपिल मुनि ने प्रस्तुत किया है। क्योंकि यह सिद्धान्त श्रृतिके विपरीत हैं और तर्क से परे हैं इसलिये अमान्य हैं।
  • ब्रह्म, शिवजी, आदि (जिनको स्वयं भगवान नारायण ने जन्म दिया है) को परत्व (सर्वश्रेष्ठ), कारणत्व (सभी का कारण) मानना बाधा है। श्रीभक्तिसार स्वामीजी ने नान्मुगन तिरुवन्दादि के पहिले पाशुर में समझाते है “नान्मुगनै नारायणन् पडैत्तान् नान्मुगनुम तान् मुगमायच्चङ्करनै पडैत्तान” – भगवान नारायण ने ब्रह्मा की रचना की है, ब्रह्माजी ने शिवजी की रचना की है। जैसे यहाँ देखा गया है ब्रह्म, रुद्र, आदि देवताओं को भगवान श्रीमन्नारायण ने बनाया है। उनके सर्वोच्चता पर कोई प्रश्न नहीं कर सकता है और न ही वे कारण बन सकते हैं।
  • ब्रह्माजी, विष्णु और शिवजी को बराबर मानना बाधा है। ब्रह्माजी, विष्णु और शिवजी तीनों त्रिमूर्ति ऐसे प्रसिद्ध है। जैसे श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवन्दादि के १५वें पाशुर में समझाते हैं कि “मुदल आवार मूवरे अम् मूवर् उल्लुम् मुदल आवान् मूरि नीर् वण्णन्” – सभी देवताओं को हटाने पर तीन मुख्य देवता होते है। इनमे जिनके शरीर का रंग समुद्र के जल के समान नील वर्ण है वही सर्वश्रेष्ठ हैं। जैसे इस पाशुर में समझाया गया है ब्रह्म (जो निर्माण के कारण है), विष्णु (जिनका भरण पोषण का कार्य है) और शिवजी (जिनका विनाश का कार्य है) तीनों में विष्णु मुख्य भगवान हैं। तीनों बराबर और एक समान नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर के व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इन तीनों के विषय पर केन्द्रित कर दर्शाते हैं। वें कहते हैं कि आल्वार भी इन तीनों देवता के विषय में कहते है ताकि दो को अस्वीकार कर भगवान विष्णु के श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में अलग अलग प्रकार के अपचार को समझाते हैं। सूत्र ३०३ में भगवद अपचार के विषय में समझते समय वे प्रारम्भ करते हैं कि देवतान्तर को भगवान श्रीमन्नारायण के समान मानना प्रथम अपचार है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में भी कहते है “ओत्तार् मिक्कारै इलैयाय मा माया” – सर्वोच्च भगवान जिनके न तो कोई बराबर है और न ही उनसे कोई बड़ा है। श्वेतस्थर उपनिषद में भी एक वाक्य ऐसा ही है “न तत समस्च अभ्यधिकस्च दृश्यते”।
  • सर्वरक्षक (भगवान श्रीमन्नारायण) को छोड़ अन्य को रक्षक मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण जो अकार वाच्यन (“अ” का अर्थ) है सभी के रक्षक हैं। वें सभी को आर्शिवाद देते हैं। देवतान्तरों में ऐसी महानता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने विशेषकर “प्रपन्न परित्राणम्” नामक रहस्य ग्रन्थ का लेख किया है। इस ग्रन्थ में उन्होंने स्थापित किया हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं रक्षक है और दूसरा कोई हमारी रक्षा नहीं कर सकते हैं। मुमुक्षुप्पड़ी के ३६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी रक्षकम का अर्थ समझाते हैं। वें समझाते हैं कि रक्षकम का अर्थ बाधाओं का निष्कासन और इच्छाओं की पूर्ति करना। अगले सूत्र में वें समझाते हैं कि बाधाएं और इच्छाएं जीवात्मा के अनुसार बदलती रहती है। संसारीयों के लिये बीमारिया, आदि बाधाएं हैं और अच्छा खाना, सांसारिक सुख, आदि लक्ष्य हैं। मुमुक्षु जिसे मोक्ष कि इच्छा हो उसके इस संसार में रहना हीं बाधा है और परमपद पहूंचकर भगवान का नित्य कैंकर्य करना हीं इच्छा हैं। मुमुक्षु और नित्य सुरियों के लिये कैंकर्य में रुकावट बाधा है और कैंकर्य में वृद्धि इच्छा है। आगे ३९वें सूत्र में समझाते हैं कि “मैंने पहले ही प्रपन्न परित्राणम् में समझा दिया है कि श्रीमन्नारायण के सिवाय अन्य कोई मुक्तिदाता नहीं है”। अत: जो भी बाधाएं हैं वे केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही दूर कर सकते हैं ओर जो भी इच्छाएं हैं केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही पूर्ण कर सकते हैं। जब कभी मंद बुद्धिवाले देवताओं के पास अपनी इच्छा पूर्ति के लिये जाते हैं तब भगवान ही उन इच्छा को पूर्ण करते हैं जो उन देवताओं के अन्तरयामि में विराजमान हैं।
  • भगवान श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य को अपना स्वामी मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण जो श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य पति हैं वे ही दोनों नित्य और लीला विभूति के स्वामी है। शेषी का अर्थ स्वामी, मालिक है। अन्य को ईश्वर मानना गलत है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीभक्तिसार स्वामीजी के नान्मुगन तिरुवन्दादि के ५३वें पाशुर में देख सकते है कि “तिरुविल्लात देवरै तेरेल्मिन् देवु” – मैं ऐसे देवताओं से सम्बन्ध नहीं रखूँगा जो श्रीमहालक्ष्मीजी से सम्बन्ध नहीं रखते और उन्हें देवता मानते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी में आगे भगवान के रक्षत्वम को समझाते है कि दूसरों कि रक्षा करते समय भगवान हमेशा श्रीमहालक्ष्मीजी के संग है।
  • यह मानना कि परब्रह्म श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य है जिनकी पूजा करनी है, यह बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष कि इच्छा करता हैं (मुक्ति – परमपदधाम में नित्य कैंकर्य)। मोक्ष केवल भगवान श्रीमन्नारायण हीं प्रदान कर सकते हैं। अन्य कोई भी यह नहीं कर सकता हैं। अत: इन मुमुक्षु को पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि सिर्फ भगवान श्रीमन्नारायण के हीं ध्यान मे रहें। अनुवादक टिप्पणी: चांदोग्य उपनिषद कहता है “कारणं तु ध्येय:” – सर्वश्रेष्ठ कारण का हमेशा ध्यान करना चाहिये। यह समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यह वाक्य धायन करने के उद्देश को स्थापित करता है लेकिन यह परिभाषित नहीं करता है कि सर्वोच्च कारण कौन है। हम यह देख चुके हैं कि सर्वोच्च कारण भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं। इन दोनों को जोड़ने से सिद्धान्त स्थापित होता हैं – अर्थात सभी को भगवान श्रीमन्नारायण पर हीं ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और भगवान श्रीमन्नारायण हीं कारण हैं। इसलिये हमें निरंतर भगवान श्रीमन्नारायण का ध्यान करना चाहिये। एक ओर मुख्य बात हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण को हीं “मुकुन्द” कहते है क्योंकि वह मोक्ष प्रदान करते हैं।
  • यह न जानना कि भगवान पुरुषोत्तम को छोड़ दूसरा कोई नहीं है जो किसी की इच्छाओं की पूर्ति कर सके – यह बाधा है। “सर्व अभिमत फल प्रधान” – वह जो सभी तरह की इच्छाएं / अपेक्षाओं की पूर्ति कर सके। देवतान्तर केवल सांसारिक आर्शिवाद प्रधान करते हैं। परन्तु केशव जो परम पुरुष हैं मोक्ष सहित सभी आर्शिवाद देते हैं।
  • क्षुद्र देवताओं कि पूजा करना बाधा है। क्षुद्र – छोटे / तुच्छ। अनुवादक टिप्पणी: देवतान्तर जैसे पहले बताया गया है कि केवल सांसारिक आर्शिवाद प्रधान कर सकते हैं। परन्तु प्रपन्नों के लिये मुख्य लक्ष्य भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना और परमपदधाम में भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य कैंकर्य करते हुये निवास करना है। भगवद्गीता के ७वें अध्याय में भगवान समझाते हैं कि अन्य देवताओं के सीमित लक्षण हैं उनके आर्शिवाद भी सीमित है। वे स्पष्ट रूप से देवतान्तरों की पूजा को अस्वीकार करते हैं क्योंकि ऐसी पूजा इस संसार में बारम्बार जन्म मरण के चक्कर में डालते हैं।
  • अल्पकालीन तुच्छ पहलूओं की इच्छा रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पहले बताये गये तथ्य की तरह ही है। प्रपन्नों को चाहिये कि वे अल्पकालीन और तुच्छ पहलूओं में रुचि न रखें और परमपदधाम में भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य कैंकर्य को महत्त्व दें।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/09/virodhi-pariharangal-38.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३६)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – १

पेरिय पेरुमाल (श्रीरंगनाथ भगवान) – प्रथमाचार्य

श्रीशठकोप स्वामीजीश्रीरामानुज स्वामीजीश्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजीश्रीवरवरमुनि स्वामीजी

सिद्धान्तम् का अर्थ प्रमाणित सिद्धान्त। किसी विशेष विषय में गलत समझ/सोच का त्याग कर उसके स्थान पर सही सोच को स्थापित करना ही सिद्धान्त है। हम जो भी सिद्धान्त को प्रस्तुत करते हैं वह वेदानुसार हो, शास्त्रों द्वारा प्रमाणित हो और उस विषय पर विद्वानों द्वारा स्पष्टीकरण किया गया होना चाहिये। हमारे सिद्धान्तो को शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठित प्रमाणों को ही प्रमाण कहते हैं। सभी आस्तिक (विद्वान जो वेदों को ही अन्तिम अधिकारी मानते हैं) वेदों को ही शाश्वत और दोषरहित प्रमाण मानते हैं। भगवान वेद व्यास के अलौकिक शब्द हैं “वेदांत शास्त्रम परम नास्ति न दैवम केशवात परम” (वेदों से बड़ा कोई ग्रन्थ नहीं है और केशव से बड़ा कोई भगवान नहीं हैं)। परम अर्थात श्रेष्ठ जिसके “बराबर या ऊँचा कोई नहीं हैं” को दिखाता है। श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीसहस्रगीति के प्रथम तनियन में समझाया गया है “द्राविड वेद सागरम्” (श्रीसहस्रगीति द्राविड वेदों का सागर है)। आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों को वेदों के समान मानते हैं। इस सिद्धान्त द्वारा जो मुख्य तत्त्व स्थापित किया गया है वह है “नारायण परम ब्रम्ह तत्वम नारायण: पर: … यच्च किंचित जगत यस्मिन ध्रुसयते श्रुयतेपिच, अंतर बहिस च तत सर्वं व्याप्य नारायणा स्तिथ:” (नारायण ही सर्वोच्च ब्रह्म है वे ही सर्वोच्च सिद्धान्त हैं … इस भूमण्डल में हम जो कुछ देखते/सुनते हैं वे ही अन्दर बाहर सब कुछ प्रदर्शित करते हैं)। इसका अर्थ यह हुआ कि नारायण ही प्रत्येक वस्तु के अन्दर अंतर्यामी रूप में निवास करते हैं। वह उन्हें सभी के स्वामी मानकर पकड़ते है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सिद्धान्त का नाम विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है – पूर्ण रूप से वैदिक सिद्धान्त (वेद, वेदान्त, आदि पर आधारित सिद्धान्त)। यह सिद्धान्त नित्य और शाश्वत है। महान ऋषि जैसे श्रीपराशर, श्रीव्यासजी, श्रीबोधायन, श्रीतनक, श्रीध्रमिड, आदि ने सबसे पहले इसका अर्थ सहित प्रचार किया। कुछ समय पश्चात आल्वारों का अवतार हुआ और उन्होंने द्राविड वेद जो वैदिक वेदों का सार ही दर्शाते हैं उनका प्रचार किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने ब्रह्म सूत्र और भगवद्गीता की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने अपने अन्य ग्रन्थ में उपनिषद के मुख्य तत्त्व को समझाया। श्रीश्रृत प्रकाशिकाचार्यजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं को विस्तार पूर्वक समझाया है। आल्वारों के पाशुरों को कई व्याख्या के माध्याम से समझाया गया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिंन्होने आल्वारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों के अर्थों का सविस्तार वर्णन किया है। उनके शिष्य श्रीपेरियवाचान पिल्लै और वडक्कु तिरुविधि पिल्लै ने श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित श्रीसहस्रगीति की व्याख्या के उनके प्रयास में सहयोग प्रदान किया। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने बड़ी सुन्दरता से श्रीसहस्रगीति के सार को अद्भुत रहस्य ग्रन्थों में प्रमाण प्रस्तुत किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन रहस्य ग्रन्थों के विषय में बड़ी सुन्दर ढंग से व्याख्या की है और अपने अद्भुत व्याख्यानों में दिव्य प्रबन्ध, वेदान्तम और रहस्य ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। अत: इस सिद्धान्त को कई विद्वानों के परिवार ने कई पीढ़ियों तक पोषण किया है। इस सिद्धान्त में तीन मुख्य तत्त्व हैं – १) चित्त (असंख्य जीवात्मा), २) अचित (अपार माया) और ईश्वर (स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान)। यहाँ ईश्वर (एकमात्र स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान) और चित्त (चेतन) / अचित (निर्विकार जड़) – ये दोनों में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध हैं। पहला शरीर / शरीर भाव – भगवान सभी जड़ चेतनों की आत्मा में निवास करते हैं (शरीरि अर्थात शारीरिक) इस तरह वे (जड़ चेतन) भगवान के शरीर के अवयव हैं। दूसरा – विशेषण/विशेष भावम – एक विशेष उद्देश्य है जिसके चित और अचित दो सहज गुण हैं। सारांश यह है कि भगवान चित/अचित के साथ एक विशिष्ट तत्त्व है इनके जैसा दूसरा कोई तत्त्व नहीं है। और श्रीमन्नारायण ही सर्वोच्च भगवान हैं यह कई प्रमाणों व शास्त्रों से प्रमाणित हो चुका है। यहाँ तत्त्वों को गहराई से समझाया गया है। इसलिये वेद, वेदान्त आदि का मूलभूत सिद्धान्तों की पूर्व जानकारी होना जरूरी है। यह विस्तृत विभाग है।

  • वैदिक सिद्धान्त के विपरीत के प्रमाणों को मानना बाधा है। वेदों में प्रतिष्ठापित तत्त्वों के विपरीत यदि कोई भी ऐसे सिद्धान्त समझाता है – समझाने वाला चाहे कोई भी हो – ऐसे सिद्धान्तों को नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस पहलू को समझने में एक बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य है। हमें यह समझना चाहिये कि यहाँ शास्त्र और शास्त्र का तात्पर्य है। विद्वान पण्डित अपने पूर्वाचार्य आदि जो शास्त्र व शास्त्र तात्पर्य के सिद्धान्तों को बिना किसी संशोधन के मूल सिद्धान्तों को अर्थ पूर्ण ढंग से समझाते हैं। उदाहरण के लिये शास्त्रों में वर्णाश्रम धर्म (कर्मानुसार समाज का विभाजन) के बारे में बहुत ही ज़ोर देकर समझाया गया है। इसके साथ ही शास्त्रों में भगवद कैंकर्य (भगवान कि गुप्त सेवा) और भागवत धर्म (भागवतों कि सेवा) भी समझाया गया है। यहाँ हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्रों के सार को अच्छी तरह समझकर और दोनों वर्णाश्रम धर्म और भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म को बहुत संतुलित तरीके से समझाया है। उन्होंने दोनों कि विशेषताओं को महत्त्वपूर्ण तरीके से प्रतिष्ठापित किया है फिर भी वर्णाश्रम धर्म से भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म ही उत्तम है। हमारे पूर्वाचार्यों की प्रतिभा को समझने के लिये यह एक अच्छा उदाहरण है।
  • यह न समझना की वेदों में जो भी समझाया गया है वह स्व स्पष्ट नही है चाहे वह प्रत्यक्ष, आदि के विपरीत ही क्यों न हो – बाधा है। सामान्यता प्रमाण अर्थात साक्ष्य। हमारे पूर्वाचार्यों ने ३ प्रमाण को समझाया हैं– प्रत्यक्षम (इंद्रियाँ – दृष्टि, स्पर्श, ध्वनी, सुगन्ध और स्वाद के द्वारा अनुभव करना), अनुमान (हमारे पूर्व ज्ञान के आधार पर – उदाहरण के लिये यदि हम धुआँ देखते हैं तो समझते हैं कि वहाँ अग्नि है – यह हमारे पूर्व में अग्नि और धुवें को एक साथ देखने के आधार पर है), शब्दम् (वेद और उसके सहायक साहित्य जो वेदों के सिद्धान्त को विस्तार से समझाते हैं)। इनमें से वेदों को स्व: प्रमाणित (स्वयं में प्रमाण) – बिना किसी शंका के – सिद्धान्तों को शब्दश: मानना। इसे “अविवादित अधिकारी” ऐसे समझाया जाता है। जिस तरह भगवान के अस्तित्व को मानते है वैसे ही आस्तिक वह जो वेद के अधिकार को पूर्णत: स्वीकार करते है। अनुवादक टिप्पणी: वेद और शास्त्र मुख्यत: जीवात्मा के लिये हैं। उपर समझाये गये ३ तत्त्वों में – भगवान पहले ही सर्वज्ञ हैं (जो सब कुछ जानते हैं) और इसलिये उन्हें वेदों की आवश्यकता नहीं है। अचित (तत्त्व) में ज्ञान का अभाव है और इसलिये वेद उनके लिये उपयोगी नहीं है। परन्तु जीवात्मा के लिये अपने जीवन निर्वाह के लिये वेद ही मार्ग दर्शक है और आध्यात्मिक रूप से उच्चतम उन्नति करना और मूल भूत रूप से मुक्ति (भगवान का नित्य कैंकर्य) पाना। एक माता अपने बच्चे का जीतना ध्यान रखती है उससे १००० गुणा अधिक ध्यान वेद शास्त्र अपने बच्चों (जीवात्मा) का करते हैं। वेदों में जो भी समझाया गया है वह जीवात्मा के आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करने के लिये हैं। अत: कुछ विषय जो अपनी अंतदृष्टि के विपरीत दिखती हो फिर भी हमें वेदों को मानना चाहिये और उसका पूर्णत: पालन करना चाहिये। उदाहरण के लिये शास्त्र कहते हैं कि हमें एकादशी (पूर्णिमा और अमावस्या के ११वें दिन) के दिन अपना पूर्ण ध्यान भगवान पर केन्द्रित करना चाहिये और खाद्य पदार्थ, सांसारिक वस्तुओं, आदि का त्याग करना चाहिये। हमें आश्चर्य होगा कि शास्त्र हमें प्रसाद पाने से क्यों रोक रहा है (यह अनुभव किया गया है कि बहुतों को उपवास रखना बहुत कष्ट देय है) – लेकिन यदि यहाँ हम यह समझेंगे कि शास्त्र हमें उच्च आध्यात्मिकता को विकसित करने का एक मंच प्रदान करने में सहायता करता है तब हम शास्त्र में समझाये गये तत्वों को पूर्णत: मानेंगे और उनका पालन करेंगे।
  • स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि में पूर्ण विश्वास न होना जो वेद और वेदान्त के अर्थ को विस्तृत रूप से समझाते हैं – बाधा है। वेद उप बृहमणम – यह सभी वेदों के तत्त्वों को समझने के लिये सहायक साहित्य हैं। इनमें स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि साहित्य है। वेदों के तत्त्वों को ध्यान में रखते हुये जो साहित्य भण्डार है उसे स्मृति कहते हैं। इतिहास – ऐतिहासिक लेख – श्रीरामायण और महाभारत। पुराणों में विष्णु पुराण, आदि है। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि यह सभी सही प्रमाण है। भगवान स्वयं कहते हैं कि “श्रुतिश स्मृतिर ममैवाज्ञा, आज्ञाच्चेती मम द्रोही, मद भक्तोपी न वैष्णव:” (श्रृति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती हैं। चाहे वह मेरा भक्त ही क्यों न हो वह वैष्णव नहीं माना जायेगा)। श्रृति (वेद), स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि सभी मिलकर इन्हें शास्त्र कहते हैं। भगवान कृष्ण भगवद्गीता के १६.२४ में यह घोषणा करते हैं कि “तस्माच्छास्त्रां प्रमाणं ते” अर्थात शास्त्रों को पूर्णत: समझकर उन्हे प्रमाण की तरह मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र का प्रारम्भ “वेदार्थम अरुधियिडुवदु स्मृति इतिहास पुराणङ्गलाले” ही ऐसे करते है – इसका अर्थ है स्मृति, इतिहास और पुराण वेदों को ही समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वे कहते हैं कि प्रमाथ (आचार्य) प्रमाणों के माध्यम से प्रमेय (लक्ष्य) निर्धारित करते हैं। वे बहुत हीं सुन्दर तरिके से स्थापित करते हैं कि वेद ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। इसलिये हमें पहले यह समझना आवश्यक है कि सर्वश्रेष्ठ प्रमाण क्या है और उसे आचार्य के द्वारा सहायक साहित्य के माध्यम से समझना चाहिये। पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि कई सहायक साहित्य है जो यहाँ पर दर्शाये गये हैं जो वेदों के अर्थ को अच्छी तरह से समझने में कितने सहायक और कीमती हैं। इसे अच्छी तरह से अध्ययन करना और समझना चाहिये जो हमें इस मूलभूत सिद्धान्तों को समझायेगा।
  • यह न समझना कि कई साहित्य जिसके कुछ अंश सात्विकता कि जानकारी देते है जिन्हें सात्विक जनों ने अपना लिया हैं वे ही मुख्य प्रमाण हैं बाधा है। उपबृम्हमण में विशेषकर पुराण में वे पहलू जो सात्विक है वें मुख्य प्रमाण हैं। यहाँ राजस और तामस पहलू भी है। इन्हें अनदेखा कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मत्स्य पुराण में यह कहा गया है कि “यस्मिन कल्पेतु यत प्रोक्तम पुराणम ब्राह्मणा पूरा, तस्य तस्यतु माहात्मीयम तत स्वरूपेण वर्णयते” – पुराण ब्रह्माजी द्वारा प्रगट किया गया है, देवता जो सात्विक, राजसिक और तामसिक स्वभाव के है उनकी स्तुति के लिये, जब भी और ज्यो भी गुण ब्रह्माजी में है श्रेष्ठ हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३रें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों द्वारा दर्शाते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि पुराणों को एक विशेष सन्दर्भ में हमें जानना चाहिये और पूर्वाचार्यों ने (जो शुद्ध सात्विक हैं) पुराणों में सात्विकता को अधिक महत्त्व दिया हैं। पुराणों के सात्विक विभाग पूरी तरह भगवान श्रीमन्नारायण के विषय पर हीं कहा गया है। यह श्रीवैष्णवों के लिये मुख्य केन्द्र बिन्दु है।
  • यह न मानना कि रज/ तम गुणोंवाले व्यक्तित्व से संबन्धित सात्विक पहलू, सात्विकों के लिये अनुपधेयम (मान्य नहीं) है, एक बाधा है। पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी, शिवजी, लिंगम, आदि जो रज/ तम व्यक्तित्व वाले हैं उनके सात्विक गुणों को ग्रहण करना चाहिये। यहाँ मूल पाठों में अनुपधेयम (अमान्य) ऐसा कहा गया है – परन्तु यह मुद्रण की गलती होकर उपधेयम (मान्य) होना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी शिवजी के सात्विक गुणों की स्तुति ऐसे करते हैं “नुणणुणरविन नीलार कणदत्तममानुम” (शिवजी जो सबसे बड़े ज्ञानी है और स्वयं विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा किये है और इस तरह उनका कण्ठ नीलकंठ है)। यहाँ आलवार शिवजी की बढ़ाई करते हैं क्योंकि जब उनका सत्व गुण सर्वाधिक प्रबल था तब उस समय वें भगवान वेंकटेश की पूजा के लिये आये थे। और लिंग पुराण में प्रसिद्ध प्रमाण श्लोक देखा गया है “वैकुण्ठेथु परे लोके … आस्थे विष्णुरचिन्तयात्मा” – यह श्लोक तिरुवाराधन के समय प्रतिदिन श्रीवैष्णव मन्त्र पुष्पांजली के समय गाते हैं।
  • दिव्य प्रबन्धों में पूर्ण दृढ़ विश्वास न होना बाधा है, दिव्य प्रबन्ध दोषरहित हैं क्योंकि उनमें रज, तम, सात्विक आदि गुणों का कोई भेद नहीं है, क्योंकि वह पूर्णतः सात्विक है और पूर्वाचार्यों ने इसे मान्य किया है। आल्वार जिन पर स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा से उनके प्रति शुद्ध ज्ञान और भक्ति हैं उन आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध भी अति शुद्ध है। क्योंकि इन्हे हमारे समस्त पूर्वाचार्यों ने स्वीकार कर इनका अनुकरण किया है इनमें त्रुटी निकालने की कोई सम्भावना नहीं है। इस सिद्धान्त में दृढ़ विश्वास होना श्रीवैष्णवों के लिये आवश्यक है।
  • यह न मानना कि सात्विक जनों के लिये पूर्वाचार्यों द्वारा जो दिव्य वाक्य कहे गये हैं वे प्रामाणिक हैं – यह बाधा है। जैसे आल्वारों को भगवान श्रीमन्नारायण का आर्शिवाद प्राप्त है वैसे पूर्वाचार्यों पर आल्वारों का आर्शिवाद है। उनकी आज्ञा को सर्वोपरी मानना चाहिये और उनकी स्तुति करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्र में कहा गया है कि “धर्मज्ञ समयम प्रमाणं वेधश च” – महान व्यक्तियों के विचार एक आज्ञा की तरह है, वेद भी एक अधिकारी है, आज्ञा है। यहाँ धर्माज्ञा का अर्थ “जो धर्म को जानता हो” – हमारे लिये सिद्ध धर्म (प्रमाणित किया हुआ सही सिद्धान्त) भगवान हैं और इस तरह धर्माज्ञा आल्वारों और आचार्यों को दर्शाता है जो पूर्णत: भगवान के गुणों, नाम, रूपों के लक्षणों के जानकार हैं। इसलिये हमें पूर्वाचार्यों के वाक्यों पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये। उपदेश रत्नमाला के ३६वें श्लोक में “तेरूलुत्तवाल्वार्हल् शीर्मैयरीवारार् अरुलिच्चैयलैयरिवारार् अरुल्पेत्त नाथमुनि मुदलान नम् देशिकरैयल्लाल् पेदै मनमे उण्डो पेशु” श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह पहलू को समझाते है – हे मूढ़ मन! विवेचन कर बताओ कि (श्रीशठकोप स्वामीजी की) कृपा के पात्र श्रीमन्नाथमुनि स्वामीजी प्रभृति हमारे पूर्वाचार्यों के सिवा दूसरा कौन यथार्थज्ञाननिधि आल्वारों का अथवा दिव्यप्रबंधों का वैभव जान सकता है। कहिये क्या हमारे पूर्वाचार्य श्रीनाथमुनि स्वामीजी से प्रारम्भ कर कोई है जिन पर आल्वारों पर अपनी निर्हेतुक कृपा किये हैं? हमारे पूर्वाचार्यों के कई घटनाएं हैं जो कई ग्रन्थों में अभिलिखित किया गया है। हमें निरन्तर इनका अध्ययन, श्रवण, विचार करें और अपने स्वयं के कल्याण के लिये इनका पालन सच्ची श्रद्धा व भक्ति के साथ करें।
  • पाञ्चरात्रं में विश्वास न होना जिसे स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ने कहा है – बाधा है। स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण द्वारा कहे श्रीपाञ्चरात्र संहिता पर हमें कण भर भी संशय नहीं होना चाहिये जो “भगवद शास्त्र” के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसे स्वयं वेद के समान मान्य देना चाहिये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने हमें “आगम प्रामान्यम” नामक ग्रन्थ से अनुग्रहित किया है जो पाञ्चरात्रं आगम की प्रामाणिकता को सविस्तार स्थापित करता है।
  • इन तत्त्वों में पूर्ण विश्वास करना जैसे कि जीतने भी प्रमाण हैं सभी भगवान के स्वरूप (सच्चा स्वभाव) जैसे नाम, रूप, गुण, धन, आदि पर केन्द्रित है – बाधा है। भगवद गीता के १५.१५ में भगवान कृष्ण यह घोषण करते है कि “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेध्यो:” – सम्पूर्ण वेद केवल मेरे विषय पर हीं कह रहा है। सभी वेदों का मुख्य उद्देश एक मात्र भगवान कि स्तुति करना है। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोझी में कहते है “वेदप्पोरुले एन  वेंकटवा” (वेंकटवा ही वेदों के मतलब और उद्देश हैं)। यहाँ भगवान का अर्थ उनके सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, धन, आदि है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के १५.१५ श्लोक को श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य में समझाते हैं कि जैसे मनुस्मृति १२.९ कहती है “शरीरजै: कर्म दोषै: याति स्तावरताम नर:, वाचिकै: पक्षी मृगतां मानसैर अंतयजातिताम” – जब कोई व्यक्ति दूसरों को अपने हाथों से कष्ट देता है वह पेड़ बन जाता है; यदि वह शब्दों द्वारा किसी को कष्ट देता है तो वह पक्षी/जानवर बनता है और जब वह दिमाग से किसी को कष्ट पहूँचाता है तो वह नीच कुल में जन्म लेता है। यहाँ हालाँकि अलग प्रकार के शरीर (मानव, पौधे, जानवर, पेड़, आदि) को समझाया गया है अंततोगत्वा वह जीवात्मा के वर्तमान क्रिया और उसके परिणाम स्वरूप आगे जन्म के बारे में समझाते हैं। उसी तरह जब भी वेद देवताओं जैसे अग्नि, यायु, आदि के विषय पर चर्चा करता है तो अंततोगत्वा वे सिर्फ भगवान श्रीमन्नारायण के विषय में ही कहते हैं जो सभी तत्त्वों की आत्मा में निवास करते हैं। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोली के पाशुर के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी गीता के उसी श्लोक का उल्लेख करते हैं और पाशुर में भी यहीं कहा गया है। वे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि “वेदों के उद्देश मुझे भगवान वेंकटेश की तरह ही मेरे समक्ष दिखते हैं”।
  • यह न समझना कि सभी शब्द परमात्मा को संभोधित करते हैं जो निरन्तर चित्त और अचित्त के साथ ही हैं बाधा है। ब्रह्माजी श्रीरामायण में श्रीरामजी को स्तुति कर इस तरह बुलाते हैं जैसे “भवान नारायणो देव: जगत सर्वं शरीरं ते”– आप नारायण है, सर्व श्रेष्ठ भगवान हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। जो भी हम देखते, सुनते हैं वे सभी परब्रह्म श्रीमन्नारायण के शरीर के विषय में ही है। यह जीवात्मा में स्पष्ट रूप से दिखायी देता है और वस्तुओं में जीवात्मा के द्वारा दिखायी देता है। जो भी वस्तु जिसका नाम व रूप है ऐसे वस्तु भीतर से भगवान द्वारा व्याप्त होती है। अनुवादक टिप्पणी: वेदार्थ संग्रह में श्रीरामानुज स्वामीजी समझाते हैं कि जिसने वेदान्त का अध्ययन किया है वह सब में भगवान का दर्शन करता है। उदाहरण के लिये ऐसा व्यक्ति अगर एक बकरी को देखता हैं तो वें जीवात्मा को उस बकरी के अन्दर देखते हैं और जीवात्मा के अन्दर परमात्मा का दर्शन करते हैं। परन्तु जिसने वेद नहीं पढ़ा हो वह केवल बकरी को देखेगा क्योंकि तत्त्वत्रय – जीव, ईश्वर और माया के सिद्धान्त से परिचित नहीं हैं।
  • यह न समझना कि भगवान सबकी आत्मा में निवास करते हैं यह बाधा है। यह पिछले सारांश की तरह ही है। अनुवादक टिप्पणी: नारायण सूक्तम में यह समझाया गया है कि “अंतर भहिस च तत  सर्वं व्याप्य नारायण स्थित:” – सभी वस्तुओं के अन्दर और बाहर भगवान श्रीमन्नारायण व्याप्त हैं। इसी तत्त्व को श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में समझाते हैं “परन्ध धण परवैयुल नीर थोरुम परन्दुलन परंध अण्डम इधेन नील विशुम्बु ओलिवर करन्ध सिल इदं थोरुम इदं थिगल पोरुल थोरुम करंधेंगुम परनढुलन इवै उणड करने” – समुद्र के ठण्डे जल की एक छोटीसी बूंद में भगवान जीतने आराम से व्याप्त हैं उतने ही आराम से वे स्वयं ही इतने विशाल ब्रह्माण्ड में निवास करते हैं। उसी तरह वे पृथ्वी रूपी ग्रह और उससे बड़े ग्रह में निवास करते हैं और बारीक से बारीक स्थानों में भी निवास करते हैं और जीवात्मा उन स्थानों में वास करते हैं। वे ऐसी जगहों में वास करते हैं फिर भी ऐसी जीवात्मा को उनकी उपस्थिती का भान नहीं होता है। सम्हार के समय भगवान इन सबका नाश भी करते हैं और स्वयं को अन्दर रखकर उनकी रक्षा भी करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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