तिरुप्पावै अनुभव – तिरुप्पावै – अर्थपञ्चकम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

पराम्बा माँ गोदाम्बाजी (आण्डाळ् देवी) द्वारा रचित तिरुप्पावै उभय वेदांत का सार है| इस तिरुप्पावै के गूढ़ रहस्यार्थ को आत्मसात करने पर , परमपद प्राप्ति में आने वाली सारी बाधाएं , अड़चने ,स्वयमेव समाप्त हो जाती है| परमपद का मार्ग सुगम और सुलभ हो जाता है|

आण्डाळ् – रन्गमन्नार्, श्रीविल्लिपुतूर्

आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने अपनी मुमुक्षुप्पडि में  कहा है की,  एक मुमुक्षुको ( इस संसार के बंधनो से मुक्त हो, मृत्यु लोक में आवागमन से मुक्त हो , परमपद में भगवान् के नित्य कैङ्कर्य में सलंग्न रहने की आकांक्षा रखने वाला) को  “अर्थ पञ्चकम्” (पञ्च भाव ) का पूर्ण रूपेण ज्ञान होना अति आवश्यक है  |

अर्थ पञ्चकम् के यह पांच भाव कुछ इस प्रकार है:

१.  परमात्म स्वरूपम्| (भगवान् के स्वरूप का ज्ञान) |

२.  जीवात्म स्वरूपम्| (स्व-स्वरूप/ पृथक आत्म स्वरूप/जीव का स्वरूप का ज्ञान) |

३.  उपाय स्वरुपम्| (भगवत प्राप्ति के साधन का का ज्ञान ) |

४.  उपेय स्वरूपम्|  (जीव के अपने लक्ष्य याने भगवत प्राप्ति के पश्चात की गतिविधियां का ज्ञान) |

५.  विरोधि स्वरूपम्| (लक्ष्य की प्राप्ति याने भगवत प्राप्ति में आने वाली बाधाएं \ रुकावटों का ज्ञान   होना) |

तिरुप्पावै के पहले पासुरम् में ही आण्डाळ् देवी संक्षेप में अर्थ पञ्चकम् बतलाकर समझाती है | यहां आण्डाळ् देवी कहती है  “नारायणने नमक्के परै तरुवान्”, पूर्वाचार्यों के अनुसार आण्डाळ् देवी की इस पंक्ति के भाव कुछ इस प्रकार है|

  • “नारयाण”  भगवान नारायण को सम्बोधित करने वाला यह नाम , यहाँ भगवान के परमात्म स्वरुप को दर्शाता है|
  • इस पंक्ति में नारायण नाम के दो अर्थ है, जो इस प्रकार है:
      • परत्व (स्वामित्व) – भगवान् के स्वामित्व को जतलाते हुये, इस चराचर जगत में जीवात्मा के आधार (अवलम्बन) हैं , दर्शाता है|और सभी जीवात्मा के नारायण ही आधेय है| , दर्शाता है (आधार \ अवलम्बन पर आश्रित है) |
      • सौलभ्य (भगवान का सुलभ गुण , उपगम्य-सर्व व्यापी) – भगवान के सौलभ्य गुण को दर्शाते हुये, इस का आभास करवाता है की , जीवात्माओं को भगवान बड़ी सरलता से मिल जाते है,  इसका अर्थ यह भी ले सकते है की ,भगवान अंतर्यामी रूप में सभी जीवात्माओ में विराजमान है |
  • “नमक्कु” यह शब्द, जीवात्म स्वरूप (स्व स्वरुप) को स्पष्ट रूप से सम्बोधित करता है|”ए” कार से यह शब्द (नमक्के) हुआ, देवी आण्डाळ् जीव को (स्वयं को) इंगित करते हुये कहती है,  जो  जीवात्मा स्वयं को, भगवान् को आत्म समर्पण करने के लिए तत्पर है अर्थात् जो अपना ” अकिंचनत्व ” (जिसके पास भगवान् को अर्पण करने के लिए स्वयं के आलावा कुछ नहीं), “अनन्य गतित्व” (उसका और कोई आश्रय नहीं) और  वह भगवान् का पूर्ण रूपसे शरणागत है |
  • “नारयणने तरुवान्” उपाय स्वरूप को स्पष्ट करता है – ” नारायणने तरुवान् “ का अर्थ है कि केवल नारायण ही मात्र जीवात्मा पर परम उपकार कर सकते हैं |
  •  “परै”  उपेय स्वरूप को दर्शाता है – परै का अर्थ है निस्वार्थ भाव से भगवत् कैङ्कर्य करना |
  • “विरोधी स्वरूपम्” अन्तर्निहित हमारे स्वतन्त्र्य भाव, जो हमें भगवान से विमुख कर ,भगवान् को हमारी सहायता करनेसे रोकता है|

हमारे संप्रदाय के अनेक पुर्वाचार्यों ने अपने व्याख्यानों में इस को और भी स्पष्ट रूपसे समझाया है |  

तिरुप्पावै व्याख्यान कर्ता (टीकाकार)


पेरियवाच्चान् पिळ्ळै- ३००० पडि


अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नयनार्-६००० पडि

आयि जनन्याचार्यर् – २०००पडि, ४००० पडि


पोन्नडिक्काल् जीयर्- स्वापदेशम्

भगवान के परमात्म स्वरूप को आण्डाळ् देवी द्वारा पुनः कई पदों में समझाया गया:

    • “पार्कडलुळ् पैय तुयिन्र परमन्” – परम पुरुष पुरुषोत्तम भगवान् श्रीमन्नारायण जो क्षीर सागर में शयन कर रहे हैं|
    • “ओंगि उलगळन्द उत्तमन्” -परम पुरुष पुरुषोत्तम, जिन्होंने अपने तीन पगों में तीनों लोकों को माप लिया|
    • “पर्पनाभन्” – जिनके नाभि से , कमल पर ब्रह्मा जी का आविर्भाव हुआ|
    • “तूय पेरुनीर् यमुनै तुरैवन्” – जो यमुना तट पर रहते है|
    • “गोविन्दन्” – धेनुओं (गायों) को पालने वाले, धेनुओं को आनन्द प्रदान करने वाले, धरती माता को सुख प्रदान करने वाले|

जीवात्म स्वरूपम् :

आण्डाळ् देवी अपने तिरुप्पावै के छठवें से पन्द्रहवें पासुरम् में और भी स्पष्ट रूप से जीवात्मा के स्वाभाव और गुण का वर्णन कर रही है. इन पासुरम् में देवी आण्डाळ्, यह उपदेश देती हुई प्रमाणित कर रही है कि, जीवात्मा को सदा श्रीवैष्णवों के सङ्ग का जिज्ञासु होते हुये उन्ही के सहयोग और मार्ग दर्शन में भगवत प्राप्ति,परमपद प्राप्ति की और अग्रसर होना चाहिये |

अपने १६ वे और १७ वे पाशुरम में पराम्बा माँ गोदाम्बाजी भगवान को पाने , अपने व्रत पालन के लिये , सखियों के स्वरुप में नित्य सुरियों का संग लेने स्वयं इन उपदेशों पालन करते हुये , इस उपदेश को सिद्ध करती है की जीवात्मा को , भगवान के अति प्रिय उनकी सेवा में लीन नित्य सुरियों की शरण ले उनकी महिमा को गौरवान्वित करते हुये गुणगान करना चाहिये |

अठारवें से बीसवें पासुरम् में माँ गोदाम्बाजी  पुरुष्कार रूपा (नप्पिन्नै नाचियार्- नीला देवी का अवतार और वृन्दावान में भगवान् कृष्ण के प्रिय महिषी) को गौरवान्वित करते हुये , प्रमाणित करती है की भगवद प्राप्ति पुरुष्कार स्वरूपा माँ की कृपा से ही प्राप्त की जा सकती है |  

विरोधी स्वरूपम् का वर्णन माँ गोदाम्बाजी तिरुप्पावै के दूसरे पासुरम् में “नेयुण्णोम् पालुण्णोम्” कहते हुये उद्घृत करती है, अर्थात् जब हम भगवान् की प्राप्ति को ही लक्ष्य बनाकर चलते है, तब उनके सिवा और कोई वस्तु हमारे लिये भोग्य नहीं समझेंगे | आण्डाळ् यह भी कहती है “चेय्याधन चेय्योम”, जिसका अर्थ है हम वह निषिद्ध कार्य नहीं करेंगे जो हमारे पूर्वाचार्यों ने नहीं किया |  

मुख्यतः  उपाय स्वरूप और उपेय स्वरूप को समझना हमारे लिये अत्यंत आवश्यक है |  
देवी आण्डाळ्  तिरुप्पावै के अट्ठाईसवें और उन्तीसवें पासुरम् में “गोपी और गोप भाव” लेकर इसकी बहुत ही सुन्दर व्यख्या करती है |   

आचार्य पेरिय वाच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी और आचार्य नायनार् स्वामीजी ने इन दोनों पासुरम् पर बहुत ही सुन्दर, अद्भुत व्याख्यान (टीका) लिखें है |  
आचार्य नायनार् स्वामीजी का विस्तृत व्याख्यान अनेक उत्कृष्ट विवरणों से भरा हुआ है | इन पासुरम् के आचार्य द्वारा तत्व निष्कर्ष कुछ इस तरह है |  

उपाय स्वरूप  – तिरुप्पावै का अट्ठाईसवां पासुरम् “करवैगळ् पिन्चेन्रु” (கறவைகள் பின்சென்று):

देवी आण्डाळ्, इस पासुरम् में प्रामाणित करती है, कि भगवान ही “सिद्ध साधन” हैं (स्थापित उपाय जिसे हमारे व्यक्तिगत प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं हैं) |

देवी आण्डाळ् आरम्भ में ही बताती हैं कि, उनका कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग में कोईअन्वय  (संबंध) नहीं है |  माँ गोदाम्बाजी इस पाशुर में भगवान की जीवो पर निर्हेतुक कृपा भी सिद्ध करती है|

    • देवी आण्डाळ् कहती है कर्मयोग हमारे लिए नहीं है क्योंकि कर्मयोग की आवश्यकताओं का पालन हम नहीं कर सकते, जैसे:
      • मनुष्य को महान पण्डितों / विद्वानों का अनुसरण करना चाहिये, परन्तु हम इनकी जगह गायों के पीछे जा रहे हैं |  
      • मनुष्य को दिव्यदेश के दर्शन करने जाना चाहिये, पर यहाँ हम वन में जा रहे है , वन में भी जाकर तपस्या करना कर्मयोग का अङ्ग है, पर हम वन में केवल धेनु चराने जाते हैं ,  धेनु चराना भी वर्ण-धर्म में मान लें , पर हम तो केवल उन धेनुओं को चराते हैं जो दूध देती हैं (दुधारू है) और अन्य पशुओं की उपेक्षा करते हैं |
      • भोजन में भी अनेक नियम हैं, पर हम किसी भी नियम का पालन नहीं करते |हम बिना स्नान किये भोजन करते हैं, हम किसी भी हाथ से भोजन कर लेते है ( बगैर धोये , उच्छिष्ट हाथों से भी,, हम चलते- फिरते भी भोजन कर लेते हैं |  
  • हम ज्ञानयोग नहीं जानते क्योंकि हम “अरिवोन्रुं इल्लाद आय्क्कुलम् ” (अनपढ/अज्ञानी ग्वाले) ग्वाल कुल के लोग हैं, अर्थात हम में सच्चा ज्ञान नहीं है |  
  • भक्ति ज्ञान-विशेष (ज्ञान की विकसित स्थिति) | चूंकि हमें ज्ञान ही नहीं, भक्तियोग करनेका प्रश्न ही नहीं उठता |
  • भगवान भागवतों पर निर्हेतुक कृपा कर , स्वयं के लालन पालन का अवसर प्रदान करते है , जैसे माता कौशल्या और माता यशोदा को प्रदान किया था | हम को यह सौभाग्य भी भगवान स्वयं प्रदान करते है, और यह जीवों का मौलिक धर्म है  (“कृष्णं धर्मं सनातनम्” – भगवान् कृष्ण शाश्वत धार्मिक सिद्धान्त हैं)  | यह स्व-प्रयास से नहीं हुआ है, भगवान स्वयं हम जीवो पर कृपा कर हमारे साथ रहने आते है  | अतः न तो हमारे बाह्य शत्रु हैं (कर्म/ज्ञान/भक्ति योग)  और न ही आन्तरिक शत्रु हैं (“स्वागत स्वीकारम्”- हम स्वयं भगवान् की ओर उपगमन कर, इस प्रयास को “उपाय” ) समझते रहना चाहिये |
  • जिस तरह हमारे पास कोई ज्ञान नहीं है,  वैसे ही भगवान “दोष” रहित है | भगवान मङ्गलमय गुणों से परिपूर्ण है | भगवान का यह मङ्गलमय गुण पूर्णतया उनके ग्वालों के साथ “गोविन्द” के स्वरुप में रहते  प्रकट होता हैं | जब नित्यसूरियोंके के साथ रहते है तब भगवान का “प्रभुत्व” पूर्णतया प्रकट होता है, और  गोप गोपियों के साथ रहते है तब भगवान का “सौलभ्य”  पूर्ण रूपेण प्रकट होता है|
  • भगवान न केवल मङ्गलमय गुणोंसे परिपूर्ण है, बल्कि सिद्ध-साधन भी है (स्थापित उपाय है, जीव को  विशेष प्रयास से प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती) | भगवान का हर जीवात्मा से सम्बन्ध है | भगवान अन्तर्यामि है , हर जीवात्मा के मूल है | भगवान द्वारा प्रसादित “तिरुमन्त्र”, परमात्मा और जीवात्मा के बीच नौ प्रकार के सम्बंधों को दर्शाता है | पिता-पुत्र, रक्षक-रक्ष्य, शेषी-शेष, भर्ता-भार्या, ज्ञेय-ज्ञाता, स्वामि-स्वम्, आधार-आधेय, आत्मा-शरीर और भोक्ता-भोग्य | अतः शरण में आये शरणागत की रक्षा करने का उत्तरदायित्व भी भगवान का है |
  • माँ गोदाम्बाजी कहती है , हे गोविन्द आप हम जीवो पर निर्हेतुक कृपा कर , अपने सरल सुलभ स्वभाव वश ,  आप हमारे अपने सखा बन हमारे मध्य , हमारे ही साथ रहने आते है, जिसका अहसास हम नहीं कर पाते , हम अज्ञानी अज्ञानतावश , प्रेमवश आपको सखा न मान , सर्वे सर्वा मान  “नारायण” नाम से सम्बोधन करते है , पर हे गोविन्द हमारी इस भूल को क्षमा करना | यहाँ हमारी गुरु परंपरा के आचार्य नायनार कहते है की, शरणागति में हमेशा क्षमा याचना करते रहना चाहिये, कारण की जीवात्मा गलतियों का पुतला है, और गलती और भूल इसका स्वाभाव है|
  • पराम्बा माँ गोदाम्बाजी बतला रही है , भगवान स्वयं परमपद प्राप्ति के परम उपाय है , जीव मात्र अकिञ्चन है, जिसको कोई और शरण नहीं है (अनन्यगतित्वं), भगवान से परम कैंकर्यं की प्रार्थना करते हुये कहती है की , वह भगवान को स्वयं की रक्षा करने से रोक नहीं  सकती | (“विलक्कामै”) |
  • इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् भगवान् का निरपेक्ष उपायत्व (अनपेक्षित हमारी रक्षा करना) को दर्शाती है | यह स्मरण रहे कि भगवान् को हमारी रक्षा करने के लिए, हममें आकिञ्चन्य भाव, अनन्य गतित्व और विलक्कामै होना आवश्यक है – ये उपाय के अंश नहीं हैं, बल्कि केवल अधिकारी विशेषण (मुमुक्षुके गुण) हैं | ये गुण ही अन्तर है एक जीवात्मा में जो भगवान् को शरणागति करना चाहता है और जो नहीं चाहता |

उपेय स्वरूपम् -उन्तीसवां पासुरम्- चिट्रम् चिरुक्काले

इस पासुरम् में आण्डाळ् समझाती हैं कि भगवत् कैङ्कर्य जो भगवान् को तुष्ट करता है वही अन्तिम ध्येय है |

  • बडे सवेरे हम सब आपकी शरण में आये हैं | नायनार् उषा काल की तुलना मुमुक्षु बनने की प्रारम्भिक अवस्थासे कर रहे हैं –  यह वह स्थिति हैं ,जब हम अज्ञानता से मुक्त हुये हैं , परन्तु भगवान् से प्रेम , लगाव , उनमें आसक्ति पूर्णतया विकसित नहीं हुयी है, प्रातःकाल की बेला में उठकर भगवान की शरणागति करना ज्ञानमय अवस्थाका प्रतीक है |
  • आप स्वामी है, हम पर आपका स्वामित्व है, आपको हमारी रक्षा के लिए आना था, पर हम आपसे मिलने आ गये| भगवान रामजी के वनवास के समय दंडकारण्य में, जब सारे ऋषि मुनि उन्हें मिलने उनके आश्रम पहुँच अपनी व्यथाएँ बतलायी  , तब भगवान श्री रामजी को बड़ा क्लेश हुआ की ,  जहाँ मुझे उनके पास जाकर उनके कुशलक्षेम पूछना चाहिये था , ऋषि मुनियों को कष्ट उठा कर स्वयं मेरे पास आना पड़ा | ऐसे जिससे भगवान को क्लेश हो, उसे स्वागत स्वीकाराम संज्ञा दी गयी, कारण की यह स्थिति अस्वाभाविक है|
  • इस में यह भाव भी बतलाया गया, भागवत आपके सम्मुख आकर दंडवत प्रणाम कर श्रद्धा से आपकी आराधना भी कर रहे है|  भगवान इतने स्वराध्य है की , वह भक्तों से प्रणाम की अपेक्षा भी नहीं रखते| भक्त को स्वयं की और आता देखकर ही आनन्दित हो जाते है| जैसे पिता बिना किसी अपेक्षा के पुत्र को देखते ही हर्षान्वित हो जाता है| जबकि देवतान्तर में अन्य देवता अपने उपासको से सदा उपासना  की कामना रखते है|
  • हमनें आपके स्वर्ण से भी बहुमूल्य पाद पद्मों का गुणगान कर रहे है, जो सभी वैदिकों को अति प्रिय है | हम आपकी और आपके चरणकमलों का महिमा मंडन किसी अपेक्षा से नहीं किये है – हमारा ध्येय केवल उनका गुणगान करना है, और आपके चरणों की शरणागति ही हमारा ध्येय है |
  • देवी आण्डाल कह रही है , हम आपको हमारा व्रत क्या है बतलाती है  | आपका वृन्दावन में अवतरित होना ही पर्याप्त नहीं है | आप अपनी मर्जी से हम गोप गोपियों के कुल में अवतरित हुये है|  आप हमारे मनो को निर्मल करते हुये अपने प्रति हमारा लगाव , आसक्ति बढ़ाई है| इसलिए अब आपको, हमारी इच्छाओं की पूर्ति करते हुये,  हम सभी को अपने यथोचित निज कैंकर्य में सम्मिलित करना होगा|
  • भगवान देवी आण्डाल को आश्वासन देते है की “व्रत का फल जरूर प्रदान करेंगे”, तब देवी आण्डाल कहती है की , हम ने व्रत, फल के लिये नहीं किया, व्रत आपकी सेवा – स्मरण में रत रहने के लिये किया है , हमें आपके निज कैंकर्य के सिवाय और कोई अभिलाषा नहीं है |
  • देवी आण्डाळ् कहती हैं कि भगवान् जहाँ कहीं भी हों- परमपद में या इस भौतिक चराचर जगत में – वह सदा उनके साथ ही रहना चाहती हैं | ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मणजी “इळैय पेरुमाळ् ” , भगवान् श्री रामजी का विरह सहन नहीं की स्थिति में, भगवान रामजी के साथ ही वन गमन को गये थे | उसी प्रकार देवी आण्डाळ् भी कहती है कि, भगवान् स्वामी हैं और वह स्वामी की संपत्ति है, इसलिये सदा भगवान कृष्ण के साथ ही रहना चाहती है | कहती है की , यह सम्बन्ध शाश्वत है, और चाहती है की, यह सम्बन्ध स्पष्ट रूपसे प्रकट हो |
  • अन्त में देवी आण्डाळ् स्थापित करती हैं कि, उनका परम ध्येय भगवान् की प्रसन्नता के लिये, भगवत कैंकर्य में रत रहना है | वह लक्ष्मणजी की तरह, सदा भगवान् का कैङ्कर्य करते रहना चाहती है,  न कि भरताळ्वान् (भरतजी) की तरह जो श्रीरामजी से कुछ समय के लिये दूर रहे थे |”मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” अर्थात् भगवान से प्रार्थना करती है की, हमारी सभी कामनाओं को मिटा दे, यहाँ देवी आण्डाल स्पष्ट करती हैं कि,  उन्हें स्वयं के आनन्द की कोई कामना नहीं  है,  साथ यह भी कहती है की  भगवान् को भीलगना चाहिये की, वहकोई कामना नहीं रखती है |इसी अवधारणा को तिरुवाय्मोळि में नम्मळ्वार् “एम्मा वीडु” (२.९) दशक “तनक्केयाग एनैकोळ्ळुमीदे” में स्पष्ट किये है अर्थात् भगवान् अपने ही आनन्द के लिए आळ्वार् संत को कैङ्कर्य में रखें |

इस प्रकार इस पासुरम् में आण्डाळ् परम लक्ष्य को प्रकट कर स्थापित करती हैं | इसके अतिरिक्त “मट्रै नम् कामंगळ् माट्रु” विरोधी स्वरूप को स्पष्ट करता है – अपने स्वार्थ के लिये ,भगवान् के निजी आनन्द के बजाय, स्वयं के आनंद के लिये भगवान् का कैङ्कर्य करना |

इस प्रकार हम “अर्थ पञ्चकम्” को आण्डाळ् के तिरुप्पावै की दिव्य वाणि और अनेक आचार्यों के इस दिव्य प्रबन्ध के व्याख्यानों में दिये गये उत्कृष्ट व्याख्यान  उपदेश द्वारा समझ सकते हैं |

अडियेन विजयकुमार रामानुज दासन्
अडियेन श्याम्सुन्दर् रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/01/thiruppavai-artha-panchakam.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १२

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

 

१११) मुक्तात्मानुक्कु लीलाविभूति तदीयत्वाकारत्ताले उद्देश्यमाग निन्रतिरे

मुक्तात्मा के लिए, लीलाविभूति (यह भौतिक संसार) भोग्य वस्तु ही है क्योंकि यह भी भगवान् की ही सम्पत्ति है । यह हमने १०५ वें  सूत्र मे विस्तारपूर्वक देखा है ।

११२) उरङ्गिनानागिल् परक्क्षणत्तुक्कु उडलायिरुक्कुम् । उणर्तिरुन्तानागिलुम् अप्पडिये ।

 

जैसे कहा गया है — उरङ्गुवान् पोल् योगु शेय्द परुमाळ् अर्थात् वह परब्रह्म भगवान् जो शयन (योग-निद्रा) का छल कर निरन्तर सभी चिदाचित वस्तुओं का संरक्षण और श्रेय का चिन्ता कर रहे है। यथारूप वही भगवान् सबका संरक्षण जागृक अवस्था मे भी करते है ।

अनुवादक टीका: इस पासुर व्याख्यामे, श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी कहते है – भगवान् स्वनेत्र बन्द (योग-निद्राका छल कर) करते है ताकि वह विभिन्न योजनाओंसे जीवोंका संरक्षणेत्यादि कार्यों पर दीर्घ आलोचन कर सकें (जैसे हम सभी किसी कार्य के सन्दर्भ में स्वनेत्र बन्द कर दीर्घ आलोचन करते है)। आऴ्वार नित्य इंगित करते है कि सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने वाले एक मात्र भगवान् ही है। भगवान् के इस दिव्य गुण से प्रभावित आऴ्वार परम श्रद्धा से अपना निर्वाह कर रहें है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् छल (योग-निद्रा) अवस्था और जागृक अवस्था दोनों अवस्थाओं में सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने में तत्पर रहते है। यह प्रतिपाद्य विषय श्रीमद्रामायण की लीलाओं में दृग्गोचर है। भगवान् श्रीरामचन्द्र का शिविर समुद्रतट के किनारे पर था। हर रात्रिमे भगवान् के शिविर के चारों ओर तैनात वानर सेना टहलते है। भगवान् के शिविरके चारों ओर टहलते वानर सेना में प्रत्येक वानर बारी-बारी मे थक कर विश्राम करने चले जाते और अन्तोगत्वा शिविर की रक्षा करने मे कोई भी तैनात नही बचता। शिविर के अन्दर से यह दृश्य देखकर भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वयं शिविर के भीतर आकर विश्राम करते हुए वानर सेना के चारों ओर स्वयं चलकर उनका संरक्षण करते थे।  देखिए यह कितना सुन्दर दृश्य है। हमारे पूर्वाचार्य अतः बारम्बार कहते है की भगवान् ही जीवके परमकल्याण कारक और श्रेयोभिलाषी है क्योंकि जीवके जागृक-अवस्था और निद्रावस्था दोनों अवस्थाओं मे भगवान् जीवका संरक्षण करते है।

११३) चक्करवर्ति तिरुमगनुक्कु विल्लुकैवन्दिरुक्कुमापोलेयायिट्रु कृष्णनुक्कु कऴल् कैवन्दिरुक्किपडि

जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रको उनके शार्ङ्ग धनुष पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे धनुषका प्रयोग करते है, ठीक उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को भी उनकी मुरली पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे मुरली का प्रयोग सुन्दर मधुर वेणु-ध्वनि का है।

अनुवादक टीका: यथा श्रीमद्रामायण मे उल्लिखित है – भगवान् श्रीरामचन्द्र का शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी तिरुप्पल्लाण्डु दिव्य-प्रबंध के अन्तिम पासुर ‘शार्ङ्गमेन्नुम् विल्लाण्डान्मे यही दर्शाते है की वह जो स्व धनुष का पूर्ण नियंत्रण करता है अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्रका शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। इस पासुर टीका मे टीक कर (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामाजी) यह दर्शाते है की भगवान् का शार्ङ्ग धनुष सभी आयुधों का प्रतिनिधि है। इसका यह अर्थ हुआ की भगवान् सभी जीवों (नित्यसूरिगणों, मुक्तात्माओं, अन्य जीवात्माओं) के एक मात्र नियंत्रक है। यहां आण्डान् शब्द का केवल यह अर्थ नही की भगवान् यह दिव्यायुध को धरे है परन्तु भगवान् के परिपूर्ण नियंत्रण को भी दर्शाता है यथा एक राजा स्वप्रजा को परिपूर्ण नियंत्रण मे रखता है।

भगवान् श्रीरामचन्द्र

श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ३.६ ‘नावलम् पेरियतीविनिल् पदिग‘ मे श्रीकृष्ण भगवान् की वेणु माधुर्य कुशलता और वेणुधुण के आकर्षक प्रभाव का वर्णन अति सुन्दरता से करते है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामाजी, श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य शरीर के अंगों का वर्णन आकर्षक ढंग से करते है (जैसे उनके दिव्य करकमलों का सुन्दर स्थान/स्थिति, उनकी वेणु को स्पर्श करते हुए उनके अधर ताकि वेणु को बजा सकें, उनका एक तरफ़ा दिव्य अर्गभाग, वायु उच्छश्वसन और निश्वसन के कारण भगवान् के कोष्ठ का विस्तार और निपात होना)। श्रीकृष्ण भगवान् की दिव्य वेणुधुण के श्रवण से मन्त्रमुग्ध वृन्दावन की गोपिकाएँ, गाएँ और अन्य पशु, देवलोक के नृत्यक ऐसे खडे है जैसे उनके सभी के नेत्रों की गतिविधि प्रतिबन्धित है। इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् का उनकी वेणु पर नियंत्रण और प्रभुत्व है।

 

११४) गणत्तारुण्डायिरुक्कच् चेय्देयुम् भारमिल्लैये अहङ्कार स्पर्शमुडैयार् इल्लामैयाले


श्रीभगवान् के दिव्य धाम (परमपद) मे ऐसे अनेक दिव्यसूरिगण है जो परिपूर्ण ज्ञानी (सुविज्ञ) है परन्तु उनमे स्वल्प मात्रा मे अभिमान व गर्व नही है। अतः ऐसे दिव्यसूरिगण को भार नही माना जाता है।अनुवादक टीका: श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ४.४.६ पासुर मे कहते है की जो सुदर्शनचक्र से सुशोभित तिरुक्कोष्ठियूर के अर्चाविग्रह भगवान् का ध्यान नही करता और भगवान् को नही भजता,वह केवल भू-भार है। इसी प्रकारेण तिरुप्पावै के मंगलाचरण पासुर – ‘पातङ्गळ् तीर्क्कुम्’ मे पासुर रचनाकार कहते है – वह सभी जो तिरुप्पावै के (३०) तीस पासुरों के ज्ञाता नही है वह भूमि के द्वारा कदापि स्वीकृत नही है। इनकी तुलना मे परमपद के दिव्यसूरिगण पूर्णतया सिद्ध और सुविज्ञ है अतैव किसी के लिए भी भार नही माना जाता है।

११५) शेषिक्कुपायभावम् स्वरूपानुबन्धियान पिन्बु शेषत्वनुक्कुम् प्रावण्यम् स्वरूपानुबन्धियागक् कडवदु

जैसे भगवान् (शेषि) का मोक्षोपाय (जीवका संरक्षण कर जीवको मोक्ष प्रदान करना) होना स्वाभाविक है वैसे ही जीवात्मा (शेष) का भगवान् मे रति होना भी स्वाभाविक है।

आऴ्वारों को भगवान् मे अत्यन्त रति का दृश्य

अनुवादक टीका: मोक्ष का एक मात्र उपाय भगवान् ही है। जीवों का संरक्षण करना भगवान् का स्वाभाविक गुण है। अतः इस प्रकारेण जीवात्मा का भगवद्-कैङ्कर्य (स्वस्वामी का कैङ्कर्य) करना स्वाभाविक है। भगवान् के प्रति इस स्वाभाविक-कैङ्कर्य को अत्यन्त प्रेम, भक्तिभाव, और रतियुक्त से करना चाहिए। इस विषयको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्रके ८०वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में बहुखूबी से समझाते है।

सर्वप्रथम, भगवद्-कैङ्कर्य विषय मे, इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी), पेरिय-उडयार् (जटायु), पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामीजी और चिन्तयन्ती को प्रेरणास्तोत्र मानकर श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उनका वर्णन ८०वें सूत्र मे करते है।

श्रीमद्रामायण से अभिज्ञात है की इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) सदैव श्रीरामचन्द्रजी के साथ ही रहते थे। श्रीरामचन्द्र की सन्निकटता मे इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) ने उनकी सेवा विभिन्न प्रकार और अवस्थाओं मे की है। पेरिय-उडयार् (जटायु) और पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी के विषयमे कहते है की इन दोनों ने स्वदेहकी चिन्ता छोड़कर भगवान् के लिये शरीर को त्याग दिया। चिन्तयन्ती नामक गोपी ने भगवद्-विप्रलम्ब भावमे शरीर को त्याग दिया।

८० वें सूत्रकी व्याख्या मे, पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्यचरित्र का वर्णन विस्तार पूर्वक है। पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्य जन्म श्रीरङ्गम के कुछ कोस दूर तोट्टियम् तिरुनारायणपुरम नामक दिव्य क्षेत्र मे हुअा था। एक बार कुछ भगवद्-विरोधि भगवद्विग्रह को आग लगाने की कुचेष्टा करते है। यह जानकर पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी तुरन्त जलते भगवद्विग्रह को आलिंगन कर और इसके पारिणाम स्वरूप शरीर को त्याग देते है। यहां एक प्रश्न उठता है – क्या भगवान् के लिये शरीर को त्यागना क्या उपाय है ? – श्रेष्ठ एवं सिद्ध भगवान् ही उपायोपाय तत्त्वमे परम निष्ठ पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का इस प्रकार के कार्य मे संलग्नता कितना उचित है।

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी ८० वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में इस तत्त्व का वर्णन करते है जिसकी अभूत पूर्व व्याख्या श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने हम भगवद्-बन्धुओं के लिये प्रेषित किया है यथा :

  • सूत्र ८६ – भगवद्-प्रेम से येन-केन प्रकारेण किया गया कार्य कदाचित भी उपाय नही माना जाता है। इस प्रकार का व्यक्तिकरण भगवद्प्रपन्नों मे भगवद्-प्रेम का ही परम स्वरूप है।
  • सूत्र ८७ – उपाय भावना से किए गए कार्य त्याज्य है और कैङ्कर्य भावना से किए गए कार्य सर्वदा स्वीकृत है।
  • सूत्र ८८ – भौतिक वस्तुओं मे रुचि रखने वाले भौतिकवादि, उन भौतिक वस्तुओं को पाने के लिये जिस प्रकार स्वप्राण त्यागने के लिये सदैव तत्पर रहते है ठीक उसी प्रकार भगवद्-प्रेम से ओत-प्रोत भगवद्प्रपन्नों के विभिन्न कार्य भगवद्-प्रेम के कारण स्वाभाविक है।
  • सूत्र ८९ – ऐसे भगवान् से अत्यन्त आसक्त एवं अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्नजनों का अनुष्ठान (शास्रविधि) और अननुष्ठान (अशास्रविधि) उपाय (अन्य मार्ग के माध्यम और स्वप्रयासों से भगवान् को प्राप्त करना) के भाग नही होते है।
  • सूत्र ९० – ऐसे कार्य जैसे भगवान् के प्राकट्य अप्राकट्य मे विलम्ब होने से उत्पन्न मनोवेदना को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना ,भगवान् को संदेशवाहकों के द्वारा संदेश भेजना इत्यादि आऴ्वारोंमे द्रष्टव्य है परन्तु यह केवल भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम और भक्ति का ही व्यक्तिकरण है।
  • सूत्र ९१ – ऐसे कार्य जो विशेष और महान व्यक्तित्वों मे द्रष्टव्य है, वह सदा स्मरणीय और कीर्तनीय है क्योंकि आप सभी सर्वज्ञ है तथापि भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम से संभ्रांत है।
  • सूत्र ९२ – ऐसे कार्य भगवदनुभव और कैङ्कर्य के अङ्ग है। भगवान् स्वयंकी सम्पूर्ण हर्षता के लिये नियुक्त अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्न जनों को दिव्यानुग्रह से आऴ्वारों मे परिवर्तन करने का स्वप्रयत्न का प्रतिफल ऐसे कार्य होते है।

११६) प्राप्त विषयप्रावण्यम् स्वरूपमागैयाले अवध्यकरमन्रु । सीआज्ञमामित्तनै ।

चूंकि भगवान् के प्रति रति (जो जीव के स्वाभाविक रति विषय वस्तु है) जीव के लिये स्वाभाविक है और तुच्छ नही है।  वास्तव मे यह सराहनीय है।

अनुवादक टीका: भगवान् के प्रति रति और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने की लालसा जीव के लिये स्वाभाविक है। इस तत्त्वको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे सुन्दर ढंग से समझाया है और इन सूत्रों पर श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने अभूतपूर्व व्याख्या लिखा है यथा :

  • सूत्र ५२ – शेषत्वम् दु:खरूपमागवन्रो नात्तिल् काण्गिरदु एन्निल् – ऐसा माना जाता है की इस भौतिक जगत् मे किसी व्यक्ति की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है। श्रीवरवरमुनि स्वामाजी मनुस्मृति के श्लोक ‘सर्वम् परस्वं दु:खम्‘ – (अर्थात् किसी की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है) और ‘सेवा श्व वृत्ति‘ (अर्थात् सेवा श्वान की वृत्ति है अत: त्याज्य है) का उदाहरण से समझाते है की शेषत्व दु:ख पूरित है ।
  •  सूत्र ५३ – अन्द नियमम् इल्लै; उगन्द विषयत्तुक्कु शेषमायिरुक्कुम् इरुप्पु सुखमागक्काणगैयाले – सेवा वृत्ति दु:ख पूरित है यह असत्य है। आत्मीय जनों का भृत्य बनना सदैव सुखदायक और आनन्दप्रद है।
  •  सूत्र ५४ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। प्रणव मे अ-कार वाच्य शब्द भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के निधित्व का प्रतीक है। हमारा (जीवों) का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है और उनकी सेवा करने का फल सदैव आनन्दप्रद और सुखदायक है।
  •  सूत्र ५५ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। यह पूर्ववर्ति सूत्र मे संशय प्रश्न का उत्तर है।  अगर जीवों का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है तो क्या यह स्वाभाविक है या अस्वाभाविक है। क्या यहां यह कहना उचित होगा की भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के अभाव मे जीव स्वशेषत्व त्याग देगा ? इसका उत्तर यह है -भगवान् का शेष होना जीव का वास्तविक और स्वाभाविक रूप है जैसा शास्त्रों मे निर्देषित है।
  •  सूत्र ५६ –  शेषत्वम् इल्लादपोदु स्वरूपमिल्लै – जब शेषत्व नही है तो जीवात्मा स्वस्स्वरुप को त्याग देता है।

११७) जीवपरङ्गळ् इरुवरुक्कुम् अपहतपाप्मत्वादिगळ् उण्डायिरुक्कच्चेय्तेयुम् जीवात्मावुक्कु हेयमुण्डाय् भगवदनुग्रहत्ताले कऴियुम् परमात्मा हेय सम्सारग्गनर्हनाये इरुक्कुम्

भगवान् स्वत: विशुद्ध और निष्कलंक है

अपहतपाप्मा गुण से शुरूवात होकर जीवात्मा और परमात्मा दोनों मे आठ गुण समान है। यह गुण जीवात्मा मे तभी प्रकट होते है जब जीवात्मा देह को त्यागकर भगवान् की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। इसे स्वरूपाविर्भाव कहते है। भगवान् का कोई भौतिक शरीर नही है जो उनके कल्याण गुणों को गुप्त रखता है अर्थात् भगवान् का स्वरूप विशुद्ध और पारलौलिक है। आठ समान गुण है –

  • अपहतपाप्मत्वम् –  अपराधों और दोषों से असम्बन्धित या मुक्ति
  • विरजत्वम् –  वृद्धावस्था से मुक्ति
  • विमृत्यत्वम् – मृत्यु से मुक्ति
  • विशोकत्वम् – शोक से मुक्ति
  • विजिगत्सत्तवम् – क्षुधा से मुक्ति
  • अपिबासत्वम् – पिपासा से मुक्ति
  • सत्यकामत्वम् – दिव्य गुण जो रसास्वादनीय है
  • सत्यसङ्कल्पत्वम् –  स्वसङ्कल्पों को पूरा करने की क्षमता

अनुवादक टीका : जीवात्मा स्वाभाविक रूपसे विशु्द्ध और सत्त्वगुणों से सम्पन्न है। भौतिक जगत् मे कर्मसे बन्धित जीवोंका ज्ञान और आनन्द प्रतिबन्धित होता है। भगवान् की कृपासे उन जीवोंका उद्धार होता है अर्थात् कर्म के बन्धन से मुक्त होता है तो मुक्तात्मा कहलाते है और अन्ततोगत्वा परमपद को पहुँचते है। उस समय, मुक्तात्मा सम्पूर्ण ज्ञान, आनन्द और भगवान् की कृपासे प्राप्त आठ सत्त्व गुणों को भली-भाँती समझता है।

भगवान् कदापि कर्म से बन्धित नही होता है। वास्तविकता मे, जीवोद्धार हेतु भगवान् इस भौतिक जगत् मे निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है। अत एव ऋगवेद कहता है – ‘ स उ श्रेयान् भवति जायमान: ‘ – अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् के प्राकट्य से भगवान् स्वयं  प्रशंनीय हो जाते है। जब भगवान् परमपद से भौतिक जगत् मे प्रगट होते है तो वह अपने सत्त्वगुणों को यथारूप और दिव्य पारलौलिक शरीर सहित पधारते है। उनका शरीर जीवात्माओं के शरीर से भिन्न है। इस विषय को अति उत्तम से श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ – ‘ अदियम् शोदि उरुवै अङ्गु वैत्तु इङ्गुप् पिरन्दु ‘ पासुर मे समझाते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस पासुर मे यह कहते है की परमपदमे भगवान् (जो नित्य है) का जो दिव्य मंगल आकर्षक स्वरूप द्रष्टव्य है वही स्वरूप इस भौतिक जगत् मे प्रगट होता है।

११८) नीर्मैक्केल्लैयान तिरुमलै अाश्रयणीयस्थलम् ; मेन्मैक्केल्लैयान परमपदमनुभवस्थानम्

नीर्मै – सरलता, सौलभ्यता – अर्थात् सरलता से कोई भी भगवान् की सन्निकटता (का सान्निध्य) प्राप्त कर सकते है। ऐसी सरलता केवल तिरुमला (श्रीनिवास भगवान्) मे दृश्यमान है। परत्व की पराकाष्ठा परमपद मे दृश्यमान है जहां जीव भगवान् के गुणों का नित्य रसास्वादन करता है।

अनुवादक टीका : श्रीनिवास भगवान् सरलता और सौलभ्यता के प्रतीक है। तिरुमऴिशै आऴ्वार नान्मुगन् तिरुवन्दादि ४५ पासुर मे कहते है की श्रीनिवास भगवान् नित्य सूरियों और संसारियों के लिये समान है। उत्तरवर्ति पासुर मे तिरुमऴिशै आऴ्वार कहते है की तिरुमला मे जन्तु (जानवर) भी श्रीनिवास भगवान् की सौलभ्यता का लाभ उठाते है। कुलशेखराऴ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि ४.५ – अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडन्तियन्गुम्  पासुर मे कहते है सभी प्रकार के जीव तिरुमला मे रहकर तिरुमला के अधिपति श्रीनिवास भगवान् की सेवा और वन्दना करते है। पूर्वाचार्य आगे कहते है यह जीव त्रिश्रेणी के होते है – १) अनन्य प्रयोजनपरर जीव – अन्याभिलाषा रहित अनन्य भक्त जिन्हें अडियार् कहते है। २) प्रयोजनान्तरपरर जीव व वानवर् — वह सारे देव जो साम्सारिक सुखों की अभिलाषा रखते है। ३) अन्यशेषपरर व अरम्बै – रम्भा, ऊर्वशी इत्यादि जो अन्य देवों की सेवा करते है।

परमपद आनन्दप्रद और हर्षमय है। वहां आनन्द की कोई सीमा नही होती है। वहां भगवान् ही पूर्ण केन्द्रबिन्दु है और भगवान् का परत्त्व पूर्णतया दृष्टिगोचर है।

119) स्वरूपानुरूपमान प्राप्यानुसन्धानम् पण्णिनाल् पोय्प्पुक्कल्लन्दु निर्क वोण्णादु

जीवात्मा भगवान् के प्रति स्वदासत्व तत्त्व को समझकर तथा (स्वस्वरूपानुरूप ज्ञान के फलसे प्राप्त) स्वस्वरूपानुरूप कैङ्कर्य की अभिलाषा, का नित्यानुसन्धान करते रहने से, वह (जीवात्मा) अवश्य भगवद्धाम को पहुँचता है।

अनुवादक टीका : श्रीशठकोप स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ३.३ पासुर ‘ओऴिविल् कालम्’ मे कैङ्कर्य प्राप्तिकी अत्यन्त इच्छा को व्यक्त करते है। भगवान् की निर्हेतुक कृपासे जीवके वास्तविक स्वरूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है इस सिद्धतत्त्वको समझकर श्रीशठकोप स्वामीजी स्वरुपानुरूप कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना ३.३ पासुर मे करते है। इस पासुर मे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की दोषरहित वह भगवान् की सेवा हर अवस्था, हर समय, हर रूप और भगवान् की सन्निकटता मे सेवा करते है। हमारे पूर्वाचार्य कहते है हम प्रपन्नजनों को सदैव कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना भगवान् से करते रहना चाहिए जो भगवान् को आनन्ददायक है।द्वयमहामन्त्र जाप का प्रतिफल और ध्येय (लक्ष्य) यही तो है। द्वयमहामन्त्र के दो खण्ड (भाग) है – प्रथम भाग मे हम पहले श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से भगवान् के दिव्य चरणों को उपाय मानते है। दूसरे भाग मे अन्याभिलाषा रहित केवल दिव्य दम्पति के परमसुख के लिये दिव्य दम्पति के प्रति हम विशुद्ध सेवा की प्रार्थना करते है। एरुम्बियप्पा स्वामीजी, पूर्वदिनचर्या स्तोत्र मे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या का सुन्दर वर्णन लिपिबद्ध किये है। इस स्तोत्र मे, एरुम्बियप्पा स्वामीजी कहते है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अधर सदा द्वयमहामन्त्रका जाप करते है और उनका मन सदा द्वयमहामन्त्र के अर्थांका (अर्थात् तिरुवाय्मोऴि का) अनुसन्धान करता है। इस प्रकिया से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को दिव्यानुभूति होती है और उनके दिव्य शरीर मे अनेकानेक रूपान्तरण जैसे रौंगटे खडे होना इत्यादि द्रष्टव्य है।


१२०) नम् मुदलिगळ् गुरुपरम्परै मुन्नाग द्वयानुसन्धानम् पण्णुगिरदु

गुरु परम्परा

द्वयमहामन्त्र (मन्त्ररत्न – मन्त्रों मे रत्न मन्त्र) का विषय – श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् – जीवों का एकमात्र शरण

 

अनुवादक टीका : हम सभी इस विषय से परिचित है की हमारे पूर्वाचार्य सदा द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करते थे। इससे यह बात और भी सुस्पष्ट होती है की द्वयमहामन्त्र का उच्चारण व जाप स्वतंत्र भाव से कदापि नही किया जा सकता है अर्थात् गुरुपरम्परा का अनुसन्धान किये बिना द्वयमहामन्त्र का उच्चारण करना वर्जित है। जीव कदापि द्वयमहामन्त्र के विषय अर्थात् श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्वतंत्र भाव से उनकी शरण नही लेता परन्तु केवल गुरुपरम्परा के माध्यम से ही उभय का शरण लेता है। अत एव हमारे पूर्वाचार्य सदैव द्वयमहामन्त्र जाप के पहले सर्वप्रथम गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करते थे।

अस्मद्गुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य )  
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य के आचार्य – परमाचार्य )
अस्मद् सर्व गुरुभ्यो नम:  (सभी पूर्वाचार्य और वर्तमानाचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुश दासाय नम: (श्रीपेरियनम्बि – श्रीपराङ्कुशदास स्वामीजी)
श्रीमद्यामुनमुनये नम: (आळवन्दार – श्रीयामुनमुनि स्वामीजी)
श्री राम मिश्राय नम: (मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (उय्यकोण्डार् – श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन् नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनिगळ् – श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (नम्माऴ्वार – श्रीशठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वकसेनाय नम: (सेनै मुदलियार् – श्रीविष्वकसेन)
श्रियै नम: (पेरिय पिराट्टि – श्रीमहालक्ष्मी)
श्रीधराय नम: (पेरिय पेरुमाळ् – श्रीरङ्गनाथ भगवान्)

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उपरोक्त विषय का विवेचन श्रीवचनभूषण २७४ सूत्र मे अती सुन्दर ढंग से करते है। वह कहते है – जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – प्रत्येक प्रपन्न को नित्य गुरुपरम्परा सहित द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिए।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-12.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३७)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – २

 श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीपेरुमबदुर – वह जिन्होंने हमारे सिद्धान्त का प्रचार सही रीति से किया

हम पिछले विषय को जारी रखेंगे। अधिकत्तर विषय में ज्ञान कि आवश्यकता है जो शास्त्र के सही अध्ययन से प्राप्त कर सकते हैं। सम्पूर्ण और गहरी समझ के लिये इन सिद्धान्तों को आचार्य और विद्वानों के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।

  • सामानाधिकरण्यम (जो एक विषेय/वस्तु को अनेकों विशेषणों/सहजगुणों से समझाता है) के अनुसार विशेषणों की उपेक्षा करना और सिर्फ अंतर्निहित तत्त्वों को मानना बाधा है। शुक्ल पत अर्थात सफेदवस्त्र। यहाँ पदार्थ अर्थात वस्त्र है। सफेदी जिसे वस्त्र से अलग नहीं किया जा सके ऐसी एक विशेषता है। ऐसी अभिन्न विशेषताओं को विशेषणम् कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सामानाधिकरण्यम को “बिन्न प्रवृत्ति निमित्तानाम शब्दानाम एकस्मिं अर्थे वृत्ति:” ऐसे परिभाषित किया जाता है – ऐसे वस्तु कि पहचान करना जिसके अनेक शब्द हो (विशेषता/अर्थ)। उदाहरण के लिये सफेद वस्त्र के विषय में सफेदी और वस्त्र दोनों वस्त्र की विशेषता है। इसलिये किसी एक पदार्थ को अनेक पहलूओं की ओर अंकित करना ही सामानाधिकरण्यम है। यह समझने के लिये एक मुख्य तत्त्व है। यह हमारे विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के लिये एक मुख्य तत्त्व है। ब्रह्म एक विशेष्य (पदार्थ) है और वही आधार (सहारा/नीव) है। चित्त और अचित्त यह विशेषण है और अधेय हैं। पदार्थ और विशेषताएं दोनों अभिन्न हैं। यहाँ कुछ सिद्धान्त चित्त और अचित्त को र्निलक्ष्य करते हैं और केवल ब्रह्म पर हीं केन्द्रीत होते हैं। पर यह सही नहीं है। श्रीरामानुज स्वामीजी वेदार्थ संग्रह में इन सिद्धान्तों को बड़ी सुन्दरता से विस्तार से व्याख्या किये है। इसे पूर्ण समझने के लिये आचार्य के कालक्षेप के जरिये सुनना चाहिये।
  • यह न समझना कि एक मात्र ब्रह्म हीं (विशेषताओं के साथ) सिर्फ ब्रह्मा के अनूठे लक्षणों को दर्शाता हैं (ब्रह्म का अर्थ – आत्मा और पदार्थ अमान्य/अवास्तविक नहीं बनाना) यह बाधा है। एक विशेषण विशिष्ट ऐक्यार्त्ता परम – एक पदार्थ जिसकी विशेषताओं से वह जुड़ा हो। श्रृति कहती है “स  ब्रह्मा, शशिव: सेंध्र:”। सा का अर्थ – “वह” – “जो एक श्रेष्ठ पुरुष है”। वह ब्रह्मा है, वह शिव है, वह इन्द्र है। यहाँ इसका अर्थ ब्रह्म, शिव, इन्द्र शरीर विशेषण है और श्रीमन्नारायण शरीर विशेष्य है। अनुवादक टिप्पणी: वेदों में तीन भाग पहचाने गये हैं – भेद श्रृति (वह जो भिन्न तत्त्वों के विषय में बताते हैं), अभेद श्रृति (वह जो एक मात्र ब्रह्म के बारे में बताते हैं) और घटक श्रृति (वह जो ब्रह्म और चित्त/अचित्त आदि विशेषताओं के सम्बन्ध विषय में बताते हैं)। अन्य सिद्धान्त भेद या अभेद श्रृति में केन्द्रित होते है और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त भेद और अभेद श्रृति को घटक श्रृति के साथ मिलाकर इनमें समंजस स्थापित करते है। जहाँ एक मात्र ब्रह्म के लिये ज़ोर दिया जाता है उसे घटक श्रृति के सन्दर्भ में समझना चाहिये जो शरीर/शरीरी के सम्बन्ध के बारे में और विशेषण/विशेष्य के सम्बन्ध चित्त/अचित्त व ब्रह्म के बारे में ज़ोर देकर बताते हैं। इन दोनों विषयों में मुख्यत: मायावाद (वह सिद्धान्त जो सिर्फ ब्रह्म को स्वीकार करता हैं और अन्य सभी को मायावी मानते हैं) को अस्वीकार करते हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी इसे श्रीसहस्रगीति के – “कूडिट्रागिल् नल्लूरैप्पू” पाशुर में समझाते हैं। सभी व्याख्यानों में इसी तरह के सिद्धान्तों को समझाया गया है। जीवात्मा ब्रह्म के समान हैं ऐसा कोई राह नहीं हैं। क्योंकि एक वस्तु दूसरे के लिये नहीं होता है – जीवात्मा जीवात्मा ही रहेगा और परमात्मा परमात्मा ही रहेगा।
  • यह न जानना कि विविधता जो यह स्थापित करें कि भगवान से स्वतन्त्र कुछ नहीं है को नकारना बाधा है। नानात्व विषेधम – विविधाओं को नामंज़ूर करना। “एकमेव अधविधियम, नेहनानास्ति किञ्चन:” श्रृति में मौजूद है। केवल एक तत्त्व है – दूसरा कोई नहीं है। यहाँ विविधता को नकारा गया है। परन्तु यह नकारना केवल उन तत्त्वों के लिये हैं जो ब्रह्म से स्वतन्त्र है। क्योंकि ब्रह्म हीं सबका अन्तरात्मा है और सबकुछ ब्रह्म में व्याप्त है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो ब्रह्म में व्याप्त न हो।
  • यह न जानना कि सम्हार के समय चित्त और अचित्त को नकारना उनकी सूक्ष्म उपस्थिती को दर्शाता है बाधा है। ब्रह्माण्ड से संबन्धित सामान्य कार्यों में विनाश एक तीसरा पहलू है। सृष्टि (निर्माण करना), स्थिति (भरण पोषण) और संहार (विनाश) ये तीन पहलू हैं। संहार के समय चित्त और अचित्त दोनों पूर्ण नष्ट नहीं होते हैं। वे शाश्वत तत्त्व हैं। वे अपनी विशाल अवस्था से सूक्ष्म रूप में परिवर्तित होते हैं और ब्रह्म उन्हें पा लेते हैं। सृष्टि के समय भगवान पुन: उन्हें अपना विशाल रूप प्रदान करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस तत्त्व को श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ६९वें पाशुर में अच्छी तरह समझाते है। “चिन्तैयिनोडु करणंगल् यावुम् शिदैन्दु मुन्नाल अन्दमुत्तालन्ददु कण्डु” – प्रलयकाल से पहले जब मन, दूसरी इंद्रियाँ और शरीर स्थूल रूप छोड़कर उपसंहृत हुए थे और आत्मा अचेतन सा रह गया। उस स्थिति में चित्त जो प्राकृतिक रूप से सूक्ष्म है और अचित्त जिसने सूक्ष्म रूप धारण किया है वह अविभेध्य हो जाते हैं। फिर भी उनका अस्तित्व है। तीनों तत्त्व – चित्त, अचित्त और ईश्वर यह सभी बाहरी हैं। चित्त को स्वभाव विकारम है (लक्षण को बदलने का ज्ञान जैसे फैलना और सिकुड़ना अवस्था)। अचित्त में स्वरूप विकारम है (स्वयं के स्वभाव को बदलना जैसे विशाल से सूक्ष्म और विशालता में भिन्न भिन्न स्वरूप, आदि)। ईश्वर जो सभी विकारों के रहित है।
  • यह न समझना कि शोधक वाक्य में नकारने के गुण अशुभ गुणों को नकारने की ओर पृवत करते हैं – बाधा है। कुछ वाक्य हैं जो ब्रह्म को निर्गुण बताते हैं। इनका अर्थ है ब्रह्म अशुद्ध गुणों के रहित है। क्योंकि ब्रह्म प्रारम्भ से ही प्रमाणित है कि “अखिल हेय प्रतिपत कल्याण गुणेक तान” – वह सभी अभद्र गुणो के रहित हैं और अच्छे गुणों का भण्डार हैं। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्म का दो प्रकार से वर्णन किया गया है – कारण वाक्य (वह वाक्य जो ब्रह्म हीं सभी कार्यों के कारण है चर्चा करता हैं) और शोधक वाक्य (वह वाक्य जो ब्रह्म के सभी विशेष गुणों कि चर्चा करता हैं)। “यतो वा इमाणी भूतानि जयते, येन जाथाणी जीवन्ति, यत्प्रयन्ति अभीसमविचन्ति, तत विजीजन्यासस्व, तत ब्रह्मेति” कारण वाक्य का एक उदाहरण है। यह समझाता है कि – वह जहाँ से इस ब्रह्माण्ड और जीवों का उत्पन्न हुआ, जिसके द्वारा पूरे ब्रह्माण्ड का निर्वाहण होता है, विनाश के समय जिसमें वह मिल जाता है, जिसे प्राणी मोक्ष के समय प्राप्त करता है, उसे समझे और ब्रह्म को समझाये। अत: जगत कारणत्व (ब्रह्माण्ड का कारण होना), मुमुक्षु उपास्यत्व (मोक्ष पाने के इच्छुक के लिये पूजा करने का बहाना) और मोक्ष प्रदत्व (जीवात्मा को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम) यह श्रेष्ठ होने के मुख्य गुण पहचाने गये हैं। “सत्यम ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म” यह शोधक वाक्य का उदाहरण हैं। यह ब्रह्म नित्य, सर्वज्ञ और अनन्त (समय, स्थान और पदार्थ से) हैं को समझाता है। अत: शोधक वाक्य को अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • जो वाक्य भगवान के पवित्र गुणों को दर्शाते हैं उन्हें अनदेखा करना बाधा है। जैसे समझाया गया है “य:  सत्यकाम: सत्य संकल्प:” – वह पवित्र गुणोंवाला है। उन्हें अनदेखा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति का प्रारम्भ “उयरवरु उयर नलं उदैयवन यवन” से करते है – वह जो पूरी तरह पवित्र गुणोंवाला है। श्रीकुरेश स्वामीजी अपने शिष्य पिल्लै आल्वान को समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी पवित्र गुणों की घोषणा से प्रारम्भ करते हैं और इससे वे कुदृष्टि की जीवन रेखा पर सीधे प्रहार करते हैं (कुदृष्टि – जो वेदों को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं) जो निरन्तर कहते हैं कि ब्रह्म गुणों के रहित है।
  • यह न समझना कि ब्रह्म के रूप के लिये असहमती बताना जो यह दर्शाता है कि ब्रह्म अपने पूर्व कर्मों से कोई रूप धारण नहीं करता (बजाय इसके कि ब्रह्म अपनी इच्छा से रूप धारण करता है) – यह बाधा है। “नाथे रूपम नचाकार:” – उनका कोई रूप, कद, आदि नहीं है, जो सांसारिक शरीर पर केन्द्रित है जो उसके कर्मों द्वारा प्राप्त होता है। हमें यह समझना चाहिये कि भगवान अपने इच्छा से विभिन्न रंग बिरंगे रूप को धारण करते हैं।
  • भगवान के रूप के वाख्याओं को अनदेखा करना बाधा है। हमें यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि परमपुरुष का रूप सबसे अधिक सुन्दर हैं। चांदोज्ञ उपनिषद में एक प्रसिद्ध पद है “अंतराधीत्ये हिरणमय: पुरुषोदृश्यते – तस्ययता कप्यासम पुण्डरीकमेवमाक्षिणी” – सूर्य गृह के मध्य में एक व्यक्ति जो तेजस्वी सूर्य के समान चमकता है नजर आता हैं। उसके दोनों नेत्र कमल पुष्प को संभोधित करते हैं जो सूर्य की तरह यौवन हैं। ऐसे विषयों को न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: ऋग वेद में घोषणा किया गया हैं कि “स यु श्रेयां भवति जायमान:” – भगवान जब इस संसार में अवतार लेते है तब वें अधिक सराहनीय हो जाते हैं। भगवद्गीता के ४थे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतार का रहस्य (अपने अवतार की गोपनियता को विस्तृत रूप से बताना) के विषय में बताते हैं। ५वें श्लोक में वें अर्जुन को समझाते हैं कि “मैं और तुम हम दोनों कई बार जन्म ले चुके हैं। हालाँकि तुम्हें अपने पूर्व जन्मों की कोई जानकारी नहीं है लेकिन मैं तो अपने पूर्व जन्मों के विषय में पूर्ण जानता हूँ”। अगले श्लोक में वें कहते है “हालाँकि मैं अजात हूँ, परिवर्तन/विनाश के लिये मैं उत्तरदायी नहीं हूँ और सबका स्वामी हूँ, अपने संकल्प से बारम्बार जन्म लेता हूँ”। अगले श्लोक में वें कहते हैं कि “जब भी धर्म का नाश होता है और अधर्म बढ़ता हैं तब उस समय मैं स्वयं अवतार लेता हूँ”। अगले श्लोक में वें घोषणा करते हैं कि “समय समय पर मैं अपने विभिन्न रूपों में लोगों की रक्षा के लिये, पाखंडियों के सर्वनाश के लिये और धर्म की स्थापना के लिये अवतार लेता हूँ”। अंत में ९वें श्लोक में अर्जुन से कहते है “जो मेरे दिव्य जन्मों का ध्यान करते हैं और मेरे दिव्य कार्यों को सही रूप में समझते हैं वे इस संसार से इस जन्म के अन्त में मुक्त होकर मुझे प्राप्त करते हैं”। इससे हम समझ सकते हैं कि ब्रह्म के कई दिव्य रूप हैं जो किसी कर्म के द्वारा बंधा हुआ नहीं है।
  • यह न जानना कि ब्रह्म जिन्हें उभय लिंग विशिष्टान (वह जिसके दो अपूर्व पहचान हो), विलक्षण विग्रह विशिष्टान (वह जिसका अपूर्व रूप हैं), श्रिय:पति (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी), अकार वाच्यन (वह जो “अ” से जाने जाते हैं) वह सर्वश्रेष्ठ भगवान है (सभी के उपर) ऐसे पहचाना जाता हैं वह बाधा है। अकार वाच्यन – प्रणवम (ॐ) सभी वेदों का सार है। वह “अ”, “उ” और “म” कार का मिश्रण है। इस अकार में “अ” भगवान श्रीमन्नारायण को सम्भोधित करता है जो सर्वश्रेष्ठ है। सर्वस्माथपरन – वह न कोई इनसे उपर यह उच्च है। उभय लिंग विशिष्टान – वह जिसके २ विशिष्ट पहचान है अकिल हेय प्राथ्यनिकन (वह जो सभी अपवित्र गुणों के विरुद्ध है) और कल्याण गुण पूर्णन (वह जो पवित्र गुणों से भरा हुआ है)। वह सबसे अधिक पवित्र है और सभी को पवित्र करने कि उसमे योग्यता हैं। उसमें दोनों परत्वम् और सौलभ्यम् गुण हैं। अकारम कारणत्वम् (सबका कारण होना) और रक्षकत्वम् (सभी का रक्षक) को अधिक महत्व देता है।
  • यह न जानना कि भगवान श्रीमन्नारायण जगतकारणन हैं (सबके कारण) बाधा है। चांदोज्ञ उपनिषद में समझाया गया हैं कि “सदैव सौम्य! इधमग्र आसीत, एकमेव, अधविधियम”। यही ब्रह्म को सुभाल उपनिषद “एकोहवै नारायण आसित, नब्रह्मा, नेसान:” इस तरह समझाया गया हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान नारायण ही सर्वोच्च कारण है। अनुवादक टिप्पणी: सर्व प्रथम चांदोज्ञ उपनिषद में उद्धालकर अपने बच्चे को समझाते हैं कि श्रुष्टि के पहिले सत ही था और कोई नहीं था। यह ब्रह्म को छोड़ ३ अन्य महत्त्वपूर्ण असहमतियों (सदेव, एकमैव, अदिद्वियम) का वर्णन इस तरह है ३ अलग अलग कारण जैसे कि उपाधान कारण (सांसारिक कारण), निमित्त कारण (सक्षम कारण), सहकारिका कारण (सहयोगी कारण)। उदाहरण के लिये मटकी बनाने के लिये मिट्टी उपाधान कारण है, कुम्हार (और उसकी मटकी बनाने की इच्छा) निमित्त कारण है और लकड़ी, चाक, आदि सहकारिका कारण हैं। सृष्टि के लिये चित्त और अचित्त उपाधान  है – यह ब्रह्म के शरीर हैं। ब्रह्म का संकल्प निमित्त है। ब्रह्म का ज्ञान, शक्ति, आदि सहकारिका हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के पाशुर में भी इसी सिद्धान्त को समझाया है कि “वेर मुधलाय वित्ताय्” – वेर (जड़) सहकारी है, मुधल निमित्त है और विथ्थू (बीज) हैं। यहाँ स्वयं भगवान इन ३ कारणों के कारण पहचाने गये हैं। सुभाल उपनिषद में यहीं ब्रह्म नारायण के रूप में पहचाने गये है। वहाँ समझाया गया है कि केवल नारायण का हीं अस्तित्व है और ब्रह्माजी, शिवजी, आदि कोई नहीं हैं। इससे हम यह समझ सकते हैं कि भगवान नायारण हीं सभीके सर्वश्रेष्ठ कारण हैं।
  • वह सिद्धान्त जो बताते हैं कि प्रधानम (माया), परमाणु (अणु) आदिकालीन सिद्धान्त हैं के प्रति भ्रांतिमान होना बाधा है। प्रधानम प्रकृति है अर्थात अचित्त है। मिट्टी स्वयं मटकी नहीं बन सकती है। माया स्वतन्त्र नहीं है और आदिकालीन कारण नहीं है। परमाणु जो एक कारण है उसे कणाधा ने प्रस्तुत किया है। इसे भी स्वीकार नहीं कर सकते है। सर्वेश्वर श्रीमन्नारायण जो इस ब्रह्माण्ड में सर्व व्यापक अन्तरयामि है वही एक मात्र कारण है जिसे “वेर मुधलाय वित्ताय्” में समझाया गया है। इसमे कोई शंखा नहीं होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने तत्त्वत्रय के १५३ से १५६वें सूत्र में प्रधानम और परमाणु एक कारण हैं के विचार को अस्वीकार करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इन सूत्रों के लिये एक बहुत ही सुन्दर व्याख्या देते है। परमाणु (अणु) यह कारण है इसे बौद्ध, जैन, वैसेशिका आदियों ने प्रतिपादित किया है। प्रधानम (प्रकृति – अचित्त – माया) यह कारण हैं इन्हे कपिल मुनि ने प्रस्तुत किया है। क्योंकि यह सिद्धान्त श्रृतिके विपरीत हैं और तर्क से परे हैं इसलिये अमान्य हैं।
  • ब्रह्म, शिवजी, आदि (जिनको स्वयं भगवान नारायण ने जन्म दिया है) को परत्व (सर्वश्रेष्ठ), कारणत्व (सभी का कारण) मानना बाधा है। श्रीभक्तिसार स्वामीजी ने नान्मुगन तिरुवन्दादि के पहिले पाशुर में समझाते है “नान्मुगनै नारायणन् पडैत्तान् नान्मुगनुम तान् मुगमायच्चङ्करनै पडैत्तान” – भगवान नारायण ने ब्रह्मा की रचना की है, ब्रह्माजी ने शिवजी की रचना की है। जैसे यहाँ देखा गया है ब्रह्म, रुद्र, आदि देवताओं को भगवान श्रीमन्नारायण ने बनाया है। उनके सर्वोच्चता पर कोई प्रश्न नहीं कर सकता है और न ही वे कारण बन सकते हैं।
  • ब्रह्माजी, विष्णु और शिवजी को बराबर मानना बाधा है। ब्रह्माजी, विष्णु और शिवजी तीनों त्रिमूर्ति ऐसे प्रसिद्ध है। जैसे श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवन्दादि के १५वें पाशुर में समझाते हैं कि “मुदल आवार मूवरे अम् मूवर् उल्लुम् मुदल आवान् मूरि नीर् वण्णन्” – सभी देवताओं को हटाने पर तीन मुख्य देवता होते है। इनमे जिनके शरीर का रंग समुद्र के जल के समान नील वर्ण है वही सर्वश्रेष्ठ हैं। जैसे इस पाशुर में समझाया गया है ब्रह्म (जो निर्माण के कारण है), विष्णु (जिनका भरण पोषण का कार्य है) और शिवजी (जिनका विनाश का कार्य है) तीनों में विष्णु मुख्य भगवान हैं। तीनों बराबर और एक समान नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर के व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इन तीनों के विषय पर केन्द्रित कर दर्शाते हैं। वें कहते हैं कि आल्वार भी इन तीनों देवता के विषय में कहते है ताकि दो को अस्वीकार कर भगवान विष्णु के श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में अलग अलग प्रकार के अपचार को समझाते हैं। सूत्र ३०३ में भगवद अपचार के विषय में समझते समय वे प्रारम्भ करते हैं कि देवतान्तर को भगवान श्रीमन्नारायण के समान मानना प्रथम अपचार है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में भी कहते है “ओत्तार् मिक्कारै इलैयाय मा माया” – सर्वोच्च भगवान जिनके न तो कोई बराबर है और न ही उनसे कोई बड़ा है। श्वेतस्थर उपनिषद में भी एक वाक्य ऐसा ही है “न तत समस्च अभ्यधिकस्च दृश्यते”।
  • सर्वरक्षक (भगवान श्रीमन्नारायण) को छोड़ अन्य को रक्षक मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण जो अकार वाच्यन (“अ” का अर्थ) है सभी के रक्षक हैं। वें सभी को आर्शिवाद देते हैं। देवतान्तरों में ऐसी महानता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने विशेषकर “प्रपन्न परित्राणम्” नामक रहस्य ग्रन्थ का लेख किया है। इस ग्रन्थ में उन्होंने स्थापित किया हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं रक्षक है और दूसरा कोई हमारी रक्षा नहीं कर सकते हैं। मुमुक्षुप्पड़ी के ३६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी रक्षकम का अर्थ समझाते हैं। वें समझाते हैं कि रक्षकम का अर्थ बाधाओं का निष्कासन और इच्छाओं की पूर्ति करना। अगले सूत्र में वें समझाते हैं कि बाधाएं और इच्छाएं जीवात्मा के अनुसार बदलती रहती है। संसारीयों के लिये बीमारिया, आदि बाधाएं हैं और अच्छा खाना, सांसारिक सुख, आदि लक्ष्य हैं। मुमुक्षु जिसे मोक्ष कि इच्छा हो उसके इस संसार में रहना हीं बाधा है और परमपद पहूंचकर भगवान का नित्य कैंकर्य करना हीं इच्छा हैं। मुमुक्षु और नित्य सुरियों के लिये कैंकर्य में रुकावट बाधा है और कैंकर्य में वृद्धि इच्छा है। आगे ३९वें सूत्र में समझाते हैं कि “मैंने पहले ही प्रपन्न परित्राणम् में समझा दिया है कि श्रीमन्नारायण के सिवाय अन्य कोई मुक्तिदाता नहीं है”। अत: जो भी बाधाएं हैं वे केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही दूर कर सकते हैं ओर जो भी इच्छाएं हैं केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही पूर्ण कर सकते हैं। जब कभी मंद बुद्धिवाले देवताओं के पास अपनी इच्छा पूर्ति के लिये जाते हैं तब भगवान ही उन इच्छा को पूर्ण करते हैं जो उन देवताओं के अन्तरयामि में विराजमान हैं।
  • भगवान श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य को अपना स्वामी मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण जो श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य पति हैं वे ही दोनों नित्य और लीला विभूति के स्वामी है। शेषी का अर्थ स्वामी, मालिक है। अन्य को ईश्वर मानना गलत है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीभक्तिसार स्वामीजी के नान्मुगन तिरुवन्दादि के ५३वें पाशुर में देख सकते है कि “तिरुविल्लात देवरै तेरेल्मिन् देवु” – मैं ऐसे देवताओं से सम्बन्ध नहीं रखूँगा जो श्रीमहालक्ष्मीजी से सम्बन्ध नहीं रखते और उन्हें देवता मानते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी में आगे भगवान के रक्षत्वम को समझाते है कि दूसरों कि रक्षा करते समय भगवान हमेशा श्रीमहालक्ष्मीजी के संग है।
  • यह मानना कि परब्रह्म श्रीमन्नारायण को छोड़ अन्य है जिनकी पूजा करनी है, यह बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष कि इच्छा करता हैं (मुक्ति – परमपदधाम में नित्य कैंकर्य)। मोक्ष केवल भगवान श्रीमन्नारायण हीं प्रदान कर सकते हैं। अन्य कोई भी यह नहीं कर सकता हैं। अत: इन मुमुक्षु को पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि सिर्फ भगवान श्रीमन्नारायण के हीं ध्यान मे रहें। अनुवादक टिप्पणी: चांदोग्य उपनिषद कहता है “कारणं तु ध्येय:” – सर्वश्रेष्ठ कारण का हमेशा ध्यान करना चाहिये। यह समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यह वाक्य धायन करने के उद्देश को स्थापित करता है लेकिन यह परिभाषित नहीं करता है कि सर्वोच्च कारण कौन है। हम यह देख चुके हैं कि सर्वोच्च कारण भगवान श्रीमन्नारायण हीं हैं। इन दोनों को जोड़ने से सिद्धान्त स्थापित होता हैं – अर्थात सभी को भगवान श्रीमन्नारायण पर हीं ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और भगवान श्रीमन्नारायण हीं कारण हैं। इसलिये हमें निरंतर भगवान श्रीमन्नारायण का ध्यान करना चाहिये। एक ओर मुख्य बात हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण को हीं “मुकुन्द” कहते है क्योंकि वह मोक्ष प्रदान करते हैं।
  • यह न जानना कि भगवान पुरुषोत्तम को छोड़ दूसरा कोई नहीं है जो किसी की इच्छाओं की पूर्ति कर सके – यह बाधा है। “सर्व अभिमत फल प्रधान” – वह जो सभी तरह की इच्छाएं / अपेक्षाओं की पूर्ति कर सके। देवतान्तर केवल सांसारिक आर्शिवाद प्रधान करते हैं। परन्तु केशव जो परम पुरुष हैं मोक्ष सहित सभी आर्शिवाद देते हैं।
  • क्षुद्र देवताओं कि पूजा करना बाधा है। क्षुद्र – छोटे / तुच्छ। अनुवादक टिप्पणी: देवतान्तर जैसे पहले बताया गया है कि केवल सांसारिक आर्शिवाद प्रधान कर सकते हैं। परन्तु प्रपन्नों के लिये मुख्य लक्ष्य भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना और परमपदधाम में भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य कैंकर्य करते हुये निवास करना है। भगवद्गीता के ७वें अध्याय में भगवान समझाते हैं कि अन्य देवताओं के सीमित लक्षण हैं उनके आर्शिवाद भी सीमित है। वे स्पष्ट रूप से देवतान्तरों की पूजा को अस्वीकार करते हैं क्योंकि ऐसी पूजा इस संसार में बारम्बार जन्म मरण के चक्कर में डालते हैं।
  • अल्पकालीन तुच्छ पहलूओं की इच्छा रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पहले बताये गये तथ्य की तरह ही है। प्रपन्नों को चाहिये कि वे अल्पकालीन और तुच्छ पहलूओं में रुचि न रखें और परमपदधाम में भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य कैंकर्य को महत्त्व दें।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/09/virodhi-pariharangal-38.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३६)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – १

पेरिय पेरुमाल (श्रीरंगनाथ भगवान) – प्रथमाचार्य

श्रीशठकोप स्वामीजीश्रीरामानुज स्वामीजीश्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजीश्रीवरवरमुनि स्वामीजी

सिद्धान्तम् का अर्थ प्रमाणित सिद्धान्त। किसी विशेष विषय में गलत समझ/सोच का त्याग कर उसके स्थान पर सही सोच को स्थापित करना ही सिद्धान्त है। हम जो भी सिद्धान्त को प्रस्तुत करते हैं वह वेदानुसार हो, शास्त्रों द्वारा प्रमाणित हो और उस विषय पर विद्वानों द्वारा स्पष्टीकरण किया गया होना चाहिये। हमारे सिद्धान्तो को शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठित प्रमाणों को ही प्रमाण कहते हैं। सभी आस्तिक (विद्वान जो वेदों को ही अन्तिम अधिकारी मानते हैं) वेदों को ही शाश्वत और दोषरहित प्रमाण मानते हैं। भगवान वेद व्यास के अलौकिक शब्द हैं “वेदांत शास्त्रम परम नास्ति न दैवम केशवात परम” (वेदों से बड़ा कोई ग्रन्थ नहीं है और केशव से बड़ा कोई भगवान नहीं हैं)। परम अर्थात श्रेष्ठ जिसके “बराबर या ऊँचा कोई नहीं हैं” को दिखाता है। श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीसहस्रगीति के प्रथम तनियन में समझाया गया है “द्राविड वेद सागरम्” (श्रीसहस्रगीति द्राविड वेदों का सागर है)। आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों को वेदों के समान मानते हैं। इस सिद्धान्त द्वारा जो मुख्य तत्त्व स्थापित किया गया है वह है “नारायण परम ब्रम्ह तत्वम नारायण: पर: … यच्च किंचित जगत यस्मिन ध्रुसयते श्रुयतेपिच, अंतर बहिस च तत सर्वं व्याप्य नारायणा स्तिथ:” (नारायण ही सर्वोच्च ब्रह्म है वे ही सर्वोच्च सिद्धान्त हैं … इस भूमण्डल में हम जो कुछ देखते/सुनते हैं वे ही अन्दर बाहर सब कुछ प्रदर्शित करते हैं)। इसका अर्थ यह हुआ कि नारायण ही प्रत्येक वस्तु के अन्दर अंतर्यामी रूप में निवास करते हैं। वह उन्हें सभी के स्वामी मानकर पकड़ते है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सिद्धान्त का नाम विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है – पूर्ण रूप से वैदिक सिद्धान्त (वेद, वेदान्त, आदि पर आधारित सिद्धान्त)। यह सिद्धान्त नित्य और शाश्वत है। महान ऋषि जैसे श्रीपराशर, श्रीव्यासजी, श्रीबोधायन, श्रीतनक, श्रीध्रमिड, आदि ने सबसे पहले इसका अर्थ सहित प्रचार किया। कुछ समय पश्चात आल्वारों का अवतार हुआ और उन्होंने द्राविड वेद जो वैदिक वेदों का सार ही दर्शाते हैं उनका प्रचार किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने ब्रह्म सूत्र और भगवद्गीता की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने अपने अन्य ग्रन्थ में उपनिषद के मुख्य तत्त्व को समझाया। श्रीश्रृत प्रकाशिकाचार्यजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं को विस्तार पूर्वक समझाया है। आल्वारों के पाशुरों को कई व्याख्या के माध्याम से समझाया गया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिंन्होने आल्वारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों के अर्थों का सविस्तार वर्णन किया है। उनके शिष्य श्रीपेरियवाचान पिल्लै और वडक्कु तिरुविधि पिल्लै ने श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित श्रीसहस्रगीति की व्याख्या के उनके प्रयास में सहयोग प्रदान किया। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने बड़ी सुन्दरता से श्रीसहस्रगीति के सार को अद्भुत रहस्य ग्रन्थों में प्रमाण प्रस्तुत किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन रहस्य ग्रन्थों के विषय में बड़ी सुन्दर ढंग से व्याख्या की है और अपने अद्भुत व्याख्यानों में दिव्य प्रबन्ध, वेदान्तम और रहस्य ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। अत: इस सिद्धान्त को कई विद्वानों के परिवार ने कई पीढ़ियों तक पोषण किया है। इस सिद्धान्त में तीन मुख्य तत्त्व हैं – १) चित्त (असंख्य जीवात्मा), २) अचित (अपार माया) और ईश्वर (स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान)। यहाँ ईश्वर (एकमात्र स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान) और चित्त (चेतन) / अचित (निर्विकार जड़) – ये दोनों में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध हैं। पहला शरीर / शरीर भाव – भगवान सभी जड़ चेतनों की आत्मा में निवास करते हैं (शरीरि अर्थात शारीरिक) इस तरह वे (जड़ चेतन) भगवान के शरीर के अवयव हैं। दूसरा – विशेषण/विशेष भावम – एक विशेष उद्देश्य है जिसके चित और अचित दो सहज गुण हैं। सारांश यह है कि भगवान चित/अचित के साथ एक विशिष्ट तत्त्व है इनके जैसा दूसरा कोई तत्त्व नहीं है। और श्रीमन्नारायण ही सर्वोच्च भगवान हैं यह कई प्रमाणों व शास्त्रों से प्रमाणित हो चुका है। यहाँ तत्त्वों को गहराई से समझाया गया है। इसलिये वेद, वेदान्त आदि का मूलभूत सिद्धान्तों की पूर्व जानकारी होना जरूरी है। यह विस्तृत विभाग है।

  • वैदिक सिद्धान्त के विपरीत के प्रमाणों को मानना बाधा है। वेदों में प्रतिष्ठापित तत्त्वों के विपरीत यदि कोई भी ऐसे सिद्धान्त समझाता है – समझाने वाला चाहे कोई भी हो – ऐसे सिद्धान्तों को नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस पहलू को समझने में एक बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य है। हमें यह समझना चाहिये कि यहाँ शास्त्र और शास्त्र का तात्पर्य है। विद्वान पण्डित अपने पूर्वाचार्य आदि जो शास्त्र व शास्त्र तात्पर्य के सिद्धान्तों को बिना किसी संशोधन के मूल सिद्धान्तों को अर्थ पूर्ण ढंग से समझाते हैं। उदाहरण के लिये शास्त्रों में वर्णाश्रम धर्म (कर्मानुसार समाज का विभाजन) के बारे में बहुत ही ज़ोर देकर समझाया गया है। इसके साथ ही शास्त्रों में भगवद कैंकर्य (भगवान कि गुप्त सेवा) और भागवत धर्म (भागवतों कि सेवा) भी समझाया गया है। यहाँ हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्रों के सार को अच्छी तरह समझकर और दोनों वर्णाश्रम धर्म और भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म को बहुत संतुलित तरीके से समझाया है। उन्होंने दोनों कि विशेषताओं को महत्त्वपूर्ण तरीके से प्रतिष्ठापित किया है फिर भी वर्णाश्रम धर्म से भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म ही उत्तम है। हमारे पूर्वाचार्यों की प्रतिभा को समझने के लिये यह एक अच्छा उदाहरण है।
  • यह न समझना की वेदों में जो भी समझाया गया है वह स्व स्पष्ट नही है चाहे वह प्रत्यक्ष, आदि के विपरीत ही क्यों न हो – बाधा है। सामान्यता प्रमाण अर्थात साक्ष्य। हमारे पूर्वाचार्यों ने ३ प्रमाण को समझाया हैं– प्रत्यक्षम (इंद्रियाँ – दृष्टि, स्पर्श, ध्वनी, सुगन्ध और स्वाद के द्वारा अनुभव करना), अनुमान (हमारे पूर्व ज्ञान के आधार पर – उदाहरण के लिये यदि हम धुआँ देखते हैं तो समझते हैं कि वहाँ अग्नि है – यह हमारे पूर्व में अग्नि और धुवें को एक साथ देखने के आधार पर है), शब्दम् (वेद और उसके सहायक साहित्य जो वेदों के सिद्धान्त को विस्तार से समझाते हैं)। इनमें से वेदों को स्व: प्रमाणित (स्वयं में प्रमाण) – बिना किसी शंका के – सिद्धान्तों को शब्दश: मानना। इसे “अविवादित अधिकारी” ऐसे समझाया जाता है। जिस तरह भगवान के अस्तित्व को मानते है वैसे ही आस्तिक वह जो वेद के अधिकार को पूर्णत: स्वीकार करते है। अनुवादक टिप्पणी: वेद और शास्त्र मुख्यत: जीवात्मा के लिये हैं। उपर समझाये गये ३ तत्त्वों में – भगवान पहले ही सर्वज्ञ हैं (जो सब कुछ जानते हैं) और इसलिये उन्हें वेदों की आवश्यकता नहीं है। अचित (तत्त्व) में ज्ञान का अभाव है और इसलिये वेद उनके लिये उपयोगी नहीं है। परन्तु जीवात्मा के लिये अपने जीवन निर्वाह के लिये वेद ही मार्ग दर्शक है और आध्यात्मिक रूप से उच्चतम उन्नति करना और मूल भूत रूप से मुक्ति (भगवान का नित्य कैंकर्य) पाना। एक माता अपने बच्चे का जीतना ध्यान रखती है उससे १००० गुणा अधिक ध्यान वेद शास्त्र अपने बच्चों (जीवात्मा) का करते हैं। वेदों में जो भी समझाया गया है वह जीवात्मा के आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करने के लिये हैं। अत: कुछ विषय जो अपनी अंतदृष्टि के विपरीत दिखती हो फिर भी हमें वेदों को मानना चाहिये और उसका पूर्णत: पालन करना चाहिये। उदाहरण के लिये शास्त्र कहते हैं कि हमें एकादशी (पूर्णिमा और अमावस्या के ११वें दिन) के दिन अपना पूर्ण ध्यान भगवान पर केन्द्रित करना चाहिये और खाद्य पदार्थ, सांसारिक वस्तुओं, आदि का त्याग करना चाहिये। हमें आश्चर्य होगा कि शास्त्र हमें प्रसाद पाने से क्यों रोक रहा है (यह अनुभव किया गया है कि बहुतों को उपवास रखना बहुत कष्ट देय है) – लेकिन यदि यहाँ हम यह समझेंगे कि शास्त्र हमें उच्च आध्यात्मिकता को विकसित करने का एक मंच प्रदान करने में सहायता करता है तब हम शास्त्र में समझाये गये तत्वों को पूर्णत: मानेंगे और उनका पालन करेंगे।
  • स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि में पूर्ण विश्वास न होना जो वेद और वेदान्त के अर्थ को विस्तृत रूप से समझाते हैं – बाधा है। वेद उप बृहमणम – यह सभी वेदों के तत्त्वों को समझने के लिये सहायक साहित्य हैं। इनमें स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि साहित्य है। वेदों के तत्त्वों को ध्यान में रखते हुये जो साहित्य भण्डार है उसे स्मृति कहते हैं। इतिहास – ऐतिहासिक लेख – श्रीरामायण और महाभारत। पुराणों में विष्णु पुराण, आदि है। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि यह सभी सही प्रमाण है। भगवान स्वयं कहते हैं कि “श्रुतिश स्मृतिर ममैवाज्ञा, आज्ञाच्चेती मम द्रोही, मद भक्तोपी न वैष्णव:” (श्रृति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती हैं। चाहे वह मेरा भक्त ही क्यों न हो वह वैष्णव नहीं माना जायेगा)। श्रृति (वेद), स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि सभी मिलकर इन्हें शास्त्र कहते हैं। भगवान कृष्ण भगवद्गीता के १६.२४ में यह घोषणा करते हैं कि “तस्माच्छास्त्रां प्रमाणं ते” अर्थात शास्त्रों को पूर्णत: समझकर उन्हे प्रमाण की तरह मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र का प्रारम्भ “वेदार्थम अरुधियिडुवदु स्मृति इतिहास पुराणङ्गलाले” ही ऐसे करते है – इसका अर्थ है स्मृति, इतिहास और पुराण वेदों को ही समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वे कहते हैं कि प्रमाथ (आचार्य) प्रमाणों के माध्यम से प्रमेय (लक्ष्य) निर्धारित करते हैं। वे बहुत हीं सुन्दर तरिके से स्थापित करते हैं कि वेद ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। इसलिये हमें पहले यह समझना आवश्यक है कि सर्वश्रेष्ठ प्रमाण क्या है और उसे आचार्य के द्वारा सहायक साहित्य के माध्यम से समझना चाहिये। पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि कई सहायक साहित्य है जो यहाँ पर दर्शाये गये हैं जो वेदों के अर्थ को अच्छी तरह से समझने में कितने सहायक और कीमती हैं। इसे अच्छी तरह से अध्ययन करना और समझना चाहिये जो हमें इस मूलभूत सिद्धान्तों को समझायेगा।
  • यह न समझना कि कई साहित्य जिसके कुछ अंश सात्विकता कि जानकारी देते है जिन्हें सात्विक जनों ने अपना लिया हैं वे ही मुख्य प्रमाण हैं बाधा है। उपबृम्हमण में विशेषकर पुराण में वे पहलू जो सात्विक है वें मुख्य प्रमाण हैं। यहाँ राजस और तामस पहलू भी है। इन्हें अनदेखा कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मत्स्य पुराण में यह कहा गया है कि “यस्मिन कल्पेतु यत प्रोक्तम पुराणम ब्राह्मणा पूरा, तस्य तस्यतु माहात्मीयम तत स्वरूपेण वर्णयते” – पुराण ब्रह्माजी द्वारा प्रगट किया गया है, देवता जो सात्विक, राजसिक और तामसिक स्वभाव के है उनकी स्तुति के लिये, जब भी और ज्यो भी गुण ब्रह्माजी में है श्रेष्ठ हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३रें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों द्वारा दर्शाते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि पुराणों को एक विशेष सन्दर्भ में हमें जानना चाहिये और पूर्वाचार्यों ने (जो शुद्ध सात्विक हैं) पुराणों में सात्विकता को अधिक महत्त्व दिया हैं। पुराणों के सात्विक विभाग पूरी तरह भगवान श्रीमन्नारायण के विषय पर हीं कहा गया है। यह श्रीवैष्णवों के लिये मुख्य केन्द्र बिन्दु है।
  • यह न मानना कि रज/ तम गुणोंवाले व्यक्तित्व से संबन्धित सात्विक पहलू, सात्विकों के लिये अनुपधेयम (मान्य नहीं) है, एक बाधा है। पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी, शिवजी, लिंगम, आदि जो रज/ तम व्यक्तित्व वाले हैं उनके सात्विक गुणों को ग्रहण करना चाहिये। यहाँ मूल पाठों में अनुपधेयम (अमान्य) ऐसा कहा गया है – परन्तु यह मुद्रण की गलती होकर उपधेयम (मान्य) होना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी शिवजी के सात्विक गुणों की स्तुति ऐसे करते हैं “नुणणुणरविन नीलार कणदत्तममानुम” (शिवजी जो सबसे बड़े ज्ञानी है और स्वयं विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा किये है और इस तरह उनका कण्ठ नीलकंठ है)। यहाँ आलवार शिवजी की बढ़ाई करते हैं क्योंकि जब उनका सत्व गुण सर्वाधिक प्रबल था तब उस समय वें भगवान वेंकटेश की पूजा के लिये आये थे। और लिंग पुराण में प्रसिद्ध प्रमाण श्लोक देखा गया है “वैकुण्ठेथु परे लोके … आस्थे विष्णुरचिन्तयात्मा” – यह श्लोक तिरुवाराधन के समय प्रतिदिन श्रीवैष्णव मन्त्र पुष्पांजली के समय गाते हैं।
  • दिव्य प्रबन्धों में पूर्ण दृढ़ विश्वास न होना बाधा है, दिव्य प्रबन्ध दोषरहित हैं क्योंकि उनमें रज, तम, सात्विक आदि गुणों का कोई भेद नहीं है, क्योंकि वह पूर्णतः सात्विक है और पूर्वाचार्यों ने इसे मान्य किया है। आल्वार जिन पर स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा से उनके प्रति शुद्ध ज्ञान और भक्ति हैं उन आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध भी अति शुद्ध है। क्योंकि इन्हे हमारे समस्त पूर्वाचार्यों ने स्वीकार कर इनका अनुकरण किया है इनमें त्रुटी निकालने की कोई सम्भावना नहीं है। इस सिद्धान्त में दृढ़ विश्वास होना श्रीवैष्णवों के लिये आवश्यक है।
  • यह न मानना कि सात्विक जनों के लिये पूर्वाचार्यों द्वारा जो दिव्य वाक्य कहे गये हैं वे प्रामाणिक हैं – यह बाधा है। जैसे आल्वारों को भगवान श्रीमन्नारायण का आर्शिवाद प्राप्त है वैसे पूर्वाचार्यों पर आल्वारों का आर्शिवाद है। उनकी आज्ञा को सर्वोपरी मानना चाहिये और उनकी स्तुति करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्र में कहा गया है कि “धर्मज्ञ समयम प्रमाणं वेधश च” – महान व्यक्तियों के विचार एक आज्ञा की तरह है, वेद भी एक अधिकारी है, आज्ञा है। यहाँ धर्माज्ञा का अर्थ “जो धर्म को जानता हो” – हमारे लिये सिद्ध धर्म (प्रमाणित किया हुआ सही सिद्धान्त) भगवान हैं और इस तरह धर्माज्ञा आल्वारों और आचार्यों को दर्शाता है जो पूर्णत: भगवान के गुणों, नाम, रूपों के लक्षणों के जानकार हैं। इसलिये हमें पूर्वाचार्यों के वाक्यों पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये। उपदेश रत्नमाला के ३६वें श्लोक में “तेरूलुत्तवाल्वार्हल् शीर्मैयरीवारार् अरुलिच्चैयलैयरिवारार् अरुल्पेत्त नाथमुनि मुदलान नम् देशिकरैयल्लाल् पेदै मनमे उण्डो पेशु” श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह पहलू को समझाते है – हे मूढ़ मन! विवेचन कर बताओ कि (श्रीशठकोप स्वामीजी की) कृपा के पात्र श्रीमन्नाथमुनि स्वामीजी प्रभृति हमारे पूर्वाचार्यों के सिवा दूसरा कौन यथार्थज्ञाननिधि आल्वारों का अथवा दिव्यप्रबंधों का वैभव जान सकता है। कहिये क्या हमारे पूर्वाचार्य श्रीनाथमुनि स्वामीजी से प्रारम्भ कर कोई है जिन पर आल्वारों पर अपनी निर्हेतुक कृपा किये हैं? हमारे पूर्वाचार्यों के कई घटनाएं हैं जो कई ग्रन्थों में अभिलिखित किया गया है। हमें निरन्तर इनका अध्ययन, श्रवण, विचार करें और अपने स्वयं के कल्याण के लिये इनका पालन सच्ची श्रद्धा व भक्ति के साथ करें।
  • पाञ्चरात्रं में विश्वास न होना जिसे स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ने कहा है – बाधा है। स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण द्वारा कहे श्रीपाञ्चरात्र संहिता पर हमें कण भर भी संशय नहीं होना चाहिये जो “भगवद शास्त्र” के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसे स्वयं वेद के समान मान्य देना चाहिये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने हमें “आगम प्रामान्यम” नामक ग्रन्थ से अनुग्रहित किया है जो पाञ्चरात्रं आगम की प्रामाणिकता को सविस्तार स्थापित करता है।
  • इन तत्त्वों में पूर्ण विश्वास करना जैसे कि जीतने भी प्रमाण हैं सभी भगवान के स्वरूप (सच्चा स्वभाव) जैसे नाम, रूप, गुण, धन, आदि पर केन्द्रित है – बाधा है। भगवद गीता के १५.१५ में भगवान कृष्ण यह घोषण करते है कि “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेध्यो:” – सम्पूर्ण वेद केवल मेरे विषय पर हीं कह रहा है। सभी वेदों का मुख्य उद्देश एक मात्र भगवान कि स्तुति करना है। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोझी में कहते है “वेदप्पोरुले एन  वेंकटवा” (वेंकटवा ही वेदों के मतलब और उद्देश हैं)। यहाँ भगवान का अर्थ उनके सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, धन, आदि है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के १५.१५ श्लोक को श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य में समझाते हैं कि जैसे मनुस्मृति १२.९ कहती है “शरीरजै: कर्म दोषै: याति स्तावरताम नर:, वाचिकै: पक्षी मृगतां मानसैर अंतयजातिताम” – जब कोई व्यक्ति दूसरों को अपने हाथों से कष्ट देता है वह पेड़ बन जाता है; यदि वह शब्दों द्वारा किसी को कष्ट देता है तो वह पक्षी/जानवर बनता है और जब वह दिमाग से किसी को कष्ट पहूँचाता है तो वह नीच कुल में जन्म लेता है। यहाँ हालाँकि अलग प्रकार के शरीर (मानव, पौधे, जानवर, पेड़, आदि) को समझाया गया है अंततोगत्वा वह जीवात्मा के वर्तमान क्रिया और उसके परिणाम स्वरूप आगे जन्म के बारे में समझाते हैं। उसी तरह जब भी वेद देवताओं जैसे अग्नि, यायु, आदि के विषय पर चर्चा करता है तो अंततोगत्वा वे सिर्फ भगवान श्रीमन्नारायण के विषय में ही कहते हैं जो सभी तत्त्वों की आत्मा में निवास करते हैं। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोली के पाशुर के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी गीता के उसी श्लोक का उल्लेख करते हैं और पाशुर में भी यहीं कहा गया है। वे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि “वेदों के उद्देश मुझे भगवान वेंकटेश की तरह ही मेरे समक्ष दिखते हैं”।
  • यह न समझना कि सभी शब्द परमात्मा को संभोधित करते हैं जो निरन्तर चित्त और अचित्त के साथ ही हैं बाधा है। ब्रह्माजी श्रीरामायण में श्रीरामजी को स्तुति कर इस तरह बुलाते हैं जैसे “भवान नारायणो देव: जगत सर्वं शरीरं ते”– आप नारायण है, सर्व श्रेष्ठ भगवान हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। जो भी हम देखते, सुनते हैं वे सभी परब्रह्म श्रीमन्नारायण के शरीर के विषय में ही है। यह जीवात्मा में स्पष्ट रूप से दिखायी देता है और वस्तुओं में जीवात्मा के द्वारा दिखायी देता है। जो भी वस्तु जिसका नाम व रूप है ऐसे वस्तु भीतर से भगवान द्वारा व्याप्त होती है। अनुवादक टिप्पणी: वेदार्थ संग्रह में श्रीरामानुज स्वामीजी समझाते हैं कि जिसने वेदान्त का अध्ययन किया है वह सब में भगवान का दर्शन करता है। उदाहरण के लिये ऐसा व्यक्ति अगर एक बकरी को देखता हैं तो वें जीवात्मा को उस बकरी के अन्दर देखते हैं और जीवात्मा के अन्दर परमात्मा का दर्शन करते हैं। परन्तु जिसने वेद नहीं पढ़ा हो वह केवल बकरी को देखेगा क्योंकि तत्त्वत्रय – जीव, ईश्वर और माया के सिद्धान्त से परिचित नहीं हैं।
  • यह न समझना कि भगवान सबकी आत्मा में निवास करते हैं यह बाधा है। यह पिछले सारांश की तरह ही है। अनुवादक टिप्पणी: नारायण सूक्तम में यह समझाया गया है कि “अंतर भहिस च तत  सर्वं व्याप्य नारायण स्थित:” – सभी वस्तुओं के अन्दर और बाहर भगवान श्रीमन्नारायण व्याप्त हैं। इसी तत्त्व को श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में समझाते हैं “परन्ध धण परवैयुल नीर थोरुम परन्दुलन परंध अण्डम इधेन नील विशुम्बु ओलिवर करन्ध सिल इदं थोरुम इदं थिगल पोरुल थोरुम करंधेंगुम परनढुलन इवै उणड करने” – समुद्र के ठण्डे जल की एक छोटीसी बूंद में भगवान जीतने आराम से व्याप्त हैं उतने ही आराम से वे स्वयं ही इतने विशाल ब्रह्माण्ड में निवास करते हैं। उसी तरह वे पृथ्वी रूपी ग्रह और उससे बड़े ग्रह में निवास करते हैं और बारीक से बारीक स्थानों में भी निवास करते हैं और जीवात्मा उन स्थानों में वास करते हैं। वे ऐसी जगहों में वास करते हैं फिर भी ऐसी जीवात्मा को उनकी उपस्थिती का भान नहीं होता है। सम्हार के समय भगवान इन सबका नाश भी करते हैं और स्वयं को अन्दर रखकर उनकी रक्षा भी करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/09/virodhi-pariharangal-37.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३५)

७०) अनाप्त विरोधी – अविश्वास योग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

स्वयं के लिये कुछ न चाहकर श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की श्रीरामानुज स्वामीजी पर असीम श्रद्धा

अनाप्त (अविश्वासी व्यक्ति / पहलू जो किसी के लिये प्रतिकुल न हो)। इस भाग में जिन विषयों पर चर्चा हुई है वहीं तत्त्वों पर प्रकाश डालेंगे। अनुवादक टिप्पणी: यह भाग असल में इसके पूर्व भाग की ही अगली कड़ी है। जीवात्मा के आध्यात्मिक प्राकृतिक उन्नति के प्रतिकूल विषयों पर चर्चा करेंगे।

  • उपायान्तर (कर्म, ज्ञान भक्ति योग आदि साधनों से भगवान का नित्य कैंकर्य प्राप्त करना) में विश्वास करना जो प्रपत्ति (सम्पूर्ण शरणागति) के विरूद्ध है, यह बाधा है। आलवार समझाते हैं और स्वयं भी भगवान की सम्पूर्ण शरणागति का अभ्यास करते हैं, जो भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। अलग अलग कार्य जैसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, आदि स्व प्रयत्न वाले कार्य हैं जो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत है क्योंकि जीवात्मा स्वयं को भगवान का नित्य सेवक मानता है। इस तरह ऐसे उपायान्तरों में विश्वास रखना जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य / आलवारों ने यह सुनिश्चित किया है कि भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति ही उनके प्रति नित्य कैंकर्य का एक मात्र साधन है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के दूसरे प्रकरण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस सिद्धान्त को समझाते हैं। इस सूत्र में वे पहले समझाते हैं कि हम उपायान्तर का त्याग अपने अज्ञान और पात्रता के कारण नहीं अपितु इसलिए करते है क्यूंकि उपायान्तर भगवान के प्रति सम्पूर्ण शरणागति के प्रतिकूल है। अगले सूत्र में वे इस सिद्धान्त को और विस्तार से समझाते हैं। १२७वें सूत्र में स्वयं से प्रश्न करते हैं कि “क्यों वेदान्त इन तत्त्वों को उपाय ऐसे दर्शाता है?”। वें स्वयं इसका उत्तर भी देते हैं कि जैसे किसी बीमार को बीमारी के समय (माँ प्रेम से) उसके पसन्द के प्रसाद की वस्तु में दवा मिला कर देते हैं। यहाँ शास्त्र जो जीवात्मा का एक माँ की तरह ध्यान रखता है, उपायान्तर में भगवान (जो वास्तविक दवा हैं) रूपी दवा मिलाता है (उपायनतार स्व प्रयत्न पर आधारित हैं और अपने स्वभाव के कारण स्व प्रयत्न में लिप्त होना जीवात्मा को प्रिय हैं, जो अनेक वर्षों से इस संसार में हैं)। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ओर सुन्दर और स्पष्टता से समझाते हैं कि जिस तरह दवा ही बिमारी को ठीक करती है न की प्रसाद की अधिकता, उसी तरह भगवान ही वास्तव में संसार बन्धन से छूटने के उपाय है और उपायान्तर कभी भी सच्चा उपाय नहीं हो सकते है। वे आगे समझाते हैं कि जब भोजन पदार्थों में मिलाई गई दवा से बीमारी का उपचार किया जाता है तब उससे ठीक होने में अधीक समय लगता है। उसी तरह कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि योगों से जीवात्मा को इस संसार के बन्धन से बाहर निकलने के लिये अधीक समय लगता है। परन्तु भगवान से सीधे सम्बन्ध करना वैसे ही है जैसे बिमारी को ठीक करने हेतु दवाई को सीधे पाना – इसका परिणाम तुरन्त होता है। आगे के सूत्रों में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई आश्चर्य चकित करनेवाले अर्थ समझाते हैं – अपने आचार्य से इन विषयों से कालक्षेप सुनना चाहिये।
  • यह जानते हुये की अपने से प्रतिकूल लोगों से दोस्ती नही रखनी चाहिए, इस सोच में रहना की ऐसे लोगों के साथ मिलने से हमारी क्या दशा होगी, यह बाधा है। हमें यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि अपने से प्रतिकूल स्वभाव वालों से हमें अपने सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ प्रतिकूल स्वभाव वालों से मतलब है वे जो देवतान्तर, संसार में लगे हैं और जो निरन्तर भगवद, भागवत, आचार्य अपचार में लगे हुये रहते हैं। क्योंकि ऐसे जनों के संगत में रहने से वे हमारे विचारों को भी अपने विचारो की तरह ढालने की कोशिश करते हैं।
  • सांसारिक सुख के प्रति लगाव, जो हमारे अन्तिम लक्ष्य में रुकावट है – यह बाधा है। कोई भी वस्तु जो भगवान के नित्य कैंकर्य के विरुद्ध हो और जिससे स्वयं को आनन्द प्राप्त होता है उसे प्रयोजनान्तर कहते हैं। ऐसे कार्यों को हमें त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारे लिये भगवान के परमपदधाम में भगवान की नित्य सेवा ही, जो भगवान को आनंददायी है, हमारा अन्तिम लक्ष्य है। अन्य लक्ष्य जैसे सांसारिक सुख, देवताओं कि सेवा, सांसारिक जनों कि सेवा, कैवल्यम – स्व-आनन्द, स्व-आनन्द के लिये भगवान कि सेवा करना, घमण्ड से भगवान कि सेवा करना, आदि, सभी जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के लिये प्रतिकूल हैं और इसलिये इनका त्याग करना चाहिये।
  • श्रीमन्नारायण भगवान ही एक मात्र विश्वसनीय और पूजनीय भगवान हैं, इस सिद्धान्त के विरुद्ध देवतान्तरों में विश्वास रखना, यह बाधा है। श्रीवैष्णवों के लिये श्रीमन्नारायण ही एक मात्र पूजनीय भगवान हैं इस सिद्धान्त को समझना और उसका पालन करना बहुत मुख्य है। देवतान्तर का भजन और पूजन हमारे उपरोक्त सिद्धान्त के विपरीत है, इसलिए उसका त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमन्नारायण भगवान स्वयं सबसे श्रेष्ठ हैं जिन्होंने कई देवताओं को इस संसार को चलाने के लिये और उन लोगो के लिए बनाया जो तामसीक और राजसीक को पूजा करने वाले हैं जिससे वे लोग भी धीरे धीरे आध्यात्मिकता को ग्रहण कर सके, नही तो नास्तिकता बड़ जायेगी। परन्तु भगवान के पवित्र भक्त जो सत्वगुण वाले हैं उनके लिये भगवान श्रीमन्नारायण हीं एक मात्र पूजनीय हैं। वैष्णव होना का अर्थ है श्रीमन्नारायण में सम्पूर्ण विश्वास रखना और उनकी हीं पूजा करना।
  • द्वय महामन्त्र के तत्त्वों में समझाये गए मन्त्रों के जो विपरीत हों उन मंत्रों में विश्वास रखना यह बाधा है। श्रीवैष्णवों को द्वय महामन्त्र को निरन्तर बोलना और ध्यान करना चाहिये क्योंकि इसमें मिठास और गूढ़ार्थ हैं। अपने संबन्धित गुणों के कारण, द्वय महामंत्र के प्रकाशन द्वारा यहाँ रहस्य त्रय (तिरुमंत्र- अष्टाक्षर, द्वय महामंत्र, गीता चरम मंत्र) को दर्शाया गया है। अत: श्रीवैष्णवों को रहस्य त्रय का निरन्तर पालन करना चाहिये। देवतान्तरों से सम्बंधित मंत्रों को पूरी तरह त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी तिरुमन्त्र की विशेषताओं को समझाते हैं। वे पहले समझाते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण से सम्बन्धित दो मन्त्र है – व्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान की सार्वभौमिकता को समझाते है) और अव्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान के अन्य गुणों को अलग अलग रूपों से समझाते हैं)। स्वामीजी विशेषत: समझाते है कि व्यापक मन्त्र (नारायण, वासुदेव, विष्णु) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विष्णु गायत्री में इसे दर्शाया गया है। वें आगे कहते है कि क्योंकि विष्णु गायत्री नारायण मन्त्र से प्रारम्भ होता है इसलिये विष्णु के मंत्रों में यह सबसे श्रेष्ठ है। आगे वे कहते है कि नारायण मन्त्र सम्पूर्ण मन्त्र है जो सभी आवश्यक अर्थों को बताता है जो दूसरे मंत्रों में नही है। यहाँ आवश्यक अर्थ से आशय है अर्थ पञ्चक (पाँच तत्त्व / स्वरूप – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, उपेय और विरोधी)। वे आगे और समझाते है कि नारायण मन्त्र वेद, ऋषी, आलवारों और आचार्यों को प्रिय है। द्वय महामन्त्र नारायण मन्त्र का विस्तृत रूप है और चरम श्लोक इस तत्त्व को और आगे समझाता है। इसलिये मुमुक्षु (जिन्हें मोक्ष और परमपद में भगवान श्रीमन्नारायण की चाह है) के लिये रहस्य त्रय ही केन्द्र है।
  • हमारा अन्तिम लक्ष्य एकमात्र भगवतप्राप्ति है, जिससे स्वयं भगवान ही आनंदित होते हो इसके विपरीत दैहिक व भौतिक सुख की ओर लगाव रखना, यह बाधा है। भोग्यम – वह जिससे कोई आनंदित हो। जीवात्मा जो भगवद/ भागवतों का कैंकर्य करते हैं जिससे भगवान आनंदित होते है। जब भगवान में यह आनन्द देखते है जीवात्मा भी प्रफुल्लित होता है। दूसरे सभी सांसारिक सुख जीवात्मा की वास्तविक दशा में बाधक हैं। अनुवादक टिप्पणी: पेरुमाल तिरुमोली में श्रीकुलशेखर स्वामीजी घोषणा करते है कि “पड़ियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – यहाँ आलवार प्रार्थना करते हैं कि उन्हें श्रीवेंकटेश भगवान के मंदिर के गर्भ गृह की सीढ़ी (थली) बनाये जिस से वे भगवान श्रीवेंकटेश की भव्य मुस्कुराहट का दर्शन भी कर सकें। सीढ़ी (थली) एक अचित की तरह है (जिसे ज्ञान नही है) लेकिन चूंकि वह भगवान के आनन्द को देख सकते है और प्रत्युत्तर में वे भी आनंदित होते हैं। क्योंकि प्रत्युत्तर में आनंदित होना ज्ञान की दशा है यह श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय का उच्चत्तम सिद्धान्त दर्शाता है। अर्थात हमें मालिक के अधीन रहना चाहिये की शुद्ध विचार हो फिर भी हमें भगवान के आनन्द का प्रत्युत्तर जरूर देना चाहिये ताकि उससे भगवान को और अधिक आनन्द प्राप्त हो। यह एक भोले भाले छोटे बच्चे की अवस्था की तरह है जो कि पूर्णत: अपने पिता के वश में हैं फिर भी पिता जब अपने पुत्र को खुशी देता है तब बच्चा भी पिता के आनन्द का प्रत्युत्तर देता है और इससे पिता को अपार आनन्द मिलता है। अत: भगवान प्रारम्भ में खुशी का अनुभव करते हैं और जीवात्मा बाद में अनुभव करता हैं – वह भी सिर्फ भगवान के आनन्द के लिये करते हैं।
  • भंध शास्त्र (सांसारिक, धन, वैभव, आदि का साहित्य पढ़ना) पर ध्यान केन्द्रित करना जो मोक्ष शास्त्र (मोक्ष सम्बन्धित साहित्य) के विपरीत है यह बाधा है। मोक्ष शास्त्र भगवान के प्रति नित्य कैंकर्य करने कि राह दिखाते हैं। भंध शास्त्र हमें इंद्रिय सुख के लिये बारम्बार इस संसार में जन्म लेने के लिये अग्रसर करते हैं। हमें मोक्ष शास्त्र पर केन्द्रित होना चाहिये और भंध शास्त्र पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
  • स्वयं के दैहिक पक्ष में रूचि रखना जो अपने अन्तिम लक्ष्य आचार्य सेवा के विपरीत है, यह बाधा है। चरम कैंकर्य – चरम पर्व निष्ठा – अन्तिम सेवा “अपने आचार्य ही सबकुछ है और ऐसे आचार्य की सेवा करना” की तरह है। उपदेश रत्नमाला के ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” – आचार्य को शिष्य के सच्चे स्वभाव पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और शिष्य को अपने आचार्य के शरीर और शारिरीक आवश्यकता की ओर ध्यान पूर्ण भक्ति के साथ केन्द्रित करना चाहिये। जैसे आचार्य कि नित्य सांसारिक जरूरत (जैसे प्रसाद, वस्त्र, तिरुमाली, आदि) की पूर्ती शिष्य का कर्तव्य है और शिष्य को चाहिये कि वह स्वयं सांसारिक आवश्यकता को छोड़ आचार्य कि ओर लगाव रखें। केवल स्वयं की आवश्यकता में निरत रहना – इसे त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: उपदेश रत्नमाला में श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की गूढ बातों का सार है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा समझाये गये इन सिद्धान्तों के सार को बहुत ही सुन्दर तरीके से बहुत ही सरल तमिल पाशुरों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आचार्य और उनकी सेवा कैंकर्य विषय पर ही श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी ने पूरा ध्यान केन्द्रित किया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे अच्छी तरह से समझाते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३४)

६९) आप्त विरोधी – विश्वासयोग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आप्त का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति / पहलू या हित चाहनेवाला। सामान्यत: वह जो बिना कुछ चाहे दूसरों का हित चाहता है उसे आप्त कहते है – मित्रों में उत्तम। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुमोगूर भगवान की तिरुमोगूर आत्तन ऐसे जय जयकार करते हैं। आप्त का तमिल शब्द आत्तन है। अनुवादक टिप्पणी: इस भाग में उन विषयों पर चर्चा हुई है जो प्रपन्नों के लिये अच्छा है – इसमें शामिल है किसी के स्वभाव को अच्छी तरह समझना, भगवद, भागवत, आचार्य, आदि के महत्त्व को समझना।

  • भगवान और भागवतों में जिनकी प्रीति हो उनकी उपेक्षा करना बाधा है। जो भी भगवद और भागवतों में लगा है उन्हें अपना हित चिन्तक समझना चाहिये और उनके प्रति अच्छी तरह व्यवहार करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण स्वयं भगवद्गीता के ७.१९ में समझाते हैं “बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपध्यते। वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥” – कई जन्मों के पश्चात जो सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है वह मेरे शरण में आता है। ऐसे व्यक्ति जो वसुदेव को ही सबकुछ (उपाय, उपेय, आदि) मानते हैं वो महान व्यक्ति है और बड़ी दुर्लभता से मिलते हैं। उसी तरह स्वयं भगवान वैष्णवों के आठ विशेष गुणों को समझाते हैं। उसमें वैष्णवों का पहला गुण है “मद भक्त जन वात्सल्य” – भगवान के भक्तों के प्रति लगाव रखना। वह भी “वात्सल्य” शब्द का यहाँ प्रयोग भगवान ने किया है। वात्सल्य अर्थात माता सा प्यार / सहनशीलता – जैसे एक माता अपने बच्चों में कितना भी दोष हो उसे प्यार करेगी उसी तरह एक वैष्णव को अन्य वैष्णव में कितना भी दोष या कमी हो उनके दोषों को अनदेखा करके उनमें प्रेम भाव रखना चाहिये। अत: इन २ प्रमाणों से हम वैष्णवों के सेवा के महत्त्व को समझ सकते है जो भगवद और भागवतों में लगे हुए हैं। यह भी समझना चाहिये कि वैष्णवों कि ओर ध्यान न देना उनके प्रति सम्मान न देने के बराबर है।
  • जो भगवान और भागवतों के प्रति लगाव नहीं करते हैं उनके प्रति बहुत प्यार करना या दिखाना बाधा है। यह पिछले विषय से जुड़ा है। हमें उनके प्रति लगाव नहीं दिखाना चाहिये जो अपने कार्य और बाह्य स्वरूप से संसारी हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवैष्णवों की दिनचर्या को समझाते हैं। कई विषयों में एक इस प्रकार हैं “अहंकार अर्थ कामंगल मूनरूम अनुकूलर पक्कलीले अनाधरत्तैयूम, प्रतिकूलर पक्कलीले प्रावण्यत्तैयुम, उपेक्षिक्कुमवर्गल पक्कलीले अपेक्षइयूम पिरप्पिक्कुम”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिए एक बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं। तीन विषयों की यहाँ चर्चा हुई है। एक एक कर हम देखेंगे। १) श्रीवैष्णव अनुकूल (हितकारी) हैं – वे हमारे स्वामी हैं। जब हम उन्हें देखते हैं हमें उनके प्रति आदर सम्मान होना चाहिये और उसी क्षण सम्मान सहित वहाँ खड़े होना चाहिये। परन्तु अहंकार (स्वयं को स्वतन्त्र मानना) हमें उनकी ओर दुर्लक्ष्य कर देता है। क्योंकि अहंकार स्वयं को उच्च मानता है और अन्यों को सम्मान देने से रोकता हैं। २) सांसारिक जन प्रतिकूल (कृपाहीन) होते हैं। अर्थतम का अर्थ सांसारिक धन है। जब हम धन की इच्छा की ओर बढ़ते हैं तब हम धन प्राप्ति के लिये किसी की भी कितनी भी प्रशंसा कर सकते हैं। अत: यह सांसारिक धन, वैभव, आदि की इच्छा हमें प्रतिकूल जनों का मान सम्मान और उनके प्रति लगाव कराता है। ३) कामुक स्त्री सामान्यता उपेक्षिक्कुमवर (जो हमारी इच्छाओं की कभी भी परवाह नहीं करती हैं) होती हैं। अपेक्षा यानी इच्छा। जब किसी में कामुकता बढ़ती है तब यद्यपि वह स्त्री उस पुरुष की परवाह नहीं करती है और सार्वजनिक रूप में उसका अपमान भी करती है तब भी वह कामी पुरुष उसके पीछे जाने में लज्जा नही करता। अत: हमें इन ३ गड्ढो में गिरने से बचना चाहिये।
  • स्वकीया स्वीकार निष्ठा (स्व कोशिश पर विश्वास) होना बाधा है। जब हम कुछ अनुसरण करते हैं तब यह विचार कर अनुसरण करना कि “यह मेरा है, मैं इसे मेरे स्व कोशिश से अनुसरण कर रहा हूँ” से बचना चाहिये। क्योंकि भगवान ही सभी के मालिक हैं, हमें सब कुछ भगवद प्रसाद (भगवान की कृपा), आचार्य प्रसाद (आचार्य कृपा) मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति के दो प्रकार को समझाया गया है – स्वगत प्रपत्ति और परगत प्रपत्ति। स्वगत प्रपत्ति यानि स्वयं के प्रभाव की कोशिश से शरण होना। परगत प्रपत्ति यानि भगवान की कृपा से शरण होना। इन दोनों में से हमारे पूर्वाचार्यों ने परगत शरणागति को महत्त्व दिया है जो भगवान हीं रक्षक हैं और वे ही अपनी कृपा से हमें उपर उठाते हैं। जीवात्मा को भगवान के शरण होना चाहिये क्योंकि जीवात्मा का स्वाभाविक स्थान है भगवान के शरण होना।
  • स्व प्रयोजन प्रवृत्ति (स्वयं की इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश) में लिप्त होना बाधा है। स्वयं के सन्तोष के लिये हमें केंद्रित नहीं होना चाहिये और हमें दूसरों को उपर उठाने और उनके अच्छे के लिये कार्य करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कहा गया हैं “विचित्र देह संपत्तिर ईश्वराय निवेदितम, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुता” जब जीवात्मा एक सूक्ष्म स्थिति में होता है जैसे एक पदार्थ बिना इन्द्रिय/शरीर और सांसारिक आनन्द में नहीं लग सकता या वह स्वतन्त्रता की कोशिश करता है, तब भगवान के चरण कमलों की ओर अग्रसर होने के लिये कृपालू सर्वेश्वर, उस जीवात्मा पर इन्द्रिय/शरीर से कृपा करते हैं। इंद्रियाँ या शरीर का उपयोग में शारीरिक आनन्द के लिये भगवान के पास जाने के बजाय उद्धार के लिये जीवात्मा को भगवान के पास जाना चाहिये जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में कहा है “अन्नाल नि तंत आक्कैयीन वली उलल्वेन” अर्थात एक व्यक्ति जिसे एक बेड़ा दिया गया नदी के उस पार जाने के लिये, परन्तु नदी के जल के प्रवाह के कारण समुद्र में गिर जाता है, उसीप्रकार जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठने के लिये वही इंद्रियाँ या शरीर दिये गये थे वह इस संसार के लिये ही अधिक प्रयोग करता है। रामानुज नूत्तन्दादि में श्रीतिरुवरंगत्तु अमुधनार (श्रीरंगामृत स्वामीजी) इस तत्त्व को ६७वें पाशूर में समझाते है “मायवन् तन्नै वणंगवैत्त करणमिवै” – भगवान ने जीवात्मा को यह शरीर उनकी पूजा करने हेतु दिये है। सभी के लिये भागवतों की सेवा करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसलिये हमें इस जन्म का सही उद्देश्य पता होना चाहिये और उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिये।
  • केवल शेषत्त्व ज्ञान होना और पारतंत्रय का ज्ञान न होना बाधा है। आत्मा का स्वभाव दो चरणों में है: शेषत्त्वम – अपने स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु तत्पर रहना; पारतंत्रियम – स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करना। भगवान की सच्ची इच्छाओं को पूर्ण करना केवल अपने स्वामी की सेवा के लिये इंतजार करने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझना चाहिये यहाँ हम श्रीभरतजी को स्मरण कर सकते हैं जिन्होंने १४वर्ष तक भगवान राम की अनुपस्थिति में अयोध्या का राज्य संभाला। हालाँकि वे पहले श्रीराम के साथ वन में जाना चाहते थे।
  • स्वयं आनंदित होना और दूसरों को आनंद न देना बाधा है। भोग्यम – जो आनंदित है, भोक्ता – जो आनंदित होता है। श्रीवैष्णवों को स्वयं को भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु समझना चाहिये। यह समझना आवश्यक है कि हमारे स्वयं का अस्तित्व केवल भगवान के आनंद के लिये ही होना चाहिये। ऐसी समझ होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। हम भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु हैं फिर भी स्वयं को उपभोक्ता समझना विपरीत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के २१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं “शेषत्व भोक्थृतवंगल पोलन्रे पारतंत्रीय भोग्यतैगल”– पारतंत्रियम और भोग्यत्व दोनों शेषत्त्व और भोक्तृवंगल से भी उच्च हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यहाँ बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि शेषत्त्व सोने की ईंट (कीमती है फिर भी उसका रूप बदल कर काम में ले सकते हैं) जैसी है और पारतंत्रियम  सोने की आभूषण कि तरह है जिसे उसी रूप में कार्य में लेना है। यह बहुत गहरा तत्त्व है और इसे आचार्य कालक्षेप के जरिये समझना चाहिये।
  • यह मानना कि हमें जो आनन्द प्राप्त हुआ वह स्वयं से प्राप्त होता है, बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा करते हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते  चिरप्पु” – भगवान अपने मुखोल्लास के लिये मुझे अपना लेवे यही उत्तम है। हमारा शेषत्व और पारतंत्रय दोनों केवल भगवान के मुख के आनन्द के लिये हीं उत्पन्न होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी इसे पेरुमाल तिरुमोझी में समझाते हैं “पडियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – मैं आपकी सन्निधी के प्रवेश द्वार में सीढी बनूँ (जैसे अचित जिसे ज्ञान नही है) और सुख के परस्पर होना (क्योंकि चित जिसे ज्ञान है) जब मैं आपके होठों पर मुस्कान देखता हूँ। (अनुवादक टिप्पणी: यह हमारे सत सम्प्रदाय का सर्वोत्तम तत्त्व है जिसे “अचित्वत पारतंत्रियम” कहते है – अचित जैसे भगवान के पूर्ण शरण होना फिर जब भगवान के द्वारा खुशी प्रगट की जाती है तब जीवात्मा भी खुश होता है)। यह तत्त्व (स्वयं के सुख को मिटाने का) द्वय महामन्त्र के दूसरे भाग “नम:” में समझाया है। स्तोत्र रत्न में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी इसी तत्त्व को समझाते है “कदाप्रहर्षयिष्यामि” – भगवान के सुख के लिये तड़प। जब जीवात्मा भगवान के सुख का परस्पर आदान प्रदान करता है तब भगवान खुश हो जाते हैं। हमारे कैंकर्य का एक मात्र उद्देश है उनकी खुशी। इसके विपरित कार्य करना बाधा है।
  • जीवात्मा का सच्चा स्वभाव भगवान के आनन्द के लिये होना है और जो मूलभूत गुण है वह भी केवल भगवान के ही आनन्द पर केन्द्रित है यह न जानना बाधा है। जीवात्मा का सच्चा प्रबन्ध भगवान के आनन्द के लिये होना है – भगवान की सम्पत्ति बनना। मूलभूत तत्त्व भगवान का सच्चा दास बनकर रहना है। ऐसे जनों के लिये जिन्हे यह अहसास हो गया है कि दासता स्वभावत: ऐसी सेवा कैंकर्य, पूर्ण अधीनता, आदि बताने से होती हैं। जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते चिरप्पु” हमें निरन्तर भगवान के आनन्द के लिये सेवा करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे इसमें कहा गया हैं कि “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” –दासता के सच्चे लक्षण को कम से कम छोटे कैंकर्य (धार्मिक सेवा) द्वारा अनवरत किया जाता हैं।
  • आचार्य जो हमें वे तत्त्व बताते हैं जिसका हमें ज्ञान नहीं है उसको भगवान न मानना बाधा है। जैसे श्रीसहस्रगीति में कहा गया हैं “अरियाधन अरिवीत्त अत्ता” – नित्य सम्बंधित जिन्होंने भगवद विषयम में अज्ञात अनुभव प्रगट किया हैं, भगवान प्रथमाचार्य हैं। हमारे आचार्य को हमें भगवान का मनुष्य रूप मानना चाहिये। ऐसे आचार्य पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कृपया अंतिमोपाय निष्ठा पर लेख पढिये जिसमें आचार्य स्वयं को भगवान मानते हैं।
  • अपने आचार्य जो अन्तिम उपाय और उपेय हैं पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें सूत्र में समझाते हैं कि “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – मोक्ष के लिये आचार्य की शरण होना ही अन्तिम उपाय है। यहाँ यह समझना चाहिये कि हमें उस स्थिति में होना चाहिये जहाँ आचार्य माने कि उनका शिष्य रहे जैसे “यह मेरा प्रिय शिष्य हैं”। ४४६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं “आचार्यनैयुम थान पररूम पर्रु अहंकार गर्भमोपाधि कालन कोणडु मोधिरमी मिडुमा पोले – आचार्य का अनुसरण करते समय भी अगर वह स्वगत शरणागति (स्व परिश्रम से आचार्य का अनुसरण करना) हैं तो भी वह जीवात्मा के स्वभाव के प्रतिकूल है क्योंकि अभिमान या स्वतन्त्र स्वभाव के कारण ऐसा अनुसरण है। यह तो केवल आचार्य ही जो शिष्य पर कृपा करता हैं (शिष्य को निरन्तर ऐसा ही सोचना चाहिये)। अगर शिष्य की ओर से अभिमान से यह कार्य किया गया हो तो वह सोने कि अंगूठी बनाकर उसे काल (यम – मृत्यु को नियंत्रण करनेवाला) से स्वीकार करना जैसे होगा।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३३)

६८) जाति विरोधीजाति/वर्ण (जन्म में बाधाएं)

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी की सेवा करते हुए जो श्रीवरदराज भगवान की  त्याग मण्डप (काञ्चीपुरम) में सेवा करते थे।

आजकल जाति को ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और क्षुद्र से जोड़ा जाता हैं। परन्तु हमें यह समझना चाहिये कि यह सत्य नहीं है। असल में जाति को देव, मनुष्य, त्रियाक (जानवर जो क्षितिज के समानन्तर बढ़ते हैं) और पेड़ (स्थावर) का जन्म अथवा शरीर सम्बन्ध से जोडकर देखना चहिये। जाति का सम्बन्ध शरीर से है न की आत्मा से। त्रियाक का अर्थ जानवर/पक्षी है – उप वर्ग में आते है वह जो उड सकते हैं, जो चल सकते हैं, जो रेंग सकते हैं, जो जल में रह सकते हैं, जो धरती पर रह सकते हैं, जो वन में रह सकते हैं, जो शहर में रह सकते हैं, आदि। स्थावर में सम्मिलित हैं पेड़, पौधे, झाड़ी, छोटे पेड़, कीट भक्षी, आदि। भगवद गीता में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि सभी ४ वर्ण मैंने ही रचे हैं और उन्हें उनके कार्य और गुणों के आधार पर अलग किया गया है। विषय जो यहाँ चर्चा किया जायेगा वह बहुत गोपनीय और आंतरिक है। हम उसे सरलता से पेश करने का प्रयत्न करेंगे। रहस्यत्रय ग्रन्थ जैसे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र, आदि में जो समझाया गया है उन्हीं पहलू की हम यहाँ चर्चा करेंगे। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शब्दों का स्मरण कर सकते है “आर वचन भुतणत्तिन आळ् पोरुलेल्लाम अरिवार? आर अतु चोल नेरिल अनुट्टिप्पार?” – वह जो श्रीवचन भूषण के अर्थों को पूरी तरह समझ सकता है? वह जो उपदेश का पालन कर सकता है? इसी को ध्यान में रख कर अब हम आगे इस विषय पर प्रकाश डालेंगे।

अनुवादक टिप्पणी: जाति के कई भिन्न भिन्न अर्थ हैं। सामान्यता यह अलग अलग प्रजातियों के सम्बन्ध में है – देव, मनुष्य, त्रियाक, स्थावर। परन्तु इसके अतिरिक्त जाति को वर्ण से भी जोड़ा जाता है। कुल मिलाकर जाति को शरीर और जन्म से जोड़ा जाता है। उदाहरण के तौर पर द्विज अर्थात एक ही जन्म में दो बार जन्म लेना (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) – इसका अर्थ है सभी क्षुद्र वर्ण में जन्म लेते हैं पर उपनयन संस्कार होने के पश्चात द्विज हो जाते हैं। उपनयन संस्कार के पश्चात सभी द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) वेद अध्ययन से ब्रह्म ज्ञान के योग्य हो जाते हैं। अक्रमत: (एकाएक) कोई ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य नहीं होता है। सामान्यता सभी अपने अपने पूर्व कर्मानुसार उस वर्ण के किसी परिवार में जन्म प्राप्त करते हैं। इसलिये अगर कोई ब्राह्मण परिवार में जन्म लेता है तो उन्हें ब्राह्मण बनने का एक अवसर प्राप्त होता है। एक बार वह ब्राहमण बन जाते है तो उन्हें उन तत्वों पर रहना चाहिये। उन्हें एक आचार्य से वेदों का अध्ययन करना और आचार्य से जो सीखे उन्हें वेदों के तत्वों के आधार पर कार्य करना चाहिये। इस तरह कोई अपना ब्राहमणत्व विद्यमान रख सकता है। उसी तरह सभी वर्ण के जन वर्णाश्रम धर्मानुसार अपना कार्य करते हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय हैं और समाज के सही कार्य को सभी की उन्नती के लिये स्थापित करते है। सभी वर्ण के मुख्य कार्य हैं:

  • एक ब्राह्मण के लिये ६ कार्य पहचाने गये हैं। वेदों का अध्ययन, वेदों को सीखाना, स्वयं के लिये यज्ञ करना, अन्यों के लिये यज्ञ करना, दान करना, परिग्रह करना (दान स्वीकार करना)।
  • क्षत्रीय के लिये वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें शस्त्र उठाना, लोगों की रक्षा करना और देश का सही शासन करना, आदि कार्य।
  • वैश्य के लिये भी वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें खेती करना, गायों को चराना, व्यापार आदि करना है।
  • क्षुद्र केवल ऊपर लिखे तीनों वर्णों को उनके कार्य में मदद करते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित “आचार्य हृदय” के ३१वें चूर्णिकै के अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार के व्याख्या में उपर बताये हुए तत्वों को समझाया गया है।

“आचार्य हृदय” के ३३वें चूर्णिकै में नायनार द्विज जन्म की दूसरे जन्म से बड़ी सुन्दरता से तुलना करते है – अर्थात वह जो पञ्चसंस्कार से श्रीवैष्णव बनता है। जैसे शरीर का दूसरा जन्म वैदिक कर्म करने से निरत होता है वैसे हीं पञ्चसंस्कार आत्मा का दूसरा जन्म भगवद और भागवतों की सेवा से निरत होता है। यद्यपि आत्मा नित्य है परन्तु तिरुमन्त्र का अर्थ सीखने से जीवात्मा को अपने सच्चे स्वभाव का ज्ञान हो जाता है जो भगवान श्रीमन्नारायण की नित्य सेवा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस चूर्णिकै की व्याख्या को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं गायत्री मन्त्र (सभी मंत्रों की माता) से जीवात्मा ब्राह्मण कहलाता है और तिरुमन्त्र (सभी गायत्री मन्त्र की माता) जीवात्मा को श्रीवैष्णव बनाता है। ब्राह्मण को कर्म निष्ठ (जो सिर्फ कर्म पर आधारित है) और वैष्णव को दास्यभूत (जो सेवा कैंकर्य पर केन्द्रित है) कहते हैं। बाद में नायनार स्वामिजी कर्म निष्ठा और दास्यभूत में कई अन्तर बताते है।

३७वें चूर्णिकै में भी नायनार स्वामीजी यह समझाते है कि किसी का ब्राहमणत्व उसके वेद अध्यन, उसके अर्थ को समझने और वेदों में बताये गये तत्व के पालन करने से स्थापित होता है उसी तरह किसी का वैष्णवत्व एक आचार्य से दिव्य प्रबन्ध सीखना, उसके अर्थों को आचार्य से समझना और उसके तत्वों का अपने जीवन में पालन करने से स्थापित होता है।

इस भाग में वैष्णव या प्रपन्न (जो श्रीमन्नारायण को समर्पित हो) के महत्व और उनके जो मुख्य गुण है उन्हैं विस्तार से समझाया गया है।

  • भगवान ही रक्षक हैं इस पर पूर्ण विश्वास न होना जो तीनों प्रपन्नों अज्ञर (अज्ञानी), ज्ञानाधिकार (जो शिक्षीत हो) और भक्ति परवसर (जो भक्ति में डुबा हो) के लिये आवश्यक है, बाधा है। प्रपन्न अर्थात जो भगवान के शरण हो और जो उन्हें ही उपाय मानता हो। सभी ३ प्रकार के प्रपन्नों को विश्वास होना चाहिये और इसी विश्वास को जाति धर्म कहते है। विश्वास का अर्थ है भगवान पर पूर्ण भरोसा होना जिनके हम शरण हुए है वे ही हमारी रक्षा करेंगे और उद्धार करेंगे। इन तीन प्रपन्नों के विषय में थोड़ा अधीक व्याख्या इस प्रकार है (अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों प्रपन्नों को सुन्दरता पूर्वक ४१वें सूत्र में समझाते है। हम अपने पूर्वाचार्यों के दया गुण को समझकर बढ़ाई कर सकते हैं जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४३वें सूत्र में स्वयं को अज्ञर कहते है – हालाँकि वे बहुत शिक्षित विद्वान हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सुन्दरता से समझाते हैं कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अपने नैच्यानुसंधान द्वारा अपने आप को इस श्रेणी में शामिल करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या इस सूत्र के लिये बड़ी स्फूर्तिदायक और समझने में आसान है)।
    • अज्ञ अर्थात वह जिसे थोड़ा भी स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि का ज्ञान न हो। हम स्वयं इसके लिये एक अच्छे उदाहरण है। ये वह हैं जिन्होंने अज्ञान और अयोग्यता के कारण स्व प्रयत्न (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, जिन्हें शास्त्र में भगवान से मिलने की प्रक्रिया माना है) का त्याग कर दिया है।
    • ज्ञानाधिकार का अर्थ है वह जो इन सभी अर्थात स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि तत्वों में स्पष्ट हो और जो दूसरों को यह समझा सके। वह जो ज्ञान और अनुष्ठान से पूर्ण हो। हमारे पूर्वाचार्य इसके अच्छे उदाहरण है। वे पूर्ण ज्ञानी थे और स्वप्रयत्न के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम थे, परंतु यह जानकार कि स्वप्रयत्न और जीवात्मा का दास्य स्वभाव एक दूसरे से विपरित है उन्होंने स्वप्रयत्न का त्याग कर पूर्णत: भगवान की शरण हो गये।
    • भक्ति परवसर अर्थात वह जो भगवान के नामस्मरण को पूर्ण निष्ठा से करने मात्र से पिघल जाते हैं। आल्वार इसके लिये सही उदाहरण हैं। हालाँकि आल्वारों पर भगवान की निर्हेतुक कृपा है, भगवान के प्रति अति प्रेम और भक्ति के कारण ही वे स्वाभाविकता से स्वप्रयत्न कर नहीं पाते थे। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं “कलैवाय थुंबम कलैयातोलिवाय कलैकण मट्रिलेन” – आप मेरी विपत्ती दूर करो या नहीं मैं तो आपके शरण में हूँ – आपको मेरी रक्षा करनी ही है। वे आगे कहते है “उन्नालल्लाल यावरालुम ओंरुम कुरै वेण्देन .. उन थाल पिडित्ते सेलक्काणे” – मुझे दूसरों से आप के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहिये – मैं सर्वथा आपके चरण कमलों पर निर्भर रहूँगा।
  • मनुष्य धर्म के विपरित बर्ताव करना बाधा है। मनुष्य की विशेष योग्यता है कृत्य अकृत्य विवेक (इसका ज्ञान होना कि क्या करना है और क्या नहीं करना है)। इस आधार पर मनुष्य जीवन का उपयोग करना चाहिये। शास्त्र कहता है इधम कुरु (यह करो यह आपके लिये लाभप्रद है) और इधम माकार्षी: (यह मत करो यह हानिकारक है)। हमें इसे समझकर अपने जीवन में इसका पालन करने की कोशिश करनी चाहिये। सभ्यता और मानवता अर्थात यह सोचना कि “सभी को शान्ती और खुशी से रहना चाहिये” – ऐसा सच्चा हृदय सभी के पास होना चाहिये। इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये। इसके विपरित बर्ताव करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव गुणों को देखने से पूर्व हमें मनुष्य के सभी के प्रति सामान्य स्वभाव को जानना चाहिये। शिक्षित / सभ्य आचरण का अर्थ तत्वों और सम्मान के आधार पर जीवन व्यतित करना। और यह भी कहा गया है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन सभी जीवमात्र के लिये सामान्य है। सभी कीड़े, बिल्ली, कुत्ते, मानव जनों के लिये यह ४ तत्व किसी न किसी रूप में अस्तिव में रहते हैं। इस जीवन के जन्म मरण के चक्र से छुटकारा पाना मनुष्य में विशेष सामार्थ्य है। जिसे शास्त्रानुसार एक आचार्य द्वारा समझा जा सकता है। भगवान जीवात्मा को रचते समय कृपा कर शरीर और इन्द्रियाँ दिये हैं। वे इस शास्त्र को ब्रह्मा, ऋषि और आल्वारों के द्वारा बताते हैं। इन्द्रियों का प्रयोग कर मनुष्य इन तत्वों को समझकर और इस शरीर को कैंकर्य में लगा सकता है। अगर यह कर सकते है तो जीवात्मा का अध्यात्मिक कल्याण होगा। अगर नहीं कर सका तो उसे जो यह कृपा कर मानव शरीर प्राप्त हुआ है वह व्यर्थ हो जायेगा।
  • स्वयं को उपर उठाने के लिये स्व प्रयत्न करना बाधा है। प्रारम्भ में प्रपन्न धर्म की चर्चा हुई है। एक प्रपन्न को भगवान के पूर्ण शरण होना चाहिये और कभी भी स्वप्रयत्न नहीं करना चाहिये। यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव शेषत्व और पारतंत्रय के विपरित है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान पर पूर्ण निर्भर अर्थात किसी भी कीमत पर स्वप्रयत्न का त्याग करना। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें निरर्थक बैठकर कुछ भी कार्य नहीं करना है। इसका अर्थ है हमें कैंकर्य में लगना चाहिये परन्तु इसे कैंकर्य समझकर करना नाकि इसके बदले में कुछ प्राप्त होगा।
  • प्रपत्ति करने के पूर्व ही यह मांगना कि मैं पवित्र हो जाऊँ, यह बाधा है। भगवान को पूर्ण शरण के रूप में स्वीकार करने के लिये प्रपत्ति एक मानसिक स्थिति है। इसे कोई विशेष स्थान, समय, परिस्थिति, आदि की जरूरत नहीं है और इसे ऐसे ही अनुसरण किया जा सकता है। जब द्रौपदी मानहीन होने के खतरे में थी तो उसने पुकारा “हा कृष्णा! रक्षमाम शरणागताम” (कृष्ण! इस शरण में आये हुये आत्मा की रक्षा करों) पूरी तरह पूर्ण विश्वास से अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर – हालाँकि वह रजस्वला थी – फिर भी भगवान कृष्ण द्वारा उसकी रक्षा हुई। उसी तरह जब विभीषण भगवान श्रीराम के शरण में आये तब उसने स्नान भी नहीं किया था हालाँकि वह समुन्द्र के उपर ही था – उसने आकाश से ही भगवान की शरण ली। जब कोई पवित्र या अपवित्र हो तो वह उसी परिस्थिति में भगवान के शरण हो सकता है। प्रपत्ति प्राप्त करने के पूर्व किसी को भी अपनी स्थिति को बदलने की आवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में प्रपत्ति के विषय पर विस्तार से चर्चा की गयी है। ३०वें सूत्र में इसी तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस विषय को सुन्दरता से स्पष्ट करते है। यह समझने की कोई बात नहीं है कि प्रपत्ति करने के पूर्व स्वयं को पवित्र करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई यह आश्चर्य कर सकता है कि कोई प्रपत्ति करने के पूर्व पवित्र होने की जरूरत क्यों नहीं है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं और समझाते हैं कि द्रौपदी और अर्जुन (पहले के सूत्र में अर्जुन को शरणागति के पवित्र सिद्धान्तों के विषय में समझाया गया है कि इस मध्य में जो बहुत नीच व दीन हैं जिन्होंने देखा है कि स्वयं भगवान कृष्ण अर्जुन की सहायता कर रहे हैं फिर भी वे धर्मयुद्ध के विपरीत हैं।) को देख कोई यह सोच भी सकता है कि “मैं अपवित्र हो सकता हूँ ताकि मैं प्रपत्ति करने के लिये शिक्षित हो जाऊँ”। परन्तु इसकी जरूरत नहीं है और इसे करना भी नहीं चाहिये। बुनियादी तौर पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते हैं कि जानबूझ कर भी किसी भी परिस्थिति में हमें निषिद्ध कार्यों में नहीं लगना चाहिये। अगले सूत्र में इससे सम्बंधित श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी लंका जाने के लिये एक सुन्दर प्रमाण को दर्शाते हैं। जब श्रीराम स्वयं समुन्द्र की शरण होते है तब वें पहले स्नान करते हैं। श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी समझाते है कि भगवान श्रीराम के लिये स्नान करना स्वाभाविक है – यह प्रपत्ति का एक अंग नहीं है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि प्रपत्ति स्वतन्त्र उपाय है जो किसी की प्रार्थना पर निर्भर नहीं होती है।
  • नित्य कर्मानुष्ठान का त्याग करना जो भगवान के सेवक के लिये स्वाभाविक है बाधा है। नित्य कर्म का पालन करना यह आम नियम है। इसे भगवद आज्ञा कैंकर्य के रूप में देखा जाना चाहिये। हमें अपने नित्य कर्म (जैसे संध्या वंधन, आदि) का त्याग करने का कोई अधिकार नहीं है। इस विषय पर बहुत चर्चा हो चुकी है। इस पर ध्यान करो और स्पष्ट रहो। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ८२वें सूत्र में कहा गया है कि “तिरुक्कण्णमंगै आण्डान स्व व्यापारत्तै विट्टान” – तिरुक्कण्णमंगै आण्डान अपना सभी व्यक्तिगत कार्य का त्याग कर दिये। वे पूर्ण विश्वास के उपर स्थित थे और इसलिये स्व प्रयत्न का त्याग कर दिये। उपदेश रत्नमाला के ५५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “एल्लार्कुमण्डाददन्नो अदु” – श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्वों का बहुत कम जन पालन कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आण्डान अपनी स्व प्रयत्न के सभी कार्यों का त्याग कर पूर्णत: कैंकर्य में लग गये। नित्य कर्मानुष्ठान के तहत जब तक भगवद कैंकर्य में कोई रुकावट नहीं है उसे न चूके करना चाहिये। परन्तु जब हम भगवद कैंकर्य में लगे हुए होते है तब नित्य कर्मानुष्ठान को उस समय के लिये छोड़ सकते हैं। आचार्य हृदय के ३१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है “…अत्ताणिच चेवकत्तिल पोधुवानधु नलुवुम” – जब भगवद / भागवतों की विशेष सेवा करते हैं तब सामान्य नियम का त्याग कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते है कि हमारे पूर्वाचार्य बिना चूके नित्य कर्मानुष्ठान करते थे इन सांसारिक जनों के प्रति दया रखकर जो वैदिक को देख पथभ्रष्ट हो जाते और वैदिक अनुष्ठान का त्याग कर देते है।
  • उन व्यक्ति के संग में रहना जो नित्य कर्मानुष्ठान नहीं करते है बाधा है। श्रीवैष्णव सन्यासी को भी शिखा, यज्ञोपवित, आदि को रखकर नित्य कर्मानुष्ठान करना चाहिये। यह कहा जाता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी १२० वर्ष की आयु में भी संध्या वंधन के समय खड़े होकर अर्ज्ञ देते थे। अनुवादक टिप्पणी: अगर यह नियम सन्यासी के लिये है तो अन्य जैसे गृहस्थ, ब्राह्मण, आदि का क्या कहना – उन्हें भी अपने अपने कर्मानुष्ठान करना चाहिये। जब हम ऐसे जनों के संग में रहते हैं जो कर्मानुष्ठान नहीं करते हैं तो हम भी उनके जैसे हो जाते हैं। इसलिये यह कहा जाता है कि ऐसे संगत से बचना चाहिये।
  • यह न जानना कि तिरुमन्त्र में फिर से जन्म लेना उत्तम जन्म है, बाधा है। तिरुमन्त्र में जन्म का अर्थ है ज्ञान जन्म – स्वयं के सच्चे स्वभाव का पवित्र ज्ञान को प्राप्त करना। तिरुमाला में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी, श्रीवेदांती स्वामीजी से कहते है कि “तिरुमंत्रत्तिले पिरंतु ध्वयत्तिले वलर्न्तु ध्वयैक निष्ठरावीर” – हमें तिरुमन्त्र में जन्म लेना चाहिये, द्वय महामन्त्र में बड़ा होना चाहिये और केवल द्वयम में हीं पूर्ण निष्ठा होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवेदांती स्वामीजी सन्यासाश्रम को स्वीकार करते है और अपने आचार्य श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के साथ रहने हेतु श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते है तब वे राह में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी से भेंट करते है। उस समय श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी पर ग़ुस्सा कर कहते है कि आप गृहस्थ रहकर भी द्वय महामन्त्र में विश्वास रख, अपने आचार्य की सेवा कर सकते थे। हम नायनार के आचार्य हृदय के ३३वें चूर्णिकै में ज्ञान जन्म विषय के प्रारम्भ में इसे देख चुके है।
  • यह न जानना कि अन्य मंत्रों में जन्म लेने से हमारे स्वरूप की बहुत बड़ी हानी होगी। यह बाधा है। पिछले तथ्य में तिरुमन्त्र द्वारा दीक्षा को समझाया गया है – इसमें द्वय महामन्त्र और चरम श्लोक भी आते हैं क्योंकि वें तिरुमन्त्र के विस्तार / व्याख्या है। यहाँ अन्य मन्त्र का अर्थ है देवतान्तर के मन्त्र। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी में शुरू में हीं श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अन्य मंत्रों पर तिरुमन्त्र की स्तुति को समझाते है। पहले वे तीन मुख्य मन्त्र की महिमा को समझाते हैं – तिरुमन्त्र (अष्टाक्षरी), वासुदेव मन्त्र (तिरु द्वादक्षारी) और विष्णु मन्त्र (सदाक्षरी)। इन तीनों में तिरुमन्त्र को अधिक उच्च समझते है क्योंकि कि वे अर्थ-पञ्चक के स्वभाव को समझाते है – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, लक्ष्य और विरोधी को मूल तरिके से समझाते है। क्योंकि तिरुमन्त्र अन्य मन्त्र के मुक़ाबले अर्थ-पञ्चक को अधिक स्पष्टता से समझाता है इसलिये वह सर्वश्रेष्ठ है।
  • कोयिलिल वालुम वैष्णवन” – वह जो सेवा करता है, श्रीरंगम में रहता है और यह उसके लिये मुख्य पहचान है। यह न जानना बाधा है। यह श्रीरंगनाथ भगवान का श्रीरामानुज स्वामीजी को आदेश है – “यावच्चरिरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” – इस संसार में अपने बचे हुए समय को श्रीरंगम में खुशी से बिताओं। क्योंकि यह सभी के लिये सम्भव नहीं है इसलिये इसमें सभी दिव्य देशों को शामिल करना चाहिये। वैष्णव का यहाँ अर्थ है वह जो द्वय महामन्त्र की ओर स्पष्ट है। खरा अर्थात स्पष्ट ज्ञान होना और जो सीखा है उसको अभ्यास में लाना। श्रीवैष्णवों का आचरण इस तरह होना चाहिये कि हमारी पहिचान “परम सात्विक, परम प्रामाणिकर (आधिकारिक)”, आदि ऐसे होनी चाहिये। कृपया तिरुमालै के ३८वें पाशुर को देखिये – “…काम्बरत्तलै शिरैत्तुन कडैत्तलै इरुन्दु वालुम शोम्बरै उगत्ति…”। अनुवादक टिप्पणी: तिरुमालै के ३८वें पाशुर की स्तुति श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै स्वामीजी इस तरह करते है “विस्तारपूर्वक द्वय महामन्त्र कि व्याख्या”। विशेषकर पाशुर के इस भाग में स्वयं को उपायान्तर से पूरी तरह अलग करना दर्शाया है। स्वयं के केश (बाल) देना अर्थात अहंकार का त्याग करना क्योंकि पुराने जमाने में जब किसी को नीचा दिखाना होता तो उसके केश काट देते थे। उसी तरह हमें स्व प्रयत्न का पूर्ण त्याग कर अपनी रक्षा के लिये भगवान की शरणागति करनी चाहिये। ऐसे व्यक्ति को “चोम्बर” (आलसी) ऐसा समझाया गया है। परन्तु किसी को “वालुम चोम्बर” (हर्षित आलसी व्यक्ति) भी होना चाहिये – वह जो स्वयं के सच्चे स्वभाव को जान सकता है, भगवद/भागवतों के कैंकर्य में निरत होता है और उसके कारण आनन्द से रहता है। ऐसे जन भगवान को नित्यसुरियों के समान प्रिय है।
  • पहिचान / नाम / प्रतिष्ठा की प्राप्ति अपने गाँव / जाति / परिवार, आदि के कारण पाता है वह व्यर्थ है। यह न जानना बाधा है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ७८वें सूत्र में इसे समझाया गया है – “ग्रामलकुलाधिगलाल वरुम पेर अनर्त्त हेतु”। ग्राम अर्थात गाँव। कुल अर्थात जाति / परिवार। क्योंकि ऐसी आदत घमण्ड की ओर ले जाता है (उदाहरण कि तौर पर: “मैंने ऐसे दिव्य देश में जन्म लिया है” या “मैंने ऐसे महान आचार्य पुरुष परिवार में जन्म लिया है”) और अन्त में यह हमारे नम्र श्रीवैष्णव होने के स्वभाव को लुप्त करता है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीपाञ्चरत्न से अपने वाख्या के समर्थन में एक प्रमाण देते है। “एकांति व्यपथेश्तव्यो नैव ग्रामकुलाधिभि: विष्णुना व्यपथेश्तव्यो तस्य सर्वम स एव हि” – जो भगवान के पूर्ण शरण हो गया हो उसकी पहचान उसके जन्मस्थान या परिवार से नहीं होती है जहाँ उसने जन्म लिया है। उसकी पहिचान भगवान से सम्बन्ध से होता है। ऐसे भक्तों के लिये स्वयं भगवान ही उसके जन्मस्थान, परिवार, आदि हैं।
  • प्रपन्न जन कूटसत्तर परांकुश, आदि है। यह न जानना बाधा है। कूटस्त्त सामान्यतया एक परिवार रूपी पेड़ में सबसे पहिले व्यक्ति के लिये उपयोग करते है। आचार्य हृदय के ३६वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है कि “विप्रर्क्कु गोत्र शरण सूत्र कुठस्तर पराशर पाराशर्य बोधायनाधिगल; प्रपन्न जन कुठस्तर परांकुश परकाल यतिवराधिगल” – ब्राह्मणों के लिये उनके मुख्य पूर्वज (उनके गोत्र, सरणा (वेद का एक भाग जिसे उन्हें पढ़ना है), सूत्र (शास्त्र का एक अंग जो कर्मानुष्ठान को दिशा निर्देश करता है)) ऋषियों जैसे पराशर, व्यास, बोधायन को मान सकते है; श्रीवैष्णवों के लिये जिन्होंने शरणागति के राह को चुना है उनके लिये श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी ही मुख्य पूर्वज है। वैदिक कर्मानुष्ठान को करते समय हमें प्रणाम, अभिवादन, आदि करना पढ़ता है। परन्तु प्रपन्नों के लिये उन्हें कभी भी आल्वरों और आचार्य के सम्बन्ध से पहचान बताना है क्योंकि यह वे है जिन्होंने जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को बताया है जो कि भगवद और भागवतों के दास बनकर उनके शरण होते हैं।
  • ऋषिगण जो अभी तक संसार में पारिवारिक जीवन में लगे है और जो श्रीवैष्णव होकर भी अपने पूर्वज के दिये हुए अब तक पत्ते खाते है। यह न मानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के ५८ से ६२ चूर्णिकै में ऋषि और श्रीशठकोप स्वामीजी के मध्य के अन्तर को बड़ी सुन्दरता से दर्शाया गया है। चूर्णिकै ५८ – ऋषि वे हैं जो ध्यान, योग, आदि में लगे हुए रहते हैं और स्वयं को स्वपरिश्रम से एक उच्च स्थिति में ले जाते हैं। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी पर स्वयं भगवान ने निर्हेतुक कृपा किये है और भगवान के गुणों का ज्ञान होने के कारण वे उनके प्रति प्रेम और भक्ति से पूर्ण हो गये। चूर्णिकै ५९ – ऋषि बहुत बड़े ज्ञानी थे फिर भी संसार लगाव उनमें था (कई उदाहरण है जहाँ बड़े साधु सांसारिक चाह के कारण पकड़े गये है और अन्त में उस परिस्थिति से बाहर आते और फिर पकड़े जाते)। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी सांसारिक चाह से पूरी तरह पृथक थे। चूर्णिकै ६० – उच्च जीवन के रहन सहन के कारण ऋषि वन में रहकर कच्चे फल, सब्जी, पत्ते, जल और कभी कभी हवा भी पाते है। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी निरन्तर भगवान कृष्ण का स्मरण करते रहे – वे स्वयं श्रीसहस्रगीति में कहते है “उण्णुम सोरु परुगुम निर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन” – मेरा प्रसाद, जल, ताम्बूल सभी कृष्ण हीं है। चूर्णिकै ६१ – अपने पुत्र के बिछड़ने से जो दुख होता है (व्यासजी को बड़ा दुख हुआ जब उनका पुत्र सुखा उन्हें अकेला छोड़ चला गया) वह दुख श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान से बिछड़ने से महसूस करते है। चूर्णिकै ६२ – हालाँकि ऋषि बहुत समझदार होते हैं परन्तु कभी कभी फलान्तर, साधनान्तर और देवतान्तर के प्रति अपना लगाव प्रगट कर देते है। परन्तु आल्वार पूरी तरह भगवान के प्रति अपने कैंकर्य की ओर निरत थे। केवल भगवान ही उपाय और उपेय और केवल भगवान की अर्चा विग्रह हीं पूजनीय हैं। ऋषि और आल्वार के इस भेद के कारण ही प्रपन्नों के लिये अपने पूर्वज ही आल्वार और आचार्य हैं इसे स्वीकार करना चाहिये।
  • श्रीसहस्रगीति को पूरे ध्यान से न पढ़ना और उसमें बताये हुए तत्वों का पालन न करना जो हमें एक सच्चा श्रीवैष्णव बनाता है, बाधा है। आचार्य हृदय के ३७ चूर्णिकै में अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार यह समझाते है कि “अध्ययन ज्ञान अनुष्ठानंगलाले ब्राह्मणयमागिराप्पोले चंदनगलायिरमुम अरियक कट्रु वल्लारानाल वैष्णवत्व सिद्धि” – जैसे एक ब्राह्मण का ब्राह्मणत्त्व वेदों के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है वैसे ही एक वैष्णव की वैष्णवता श्रीसहस्रगीति के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है। यहाँ अरिया का अर्थ है एक आचार्य से श्रीसहस्रगीति का अध्ययन करना; कर्रु का अर्थ एक आचार्य से भगवद विषय कालक्षेप का अध्ययन करना; वल्लार का अर्थ है वह जो अपने स्वयं के जीवन में सीखे हुए तत्वों को अपने जीवन में उतारना। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियककट्रु वल्लार वैट्टणवर आल्कदल ज्ञालत्तुल्ले” – जिसने श्रीसहस्रगीति का अर्थानुसन्धान किया है और जो इसको अपने जीवन में उतारता है वही इस संसार में वैष्णव माना गया है।
  • यह न जानना कि किसी का वर्ण जो घमण्ड की ओर ले जा सकता है और भागवत अपचार कराता है। इसका त्याग न करना बाधा है। कोई भी वर्ण का क्यों न हो एक वैष्णव अर्थात वह भगवद और भागवतों के कैंकर्य में निरत होना चाहिये। एक उच्च वर्ण में जन्म लेने का घमण्ड होना भागवत अपचार कराता है और इसलिये इस बर्ताव का त्याग करना चाहिये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुमला गये तब श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी (जो उनके मामाजी और आचार्य थे) स्वयं बाहर आकर उनका स्वागत किये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने पूछा किसी ओर को क्यों न भेजा तो उत्तर दिये कि “जब मैंने देखा तो मुझसे हीन और कोई नहीं दिखा” – यह उनकी नम्रता थी। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” के २०७ से २१७वें सूत्र में इस विषय पर चर्चा विस्तार से हो गयी है। शास्त्र में सामान्यता वेदाध्यन जो भगवद विषय पर केन्द्रित है ब्राह्मण वर्ण  को उत्कृष्ठ माना गया है। परन्तु केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेना और इसका पालन करने से भी घमण्ड आ सकता है। इसलिये श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह स्थापित किये कि “जन्म जो घमण्ड का कारण हो” वह निकृष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य होने से उपायान्तर (अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति, आदि) में भी लगा सकते है ताकि वे वेदाध्यन करे। अत: में वों घोषित करते हैं कि “जन्म जो नम्रता प्रदान करता है और उपायान्तर से दूर रखता है वही उत्कृष्ठ जन्म है”। आचार्य हृदय के ८५ चूर्णीकै में अजगिया मणवाल पेरुमाल नायनार इस तत्व को विस्तार से समझाते हैं। यह बड़ा पेचिदा पहलू है – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या को कालक्षेप की तरह एक आचार्य के सन्निधी में उसका गूढ़ार्थ समझने हेतु सुनना चाहिये।
  • यह न जानना कि वर्णाश्रम प्रथा जिससे उपायान्तर में आसानी से कार्य रत हो सकते हैं और अपने आप को शिष्ट या नम्र मानता है (प्राकृतिक नम्रता के बदले) नीचता है बाधा है। श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है “नैच्यम जन्म सिद्धम” – नम्रता एक स्वाभाविक गुण है। जीवात्मा स्वाभाविकता से ही नित्य भगवान का सेवक है। हम किसी भी वर्ण में क्यों न हो हममें स्वाभाविक नम्रता होनी चाहिये उसे कल्पना नहीं करना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी भी कहते हैं “नीर नुमधु एनरिवै वेर मुधल माय्त्तु” – हमें पूरी तरह अपना अहंकार और ममकार का त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में यह समझाया गया है कि क्षुद्र वर्ण के लिये नम्रता जो सच्ची भक्ति के लिये आवश्यक है वह उनमे स्वाभाविक गुण है और इसी कारण से वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं है, उपायान्तर में कोई सम्बन्ध नहीं है – इसलिये वैष्णव बनने के लिये वें अधिक योग्य है। अन्य वर्ण में यह सम्भव नहीं है। हमें घमण्ड का त्याग कर भगवान और भागवतों का नम्र दास बनना चाहिये।
  • यह न जानना कि जन्म जो हमें पूर्ण उपायान्तर से दूर कर देता है और स्वाभाविक नम्रता प्रदान करता है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है हमें स्वाभाविक नम्रता की चाहना करना चाहिये और भगवान की शरण होना चाहिये – केवल ऐसे व्यक्ति श्रीवैष्णव बनने के योग्य है।
  • यह न जानना कि छोटे जनों के दोष बड़े लोगों के पवित्र दृष्टि से पराजित हो जाते है, बाधा है। जब महान श्रीवैष्णव किसी की ओर करुणा से देखते है तब उस मनुष्य के सभी दोष मिट जाते है। जब एक श्रीवैष्णव का लड़का पथभ्रष्ट होकर जाता है और लौटने पर पवित्र हो जाता है तो उसके पिताजी पूंछते है कि “क्या तुम्हें श्रीकुरेश स्वामीजी ने देखा और यह कृपा किये?” – पवित्र श्रीवैष्णवों की ऐसी योग्यता है जो सभी दोष और अशुभ को मिटा देते है।
  • अहंकार, आदि दोषों को निकाले बिना पवित्र श्रीवैष्णवों के संग में रहना और उन्हें पीड़ा पहुँचाना बाधा है।
  • दिव्य रत्न जैसे श्रीवैष्णवों पर शंका करना और उनकी योग्यता पर सन्देह करना बाधा है। वर्ण की पहचान किये बिना पवित्र श्रीवैष्णवों को दिव्य रत्न कहते है। हमें कभी भी उन पर सन्देह नहीं करना चाहिये नाही दूसरों को पवित्र करने की उनकी योग्यता पर सन्देह करना चाहिये। हम यहाँ स्मरण कर सकते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं स्नान के पश्चात श्रीदाशरथी स्वामीजी के कन्धो को पकड़ते थे जो बाह्मण नहीं थे। इसलिये उनकी पवित्रता पर कोई शंका नहीं है।
  • यह न मानना कि ऐसे महान ज्ञानी हमारे आचार्य से भी अच्छे और भगवान से भी बड़े है, बाधा है। एक बार जिसे भगवद विषय में विश्वास हो गया हो चाहे वह किसी वर्ण, परिवार, आदि का क्यों न हो – उसे एक बार हमारे आचार्य के बराबर सम्मानित किया जाना चाहिये। वे भगवान से भी बड़े है। पेरिय तिरुमोळि में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “निन तिरुवेट्टेलुत्तुम कट्रु यानुट्रतु उन्नडियार्क्कु अडिमै” – तिरुमन्त्र सीखने के पश्चात मैंने यह समझा है कि मैं आपके दासों का दास हूँ। सामान्यतय भागवतों को भगवान से भी अदिक पूजना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी “नेदुमारकदिमल” पादिगम में यह स्थापित करते है कि भागवत जन हीं उनके स्वामी है और “पयिलुम चुडरोलि” पादिगम में यह प्रमाणित करते है कि भागवत जन उनके कैंकर्य के पदार्थ है। आगे कहते है “पयिलुम चुडरोलि मुर्त्तियैप पंगयक कण्णनै पयिल इनिय नम पारकडल चेरन्ध परमनै पयिलुम तिरुवुदैयार यवरेलुम अवर कण्डीर्पयिलुम पिरप्पिदै थोरु एम्मै आलुम परमरे” – वह जो भी हो अगर वह दीप्तिमान भगवान जिनके कमल नयन हो और जो क्षीरसागर में विराजमान हो उनकी पूजा करता हो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से मुझे नियन्त्रण में रख सकता है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २२२वें सूत्र से आचार्य साम्यम के तत्व और भगवान से भी बड़ा को समझाया गया है। यहाँ वह समझाते है कि आचार्य स्वयं शिष्य को दिशानिर्देश करते है कि अन्य श्रीवैष्णव को स्वयं आचार्य जैसे अच्छा मानने के लिये, सभी शिष्यों को आचार्य के समान मानना। आगे कहते हैं श्रीवैष्णव भगवान से उच्च है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इन पहलू को अपने व्याख्या में स्थापित कर समझाते है। वह कहते है जीवात्मा को भगवान कभी कभी उसके कर्म के आधार पर इस संसार में रखते है परंतु श्रीवैष्णवों को अपने निर्हेतुक दया कृपा से मोक्ष ही प्रदान करते है। जब जीवात्मा भगवान के शरण आते हैं तो भगवान अम्माजी के पुरुषाकार से ही स्वीकार करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव उनके निकट आते ही उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। भगवान जो दिव्य देशों में अर्चा रूप में विराजमान हैं जहाँ वे किसी से वार्ता नहीं करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव दूसरों के स्वभाव अनुसार उनसे उचित कैंकर्य करवाते है। इसलिये भगवान से भी अदिक स्तुति श्रीवैष्णवों की होती है।
  • वैष्णव होकर देवतान्तर में थोड़ा भी लगना बाधा है। देवतान्तर सम्बन्ध वैष्णवों के लिये दाग है। यह केवल वैष्णवता को नष्ट करेगा। इसलिये इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इससे सम्बंधित हम कई घटनायें देख चुके है। एक बार श्रीरंगनाथ भगवान की सवारी के समय ज़ोर वर्षा हो रही थी और उन्हें एक मण्डप में ले जाया गया जो कि तिरुवानैक्कावल शिवजी का मन्दिर था। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी अन्दर नहीं गये और कहा कि “भगवान स्वतन्त्र हैं वे कही भी जा सकते हैं परन्तु हम उनके सेवक हैं इसलिये हम देवतान्तर के मन्दिर में नहीं जा सकते है”। श्रीधनुर्दास स्वामीजी के भतीजे जो पक्के श्रीवैष्णव थे उन्हें धोखे से जैन मन्दिर में ले जाया गया जो विष्णु का मन्दिर जैसे दिखता था। जब उन्हें यह पता चला तो दोनों मूर्छित हो गये और जब श्रीधनुर्दास स्वामीजी की चरण रज उनके माथे पे लगायी गई तब उन्हें होश आया। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को एक बार अनुमान हुआ कि उनका अवैष्णव से सम्पर्क हुआ तो उनकी माता की सलाह से उन्होंने एक ब्राह्मण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर स्वयं को पवित्र किया। ऐसी कई घटनायें हैं जहाँ हमारे पूर्वाचार्य देवतान्तर सम्बन्ध से बचे हैं।
  • अन्य के जन्म के प्रथा का पालन कर स्वयं के सम्प्रदाय के विश्वास को खोना बाधा है। जब कोई वैष्णव बनता है तो दूसरे धर्मों की ओर लगाव का त्याग करना चाहिये। उदाहरण के तौर पर भस्म, आदि लगाना हमारा वैष्णव सम्प्रदाय के प्रति आस्था को कम करता है। अनुवादक टिप्पणी: इसे स्वधर्म पालन करने का एक पहलू ऐसे भी देखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक श्रीवैष्णव अगर वह ब्राह्मण है तो उसे अपने नियमानुसार रहना चाहिये नाकि एक क्षत्रीय या वैश्य के नियमानुसार रहना चाहिये। हम जिस किसी भी वर्ण में रहे उस वर्ण में रहकर भी श्रीवैष्णवता का पालन कर स्पष्ट रूप से नम्रता, पूजा, सेवा, आदि से रह सकते है। हमें वर्ण बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि शास्त्र का यह अपमान कर केवल गड़बड़ी होगी। हमारे पूर्वाचार्य भी केवल वैष्णवता और वर्णाश्रम धर्म को महत्त्व देने को कहे है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/08/virodhi-pariharangal-34.html

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