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श्री वैष्णव लक्षण – २

श्री:
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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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पञ्च संस्कार

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हमारे पहले अनुच्छेद में श्री वैष्णवों के बाह्य स्वरूप और गुण के बारे में पढ़ा था.

कोई हमसे पूछ सकता है किसी का बाह्य स्वरूप इतना आवश्यक क्यों है? शास्त्रों में दिए गए बाह्य स्वरुप के बिना ही मैं श्रीवैष्णव क्यों नहीं बन सकता?” यह एक उच्च कोटी के श्री वैष्णव के लिये सम्भव हो सकता है, लेकिन साधारण मनुष्यों के लिये नहीं। हमारे लिये शास्त्र ने कुछ नियम बनाये हैं और हमें उनके पालन करना अत्यंत आवश्यक है| एक लौकिक उधारण हैजब एक सिपाही अपने कर्तव्य में अच्छी तरह वरदी पहनता है, तो उस देश का कानून उसे कुछ ताकत देता है।

परन्तु वह यह नहीं कह सकता कि मैं सिपाही हूँ मुझे अपने कर्तव्य के दौरान वरदी की क्या जरुरत है? कुछ विशेष लोगो के लिये यह अपवाद हो सकता परंतु अगर वो यह वरदी नहीं पहनता तो उसे वह मानसम्मान नहीं मिल सकेगा। और चिंता की बात तो यह है कि कामकाज़ के लिए वर्दी पहनने में किसी को कोई संकोच नहीं होता है मगर शास्त्रों में दिए गए आज्ञाओं के पालन करने में ही संकोच होता है| यही दुःख की बात है|

श्रीवैष्णवम

श्रीवैष्णवम एक अनंत तत्त्व ज्ञान है और इसमे श्रीमन नारायण इन तथ्वों का केंद्र बनकर स्थापित हैं। वे पूरे मंगल गुण से भरपूर हैं। वे इस नित्य विभूती और लीला विभूती के मालिक हैं। तत्त्वत्रय ज्ञान के अनुसार ये तीन संस्थाएं मुख्य माना जाता है ईश्वर, चित और अचित। ईश्वर दोनो चित और अचित के मालिक हैं। इन दोनो नित्य विभूती और लीला विभूती में अनगिनत जीव हैं। यह तत्त्व ज्ञान और सिद्दान्त सब शास्त्र (वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण, पञ्चतंत्र, आल्वार और आचार्यों की श्रीसूक्ति ) पर आधारित हैं। यह शास्त्र विशेषकर चित के लिये ही हैं और यह शास्त्र इस चित को इस लीला विभूती (इसे श्रीभगवद गीता में अशाश्वत और दु:खकालयम बताया गया है) से श्रीवैकुण्ठ (वह जगह जहाँ कोई दु:ख नहीं है केवल सुख ही सुख है) जाने के लिये मदद करता है। यह प्रक्रिया जिससे इस चितयात्रा प्रारम्ब होता है ( लीला विभूती से नित्य विभूती को ), उसे पञ्च संस्कार कहते हैं।

एक श्रीवैष्णव कैसे बनना चाहिए?

हमारे पूर्वाचार्यों के अनुसार एक व्यवस्थित संस्कार (प्रक्रिया) जहाँ एक कोई भी श्रीवैष्णव बनता है, उस विधी को “पञ्च संस्कार” कहते हैं।

संस्कार एक शुध्द या निर्मल करने की विधी है। यह एक विधी है जहाँ किसी का रुप परिवर्तन एक अशिक्षित दशा / अवस्था से शिक्षित दशा में होती है। यही वह विधी है जहाँ कोई पहले श्रीवैष्णव बनता है। जैसे कोइ अगर ब्राम्हण परिवार में जन्म लेता है तो उसे ब्रम्ह विधी से गुजर कर ब्राम्हण बनना आसान हो जाता है। उसी तरह एक श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेकर उसे पञ्च संस्कार कि विधी से श्रीवैष्णव बनना आसान हो जाता है। यहाँ पर एक ब्राम्हण परिवार के साथ तुलना करने का कारण यह है कि किसी को श्रीवैष्णव बनने के लिये एक श्रीवैष्णव परिवार में ही जन्म लेने की कोइ आवश्यकता नहीं है क्योंकि श्रीवैष्णवम आत्मा से जुडा है और ब्राम्हणयम किसी के शरीर से जुडा है। और एक बहुत जरूरी बात श्रीवैष्णवों के लिये यह है कि वह पूरी तरह अपने आप को देवतान्तरों से (देवता याने ब्रम्हा, शिवजी, दुर्गा, सुब्रमन्य, इन्द्र, वरुण आदि जो कि पूरी तरह भगवान श्रीमन्नारायण के नियंत्रन में हैं) और जो देवतान्तरों से सम्भंधीत कार्य है उससे दूर रहे।

पञ्च संस्कार

पञ्च संस्कार/ समाश्रय, इसे शास्त्र बताता है कि यह एक विधी है जहाँ एक व्यक्ति को श्रीवैष्णव बनाया जाता है। निम्नलिखित श्लोक पञ्च संस्कार के विभीन्न पाँच क्रिायों के बारे में बताता है:

ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मन्त्रो यागश्च पंचम:”

तप्त, पुण्ड्रा, नाम, मंत्र, याग यही पञ्चसंस्कार कहा जाता है

ताप: शंकचक्र लांचनम् तप्त शंकचक्र को अपने दोनो बाहु पर अंकित करना। यह पहचान हमें भगवान श्रीमन्नारायण की आस्थी करा देता है। जैसे किसी बर्तन पर उसके मालिक की पहचान होती है वैसे ही हम पर भगवान के चिन्ह अंकित किया जाता है।

पुण्ड्र: द्वादश ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करना। शरीर के बारह जगह पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करना चाहिए।

नाम:दास्य नामः आचार्य स्वामी द्वारा दिए गए नाम धारण करना ( जैसे रामानुजदास, मधुरकविदास, श्रीवैष्णवदास)

मंत्र: मन्त्रोपदेश आचार्य से मंत्र सीखनामंत्र वो होता है जो बोलने वाले की पीढियां हठाता है यहाँ अष्टाक्षर मंत्र, द्वयमंत्र और चरम श्लोक संसार से पीड़ित जीवात्मा को मुक्ति दिलाती है।

याग: देव पूजा तिरुवाराधन का क्रम सीखना

पञ्च संस्कार के लक्ष्य

  • शास्त्र कहता है, “तत्त्व ज्ञान मोक्ष लाभ:” – याने ब्रह्ममज्ञान के दौरान एक जीवात्मा को मोक्ष प्राप्ति होती है। अपने आचार्य से अर्थ पंचकम का बहुमूल्य ज्ञान प्राप्त करके ( ब्रह्मम भगवान, जीव जीवात्मा , उपाय परमात्मा तक पहुँचने कि रास्ता, उपेय परिणाम , विरोधी बाधाओं — – यह सब मन्त्रोपदेश का अंग हैं ) हम अपने अंतिम लक्ष को प्राप्त करने के योग्य बन सकते हैं यानि नित्य विभूति में श्रीपति का कैंकर्य करने का योग्य प्राप्त कर सकते हैं।

  • हमें अपने हर रोज की दिनचर्या में हमारे इस जीवित काल में आचार्य कैंकर्य, श्री वैष्णव कैंकर्य और तिरुवराधन के द्वारा भगवद् कैंकर्य करते रहना चाहिए ( जितना हो सकता है उतना ) और दिव्य देश का कैंकर्य भी करना चाहिए।

उपर यह प्रकाश डाला गया हैं कि, एक श्रीवैष्णव का तत्त्व ज्ञान यही होना चाहीए कि इस लीला विभूति को छोडकर (संसार) नित्य विभूति (परमपद) में जाना चाहिए और वहाँ बिना कोइ रूकावट के भगवान श्रीमन्नारायण का कैंकर्य करना चाहिए ।

पञ्च संस्कार कौन कर सकता हैं?

श्रीवैष्णवम एक अपरिवर्तनशील (नित्य) तत्त्व ज्ञान है उसे हमारे आचार्यों और आल्वारों ने उसका पुनर्निर्माण किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने शास्त्र को पढकर और उसे फिर से अपने आचार्यों और पूर्वाचार्यों के दिशा के अनुसार फिर से स्थापित किया जो समय के साथ खो गया था। उन्होंने ७४ पीठादीश (आचार्य और धर्म गुरू) कि स्थापना की और उन्हें यह अधिकार दिया कि वह किसी का भी पञ्च संस्कार कर सकते हैं जो इस जीवन के लक्ष को समझा है (लीला विभूति को छोडकर नित्य विभूति में जाना)। जो भी इस दर्जे में आता है वह यह पञ्च संस्कार पा सकता है। श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इन दोनो ने कुछ मठ (वानप्रस्थाश्रम ) और जीयर स्वामीजी (सन्यासियों) को नियमित किया था जो भी पञ्च संस्कार करने के अधिकारी हैं। जात, पात, देश, लिंग, धन की परिस्थिथी, घर की परिस्थिथी, इत्यादि पर आधारित यहाँ कोइ भेदभाव नहीं है। जो भी मोक्ष के पथ पर चलने की इच्छा रखता हो वह इसमें शामिल हो सकता है।

क्या पञ्च संस्कार शुरुआत है या अंत?

यह एक सामान्य गलत फेमी है, कि समाश्रय कि विधी एक साधारण और सरल अनुष्ठान है और वही इस रास्ते का अंत भी है। यह बिलकुल गलत फेमी है। यह तो एक श्रीवैष्णव् की यात्रा की शुरुआत है। अंतिम लक्ष्य तो यह है कि हर एक जीवात्मा लीला विभूती को छोड़कर नित्य विभूती जाये और नित्य ही श्रीमान नारायण की सेवा में लगे रहे और नित्य ही आनंदित रहे और वह विधी हमारे पूर्वाचार्यों ने दे दी है (इसे हम आगे देखेंगे )। यह तो उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह उस विधी को पालन करता है या नहीं। पञ्च संस्कार एक आचार्य और शिष्य के बीच में एक सुन्दर रिश्ता भी बना देता है। यह किस तरह का रिश्ता हैं वह हम आगे देखेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासि

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-lakshanam-2.html

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श्री वैष्णव लक्षण – १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

बाह्य स्वरूप

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अपने पूर्वाचार्यों के बहुत से ग्रन्थो में बहुत से जगह श्री वैष्णवों के लक्षणो के बारे में उल्लेख किया है। इसी संर्दभ में हमें अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में बहुत से उधारण मिलेंगे।

पद्म पुराण में एक मौलिक प्रमाण दिया गया है जिसे हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों में उपयोग किया है

ये कण्ठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला ये बाहुमूल परिच्रिन्हत शंख चक्रा |
ये वा ललाट पटले लसदुर्ध्वपुण्ड्रा ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्र यन्ति ॥

यह पूरा श्लोक हमें स्पष्ट से बताता है कि एक श्रीवैष्णव का पूर्ण बाह्य स्वरूप किस तरह होता है और कैसे वह उस जगह को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुध्द करता है।

जिसके गले में तुलसी और कमलाक्ष की माला, (भगवान, पूर्वाचार्य, आचार्य, आल्वार इनके द्वारा धारण किये गये पवित्र माला) जिनके कंधों में भगवान श्रीमन नारायण के चिन्ह शंखचक्र अंकित है (पञ्चसंस्कार की एक विधी) और ललाट पर सच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र विराजमान है (मतसम्प्रदाय के गुरू का दिया हुवा चिन्ह गौरव सहित धारण करना चाहिए। श्री वैष्णवों को (मृतिका) पासा का सुन्दर सच्छिद्र अपने ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करके उसको अलंकृत करने के लिये (बीच में) हरिद्रा का श्री धारण करना चाहिए। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक में ये खडी दोनो रेखाये शरणागती का प्रतीक हैं। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक भगवान के श्रीचरण कमल हैं और बीच में स्थित लक्ष्मीजी का स्थान है। हमारे पूर्वाचार्य तो हमेशा द्वादश तिलक धारण करते थे और करते आये हैं । ऎसे श्री वैष्णव, वातावरण को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुध्द करता है।

हमारे पूर्वाचार्यों ने सदैव अपने बाह्य स्वरूप को मुख्य स्थान दिया है और सदैव यह खयाल रखा है कि किसी भी परिस्थिती में अपने स्वरूपानरूप बाह्य स्वरूप का पूरा ध्यान रखें। बाह्य स्वरूप ही श्रीवैष्णवों की मुख्य पहचान है, सिर्फ एक परम श्रीवैष्णव ही दूसरे वैष्णवों को बिना बाह्य स्वरूप की आंतरिक स्वरूप से पहचान सकता है (इसके लिये कृपा के दिव्य दृष्टी की जरूरत है जो परम भागवतो में होती है, सामान्य जन में नहीं!)

इस शुरुवात के साथ हम अपने पूर्वाचार्यों के अनेक ग्रन्थों से श्री वैष्णव लक्षण के प्रमाणो को देखेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासि

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