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अन्तिमोपाय निष्ठा – ६ – भगवान् के ऊपर आचार्य की उच्च स्थिति

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – ५ – भट्टर्, श्री वेदान्ति जीयर् (नन्जीयर्) और श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै)) में, हमने भट्टर्, श्री वेदान्ति जीयर् (नन्जीयर्) और श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के दिव्य व्यवहारों को देखा। हम इस लेख में हमारे पूर्वाचार्यों के साथ हुए और कई घटनाओं का क्रम जारी रखेंगे।

गोष्ठीपूर्ण (तिरुक्कोष्ठियूर् नम्बि) स्वामी एक बार श्रीरंगम-धाम मे जारी उत्सव के समय आकर उत्सव-समय पर्यन्त वहीं वास करते है। श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) उत्सव-समय पर्यन्त गोष्ठीपूर्ण स्वामी (तिरुक्कोष्ठियूर् नम्बि) की सेवा करते हैं। जब गोष्ठीपूर्ण (तिरुक्कोष्ठियूर् नम्बि) प्रस्थान कर रहे थे, श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) ने उनसे पूछा, “कृपया मुझे कुछ अच्छे निर्देश दें जिनका मैं शरण ले सकता हूं”। गोष्ठीपूर्ण (तिरुक्कोष्ठियूर् नम्बि) कुछ समय के लिए स्वनेत्र बंद करके कहते हैं, “हम यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के अधीन प्रशिक्षण से गुजर रहे थे। उस समय, जब वो (यामुनाचार्य) नदी में बैठ कर नीचे झुकके एक डुबकी लेते हैं, तो उनकी ऊपरी पीठ एक सुंदर चमकदार तांबे के बर्तन जैसा दिखता है। मैं हमेशा इस दिव्य दृष्टि का शरण लेता हूं। आप भी इसी दिव्य दृष्टि का शरण ले ” – यह घटना बहुत लोकप्रिय है (अनुवादक का टिप्पणीः ६००० पडि गुरु परम्परा प्रभाव में भी यही घटना समझाई गई है। यह घटना इंगित करती है कि शिष्य का ध्यान आचार्य के दिव्य रूप पर ध्यान केंद्रित करने में होना चाहिए)। ऐसा कहा जाता है कि, गोष्ठीपूर्ण (तिरुक्कोष्ठियूर् नम्बि) मुख्य गोपुर के ऊपरी स्थर पर तिरुक्कोष्ठियूर् मंदिर में यामुनाचार्य (आळवन्दार्) पर ध्यान केंद्रित करते थे और हमेशा “यमुनैतुरैवर्” (यामुनाचार्यर्) मंत्र पढ़ते थे।

हमारे जीयर् इस निम्नलिखित घटना को बताते हैं। एक बार श्रीरामानुजाचार्य (उडयवर्), एक गूंगे (मूक) व्यक्ति पर अपनी निर्बाध दया को बरसाने के लिए, उसे अपने कमरे में ले गये, उसे अपने दिव्य रूप और चरणकमलों को संकेत भाषा के माध्यम से दिखा कर मूक व्यक्ति को उनके चरणकमलों मे पूर्ण शरण लेने को कहते हैं। मूक व्यक्ति उत्साहित होकर श्रीरामानुजाचार्य (उडयवर्) के सामने झुकता है। श्रीरामानुजाचार्य (उडयवर्) मूक व्यक्ति के सिर पर अपने चरणकमल रखते हैं और पूरी तरह से उसे आशीर्वाद देते हैं। श्री कूरेश (कूरत्ताऴ्वान्) उस समय यह देखकर मन ही मन में कहते हैं ” अहो ! अगर मैं एक मूक व्यक्ति के रूप में पैदा हुआ होता तो मुझे भी सही मार्ग दिखाया जा सकता था (जो श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) के दिव्य रूप को कुल शरण के रूप में स्वीकारना है)। इसके बजाय, मैं आऴ्वान् के रूप में पैदा हुआ और पूरी तरह से शास्त्र सीखा। लेकिन इस कारण, श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) ने मुझे प्रपत्ति का मार्ग दिखाया और इस प्रकार मैं श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) के दिव्य रूप का पूर्ण आश्रय लेने के लिए अयोग्य हो गया! ” और स्वयं उदास/परेशान हो जाते हैं।

श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) एक बार श्री शठकोप (नम्माऴ्वार) को मङ्गलाशासन करना चाहते थे और आऴ्वार-तिरुनगरि की ओर अपनी यात्रा शुरू करते है । रास्ते में श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) तिरुप्पुळिङ्गुडि दिव्य देश पहुंचते है। श्रीरामानुजाचार्य सड़क पर एक छोटी ब्राह्मण लड़की को देखते हैं और उससे पूछते हैं “ओह छोटी लड़की! यहाँ से आऴ्वार-तिरुनगरि कितना दूर है?” लड़की जवाब देती है “ओह विद्वान व्यक्ति! क्या आपने तिरुवाय्मोऴि नहीं सीखी?”। श्रीरामानुजाचार्य चौंक गए और लड़की से पूछते हैं “हम तिरुवाय्मोऴि सीखकर यहां से आऴ्वार-तिरुनगरि की दूरी कैसे जानेंगे?”। लड़की जवाब देती है, चूंकि आळ्ळवार कहते हैं – तिरुप्पुळिङ्गुडियाय्! वडिविणैयिल्ला मलर्मगळ् मट्रै निलमगळ् पिडिक्कुम् मेल्लडियैक् कोडुविनैयेनुम् पिडिक्क नी ओरुनाळ् कूवुतल् वरुतल् चेय्याये (तिरुवाय्मोऴि ९.२.१० – ओह तिरुप्पुळिङ्गुडि में वास करने वाले व्यक्ति  ! आप मुझे क्यों नहीं बुलाते या मेरे पास नहीं आते हैं, ताकि मैं आपके सबसे कोमल कमल चरणों की सेवा कर सकता हूं, जिनकी सेवा सबसे सुन्दर श्रीदेवि और भुदेवि नाचियार् करती हैं) – क्या आप नहीं जानते कि दूरी बहुत छोटी होनी चाहिए (क्योंकि अगर भगवान् (एम्पेरुमान्) वहां से बुलाते है आऴ्वार-तिरुनगरि में आऴ्वार अवश्य सुनेंगे)? “इसे सुनकर श्रीरामानुजाचार्य आऴ्वार के शब्दों में उस छोटी लड़की की बुद्धि और विश्वास से बहुत प्रसन्न हो जाते है। फिर श्रीरामानुजाचार्य अपने खाने पकाने का मिट्टी के पात्र को तोड़ते हैं और पूछते है के वो लड़की कहां रहती है। लड़की अपने घर में श्रीरामानुजाचार्य को लाती है और श्रीरामानुजाचार्य उस लड़की के माता-पिता, उस लड़की और उनके रिश्तेदारों को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकारते हैं, माता-पिता और लड़की को एक भोजन तैयार करने का निर्देश देते हैं (श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) को पेश करते हैं) और उनसे प्रसाद स्वीकार करते हैं। फिर वह वहां से निकलते हैं और आऴ्वार-तिरुनगरि पहुंचते हैं। उस दिन से, छोटी लड़की और उसके सभी रिश्तेदारों ने श्रीरामानुजाचार्य (उडयवर्) को उनकी पूजा करने योग्य देवता के रूप में माना और एक गौरवशाली जीवन जीया – यह हमारे पितरों द्वारा समझाया गया है।

उपर्युक्त घटनाओं से, हम समझ सकते हैं कि बच्चे, गूंगा (मूक), संसार में गिरे हुए, जो शास्त्र का अध्ययन करने के योग्य नहीं हैं, अभी भी एक असली आचार्य के साथ संबंध के माध्यम से अंतिम गंतव्य / लक्ष्य तक पहुंच जाएंगे। जैसा कि हम देख सकते हैं, छोटी लड़की और गूंगा (मूक) व्यक्ति ने श्रीरामानुजाचार्य (उडयवर्) के सबसे दयालु कृत्यों द्वारा सबसे गौरवशाली आशीर्वाद प्राप्त किया है।

निम्नलिखित २ घटनाओं (दूसरों के बीच) की पहचान पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि ५.५.१ नव् करियम् पसुर की व्याख्या श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) द्वारा की गयी है। (अनुवादक का टिप्पणीः ये २ घटनाएं आचार्य पर कुल विश्वास के महत्त्व को उजागर करती हैं और उन लोगों का सहयोग छोड़ती हैं जो केवल भगवान् की महिमा करते हैं, आचार्य को भगवान् के जितना या भगवान् से अधिक महत्व दिए बिना।

  • एक बार तिरुक्कुरुगैप्पिरान् पिळ्ळान् कोङ्गु क्षेत्र (कोयंबटूर, आदि) के लिए यात्रा कर रहे थे। वह एक श्रीवैष्णव की जगह पर आते हैं जहां वह अपना खुद का प्रसाद तैयार करने का फैसला करते हैं। लेकिन वह देखते हैं कि उस घर में हर कोई सिर्फ भगवान् का महिमागान (नाम सङ्कीर्तनम्) (आचार्य का स्मरण के बिना) कर रहे हैं। चूंकि इस तरह के महोल ने उन्हें खुश नहीं किया, इसलिए उन्होंने बस उस घर को छोड़ दिया।
  • एक बार, श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्) की सभा में, एक वैष्णव आकर तिरुमन्त्र सुनाता है। आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) इस दृश्य को देखकर घोषणा करते है की चूंकि तिरुमन्त्र का पाठ/जप गुरु-परम्परा मन्त्र को के बिना किया गया था, अतः जीभ के लिए यह अयोग्य है और उस जगह को तत्क्षण छोड़कर चले जाते हैं। (अनुवादक का टिप्पणीः पिळ्ळै लोकाचार्य ने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में घोषणा की है – एक सच्शिष्य (सच्चे शिष्य) को हमेशा गुरु परम्परा और द्वय का सदैव पाठ/जप करते रहना चाहिए)।

वार्ता माला मे, मालाधर (तिरुमालै आण्डान्) कहते है, “अगर मैं भगवद्विषय को पढ़ाना चाहता हूं तो इस भौतिकवादी दुनिया में बहुत से लोग सुनने और सीखने के लिए नहीं हैं। अगर हमने एक अर्क अखरोट बोया, कुछ उर्वरक डालें, जब तक यह अंकुरित न हो जाए, एक छोटा झोपड़ी बनाएं और वहां कई वर्षों तक इसे देखते रहें, आखिरकार हम कुछ इलाके मे छोटे अखरोट देखेंगे। कहने का तात्पर्य यह हुअा कि इस तरह के सभी परिश्रम दुखों का फल चूँकि महत्वहीन होता है, यहां भगवद्विषय में, हमें इस भौतिक संसार से राहत मिलेगी जो पीड़ा से भरी हुई है और हम परमपद प्राप्त करेंगे जो सभी शुभों से पूरित है। हमें आचार्य की ओर थोडी सी कृतज्ञता से देखना है जिन्होने यह सब संभव बनाया – लेकिन भौतिकवादी लोगों के लिए जो इस छोटी आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकते हैं, मैं भगवद्विषय को कैसे समझा सकता हूं? ” और बहुत दुखी हो जाते हैं। जैसा कि कहा गया है “गोग्ने चैव सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा; निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्क्रुतिः” (अनुवादक का टिप्पणीः यह श्लोक सबसे घृणास्पद पापों को सूचीबद्ध करता है जैसे कि गाय को मारना, शराब पीना, चोरी करना आदि, जिनके पास प्रायश्चित्त नहीं है – और ऐसे पाप करने वाले कृतघ्न लोग उन्हें पुण्य काल / शुभ समय के दौरान कुछ पवित्र कर्मों को करके इससे से मुक्त हो जाएगे) यदि कृत्यों (शारीरिक) में कृतघ्न शामिल है जिसमें गाय की हत्या करना, चोरी, इत्यादि बहुत घृणित है, तो आचार्य के प्रति कृतघ्न होने के बारे में क्या कहना है, जिन्होंनें जीवात्मा को स्वस्वरूप का दिव्य ज्ञान प्रदानकर जीवात्मा को शारीरिक सोच की स्थिति से आत्मा (आध्यात्मिक सोच) की स्थिति में बदल दिया – यह सबसे घृणित पाप है जिसका प्रायश्चित्त ही नहीं है।

रेत के साथ मिश्रित पानी और तेत्ताम् बीज (बीज का एक प्रकार) के साथ शुद्धीकरण क्रिया मे जिस प्रकार रेत अर्ध भाग में जमता है और साफ पानी शीर्ष भाग मे, ठीक उसी प्रकार सबसे दयालु आचार्य जीवात्मा (साफ पानी) शरीर (पात्र) में जो अज्ञानता (रेत) का स्रोत है, इसे तिरुमन्त्र (बीज) के साथ शुद्धीकरण करते है । अतः फलस्वरूप अज्ञानता कम होती है और ज्ञान प्रकाशमय हो जाता है। लेकिन जब तक शुद्ध पानी को किसी अन्य स्वच्छ पात्र में स्थानांतरित नहीं किया जाता है, जब भी पानी किसी और चीज से छूता है तो रेत आती है, जब तक कि वह परमपद में किसी अन्य शुद्ध शरीर में स्थानांतरित नहीं हो जाता तब तक जीवात्मा को इस शरीर में भी संभ्रमित ही रहना पडेगा । इस तरह के घबराहट से बचने के लिए शिष्य को आचार्य और अन्य श्रीवैष्णव के आस-पास रहना आवश्यक हैं जो आचार्य के रूप में अच्छे हैं। यह सिद्धांत हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा समझाया गया है।

यामुनाचार्य (आळवन्दार्), तिरुवनन्तपुरम् जाने के दौरान, अपने प्रिय शिष्य दैववारियाण्डान् को श्री रंगानाथ (एम्पेरुमान्) की माला-सेवा और श्रीरंगम में मठ की देखभाल करने का निर्देश देते हैं। आण्डान् बहुत चिंतित हो जाते हैं और तीर्थ और प्रसाद को नहीं स्वीकार करते हैं और दिन-प्रतिदिन पतले होते जाते हैं। श्री रंगानाथ (पेरिय-पेरुमाळ्) उनसे पूछते हैं “तुम ऐसा क्यों हो रहे हो?” और आण्डान् ने जवाब दिया “भले ही मेरे पास आपके (देवरिर्) के कैङ्कर्य और सेवा (दर्शन) हैं, फिर भी मैं अपने आचार्य यामुनाचार्य (आळवन्दार्) से अलग होने में असमर्थ हूं, यही कारण है कि मेरा शरीर पतला हो रहा है”। “अगर ऐसा है तो आप केवल आळवन्दार् के पास जाएं”। आण्डान् खुशी से जाते हैं और तिरुवनंतपुरम के बाहर नदी के तट पर यामुनाचार्य (आळवन्दार्) (जो तिरुवनंतपुरम से लौट रहे थे) से मिलते हैं। आण्डान् वहां जाते हैं, अपने आचार्य से मिलते हैं और उन्हे देखकर आनंदमय और स्वस्थ हो जाते हैं। उस समय, यामुनाचार्य (आळवन्दार्) कहते हैं, “आप तिरुवनंतपुरम के चारों ओर बगीचे देख सकते हैं। आप अनन्तशयन एम्पेरुमान् की पूजा करने के लिए श्रीवैश्णव के साथ वहाँ जाए। आण्डान् ने जवाब दिया, “यह आपका तिरुवनतपुरम् है; मैं पहले से ही अपने तिरुवनतपुरम् से मिला हूं” (अनुवादक का टिप्पणीः आचार्य का दिव्य रूप वह जगह है जहां श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) रहते हैं – तो स्वयं वही शिष्य के लिए एक दिव्य देश है)। यामुनाचार्य (आळवन्दार्) कहते हैं, “कितना बड़ा विश्वास! इस तरह के दृढ़ विश्वास के साथ शिष्य को ढूंढना मुश्किल है” और आण्डान् से बहुत खुश हो गये।

जब पश्चात् सुन्दर देशिक (पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्) बीमार थे, तो उन्होंने अन्य श्रीवैष्णव से निवेदन करते है, “कृपया श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) से प्रार्थना करें कि वह मुझे वर्तमान में परमपद नहीं दें और मुझे कुछ और समय के लिए श्री रंगम में रहने दें” और उन्हें आऴियेऴ (तिरुवाय्मोऴि ७.४), एऴै एतलन् (पेरिय तिरुमोळि ५.८) पदिग का पाठ करने को कहते है और श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान् से ऐसा अनुरोध करते हैं (अनुवादक का टिप्पणीः इसे श्रीवैष्णव शिष्टाचार के अनुचित के रूप में माना जाता है – किसी को भी कुछ भी चीज़ के लिए श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए – यहां तक कि बीमारी से ठीक होने के लिए भी)। अन्य श्रीवैष्णव के निवेदन करने से पश्चात् सुन्दर देशिक (पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्)) जल्दी से सुस्स्वस्थ हो जाते हैं। यह देखकर, श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के शिष्य उनके पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं “वो सबसे ज्यादा जानकार और बुजुर्ग हैं, लेकिन क्या उनकी प्रार्थना शारीरिक सुरक्षा के लिए उनके स्वरूप के लिए योग्य है?”। श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) कहते हैं, “हम नहीं जानते कि उनके विचार क्या हैं”। तब श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) कहते हैं, जाओ और पिळ्ळै एङ्गळाऴ्वान् से पूछो। पिळ्ळै एन्गळाज़्ह्वान् जवाब देते हैं “वह श्री रंगम के गौरवशाली कैङ्कर्यों से जुडे हो सकते हैं और वह कुछ और समय के लिए यहाँ रहना चाहते हैं” क्योंकि यह भी कहा जाता है कि “इस संसार में एक को अपने कर्मो का पूरी तरह से उपभोग करना चाहिए”। श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) तब अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् से पूछने के लिए कहते हैं – अरयर् कहते हैं, “हो सकता है कि उनके पास कुछ अधूरा कार्य हो जो वह पूरा करना चाहते हैं, इसलिए वह यहां अपने जीवन को बढ़ाने के लिए प्रार्थना कर रहा हैं”। श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) तब अपने शिष्यों को अम्मङ्गि अम्माळ् से पूछने को केहते हैं, जो कहती हैं, “कौन श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के कालक्षेप गोष्टी को छोड़ना चाहेगा, वह प्रार्थना कर सकता है ताकि वह श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के कालक्षेप को सुनने के लिए कुछ और समय के लिए यहां रहना चाहते हैं।” श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) तब अपने शिष्यों से अम्मङ्गि पेरिय मुदलियार् के पास जाने के लिए कहते हैं और जब वे उनके पास जाते हैं, तो वो कहती हैं, “भट्टर् ने कहा कि अगर उन्हें परम्पद में श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) का एक ही दिव्य रूप नहीं दिखाई देता है, तो वह एक छेद बनायेगा और श्री रंगम में वापस कूद जाएगा। इसी तरह वह श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) से भी जुड़ा हो सकते हैं कि वह यहां से नहीं निकलना चाहता “। इन सभी विचारों को सुनने के बाद, श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) अंततः जीयर से पूछते हैं कि इनमें से कोई भी विचार वह स्वयं जो सोच रहे हैं उसके अनुरूप है क्या। जीयर जवाब देते हैं, “इनमें से कोई भी मेरी सोच से मेल नहीं करता है।” श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) जीयर को अपने दिमाग (सोच) को प्रस्तुत/प्रकट करने के लिए कहते हैं। जीयर कहते हैं, “आप सबकुछ जानते हैं। लेकिन आपकी दया से, आप इसे मेरे माध्यम से प्रस्तुत/प्रकट करना चाहते हैं। मुझे कहना है कि मैं यहां क्यों रहना चाहता हूं। हर दिन, स्नान करने के बाद, आप नए कपड़े पहनेंगे और अपने दिव्य चेहरे पर थोडा पसीने के साथ घूमेंगे और मैं उस समय आपको पंखा करना शुरू कर दूंगा। मैं इस तरह के दिव्य रूप और उस सेवा की उस दृष्टि को कैसे छोड़ सकता हूं जो उस समय मैं करता हूं और अभी परमपद जाऊं? “। श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) और उनके शिष्य ये सुन रहे थे और आनंदमय हो गये इस संसार में इस तरह के समर्पण को देखकर आश्चर्यचकित हुए। हमारे जीयर् (मामुनिगळ्) को भी इस समर्पण के साथ अतिरंजित किया गया था और उपरोक्त रत्न माला ६६ वें पासुरम् में इस तरह के समर्पण को विकसित करने के लिए अपने दिमाग को निर्देश दिया था।

पिन्बऴगराम् पेरुमाळ् जीयर्
पेरुन्तिवत्तिल् अन्बदुवुमट्रु
मिक्क आशैयिनाल् नम्पिळ्ळैक्कान अडिमैगळ् शेय्
अन्निलैयै नन्नेन्जे! ऊनमऱ एप्पोऴुदुम् ओर्

सरल अनुवादः पिन्भऴगराम् पेरुमाळ् जीयर्, परमपद से जुड़ाव के बिना, श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के दिव्य रूप की सेवा करने के लिए महान प्यार से श्री रंगम में रहे। ओह प्रिय दिमाग ! हमेशा समर्पण की स्थिति पर ध्यान दें।

एक बार श्री महापूर्ण (पेरिय नम्बि), गोष्टीपूर्ण (तिरुक्कोष्ठीयूर् नम्बि) और मालाधर (तिरुमालै आण्डान्) को चन्द्र पुष्करिणी के तट पर पुन्नै पेड़ के नीचे श्री रंगंम में इकट्ठित हुए। वे अपने आचार्य (यामुनाचार्य (आळवन्दार्)) की यादगार यादों का स्मरण कर रहे थे और उनके द्वारा दिए गए अद्भुत निर्देशों पर चर्चा कर उनका आनंद ले रहे थे। उस समय, सेल्वर् (अनुवादक का टिप्पणीः सेल्वर् श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) का रूप (विग्रहम्) है जो परिवार देवताओं को प्रसाद वितरित करने की प्रक्रिया को देखता है) की  सवारी शुरू होती हैं और श्रीबलि (प्रसाद) को वितरित करने वाले कैङ्कर्य करने वालों (कैङ्कर्यपर) के साथ वहां आते हैं। चूंकि उन्हें अपनी चर्चा को कुछ क्षणों के लिए विश्राम देना पड़ा, और तदनन्तर श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) के सामने झुकना पड़ा, वे कहते हैं, “यहां भीड़ तोडने वाले आ गये है; इस दिन से हम एक मंदिर में रहने की प्रतिज्ञा करते हैं जहां सेल्वर् श्रीबलि को वितरित करने वाले कैङ्कर्य करने वालों (कैङ्कर्यपारा) के साथ नहीं जाते हैं” । (अनुवादक का टिप्पणीः अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए, श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) ने कैङ्कर्य करने वालों के साथ नहीं जाने की शपथ ली क्योंकि यह अपने भक्तों के दिव्य चर्चाओं को श्री रंगम में ईन्टेर्रुप्ट्/परेशान करेगें और आज तक इसका पालन आज भी होता है)।

जब अनन्तार्य (आनन्ताऴ्वान्) श्री वेदान्ति जीयर् (नन्जीयर् (वेदान्ति जिनका भट्टर द्वारा सुधार किया गया था)) से मिले जिन्होंने संयास लिया और श्री रंगम तक पहुंचने की योजना बना रहे थे और उन्हे बताया, “आपने संयास आश्रम स्वीकार कर लिया है जो आपके आचार्य के प्रति आपके कैङ्कर्य में हस्तक्षेप करेगा। क्या वे आपको परमपद से बाहर धकेलेंगे यदि आपने पसीने आने पर स्नान लिया, जब आपको भूख लगी तो आपने खाया और हमेशा भट्टर के चरणकमलों पर शरण लेते थे? अब आपको सिर्फ एक कोने में रहना होगा और आप भट्टर की सेवा करने में सक्षम नहीं हैं।

तोण्डनूर् नम्बि का एक शिष्य जो तिरुमलै जाने से पहले एक शैव था और अनन्तार्य (अनन्ताऴ्वान्) से मिलता है। उन्होंने देखा किया कि अनन्तार्य (अनन्ताऴ्वान्) फूलों को तोड़ रहे हैं और अपने बगीचे में बीज लगा रहा है ताकि श्री बालाजी (तिरुवेंकटमुडैयान्) के लिए माला बना सके। वह कहते हैं, “अनन्तार्य (अनन्ताऴ्वान्) ! कई नित्यसूरि इन फूलों का रूप ले कर तिरुवेकटम् में श्री बालाजी (तिरुवेकटमुडैयान्) की सेवा करते हैं। आप उन्हें अनावश्यक रूप से पेराई कर रहे हैं। मेरा कैङ्कर्य मेरे आचार्य तोण्डनूर् नम्बि के निवास के पिछवाड़े पर है जहां वे केले के पत्तियों को खाली करते हैं, जिस पर श्रीवैष्णव प्रसाद का उपभोग करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वहां सबकुछ साफ और उचित बनाए रखा जाए। मैं आपके साथ अपना यह कैङ्कर्य के सहभागी बने। उस भागवत्कैङ्कर्य में शामिल होने से हम पयिलुम् चुडरोळि  (तिरुवाइमोऴि ३.७) और नेडुमार्क्कडिमै (तिरुवाइमोऴि ८.१०) के अनुसार अपना जीवन जी सकते हैं। (अनुवादक का टिप्पणीः इन दोनों पदों में भगावतों के उप-सहायक होने के महत्व पर प्रकाश डाला गया है)। आप इन दैवीय फूलों के पेड़ को परेशान करने से क्यों नहीं वर्जन करते हैं? “इसके बाद, वह श्रीवैष्णव बीमार हो जाता है और उसके सिर को अनन्तार्य (अनन्ताऴ्वान्)  की गोद पर रख कर लेट जाता है। अनन्तार्य (अनन्ताऴ्वान्) पूछते हैं “इस समय आप क्या सोच रहे हैं?”। वह श्रीवैष्णव जवाब देता है “तोण्डनूर् नम्बि ने मुझे स्वीकारा और मेरे पिछले बुरे सहयोग पर विचार किए बिना मुझे सुधारा। मैं अपने निवास के पिछवाड़े पर ध्यान कर रहा हूं जहां मैं कैङ्कर्य करता था” और तुरंत परमापद चले जाते हैं। इस घटना का सार यह है – भले ही इस श्रीवैष्णव के पास श्री बालाजी (तिरुवेंकटमुडैयान्) के सामने होने का बड़ा भाग्य था, लेकिन उसमें उसे कोई रूचि नहीं थी और उस जगह पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित किया गया जहां उसके आचार्य ने उसे स्वीकार कर लिया और उसे कैङ्कर्य में लगाया।

अनुवादक का टिप्पणीः इस प्रकार, उपर्युक्त घटनाओं के माध्यम से, हम अपने पूर्वाचर्यों द्वारा भागवत्कैङ्कर्य पर भी आचार्य कैङ्कर्य को दिए गए अधिक महत्व को समझ सकते हैं।

जारी रहेगा………

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – https://ponnadi.blogspot.com/2013/06/anthimopaya-nishtai-6.html

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अन्तिमोपाय निष्ठा – ५ -भट्टर्, श्रीवेदान्ति जीयर् (नन्जीयर्) और श्रीकलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – ४ – श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) की दया) में, हमने श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) की दिव्य दया देखी। हम इस लेख में हमारे पूर्वाचार्यों के साथ हुए कई घटनाओं का क्रम को जारी रखेंगे।

आज़्ह्वान्, भट्टर्, श्री रंगनायकी (नाचियार्) और श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्)

भट्टर् जो श्री कूरेश (कूरत्ताऴ्वान्) के पुत्र के रूप में पैदा हुए थे और जिनको स्वयं श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) ने अपने प्रिय बेटे के रूप में अपनाया गया था और श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) (और श्री रंगनायकी (पेरिय पिराट्टियार्) खुद) द्वारा उत्थापित किया गया था, हमारे सम्प्रदाय का नेतृत्व कर रहे थे। एक बार, एक यात्री ब्राह्मण श्रीरंगम का दौरा करते हैं और भट्टर् की सभा में जाते हैं। वह (यात्री ब्राह्मण) कहता है, “भट्टर् जी! पश्चिमी भाग में (मेल्कोटे/तिरुनारायणपुर के अंदर / पास), वहां एक वेदान्ती नाम का विद्वान है। इस दास का मानना है की उनका ज्ञान और (उनके) शिष्य आपके योग्य प्रतियोगी हैं। “भट्टर्, उस ब्राह्मण के शब्दों को सुनकर जवाब देते हैं” ओह! क्या ऐसा विद्वान् है? “और ब्राह्मण जवाब देता है “जी हां स्वामिन्”। तदनन्तर वह ब्राह्मण श्रीरंगम छोड़ देता है और वेदान्ती के शहर तक पहुंचता है और वेदान्ती की सभा में जाता है। वह कहता है “हे वेदान्ती! दो नदियों (श्रीरंगम) के बीच में, एक भट्टर् नाम के विद्वान् है जो आपके ज्ञान और शिष्यों के योग्य प्रतियोगी है”। वेदान्ती जवाब देता है “क्या भट्टर् मेरे योग्य प्रतियोगी है?”। ब्राह्मण ने जवाब दिया “जी हां वेदान्ती जी । वह शब्द, तर्क, पूर्व मीमाम्स, उत्तर मीमाम्स इत्यादि से शुरू होने वाले सभी ग्रंथों में कुशल हैं। “वेदान्ती चिंतित हो जाते हैं और सोचते हैं” मैंने सोचा कि मेरे लिए कोई प्रतियोगी नहीं था क्योंकि मैंने पहले से ही कई विद्वानों को जीते है और ६ तख्तों पर बैठे हूँ (षड्-दर्शन का प्रतिनिधि हूँ) जहाँ हर एक-एख तख्त एक-एख षड्-दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है (छः दार्शनिक विद्यालय – न्याय, वैसेशिक, सान्क्य, योग, पूर्व मीमाम्स, उत्तर मीमाम्स)। लेकिन यह ब्राह्मण कह रहा है कि इन सभी में भट्टर् मुझसे भी ज्यादा बुद्धिमान है। ” ब्राह्मण श्रीरंगम लौटते हैं और भट्टर् को सूचित करते हैं कि उन्होंने भट्टर् की महानता का विशेष परिचय वेदान्तीजी को दिया । भट्टर् ने ब्राह्मण से पूछा, “आपने मेरे ज्ञान के बारे में क्या कहा?” और ब्राह्मण ने जवाब दिया “मैंने कहा कि भट्टर् शब्द, तर्क और सभी वेदान्त में कुशल है।”  भट्टर् ने जवाब दिया “ओह ब्राह्मण! आप कई जगहों पर यात्रा करते हैं और विभिन्न विद्वानों और उनके ज्ञान से अवगत हो गए हैं। लेकिन मेरा पूरा ज्ञान जानने के बाद भी, आपने केवल मेरे वेदान्त ज्ञान के बारे में सूचित किया है”। ब्राह्मण पूछता है, “मैं सबसे ज्यादा स्थापित शास्त्र – वेदान्त पर आपके नियंत्रण के अलावा वेदान्ती से और क्या कह सकता हूं?” और भट्टर् कहते हैं, “आपको उसे बताना चाहिए कि मैं तिरुनेडुन्ताण्डगम् में एक विशेषज्ञ हूं (अनुवादक का टिप्पणी: तिरुमङ्गै आऴ्वार् का एक दिव्य ग्रन्थ जो बहुखूबी से वेदान्त-सार और हमारे सम्प्रदाय के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाता है) “। तब भट्टर् वेदान्ती को श्रीवैष्णव गुना में लाने पर विचार करना शुरू करते हैं (अनुवादक का टिप्पणी: जैसा कि ६००० पडि गुरु परम्परा प्रभाव में पहचाना जाता है, श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) स्वयं वेदान्ती में सुधार करना चाहते हैं लेकिन उनकी बुढ़ापे के कारण वह यात्रा करने में असमर्थ है और इसलिए ऐसा करने के लिए भट्टर् को निर्देश देते हैं)। वह श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) के पास जाते हैं और उन्हे बताते हैं “पश्चिमी भाग में एक महान विद्वान वेदान्ती है। मैं उधर जाने और उसे सुधारने के लिये आपकी अनुमति का अनुरोध कर रहा हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें कि मैं उसे सुधारने और उसे हमारे रामानुज सिद्धांत में एक नेता बनाने में सक्षम हूं। श्री रंगनाथ (पेरुमाळ्) ने भट्टर् के अनुरोध को स्वीकारा और भट्टर् के साथ अपना माता-पिता के रिश्ते पर विचार करते हुए, श्री रंगनाथ (पेरुमाळ्) अपने स्वयं के कैङ्कर्यपर (वो जो श्री रंगनाथ का कैङ्कर्य करते थे) को यात्रा के दौरान उनके साथ जाने का आदेश देते  हैं।

भट्टर्, श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्)

भट्टर् उस स्थान के आस-पास पहुंचते हैं जहां वेदान्ती कई श्रीवैष्णवों के साथ रहते हैं। उनके साथ कैङ्कर्यपर (वो जो श्री रंगनाथ का कैङ्कर्य करते थे) भट्टार की महिमा कह रहे थे और लगातार कह रहे थे कि “पराशर भट्टर् आ गये हैं, वेदाचार्य भट्टर् आ गये हैं, आदि” और उनके सामने कई संगीत वाद्ययंत्र बजा रहे थे। उन्होने (पराशर भट्टर्) कई दिव्य गहने और बहुत खूबसूरत कपड़े पहने हुए थे (सभी श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) से संबंधित थे क्योंकि वह श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) के पुत्र थे)। उस समय कुछ स्थानीय ब्राह्मणों ने उन पर ध्यान दिया (नोटिस किया) और उनसे पूछा, “आप कौन हो? आप कहाँ से आ रहे हो? आप तेजामय प्रकाश से चकाचौंध लग रहे है और यहां कोई उत्सव-काल भी नही है। अब आप कहाँ जा रहे हैं? “भट्टर् ने जवाब दिया” मैं भट्टर् हूं। मैं वेदान्ती के साथ वाद-विवाद करने जा रहा हूं “। ब्राह्मणों ने कहा,” यदि आप इतने उत्साह और उत्तेजना के साथ जाते हैं, तो आप वेदान्ती से मिलने में असमर्थ होंगे। वह अपने महल के अंदर रहेगा और उनके शिष्य आपके साथ कई महीनों तक वाद-विवाद करेंगे और केवल टालेंगे/तबाही करेंगे और आप अंततः हार जाएंगे। “तब भट्टर् पूछते हैं” उनसे सीधे मिलने और उनसे वाद-विवाद करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? “और ब्राह्मणों ने कहा,” चूंकि वेदान्ती एक अमीर व्यक्ति है, इसलिए वह अपने महल में निरंतर/लगातार ब्राह्मणों को खिलाता है। आप एक गरीब ब्राह्मण की तरह कपड़े पहनो और उनके साथ प्रवेश करें। इसलिए, आप अपने सभी लोगों को पीछे छोड़ दो और अकेले जाइये। “भट्टर् इस प्रस्ताव से सहमत होते हैं, अपने कपड़ों के ऊपर एक कषाय कपड़े पहनते हैं, कमण्डल (छोटे पानी के बर्तन) को उठाते हैं और गरीब ब्राह्मणों के साथ मण्डप (हॉल) जहां ब्राह्मणों को खिलाया जाता है वहां जाते हैं।

मण्डप में, वेदान्ती, ऊपर उठाए गए मंच पर बैठे, खुशी से भोजन स्वीकार करने के लिए आने वाले ब्राह्मणों को देख रहे थे। सब में, अकेले भट्टर् , भोजन स्वीकार करने के बजाय सीधे वेदान्ती के पास जाते हैं। वेदान्ती पूछते हैं “बेटा! तुम यहाँ क्यों आ रहे हो?” और भट्टर् जवाब देते हैं “मैं यहां एक भिक्षा के लिए आया हूं”। वेदान्ती कहते हैं, “कृपया जहां वे भोजन वितरित कर रहे हैं वहां पर जाएं”। भट्टर् कहते हैं, “मैं खाना नहीं चाहता हूं”। वेदान्ती सोचते हैं, भले ही वह गरीब दिखता है, यह आदमी विद्वान हो सकता है और इसलिए पूछते हैं “क्या भिक्षा?”। तुरंत भट्टर् कहते हैं “तर्क भिक्षा” (मुझे वाद-विवाद करना है)। वेदान्ती यात्री ब्राह्मण के शब्दों को समझते हैं जिन्होंने भट्टर् के बारे में बताया और सोचता हैं कि भट्टर् के अलावा किसी और के पास आने और वाद-विवाद के लिए हिम्मत नहीं होगी। वह सोचते हैं कि इनका रूप धोखा दे रहा हैं, यह भट्टर् होना चाहिए और पूछता है, “मेरे साथ वाद-विवाद करने के लिए कौन पूछ सकता है? क्या आप भट्टर् हैं?”। भट्टर् जवाब देता है “हां, मैं भट्टर् हूं” और कमण्डल और कषाय कपड़े को दूर फेंका। वह शास्त्र के सार को उग्र रूप से समझाते हैं और वेदान्ती तुरंत मंचक से नीचे उतरते हैं और भट्टर् के कमल चरणों में गिरते हैं। वह भट्टर् से उसे स्वीकार करने और उसे शुद्ध करने के लिए कहते हैं। भट्टर् बहुत खुश थे कि उनका उद्देश्य जल्दी से पूरा हो गया था, वेदान्ती को स्वीकार करते हैं और उनको पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं। भट्टर् ने उन्हें बताया “प्रिय वेदान्ती! आप पहले से ही शास्त्र के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। मैं अब सबकुछ विस्तार से समझाऊंगा नहीं। विशिष्टाद्वैत सच्छा सिद्धांत है। आप पूरी तरह से मायावाद छोड़ दो, सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में श्रीमन् नारायणन् को स्वीकार करो और हमारे रामानुज दर्शन में एक आचार्य का नेतृत्व करना शुरू करो । तब भट्टर् वहं से निकलने का फैसला करते हैं और सभी कैङ्कर्यपर (वो जो श्री रंगनाथ का कैङ्कर्य करते थे) (जो बाहर इंतजार कर रहे थे) उस समय महान वैभव के साथ पहुंचे। भट्टर् को फिर से दिव्य कपड़े और गहने के साथ खूबसूरती से सजाया गया और पालकी में बिठाया गया। कई लोग चामर, पंखा, आदि के साथ उनकी सेवा करते हुए वहाँ से प्रस्थान करते हैं। धन, अनुयायियों और धूमधाम को देखकर वेदान्ती जोर से रोते हुए कहते हैं, “आप इतने महान व्यक्तित्व हैं। मैं इतना गिर गया हूं (भौतिकवादियों की तुलना में अधिक गिर गया क्योंकि मैं मायावाद का प्रचार कर रहा था)। लेकिन आपने कई जंगलों, पहाड़ों, आदि पार किया है यहां पहुंचे और मुझे, मेरे दुर्भाग्य को देखकर मुझे स्वीकार कर लिया। आप इतने दयालु हैं “और फिर भट्टर् के कमल चरणों में गिरते हैं।

वेदान्ती तब कहते हैं, “आप श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) के अलावा कोई नहीं हैं जो अपनी सुंदरता, कोमलता इत्यादि प्रकट करने के लिए यहां पहुंचे हैं। बहुत काल के लिए, मैं भगवान् के दयालु हाथों से बच गया था और मुझे बचाने का कोइ अन्य तरीका नहीं है सोचकर, आपने एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण के रूप को स्वीकार कर लिया और मुझे स्वीकार किया जो इतने गर्व और अहंकार से भरा हुआ था। मैं कल्पना नहीं कर सकता और उस रूप को देखता हूं जिसे आपने मेरे लिए महान दया से स्वीकार किया है “और फिर रोना शुरू कर देता है। तब भट्टर् ने वेदान्ती को उठाया और कहा कि “आप यहां खुशी से रहना जारी रखें” और श्रीरंगम को निकल जाते है।

कुछ समय बाद, वेदान्ती, अपने आचार्य से जुदाई सहन करने में असमर्थ हो कर, श्रीरंगम जाने का फैसला करते है। उनकी पत्नियां उन्हे जाने से रोकती हैं और वह अपनी संपत्ति को विभाजित करके और जाने से पहले अपनी पत्नियों को व्यवस्थित करने का फैसला करते हैं। वह अपनी असीमित संपत्ति को 3 भागों में विभाजित करते हैं, अपनी दोनों पत्नियों को एक हिस्सा देता हैं और शेष भाग को अपने आचार्य (भट्टर्) को पेश करते हैं और श्रीरंगम को जाते हैं। उसके बाद वो श्रीरंगम तक पहुंचते हैं, बिना किसी गर्व के भट्टर् को सारी संपत्ति प्रदान करते हैं और वो सब भट्टर् के नियंत्रण में छोड़ देते हैं। वेदान्ती वहां भट्टर् के प्रति कृतज्ञता से खड़े हैं, और् भट्टर् वेदान्ती के समर्पण से बहुत खुश हो कर , “नम् जीयर् वन्दार्” – हमारे जीयर आ गए हैं) और उसे गले लगाते हैं। भट्टर् हमेशा अपनी संगत में श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) को रखते हैं और उसे सभी आवश्यक शिक्षाओं के साथ आशीर्वाद देते हैं। जीयर पूरी तरह से स्वीकार करते हैं / भट्टर् की पूजा करते हैं और किसी अन्य पूजा करने योग्य देवता की तलाश नहीं करते हैं। उस समय से, भट्टर् ने वेदान्ती को श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) कहा, और वेदान्ती श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के नाम से जाना जाने लगे। हमारे जीयर् (मामुनिगळ्) कहते हैं कि ”  श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) १०० वर्षों तक जीवित रहे और उन्होंने तिरुवाय्मोऴि के अर्थों को १०० बार व्याख्यान दिया और शताभिशेक प्रदर्शन किया (उत्सव को तिरुवाय्मोऴि के १०० गुना व्याख्यान मनाने का जश्न मनाया)।

श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) नित्य भट्टर् की सेवा करते थे और उनेकी अनुमति के साथ तिरुवाय्मोऴि  की व्याख्या (व्याख्यात्मक निबंध) लिखते हैं जिसका नाम ९००० पडि है। वह अपने शिष्यों से पूछते हैं कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो उस व्याख्यात्मक निबंध की अच्छी / साफ प्रतिलिपि बना सकता है। शिष्य कहते हैं, “एक वरदराजन् है जो यहां थोडे दिनो से व्याख्या में भाग ले रहा है। वह बहुत अच्छी तरह से लिखता है “। श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) वरदराजन् को आमंत्रित करते हैं और उन्हे अपने हाथ-लेखन का नमूना दिखाने के लिए कहते हैं और वह बाध्य से करता है। श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) सोचते हैं” उसका हाथ-लेखन सुंदर है। लेकिन चूंकि यह तिरुवाय्मोऴि के लिए व्याख्यात्मक निबंध है, हमें यह एक बहुत ही योग्य श्रीवैष्णव द्वारा लिखा जाना चाहिए, ना कि कोइ जिसका सिर्फ पञ्च संस्कार हुआ है और एक श्रीवैष्णव की शारीरिक रूप रखता है। “वरदराजन् श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के दिव्य विचारों को समझते हैं और तुरंत उन्के सामने खुदको सोंप देते हैं और कहते हैं, “कृपया मुझे अपनी संतुष्टि तक के लिए शुद्ध करें। मैं आपकी सेवा में हूँ”।

श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्), श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै)

यह सुनकर, श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) बहुत खुश हो जाते हैं। वह वरदराजन् को स्वीकार करते हैं और उसे पूरा आशीर्वाद देते हैं। वह ९००० पडि व्याख्या (व्याख्यात्मक निबंध) को पूरी तरह से वरदराजन् को बताते हैं और उससे इसकी प्रतिलिपि बनाने के लिए कहते हैं। वरदराजन् स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वह अपने स्थान जाकर कार्य पूरा करेंगे और श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के पास वापस लौटेंगे। श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) प्रस्ताव स्वीकार करते हैं। तो वरदराजन्, अपने गांव में जाने के लिए कावेरी नदी पार करने के लिए, नदी भर में तैरना शुरू करते हैं। वह एक कपड़े में मूल ग्रन्थम् को लपेटते हैं और तैरना शुरू करते समय उसे अपने सिर पर रखते हैं। एक बड़ी लहर उभरती है और अचानक मूल ग्रन्थम् नदी के साथ बह जाता है। वरदराजन् ग्रन्थम् के नुकसान के कारण बहुत पीड़ित हो जाते हैं और सोचते हैं कि क्या करें। उसके बाद, वह मूल ग्रन्थम् लिखना शुरू करते हैं जिसे श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) ने उसे आशीर्वाद दिया (सिखाया)। चूंकि वरदराजन् तमिऴ् में एक विशेषज्ञ है, इसलिए वह गहराई से अर्थ के साथ टिप्पणी में उचित स्पष्टीकरण भी जोड़ते हैं। उसके बाद वह श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के पास जाते हैं और नई प्रतिलिपि श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के कमल चरणों में जमा करते हैं। श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) मानते हैं कि जैसा कि उन्होंने पहले लिखा और समझाया, वैसे ही, विभिन्न स्थानों पर विशेष अर्थ और विस्तार थे और बेहद प्रसन्न हो गए। वह पूछता हैं “यह बहुत सुंदर है, लेकिन मैंने जो कुछ समझाया उससे थोड़ा अलग है। क्या हुआ?”। वरदराजन् डर से चुप रहते हैं और श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) उसे प्रोत्साहित करते हैं “चिंता मत करो, बस सच बताओ”। वरदराजन् तब बताते हैं “चूंकि कावेरी में पानी प्रवाह तेज था, इसलिए मैंने अपने सिर पर मूल ग्रन्थ रखा और तैरना शुरू किया। लेकिन जब एक बड़ी लहर आई, तो मूल ग्रन्थम् नदी में बह गया। मैंने इसे अपनी स्मृति से आपकी दया के आधार पर लिखा है” ।श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) वरदराजन् की स्मृति और बुद्धि की महिमा कर उसे गले लगाता हैं। उन्होंने घोषणा की कि वरदराज “नम्मुडैय पिळ्ळै तिरुक्कलिकन्ऱिदासर्” – हमारे प्यारे पिळ्ळै तिरुक्कलिकन्ऱि हैं – और उसे हमेशा अपने सम्पर्क में रखते हैं और उसे सभी गहन अर्थ बताते हैं। हमारे जीयर् (मामुनिगळ्) कहते हैं कि ” जिस दिन से, श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) ने वरदराजन्” को श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) “कहा, उन्हें श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के नाम से जाना जाने लगा।

हमारे जीयर् ने इन घटनाओं को उपदेस रत्न माला के ५० वें पासुर में समझाते है..

नम्पेरुमाळ् नम्माऴ्वार् नन्जीयर् नम्पिळ्ळै एन्बर्
अवरवर् तम् एट्रत्ताल्
अन्बुडैयोर् शाट्रु तिरुनामङ्गळ् तान् एन्ऱु नन्नेन्जे!
एत्तदनैच् शोल्लि नी इन्ऱु

सरल अनुवादः

श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्), श्री शठकोप (नम्माऴ्वार्), श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) और श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) उनके नाम की विशेष महिमा के कारण, “नम् – हमारे” उपसर्ग के साथ नामकरण किया था। (इसको ऐसे भी समझाया गया है – श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) ने श्री शठकोप स्वामी को नम्माऴ्वार् के रूप में। श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) ने वरदराजन् को श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के रूप में सम्मानित किया)। उन्हें ये प्रिय नाम उन लोगों के द्वारा दिया गया था जो उनके लिए बहुत प्रिय हैं। ओह प्रिय दिमाग! आप इन घटनाओं को अभी पढ़कर उन घटनाओं की भी महिमा इन नामों का जप करते हैं।

श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) की महिमा इस प्रकार है कि “इस दुनिया में कोई भी इंद्र, ब्रह्मा, रुद्र, स्कंद आदि के शब्दों को नहीं सीख पाएगा। अगर कोई सिर्फ कुछ शब्दों को उठाएगा (जो मोती की तरह हैं) तो हर कोई इतना अमीर होगा। नम्-भूर्-वरदर् (नम्पिळ्ळै) के महल से”। अनुवादक का टिप्पणीः यह आसानी से नडुविल् तिरुवीदि पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि भट्टर्) के जीवन के चरम के साथ संबंधित हो सकता है जहां हमने राजा द्वारा बहुत सारे धन के साथ सम्मानित किया है, जिसमें श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के व्याख्यान के आधार पर रामायण स्लोकम समझाया गया है। पूरी घटना ह्ट्ट्पः//गुरुपरम्परै.wओर्ड्प्रेस्स्.cओम्/2013/04/20/नडुविल्-तिरुविदि-पिल्लै-भट्टर्/ पर देखी जा सकती है।

अनुवादक का टिप्पणीः इस प्रकार हमने श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) के दिल को शुद्ध करने में भट्टर् (पराशर भट्टर्) की दिव्य दया देखी है और बदले में श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) की कुल निर्भरता और भट्टर् की ओर। हमने श्री वेदान्ती जीयर् (नन्जीयर्) और श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) के बीच बातचीत को भी देखा है जो आचार्य / शिष्य लक्षण को खूबसूरती से प्रदर्शित करता है।

जारी रहेगा…..

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.com/2013/06/anthimopaya-nishtai-5.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

अन्तिमोपाय निष्ठा – ४ – एम्पेरुमानार् की दया

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा ३ – शिष्य लक्षण) में, हमने एक सच्चे शिष्य के गुणों को देखा। हम इस लेख में हमारे पूर्वाचार्यों के कई घटनाओं का क्रम जारी रखेंगे।

एक बार, आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) श्रीरामानुाजाचार्य (एम्पेरुमानार्) के लिए दूध उबाल रहे थे। उन दिनों श्रीरंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) का उत्सव चल रहा था । उत्सव के दौरान, श्रीरंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) को अति सुन्दरता से अलङ्कृत किया जा रहा था । जुलूस के हिस्से के रूप में मठ (आश्रम) के प्रवेश द्वार पर श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) एवं उनकी सवारी पहुंची । आये हुए श्रीरंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) का मङ्गलाशासन श्रीरामानुाजाचार्य (उडयवर्) ने बाहर आकर किया और तत्पश्चात् आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) को बुलाया – वडुग! (आन्ध्रपूर्ण!) । कृपया बाहर आएं और श्रीरंगनाथ (एम्पेरुमान्) का दर्शन करें। यह प्रसिद्ध है कि, आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) ने जवाब दिया, “दासन् ! अगर मैं आपके भगवान् के दर्शन लेने के लिए बाहर आता हूं, तो मेरे भगवान् के लिए दूध उबल जाएगा। इसलिए, मैं अभी बाहर नहीं आ सकता”। हमारे जीयर् (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि)) ने आर्ति प्रबन्ध के ११ वें पासुर में आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) के जैसी निष्ठा के लिए प्रार्थना कीः

उन्नै ओऴिय ओरु देय्वम् मट्रऱिया
मन्नुपुगऴ्शेर् वडुगनम्बि – तन्निलैयै
एन्ऱनक्कु नी तन्दु
एदिराशा एन्नाळुम् उन्ऱनक्के आट्कोळ् उगन्दु

हे यतिराज! (हे श्री रामानुज!) कृपया मुझे गौरवशाली आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) के उसी निष्ठा के साथ आशीर्वाद दें जो आपके अलावा किसी अन्य भगवान् को नहीं जानते थे और मुझे आपकी सेवा में खुशी से पूरी तरह व्यस्त रहने देते हैं।

हमारे जीयर् (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि)) अक्सर इन ३ सिद्धांतों / घटनाओं को उद्धृत करते हैं। इनमें से, दूसरी घटना को एक आचार्य से ठीक से सुना जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए।

  • जो भौतिक रूप से केंद्रित है वह एक अच्छे डॉक्टर के करीब रहेगा (यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके शरीर की अच्छी देखभाल हो रही है)। जो आध्यात्मिक रूप से केंद्रित है वह एक अच्छे आचार्य के करीब रहेगा (यह सुनिश्चित करने के लिए कि आत्मा की अच्छी देखभाल हो रही है)।
  • एक बार, श्रीकलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) ने अपने प्रिय शिष्य श्री कृष्ण पाद (वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै) को एक विशेष कार्य में अपनी पत्नी की सहायता करने का निर्देश दिए। कुछ समय बाद, नम्पिळ्ळै ने पूछा “कृष्ण! तुमने मेरे कार्य के बारे में क्या सोचा (तुम्हे एक काम में मेरी पत्नी की सहायता करने में शामिल करने के लिए)?”। श्रीकृष्णपाद (वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै) ने जवाब दिया “मुझे हमेशा लगता है कि मैं आप दोनों (आप और आपकी पत्नी) के नियंत्रण में हूँ?” (अनुवादक का टिप्पणी: जैसे हम जीव श्रीरंगनायकी-तायार् (श्रीजी) और श्रीरंगनाथ (एम्पेरुमान्) के नियंत्रण में हैं यथारूपेण (मै) श्रीकृष्णपाद आप दोनों के अधीन में हूँ ।) प्रवृत्त जवाब सुनकर श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) बहुत खुश हो जाते हैं और उल्लेख करते हैं कि सच्चे शिष्य इस तरह का व्यवहार करेंगे। (अनुवादक का टिप्पणी: अन्य संप्रदाय के विपरीत हम हमेशा श्रीमहालक्षमी और श्रीमन्नारायण की पूजा करते हैं – यह हमारे सम्प्रदाय का एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है)।
  • एक बार, पिळ्ळै लोकाचार्य अपने शुद्धमति महिला शिष्य से पंखा सेवा करने को बोलते हैं, क्योंकि वहां का वातावरण उष्ण (उमस) से भरा हुआ था। वह पूछती है, “क्या आपका यह दिव्य शरीर इससे प्रभावित होगा और क्या आपको पसीना आएगा?”। पिळ्ळै लोकाचार्य कहते हैं, “हां – इसे (शरीर को) पसीना आएगा। यहां तक कि भगवान् को भी पसीना आता है, नाचियार् तिरुमोऴि १२.६ में आण्डाळ् देवी कहती हैं ‘वेर्त्तुप् पसित्तु वयिऱचैन्दु’. इस प्रकार, वह उपयुक्त रूप से आण्डाळ् के शब्दों का उपयोग करके बताते हैं ताकि उस (शिष्य) का विश्वास बिखर ना जाए। (अनुवादक का टिप्पणी: हमें अपने आचार्य के शरीर को दिव्य के रूप में मानना चाहिए, तब भी जब वह इस दुनिया में जीवित हो – ना केवल शारीरिक/भौतिक। साथ ही यह लीला के हिस्से के रूप में भगवान् के दिव्य शरीर की तरह इसमे पसीना आता है। पिळ्ळै लोकाचार्य एक उचित प्रमाण उद्धृत करके खूबसूरती से इस सिद्धांत को समझाते हैं)।

श्री रामानुज (उडयवर्) के समय के दौरान, यज्ञमूर्ति नामका एक महान अद्वैत विद्वान था (जो अंततः सत्सम्प्रदाय मे दीक्षा ग्रहण कर देवराजमुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) का दास्य नाम स्वीकार कर सत्सम्प्रदाय के विशेष आचार्य के रूपमे प्रतिष्ठित हैं)। उनके (यज्ञमूर्ति) बहुत सारे शिष्य थे और उन्होंने शास्त्र के कई हिस्सों को सीखा था। वह अपने शिष्यों के साथ अपने कई साहित्यिक कार्यों को लेकर श्री रंगम में गर्व से आते हैं। उन्होंने वाद-विवाद के लिए श्री रामानुज (उडयवर्) को चुनौती दी और वाद-विवाद शुरू हो गया। वाद-विवाद पूरे १७ दिनों तक चलता है और १८वें दिन तक वाद-विवाद में यज्ञमूर्ति का ही गौरवशाली जयपताका लहर रहा था । दोनों पक्ष उस दिन के वाद-विवाद को रोकते हैं और यज्ञमूर्ति खुशी से जाते हैं। श्री रामानुज (उडयवर्) अपने मठ पर लौटते हैं, श्री रंगनाथ (पेररुळाळन्) का तिरुवाराधन करते हैं और उनके उपर चिंतित (परेशान) हो जाते हैं। वह श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) से कहते हैं “सभी के साथ, आपने यह स्थापित किया है कि आपका स्वरूप, रूप, गुण, धन, आदि शास्त्र के अनुसार सत्य हैं; लेकिन अब मेरे समय के दौरान, यदि आप झूठे लोगों के माध्यम से उन्हें नष्ट करना चाहते हैं (जो बताते है कि सबकुछ माया-झूठा है), तो आप आगे बढ़ें और इसे करें “। फिर वह प्रसाद को स्वीकार किए बिना योग (नींद) में जाता है। उनके (श्री रामानुज) सपने में, श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) प्रकट होकर कहते हैं “मैंने आपके लिए एक योग्य शिष्य की व्यवस्था की है; आप सिद्धांतों की व्याख्या उससे करें। (जैसा कि यामुनाचार्य (आळवन्दार्) द्वारा किया जाता है) और वह स्वीकार करेगा और आपका शिष्य बन जाएगा”।

श्री रामानुज (उडयवर्) स्वप्नावस्था से उठते हैं और दिव्य सपने के बारे में आश्चर्य करते हैं। वह प्रसन्न होते हैं और विभिन्न प्रमाणों पर ध्यान करते हैं। रामानुज नूट्रन्दादि ८८ “वलिमिक्क चीयमिरामानुशन् मऱै वादियराम् पुलिमिक्कतेन्ऱु इप्पुवनत्तिल् वन्दमै”  – जिस प्रकार प्रगट शक्तिशाली सिम्ह, जंगल मे भरे दुष्ट बाघों का नाश करता है, ठीक उसी प्रकार शक्तिशाली सिम्ह रूपी श्रीरामानुज के प्राकट्य (अवतरण) ने इस दुनिया मे भरे दुष्ट दिमागी प्रचारकों का नाश कर दिया (शुद्ध) । अगली सुबह, श्री रामानुज (उडयवर्) एक विजयी शेर की तरह वाद-विवाद सभा-भवन में चलते हैं। श्री रामानुज (उडयवर्) के आनंदमय रूप को देखते हुए, यज्ञमूर्ति भ्रमित हो जाते हैं और सोचते हैं कि “कल जब वह वापस जा रहे थे, तो वह उदास थे और अब वह बहुत प्रभावशाली है – यह कोई मानवीय कार्य नहीं है। इसमें एक दिव्य हस्तक्षेप होना चाहिए “और श्री रामानुज (उडयवर्) के कमल पैर पर गिर जाते हैं। श्री रामानुज (उडयवर्) पूछते हैं “यह क्या है? क्या आप आगे वाद-विवाद नहीं करना चाहते हैं? ” यज्ञमूर्ति जवाब देते हैं, “जब श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) खुद आपको प्रकट करते हैं और आपका मार्गदर्शन करते हैं, तो मुझे लगता है कि श्री रंगनाथ (पेरिय पेरुमाळ्) और आपकी उच्चता के बीच कोई अंतर नहीं है। इसलिए, अब मैं आपकी उपस्थिति में अपना मुंह खोलने के लिए योग्य नहीं हूं। कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें और मुझे आशीर्वाद दें “। श्री रामानुज (उडयवर्) बहुत खुश हो जाते हैं और उन्हें नाम देते हैं “(देवराज मुनि ) अरुळाळा पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्” (पेररुळाळन् के नाम और उनके नाम का संयोजन), उन्हे आशीर्वाद देते है (श्रीवैष्णव सन्यास आश्रम) और उन्हे रहने के लिए एक बड़ा आश्रम (मठ) भी देते हैं। श्री रामानुज (उडयवर्) कहते हैं, “आप पहले से ही सभी शास्त्र जानते हैं। सभी बंधनों (संलग्नक) को पूरी तरह से छोड़ दें और श्रीमन्नारायणन् के चरणकमलों को देखें। मुझे आपको बहुत कुछ समझाना नहीं है; आप और आपके शिष्य विशिष्टाद्वैत दर्शन शास्त्र पर चर्चा करते हुए अपना समय आनन्दपूर्वक बिताए। “देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) आभार व्यक्त कर स्व-आश्रम (मठ) में रहना शुरू करते है।

श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) – श्रीपेरुम्बूतूर्, देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् )- तिरुप्पाडगम्

इसके बाद, श्रीवैष्णव और श्रीरंगम में आने वाले कुछ अन्य लोग स्थानीय लोगों से पूछताछ करते हैं “एम्पेरुमानार् का आश्रम (मठ) कहां है?” और स्थानीय लोग उन्हें वापस पूछते हैं “कौन से एम्पेरुमानार्?”। श्रीवैष्णव परेशान हो जाते हैं और पूछते हैं “हमने सोचा था कि हमारे संप्रदाय में केवल एक एम्पेरुमानार् है। क्या यहां दो हैं?”। स्थानीय लोग कहते हैं, “हां, एक श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) है और देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) भी है”। श्रीवैष्णव कहते हैं, “ओह! हमने दूसरे एम्पेरुमानार् के बारे में नहीं सुना है, हम श्री रामानुज (श्रीभाष्यकार) के बारे में पूछ रहे हैं”। स्थानीय लोग उन  श्रीवैष्णव को श्रीरामानुज (एम्पेरुमानार्) के मठ में ले जाते हैं। संयोग से, देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) इस वार्तालाप को सुनते हैं और सोचते हैं “ओह! क्योंकि हम श्री रामानुज (उडयवर्) से अलग मठ में रहते हैं, लोग मुझे श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) के तुल्य मानते हैं। मैंने अब एक गंभीर गलती की है “और बहुत चिंतित हो जाते हैं। वोह, अपने मठ को नष्ट करने का आदेश देते है, श्रीरामानुज (एम्पेरुमानार्) के मठ को जाकर, उनके चरणकमलों को पकडते हैं और उनसे पूछते हैं, “स्मरणातीत काल के लिए, मैं अहङ्कार से भरा था और आपका आश्रय नहीं लिया। लेकिन अापके चरणकमलों का आश्रय लेने के बाद, आप अभी भी मुझे एक अलग मठ में दूर रखा है। क्या यह हमेशा के लिए करने की योजना बना रहे हैं? ” श्रीरामानुज (उडयवर्) आश्चर्य करते हैं कि क्या हुआ और देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) पूरी घटना बताते हैं। श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) पूछते हैं “अब मुझे तुम्हारे लिए क्या करना चाहिए?”। देवराज मुनि (आरुळाळ पेरुमाल् एम्पेरुमानार्) कहते हैं, “आज से, आपको मुझे अपनी छाया, चरणकमलों की लकीर की तरह रखे और मुझे लगातार आपकी सेवा में व्यस्त करें”। श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) बाध्य करते हैं और उन्हे अपने मठ में एक जगह देते हैं और उसे हमारे संप्रदाय के सभी जटिल सिद्धांत बताते हैं। वह खुशी से श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) की सेवा के अलावा किसी और चीज के बारे में सोचे बिना वहां रहते हैं। श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) से जो सीखा है, उसके आधार पर, वो दो सुंदर प्रबन्ध ज्ञान-सार और प्रमेय-सार की रचना करते है जिसे किसी भी व्यक्ति को समझाया जा सकता है। वह उस प्रबन्ध के माध्यम से स्थापित करते हैं कि आचार्य शिष्य के लिए परम पूजा करने योग्य देवता हैं और उनके चरणकमल ही एकमात्र शरण हैं, “आचार्य जो शरणागति का मार्ग दिखाते हैं, शिष्य के लिए कुल शरण है”, “श्रीमन्नारायण स्वयं एक आचार्य के रूप में प्रकट होते हैं”, आदि। प्रज्ञ देवराज मुनि (आरुळाळा पेरुमल् एम्पेरुमानार्) ने इन सिद्धांतों को इन प्रबन्धों के रूप मे प्रकाशित किया और हमारे जीयर् (मामुनिगळ्) ने इन प्रबन्धों को स्वटीका द्वारा अति सुन्दरता से समझाया है।

अनुवादक का टिप्पणी: इस प्रकार हमने आन्ध्रपूर्ण (वडुग नम्बि) और देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) के हृदय को शुद्ध करने में श्रीरामानुज (एम्पेरुमानार्) की निर्बाधक दिव्य दया को देखा और बदले में उनकी कुल निर्भरता और श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) की ओर परवशता को भी देखा।

जारी रहेगा…

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ५

“सेतुर् यग्ये सकल जगताम् एक सेतुः स देव ॥”

निर्विवाद रूप से प्रसिद्ध तोण्डै प्रान्त की भव्यता (चेन्नई/कांचीपुरम प्रान्त)……

ब्रह्माण्ड पुराण वरदराज भगवान (पेररुळाळन्) की श्रेष्ठता और बुलंद तिरु हस्ति पर्वत की प्रतिष्ठा प्रकट करता हैI

उस पुराण में, हस्तिगिरी महात्म्य के अंतर्गत, नारद और ब्रुगु मुनियों के बीच संवाद प्रतीत होता है।

ब्रुगु मुनि के निवेदन से नारद ने सत्य व्रत क्षेत्र महात्म्य का वर्णन कियाI नारद ने यह ज्ञान ब्रह्मा से पाया थाI

यह प्रदेश जिसका नाम “तुण्डीर मण्डल” या “तोण्डै मण्डल” पृथ्वी पर शेष स्थानों की तुलना में अधिक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित है। !

यह यहां स्थित है सत्य व्रत क्षेत्रI और इसी कारण से अशरीरी ने ब्रह्मा को इस प्रान्त में जाने के लिए आदेश दियाI सभी हित कर्म (व्रत) जिन्हें हम निष्पादित करना चाहते हैं, यहां प्रराम्ब किए जाने पर बिना किसी अवरोध के सफलता पूर्वक संपूर्ण होंगेI अतः यह क्षेत्र, सत्य व्रत क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हैI

यह शहर विशेष आकार जैसे मां पृथ्वी (भूदेवी) के “ओट्टियाणम्” (कमर पर पहने जाना वाला एक आभूषण) के जैसे हैI वास्तव में केवल इस स्तल को हि कांची के रूप में सराहना की गयी है (संस्कृत में कांची का अर्थ यह आभरण है)I कवियों ने स्त्री का वर्णन करते हुए, साधारणतः उनके कमर की प्रशंसा में गाते हैं। इसी तरह, पृथ्वी की सुंदरता उसके कमर के कारण है और वह आभूषण कांची है।

एक साधारण व्यक्ति भी लोकोक्ति से इस शहर की महिमा को समझ जाएगा कि “अगर कांची में जन्म लिया या काशी में निधन हुआ तो हमें मुक्ति प्राप्त होगा” I

मुक्ति प्रदान करने वाले शहर है अयोध्या, मथुरा (उत्तर में), हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारकाI दक्षिण में एक मात्र कांची हैI

इस सूची में उपस्थित है, हमें कांची की इस प्रशंसनीय स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।

कांची कि अद्वितीयता यह है कि वह एक मात्र मुक्ति प्रदान क्षेत्र/पवित्र शहर है जो पृथ्वी की कमर आभूषण की तुलना में आती हैI

इसके अलावा, यह स्वयंम व्यक्त क्षत्रों में से एक है, कांची को यह और एक गौरव है I स्वयंम व्यक्त क्षत्र के विषय में, दया सतकम प्रकट करता है कि ” स्वयमुधयिन…” अर्थात, भगवान इस स्थान पर अपनी ही मधुर संकल्प पर उतरते हैं, कोई प्रार्थना से प्रेरित होके नहीं I

यह पवित्र तपस्या सफल होने के लिए, अशरीरि आज्ञा देते है ब्रह्मा को ,जो भारत देश पहुचे है, वह “सत्य व्रत क्षेत्र” कि और प्रस्थान करेI उन्होंने भी तुरंत अपनी यात्रा प्रारम्भ कीI कमलोत्पलन् (कमल में से जन्में हुए., ब्रह्मा) उत्साही और आनंदमय हो गये जैसे कि याग संपन्न हो गया हो और उसी पल में भगवान के दर्शन हुआ होI

वेदांत देशिकन ने एक अलौकिक रचना “हम्स सन्देश” किया I इस अद्भुत कथा में वर्णित किया गया है कि कैसे सीता वियोग से पीड़ित राम एक हंस को सीता के पास दूत के रूप में भेजते हैंI उन्होंने कौनसे स्तलों का दर्शन करना है और मार्ग के बारे में हंस को विस्तृत निर्देश दियाI “और ध्यान पूर्वक देखना”, उन्होंने हंस से आग्रह किया कि वे मार्ग में तोंडै मण्डल का दर्शन करना न भूले।

वो प्रशंसा करते हैं

“तुन्डेईर् आख्यम् तदनु महितम् मण्डलम् वीक्शमाणः क्षेट्न्रम् यायाः
क्शपित दुरितम् तत्र सत्य व्रताक्यम्!!”

– कि यह पवित्र स्थल सत्य व्रत क्षेत्र हमारे कुकर्मो को शीघ्र पदच्युत कर देगा I

हम्स सन्देश आगे इस शहर की महिमा और प्रशंसा करते हुए कहता है कि कांची एक मात्र जगह है जो निरंतर भगवान की दयालु कृपा और आनंद का पात्र बना हैI

अपनी स्वयं की अननुकरणीय अद्वितीय शैली में “कवितार्किक सिम्हम”  देशिकन और एक    दिलचस्प अंश प्रदान करते है I हंस को सीता कि खोज में लंबी दूरी तय करना था और इस लिए थक सकता था। पसीने और अन्य असुविधाओं के कारण इसके दुःख बड सकते है। लेकिन हंस को भय होने की कोई आवश्यकता नहीं है। कंची की मंद पवन सुलभता से अपनी थकावट दूर कर देगी।

“मंदाद्भुतात तधनु महितो निस्स्रुत्च चुताशंदाथ पार्श्वे तस्या” पशुपतिशिरच चन्द्र निहारा वाही I  दुरात प्राप्तम प्रियासखमिव त्वां उपैष्यति अवश्यं कम्पापाध: कमल वनिक कामुको गंधवाहा: II”

हे हंस, कांची में बहुत से आम उपवन हैं। बहने वाली हवाएं पेड़ों को हिलाएगा। मीठी सुगंध (फल, पत्ते और पुष्पों के कारण) हवा ले जाएगा। यह शहर की तरफ बह कर प्रजा को प्रसन्न और आनन्दित करेगा।

इतना ही नहीं, पवन अपनी शीतलता को समृद्ध करने के लिए एक चाल को अपनाएगी। आम के बगीचे से शहर कि तरफ रास्ते में यह शिव के शीर्ष (एकाम्बन) से होते हुए कृपा बरसायेगा, जिनका यह मंदिर में निवासस्थान है।

यह स्वाभाविक है हमें संदेह आयेगा कि….हवा शिव के शीर्ष को दुलारेगा तो शीतलता कैसे प्राप्त करेगा?

चन्द्रमाँ शिव के शीर्ष को आभूषित करता है I चंद्रा (चाँद) और शीतलता दोनों समानार्थक है I अतः शशि को दुलारने से, पवन और भी शीतल हो जायेगा I

इसके अलावा इस में कमल के जंगल का आलिंगन के नतीजे के रूप में कमल की सुगंध होगी I अतः, कांची से हवा एक प्रिय मित्र की तरह आपका स्वागत करेगा (जैसा एक मित्र आपका मनोरंजन करता हो)I

इस कारण, भय को दूर करो I ऐसे राम हंस से कहते है – देशिकन ने विवरण दिया I

वर्तमान में (श्रृंखला लिखने के समय) तीव्र ग्रीष्मकाल भय भीत कर रही है I वरुण देव की दया कि प्रतीक्षा दिलासा दे रही है I

(अन्द वरुणनै वेन्डुम्बोतु इन्द वरुणनै आऱुतल् अलिक्कुम्)

इस प्रकार सर्वशक्तिमान राम स्वयं ने कई तरीकों से इस शहर की सराहना की और महिमा की है। फिर, क्या ब्रह्मा आनंद से उस स्तान कि ओर प्रस्तान करने में संकोच क्यों होंगे?

मन में प्रसन्नता से, ब्रह्मा फुर्ती के साथ कांची शहर पहुंचे जो पृथ्वी के लिए एक आभूषण के रूप में जगमगाता है I

अयन (ब्रह्मा) अथ्थिगिरी का परिकल्पना किया, जिन पर भगवान कि कृपा थी, वरद राज भगवान यह शहर को सुशोभित करने से पूर्व I

ब्रह्मा अचंभित हुए कि क्या भगवान का चक्रायुद (भगवान के पांच दिव्य आयुधों में से एक) को अथ्थिगिरि के रूप में परिवर्तित किया गया हो I चक्र शत्रु को विध्वंस करता है I इसी तरह, यह पर्वत (अथ्थिगिरि) हमारे सभी पापों को बिना किसी अवशेष छोडे विनाश कर देगा ।

यह पर्वत उनके (वासुदेव) मन के बहुत करीब था I इस कारण, नाभिजन्मन (नाभि से जन्मे, अर्थात ब्रह्मा) अपने मन को पूर्णतः भगवान पर ध्यान केंद्रित करके यह पर्वत की आराधना करना प्रारंभ किया।

वह तुरंत यज्ञ के लिए स्वयं को और शहर को सन्नद्ध करना चाहते थे I शीघ्रता में, उनके मुंह ने एक नाम निकला – विश्वकर्मा।

ब्रह्मा के साथ साथ, हम भी उनकी आगमन का प्रतीक्षा करेंगे I

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यह सामान्य ज्ञान है कि दीपक कि आग के प्रलोभन से जुगुनू की उसी अग्नि में उसकी मृत्यु  होति है। लेकिन क्या कोई दीपक को दोषी ठहराएगा? वास्तविक जीवन में भी कई मूर्ख होते हैं जिन्हें दीपक द्वारा खींची गई कीड़ों से तुलना की जा सकती है, जो मृत्यु से मिलने के लिए पूर्वनिर्दिष्ट होते हैं।

अगले प्रकरण में आ रहा है ..

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अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ४

सर्वव्यापी भगवान् से चौदह लोकों के अधिपति के रूप में ब्रह्मा नियुक्त होने पर भी, देवताओं के गुरु का श्राप के परिणाम वशात उन्हें धरती पर भटकना पड़ा I

अपनी पदवी से हटाने से कौन दुःखी और परेशान नहीं होगा, और वोह भी ब्रह्मा का यह अमूल्य पदवी?

हज़ार करोड़ों युगों भगवान का अराधना और उपासना के बाद ब्रह्मा यह पदवी आर्जित करते है I ब्रह्मा का यह आसन एक महान निधि है जो कठिन श्रम और कष्ट के बाद प्राप्त हुआ है I

ब्रह्मा मनन करते….” पदवी को कायम रखने के लिये हज़ार अश्वमेध यग्न पूर्ण करना होगा! ठीक है! यह आवश्यक है कि हज़ार पवित्र अग्नि का निर्माण करना होगा I पदवी संरक्षण की यह परीक्षा को छोड़कर क्योंना भगवान् के दर्शन के लिए प्रयास करूँ?”

भारत देश पहुँच कर वे यग्न के लिए उचित स्थान का अन्वेषण कर रहे थे I यग्न का कार्य – यह विचार उन्हें  एक अनभिज्ञ पहेलु कि तरह विचलित कर रही थि I

इस से पूर्व ब्रह्मा को असफलता और निराशा प्राप्त हुआ जब वे स्वयं के प्रयास और बल से भगवान का अनुभव करने कि प्रयत्न करते है I वे ऊँचे चन्द्र माँ को पकड ने के प्रयत्न में विफल एक निराश शिशु की तरह शोक में डुब गए I

तब उन्हें स्पष्ट होके  ज्ञान प्रकाशित होता है – ” भगवान को अपने प्रयासों से प्राप्त करना एक अवास्तविक कार्य है I हम उन्ही कि सहायता और अनुग्राह से उनको प्राप्त कर सकते हैं “I 

उन पर विश्वाश हि एक मात्र राह है I रास्ता और मार्ग दर्शन वे खुद करेंगे I ब्रह्मा दृढ़ निश्चयी हुए I इस अहसास के साथ, पद्मासन (कमल आसन भगवान ब्रह्मा) इस कठिन स्थिति में सही निर्णय लेते हैं I

तभी, उनको एक दिव्य वाणी सुनाई देती है ” कैसे हो ब्रह्मा?” इस वाणी को पहचान ने में ब्रह्मा को अधिक समय नहीं लगा (अशरीरी) I

यह सभी का सर्वोच्च प्रमुख (नारायण) है जिनके दर्शन के लिए ब्रह्मा ने इंतजार और वांछित किया I

मेरे भगवान्! अगर मै कुशल हूँ तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो? आप मेरे बारे में इतना जानते हो जितना मै अपने बारे में खुद नहीं जानता I वेद घोषित करते हैं कि “यस सर्वज्ञ सर्व विथ…” कि आप सब जानते है I

“माता पिता भ्राता निवासस चरणं सुह्रुथ गति नारायणा” – आप हमारे लिए सब कुछ हैं; आप आदरणीय माता, पिता और संबंधी हैं I आप सम्पत्ति हो I

परंतु हम विस्मरणशील होकर अपने आप को महान सोच के अपने आत्म छवि (मै, मेरा) से पीड़ित हैं I

मैं आपके द्वारा सौंपा गया सृष्टि का काम करता हूं I परंतु, वास्तविकता को भूलके कि, आप मेरे अंदर निवास होके यह कार्य को सम्पूर्ण करते हैं (अन्तर्यामी होकर), मै अहंकारी हो गया और निष्कर्ष निकाला कि मुझसे बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं I

आपके दिव्य कृपा से हि, मै साधारण होके भी ब्रह्मा पदवी का अधिष्टान किया I परंतु मैं कभी आपके प्रति कृतज्ञ नहीं थाI

शास्त्र के धार्मिक वचन कहता है कि किसी को भगवान से मांगना नहीं चाहिए I उन्होंने जो हमें प्रदान किया, कृतज्ञता प्रकट करने हमें उनके पास जाना चाहिए I उसके विपरीत हम आपकी भक्ति केवल विनती करने और आग्रह करने के लिए करते है I

हमने कभी भी उस दुःख और पीड़ा के बारे में चिंतित नहीं हुए जो हमारी अज्ञानता के कारण आपके दिल में हुई।

आज मुझे उपयुक्त प्रतिफल प्राप्त हुई है, यह दण्ड I पत्नी बिछड़ गयी I ब्रुस्पाथी ने शाप दिया और अपना पद खों दिया I यह अनिवार्य है कि मुझे 1000 अश्वमेध यग्न संपन्न करना होगा I मैं यग्न करने के लिए इस विवशता में फंस गया हूँ I

यग्न करने के लिए, एक के मन और विचारों को शुद्ध होना चाहिए I शुद्धता तपस्या से प्राप्त होता है, जो परिणाम स्वरूप बुद्धि और शरीर को नियंत्रित करके  (कर्मेन्द्रिय और अन्य अंग)I तथापि, हातों को जोड़ कर एक पैर पर खड़े होने से, साँस को नियंत्रित करने से मेरी बुद्धि को आपके दर्शन योग्य नहीं बना सकता जो मेरे मन में विराजे हुए है (अंतर्यामी होके) I

मै पूरी तरह से परास्त हो चूका हूँ I मैं प्यासा हिरण की तरह हूं जो जल कि खोज में मृगतृष्णा की तरफ दौड़ रहा हो – इस तरह ब्रह्मा ने शोक किया I

एक अशरीरि से हास्य की ध्वनी I आपके कल्याण के बारे में एक बार पूछ ताछ से हि आपका सम्पूर्ण वृत्तान्त बाहर आगया I  आपने सामान्य पुरुषों की तरह प्रदर्शन किया है जो इसी तरह समरूप परिस्थितियों में व्यव्हार करते है I भयभीत न होना I मैं आपके दुःख को अल्प करने का अभिप्राय रखता हूं I मैं समझता हूं कि आप अपने बुद्धि को नियंत्रित करने और अपने विचारों को अभिसरण करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, परंतु असफलता से Iलंबे समय तक आप केवल अपनी स्थिति का आनंद ले रहे हैंI अब आपके दुःख इस के कारण और कर्म के वजह से हैं (जो यह भोगना निर्धारित है) I

ब्रुस्पाथी ने उचित रूप से आदेश दिया है कि आपको 1000 अश्वमेध यग्न निष्पादित करना होगा I केवल तभी आप मन की शांति प्राप्त करेंगे I

हैरान और अचंभे होगये वाणीसान ( वाणी के पति – ब्रह्मा) I

यह एक चमत्कार है कि उनका दिल टुकड़ों में नहीं बिखरा।

शीघ्र ही स्वर्ग से वह द्वानी ब्रह्मा के भय को कम करने के लिए उत्साहजनक शब्दों का वर्षा करना प्रारम्भ किया I

” चतुर्मुख! आपकी पीड़ा समझने योग्य है I एक अश्वमेध यग्न का निर्वाहन करना हि बहुत कठिन है I अगर १००० हो तो, उस कष्ट का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है I और विलंब के कारण भी, आप और पीड़ा से गुजरेंगे।

चिंतित न होना! ध्यान से मेरी बात सुनो I मैं आपको एक सरल मार्ग दिखाता हूँ I एक ऐसा स्तान है जहाँ आपको एक यग्न करके १००० नहीं बल्कि एक करोड़ याग्नो का फल प्रदान कर सकता है। क्या मैं उस स्तान का नाम बताऊ?

ब्रह्मा हाथ जोड के घुटने के बल बैठ गए I  आकाश की ओर देखा I अपने अश्रुवों को पोंच के बोलना आरम्भ किया।

मेरे भगवान! कृपया उस स्तान के बारे में तुरंत उल्लेख करें I आपका यह दास बिना संकोच किये अभि प्रस्थान करेगा ।

एक संक्षिप्त मौन के पश्चात, अशरीरि एक उच्च तरंगों की तीव्रता से अभिव्यक्त किया कि ” सत्य व्रत क्षेत्र जाओ I श्री हस्थिगिरी तुम्हारी शरण और आश्रय होगा I उधर तपस्या करो I

ब्रह्मा  ने आनंदपूर्वक दक्षिण की तरफ चलना आरम्भ किया। वे एक बार उच्चारण किया कि ” सत्य व्रत क्षेत्र – श्री हस्थिगिरी” I यह शहद, दूध, शक्कर और अमृत की तरह स्वादिष्ट था I

हम भी अगले प्रकरण कि और प्रस्थान करेंगे, हमारे मुंह से “सत्य व्रत क्षेत्र – श्री हस्थिगिरी” का जाप करते हुए I

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/14/story-of-varadhas-emergence-5/

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

६३) दास्य विरोधी – दासत्व में बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी – दास्य भाव के आदर्श उदाहरण। श्रीरामानुज स्वामीजी जो स्वयं आदि शेष अवतार है, वे दासत्व के श्रेष्ठ उदहारण है. श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति उत्तम सेवक के प्रत्यक्ष उदाहरण है।

दास्य का अर्थ पूर्णत: नियंत्रण में रहना – अर्थात स्वामी की सेवा में रहना। यहाँ यह समझाया गया है कि हम सभी जन भगवान श्रीमन्नारायण के सेवक हैं जो सभी के स्वामी हैं। “दास भूता: स्वतस्सर्वे ही आत्मन: परमात्मन:” यह शास्त्र में से एक मुख्य और प्रामाणिक प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा परमात्मा के स्वाभाविक सेवक हैं जो सर्वस्वामी हैं – यहाँ “ही” का अर्थ प्रसिद्ध है। हमारी भगवान के प्रति सेवा निर्हेतुक और जीवात्मा और परमात्मा के मध्य नित्य सम्बन्ध पर आधारित है। इस संसार में दूसरों के प्रति हमारी सेवा औपाधिक है (एक विशेष कारण पर आधारित है जैसे हमारा कर्म हमें एक निश्चित जन्म/ सम्बन्ध की ओर ले जाता है और हम इस सम्बन्ध के कारण सभी की सेवा करते हैं)। भगवान के प्रति हमारी सेवा दो प्रकार की हैं “स्वरूप पर्युक्त दास्य” और “गुण कृत्य दास्य”। “स्वरूप पर्युक्त दास्य” का अर्थ है जीवात्मा की भगवान के प्रति सेवा जो परमात्मा के साथ नित्य सम्बन्ध के कारण है, क्योंकि केवल भगवान स्वामी हैं और जीवात्मा स्वाभाविक सेवक है, जीवात्मा भगवान की सेवा करता है। “गुण कृत्य दास्य” का अर्थ जीवात्मा का भगवान के कई शुभ गुणों के कारण उनकी सेवा करना (सामान्यता जब भी किसी के पास दया, सौन्दर्य, सुन्दरता, ज्ञान, धन, बल, आदि गुण हो तो उनकी सेवा करना सब चाहेंगे)। हम में दोनों तरह के दास्य विद्यमान हैं। क्योंकि भगवान हमारे नित्य स्वामी हैं हम उनकी सेवा करते हैं और क्योंकि उनके पास कई शुभ गुण हैं हम उनकी सेवा करते हैं। फिर भी स्वरूप पर्युक्त दास्य होना अधिक प्रधान और मुख्य है, क्योंकि यह जीवात्मा के लिये सामान्य है। अनुवादक टिप्पणी: इस दास्य तत्व को हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़े विस्तार से समझाया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के ईडु महा व्याख्यान के पाशुर में बड़े विस्तार से समझाया है। इस पाशुर में श्रीपरांकुश नायकी की सहेली उनका ध्यान एक क्षण के लिये भगवान से दूर करने के लिये कहती हैं कि “भगवान कृष्ण बहुत बुरे, निर्दयी, आदि है” और देखती है कि कैसे उसे भगवान से बिछड़ने से दुख होता है। परंतु यह सुनते ही श्रीपरांकुश नायकी (श्रीशठकोप स्वामीजी स्त्री भाव में) अपनी सखी से कहती है अगर वो ऐसे भी हैं तो भी वह उन्हीं से प्रेम करेंगी क्योंकि यह उनका स्वभाव है। इस व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी स्वरूप पर्युक्त दास्य का तत्व विस्तार से समझाते हैं। श्रीरामायण से एक उदाहरण देते हैं कि जब माता सीता माता अनुसुया (श्रीगौतम महर्षि कि धर्म पत्नी) से मिलती हैं तो उनसे कहती हैं कि अगर भगवान श्रीराम इतने महान न होते तो भी वह उनसे इतना और इसी तरह प्रेम करती – क्योंकि यह उनके लिये स्वाभाविक है। श्रीपरकाल स्वामीजी ने भी पाशुर में इसे सुन्दरता से कहा है “वेम्बिन पुलु वेम्बनरी उण्णातु” – एक कीट जिसका जन्म नीम के फल में हुआ है वह बाहर जाकर गन्ने के रस के लिये तलाश नहीं करेगा – यद्यपि नीम कड़वा और गन्ने का रस मीठा है। वह कीट उसके और नीम के मध्य के सम्बन्ध के कारण नीम के फल को ही पायेगा। यही ही तत्व श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०८ से ११४वें सूत्र में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने प्रवचनों में इन सूत्रों की व्याख्या से इतनी सुन्दरता से अपने पूर्वाचार्यों के तत्व को बताया है। इस प्रस्तावना के साथ हम इस भाग में आगे बढ़ते हैं।

  • स्वयं को स्वतन्त्र मानना और उस पर अभिमान करना बाधा है। यह बहुत बड़ी बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि हम पूर्णत: भगवान पर हीं निर्भर हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ८३ और ८४वें सूत्र में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से तिरुमन्त्र में “नम:” विषय द्वारा समझाते हैं। वे कहते हैं “नम:” (न मम – मेरे लिये नहीं) यह दिखाता है कि कोई भी स्वयं के लिये नहीं है परन्तु भगवान के प्रगट होने के लिये है। वो यह भी पहचानता है कि जब भी कोई स्वयं को दूसरे देवता का सेवक समझता है तो भगवान बड़ी आसानी से उसे अपनी प्रधानता, शुभ गुण, आदि बताते हैं और जीवात्मा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। परन्तु जब कोई पूर्णत: अपने को स्वतन्त्र मानता हैं तो वह अपना मुलभुत शिक्षण शेषत्व को सिद्ध करने के लिये खो देता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “त्वमे” (तुम मेरे हो) और “अहमे” (मैं मेरा हूँ) क्रम को बड़ी सुन्दरता से दर्शाते हैं। जब भगवान कहते हैं “तुम मेरे हो” और जीवात्मा कहता है “मैं मेरा हूँ” तब भगवान इस स्थिति में घबरा जाते हैं, अचरज करते हैं कि इस जीवात्मा को ऊपर कैसे उठाऊँ।
  • भगवान श्रीमन्नारायण और भागवतों को छोड़ अन्य किसी का सेवक होना मूल्यहीन है, यह बाधा है। यहाँ पर विशेषकर देवतान्तरों के भजनो पर ध्यान केन्द्रीत है – श्रीवैष्णव को कभी भी अन्य देवताओं की सेवा में नहीं लगना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारा सच्चा मूल्य तो भगवान और भागवतों की सेवा पर ही आधारीत है। श्री गोदाम्बाजी नाच्चियार तिरुमोलि में यह समझाती हैं “वानिडै वालुम अव्वानवरक्कु मरैयवर वेल्वियिल वगुत्त अवि कानिडैत्तिरिवदोर नरि पुगुन्दु कडप्पदुम मोप्पदुम शेय्वदोप्प ऊनिडै आलि शङ्गुत्तमरक्केन्रु उन्नित्तेलुन्द एन तड मुलैगल मानिडवरक्केन्रु पेच्चुप्पडिल वालगिल्लेन कण्डाय मन्मदने” – जब ब्राह्मण यज्ञ करते हैं तो वे देवताओं के लिये भेंट तैयार करते हैं और स्वयं रख लेते हैं – और अगर कोई जंगली लोमड़ी उस भेंट को छूले तो वह मूल्यहीन हो जाता है। उसी तरह मेरे द्वारा प्रगट की हुई भक्ति विशेषकर भगवान श्रीमन्नारायण के लिये ही प्राप्य है – यदि यह चर्चा होती है कि मेरी भक्ति दूसरे के लिये है तो उसी क्षण मैं अपना प्राण दे दूँगा। इसी तरह का विषय श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा मुमुक्षुप्पडि के ६२वें सूत्र में समझाया गया है “देवर्गलुक्कु शेष्मान पुरोडासत्तै नाय्क्कु इडुमापोले, ईश्वर शेष्मान आत्म वस्तुवै संसारीगलुक्कु शेष्माक्कुगै” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि जिसप्रकार जो भेंट पूजनीय देवताओं के लिये है अंततः कुत्ते को दी जाती है (जिसे सामान्यतया देखना और छूना भी नहीं चाहिये), उसीप्रकार जीवात्मा (जो भगवान का हैं) वह संसारियों की सेवा में लगा है (जो देवतान्तर, आदि हैं – जो भी इस संसार में हैं और अपने सच्चे स्वभाव को न जानते हुये है संसार के सुख भोगने में लगा है ऐसे संसारी) । अत: हमारे पूर्वाचार्यों ने हमें सचेत किया है कि हमें देवतान्तर से सम्बंधित कार्य को नहीं करना चाहिये जिसका हमारे स्वरूप पर विपरीत प्रभाव पड़े।
  • अपने वर्णानुसार स्वयं को किसी देवतान्तर का सेवक मानना बाधा है। सभी जीवात्मा केवल भगवान श्रीमन्नारायण के ही सेवक हैं। सभी वर्णों में कुछ भी भेद भाव नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: यह एक मनोहर पहलू है। वार्ता माला के ४५०वें प्रवेश में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदाशरथी स्वामीजी को श्रीवैष्णव यज्ञोपवित से साथ और श्रीवैष्णव बिना यज्ञोपवित के साथ को समझाते हैं। वें दोनों श्रीवैष्णव वर्गों में १० अन्तर बताते हैं। खासकर अन्तर का केन्द्र उन यज्ञोपवित धारण श्रीवैष्णव के बारें में हैं जिन्हें वेद की शिक्षा लेनी पडती है और नित्य/नैमितिक कर्म करना पड़ता है जिसमें देवतान्तर सम्बन्ध (इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) और सात्ताध्य शामिल है (जो यज्ञोपवित धारण नहीं करते हैं)। श्रीवैष्णवों का वेदों से प्रत्यक्ष कोई प्रयोजन नहीं हैं और वे पूर्णत: दिव्यप्रबन्ध और उसके व्याख्यानों, कैसे भगवद, भागवत और आचार्य का कैंकर्य कर सकें ऐसे विषयों पर केन्द्रित होना चाहिए है। जब हम इसे देखते हैं तब हम यह सोचते हैं कि जब हम नित्य/नैमितिक कर्म कर रहे हैं तो हम देवतान्तर की पूजा कर रहे हैं। परन्तु इस संभ्रम को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत सुन्दरता से समझाते हैं। एक व्यक्ति श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के पास आकर पूछता है “आप देवतान्तर (जैसे इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) आदि की पूजा अपने नित्यकर्मों में करते हो तब फिर आप उनकी पूजा उनके मन्दिरों में क्यों नहीं करते हो?”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उसी क्षण दीप्तमान उत्तर देते हैं कि “आप यज्ञ में अग्नि कि पूजा करते हैं परन्तु धरती में आच्छादित करते समय क्यों अग्नि से दूर रहते हो? उसी तरह क्यों कि शास्त्र कहता हैं नित्यकर्मों को भगवद आराधना मानकर करना चाहिये यह समझकर कि भगवान सभी देवता के लिये भी अन्तरयामी हैं। वही शास्त्र यह भी कहता है कि मन्दिर में हमें भगवान को छोड़ अन्य देवता की पूजा नहीं करनी चाहिये और इसलिये हम उनके मन्दिर भी नहीं जाते हैं। और जब इन देवताओं को मन्दिर में स्थापित करते हैं तो वे रजो गुण उत्पन्न करते हैं और अपने आप को श्रेष्ठ विचार हैं और क्योंकि हम सत्वगुणी हैं हम देवता जो रजोगुणी हैं उनकी पूजा नहीं करते हैं”। इसलिये श्रीवैष्णव (यज्ञोपवित वाले) जब नित्य/नैमितिक कर्म करते हैं तब यह नहीं मानना चाहिये कि वे देवतान्तर कि सेवा कर रहे हैं – श्रीवैष्णव के लिये ये सभी कार्य भगवद कैंकर्य का एक अंग है जो भगवान कि ही आज्ञा है।
  • केवल जन्म देने के कारण हमें अपने माता पिता का सेवक मानना बाधा है। हमारा जन्म एक विशेष परिवार में विशेष माता पिता के यहाँ होना हमारे कर्म पर आधारित है और शास्त्र के आधार पर उनके प्रति हमारी सेवा सीमित है। परन्तु भगवान सभी के लिये माता और पिता हैं। इसलिये भगवान के प्रति सेवा अति श्रेष्ठ है। अनुवादक टिप्पणी: अगर माता पिता श्रीवैष्णव हैं तो हमें स्पष्ट रूप से उनकी सेवा अच्छी तरह से करनी चाहिये जैसे अन्य श्रीवैष्णवों की करते हैं जो पहिले समझाया जा चुका है।
  • केवल विवाह सम्बन्ध मात्र से पति की सेवक होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण परम पुरुष हैं। भगवान और जीवात्मा के मध्य एक मुख्य सम्बन्ध है भार्तृ – भार्या (पति – रक्षक और पत्नी रक्षिका)। यद्यपि एक स्त्री अपने कर्म के कारण एक पुरुष से विवाह करती है परन्तु सभी जीवात्मा के सच्चे पति तो भगवान ही हैं। यद्यपि एक स्त्री को धर्म शास्त्रानुसार अपने पति की ही सेवा करनी हैं – फिर भी भगवान के संग नित्य सम्बन्ध के मूलभूत को समझना और निरन्तर स्मरण रखना चाहिये। जैसे पहिले समझाया गया है कि अगर पति श्रीवैष्णव है तो उससे बड़े आदर और सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिये। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य हैं उनको दो पत्नियाँ थी। वो एक बार अपनी पत्नियों से अलग अलग एक प्रश्न पूछते हैं। पहले वों अपनी पहली पत्नी से पूछते हैं “तुम मेरे बारें में क्या सोचती हो?”। पहली पत्नी उत्तर देती है “मैं आपको स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान के समान और मेरे आचार्य ऐसे देखती हूँ”। वह बहुत खुश होकर उसे तिरुवाराधन और उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर वही प्रश्न वें अपनी दूसरी पत्नी से पूछने पर वो कहती है “मैं आपको मेरा पती मानती हूँ”। वो उसे अपनी पहली पत्नी को प्रसाद बनाने में सहायता करने को कहते हैं। परन्तु जब उनकी पत्नी के मासिक काल के समय वो प्रसाद नहीं बना सकती तब वें अपनी दूसरी पत्नी से प्रसाद बनाने को कहते हैं परन्तु वह अपने प्रिय शिष्य को उस प्रसाद को पहिले छूने को कहकर फिर पाते हैं। अत: हम समझ सकते हैं कि सच्चे श्रीवैष्णव का उनकी पत्नी द्वारा आदर होना चाहिये।
  • सांसारिक लाभ के लिये सांसारिक जनों का सेवक बनना बाधा है। हमें कैंकर्य का नित्य लक्ष्य रखना चाहिये न कि अस्थाई लाभ पाना। अनुवादक टिप्पणी: एक बार एक राजा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की कीर्ति सुनकर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को उससे मिलकर आर्थिक मदद लेने को कहते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं अगर भगवान श्रीरंगनाथ के अभय हस्त भी अपनी दिशा बदल दे तब भी वे किसी के पास मदद के लिये नहीं जायेंगे। हमारे पूर्वाचार्यों की ऐसी निष्ठा थी। किसी भी परिस्थिती में वे पूर्णत: भगवान पर ही निर्भर रहते थे और कभी भी किसी के लिये भी सांसारिक जनों के पास नहीं जाते थे।
  • तुच्छ सांसारिक सुख की ओर लगाव रखना और अपना मान गँवाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यता श्रीवैष्णवों की राजकुमार जैसी स्तुति होती है – अति आनंदमय श्रीमन्नारायण के सुन्दर और धनी सन्तान। किसी को उस अवस्था से नीचे नहीं आना चाहिये और सांसारिक जनों कि सेवा कर के अपना मान न गवाँये।
  • यह न जानना बाधा है कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण की ही सेवक हैं, जो सभी जीवों के नित्य संबंधी है, जो सभी जीवात्मा के नित्य रक्षक है और सभी जीवात्मा के नित्य स्वामी हैं। जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के नव विध सम्बन्ध में कहा गया है कि भगवान ही ऐसे पूर्ण व्यक्ति हैं जो पूर्णत: कई रीति से जीवात्मा के सम्बन्धी हैं। जीवात्मा की पूर्ण सेवा ही तिरुमन्त्र का मुख्य विषय हैं जो सभी वेदों व वेदांतों का तत्व है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वस्वामी, लोकभर्ता (पती या सबका रक्षक), जगन्नाथ (संसार के स्वामी), आदि कहकर बुलाते हैं। अत: हमें इस सत्य को मानना चाहिये कि हम ऐसे महान भगवान के सेवक हैं और उसी तरह कार्य करना चाहिये।
  • अपने आप को पूरी तरह भगवान की ओर जो कि स्वामी है, उपलब्ध नहीं करना बाधा है। किसी की सेवा की अन्तिम स्थिति को पारतंत्रय कहते हैं – भगवान ही जीवात्मा को नियंत्रित करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण में श्रीभरतजी पूर्णत: भगवान राम को समर्पित रहते हैं। भगवान श्रीराम की जो भी इच्छा है भरतजी उसका पालन कर उस इच्छा को पूर्ण करते थे। सभी जीवात्मा को अपना सच्चा स्वभाव स्थापित करने के लिये ऐसे ही होना चाहिये।
  • पूर्णत: भगवान का होना आर्थात भागवतों का सेवक होना। यह न जानना बाधा है। तत शेषत्व (भगवान की ओर सेवा) तदिय शेषत्व (भागवतों कि ओर सेवा) की ओर ले जाता है। विशेषकर सभी को अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये – यह सभी जीवात्मा के स्वभाव के लिये मुख्य और योग्य है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा की सामान्य स्थिति भगवद दास्यत्व है और पूरी तरह भगवान कि सेवा में रहना। इससे भी मुख्य – स्वरूप यातात्मयम (सच्चे स्वभाव का तत्व) – भागवत दास्य (भागवतों के सेवक होना)। पेरिया तिरुमोली में श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं भगवान को ही तिरुमन्त्र का तत्व इस तरह घोषित करते हैं “निन तिरुवेट्टेळुत्तुम् कट्रु नान उर्ट्रथुम उन्नडियार्क्कडिमै कण्णपुरत्तुरेयम्माने” (हे तिरुक्कण्णपुरम के प्रिय भगवान तिरुमन्त्र का तत्व सीखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं आपके दासों का दास हूँ)। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नान्मुगन तिरुवन्दादि के पाशुर में यह दर्शाते हैं “एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मटवरै शारत्ति इरूप्पार तवम” (भागवतों कि ओर भक्ति स्वयं भगवान से अधीक है)। एत्तियिरुप्पवर – भगवत शेष भूतर – वह जो भगवान के शरण हो गया हो। ऐसे भक्तों की शरण में जो हुए हो उनकी स्थिति और अधिक महान है। श्रीरामायण में श्रीलक्ष्मणजी और श्रीभरतजी पूर्णत: श्रीरामजी के शरण थे। श्रीशत्रुघ्नजी पूर्णत: श्रीभरतजी के शरण थे। श्रीरामायण में कहा गया है कि “चत्रुघ्नो नित्यचत्रुघ्न:” (वह जिसने नित्य बाधाओं को पाराजित किया है)। हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं कि “श्रीशत्रुघ्नजी भगवान राम के सुन्दर और दिव्य गुणों का पूरी तरह त्याग कर श्रीभरतजी की सेवा किये”। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अवनदियार सिरुमामनिसराय एन्नैयाण्दार” – सिरुमामनिसर – वो जो पूर्णत: भगवान के शरण हुए हैं जो छोटे हैं पर बड़े ज्ञानी हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसे भक्तों को अपना स्वामी मानते हैं, यह घोषणा किये हैं। जब ऐसे भागवात हैं तो कोई कैसे उन्हे निर्लक्ष्य कर भगवान के श्रीचरण कमलों की सेवा कर सकता है? अत: जीवात्मा के लिये भागवत कैंकर्य भगवद कैंकर्य से भी अधिक मुख्य है।
  • यह न जानना कि अपने स्वामी की रुचि और अरुचि ही हमारी रुचि और अरुचि होना चाहिये। इस विषय में श्रीवैष्णवों को अपने बड़ों की राह पर चलना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कैंकर्य के पहलू को समझाते हैं। २७५वें सूत्र में वे कहते हैं भगवद कैंकर्य हमें शास्त्र के जरिये सिखना चाहिये और आचार्य कैंकर्य शास्त्र और स्वयं आचार्य के जरिये सिखना चाहिये। फिर वें २७६वें सूत्र में समझाते हैं कि कैंकर्य में दो पहलू हैं। २७७वें सूत्र में वे क्या हितकारी (भगवान/आचार्य की पसन्द) हैं और क्या अहितकारी (भगवान/आचार्य की ना पसन्द) हैं कहते हैं। २७८वें सूत्र में समझाते हैं कि हितकारी / अहितकारी पहलू वर्णाश्रम धर्म और आत्मा स्वरूप के आधार पर हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस २७८वें सूत्र पर विस्तार से व्याख्या देते हैं। वे इस सूत्र के लिये ३ अलग व्याख्या देते हैं परन्तु अन्त में स्वयं कहते हैं पहली व्याख्या ही योग्य हैं। पहिले व्याख्या का तत्व हैं:
    • वर्णाश्रम में हितकारी उतने ही (नित्य / नैमित्तिक) कर्म करना जो शिष्य व बच्चों को वैधिक धर्म पालन करने के लिये आवश्यक हो और दूसरों के प्रति दया भाव से – यह अन्य जीवों के कल्याण पर केन्द्रित है (दया भाव)
    • नित्य / नैमित्तिक कर्मों को इस तरह से निभाना कि ऐसा न करने से पाप लगेगा, यह वर्णाश्रम के प्रतिकूल है – यह स्वयं को पापों से बचाने पर केन्द्रित है (स्वार्थ भाव)।
    • आत्म स्वरूप में हितकारी कर्म- स्वयं को भगवान के पूर्ण आधीन रखना।
    • आत्म स्वरूप में प्रतिकूल कर्म – ऐसे कर्म जिसमें भगवान को भागी नहीं बनाना जो हमारे दास्य स्वभाव को प्रभावित करता है (भगवान हमारे स्वामी है और हम उनके दास हैं) । उदाहरण के लिये एक पिता (जो उच्च है) प्रेमवश और खेल-खेल में अपने स्वयं के पुत्र को उठाता है और उसके पैरों को अपनी छाती से लगाता है। परन्तु उस पुत्र को यह कहकर अपने पैरों को नहीं हटाना चाहिये कि “पिताजी आप मुझसे उच्च है मैं कैसे अपने चरणों से आपके मस्तक को छु सकता हूँ” बजाय इसके वह अपने पिता को इसका पूर्ण आनन्द लेने दे।
  • अपने स्वयं के दासत्व के डर से भगवान को पूर्ण आनंदित न होने देना बाधा है। एक दास का धर्म है कि व अपने स्वामी को खुश रखें। इसके लिये उसे अपना सम्मान ही क्यों न खोना पड़े। हमें अपने स्वामी की खुशियों को लाने के लिये हमेशा उनकी सेवा के लिये तैयार रहना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के १७७वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि एक शेष्दभूत (दास) को अपने शेषी (स्वामी) की खुशी को लाना स्वरूप (सच्चाधर्म) और प्राप्यम (लक्ष्य) है। इसलिये जीवात्मा को हमेशा इसके लिये कार्य रत रहना चाहिये।
  • भगवान जब जीवात्मा के शेषत्व को नष्ट करते हैं तब घबराना बाधा है। जब स्वयं भगवान नीचे आकर जीवात्मा की प्रेम से सेवा करते हैं तब जीवात्मा को भगवान को रोकना नहीं चाहिये – उन्हें सेवा करने देना चाहिये – ऐसे न करना हानिकारक हैं। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के ९२वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसी तत्व को समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। भगवान जो श्रेष्ठ हैं आल्वार श्रीशठकोप स्वामीजी को ऊपर उठाने के लिये उनके हृदय में प्रवेश करते हैं। परन्तु आल्वार के प्रति प्रेम के कारण भगवान उनके सेवक बन जाते हैं और उनकी सेवा करते हैं। उस समय आल्वार यह नहीं कहते हैं कि “मैं साधारण जीवात्मा हूँ भगवान मेरी सेवा क्यों कर रहे हैं? मैं उन्हें ऐसे करने से रोकूँगा क्योंकि कि मुझे शास्त्र तत्व का ज्ञान है कि जीवात्मा सेवक है और भगवान स्वामी”। इससे विपरीत आल्वार ने भगवान को उनकी इच्छा पूर्ण करने दी यह जानते हुए कि भगवान को क्या चाहिये और यही मुख्य पहलू है।
  • सेवा में न रमकर (शामील होकर), बाधाओं में जुड़े रहना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी:  शास्त्र में कहा गया हैं “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” – भगवान कि सेवा करना जीवात्मा का स्वभाव है, अगर यह सेवा स्पष्ट नहीं है तो वह जीवात्मा स्वयं अपनी पहचान खो देता है। सभी को बाधाओं से बचना चाहिये – जैसे कोई अपने शरीर पर आनेवाली बाधाओं से बचता है वैसे ही हमें आत्मा को जो हानी पहुँचाता है उससे बचना चाहिये।
  • आचार्य की ओर हमारी सेवा अस्थाई / नियमबद्ध मानना बाधा है। आचार्य को भगवान के अपरावतार माना गया है – इसलिये आचार्य-शिष्य के मध्य के सम्बन्ध को भी नित्य मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। श्रीवचन भूषण के ४२७ सूत्र में इस तत्व को सुन्दरता से श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं। भगवान के निकट सीधे जाना अर्थात “उनके हाथ पकड़ना और सहायता माँगना” और भगवान के निकट आचार्य के जरिये जाना अर्थात “उनके चरण कमलों को पकड़ना और उनकी सहायता माँगना” – स्पष्ट रूप से दूसरा विकल्प ही सही है। इस समझ से आचार्य के साथ सम्बन्ध भी नित्य माना जाता है।
  • यह न जानना कि हम भगवान के नित्य सेवक हैं, और भगवान नित्य स्वामी हैं, बाधा है। भगवान और जीवात्मा के मध्य स्वामी-दास्य भाव स्थायी है। यह समय, स्थान और परिस्थिति के सीमा से परे है।
  • देवतान्तर और पितृ (पूर्वज) की सेवा करना बाधा है। क्योंकि हम भगवान के नित्य सेवक हैं देवतान्तर, पितृ, आदि की सेवा का यहाँ त्याग किया गया है। यहाँ पितृ तर्पण, आदि (नैमितिक कर्म) जो शास्त्र से नियत किया गया है उसका त्याग नहीं करना है – क्योंकि इसे हम पहिले ही समझ चुके हैं कि हम आज्ञा कैंकर्य की सीमा में हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीशठकोप स्वामीजी कि स्तुति “कृष्णा तृष्णा तत्वम” ऐसी कि गयी है – भगवान के प्रति भक्ति का मूर्त रूप

६१) स्नेह विरोधी – लगाव / मित्रता में बाधाएं

स्नेह का अर्थ मित्रता, स्नेह, लगाव, प्रेम आदि है। स्नेह कि परिपक्व स्थिति भक्ति है। छोटे जनों का श्रेष्ठ जनों के प्रति स्नेह भी भक्ति कहलाता है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिये हनुमानजी (तिरुवड़ी – जीवात्मा) का श्रीराम भगवान (पेरुमाल – परमात्मा) के प्रति प्रेम को भक्ति कहते है। और भगवान श्रीराम का हनुमानजी के प्रति प्रेम को स्नेह कहते हैं। इस भाग में हर बात के लिये दो पहलू पर चर्चा कि गयी है – पहला पक्ष है किससे बचना चाहिये और अगला पहलू किसका पालन करना चाहिए। यहाँ सारतत्व यह है कि हम प्रथम पक्ष को सामान्यत: होते देखते है परन्तु इस संसार में दूसरा पहलू बहुत कम देखने को मिलता है। यह जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही नहीं है। हमें पहिले में कम या लगाव होना ही नहीं चाहिये और दूसरे में अधीक लगाव होना चाहिये। यह समझना बहुत आसान है।

  • प्राकृत बन्धुओं (सांसारिक सम्बन्धी – वह सम्बन्धी जो हमारे शारीरिक जन्म से जुड़े है) से लगाव रखना और आत्म बंधुओं (वह जो भगवद, भागवत और आचार्य के जरिये हमसे जुड़े हैं) से लगाव नहीं रखना बाधा है।
  • सांसारिक पहलू से लगाव रखना और भगवद विषय से लगाव नहीं रखना बाधा हैं। हमें भगवद विषय में लगाव को आगे बढ़ना चाहिये और सांसारिक पक्षों में लगाव का त्याग करना चाहिये। श्रीमहद्योगी स्वामीजी मून्राम तिरुवन्दादि के १४वें पाशुर में समझाते है कि “मार्पाल मनम शुलिप्प मङगैयर तोल कैविट्टु” जब हम भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति लगाव को बढ़ाएंगे तो औरतों (और अन्य सांसारिक खुशियों) के प्रति हमारा लगाव अपने आप समाप्त हो जायेगा।
  • अपने शारीरिक सुख कि ओर लगाव रखना और आचार्य के शारीरिक सुख कि ओर लगाव न रखना। उपदेश रत्नमाला के ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयिरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” आचार्य का अर्थ वो जो शिष्य (आत्मा और आत्मा से जुड़े पक्षों जैसे ज्ञान, भक्ति आदि) का पालन पोषण करता है और शिष्य का अर्थ वो जो आचार्य के पवित्र शरीर का पोषण करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्व को उपदेश रत्नमाला के पाशुरों से बड़ी सरल और सुन्दर रूप से प्रस्तुत करते हैं। श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य और शिष्य अपने कार्य को बदल नहीं सकते है। अर्थात आचार्य को केवल शिष्य के आत्म यात्रा (आत्मिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये और शिष्य को केवल आचार्य के देह यात्रा (शारीरिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये। और अगर आचार्य शिष्य के देह कि जरूरतों के बारें में विचार करें और शिष्य आचार्य के आत्मिक जरूरतों के विषय में विचार करें तो गड़बड़ी हो जायेगी – क्योंकि यह उनके लिये करने में असामान्य हैं।
  • जो हमें सांसारिक सुख प्रदान करते हैं उन जनों से लगाव रखना और आचार्य जो हमें तिरुमन्त्र के तत्व को प्रदान करते हैं उनसे लगाव न रखना बाधा हैं। सांसारिक सुख अर्थात खाना, वस्त्र, घर आदि। तिरुमन्त्र अर्थात अष्टाक्षर मन्त्र और उसकी स्तुति पेरिया तिरुमन्त्र ऐसे की जाती है क्यूंकि उसमें सभी महत्वपूर्ण ज्ञान समाहित है।
  • जहाँ हम निवास करते हैं उस स्थान में लगाव रखना और जहाँ आचार्य निवास करते हैं उस स्थान में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। सभी को उस स्थान या शहर पर अधीक लगाव होना चाहिये जहाँ हमारे आचार्य निवास करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम स्मरण कर सकते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला के ६४वें पाशुर में कहते हैं “तन्नारियुनुक्कुत्तानडिमै शेयवदु अवन इन्नाडुतन्निलिरुक्कुम नाल, अन्नेररिन्दुमदिलाशैयिन्नि आचार्यनैप्पिरिन्दिरुप्पारार् ? मनमे पेशु” –जब तक हमारे आचार्य इस संसार में है तब तक हम उनकी सेवा कर सकते है (वह सेवा उनके लिये सच में लाभ दायक रहेगी)। यह जानने के पश्चात कौन अपने आचार्य से अलग रहना चाहेगा?
  • देह यात्रा में लगाव रखना और आत्म यात्रा में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। श्रीवैष्णवों को शारीरिक जरूरतों का पालन पोषण करना जरूरी नहीं है। उनको आत्मिक पक्ष पर केन्द्रीत होना चाहिये जैसे भगवद, भागवत और आचार्य कि सेवा करना।
  • पत्नी, बच्चे आदि जो भगवान और भागवतों से विरोधी/ शत्रुता कि भावना रखते हैं उनके साथ स्नेह रखना बाधा हैं। ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग उतना ही सम्बन्ध रखना चाहिये जितना शास्त्र अनुमती देता है (जैसे खाना, वस्त्र, घर आदि) और किसी को भी ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग प्रेम सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। उस पत्नी, बच्चों आदि से प्रेम सम्बन्ध रखने में कोई गलत नहीं हैं जो भगवद भागवत विषय कि ओर हितकारी हो क्योंकि वें भागवत होने के योग्य है।
  • अर्चावतार भगवान और मुख्य मन्दिर/दिव्यदेश जैसे कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति) आदि कि ओर लगाव न रखना बाधा हैं। अर्चावतार कि स्तुति तिरुनेडुन्दाण्डगम में श्रीपरकाल स्वामीजी ने “पिन्नानार वणन्गुम सोदि” ऐसे की है –जो कोई भी विभव अवतारों (जैसे राम, कृष्ण आदि) का दर्शन करने में असफल रहे है उनके लिए अर्चावतार ही दीप्तिमान चमकती रोशनी है। हमें यह पूरी तरह समझ लेना चाहिये कि अर्चावतार भगवान ही हमारे पूर्ण रक्षक हैं। हमारे आल्वार और आचार्यों को दिव्य देश और इन दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार भगवान से बहुत लगाव था। इन दिव्य देशों में भी हमें कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति), पेरुमाल कोइल (काञ्चीपुरम) और तिरुनारायणपुरम (मेलकोटे) क्षेत्रों में विशेष स्तुति होने के कारण अधीक लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीरंगम जैसे दिव्यदेश कि अधीक बढाई या स्तुति होती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि अन्य दिव्यदेश नीचे है। उदाहरण के लिये हमारे सम्प्रदाय के लिये श्रीरंगम मुख्य स्थान है और हमारे सभी आल्वार और आचार्य को इस दिव्यदेश के प्रति अधीक लगाव था। आल्वार और आचार्य के इस अधीक लगाव के कारण श्रीरंगम को अन्य दिव्यदेश से अधीक महत्ता (विशिष्टता) है।
  • मन्त्र रत्न को छोड़ अन्य मन्त्र कि ओर लगाव रखना बाधा हैं। मन्त्र रत्न अर्थात द्वय महा मन्त्र। हम इसे रहस्य त्रय से भी जोड़ सकते है। इन्हें अपने आचार्य से सिखा जा सकता है। यह रहस्य त्रय जीवात्मा के स्वभाव को समझाता है और जीवात्मा को मोक्ष के पथ पर ले जाता है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वदिनचर्या में श्रीएरुम्बी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या को लिखते है। ९वें श्लोक में वें इस तरह दर्शाते हैं: मन्त्र रत्न अनुसन्धान सन्तत स्फुरिताधरम तदर्थ तत्व निध्यान सन्नद्ध पुलकोग्दमम् – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महा मन्त्र (जिसे मन्त्र रत्न भी कहते है – सभी मंत्रों में रत्न) का जाप करते रहते है। द्वयम का निरन्तर अर्थानुसंधान करने के कारण उनका शरीर एक स्पष्ट दिव्य पवित्र प्रतिक्रिया देता है जो ओर कुछ नहीं श्रीसहस्रगीति है। नायनार ने यह बताया है कि श्रीसहस्रगीति दिव्य ग्रंथ द्वय महामन्त्र का ही पूर्ण स्पष्टीकरण करता है। यह आचार्य हृदय के चूर्णिका २१० में दर्शाया गया है। अत: हमें मन्त्र रत्न कि ओर ही पूर्ण लगाव होना चाहिये। आजकल हम यह देखते हैं कि श्रीवैष्णव जन अन्य सम्प्रदाय के जनों के प्रभाव में आकर अन्य मन्त्र का जाप करते है। इससे बचना चाहिये और हमारे ऐसे विषयों में पूर्वाचार्यों के आर्दशों का पालन करना चाहिये।
  • अन्य मन्त्र देनेवाले कि ओर लगाव रखना और जिन्होंने तिरुमन्त्र दिया हैं उनकी ओर लगाव न रखना बाधा है। जो पेरिया तिरुमन्त्र (अष्टाक्षर) सिखाते हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। यहाँ अन्य मन्त्र अर्थात वह मन्त्र जिनका प्रयोग उपासना में होता हैं। हमारे आचार्य कभी भी मन्त्र सांसारिक लाभ के लिये कहने को नहीं कहे हैं। इसीलिए जिन्होंने हमें पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया हैं उन आचार्य कि ओर हमें हमेशा पूर्ण लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी सबसे पहिले पाशुर में श्रीमन्नारायण भगवान का नाम बतलाते है “एन पेरुक्कन्नलत्तु ओण पोरुलीरिल वण पुगल नारणन थीण कलल सेरे” आपको भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों में आत्मसमर्पण करना हीं होगा – श्रीमन्नारायण भगवान सभी में अन्तरयामि रूप से विराजमान है, वह जिसके पास पवित्र गुण है और वह जो कभी भी अपने भक्तों कि रक्षा करने से नहीं चुकते है। ईडु महा व्याख्या अवतारिका (प्रस्तावना) में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी यह समझाते हैं कि यह पाशुर तिरुमन्त्र पर केन्द्रीत है जो भजन द्वारा भगवान कि ओर ले जाता है। वह यह भी समझाते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य इस मन्त्र के पवित्र अर्थों पर केन्द्रीत थे और अपने शिष्यों को भी यहीं सिखाते थे परन्तु अन्य लोग इस मन्त्र का प्रयोग जप, याग, होम आदि के लिये और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये करते थे। इससे यह स्थापित होता हैं कि हमें ऐसे जप, होम आदि अगर तिरुमन्त्र का उपयोग करके भी किया जा रहा हो तो भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखना है। और श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जिसने पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया है (जो रहस्यत्रय का एक अंग है) वों हीं हमारे आचार्य है।

६२) भक्ति विरोधी भक्ति में बाधाएं

भक्ति अर्थात अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति/ तत्व से स्नेह, प्रेम। एक आस्तिक की भगवान के प्रति पूजा को भक्ति कहते है। इसे काधल ऐसा समझाते है (तमिल में प्रेम)। शास्त्र में मोक्ष प्राप्ति के लिये भक्ति को उपाय समझाया गया है – इसे साधना भक्ति कहते है। भगवान के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात, निरन्तर उनका प्रेम से ध्यान करने को भक्ति योग कहते है जिसे मोक्ष साधन (मोक्ष प्राप्त करने का उपाय) ऐसा समझाते हैं। केवल योग्य जीव ही भक्ति योग को कर सकते है। (अनुवादक टिप्पणी: साधन भक्ति केवल तीन वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य) ही कर सकते है, क्योंकि कर्म योग और ज्ञान योग उसके अंग है जिसे केवल वें ही निभा सकते हैं)।

आल्वारों कि भक्ति (जो सबसे उच्च भक्त है) स्वयं भगवान की कृपा से है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के प्रारम्भ में ही कहते है “मयर्वर मदि नलम अरुलिनन” –भगवान मुझ पर दोषरहित ज्ञान/पूजा का आशिर्वाद प्रदान किये है – यह भगवान की निर्हेतुक कृपा का परिणाम है। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य मंगल श्लोक में भगवान से उनकी इसी तरह के भक्ति कि अपेक्षा से प्रार्थना करते है “भवतु मा परस्मिन शेमुषी भक्ति रूपा”। क्योंकि भगवान अपने भक्तों को ऐसी भक्ति का आशिर्वाद प्रदान करते है, तो वह भक्ति प्राप्य (अन्तिम लक्ष्य – कैंकर्य) का एक अंग हो जाता है। इसलिये इसे साध्य भक्ति (अधिकारी के पूजा के आधार पर भक्ति जो स्वयं भगवान प्रदान करते है) और यह साध्य भक्ति साधन भक्ति से भिन्न है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार बड़ी सुन्दरता से कई प्रकार की भक्ति और चूर्णिका ९५ से १०२ तक श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वारों) की भक्ति के स्वभाव को स्थापित करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने निपुण व्याख्यान से हम पर आशिर्वाद प्रदान करते है जिसके मदद से हम यह पवित्र तत्व को समझ सकते है। ३ प्रकार कि भक्ति पहचानी गयी है – साधन भक्ति, साध्य भक्ति और सहज भक्ति।

  • साधन भक्ति वह भक्ति है जो स्वयं के परिश्रम से बढ़ती है और भगवद प्राप्ति के लिये इसे उपाय माना गया है – यह भक्ति योग है जिसे शास्त्र में समझाया गया है।
  • साध्य भक्ति पवित्र योग है जो उच्च आचार्य जैसे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी आदि द्वारा प्रगट कि गयी है। यह आचार्य पहिले ही भगवान के शरण हो चुके है और केवल भगवान को ही उपाय स्वीकार किये है। ऐसे साध्य भक्ति भूख के समान है – केवल जब कोई भूखा हो तभी वो अपनी पूर्ण संतुष्टी तक भोजन खा सकता है उसी तरह जब पवित्र भक्ति होती है तब वह जो कैंकर्य करते है उससे उन्हें पूर्ण संतुष्टी मिलती है। इसलिये यह साध्य भक्ति कैंकर्य का एक अंग हो जाता है।
  • सहज भक्ति ऐसे अधिकारी का जन्म इस पवित्र भक्ति के साथ ही हुआ है। उदाहरण के तौर पर श्रीशठकोप स्वामीजी का जन्म भगवान कि तरफ पवित्र भक्ति के साथ हुआ और ऐसी भक्ति स्वयं भगवान ने ही प्रदान की है। सहज का अर्थ “वह जो स्वयं से जन्म लिया हो”। यह सहज भक्ति साधन भक्ति और साध्य भक्ति से भिन्न हैं। इसी कारण से आल्वारों को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है – भगवान की भक्ति करने के लिए भगवान की निर्हेतुक कृपा से वें भगवान के सीधे कृपा प्राप्त बने।

इस प्रस्तावना के साथ इस विषय के भिन्न पहलू पर हम चर्चा करेंगे।

  • भगवान को पाने के लिये भक्ति को साधन मानना बाधा है। जब हम भक्ति को मोक्ष का साधन मानते है तब उसमें स्व प्रयास हैं। परन्तु कुछ पाने के लिये स्व प्रयास करना सीधा उसके शेषत्व और पारतंत्र्य के विरुद्ध है। अत: भक्ति को साधन मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तो स्थापित हो ही गया है कि केवल “भगवान” ही उपाय है। हमारा चरम श्लोक भी इसी तत्व को समझाता है। चरम श्लोक में “मामेकं” (केवल में) भगवान हीं उपाय इस तत्व को स्वीकार करने पर ज़ोर देता हैं। इसलिये भक्ति को उपाय मानना दोषपूर्ण है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ११५वें सूत्र में बड़े विस्तृत रूप से सिखाते हैं। वह कहते हैं “प्रापकांतर परित्यागत्तुक्कु अज्ञान असक्तिकलन्रु, स्वरुप विरोधमे प्रधान हेतु” – अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का त्याग करने का मुख्य कारण है वें आत्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत हैं (जो पूर्णत: भगवान पर निर्भर है) और ज्ञान/योग्यता के कमी के कारण नहीं। कोई कहते है कि जिनमें क्षमता है वे भक्ति योग कर सकते हैं और जो सक्षम नहीं हैं वें भगवान के शरण हो सकते हैं। ऐसे तर्क शास्त्र को हमारे पूर्वाचार्यों ने पूरी तरह अस्वीकार किया हैं। चाहे समर्थ हो या असमर्थ यह जीवात्मा का स्वभाव हैं की अपनी रक्षा और ऊपर उठाने के लिये भगवान के शरण होना।
  • स्मरण, संकिर्तन आदि सभी साध्य (परिणाम- कैंकर्य) के अंग है, यह न जानना बाधा हैं। भक्ति के प्रारम्भ दशा में जब भगवान रक्षा के लिये आते है तब जीवात्मा कि ओर से एक अद्वेष होता है। जब भगवान “त्वममे” (तुम मेरे हो) कहते है तब हमें “अहममे” (में मेरा हूँ) यह नहीं कहना चाहिये। हमें यह मानना चाहिये कि भगवान को अस्वीकार न करने की सोच भी भगवान ही उत्पन्न करते हैं।
  • हमारी भक्ति में सांसारिक इच्छाओं का मिश्रण होना और पवित्र भक्ति में स्थित नहीं होना बाधा हैं। सांसारिक इच्छाओं को हृदय में घर करने से बचाना चाहिये। उसी तरह सभी को निरन्तर पवित्र भक्ति के लिये प्रयास करना चाहिये।
  • प्रपत्ति और साध्य भक्ति को समान मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति भगवान के शरण होने का कार्य और भगवान को उपाय रूप में स्वीकार करना हैं। जैसे पहिले देखा गया हैं साध्य भक्ति हमारी भक्ति पवित्र हो सके इसीलिए भगवान से प्रार्थना के लिए है – दोनों भिन्न है। प्रपत्ति स्वरूप से सम्बन्धीत हैं और साध्य भक्ति हम कैसे अपना कैंकर्य बड़े प्रेम से करें इससे सम्बन्धीत हैं।
  • प्रपन्न के लिये यह न जानना कि साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करने से प्रपत्ति प्रभावहीन हो सकती है, यह बाधा हैं। यह बात स्पष्ट नहीं हैं – मैंने (डॉ व्ही व्ही रामानुजम स्वामी) अपने बड़ों से यह सुना हैं कि जब साध्य भक्ति निभाई जाती हैं तो सामान्यत: उसका अन्त प्रपत्ति में ही होता हैं।
  • जब प्रपन्न जन साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करते हैं तो यह भक्ति उनके कैंकर्य का एक अंग है यह न जानना बाधा हैं। क्योंकि प्रपन्न ऐसी श्रद्धा और भक्ति के लिए उच्च उत्कंठा के साथ प्रार्थना करते हैं, यह उसी प्रकार है जैसे भोजन के लिये भूख हैं जो कैंकर्य करना और भी सुगम कर देता हैं।  अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१ सूत्र में समझाते है कि एक प्रपन्न के लिये उनके कर्म हीं उनके कैंकर्य का एक अंग होगा, ज्ञान उनके स्वयं के ज्ञानाभिवृद्दि का अंग होगा, भक्ति कैंकर्य के प्रति लगाव का अंग, स्वयं प्रपत्ति जीवात्मा के सच्चे स्वभाव का अंग होगा।
  • आल्वारों कि भक्ति जो स्वयं भगवान कि निर्हेतुक कृपा से प्राप्त हुई है वह आल्वारों का आधार है, यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे सामान्य जन भोजन, जल आदि से पोषण करते है वैसे हीं आल्वार जिन पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा है उनका पोषण भगवान के प्रति भक्ति से ही होता है। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा किये हैं कि “उण्णुम सोरु परुगु नीर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन् एम्पेरुमान” – प्रसाद, जल, ताम्बूल आदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हीं हैं।
  • यह मानना कि जब हम भगवान को सब जरूरत कि वस्तुएं देते हैं तो वह तृप्त और खुश होते है बिना यह जाने कि यह उनकी हीं कृपा हैं जो हमें सब कुछ प्राप्त हुआ हैं। यह बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ९.२६ में भगवान कहते हैं “पत्रं पुष्मं फलं तोयं यो मे भकत्या प्रयच्छति। तदहं भकत्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:” – एक पत्ता, फूल, फल और जल – जब भक्ति से मुझे अर्पण किया जाता है तो मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये यह समझना अति जरूरी है कि भक्ति एक मुख्य अंग है – न कि महँगे भोजन/वस्तु जो हम अर्पण करते हैं। भगवान के पास यह सब पहिले ही है –हम उन्हें कुछ नया नहीं दे सकते हैं। यह हमारी भक्ति हैं जिसे वें देखते हैं और यह हीं उन्हें सबसे अधिक संतुष्टी प्रदान करेगी।
  • भगवान के प्रति भक्ति हमारे हृदय में उत्पन्न होती हैं ऐसी भक्ति और परम भक्ति कि वृद्धि भगवान कि कृपा का ही फल हैं। यह न जानना बाधा हैं। ऐसी परम भक्ति की प्रार्थना श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगनाथ गद्य में कहते हैं “पारभक्ति परज्ञान परमभक्ति युक्तां माम कुरुश्व”। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार १०४ चूर्णिका में यह समझाते है कि भगवान को भक्ति उळवन (भक्ति किसान) कहते हैं – जैसे एक किसान अपने खेत में चावल बुआई करता है, खाद डालता है, घास निकालता हैं, अनाज काटता है और अन्त में चावल घर लाता है। भगवान निरन्तर जीवात्मा को जोतते है, भक्ति का बीज बोवते है, जीवात्मा को अध्यात्मिक कार्य में लगने के लिये कई अवकाश प्रदान करते है, बाधाओं से निकालने में सहायता करते है, एक बार जीवात्मा में भक्ति आ जाती है अन्त में जीवात्मा पर कृपा कर मोक्ष प्रदान कर जीवात्मा को नित्य कैंकर्य में लगाते हैं।
  • सभी अन्य उपायों का त्याग करने से किसी के सच्चे स्वभाव को कोई क्षती नहीं पहूंचेगी यह नही जानना बाधा हैं क्योंकि इसे भगवान पर पूर्ण विश्वास के आधार पर और उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करके किया जाता है। क्योंकि स्वयं भगवान भगवद्गीता में कहते हैं “सर्व धर्मान परित्यज्य” (सभी धर्मों का त्याग कर दो) कर्म, ज्ञान, भक्ति योग उपाय रूप में त्याग करने में कोई गलत नहीं है क्योंकि हम भगवान के शरण होने के लिये उन्हीं के हीं नियमों का पालन कर रहे हैं।
  • पवित्र श्रद्धा से भगवान का मंगलाशासन करना ही जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही है, यह नही जानना बाधा है। यद्यपि भगवान से यह कहना कि “आपका सब मंगल हो” सही नहीं दिखता है (वह पहले से ही सबसे श्रेष्ठ और पवित्र है)। परन्तु वह जो भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन है वह भगवान की सुन्दरता, कोमल स्वभाव आदि को देखेगा और यह विचार करेगा कि ऐसे कृपालु भगवान का कुछ अशुभ न हो जाये और इसलिये मंगलाशासन प्रगट करता है। उपदेश रत्नमाला में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं –“पोंगुम परिवले विल्लिपुत्तुर पट्टरपिरान पेट्रान पेरियाल्वार एन्नुम पेयर” – पट्टरपिरान की भगवान के प्रति अपरिहार्य भक्ति के कारण उन्हें पेरीय आल्वर (बड़े आल्वार) नाम प्राप्त हुआ। हालाकि उन्होंने स्वयं श्रीमन्नारायण कि प्रधानता मदुरै राजा के दरबार में स्थापित कि परंतु जब उन्होंने बाहर आकर भगवान को गरुड वाहन में उन्हें आशिर्वाद प्रदान करते देखा तो वे गाने लगे “पल्लांडु पल्लांडु .. उन सेवडी सेव्वी तिरुक्काप्पू” (जीते रहो जीते रहो … आपके सुन्दर चरण कमल सुरक्षीत रहे)। यह हमारे स्वभाव के विपरीत नहीं है – अपितु यह तो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के सर्वथा योग्य है। इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है। इसे एक आचार्य के मार्गदर्शक में पढ़ा जा सकता हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/06/virodhi-pariharangal-28.html

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