Monthly Archives: July 2016

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १४

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १३

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श्रीरामानुज स्वामीजी अपनी कालक्षेप गोष्ठी में

४५) श्रवण विरोधी – सुनने में बाधाएं (भगवान और भागवतों कि स्तुतियाँ)

श्रवण का अर्थ सुनना है। इस अंश में क्या सुनना और क्या न सुनना इस विषय को समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: भागवत में श्रीप्रह्लादजी भक्ति की ९ पद्धतियों को समझाते है – श्रवणम् कीर्तनम् विष्णो: स्मरणम् पाद सेवनम् अर्चनम् वंदनम् दास्यम् सख्यम् आत्म निवेदनम् – सुनना, गाना, भगवान श्रीमन्नारायण का स्मरण करना, उनके चरण कमलों कि सेवा करना, उनकी आराधना करना, उनकी स्तुति करना, उनकी सेवा करना, उनके दास बनकर रहना और अपने आप को उनको समर्पित करना, यह भगवान के प्रति सेवा भक्ति करने कि नौ प्रकार की पद्धति है। इनमें श्रवण को पहिले दर्शाया गया है क्योंकि यह मुख्य पहलू है। इसके बारे में हम अभी देखेंगे।

  • जहाँ भगवद विषय पर चर्चा हो रही हो ऐसे स्थान पर व्यर्थ चर्चा करने पर विरोध करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। हालांकि कोई पूर्णत: भगवद विषय (भगवान से संबंधित विषय) में लिप्त हो तो वह जो भी कहते है वह स्वतः ही भगवद विषय बन जाता है। ज्ञान सारम के ४०वें पाशुर में यह कहा गया है कि “अंबर सोल्लुम अविडु सुरुदियाम” – भगवान के प्रिय भक्त, जो भगवान को जानते है, के द्वारा की गई कोई संयोगिक बात भी प्रमाण बन जाती है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामिजी के उत्तर दिनचर्या में एरुम्बिअप्पा स्वामीजी उनसे प्रार्थना करते है कि “प्रिय स्वामीजी! कृपया मुझे आशिर्वाद प्रदान करे कि मेरे सारे विचार आप पर हीं केन्द्रीत हो, सारे शब्द आप हीं कि स्तुति करे, मेरे शरीर के सारे अंग आपकी ही सेवा करे, यहाँ जो भी मैंने न कहा हो – वह सभी आपके आनन्द के लिये हो” – यह सच्चे श्रीवैष्णवों कि परिस्थिती है – वह हमेशा भगवान और आचार्य का आनन्द देखते रहते है – इसलिये वह जो भी कुछ करते है वह अपने आप भगवान और आचार्य के लिये आनन्ददायक हो जाता है।
  • सुनते समय विषय पर पूर्णत: ध्यान नहीं रखना बाधा है। मन पूर्णत: विषय पर केन्द्रीत रहना चाहिये। उसे अनजाने से नहीं सुनना चाहिये और उसके पूर्ण महत्त्व को जाने बिना यह कहना कि “मैंने भी भगवद विषय सुना है” यह बाधा है।
  • भगवद विषय को सुनते समय ध्यान अन्य विषय पर केन्द्रीत करना बड़ी बाधा है।
  • जब कोई विशेष विषय को सुन रहे हो जिसके बारे में हमे पता न हो तो हमें पूरे ध्यान से उसे सुनना चाहिये और समझने कि कोशिश करनी चाहिये। केवल सिर हिलाकर यह कहना कि “हां यह सत्य है” आदि और ऐसे रहना जैसे कि हमें सब पता हो ऐसा करना बाधा है।
  • जब कोई शिक्षीत विद्वान कुछ तत्व समझा रहे हो तो उन्हें मध्य में रोककर अपने ज्ञान कि बढाई नहीं करनी चाहिये। हमें उनमें कोई दोष भी नहीं देखना चाहिये।
  • अगर कोई भगवद विषय का अर्थ बड़ी सुन्दरता से बता रहा हो, तो उनके प्रति ईर्ष्या भावना रखना बाधा है। अगर कोई भगवद विषय में जगमगा रहा हो, तो हमें ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आर्ति प्रबन्ध में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ५५वें पाशुर में स्वयं के बारे में कहते “पिरर मिनुक्कम पोरामै ईल्लाप पेरुमैयुम पेट्रोमे”” – मैं अन्य को जगमगाते देख कभी भी ईर्ष्या भावना नहीं रखता हूँ। यह बहुत बड़ा महान गुण है और प्राप्त करने के लिये भी कठिन है – परन्तु श्रीवैष्णवों से इसी की अपेक्षा रहती है – अन्य श्रीवैष्णवों कि स्तुति होते देख हमें स्वयं भी आनंदित होना चाहिये।
  • भगवद विषय के अच्छे शब्दों को सुन उनकी स्तुति न करना बाधा है। नम्र होना बहुत अच्छी बात है और जब अच्छे शब्द सुनते है और वे अच्छे काम करते है, तो हमें पूर्ण हृदय के साथ उनकी प्रशंसा करनी चाहिये।
  • सह विद्यार्थी, जो हमसे अधिक समझदार है, उनसे ईर्ष्या भावना रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हर श्रीवैष्णवों को दूसरे श्रीवैष्णवों को जगमगाते देख आनंदित होना चाहिये और जब वे दुखी हो तो शोक प्रकट करना चाहिये। यह समझदार लोगों का सच्चा गुण है। यह कहा जाता है कि अन्य श्रीवैष्णवों का जब भी अच्छा होता है तो हमें भी आनंदित होना चाहिये जैसे हमारे बच्चो का ही कुछ अच्छा होता है तब हम हर्षित होते है (सभी जन अपने बच्चों कि प्रगति और खुशी देख हर्षीत होते ही है)।
  • हमारा हृदय भगवान के दिव्य गुण जैसे सौलभ्य (आसानी से प्राप्त होना), सौशिल्य (सभी से हिल मिल जाना) आदि को सुनकर पिघलना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। यह जानकर कि भगवान श्रीमन्नारायण कृष्ण रूप में असहाय परिस्थिति में है, श्रीशठकोप स्वामीजी अपना चेतन ६ महिने के लिये खो देते है, हम इस घटना को स्मरण कर सकते है।
  • भगवद विषय (भगवान से जुड़ा हुवा विषय) हृदय से पूर्ण उपासना सहित होना चाहिये। उन्हें अनुराग रहित ऐसे ही सुनना बाधा है।
  • दिव्य मनोभाव में कोई शारिरीक बदलाव न होना बाधा है। “आह्लादसीत नेत्राम्बु: पुलाक्लकृत गात्रवान” – उमंग के साथ जब हम भगवान का नाम सुनते है खुशी के आँसु और शारीरिक बदलाव (रोमांच, शरीर के बाल खड़े होना आदि) न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह सभी भगवान, गरुड पुराण में स्वयं समझा चुके है, जब वे अपने भक्तों के ८ गुण समझाते है – एक गुण है भगवान के बारे में सुनते ही दिव्य उमंग होना। वह कहते है “मेरे भक्तों में यह ८ गुण है – १) भगवान के भक्तों में बिना शर्त के प्रेम, २) दूसरे को भगवान के प्रति पुजा करते देख आनन्द लेना, ३) स्वयं भगवान की पुजा करना, ४) अहंकार छोड़ करके रहना, ५) भगवान के प्रति सुनने में लगाव रखना, ६) जब भी भगवान के विषय में सुनते/ सोचते/ कहते है, शारीरिक बदलाव (जैसे रोमांच आदि) होना, ७) हमेशा भगवान के बारे में सोचना, ८) भगवान कि सेवा के बदले सांसारिक लाभ नहीं मांगना। ऐसे भक्त अगर म्लेच्छ भी हो, तब भी वे मेरे समान ही ब्राह्मणों, योगियों, कैंकर्य करने वालों और यहाँ तक की सन्यासियों और विद्वानों द्वारा पूजनीय है। ऐसे विद्वानों से ज्ञान देने और लेने में वे योग्य है।
  • एक बार सत सम्प्रदाय के तत्वों को सुनने के पश्चात उसका पूर्णत: पालन करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। श्रीगोदम्बाजी, नाच्चियार तिरुमोली में कहते है “मेयम्मैप्परु वारत्तै विट्टुचित्तर केट्टिरुप्पर” – मेरे पिताजी श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी ने चरम श्लोक को सुनकर उसके अनुसार ही जीवन व्यतीत किया। यह आस्तिक लक्षण (शास्त्र में विश्वास करने वाला) है। इस तत्व का पालन नहीं करना मतलब सच्चे स्वभाव का नाश करना है।
  • सदाचार्य से नहीं सुनना बाधा है। सदाचार्य का अर्थ वह जो अपने बड़ो (अपने आचार्य) से सही तरह सुने, उनके अर्थों पर विचार करें और वही दूसरों को समझाये। वह जो अपने पूर्वाचार्यों के आचरण से सिखे। ऐसे ही महान व्यक्ति को सदाचार्य कहते है। उपदेश रत्नमाला के ६१वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस तरह समझाते है “ज्ञानं अनुष्ठानं इवै नंरागवे उदैयनान गुरु” – आचार्य, जो ज्ञान में सही प्रकार से स्थित हो और तत्वों को सही तरिके से पालन करते है।
  • सदाचार्य से अनमोल ज्ञान को प्राप्त कर दूसरे अज्ञानी जनों को ज्ञान देना बाधा है। उसमें सही ज्ञान को पाने कि तीव्र इच्छा होनी चाहिये और ऐसे ज्ञान में विश्वास होना चाहिये।
  • अवैष्णवों से भगवद विषय सुनना विरोधी है। अवैष्णव अर्थात जिनका देवतान्तर सम्बन्ध हो – अन्य देवों से जैसे रुद्र, दुर्गा, इन्द्र, ब्रम्ह, आदि से सम्बन्ध। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपरकाल स्वामीजी, पेरिय तिरुमौली में यह समझाते है कि हमें उन लोगों से कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये, जो देवताओं से जुड़े हुए है। पेरिय तिरुमौली – मट्रुमोर धेय्वं उलधेंरु इरुप्पारोडु उट्रिलेन – मैं उनसे नहीं जुडुंगा जो अन्य देवताओं को स्वीकार करते है। ऐसे जन अगर वें भगवद विषय प्रस्तुत भी करें तो भी अपने प्रिय देवता के प्रति थोड़ा प्रेम रहेगा – ऐसों से बचना ही चाहिये। चाहे वो बाह्य हो (वैदिक क्रम से बाहर) या कुदृष्टि (वो जो वैदिक रीति को अपनाते है, परन्तु उसके अर्थ को गलत रूप देते है) – वो जो भी समझाते है, वो सत सम्प्रदाय के विपरीत रहेगा – इसलिये हमें ऐसे जनों से बहुत सावधान रहना चाहिये और उन्हे नहीं सुनना चाहिये।
  • सत सम्प्रदाय का विषय छोड़ हमें और कुछ भी नहीं सुनना चाहिये। हमें ऐसे विद्वानों से सुनना चाहिये जो सत सम्प्रदाय में ही पूर्णत: शिक्षीत हो। अनुवादक टिप्पणी: अगर हम उन विद्वानों से सुनते है जो इन तत्वों में शिक्षीत न हो तो भ्रम होना पूर्णत: सम्भव है और सहीं तत्वों का गलत प्रतिनिधित्व या प्रकाशन होगा। अत: ऐसे लोगों से बच कर ही रहना चाहिये। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमलै के पाशुर में कहते है “कलै अरक्कट्र मांदर काण्बरो केटपरो ताम” – क्या शिक्षीत जन अवैदिक विषय को सुनेंगे। श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै अपने व्याख्यान में एक घटना को दर्शाते है जहाँ श्रीकुरेश स्वामीजी अपनी युवा अवस्था में एक बौद्ध ग्रन्थ के विषय में सुनते है और तिरुमाली में देर से आते है। श्रीकुरेश स्वामीजी के पिताजी कुरताल्वार स्वामीजी ऐसे बर्ताव से बहुत दुखी होते और श्रीकुरेश स्वामीजी को पवित्र करने हेतु श्रीपादतीर्थ देकर ही तिरुमाली में अन्दर स्वीकार करते है।
  • भगवान और भागवतों कि स्तुतियाँ सुनकर हमें आनंदित होना चाहिये। उसी तरह जब कोई भगवान और भागवतों का अपमान करता है (जैसे शिशुपाल ने किया) तो हमें उसी क्षण अपने कान बन्द कर उस स्थान को छोड़ देना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • चरमार्थम जैसे तिरुमन्त्र, द्वयं और चरम श्लोक को अच्छी तरह समझकर जीवन में उतारना चाहिये। चरमार्थ का अर्थ चरम श्लोक भी है। अनुवादक टिप्पणी: चरमार्थ का अर्थ है आचार्य को उपाय और उपेय रूप में स्वीकार करना। श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी ने ज्ञान सारं और प्रमेय सारं प्रबन्ध में यह समझाया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र को यह कहकर समाप्त करते है कि हमें सर्वोच्च स्थान पर ले जाने के लिये आचार्य कृपा ही सर्वोत्तम है। श्रीविलांचोलै पिल्लै स्वामीजी अपने सप्त कथा में ७ पाशुरों में यही तत्व समझाते है। उपदेश रत्नमाला के अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे एक सुन्दर रूप से समझाते है।
  • भगवद विषय के बारे में चर्चा करते समय किसी को भी अन्य देवता जैसे शिवजी, ब्रम्हाजी, इन्द्र आदि कि चर्चा नहीं करनी चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-14.html

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तत्व त्रय- अचित- माया क्या है?

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

तत्व त्रय

इस लेख को चित्रों के माध्यम से इस लिंक पर देखा जा सकता है- https://docs.google.com/presentation/d/188gzTl_qZKtyIxiwKguIjBSkxH-9t9zUw_U98YJGbkk/present#slide=id.p

ज्ञानपूर्ण व्यक्तियों के शिक्षण के द्वारा अचित तत्व को समझना

भूमिका

  • माया ज्ञानहीन है और परिवर्तन का निवास है।
  • क्योंकि माया ज्ञानहीन है, वह पुर्णतः दूसरों के भोग के लिए सृष्टि में है।
  • चित्त,जो अपरिवर्तनीय है, से भिन्न अचित परिवर्तन से गुज़रती है
  • अचित तीन प्रकार की है-
    • शुद्ध सत्व – सम्पूर्ण सत्वता/ शुद्धता, जो रजस और तमो गुणों से हीन है|
    • मिश्र सत्व – सत्व (साधुता), रजस (राग) और तमस (अज्ञान), तीन गुणों का मिश्रणचित।
    • सत्व शून्य (काल) – समय/ काल का सिद्धांत, जो तीनों गुणों (सत्व, राग, तमस) से हीन है|

शुद्ध सत्व (शुद्ध साधुता)

1.

परमपद – श्रीमन्नारायण भगवान का आध्यात्मिक निवास, जो दिव्य पदार्थ से निर्मित मंडपों, बागीचों, आदि से सुसज्जित है

  • यह शुद्ध सत्वता है, जो रजस और तमो गुणों से हीन है। यह मुख्यतः परमपद में पाए जाने वाली सभी माया/ वस्तुयें हैं।
  • स्वरुप से यह
    • नित्य/ अनादी है
    • ज्ञान और आनंद का स्त्रोत है
    • भगवान की दिव्य अभिलाषा को प्रत्यक्ष करते विमानों/ मीनारों, मंडपों आदि, जो कर्म में बंधे जीवात्मा द्वारा निर्मित नहीं है।
    • असीमित अद्वितीय चमकदार रूप में
    • जिसे नित्य, मुक्त और स्वयं भगवान भी पूर्णतः समझ नहीं सकते। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस पर एक प्रश्न करते हैं और फिर स्वयं उसका उत्तर भी देते हैं – यदि भगवान स्वयं इसे पूर्णतः समझ नहीं सकते, तो क्या यह उनके सर्वज्ञत्वं (सर्व ज्ञाता गुण) को ग़लत साबित नहीं करेगा? फिर वह सुंदरता से समझाते हैं कि सर्व ज्ञाता होना अर्थात सभी के सच्चे स्वरुप जो जानना – इसलिए, भगवान जानते हैं कि शुद्ध सत्व असीमित है, जो उसका सच्चा स्वरुप है और यही उनका सच्चा सर्वज्ञत्वं है। 
    • अत्यधिक अद्भुत है
  • कुछ का मत है कि, यह दीप्तमान है और कुछ अन्य का मत है कि यह दीप्तमान नहीं है। इसके विषय में दो अभिमत प्रचलित है।
  • परंतु अधिक महत्व इस मत को दिया जाता है कि वह दीप्तमान है। ऐसी परिस्थिति में, नित्य, मुक्त और भगवान के समक्ष वह प्रत्यक्ष है। परंतु संसारी उसे समझ पाने में असमर्थ है।
  • यह जीवात्मा के स्वरुप से भिन्न है क्योंकि
    •  इसे स्वयं की अनुभूति नहीं है
    •  यह विभिन्न रूपों में परिवर्तित हो जाता है
  • यह ज्ञान से भिन्न है क्योंकि
    • यह दूसरों की सहायता के बिना ही विभिन्न रूपों में प्रत्यक्ष है (ज्ञान का कोई स्थूल स्वरुप नहीं है)
    • ज्ञान, जो तन्मात्रों (ज्ञानेन्द्रियाँ – आवाज, स्पर्श, रूप, स्वाद और गंध) को थामता है, उसके विपरीत यह सूक्ष्म तत्वों का समावेश है।

मिश्र सत्व (अशुद्ध साधुता)

  • स्वरूप से, यह
    • सत्व, रजस और तमस का मिश्रण है
    • एक आवरण है, जो सम्पूर्ण ज्ञान और आनंद प्राप्त करने से जीवात्मा को रोकता है
    • जीवात्माओं के लिए विकृत ज्ञान का स्त्रोत
    • नित्य/ अनादी
    • इस लीला-विभूति में ईश्वर के क्रीड़ा के लिए है
    • समय (सृष्टि और संहार) और परिस्थिति (अव्यक्त और व्यक्त) के अनुसार कभी एक दूसरे के समान और कभी एक दूसरे से भिन्न है
    • इसे निम्न रूप में जाना जाता है
      • प्रकृति – क्योंकि वह सभी परिवर्तनों का स्त्रोत है, इसे निम्न रूप में जाना जाता है
      • अविद्या – क्योंकि वह सच्चे ज्ञान से भिन्न है
    • माया – क्योंकि इसका परिणाम अद्भुत और भिन्नता से परिपूर्ण है
    • तिरुवाय्मौली 10.7.10 में श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा यह बताया गया है कि माया के 24 तत्व है-
      • पञ्च तन्मात्र – 5 अनुभूति के स्त्रोत – शब्द (आवाज), स्पर्श, रूप, रस (स्वाद), गंध
      • पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ – 5 ज्ञानेन्द्रियाँ- श्रोत्र (कान), त्वक (त्वचा), चक्षु (नेत्र), जिह्वा, ग्राह्णा (नासिका)
      • पञ्च कर्मेन्द्रियाँ – 5 कर्मेन्द्रियाँ – वाक् (मुख), पाणी (हस्त), पाद (पैर), पायु (मल उत्सर्जन अंग), उपस्थ (संतति के अंग)
      • पञ्च भूत – 5 महान तत्व – आकाश (नभ), वायु (हवा), अग्नि, जल, पृथ्वी
      • मानस – मस्तिष्क
      • अहंकार – अहं
      • महान – पदार्थ का प्रत्यक्ष स्वरुप
      • मूल प्रकृति – पदार्थ का अव्यक्त स्वरुप
    • इनमें से, मूल प्रकृति प्राथमिक पदार्थ है जो गुणों के मिश्रण से स्वयं को विभिन्न अवस्था में प्रत्यक्ष करती है
    • गुणों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है – सत्व, रजस (राग) और तमस (अज्ञान)
    • सत्व आनंद और प्रसन्नता का स्त्रोत है
    • रजस/ राग, लौकिक कामनाओं की आसक्ति और तृष्णा का स्त्रोत है
    • तमस विकृत ज्ञान, कृतघ्नता, आलस्य और नींद का स्त्रोत है
    • जब तीनों गुण समानता से विभाजित होते है, उसका परिणाम पदार्थ की अव्यक्त अवस्था होती है।
    • जब वे असमान रूप से विभाजित होते है, तब पदार्थ की प्रत्यक्ष अवस्था प्रकट होती है।
    • महान व्यक्त पदार्थ की प्रथम अवस्था है।
    • महान से ही अहंकार उत्पन्न होता है।
    • तदन्तर महान और अहंकार से ही सभी अन्य तत्व (जैसे तन्मात्र, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, आदि) व्यक्त होते है।
    • पञ्च तन्मात्र (अनूभुती के विषयवस्तु) पुच भूतों अर्थात सकल तत्वों की सूक्ष्म अवस्था है।
    • भगवान इन विभिन्न तत्वों के मिश्रण से व्यक्त ब्रह्माण्ड का निर्माण करते है।
    • भगवान ब्रह्माण्ड और उसके कारक का निर्माण करते है। अर्थात, अपने संकल्पमात्र से अनायास ही भगवान अव्यक्त मूल प्रकृति को व्यक्त स्थिति में परिवर्तित करते है।
    • ब्रह्माण्ड में रहने वाले सभी जीवों का निर्माण ब्रह्मा, प्रजापति आदि के माध्यम से भगवान द्वारा किया गया है (उनमें अन्तर्यामी होकर)
    • ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है।

2.

  • उनका निर्माण एक ही समय पर और अनायास ही भगवान के संकल्प मात्र से हुआ है।
  • प्रत्येक ब्रह्माण्ड की 14 परतें है। श्री वरवरमुनि स्वामीजी विभिन्न प्रमाणों के आधार पर अत्यंत विस्तार से ब्रह्माण्ड की संरचना को समझाते है।

3.

लीला विभूति की संरचना (संसार)

  • 7 नीचे की परतें
    • ऊपर से नीचे तक जाते हुए, क्रमश: उनका नाम है – अतल, वितल, नितल, कपस्थिमत (तलातल), महातल, सुतल और पाताल
    • ये राक्षसों, सांपो, पक्षियों, आदि के रहने का स्थान है
    • यहाँ बहुत से सुंदर महल, मकान आदि है जो स्वर्ग लोक से भी अधिक आनंददाई है
  • 7 ऊपर की परतें
    • भू लोक – जहाँ मानव, पशु, पक्षी आदि निवास करते है। यह 7 बड़े द्वीपों में विभाजित है। हम जम्भूद्वीप में रहते है।
    • भूवर लोक – जहाँ गंधर्व (आकाशीय गायक) निवास करते है
    • स्वर्ग लोक – जहाँ इंद्र (वह पद जो भूलोक, भूवर लोक और स्वर्ग लोक की गतिविधियों का प्रबंध करता है) और उसके सहयोगी निवास करते है
    • महर लोक – जहां निवृत्त इंद्र या आने वाले इंद्र निवास करते है
    • जनर लोक – जहाँ अनेकों महान ऋषि जैसे ब्रह्मा के चार पुत्र – सनक, सनकाधिक, सनातन और सनंदन आदि निवास करते है
    • तप लोक – जहाँ प्रजापति (मौलिक प्रजनक) निवास करते है
    • सत्य लोक – जहाँ ब्रहमा, विष्णु और शिव, अपने भक्तों के साथ निवास करते है
  • प्रत्येक ब्रह्माण्ड (14 परतों से निर्मित) सुरक्षा की 7 परतों से घिरा है – जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महान और अंततः मूल प्रकृति।
  • ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म और सकल तत्वों के ज्ञान को प्राप्त करती है। कर्मेन्द्रियाँ बहुत से शारीरिक कार्य करने में सहायता करती है। मस्तिष्क सभी के लिए समान है और सभी पक्षों में सहायक है।

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  • पंचीकरणं वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भगवान विभिन्न तत्वों का मिश्रण करते हैं और परिणामस्वरूप हम इस ब्रह्माण्ड का व्यक्त स्वरुप देख रहे हैं।

सत्व शून्य – समय

5.

  • स्वरूप से, समय
    • अचित वस्तु के परिवर्तन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है (अव्यक्त स्वरुप से व्यक्त/प्रत्यक्ष स्वरुप में)।
    • के विभिन्न मापदण्डों में प्रत्यक्ष है (जैसे दिन, सप्ताह, महीना आदि)।
    • अनादी है – अर्थात उसका कोई आदि और कोई अंत नहीं है
    • ईश्वर के क्रीड़ा के लिए सहायक है
    • स्वयं भगवान के स्वरुप का अंश है
  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, नुदुविल तिरुवेधिप पिल्लै भट्टर द्वारा समझाए गए समय के वर्गीकरण को समझाते हैं।
    • निमेषम (क्षण, पलक झपकने का समय – एक सेकंड के बराबर) समय की सबसे सूक्ष्म इकाई है
    • 15 निमेषम = 1 काष्ट
    • 30 काष्ट = 1 कलई
    • 30 कलई = 1 मुहूर्त
    • 30 मुहूर्त = 1 दिवस (1 दिन)
    • 30 दिवस = 2 पक्ष (पंद्रह दिन) = 1 मास (महीना)
    • 2 मास = 1 ऋतू
    • 3 ऋतू = 1 अयन (6 मास – उत्तरायण और 6 मास – दक्षिणायण)
    • 2 अयनं = 1 संवत्सर (वर्ष)
    • 360 मानव संवत्सर = 1 देव संवत्सर
  • अन्य दो अचित तत्वों (शुद्ध सत्व और मिश्र सत्व) भोगने योग्य हैं, आनंद के निवास और आनंद के साधन हैं।
  • शुद्ध सत्व (दिव्य पदार्थ) ऊपर की ओर असीमित है और नीचे की ओर सीमित है (यह परमपद – परलोक में पुर्णतः स्थित है)
  • मिश्र सत्व (पदार्थ) नीचे की ओर असीमित है और ऊपर की ओर सीमित है (यह लौकिक संसार में पूर्ण रूप से स्थित है)
  • काल तत्व सर्व व्याप्त है (परमपद में भी और लौकिक संसार में भी)।
  • ऐसा कहा जाता है कि परमपद में समय नित्य/ अनादी है और लौकिक संसार में अनित्य है। श्री वरवरमुनि स्वामीजी, श्री पेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान द्वारा, अपने तत्व त्रय विवरण (एक ग्रंथ, जो अब उपलब्ध नहीं है) में समझाते हैं – “परमपद और संसार दोनों में ही समय का स्वरुप एक समान है”। इसलिए, उस व्याख्यान को ही परम अधिकारी माना जाता है। परंतु क्योंकि कुछ आचार्य परमपद और संसार में समय के स्वरुप को भिन्न बताते हैं – तब यह समझना चाहिए कि संसार के परिवर्तनशील स्वरुप के कारण समय को यहाँ अनित्य माना गया है।
  • कुछ का कहना है कि समय का कोई अस्तित्व नहीं है। परंतु क्योंकि यह शास्त्र और तर्क के विपरीत है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सारांश

इस प्रकार हमने अचित (पदार्थ) तत्व के विषय में थोडी चर्चा की, जिसका स्वरुप 3 प्रकार का है (शुद्ध सत्व- परमपद के दिव्य पदार्थ, मिश्र सत्व – संसार के पदार्थ और सत्व शून्य – समय)। जैसा की पहले भी कहा गया है, यह विषय वस्तु अत्यंत जटिल है और इस लेख का उद्देश्य इस विषय को कालक्षेप द्वारा आचार्य के सानिध्य में समझने की रूचि निर्मित करना है।

यद्यपि यहाँ तत्व त्रय नामक दिव्य ग्रंथ से अचित प्रकरण का भली प्रकार से विवेचन किया गया है, यह अनुशंसा की गयी है कि इस ग्रंथ के कालक्षेप को आचार्य के सानिध्य में श्रवण करने से सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होती है।

रहस्य तत्वत्रयतय विवृत्या लोकरक्षिणे।
वाक्बोशा कल्परचना प्रकल्पायास्तु मंगलम।।

श्रीमते रम्यजामातृ मुनींद्राय महात्मने।
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री नित्य मंगलं।।

मंगलाशासन परैर मदाचार्य पुरोगमै।
सर्वैश्च पूर्वैर आचार्यै सत्कृतायास्तु मंगलं।।

अगले अंक में, हम ईश्वर तत्व के विषय में विस्तार से समझेंगे।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – तत्व त्रय

अंग्रेजी संस्करण – http://ponnadi.blogspot.in/2013/03/thathva-thrayam-achith-what-is-matter.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

तत्व त्रय- चित- मैं कौन हूँ?

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

तत्व त्रय

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बुद्धिमान व्यक्ति की शिक्षा से चित (आत्मा) तत्व को समझना

भूमिका

आत्मा, जड़ पदार्थ/ माया और ईश्वर के सच्चे स्वरुप को जानने की जिज्ञासा प्रत्येक में है। बहुत सी संस्कृतियों में, बुद्धिजीवियों के मध्य इन तीन तत्वों को समझने की जिज्ञासा आम पहलू के रूप में देखा जाता है। सनातन धर्म, जो वेद, वेदांत, स्मृति, पुराण और इतिहास पर आधारित है, वह अत्यंत सुंदरता से जीवात्मा, प्रकृति (माया) और ईश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान को प्रकाशित करता है। श्रीमन्नारायण भगवान (गीताचार्य के रूप में), श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने विभिन्न ग्रंथों में अपने दिव्य वचनों द्वारा इन तीन तत्वों के स्वरुप को समझाया है।

मुख्यतः श्रीपिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित तत्व त्रय और उस ग्रंथ पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का उत्कृष्ट व्याख्यान इन तीन तत्वों को सु-स्पष्टता से वर्णन करता है। आत्मा/ स्वयं के सच्चे स्वरुप को जाने बिना, हमारी आध्यात्मिक प्रगति सीमित होगी। आत्मा के विषय में उचित ज्ञान होने के पश्चाद ही, तदनुरूप कार्य करने से हमें आध्यात्मिक जीवन में प्रगति प्राप्त होगी। सर्वप्रथम हम आत्मा के वर्णन से प्रारंभ करेंगे।

1.

भगवान द्वारा अर्जुन को उपदेश 

2.

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

आत्मा का सच्चा स्वरुप

आत्मा का स्वरुप, देह, इन्द्रियाँ, प्राण वायु, मन, मानस, और बुद्धि से भिन्न है।

  • स्वभाव से आत्मा –
    • आभायमान/ प्रकाशमान है – वह जिसे स्वयं के विद्यमान और स्व-दीप्तिमान होने की अनुभूति है
    • प्रसन्न – स्वाभाविक आनंदपूर्ण
    • नित्य/ अनादी – जिसकी उत्पत्ति या संहार नहीं किया जा सकता
    • अव्यक्त – बाहरी चक्षुओं के द्वारा नहीं देखा जा सकता
    • सूक्ष्म – अत्यंत छोटा स्वरुप
    • अचिंतनीय/ अगम्य – हमारे बुद्धि/ विवेक के पार
    • अविभाज्य – जिसके कोई अंग प्रत्यंग नहीं है
    • अपरिवर्तनीय – जिसमें कोई परिवर्तन संभव नहीं
    • जिसमे ज्ञान का वास है
    • भगवान द्वारा नियंत्रित है
    • भगवान के द्वारा पोषित/ संरक्षित है
    • भगवान का दास है

आत्मा और देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, मानस, बुद्धि आदि के मध्य भिन्नतायें-

  • देह, इन्द्रियाँ, मन, आदि को “मेरा शरीर”, “मेरी इन्द्रियाँ”, “मेरा मानस” आदि भिन्न रूप से कहा जाता है, यहाँ “मेरा” शब्द आत्मा को दर्शाता है।
  • आत्मा के संदर्भ में “मैं” शब्द का और देह, इन्द्रियाँ, मन, आदि के संदर्भ में “मेरा” शब्द का प्रयोग किया जाता है।
  • जहाँ आत्मा की अनुभूति सदैव की जाती है, वहाँ देह, इन्द्रियाँ, प्राण, आदि की अनुभूति कभी की जाती है और कभी नहीं। उदाहरण के लिए, जब हम सो रहे हैं, आत्मा तब भी जागृत अवस्था में रहती है, परंतु उस स्थिति में देह की अनुभूति नहीं रहती। और जब हम जाग उठते हैं तब चेतना लौट आती है, तब आत्मा के निरंतर ज्ञान के द्वारा हमें तुरंत स्वयं की अनुभूति होती है।
  • व्यक्तिगत परिस्थिति में, आत्मा एक है, परंतु देह, इन्द्रियाँ, मानस, आदि सभी बहुत से अव्यवों का समागम है।

उपरोक्त के साथ, हम आत्मा और देह आदी के भेद को सुगमता से समझ सकते है। यद्यपि फिर भी इन तार्किक अर्थों को, जो सभी को सरल रूप में समझ आ सकता है, उसमें कोई संदेह होता है, तब शास्त्रों के मत को स्वीकार करना चाहिए कि आत्मा और देह एक दूसरे से भिन्न है। क्योंकि शास्त्र अनादी है, किसी के द्वारा बनाये नहीं गया है और दोषहीन है, इसलिए शास्त्रों में निर्देशित सिद्धांत, पूर्ण रूप से स्वीकार करने योग्य है।

आत्मा और देह में भिन्नता – व्यवहारिक उदहारण

3.

उसी प्रकार, “मैं”, जो आत्मा है, शरीर उसी का है। आत्मा और शरीर एक दूसरे से भिन्न हैं परंतु वे परस्पर संबंधित हैं। जब हम स्पष्टता से यह समझते हैं कि हम आत्मा हैं, हम शरीर के लिए कर्म करना त्याग देते हैं।

शरीर का परिवर्तनशील स्वरुप और आत्मा का पुनर्जन्म

  • भगवान भगवत गीता के द्वितीय अध्याय में आत्मा और शरीर के स्वरुप के बारे में अत्यंत विस्तार से समझाते हैं।
  • 13वे श्लोक में भगवान कहते हैं “जिस प्रकार शरीर में समाहित आत्मा, शरीर के विभिन्न पड़ावों जैसे बचपन, यौवन, आदि से गुजरती है, उसी प्रकार मृत्यु के समय आत्मा दूसरा शरीर धारण करती है। जिसने आत्मा के स्वरुप को समझ लेता है, वह इस परिवर्तन से विचलित नहीं होता”।
  • 22वे श्लोक में भगवान कहते हैं “जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रों के फट जाने पर नए वस्त्र धारण करते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी मृत्यु के पश्चाद नया शरीर धारण कर लेती है “।

4.

आत्मा देह के विभिन्न पडावों से गुजरती हुई और एक शरीर के अंत के पश्चाद दूसरे शरीर को धारण करती हुई।

ज्ञाता, कर्ता और भोग्यता

  • आत्मा को ज्ञाता कहा जाता है, क्योंकि वह ज्ञान का वास है।
  • आत्मा मात्र ज्ञान ही नहीं है, अपितु ज्ञानी भी है, क्योंकि यही शास्त्रों में कहा गया है।
  • ज्ञान स्वतः ही कार्य और कार्य के परिणामों के भोग की ओर अग्रसर करता है, क्योंकि कार्य और उसके परिणामों को भोग करना, ज्ञान के दो भिन्न रूप हैं।
  • आत्मा, इस संसार में भौतिक प्रकृति के तीन भिन्न प्रकारों – सत्व, रजस्, तमस् अर्थात अच्छाई, लालसा और आवेग, अज्ञान से प्रभावित होती है और उसी के अनुसार कार्य करती है।
  • भगवान जीवात्माओं को स्वयं ही मार्ग निर्धारित करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।
  • परंतु क्योंकि भगवान ही परम अधिकारी है, उनकी स्वीकृति के बिना कुछ नहीं होता।
  • प्रत्येक कार्य के लिए, आत्मा को कार्य निष्पादन का मार्ग चयन करने का विकल्प प्रदान किया गया है। भगवान पहले साक्षी रहते हैं, और फिर उस विशिष्ट विकल्प को प्रदान करते हैं।
  • तदन्तर, उस वरण किये हुए विकल्प के आधार पर (चाहे वह कार्य शास्त्र के अनुसार हो या शास्त्रों के विरुद्ध), भगवान उस कार्य को करने में उस जीवात्मा की सहायता करते हैं।
  • इस प्रकार, भगवान जीवात्मा द्वारा किये गए कार्य के परम अधिकारी हैं, परंतु वे उसे अपना मार्ग निर्धारित करने देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो कि प्रत्येक जीवात्मा अपने कार्यों के लिए स्वयं उत्तरदायी है।
  • ऐसे विशिष्ट उदाहरण भी है, जहाँ भगवान किसी विशिष्ट कारण से स्वयं जीवात्मा के जन्म और कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण करते हैं।

भगवान द्वारा नियंत्रित, भगवान द्वारा पोषित और उनकी ही शेषभूत (दास)

5.

  • जीवात्मा पूर्ण रूप से भगवान के नियंत्रण में है। अर्थात जीवात्मा के सभी कार्य भगवान द्वारा अनुमोदित है।
  • जिस प्रकार शरीर के सभी कार्य आत्मा द्वारा नियंत्रित होते हैं, उसी प्रकार आत्मा के सभी कार्य अन्तर्यामी परमात्मा भगवान द्वारा नियंत्रित हैं।
  • फिर भी भगवान आत्मा को अपने कर्मों के मार्ग को चुनने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं क्योंकि आत्मा ज्ञान से परिपूर्ण है, जिसका निर्णय लेने में उपयोग किया जा सकता है।
  • अन्यथा शास्त्रों का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा।
  • आत्मा भगवान द्वारा नियंत्रित है, भगवान ही उसके पालक है और आत्मा उनकी शेषभूत है।
  • आत्मा के सीखने, समझने, विभिन्न कार्यों और उनके गुण और अवगुणों के मध्य भेद करने और श्रेष्ठ मार्ग के अनुसरण आदि हेतु ही शास्त्रों का अस्तित्व है।
  • इसलिए, आत्मा के कृत्य के लिए, भगवान निम्न स्थिति में रहते हैं
    • साक्षी – अपने कार्यों के लिए आत्मा द्वारा किये जाने वाले प्रथम प्रयासों में निष्क्रिय रहकर साक्षी बनते हैं
    • स्वीकृती प्रदान करते हैं – आत्मा द्वारा कर्म का मार्ग चुनने के पश्चाद उसके कृत्यों को अनुमति प्रदान करना
    • प्रेरक – एक बार आत्मा द्वारा कार्य के प्रारंभ के पश्चाद, उनके आधार पर आगे के कार्यों के लिए भगवान प्रेरणा प्रदान करते हैं
  • भगवान ही आत्मा के संरक्षक/ पालक हैं। पालक अर्थात, निम्न वर्णित उचित ज्ञान के अभाव में आत्मा स्वयं की अनुभूति को खो देती है:
    • स्वयं और भगवान के मध्य का संबंध
    • भगवान का दिव्य स्वरुप
    • भगवान के दिव्य कल्याण गुण
    • आत्मा नित्य ही भगवान के शेषभूत है, जो सभी का केंद्र है।
  • इसका अर्थ है आत्मा को सदैव भगवान की प्रसन्नता के लिए स्वार्थ को त्याग कर कैंकर्य करना चाहिए। चन्दन, पुष्प आदि सभी केवल भगवान के आनंदानुभव के लिए ही सृष्टि में है।
  • अंततः, आत्मा भगवान से अविभाज्य है।

तीन प्रकार की आत्मा

असंख्य जीवात्माएं हैं। परंतु उनके तीन प्रकार है –

  • बद्ध आत्माएं
    • बद्ध आत्माएं वे हैं, जो अनादी समय से इस संसार चक्र में फसें हुए हैं।
    • वे अज्ञानवश, जन्म मृत्यु चक्र में बंधे हैं, जिससे पापों/ पुण्यों का संचय होता है।
    • वे सभी जीवात्माएं, जिन्हें अपने सच्चे स्वरुप के विषय में ज्ञान नहीं है, वे इस वर्ग में आते हैं।
    • वे आत्मा के सच्चे स्वरुप के ज्ञान को खोकर, स्वयं का बोध देह, इन्द्रियाँ आदि के द्वारा करते हैं।
    • ऐसी बद्ध आत्माएं भी हैं, जो स्वयं को संपूर्णतः स्वतंत्र मानकर कृत्य करते हैं।

6.

  • मुक्त आत्माएं
    • ये वह जीवात्माएं हैं, जो किसी समय संसार (भौतिक जगत) में फंसे हुए थे, परंतु अब परमपद (आध्यात्मिक जगत) में सुशोभित हैं।
    • ये जीवात्माएं स्वप्रयासों (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) द्वारा अथवा भगवान की निर्हेतुक कृपा द्वारा परमपद पहुँचते हैं।
    • संसार से निवृत्त होकर, ये मुक्त जीवात्माएं अर्चिरादी गति द्वारा, विरजा नदी में स्नान करके एक सुंदर दिव्य देह को प्राप्त करते हैं।
    • वहाँ नित्यसुरीगण और अन्य मुक्त जीवात्माएं, श्री वैकुंठ में उनका स्वागत करते हैं और फिर वे सभी भगवान की नित्य सेवा को प्राप्त करते हैं।

Alwars-10

श्रीमन्नारायण भगवान की निर्हेतुक कृपा से ही आलवारों ने परमपद प्रस्थान किया

  • नित्य आत्माएं
    • यह वह जीवात्माएं हैं, जो कभी संसार चक्र के बंधन में नहीं बंधे।
    • वे सदा परमपद में अथवा जहाँ भी भगवान हो, उनकी नित्य सेवा करते हैं।
    • मुख्य नित्यसूरीगण, जो सदा भगवान की सेवा करते हैं-

8.

परमपद में नित्य सुरियों द्वारा सदा सेवित परमपदनाथ।

  • जिस प्रकार अग्नि पर रखे किसी गर्म पात्र में डाला गया जल (जो स्वभाव से शीतल है) पात्र के संपर्क में आने से गर्म हो जाता है उसी प्रकार बद्ध जीवात्माएं अचित जड़ पदार्थों/ माया के संपर्क में आने पर अज्ञान, कर्म आदि द्वारा बाधित हो जाती है।
  • माया/ जड़ पदार्थों से मोह त्यागने पर, अज्ञान आदि का नाश होता है।
  • बद्ध, मुक्त और नित्य सभी प्रकार की जीवात्माएं असंख्य हैं।
  • कुछ लोग एकैक आत्मा के सिद्धांत का प्रचार करते हैं (शास्त्रों में पाए जाने वाले अद्वैत के सिद्धांत का गलतफ़हमी करते हुए) जो अज्ञान से आच्छादित होकर , स्वयं को अनेकों (बहुवचन) मानकर भ्रमित होती होते हैं। परंतु यह तर्क और शास्त्र के विपरीत है।
  • यदि केवल एक ही आत्मा है, तब एक व्यक्ति के सुखी होने पर, अन्य व्यक्ति को दुखी नहीं होना चाहिए। परंतु क्योंकि दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं, किसी एक व्यक्ति में एक ही समय पर भिन्न भाव नहीं हो सकते। शास्त्र यह भी कहता है कि कुछ आत्माएं मुक्त हैं और कुछ अभी भी संसारी हैं, कुछ आचार्य हैं और अन्य शिष्य हैं, इसलिए बहुत सी जीवात्माएं सृष्टि में हैं। एकैक आत्मा का सिद्धांत, शास्त्रों के कथन के भी विरुद्ध है, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि सृष्टि में बहुत सी जीवात्माएं हैं।
  • मोक्ष की अवस्था में भी, असंख्य जीवात्माएं हैं।
  • हमें यह शंका हो सकती है कि –परमपद में निवास करने वाले जीवात्माएं भिन्न हैं, क्योंकि उनमें क्रोध, इर्ष्या, आदि कोई अवगुण नहीं है, जो इस भौतिक जगत में देखे जाते हैं। यद्यपि गुणात्मक रूप से उस स्थिति में सभी आत्माएं समान हैं, जिस प्रकार बहुत से पात्र जो वजन और माप में एक समान है, परंतु फिर भी एक दूसरे से भिन्न हैं, उसी प्रकार परमपद में निवास करने वाले जीवात्माएं भी एक समान होते हुए भी एक दूसरे से भिन्न हैं।
  • इस प्रकार, यह स्पष्टता से समझा जा सकता है कि भौतिक और आध्यात्मिक जगत दोनों ही स्थानों पर असंख्य जीवात्माएं हैं।

धर्मी ज्ञान और धर्म भूत ज्ञान

  • आईए अब हम ज्ञान के दो प्रकारों को समझते हैं
    • धर्मी ज्ञान – चेतना
    • धर्म भूत ज्ञान – विद्या/ ज्ञान (गुण)।
  • आत्मा का सच्चा/ विशिष्ट स्वरुप (बद्ध, मुक्त, नित्य आदि से भिन्न) –
    • शेषत्वं – यह बोध की जीव भगवान का शेष (दास) है और
    • ज्ञातृत्वं – ज्ञानवान होना।
  • दोनों ही अति आवश्यक गुण हैं।
  • ज्ञानवान होना,  आत्मा को अचित (जड़ पदार्थ) से भिन्न करता है।
  • भगवान के शेष/ दास होना, उसे भगवान/ ईश्वर से भिन्न करता है।
  • यद्यपि आत्मा स्वयं ज्ञान से उपजी है (धर्मी ज्ञान- स्वरुप), तथापि उसमें ज्ञान समाहित है (धर्म भूत ज्ञान- गुण)।
  • धर्मी ज्ञान और धर्म भूत ज्ञान के मध्य भेद – धर्मी ज्ञान, चेतना है, जो सदैव स्वयं के अस्तित्व का बोध कराती है (सूक्ष्म – अपरिवर्तनशील)।
  • धर्म भूत ज्ञान वह है, जो आत्मा को बाह्य प्रयोजनों से प्रकाशित करता है (सभी सर्वव्यापी – जो ज्ञान के संकुचन और विस्तार के कारण निरंतर परिवर्तनीय है)।
  • नित्यात्मा के परिपेक्ष्य में, ज्ञान पुर्णतः विस्तारित होता है।
  • मुक्तात्माओं के लिए, उनका ज्ञान किसी समय में संकुचित था परंतु अब पुर्णतः विस्तारित है।
  • इस संसार की बद्ध आत्माओं के परिपेक्ष्य में, ज्ञान संकुचित है।
  • यद्यपि ज्ञान आत्मा का जीवंत गुण है, ज्ञान का संकुचित होना और विस्तारित होना इस वजह से है कि ज्ञान इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।
  • इन्द्रियाँ किसी समय जागृत रहती है, और किसी समय में नहीं।
  • इसलिए, धर्म भूत ज्ञान (ज्ञान गुण) उसके अनुसार बढ़ और घट सकता है।

उपसंहार

  • यहाँ आत्मा की स्वाभाविक आनंदपूर्ण स्थिति के विषय में बताया गया है।
  • ज्ञान के सम्पूर्ण उदय या विस्तार से आत्मा को आनंदपूर्ण अवस्था प्राप्त होती है।
  • जब अस्त्र अथवा विष (कोई भी वस्तु जो देह, मानस आदि के लिए प्रतिकूल हो) से हमारा सामना होता है, वह दुख जनित होता है।
  • परंतु वह इसलिए है, क्योंकि
    • हम आत्मा को देह मानकर भ्रमित होते हैं- परंतु जब हम समझ जाते हैं कि अस्त्रों से केवल देह प्रभावित होती है, आत्मा नहीं, तब हमें कोई पीढ़ा नहीं सताएगी।
    • हमारे अपने कर्म ही हमें भयभीत करते हैं।
    • हमें इस विषय में पूर्ण समझ नहीं है कि भगवान सभी में व्याप्त हैं (उन अस्त्रों में भी)– प्रहलाद आलवान पूर्णतः आश्वस्त थे कि भगवान सभी में व्याप्त हैं और साँप, हाथियों अथवा अग्नि द्वारा भयभीत किये जाने पर भी उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। वे उनमें से किसी से भी प्रभावित नहीं हुए।
    • क्योंकि सभी में भगवान व्याप्त हैं इसलिए सभी को अनुकूल ही समझना चाहिए।
    • प्रतिकूलता, हमारे विवेक का भ्रम है।
    • किसी के अनुकूल होने का यदि कोई कारण है, तो उसी जीवात्मा के लिए अन्य परिस्थितियों, अन्य समय में वही वस्तु प्रतिकूल प्रतीत होती है। उदहारण के लिए, गर्म पानी शीत ऋतू में अनुकूल प्रतीत होता है, परंतु ग्रीष्म ऋतू में प्रतिकूल – इसलिए गर्म पानी स्वतः ही अच्छा अथवा बुरा नहीं है- यह उसे उपयोग करने वाले की अनुभूति और आसपास के पर्यावरण से प्रभावित उसके देहिक विचार पर आधारित है।
    • एक बार जब हम यह देखते हैं कि सभी भगवान से सम्बंधित है, हम स्वतः ही आनंद का अनुभव कर सकते हैं।

यद्यपि यहाँ तत्व त्रय नामक दिव्य ग्रंथ से चित प्रकरण का भली प्रकार से विवेचन किया गया है, यह अनुशंसा की गयी है कि इस ग्रंथ के कालक्षेप को आचार्य के सानिध्य में श्रवण करने से सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होती है।

रहस्य तत्वत्रयतय विवृत्या लोकरक्षिणे।
वाक्बोशा कल्परचना प्रकल्पायास्तु मंगलम।।

श्रीमते रम्यजामातृ मुनींद्राय महात्मने।
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री नित्य मंगलं।।

मंगलाशासन परैर मदाचार्य पुरोगमै।
सर्वैश्च पूर्वैर आचार्यै सत्कृतायास्तु मंगलं।।

अगले अंक में, हम अचित तत्व (जड़ पदार्थ) के विषय में विस्तार से समझेंगे।

-अडियेन भगवती रामानुज दासी

आधार – तत्व त्रय, भगवत गीता भाष्य

अंग्रेजी संस्करण – http://ponnadi.blogspot.in/2013/03/thathva-thrayam-chith-who-am-i5631.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्री वैष्णव लक्षण – १३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

<< पूर्व अनुच्छेद

निष्कर्ष

mamunigal-srirangam श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पिछले लेख में हमने देखा कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी एक आदर्श आचार्य थे जिनमे वे सभी गुण भरपूर थे जो एक श्रेष्ठ श्रीवैष्णव में होना चाहिए । अब हम उनके गौरवशील जीवन के बारे में और कुछ देखकर इस श्रृंख्ला को समाप्त करेंगे |   “मधुरेण समाप्येत: ” के अनुसार, पेरियजीयर, स्वामी मनवाल मामुनिगल के बारे में चर्चा करते हुए इस लेख को समाप्त करने से भी अधिक मधुर और क्या हो सकता है? यह तो परमात्मा श्रीमन नारायण की दिव्य योजना ही तो है कि यह श्रृंख्ला मामुनिगल की अनुभव के साथ समाप्त हो रहा है |

श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र के सूत्र २२१ में यह कहा गया है – ” वेदग पोन पोले इवर्गलोट्टै सम्भन्धं ” – इसके टीका में स्वामी यतीन्द्रप्रणवर समझाते हैं कि श्रीवैष्णवों के संभंध हमें शुद्ध बनाता है – बिलकुल रसायनशास्त्र के समान – जिस प्रकार एक रासायनिक संयोजन, लोहे को सोना बना देता है उसी प्रकार श्रीवैष्णव संभंध हमें शुद्ध बना देता है | पेरिय तिरुमोळि में कलियन स्वामी बताते हैं – ” तम्मैये नालुम वनंगि तोलुवारक्कु तम्मैयेयोक्क अरुल सेय्वार ” – जो भी निरन्तर एम्पेरुमान श्रीमन नारायण की प्रार्तना करता रहता है वो एम्पेरुमान के समान बन जाता है – अथार्थ एम्पेरुमान के कृपा पात्र बनकर उनके तरह आठ गुण प्राप्त होता है ( अपहतापापमा आदि) | मगर श्रीवैष्णवों और एम्पेरुमान के बीच अंतर यह है कि एक शुद्ध श्रीवैष्णव बनने के लिए श्रीवैष्णव संभंध काफी है मगर एम्पेरुमान के समान बनने के लिए हमेशा २४ घंटे ३६५ दिन उनकी पूजा करते रहना चाहिए |

 इस विषय को हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन से देख सकते हैं – स्वामी एम्पेरुमानार सभी लोगों के जीवन को अच्छे मार्ग में परिवर्तित कि है | उनके शिष्य भी उनकी तरह अतुल्य ही थे – कूरत्ताळ्वान् , मुदलियान्डान् , एम्बार् , अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् आदि सभी स्वामी एम्पेरुमानार के तरह महान होने पर भी अपने आप को हमेशा एम्पेरुमानार के अधीन मानते थे |

उसी प्रकार स्वामी मामुनिगल के शिष्य थे – पोन्नडिक्काल् जीयर् , कोयिल् कन्दाडै अण्णन् , प्रतिवादि भयंकरम अण्णन् , पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् , अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर् , एऱुम्बि अप्पा , अप्पिळ्ळै , अप्पिळ्ळार् , कोयिल् कन्दाडै अप्पन् आदि जो सभी स्वामी मामुनिगल के तरह ही गौरवशाली थे परन्तु वे सभी अपने आप को मामुनिगल के अधीन मानते थे | इस विचार को हम उपदेश रत्न माला के ५५ पाशुर के व्याक्यान से समझ सकते हैं – पिळ्ळै लोकम् जीयर् – जो कि इस व्याक्यान के टीकाकार हैं – पहले यह कहते हैं कि ” पेरिय जीयर एक ही हैं जिनको ओरोरुवर माना जा सकता है ” और फिर आगे कहते हैं कि प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्  , पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् आदि भी ओरोरुवर कहने के योग्य हैं |

इस लेख का सारांश फिरसे आपके लिए:

अतः अगर हम इन सरल सिद्धांतों को पालन करने कि कोशिश करें तो धीरे धीरे मगर व्यवस्थित रुप से हम उन सभी श्रीवैष्णव लक्षण को हासिल कर सकते हैं जिनके बारे में हमारे पूर्वाचार्यों ने विस्तार रूप से समझाया और अनुशासन भी किया था | वे सिध्दान्त कुछ इस प्रकार हैं :-
१) पूर्वाचार्यों के जीवन और अनुदेशों पर पूर्ण भरोसा |
२) एम्पेरुमान और आचार्यों के प्रति उपकारक स्मृति ( कृतज्ञता ) प्रकट करना |
३) भगवद – भागवद विषयों में तल्लीन रहना और सभी अन्य विषयों में निरपेक्ष रहना |
४) देवदांतर भजन को टालना |
५) नैच्यानुसंदानम का पालन करना – हमेशा खुद को दुसरे श्रीवैष्णवों से नीच मानना |
६) उचित आहार नियमम का पालन करना |

इसके साथ अडियेन इस श्रृंख्ला को समाप्त करना चाहता हूँ |

जबकि अडियेन पूर्वाचार्य ग्रंथों से बहुत सारे बहुमूल्य विषयों कि जानकारी की है , यह बहुत आवश्यक है कि हम एक उचित आचार्य के माध्यम से हमारे पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के बारे में सही रूप से सीखें | विद्वानों से सीखे बिना सिर्फ पुस्तकों को पढ़कर इन अनुकरणीय और गहरे अर्थों को समझना नामुमकिन है |

अडियेन श्रीय:पति, आलवारों ओर आचार्यों पर आभारी हूँ जिनके निर्हेतुक कृपा से अडियेन इस श्रृंख्ला को लिख सका | उन स्वामियों को अडियेन प्रणाम करता हूँ जिनसे अडियेन कालक्षेप के द्वारा कई मूल्य अर्थों को समझ सका | अगर इस श्रृंख्ला के द्वारा कोई भी भलाई हो तो वो सिर्फ उन आचार्यों, स्वामियों के चरण कमलों को और गुरु परंपरा को समर्पित है | अडियेन की इतनी सी प्रर्तना है कि इस श्रृंख्ला में जो भी गलती अडियेन के द्वारा हुआ हो उसे क्षमा करें और सिर्फ इन लेखों के तत्वों को मन में लें |

श्रीमते रम्यजामात्रु मुनींद्राय महात्मने |
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री: नित्य मंगलम ||

अडियेंन जानकी रामानुज दासी

संग्रहीत : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-lakshanam-13.html

प्रमेय – http://koyil.org
प्रमाण  – http://granthams.koyil.org
प्रमाता – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा / बाल्य पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्री वैष्णव लक्षण – १२

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

<< पूर्व अनुच्छेद

ऒरोरुवर (सबसे आदर्श आचार्य)

अपने पिछले लेख में हमने एक श्रीवैष्णव की दिनचर्या को देखा।

एऱुम्बि अप्पा (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्टदिग्गजों में से एक हैं) अपने शिष्यों को समझाते हैं कि कैसे एक श्रीवैष्णव को अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। यह वार्तालाप “विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” ग्रन्थ में संग्रह की गयी है। यह एक उत्तम ग्रन्थ है जो श्रीवचन भूषण और अन्य पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्ति के मूल तत्व पर रची गयी है। इसमें, एऱुम्बि अप्पा समझाते हैं कि हमारे सभी पूर्वाचार्य शिक्षित वैष्णव अधिकारी थे, जो उचित ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और आरती के सात अपना जीवन काल बिता रहे थे। इस बात को नीचे दिए गए प्रमाणों से समझ सकते हैं :-

  • वे सब पूरी तरह भगवद् विषय पर केंद्रीत थेकही भी हमें यह प्रमाण लिखीत नहीं मिलेगा कि वे अपने जीवन में पैसे, शोहरत, आदि के पीछे भागे। अअगर ऐसे भी कोई घटना मिले तो भी अंत में उन श्रीवैष्णव आचार्यों के महानता को स्पष्ट करने के लिए ही होगा। जैसे हीं उन्होंने यह अमूल्य ज्ञान अपने आचार्य से प्राप्त किया, उन्होंने अपने पास जो भी हो उन सब चीज़ों को त्याग कर आचार्य सेवा में लग गए।

  • हालाकि इनमे बहुत से विवाहीत थे, वे केवल यह सब लोक क्षेम के लिये किया अपना वंश बढाने के लिये ताकि सम्प्रदाय की रक्षा और पालन पोषण हो सके।

  • उन्होंने यह सब अपने शारीरिक सुख के लिये नहीं बल्कि सिर्फ संप्रदाय की उन्नति के लिए अच्छी सन्तान पैदा करने के लिये किया।

हालकि हमारे सभी पूर्वाचार्य ऐसे ही थे उनमे से खास हैं श्रीकूरेश स्वामीजी, श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी, श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् जीयर् (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के खास शिष्यों में एक), आदि जो विहित भोग से पूरी तरह अलगाव प्रकट किया था। इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे आचार्य विहीत भोग से जुडे हुए थे। इसको इस तरह समझना चाहिए कि “ नही निन्दा न्यायं ”। इस विषय को एऱुम्बि अप्पा ने “विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” में पूरे विस्तार से समझाया है। उन सभी आचार्यों से श्रेष्ठ थे श्रीवरवरमुनि स्वामी, जो उन सभी गुणों के भंडार थे – वे सारे गुण जिनके बारे में श्रीवचनभूषण में विस्तार से दिया गया है। अब हम देखेंगे कि इस साहसिक कथन को हम कैसे कह सकते कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन सभी वैष्णव अधिकारत्व गुणों को प्रकट करते हैं। यह सब हम आगे दिए गए पाशुर के मतलब को समझकर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन चरित्र को पढकर जानेंगे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्न माला में स्वामी पिल्लै लोकाचार्य और उनके ग्रन्थ श्रीवचन भूषन की बहुत ही तारीफ़ की है। ५५वें पाशुर में, श्रीवचन भूषण की स्तुति की गयी है। आइये हम उस पाशुर का अर्थ अब देखेंगे।

आर वचनभूडनथ्थीन आल पोरुल एल्लाम अरिवार
आर अतु चोल नेरिल अनुट्टीप्पार
ओरोरुवर उंडागिल अत्थनै कान उल्लमे
एल्लारक्कुम अंडाददन्ड्रो अदु

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं, “कौन श्रीवचन भूषण के आंतरिक भाव को समझ सकता है? कौन उनके मुताबिक जीवन व्यतीत कर सकता है? ऎसा एक भी व्यक्ति ढूंढना मुश्किल है क्योंकि उनमें बहुत से कठिन नियम हैं, जो हर कोई पालन नहीं कर सकता”। हलाकि श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि ऐसा कोई मिलना कठिन है हम यह समझना चाहिए कि कुछ लोग हैं जो उन सभी आचारों सहित अपना जीवन गुज़ारते हो | ऐसे लोग श्री वैष्णवों के कुल जनसंख्या में कम प्रतिशत होते हैं 

इस पाशुर के व्याख्यान पर पिळ्ळै लोकम् जीयर् की टीका में वे यह स्पष्ट से कहते हैं कि, “केवल श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही, जो कि श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी के कृपा पात्र बने, श्रीवचनभूषण में कहे गए आचारों को समझ सकते हैं और उसका पालन भी कर सकते हैं”।

श्रीकांची प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी जो बहुत से ग्रन्थ, श्रीवैष्णव सम्प्रदाय पर आधारित लिखे हैं, इस पाशुर पर अपने टीका में कहते हैं कि हमें अपने जीवन को श्रीवचनभूषण के सिद्धान्तों के अनुसार चलना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि उसमें एसे सिद्धन्त हैं जैसे:

  • सूत्र ४५५

वैवाहीक जीवन में विषय भोग लेना (जैसे शास्त्रों में इसके लिये कुछ नियम हैं कि कब और कैसे यह प्राप्त करें) शास्त्रों ने मना नहीं किया है और वह किसी को नरक ले जाने के लिये मार्गदायी नहीं है। परन्तु यह आत्म स्वरूप विरोधी है (कोई भी शारिरिक विषय भोग त्यागना) और क्योंकि हमारे पूर्वाचार्यों ने इसे केंद्रीत नहीं किया और क्योंकि वह हमारे अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) के लिये विरोधी है, इसे त्यागना चाहिए।

  • सूत्रं ३६५

जब कोई हमारे खिलाफ अन्याय करे तो उनपर हमें यह सारी भावनाएँ होना चाहिए:

  • सहनशीलता उसी क्षण जैसे को तैसा नहीं करना।
  • कृपा भगवान की प्रतिक्रिया पर चिंता करना, क्योंकि भगवान भागवत अपचार के लिये योग्य शिक्षा देंगे, यानि, भगवान से, दोषि के लिये, क्षमा मांगते प्रार्थना करना।

  • हँसीक्योंकि वो हमारे सांसारिक लाभ में बाधा डाल सकता है मगर उन लाभों में हमारा केंद्र नहीं है ( आत्मा का हित ही हमारा सर्वत्र केंद्र है ) | इन सांसारिक लाभों से हमें कुछ लेना देना नहीं है | इसलिए उनके होशियारी पर हंसकर शत्रुता को समाप्त करना चाहिए।

  • आनन्ददोषि केवल हमारे शरीर को दुख पहुँचाता है, जिस शरीर को हम अपना दुश्मन समझते हैं, इसीलिये हमें यह सोचकर खुश होना चाहिए कि वह हमारे उपर कृपा ही कर रहा हैं।

  • कृतज्ञहमें हमारे दोष को याद दिलाने के लिए और यह याद दिलाने के लिए कि इस लीला विभूति से हम अलग होना निष्चय है कृतज्ञता प्रकट करना चाहिए।

उनके इस जीवन काल के आधार पर, हम यह देख सकते हैं कि कैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इन गुणों के सारसंग्रह थे। उनके जीवन के अनमोल चरित्र के कुछ उदाहरण अब हम देखेंगे :-

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो कि श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के अवतार थे, हमें यह बताये कि हमें अपने आप को कैसे श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के चरण कमलों पर समर्पित करना चाहिए| आलवार तिरुनगरी में भविष्यत् आचार्य सन्निधी में उनकी पूजा करते, यतिराज विंशति, आर्ति प्रबंध, आदि लिखकर हमें यह सिखाया कि निरन्तर श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के बारें में चिन्तन करते रहना चाहिए

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीशैलेश स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार किये और अपना पूरा जीवन उनके आचार्य के निर्देशानुसार ही रहे। वह श्रीभाष्य केवल एक बार उनसे पढ़े परन्तु अपना सारा जीवन अरुलिचेयल पड़ने और उसके मतलब समझने में ख़र्च किया। वह एक अद्वितीय संस्कृत और वेदों के विद्वान थे परन्तु उन्होंने वेदों को हमेशाअरुलिचेयल के जरिये ही समझाया।

  • उनकी दिनचर्या जो एऱुम्बि अप्पा ने बनायी, उसमे कहा है कि, “श्रीवरवरमुनि स्वामीजी हर समय द्वय मंत्र का अनुसंधान करते रहते थे और उनका हृदय हमेशा तिरुवायमोली के बारे में ही सोचता रहता था”।

  • एक बार आल्वार तिरूनगरी में जब कुछ दुरात्मा लोगों ने उनके मठ में आग लगाया था, तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने राजा को उन्हें माफ करने के लिये कहा और उन लोगों पर भी कृपा किये जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना दुश्मन समझते थे।

  • एक बार जब ऊत्तम नम्बी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अपराध किया तो, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वहाँ से चुपचाप निकल गयेवह ऊत्तम नम्बी को एक शब्द भी नहीं बोले।तब श्रीरंगनाथ भगवान ने ऊत्तम नम्बी को यह दिखाया कि, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और कोई नहीं बल्कि साक्षात आदिशेष हैं।

  • जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीरंगम में यह पता चला कि, उनके कुछ शिष्य दूसरे आचार्यों का सम्मान नहीं कर रहे हैं, तब उन्होंने कालक्षेप करना छोड दिया और उन्होंने अपने शिष्य से कहा, पहले अन्य आचार्यों का सम्मान करें फिर उनसे कालक्षेप सुनें।

  • एक बार कुछ किसान श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को कच्चा पदार्थ दे रहे थे, तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह जानकर कि वे किसान अवैष्णव हैं, तुरन्त हीं उस भोजन को लौटा दिया। वह अवैष्णवों के साथ सम्बन्ध नहीं रखते थें।

  • एक बार एक बूढ़ी औरत एक रात के लिये उनके मठ में ठहरने की अनुमति माँगी तो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने उसे साफ मना कर दिया, कि यह उनको स्वीकारनिय नहीं है। कुछ ऐसा था सांसारिक विषयों के प्रति उनका वैराग्य |

  • श्रीकांची प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी जो एक बहुत बडे विद्वान थे, एक बार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से मिलने आये | उस समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति पर व्याख्यान कर रहे थे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वेदों, अरुलिचेयल और पूर्वाचार्यों के व्याख्यान पर विशेष ज्ञान और अद्वितीय पकड को देखकर अण्णा चकीत रह गये और उसी समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बन गये।

  • श्रीरंगम में बहुत से आचार्य पुरूष, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को ही अपना आचार्य मान लिये, हालकि वह पहले से ही आचार्य वंश में जन्म लिये हो।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपना सारा जीवन पूर्वाचर्यों के व्याख्यान ढूंढने में बिताया, उनका लेख तैय्यार किया, उनको अनुसंधान किया और अपने शिष्यों को सिखाया। अपने वृद्धावस्था में भी ताड के पत्तों पर, दूसरों की भलाई के लिये लिखते थे।

  • उनकी सच्चाई बेमिसाल थी, जिसके कारण उन्हें यह नाम मिलापोय इल्लाद मनवाल मामुनि

  • उनकी शास्त्र और भाषा पर पकड बेमिसाल थी, जिसके कारण उन्हें यह नाम मिलाविसद वाक् शिकामनी। रहस्य ग्रन्थों पर उनके टीका बहुत ही विशेष थी और उन टीकाओं के बिना उन रहस्य ग्रन्थों के मतलब को समझना नामुमकिन है।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के श्रीसहस्त्रगीति के प्रचार के बिना, श्रीसहस्त्रगीति के तत्त्व को जानना और समझना नामुमकिन है।

  • उन्होंने कभी भी पूर्वाचार्यों की निन्दा नहीं की, हालकि जब एक ग्रन्थ में दुसरे ग्रन्थ के विरुद्ध विचार होते फिर भी वे कभी भी एक पर प्रकाश डालकर दूसरे विचार को नीचे नहीं दिखाया | वे ज्यों का त्यों लिख देते हैं

  • उनमें इतना नैच्य अनुसन्धान था कि, उन्होंने श्रीरंगम और आलवार तिरूनगरी दोनों जगह में कभी भी अपने अर्चाविग्रह का उत्सव मनाने की आज्ञा नहीं दी, ताकि सभी भागवतों का ध्यान, भगवान श्रीमन्नारायण और श्रीशठकोप स्वामीजी पर ही केंद्रीत रहें। उन्होंने बहुत हीं छोटे अर्चा विग्रह बनाने की आज्ञा दी और यह निश्चय किया कि उनके अर्चाविग्रह का कोई शोभायात्रा न हो।

इसके साथ साथ, भगवान श्रीमन्नारायण जो अपने पिछले अवतार के आचार्यों से संतुष्ट नहीं थे (रामावतार में वशिष्ठ / विश्वामित्र , कृष्ण अवतार में संदीपानी, आदि) यह स्थापित किया कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही सबसे उत्तम और निपुण आचार्य हैं। नमपेरुमाल की यही श्रेष्ठ इच्छा/उपाय थी कि उनको भी उनके आचार्य का ही नाम मिले। इसीलिए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को यह आज्ञा दी कि, वह एक वर्ष तक तिरुवरंगम में उनके सन्निधी के सामने, श्रीशठकोप स्वामीजी से विरचित श्रीसहस्त्रगीति का प्रवचन करें। और तब तक उन्होंने अपने नित्य समस्त उत्सवों को रोक दिया और वह दिव्य पत्नियों (श्रीदेवी और भूदेवी) सहित एक वर्ष तक श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का प्रवचन सुनें।

आणि तिरुमूलम के दिन [ कालक्षेप के अंतिम दिन ], साटृमुरै के समय, भगवान एक छोटे बालक के रूप में प्रकट होकर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सामने आकर उनके लिये यह तनियन अर्पण किया (जैसे एक शिष्य अपने आचार्य के लिये करता है)

श्रीशैलेश दयापात्रं दीपकथ्यादि गुणार्णवम् ।

यतींद्र प्रवणं वन्दे रम्यजामातरं मुनिम् ॥

यहाँ, भगवान कहतें हैं कि, “मैं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की पूजा करता हूँ जो कि अ) श्रीशैलेश स्वामीजी के कृपा पात्र हैं, ) ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, आदि के सागर हैं और इ) जिन्हें श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के प्रति असीम प्रेम है”।

उन्होंने यह आज्ञा की कि अरुलिचेयाल अनुसंदान के शुरू और अंत में, इस तनियन को सभी दिव्यदेशों के मंदिरों में, अन्य दिव्य क्षेत्रों में, मठों में और तिरूमाली में अनुसंदान करना चाहिए। और यह आज भी देखा जा सकता है, जहाँ भी हम जाये अरुलिचेयाल अनुसंदान के समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की स्तुतियाँ सुन सकते हैं।

इस तरह श्रीरंगनाथ भगवान नें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शन कियाजो उनके अपने ही ओरोरुवर पसुरम के उचित उदाहरण माना जा सकता है, इसिलिये उन्होंने

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य चुना।

  • उन्होंने अपने आचार्य का नाम रखा क्योंकि हर एक शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य का नाम रखे।

  • उन्होंने सब कुछ छोडकर अपने आचार्य से भगवद् विषय सीखा।

  • उन्होंने सारे लोगों के सामने अपने आचार्य को एक तनियन प्रस्तुत किया और यह आज्ञा दिया कि यह तनियन सभी जगह गाया जाये (यह कहा गया है कि एक शिष्य अपने आचार्य की स्तुति सभी के सामने करें)

  • उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को शेश पर्यंकम आचार्य सम्भावना के रूप में प्रदान किये। (आज भी हम यह देख सकते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही एक ऎसे आचार्य हैं जिनके अर्चा विग्रह में शेश पर्यंकम  है )

  • नमपेरुमाल तिरुवरंगम में, (आज भी) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का तिरूवध्यायन महोत्सव करते हैं (क्योंकि यह एक शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य का तीर्थ उत्सव करें)। इस दिन (माघ महीने कृष्ण पक्ष द्वादशी) श्रीरंगनाथ भगवान के अर्चक, परिचरक, आदि श्रीरंगनाथ भगवान के सामाग्रि (चमर, वट्टिल, कुदै, आदि) के साथ आते हैं और श्रीरंगम के श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सन्निधी में उत्सव मनाते हैं। भगवान खुद भी उस दिन अपने आचार्य के प्रति सम्मान के कारण भोग्य वस्तु जैसे सुपारी, पान आदि नहीं पाते

इस तरह हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन से यह समझ सकते हैं कि यह सिध्दान्त काल्पनिक नहीं है। हम यह भी देख सकते हैं कि उन्होंने कैसे अपना जीवन गौरव, प्रामानिकता और सम्पूर्णता के साथ बिताया। उन्होंने यह सब कुछ हमारे भविष्य की पीढ़ी के लाभ के लिए और उनको समझकर उनका पालन करने के लिये दस्तावेज बना कर रखा है। यह भगवान की निर्हेतुक कृपा ही है कि हम मनुष्य योनि में जन्म लिये हैं और उसमें भी श्रीवैष्णव परिवार में, और वह भी थोडी सी बुद्धी के साथ इनकी मूल्यता समझ सके और इस ज्ञान रूपी धन, जो अपने पूर्वाचार्यों से प्राप्त किये, को सराह सके। हमें भगवान का सदैव ही कृतज्ञता प्रकट करना चाहिए कि उन्होंने हमें यह मौका प्रदान किया और इसी उत्साह के सात हमें तुरन्त ही उनके ईच्छाओं को अमल में लाना चाहिए और अपना समय उनके और उनके सेवकों की सेवा में व्यतीत करना चाहिए।

यह शृंखला अब समाप्त हो रहा है | अगले लेख में हम , अब तक किये गए चर्चाओं की सारांश देखेंगे और इस शृंखला को समाप्त करेंगे |

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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