Monthly Archives: November 2018

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३४)

६९) आप्त विरोधी – विश्वासयोग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आप्त का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति / पहलू या हित चाहनेवाला। सामान्यत: वह जो बिना कुछ चाहे दूसरों का हित चाहता है उसे आप्त कहते है – मित्रों में उत्तम। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुमोगूर भगवान की तिरुमोगूर आत्तन ऐसे जय जयकार करते हैं। आप्त का तमिल शब्द आत्तन है। अनुवादक टिप्पणी: इस भाग में उन विषयों पर चर्चा हुई है जो प्रपन्नों के लिये अच्छा है – इसमें शामिल है किसी के स्वभाव को अच्छी तरह समझना, भगवद, भागवत, आचार्य, आदि के महत्त्व को समझना।

  • भगवान और भागवतों में जिनकी प्रीति हो उनकी उपेक्षा करना बाधा है। जो भी भगवद और भागवतों में लगा है उन्हें अपना हित चिन्तक समझना चाहिये और उनके प्रति अच्छी तरह व्यवहार करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण स्वयं भगवद्गीता के ७.१९ में समझाते हैं “बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपध्यते। वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥” – कई जन्मों के पश्चात जो सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है वह मेरे शरण में आता है। ऐसे व्यक्ति जो वसुदेव को ही सबकुछ (उपाय, उपेय, आदि) मानते हैं वो महान व्यक्ति है और बड़ी दुर्लभता से मिलते हैं। उसी तरह स्वयं भगवान वैष्णवों के आठ विशेष गुणों को समझाते हैं। उसमें वैष्णवों का पहला गुण है “मद भक्त जन वात्सल्य” – भगवान के भक्तों के प्रति लगाव रखना। वह भी “वात्सल्य” शब्द का यहाँ प्रयोग भगवान ने किया है। वात्सल्य अर्थात माता सा प्यार / सहनशीलता – जैसे एक माता अपने बच्चों में कितना भी दोष हो उसे प्यार करेगी उसी तरह एक वैष्णव को अन्य वैष्णव में कितना भी दोष या कमी हो उनके दोषों को अनदेखा करके उनमें प्रेम भाव रखना चाहिये। अत: इन २ प्रमाणों से हम वैष्णवों के सेवा के महत्त्व को समझ सकते है जो भगवद और भागवतों में लगे हुए हैं। यह भी समझना चाहिये कि वैष्णवों कि ओर ध्यान न देना उनके प्रति सम्मान न देने के बराबर है।
  • जो भगवान और भागवतों के प्रति लगाव नहीं करते हैं उनके प्रति बहुत प्यार करना या दिखाना बाधा है। यह पिछले विषय से जुड़ा है। हमें उनके प्रति लगाव नहीं दिखाना चाहिये जो अपने कार्य और बाह्य स्वरूप से संसारी हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवैष्णवों की दिनचर्या को समझाते हैं। कई विषयों में एक इस प्रकार हैं “अहंकार अर्थ कामंगल मूनरूम अनुकूलर पक्कलीले अनाधरत्तैयूम, प्रतिकूलर पक्कलीले प्रावण्यत्तैयुम, उपेक्षिक्कुमवर्गल पक्कलीले अपेक्षइयूम पिरप्पिक्कुम”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिए एक बहुत सुन्दर उदाहरण देते हैं। तीन विषयों की यहाँ चर्चा हुई है। एक एक कर हम देखेंगे। १) श्रीवैष्णव अनुकूल (हितकारी) हैं – वे हमारे स्वामी हैं। जब हम उन्हें देखते हैं हमें उनके प्रति आदर सम्मान होना चाहिये और उसी क्षण सम्मान सहित वहाँ खड़े होना चाहिये। परन्तु अहंकार (स्वयं को स्वतन्त्र मानना) हमें उनकी ओर दुर्लक्ष्य कर देता है। क्योंकि अहंकार स्वयं को उच्च मानता है और अन्यों को सम्मान देने से रोकता हैं। २) सांसारिक जन प्रतिकूल (कृपाहीन) होते हैं। अर्थतम का अर्थ सांसारिक धन है। जब हम धन की इच्छा की ओर बढ़ते हैं तब हम धन प्राप्ति के लिये किसी की भी कितनी भी प्रशंसा कर सकते हैं। अत: यह सांसारिक धन, वैभव, आदि की इच्छा हमें प्रतिकूल जनों का मान सम्मान और उनके प्रति लगाव कराता है। ३) कामुक स्त्री सामान्यता उपेक्षिक्कुमवर (जो हमारी इच्छाओं की कभी भी परवाह नहीं करती हैं) होती हैं। अपेक्षा यानी इच्छा। जब किसी में कामुकता बढ़ती है तब यद्यपि वह स्त्री उस पुरुष की परवाह नहीं करती है और सार्वजनिक रूप में उसका अपमान भी करती है तब भी वह कामी पुरुष उसके पीछे जाने में लज्जा नही करता। अत: हमें इन ३ गड्ढो में गिरने से बचना चाहिये।
  • स्वकीया स्वीकार निष्ठा (स्व कोशिश पर विश्वास) होना बाधा है। जब हम कुछ अनुसरण करते हैं तब यह विचार कर अनुसरण करना कि “यह मेरा है, मैं इसे मेरे स्व कोशिश से अनुसरण कर रहा हूँ” से बचना चाहिये। क्योंकि भगवान ही सभी के मालिक हैं, हमें सब कुछ भगवद प्रसाद (भगवान की कृपा), आचार्य प्रसाद (आचार्य कृपा) मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति के दो प्रकार को समझाया गया है – स्वगत प्रपत्ति और परगत प्रपत्ति। स्वगत प्रपत्ति यानि स्वयं के प्रभाव की कोशिश से शरण होना। परगत प्रपत्ति यानि भगवान की कृपा से शरण होना। इन दोनों में से हमारे पूर्वाचार्यों ने परगत शरणागति को महत्त्व दिया है जो भगवान हीं रक्षक हैं और वे ही अपनी कृपा से हमें उपर उठाते हैं। जीवात्मा को भगवान के शरण होना चाहिये क्योंकि जीवात्मा का स्वाभाविक स्थान है भगवान के शरण होना।
  • स्व प्रयोजन प्रवृत्ति (स्वयं की इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश) में लिप्त होना बाधा है। स्वयं के सन्तोष के लिये हमें केंद्रित नहीं होना चाहिये और हमें दूसरों को उपर उठाने और उनके अच्छे के लिये कार्य करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कहा गया हैं “विचित्र देह संपत्तिर ईश्वराय निवेदितम, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुता” जब जीवात्मा एक सूक्ष्म स्थिति में होता है जैसे एक पदार्थ बिना इन्द्रिय/शरीर और सांसारिक आनन्द में नहीं लग सकता या वह स्वतन्त्रता की कोशिश करता है, तब भगवान के चरण कमलों की ओर अग्रसर होने के लिये कृपालू सर्वेश्वर, उस जीवात्मा पर इन्द्रिय/शरीर से कृपा करते हैं। इंद्रियाँ या शरीर का उपयोग में शारीरिक आनन्द के लिये भगवान के पास जाने के बजाय उद्धार के लिये जीवात्मा को भगवान के पास जाना चाहिये जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में कहा है “अन्नाल नि तंत आक्कैयीन वली उलल्वेन” अर्थात एक व्यक्ति जिसे एक बेड़ा दिया गया नदी के उस पार जाने के लिये, परन्तु नदी के जल के प्रवाह के कारण समुद्र में गिर जाता है, उसीप्रकार जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठने के लिये वही इंद्रियाँ या शरीर दिये गये थे वह इस संसार के लिये ही अधिक प्रयोग करता है। रामानुज नूत्तन्दादि में श्रीतिरुवरंगत्तु अमुधनार (श्रीरंगामृत स्वामीजी) इस तत्त्व को ६७वें पाशूर में समझाते है “मायवन् तन्नै वणंगवैत्त करणमिवै” – भगवान ने जीवात्मा को यह शरीर उनकी पूजा करने हेतु दिये है। सभी के लिये भागवतों की सेवा करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसलिये हमें इस जन्म का सही उद्देश्य पता होना चाहिये और उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिये।
  • केवल शेषत्त्व ज्ञान होना और पारतंत्रय का ज्ञान न होना बाधा है। आत्मा का स्वभाव दो चरणों में है: शेषत्त्वम – अपने स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु तत्पर रहना; पारतंत्रियम – स्वामी की इच्छाओं को पूर्ण करना। भगवान की सच्ची इच्छाओं को पूर्ण करना केवल अपने स्वामी की सेवा के लिये इंतजार करने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझना चाहिये यहाँ हम श्रीभरतजी को स्मरण कर सकते हैं जिन्होंने १४वर्ष तक भगवान राम की अनुपस्थिति में अयोध्या का राज्य संभाला। हालाँकि वे पहले श्रीराम के साथ वन में जाना चाहते थे।
  • स्वयं आनंदित होना और दूसरों को आनंद न देना बाधा है। भोग्यम – जो आनंदित है, भोक्ता – जो आनंदित होता है। श्रीवैष्णवों को स्वयं को भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु समझना चाहिये। यह समझना आवश्यक है कि हमारे स्वयं का अस्तित्व केवल भगवान के आनंद के लिये ही होना चाहिये। ऐसी समझ होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। हम भगवान को आनंद देनेवाली वस्तु हैं फिर भी स्वयं को उपभोक्ता समझना विपरीत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के २१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं “शेषत्व भोक्थृतवंगल पोलन्रे पारतंत्रीय भोग्यतैगल”– पारतंत्रियम और भोग्यत्व दोनों शेषत्त्व और भोक्तृवंगल से भी उच्च हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यहाँ बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि शेषत्त्व सोने की ईंट (कीमती है फिर भी उसका रूप बदल कर काम में ले सकते हैं) जैसी है और पारतंत्रियम  सोने की आभूषण कि तरह है जिसे उसी रूप में कार्य में लेना है। यह बहुत गहरा तत्त्व है और इसे आचार्य कालक्षेप के जरिये समझना चाहिये।
  • यह मानना कि हमें जो आनन्द प्राप्त हुआ वह स्वयं से प्राप्त होता है, बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा करते हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते  चिरप्पु” – भगवान अपने मुखोल्लास के लिये मुझे अपना लेवे यही उत्तम है। हमारा शेषत्व और पारतंत्रय दोनों केवल भगवान के मुख के आनन्द के लिये हीं उत्पन्न होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी इसे पेरुमाल तिरुमोझी में समझाते हैं “पडियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – मैं आपकी सन्निधी के प्रवेश द्वार में सीढी बनूँ (जैसे अचित जिसे ज्ञान नही है) और सुख के परस्पर होना (क्योंकि चित जिसे ज्ञान है) जब मैं आपके होठों पर मुस्कान देखता हूँ। (अनुवादक टिप्पणी: यह हमारे सत सम्प्रदाय का सर्वोत्तम तत्त्व है जिसे “अचित्वत पारतंत्रियम” कहते है – अचित जैसे भगवान के पूर्ण शरण होना फिर जब भगवान के द्वारा खुशी प्रगट की जाती है तब जीवात्मा भी खुश होता है)। यह तत्त्व (स्वयं के सुख को मिटाने का) द्वय महामन्त्र के दूसरे भाग “नम:” में समझाया है। स्तोत्र रत्न में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी इसी तत्त्व को समझाते है “कदाप्रहर्षयिष्यामि” – भगवान के सुख के लिये तड़प। जब जीवात्मा भगवान के सुख का परस्पर आदान प्रदान करता है तब भगवान खुश हो जाते हैं। हमारे कैंकर्य का एक मात्र उद्देश है उनकी खुशी। इसके विपरित कार्य करना बाधा है।
  • जीवात्मा का सच्चा स्वभाव भगवान के आनन्द के लिये होना है और जो मूलभूत गुण है वह भी केवल भगवान के ही आनन्द पर केन्द्रित है यह न जानना बाधा है। जीवात्मा का सच्चा प्रबन्ध भगवान के आनन्द के लिये होना है – भगवान की सम्पत्ति बनना। मूलभूत तत्त्व भगवान का सच्चा दास बनकर रहना है। ऐसे जनों के लिये जिन्हे यह अहसास हो गया है कि दासता स्वभावत: ऐसी सेवा कैंकर्य, पूर्ण अधीनता, आदि बताने से होती हैं। जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया हैं कि “थनक्केयाग एनैक्कोल्लुमिते चिरप्पु” हमें निरन्तर भगवान के आनन्द के लिये सेवा करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे इसमें कहा गया हैं कि “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” –दासता के सच्चे लक्षण को कम से कम छोटे कैंकर्य (धार्मिक सेवा) द्वारा अनवरत किया जाता हैं।
  • आचार्य जो हमें वे तत्त्व बताते हैं जिसका हमें ज्ञान नहीं है उसको भगवान न मानना बाधा है। जैसे श्रीसहस्रगीति में कहा गया हैं “अरियाधन अरिवीत्त अत्ता” – नित्य सम्बंधित जिन्होंने भगवद विषयम में अज्ञात अनुभव प्रगट किया हैं, भगवान प्रथमाचार्य हैं। हमारे आचार्य को हमें भगवान का मनुष्य रूप मानना चाहिये। ऐसे आचार्य पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कृपया अंतिमोपाय निष्ठा पर लेख पढिये जिसमें आचार्य स्वयं को भगवान मानते हैं।
  • अपने आचार्य जो अन्तिम उपाय और उपेय हैं पर पूर्ण विश्वास न होना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें सूत्र में समझाते हैं कि “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – मोक्ष के लिये आचार्य की शरण होना ही अन्तिम उपाय है। यहाँ यह समझना चाहिये कि हमें उस स्थिति में होना चाहिये जहाँ आचार्य माने कि उनका शिष्य रहे जैसे “यह मेरा प्रिय शिष्य हैं”। ४४६वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं “आचार्यनैयुम थान पररूम पर्रु अहंकार गर्भमोपाधि कालन कोणडु मोधिरमी मिडुमा पोले – आचार्य का अनुसरण करते समय भी अगर वह स्वगत शरणागति (स्व परिश्रम से आचार्य का अनुसरण करना) हैं तो भी वह जीवात्मा के स्वभाव के प्रतिकूल है क्योंकि अभिमान या स्वतन्त्र स्वभाव के कारण ऐसा अनुसरण है। यह तो केवल आचार्य ही जो शिष्य पर कृपा करता हैं (शिष्य को निरन्तर ऐसा ही सोचना चाहिये)। अगर शिष्य की ओर से अभिमान से यह कार्य किया गया हो तो वह सोने कि अंगूठी बनाकर उसे काल (यम – मृत्यु को नियंत्रण करनेवाला) से स्वीकार करना जैसे होगा।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३३)

६८) जाति विरोधीजाति/वर्ण (जन्म में बाधाएं)

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी की सेवा करते हुए जो श्रीवरदराज भगवान की  त्याग मण्डप (काञ्चीपुरम) में सेवा करते थे।

आजकल जाति को ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और क्षुद्र से जोड़ा जाता हैं। परन्तु हमें यह समझना चाहिये कि यह सत्य नहीं है। असल में जाति को देव, मनुष्य, त्रियाक (जानवर जो क्षितिज के समानन्तर बढ़ते हैं) और पेड़ (स्थावर) का जन्म अथवा शरीर सम्बन्ध से जोडकर देखना चहिये। जाति का सम्बन्ध शरीर से है न की आत्मा से। त्रियाक का अर्थ जानवर/पक्षी है – उप वर्ग में आते है वह जो उड सकते हैं, जो चल सकते हैं, जो रेंग सकते हैं, जो जल में रह सकते हैं, जो धरती पर रह सकते हैं, जो वन में रह सकते हैं, जो शहर में रह सकते हैं, आदि। स्थावर में सम्मिलित हैं पेड़, पौधे, झाड़ी, छोटे पेड़, कीट भक्षी, आदि। भगवद गीता में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि सभी ४ वर्ण मैंने ही रचे हैं और उन्हें उनके कार्य और गुणों के आधार पर अलग किया गया है। विषय जो यहाँ चर्चा किया जायेगा वह बहुत गोपनीय और आंतरिक है। हम उसे सरलता से पेश करने का प्रयत्न करेंगे। रहस्यत्रय ग्रन्थ जैसे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र, आदि में जो समझाया गया है उन्हीं पहलू की हम यहाँ चर्चा करेंगे। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शब्दों का स्मरण कर सकते है “आर वचन भुतणत्तिन आळ् पोरुलेल्लाम अरिवार? आर अतु चोल नेरिल अनुट्टिप्पार?” – वह जो श्रीवचन भूषण के अर्थों को पूरी तरह समझ सकता है? वह जो उपदेश का पालन कर सकता है? इसी को ध्यान में रख कर अब हम आगे इस विषय पर प्रकाश डालेंगे।

अनुवादक टिप्पणी: जाति के कई भिन्न भिन्न अर्थ हैं। सामान्यता यह अलग अलग प्रजातियों के सम्बन्ध में है – देव, मनुष्य, त्रियाक, स्थावर। परन्तु इसके अतिरिक्त जाति को वर्ण से भी जोड़ा जाता है। कुल मिलाकर जाति को शरीर और जन्म से जोड़ा जाता है। उदाहरण के तौर पर द्विज अर्थात एक ही जन्म में दो बार जन्म लेना (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) – इसका अर्थ है सभी क्षुद्र वर्ण में जन्म लेते हैं पर उपनयन संस्कार होने के पश्चात द्विज हो जाते हैं। उपनयन संस्कार के पश्चात सभी द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य) वेद अध्ययन से ब्रह्म ज्ञान के योग्य हो जाते हैं। अक्रमत: (एकाएक) कोई ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य नहीं होता है। सामान्यता सभी अपने अपने पूर्व कर्मानुसार उस वर्ण के किसी परिवार में जन्म प्राप्त करते हैं। इसलिये अगर कोई ब्राह्मण परिवार में जन्म लेता है तो उन्हें ब्राह्मण बनने का एक अवसर प्राप्त होता है। एक बार वह ब्राहमण बन जाते है तो उन्हें उन तत्वों पर रहना चाहिये। उन्हें एक आचार्य से वेदों का अध्ययन करना और आचार्य से जो सीखे उन्हें वेदों के तत्वों के आधार पर कार्य करना चाहिये। इस तरह कोई अपना ब्राहमणत्व विद्यमान रख सकता है। उसी तरह सभी वर्ण के जन वर्णाश्रम धर्मानुसार अपना कार्य करते हैं जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय हैं और समाज के सही कार्य को सभी की उन्नती के लिये स्थापित करते है। सभी वर्ण के मुख्य कार्य हैं:

  • एक ब्राह्मण के लिये ६ कार्य पहचाने गये हैं। वेदों का अध्ययन, वेदों को सीखाना, स्वयं के लिये यज्ञ करना, अन्यों के लिये यज्ञ करना, दान करना, परिग्रह करना (दान स्वीकार करना)।
  • क्षत्रीय के लिये वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें शस्त्र उठाना, लोगों की रक्षा करना और देश का सही शासन करना, आदि कार्य।
  • वैश्य के लिये भी वेदों का अध्ययन, स्वयं के लिये यज्ञ करना और दान करना यही लागू होता है – वेदों को सीखाना, अन्यों के लिये यज्ञ करना और परिग्रह करना (दान स्वीकार करना) लागू नहीं है। परन्तु उस स्थान पर उन्हें खेती करना, गायों को चराना, व्यापार आदि करना है।
  • क्षुद्र केवल ऊपर लिखे तीनों वर्णों को उनके कार्य में मदद करते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित “आचार्य हृदय” के ३१वें चूर्णिकै के अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार के व्याख्या में उपर बताये हुए तत्वों को समझाया गया है।

“आचार्य हृदय” के ३३वें चूर्णिकै में नायनार द्विज जन्म की दूसरे जन्म से बड़ी सुन्दरता से तुलना करते है – अर्थात वह जो पञ्चसंस्कार से श्रीवैष्णव बनता है। जैसे शरीर का दूसरा जन्म वैदिक कर्म करने से निरत होता है वैसे हीं पञ्चसंस्कार आत्मा का दूसरा जन्म भगवद और भागवतों की सेवा से निरत होता है। यद्यपि आत्मा नित्य है परन्तु तिरुमन्त्र का अर्थ सीखने से जीवात्मा को अपने सच्चे स्वभाव का ज्ञान हो जाता है जो भगवान श्रीमन्नारायण की नित्य सेवा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस चूर्णिकै की व्याख्या को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं गायत्री मन्त्र (सभी मंत्रों की माता) से जीवात्मा ब्राह्मण कहलाता है और तिरुमन्त्र (सभी गायत्री मन्त्र की माता) जीवात्मा को श्रीवैष्णव बनाता है। ब्राह्मण को कर्म निष्ठ (जो सिर्फ कर्म पर आधारित है) और वैष्णव को दास्यभूत (जो सेवा कैंकर्य पर केन्द्रित है) कहते हैं। बाद में नायनार स्वामिजी कर्म निष्ठा और दास्यभूत में कई अन्तर बताते है।

३७वें चूर्णिकै में भी नायनार स्वामीजी यह समझाते है कि किसी का ब्राहमणत्व उसके वेद अध्यन, उसके अर्थ को समझने और वेदों में बताये गये तत्व के पालन करने से स्थापित होता है उसी तरह किसी का वैष्णवत्व एक आचार्य से दिव्य प्रबन्ध सीखना, उसके अर्थों को आचार्य से समझना और उसके तत्वों का अपने जीवन में पालन करने से स्थापित होता है।

इस भाग में वैष्णव या प्रपन्न (जो श्रीमन्नारायण को समर्पित हो) के महत्व और उनके जो मुख्य गुण है उन्हैं विस्तार से समझाया गया है।

  • भगवान ही रक्षक हैं इस पर पूर्ण विश्वास न होना जो तीनों प्रपन्नों अज्ञर (अज्ञानी), ज्ञानाधिकार (जो शिक्षीत हो) और भक्ति परवसर (जो भक्ति में डुबा हो) के लिये आवश्यक है, बाधा है। प्रपन्न अर्थात जो भगवान के शरण हो और जो उन्हें ही उपाय मानता हो। सभी ३ प्रकार के प्रपन्नों को विश्वास होना चाहिये और इसी विश्वास को जाति धर्म कहते है। विश्वास का अर्थ है भगवान पर पूर्ण भरोसा होना जिनके हम शरण हुए है वे ही हमारी रक्षा करेंगे और उद्धार करेंगे। इन तीन प्रपन्नों के विषय में थोड़ा अधीक व्याख्या इस प्रकार है (अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों प्रपन्नों को सुन्दरता पूर्वक ४१वें सूत्र में समझाते है। हम अपने पूर्वाचार्यों के दया गुण को समझकर बढ़ाई कर सकते हैं जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४३वें सूत्र में स्वयं को अज्ञर कहते है – हालाँकि वे बहुत शिक्षित विद्वान हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सुन्दरता से समझाते हैं कि श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अपने नैच्यानुसंधान द्वारा अपने आप को इस श्रेणी में शामिल करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या इस सूत्र के लिये बड़ी स्फूर्तिदायक और समझने में आसान है)।
    • अज्ञ अर्थात वह जिसे थोड़ा भी स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि का ज्ञान न हो। हम स्वयं इसके लिये एक अच्छे उदाहरण है। ये वह हैं जिन्होंने अज्ञान और अयोग्यता के कारण स्व प्रयत्न (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, जिन्हें शास्त्र में भगवान से मिलने की प्रक्रिया माना है) का त्याग कर दिया है।
    • ज्ञानाधिकार का अर्थ है वह जो इन सभी अर्थात स्वरूप, उपाय, उपेय, आदि तत्वों में स्पष्ट हो और जो दूसरों को यह समझा सके। वह जो ज्ञान और अनुष्ठान से पूर्ण हो। हमारे पूर्वाचार्य इसके अच्छे उदाहरण है। वे पूर्ण ज्ञानी थे और स्वप्रयत्न के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम थे, परंतु यह जानकार कि स्वप्रयत्न और जीवात्मा का दास्य स्वभाव एक दूसरे से विपरित है उन्होंने स्वप्रयत्न का त्याग कर पूर्णत: भगवान की शरण हो गये।
    • भक्ति परवसर अर्थात वह जो भगवान के नामस्मरण को पूर्ण निष्ठा से करने मात्र से पिघल जाते हैं। आल्वार इसके लिये सही उदाहरण हैं। हालाँकि आल्वारों पर भगवान की निर्हेतुक कृपा है, भगवान के प्रति अति प्रेम और भक्ति के कारण ही वे स्वाभाविकता से स्वप्रयत्न कर नहीं पाते थे। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं “कलैवाय थुंबम कलैयातोलिवाय कलैकण मट्रिलेन” – आप मेरी विपत्ती दूर करो या नहीं मैं तो आपके शरण में हूँ – आपको मेरी रक्षा करनी ही है। वे आगे कहते है “उन्नालल्लाल यावरालुम ओंरुम कुरै वेण्देन .. उन थाल पिडित्ते सेलक्काणे” – मुझे दूसरों से आप के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहिये – मैं सर्वथा आपके चरण कमलों पर निर्भर रहूँगा।
  • मनुष्य धर्म के विपरित बर्ताव करना बाधा है। मनुष्य की विशेष योग्यता है कृत्य अकृत्य विवेक (इसका ज्ञान होना कि क्या करना है और क्या नहीं करना है)। इस आधार पर मनुष्य जीवन का उपयोग करना चाहिये। शास्त्र कहता है इधम कुरु (यह करो यह आपके लिये लाभप्रद है) और इधम माकार्षी: (यह मत करो यह हानिकारक है)। हमें इसे समझकर अपने जीवन में इसका पालन करने की कोशिश करनी चाहिये। सभ्यता और मानवता अर्थात यह सोचना कि “सभी को शान्ती और खुशी से रहना चाहिये” – ऐसा सच्चा हृदय सभी के पास होना चाहिये। इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये। इसके विपरित बर्ताव करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव गुणों को देखने से पूर्व हमें मनुष्य के सभी के प्रति सामान्य स्वभाव को जानना चाहिये। शिक्षित / सभ्य आचरण का अर्थ तत्वों और सम्मान के आधार पर जीवन व्यतित करना। और यह भी कहा गया है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन सभी जीवमात्र के लिये सामान्य है। सभी कीड़े, बिल्ली, कुत्ते, मानव जनों के लिये यह ४ तत्व किसी न किसी रूप में अस्तिव में रहते हैं। इस जीवन के जन्म मरण के चक्र से छुटकारा पाना मनुष्य में विशेष सामार्थ्य है। जिसे शास्त्रानुसार एक आचार्य द्वारा समझा जा सकता है। भगवान जीवात्मा को रचते समय कृपा कर शरीर और इन्द्रियाँ दिये हैं। वे इस शास्त्र को ब्रह्मा, ऋषि और आल्वारों के द्वारा बताते हैं। इन्द्रियों का प्रयोग कर मनुष्य इन तत्वों को समझकर और इस शरीर को कैंकर्य में लगा सकता है। अगर यह कर सकते है तो जीवात्मा का अध्यात्मिक कल्याण होगा। अगर नहीं कर सका तो उसे जो यह कृपा कर मानव शरीर प्राप्त हुआ है वह व्यर्थ हो जायेगा।
  • स्वयं को उपर उठाने के लिये स्व प्रयत्न करना बाधा है। प्रारम्भ में प्रपन्न धर्म की चर्चा हुई है। एक प्रपन्न को भगवान के पूर्ण शरण होना चाहिये और कभी भी स्वप्रयत्न नहीं करना चाहिये। यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव शेषत्व और पारतंत्रय के विपरित है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान पर पूर्ण निर्भर अर्थात किसी भी कीमत पर स्वप्रयत्न का त्याग करना। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें निरर्थक बैठकर कुछ भी कार्य नहीं करना है। इसका अर्थ है हमें कैंकर्य में लगना चाहिये परन्तु इसे कैंकर्य समझकर करना नाकि इसके बदले में कुछ प्राप्त होगा।
  • प्रपत्ति करने के पूर्व ही यह मांगना कि मैं पवित्र हो जाऊँ, यह बाधा है। भगवान को पूर्ण शरण के रूप में स्वीकार करने के लिये प्रपत्ति एक मानसिक स्थिति है। इसे कोई विशेष स्थान, समय, परिस्थिति, आदि की जरूरत नहीं है और इसे ऐसे ही अनुसरण किया जा सकता है। जब द्रौपदी मानहीन होने के खतरे में थी तो उसने पुकारा “हा कृष्णा! रक्षमाम शरणागताम” (कृष्ण! इस शरण में आये हुये आत्मा की रक्षा करों) पूरी तरह पूर्ण विश्वास से अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर – हालाँकि वह रजस्वला थी – फिर भी भगवान कृष्ण द्वारा उसकी रक्षा हुई। उसी तरह जब विभीषण भगवान श्रीराम के शरण में आये तब उसने स्नान भी नहीं किया था हालाँकि वह समुन्द्र के उपर ही था – उसने आकाश से ही भगवान की शरण ली। जब कोई पवित्र या अपवित्र हो तो वह उसी परिस्थिति में भगवान के शरण हो सकता है। प्रपत्ति प्राप्त करने के पूर्व किसी को भी अपनी स्थिति को बदलने की आवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” में प्रपत्ति के विषय पर विस्तार से चर्चा की गयी है। ३०वें सूत्र में इसी तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस विषय को सुन्दरता से स्पष्ट करते है। यह समझने की कोई बात नहीं है कि प्रपत्ति करने के पूर्व स्वयं को पवित्र करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोई यह आश्चर्य कर सकता है कि कोई प्रपत्ति करने के पूर्व पवित्र होने की जरूरत क्यों नहीं है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं और समझाते हैं कि द्रौपदी और अर्जुन (पहले के सूत्र में अर्जुन को शरणागति के पवित्र सिद्धान्तों के विषय में समझाया गया है कि इस मध्य में जो बहुत नीच व दीन हैं जिन्होंने देखा है कि स्वयं भगवान कृष्ण अर्जुन की सहायता कर रहे हैं फिर भी वे धर्मयुद्ध के विपरीत हैं।) को देख कोई यह सोच भी सकता है कि “मैं अपवित्र हो सकता हूँ ताकि मैं प्रपत्ति करने के लिये शिक्षित हो जाऊँ”। परन्तु इसकी जरूरत नहीं है और इसे करना भी नहीं चाहिये। बुनियादी तौर पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते हैं कि जानबूझ कर भी किसी भी परिस्थिति में हमें निषिद्ध कार्यों में नहीं लगना चाहिये। अगले सूत्र में इससे सम्बंधित श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी लंका जाने के लिये एक सुन्दर प्रमाण को दर्शाते हैं। जब श्रीराम स्वयं समुन्द्र की शरण होते है तब वें पहले स्नान करते हैं। श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी समझाते है कि भगवान श्रीराम के लिये स्नान करना स्वाभाविक है – यह प्रपत्ति का एक अंग नहीं है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि प्रपत्ति स्वतन्त्र उपाय है जो किसी की प्रार्थना पर निर्भर नहीं होती है।
  • नित्य कर्मानुष्ठान का त्याग करना जो भगवान के सेवक के लिये स्वाभाविक है बाधा है। नित्य कर्म का पालन करना यह आम नियम है। इसे भगवद आज्ञा कैंकर्य के रूप में देखा जाना चाहिये। हमें अपने नित्य कर्म (जैसे संध्या वंधन, आदि) का त्याग करने का कोई अधिकार नहीं है। इस विषय पर बहुत चर्चा हो चुकी है। इस पर ध्यान करो और स्पष्ट रहो। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ८२वें सूत्र में कहा गया है कि “तिरुक्कण्णमंगै आण्डान स्व व्यापारत्तै विट्टान” – तिरुक्कण्णमंगै आण्डान अपना सभी व्यक्तिगत कार्य का त्याग कर दिये। वे पूर्ण विश्वास के उपर स्थित थे और इसलिये स्व प्रयत्न का त्याग कर दिये। उपदेश रत्नमाला के ५५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “एल्लार्कुमण्डाददन्नो अदु” – श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्वों का बहुत कम जन पालन कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आण्डान अपनी स्व प्रयत्न के सभी कार्यों का त्याग कर पूर्णत: कैंकर्य में लग गये। नित्य कर्मानुष्ठान के तहत जब तक भगवद कैंकर्य में कोई रुकावट नहीं है उसे न चूके करना चाहिये। परन्तु जब हम भगवद कैंकर्य में लगे हुए होते है तब नित्य कर्मानुष्ठान को उस समय के लिये छोड़ सकते हैं। आचार्य हृदय के ३१वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है “…अत्ताणिच चेवकत्तिल पोधुवानधु नलुवुम” – जब भगवद / भागवतों की विशेष सेवा करते हैं तब सामान्य नियम का त्याग कर सकते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते है कि हमारे पूर्वाचार्य बिना चूके नित्य कर्मानुष्ठान करते थे इन सांसारिक जनों के प्रति दया रखकर जो वैदिक को देख पथभ्रष्ट हो जाते और वैदिक अनुष्ठान का त्याग कर देते है।
  • उन व्यक्ति के संग में रहना जो नित्य कर्मानुष्ठान नहीं करते है बाधा है। श्रीवैष्णव सन्यासी को भी शिखा, यज्ञोपवित, आदि को रखकर नित्य कर्मानुष्ठान करना चाहिये। यह कहा जाता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी १२० वर्ष की आयु में भी संध्या वंधन के समय खड़े होकर अर्ज्ञ देते थे। अनुवादक टिप्पणी: अगर यह नियम सन्यासी के लिये है तो अन्य जैसे गृहस्थ, ब्राह्मण, आदि का क्या कहना – उन्हें भी अपने अपने कर्मानुष्ठान करना चाहिये। जब हम ऐसे जनों के संग में रहते हैं जो कर्मानुष्ठान नहीं करते हैं तो हम भी उनके जैसे हो जाते हैं। इसलिये यह कहा जाता है कि ऐसे संगत से बचना चाहिये।
  • यह न जानना कि तिरुमन्त्र में फिर से जन्म लेना उत्तम जन्म है, बाधा है। तिरुमन्त्र में जन्म का अर्थ है ज्ञान जन्म – स्वयं के सच्चे स्वभाव का पवित्र ज्ञान को प्राप्त करना। तिरुमाला में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी, श्रीवेदांती स्वामीजी से कहते है कि “तिरुमंत्रत्तिले पिरंतु ध्वयत्तिले वलर्न्तु ध्वयैक निष्ठरावीर” – हमें तिरुमन्त्र में जन्म लेना चाहिये, द्वय महामन्त्र में बड़ा होना चाहिये और केवल द्वयम में हीं पूर्ण निष्ठा होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवेदांती स्वामीजी सन्यासाश्रम को स्वीकार करते है और अपने आचार्य श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के साथ रहने हेतु श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते है तब वे राह में श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी से भेंट करते है। उस समय श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी पर ग़ुस्सा कर कहते है कि आप गृहस्थ रहकर भी द्वय महामन्त्र में विश्वास रख, अपने आचार्य की सेवा कर सकते थे। हम नायनार के आचार्य हृदय के ३३वें चूर्णिकै में ज्ञान जन्म विषय के प्रारम्भ में इसे देख चुके है।
  • यह न जानना कि अन्य मंत्रों में जन्म लेने से हमारे स्वरूप की बहुत बड़ी हानी होगी। यह बाधा है। पिछले तथ्य में तिरुमन्त्र द्वारा दीक्षा को समझाया गया है – इसमें द्वय महामन्त्र और चरम श्लोक भी आते हैं क्योंकि वें तिरुमन्त्र के विस्तार / व्याख्या है। यहाँ अन्य मन्त्र का अर्थ है देवतान्तर के मन्त्र। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी में शुरू में हीं श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अन्य मंत्रों पर तिरुमन्त्र की स्तुति को समझाते है। पहले वे तीन मुख्य मन्त्र की महिमा को समझाते हैं – तिरुमन्त्र (अष्टाक्षरी), वासुदेव मन्त्र (तिरु द्वादक्षारी) और विष्णु मन्त्र (सदाक्षरी)। इन तीनों में तिरुमन्त्र को अधिक उच्च समझते है क्योंकि कि वे अर्थ-पञ्चक के स्वभाव को समझाते है – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, लक्ष्य और विरोधी को मूल तरिके से समझाते है। क्योंकि तिरुमन्त्र अन्य मन्त्र के मुक़ाबले अर्थ-पञ्चक को अधिक स्पष्टता से समझाता है इसलिये वह सर्वश्रेष्ठ है।
  • कोयिलिल वालुम वैष्णवन” – वह जो सेवा करता है, श्रीरंगम में रहता है और यह उसके लिये मुख्य पहचान है। यह न जानना बाधा है। यह श्रीरंगनाथ भगवान का श्रीरामानुज स्वामीजी को आदेश है – “यावच्चरिरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” – इस संसार में अपने बचे हुए समय को श्रीरंगम में खुशी से बिताओं। क्योंकि यह सभी के लिये सम्भव नहीं है इसलिये इसमें सभी दिव्य देशों को शामिल करना चाहिये। वैष्णव का यहाँ अर्थ है वह जो द्वय महामन्त्र की ओर स्पष्ट है। खरा अर्थात स्पष्ट ज्ञान होना और जो सीखा है उसको अभ्यास में लाना। श्रीवैष्णवों का आचरण इस तरह होना चाहिये कि हमारी पहिचान “परम सात्विक, परम प्रामाणिकर (आधिकारिक)”, आदि ऐसे होनी चाहिये। कृपया तिरुमालै के ३८वें पाशुर को देखिये – “…काम्बरत्तलै शिरैत्तुन कडैत्तलै इरुन्दु वालुम शोम्बरै उगत्ति…”। अनुवादक टिप्पणी: तिरुमालै के ३८वें पाशुर की स्तुति श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै स्वामीजी इस तरह करते है “विस्तारपूर्वक द्वय महामन्त्र कि व्याख्या”। विशेषकर पाशुर के इस भाग में स्वयं को उपायान्तर से पूरी तरह अलग करना दर्शाया है। स्वयं के केश (बाल) देना अर्थात अहंकार का त्याग करना क्योंकि पुराने जमाने में जब किसी को नीचा दिखाना होता तो उसके केश काट देते थे। उसी तरह हमें स्व प्रयत्न का पूर्ण त्याग कर अपनी रक्षा के लिये भगवान की शरणागति करनी चाहिये। ऐसे व्यक्ति को “चोम्बर” (आलसी) ऐसा समझाया गया है। परन्तु किसी को “वालुम चोम्बर” (हर्षित आलसी व्यक्ति) भी होना चाहिये – वह जो स्वयं के सच्चे स्वभाव को जान सकता है, भगवद/भागवतों के कैंकर्य में निरत होता है और उसके कारण आनन्द से रहता है। ऐसे जन भगवान को नित्यसुरियों के समान प्रिय है।
  • पहिचान / नाम / प्रतिष्ठा की प्राप्ति अपने गाँव / जाति / परिवार, आदि के कारण पाता है वह व्यर्थ है। यह न जानना बाधा है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ७८वें सूत्र में इसे समझाया गया है – “ग्रामलकुलाधिगलाल वरुम पेर अनर्त्त हेतु”। ग्राम अर्थात गाँव। कुल अर्थात जाति / परिवार। क्योंकि ऐसी आदत घमण्ड की ओर ले जाता है (उदाहरण कि तौर पर: “मैंने ऐसे दिव्य देश में जन्म लिया है” या “मैंने ऐसे महान आचार्य पुरुष परिवार में जन्म लिया है”) और अन्त में यह हमारे नम्र श्रीवैष्णव होने के स्वभाव को लुप्त करता है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीपाञ्चरत्न से अपने वाख्या के समर्थन में एक प्रमाण देते है। “एकांति व्यपथेश्तव्यो नैव ग्रामकुलाधिभि: विष्णुना व्यपथेश्तव्यो तस्य सर्वम स एव हि” – जो भगवान के पूर्ण शरण हो गया हो उसकी पहचान उसके जन्मस्थान या परिवार से नहीं होती है जहाँ उसने जन्म लिया है। उसकी पहिचान भगवान से सम्बन्ध से होता है। ऐसे भक्तों के लिये स्वयं भगवान ही उसके जन्मस्थान, परिवार, आदि हैं।
  • प्रपन्न जन कूटसत्तर परांकुश, आदि है। यह न जानना बाधा है। कूटस्त्त सामान्यतया एक परिवार रूपी पेड़ में सबसे पहिले व्यक्ति के लिये उपयोग करते है। आचार्य हृदय के ३६वें चूर्णिकै में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते है कि “विप्रर्क्कु गोत्र शरण सूत्र कुठस्तर पराशर पाराशर्य बोधायनाधिगल; प्रपन्न जन कुठस्तर परांकुश परकाल यतिवराधिगल” – ब्राह्मणों के लिये उनके मुख्य पूर्वज (उनके गोत्र, सरणा (वेद का एक भाग जिसे उन्हें पढ़ना है), सूत्र (शास्त्र का एक अंग जो कर्मानुष्ठान को दिशा निर्देश करता है)) ऋषियों जैसे पराशर, व्यास, बोधायन को मान सकते है; श्रीवैष्णवों के लिये जिन्होंने शरणागति के राह को चुना है उनके लिये श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी ही मुख्य पूर्वज है। वैदिक कर्मानुष्ठान को करते समय हमें प्रणाम, अभिवादन, आदि करना पढ़ता है। परन्तु प्रपन्नों के लिये उन्हें कभी भी आल्वरों और आचार्य के सम्बन्ध से पहचान बताना है क्योंकि यह वे है जिन्होंने जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को बताया है जो कि भगवद और भागवतों के दास बनकर उनके शरण होते हैं।
  • ऋषिगण जो अभी तक संसार में पारिवारिक जीवन में लगे है और जो श्रीवैष्णव होकर भी अपने पूर्वज के दिये हुए अब तक पत्ते खाते है। यह न मानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय के ५८ से ६२ चूर्णिकै में ऋषि और श्रीशठकोप स्वामीजी के मध्य के अन्तर को बड़ी सुन्दरता से दर्शाया गया है। चूर्णिकै ५८ – ऋषि वे हैं जो ध्यान, योग, आदि में लगे हुए रहते हैं और स्वयं को स्वपरिश्रम से एक उच्च स्थिति में ले जाते हैं। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी पर स्वयं भगवान ने निर्हेतुक कृपा किये है और भगवान के गुणों का ज्ञान होने के कारण वे उनके प्रति प्रेम और भक्ति से पूर्ण हो गये। चूर्णिकै ५९ – ऋषि बहुत बड़े ज्ञानी थे फिर भी संसार लगाव उनमें था (कई उदाहरण है जहाँ बड़े साधु सांसारिक चाह के कारण पकड़े गये है और अन्त में उस परिस्थिति से बाहर आते और फिर पकड़े जाते)। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी सांसारिक चाह से पूरी तरह पृथक थे। चूर्णिकै ६० – उच्च जीवन के रहन सहन के कारण ऋषि वन में रहकर कच्चे फल, सब्जी, पत्ते, जल और कभी कभी हवा भी पाते है। परन्तु श्रीशठकोप स्वामीजी निरन्तर भगवान कृष्ण का स्मरण करते रहे – वे स्वयं श्रीसहस्रगीति में कहते है “उण्णुम सोरु परुगुम निर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन” – मेरा प्रसाद, जल, ताम्बूल सभी कृष्ण हीं है। चूर्णिकै ६१ – अपने पुत्र के बिछड़ने से जो दुख होता है (व्यासजी को बड़ा दुख हुआ जब उनका पुत्र सुखा उन्हें अकेला छोड़ चला गया) वह दुख श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान से बिछड़ने से महसूस करते है। चूर्णिकै ६२ – हालाँकि ऋषि बहुत समझदार होते हैं परन्तु कभी कभी फलान्तर, साधनान्तर और देवतान्तर के प्रति अपना लगाव प्रगट कर देते है। परन्तु आल्वार पूरी तरह भगवान के प्रति अपने कैंकर्य की ओर निरत थे। केवल भगवान ही उपाय और उपेय और केवल भगवान की अर्चा विग्रह हीं पूजनीय हैं। ऋषि और आल्वार के इस भेद के कारण ही प्रपन्नों के लिये अपने पूर्वज ही आल्वार और आचार्य हैं इसे स्वीकार करना चाहिये।
  • श्रीसहस्रगीति को पूरे ध्यान से न पढ़ना और उसमें बताये हुए तत्वों का पालन न करना जो हमें एक सच्चा श्रीवैष्णव बनाता है, बाधा है। आचार्य हृदय के ३७ चूर्णिकै में अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार यह समझाते है कि “अध्ययन ज्ञान अनुष्ठानंगलाले ब्राह्मणयमागिराप्पोले चंदनगलायिरमुम अरियक कट्रु वल्लारानाल वैष्णवत्व सिद्धि” – जैसे एक ब्राह्मण का ब्राह्मणत्त्व वेदों के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है वैसे ही एक वैष्णव की वैष्णवता श्रीसहस्रगीति के अध्ययन और उसके तत्वों के पालन से स्थापित होता है। यहाँ अरिया का अर्थ है एक आचार्य से श्रीसहस्रगीति का अध्ययन करना; कर्रु का अर्थ एक आचार्य से भगवद विषय कालक्षेप का अध्ययन करना; वल्लार का अर्थ है वह जो अपने स्वयं के जीवन में सीखे हुए तत्वों को अपने जीवन में उतारना। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियककट्रु वल्लार वैट्टणवर आल्कदल ज्ञालत्तुल्ले” – जिसने श्रीसहस्रगीति का अर्थानुसन्धान किया है और जो इसको अपने जीवन में उतारता है वही इस संसार में वैष्णव माना गया है।
  • यह न जानना कि किसी का वर्ण जो घमण्ड की ओर ले जा सकता है और भागवत अपचार कराता है। इसका त्याग न करना बाधा है। कोई भी वर्ण का क्यों न हो एक वैष्णव अर्थात वह भगवद और भागवतों के कैंकर्य में निरत होना चाहिये। एक उच्च वर्ण में जन्म लेने का घमण्ड होना भागवत अपचार कराता है और इसलिये इस बर्ताव का त्याग करना चाहिये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुमला गये तब श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी (जो उनके मामाजी और आचार्य थे) स्वयं बाहर आकर उनका स्वागत किये। जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने पूछा किसी ओर को क्यों न भेजा तो उत्तर दिये कि “जब मैंने देखा तो मुझसे हीन और कोई नहीं दिखा” – यह उनकी नम्रता थी। अनुवादक टिप्पणी: “श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र” के २०७ से २१७वें सूत्र में इस विषय पर चर्चा विस्तार से हो गयी है। शास्त्र में सामान्यता वेदाध्यन जो भगवद विषय पर केन्द्रित है ब्राह्मण वर्ण  को उत्कृष्ठ माना गया है। परन्तु केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेना और इसका पालन करने से भी घमण्ड आ सकता है। इसलिये श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह स्थापित किये कि “जन्म जो घमण्ड का कारण हो” वह निकृष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य होने से उपायान्तर (अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति, आदि) में भी लगा सकते है ताकि वे वेदाध्यन करे। अत: में वों घोषित करते हैं कि “जन्म जो नम्रता प्रदान करता है और उपायान्तर से दूर रखता है वही उत्कृष्ठ जन्म है”। आचार्य हृदय के ८५ चूर्णीकै में अजगिया मणवाल पेरुमाल नायनार इस तत्व को विस्तार से समझाते हैं। यह बड़ा पेचिदा पहलू है – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या को कालक्षेप की तरह एक आचार्य के सन्निधी में उसका गूढ़ार्थ समझने हेतु सुनना चाहिये।
  • यह न जानना कि वर्णाश्रम प्रथा जिससे उपायान्तर में आसानी से कार्य रत हो सकते हैं और अपने आप को शिष्ट या नम्र मानता है (प्राकृतिक नम्रता के बदले) नीचता है बाधा है। श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है “नैच्यम जन्म सिद्धम” – नम्रता एक स्वाभाविक गुण है। जीवात्मा स्वाभाविकता से ही नित्य भगवान का सेवक है। हम किसी भी वर्ण में क्यों न हो हममें स्वाभाविक नम्रता होनी चाहिये उसे कल्पना नहीं करना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी भी कहते हैं “नीर नुमधु एनरिवै वेर मुधल माय्त्तु” – हमें पूरी तरह अपना अहंकार और ममकार का त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण के २१५वें सूत्र में यह समझाया गया है कि क्षुद्र वर्ण के लिये नम्रता जो सच्ची भक्ति के लिये आवश्यक है वह उनमे स्वाभाविक गुण है और इसी कारण से वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं है, उपायान्तर में कोई सम्बन्ध नहीं है – इसलिये वैष्णव बनने के लिये वें अधिक योग्य है। अन्य वर्ण में यह सम्भव नहीं है। हमें घमण्ड का त्याग कर भगवान और भागवतों का नम्र दास बनना चाहिये।
  • यह न जानना कि जन्म जो हमें पूर्ण उपायान्तर से दूर कर देता है और स्वाभाविक नम्रता प्रदान करता है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है हमें स्वाभाविक नम्रता की चाहना करना चाहिये और भगवान की शरण होना चाहिये – केवल ऐसे व्यक्ति श्रीवैष्णव बनने के योग्य है।
  • यह न जानना कि छोटे जनों के दोष बड़े लोगों के पवित्र दृष्टि से पराजित हो जाते है, बाधा है। जब महान श्रीवैष्णव किसी की ओर करुणा से देखते है तब उस मनुष्य के सभी दोष मिट जाते है। जब एक श्रीवैष्णव का लड़का पथभ्रष्ट होकर जाता है और लौटने पर पवित्र हो जाता है तो उसके पिताजी पूंछते है कि “क्या तुम्हें श्रीकुरेश स्वामीजी ने देखा और यह कृपा किये?” – पवित्र श्रीवैष्णवों की ऐसी योग्यता है जो सभी दोष और अशुभ को मिटा देते है।
  • अहंकार, आदि दोषों को निकाले बिना पवित्र श्रीवैष्णवों के संग में रहना और उन्हें पीड़ा पहुँचाना बाधा है।
  • दिव्य रत्न जैसे श्रीवैष्णवों पर शंका करना और उनकी योग्यता पर सन्देह करना बाधा है। वर्ण की पहचान किये बिना पवित्र श्रीवैष्णवों को दिव्य रत्न कहते है। हमें कभी भी उन पर सन्देह नहीं करना चाहिये नाही दूसरों को पवित्र करने की उनकी योग्यता पर सन्देह करना चाहिये। हम यहाँ स्मरण कर सकते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं स्नान के पश्चात श्रीदाशरथी स्वामीजी के कन्धो को पकड़ते थे जो बाह्मण नहीं थे। इसलिये उनकी पवित्रता पर कोई शंका नहीं है।
  • यह न मानना कि ऐसे महान ज्ञानी हमारे आचार्य से भी अच्छे और भगवान से भी बड़े है, बाधा है। एक बार जिसे भगवद विषय में विश्वास हो गया हो चाहे वह किसी वर्ण, परिवार, आदि का क्यों न हो – उसे एक बार हमारे आचार्य के बराबर सम्मानित किया जाना चाहिये। वे भगवान से भी बड़े है। पेरिय तिरुमोळि में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “निन तिरुवेट्टेलुत्तुम कट्रु यानुट्रतु उन्नडियार्क्कु अडिमै” – तिरुमन्त्र सीखने के पश्चात मैंने यह समझा है कि मैं आपके दासों का दास हूँ। सामान्यतय भागवतों को भगवान से भी अदिक पूजना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी “नेदुमारकदिमल” पादिगम में यह स्थापित करते है कि भागवत जन हीं उनके स्वामी है और “पयिलुम चुडरोलि” पादिगम में यह प्रमाणित करते है कि भागवत जन उनके कैंकर्य के पदार्थ है। आगे कहते है “पयिलुम चुडरोलि मुर्त्तियैप पंगयक कण्णनै पयिल इनिय नम पारकडल चेरन्ध परमनै पयिलुम तिरुवुदैयार यवरेलुम अवर कण्डीर्पयिलुम पिरप्पिदै थोरु एम्मै आलुम परमरे” – वह जो भी हो अगर वह दीप्तिमान भगवान जिनके कमल नयन हो और जो क्षीरसागर में विराजमान हो उनकी पूजा करता हो ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से मुझे नियन्त्रण में रख सकता है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २२२वें सूत्र से आचार्य साम्यम के तत्व और भगवान से भी बड़ा को समझाया गया है। यहाँ वह समझाते है कि आचार्य स्वयं शिष्य को दिशानिर्देश करते है कि अन्य श्रीवैष्णव को स्वयं आचार्य जैसे अच्छा मानने के लिये, सभी शिष्यों को आचार्य के समान मानना। आगे कहते हैं श्रीवैष्णव भगवान से उच्च है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इन पहलू को अपने व्याख्या में स्थापित कर समझाते है। वह कहते है जीवात्मा को भगवान कभी कभी उसके कर्म के आधार पर इस संसार में रखते है परंतु श्रीवैष्णवों को अपने निर्हेतुक दया कृपा से मोक्ष ही प्रदान करते है। जब जीवात्मा भगवान के शरण आते हैं तो भगवान अम्माजी के पुरुषाकार से ही स्वीकार करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव उनके निकट आते ही उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। भगवान जो दिव्य देशों में अर्चा रूप में विराजमान हैं जहाँ वे किसी से वार्ता नहीं करते हैं परन्तु श्रीवैष्णव दूसरों के स्वभाव अनुसार उनसे उचित कैंकर्य करवाते है। इसलिये भगवान से भी अदिक स्तुति श्रीवैष्णवों की होती है।
  • वैष्णव होकर देवतान्तर में थोड़ा भी लगना बाधा है। देवतान्तर सम्बन्ध वैष्णवों के लिये दाग है। यह केवल वैष्णवता को नष्ट करेगा। इसलिये इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इससे सम्बंधित हम कई घटनायें देख चुके है। एक बार श्रीरंगनाथ भगवान की सवारी के समय ज़ोर वर्षा हो रही थी और उन्हें एक मण्डप में ले जाया गया जो कि तिरुवानैक्कावल शिवजी का मन्दिर था। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी अन्दर नहीं गये और कहा कि “भगवान स्वतन्त्र हैं वे कही भी जा सकते हैं परन्तु हम उनके सेवक हैं इसलिये हम देवतान्तर के मन्दिर में नहीं जा सकते है”। श्रीधनुर्दास स्वामीजी के भतीजे जो पक्के श्रीवैष्णव थे उन्हें धोखे से जैन मन्दिर में ले जाया गया जो विष्णु का मन्दिर जैसे दिखता था। जब उन्हें यह पता चला तो दोनों मूर्छित हो गये और जब श्रीधनुर्दास स्वामीजी की चरण रज उनके माथे पे लगायी गई तब उन्हें होश आया। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को एक बार अनुमान हुआ कि उनका अवैष्णव से सम्पर्क हुआ तो उनकी माता की सलाह से उन्होंने एक ब्राह्मण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर स्वयं को पवित्र किया। ऐसी कई घटनायें हैं जहाँ हमारे पूर्वाचार्य देवतान्तर सम्बन्ध से बचे हैं।
  • अन्य के जन्म के प्रथा का पालन कर स्वयं के सम्प्रदाय के विश्वास को खोना बाधा है। जब कोई वैष्णव बनता है तो दूसरे धर्मों की ओर लगाव का त्याग करना चाहिये। उदाहरण के तौर पर भस्म, आदि लगाना हमारा वैष्णव सम्प्रदाय के प्रति आस्था को कम करता है। अनुवादक टिप्पणी: इसे स्वधर्म पालन करने का एक पहलू ऐसे भी देखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक श्रीवैष्णव अगर वह ब्राह्मण है तो उसे अपने नियमानुसार रहना चाहिये नाकि एक क्षत्रीय या वैश्य के नियमानुसार रहना चाहिये। हम जिस किसी भी वर्ण में रहे उस वर्ण में रहकर भी श्रीवैष्णवता का पालन कर स्पष्ट रूप से नम्रता, पूजा, सेवा, आदि से रह सकते है। हमें वर्ण बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि शास्त्र का यह अपमान कर केवल गड़बड़ी होगी। हमारे पूर्वाचार्य भी केवल वैष्णवता और वर्णाश्रम धर्म को महत्त्व देने को कहे है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/08/virodhi-pariharangal-34.html

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