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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४१

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४०)

७२) तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – 2

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – श्रीभूतपुरी

पिछले अध्याय से हम तत्व विरोधी विषय पर आगे की चर्चा करेंगे। ऐसे अनेक विषयों को जानने के लिये हमें गहरा ज्ञान होना जरूरी है जिसे हम शास्त्रों के सुव्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त कर सकते हैं। विषय कि सम्पूर्ण वह गहरी ज्ञान के लिये आचार्य के मार्गदर्शन में इन सिद्धान्तों का अध्ययन करना चाहिये।

  • पदार्थ का परिवर्तन अपने ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड से बाहर दूसरे ब्रह्माण्ड में चेतन की इच्छा से होता है, यह न समझना बाधा है। सभी अचित्त हमारे और दूसरे ब्रह्माण्ड में जो हमारे ब्रह्माण्ड से बाहर हैं (सभी भांति के ब्रह्माण्ड को मिलाकर लीलाविभूति – संसार कहते हैं) में जो परिवर्तन होता है वह परम चेतन (भगवान – श्रीमन्नारायण) की इच्छा से होता है। चांदोग्य उपनिषध कहता है “तधऐक्षत – बहुस्याम प्रजायेयेती” – मुझे मेरे रंग बिरंगे आविर्भाव को देखने दो। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टी जो भगवान के सर्वोच्च चेतानन है (ज्ञान पुरुष) भगवान के संकल्पानुसार होती है। श्रुति कहती है “नित्यो नित्यानाम चेतनश चेतनानाम” – शाश्वतों में शाश्वत और ज्ञानियों में ज्ञानी। अन्य कई स्थानों में “बहु श्याम” से सम्बोधित करते हैं और प्रमाणित करते हैं कि सृष्टि भगवान के संकल्प का परिणाम है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “मुन्नीर् ज्ञालम पडैत्त एम मुगिल्वन्णने” – जो बादल कि तरह है (शाम वर्ण और दयालु स्वभाव)! – आपने इस ब्रह्माण्ड कि रचाना किये है जिसमें तीन प्रकार के जल हैं। यहाँ पर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी की दैविक भावनाओं को दर्शाते हैं। वें कहते हैं कि भगवान द्वारा इस ब्रह्माण्ड कि रचना के लिये श्रीशठकोप स्वामीजी उनको धन्यवाद देते है, इसलिये सभी जीवात्मा (स्वयं के सहित) को उपयुक्त शरीर, इंद्रियाँ, आदि हैं जिससे वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं और अन्त में वे ऊपर उठाये जाते हैं। फिर भी श्रीशठकोप स्वामीजी दर्शाते हैं कि ऐसा अवसर व्यर्थ हो जाता है क्योंकि इस शरीर का हम भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये ही प्रयोगे में लेते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि केवल भगवान की दैविक ईच्छा ही है जो इस सृजन के द्वारा जीवात्मा की उन्नति में सहायता करती है।
  • यह न मानना कि ब्रह्माण्ड परिणाम अद्वारक भगवद संकल्प अधिनम (भगवान के दिव्य ईच्छा के अधीन है) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहले समझाया गया है यहाँ दो प्रकार की सृष्टी है – अद्वारक सृष्टी और सद्वारक सृष्टी। अद्वारक सृष्टी सूक्ष्म द्रव्य से पूर्ण द्रव्य के रूप में बदलाव है और यह सीधे भगवान द्वारा किया जाता है। इसके पश्चात जो रंग बिरंगी स्वरूप आदि का उत्पत्ति स्वयं भगवान ब्रह्माजी, आदि द्वारा उत्पन्न करवाते हैं। उसी तरह विनाश के समय भगवान पहिले रंग बिरंगी स्वरूप का विनाश रुद्र, अग्नि, आदि के द्वारा करवाते हैं। अन्त में वें सभी पदार्थ को ग्रहण करते है और उसे सूक्ष्म पदार्थ में परिवर्तित करते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है।
  • यह न जानना कि सभी तत्व भगवद आत्मकम (भव्य आत्मा की तरह वास करना जो भगवान द्वारा सर्व व्यापी है) हैं वाधा है। नारायण सूक्त से यह स्पष्ट है कि “अंतर बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणस्थित:” – नारायण सबके अन्दर और बाहर व्याप्त हैं और सबको एक साथ बाँधकर रखते हैं। “सर्वभूतांतरात्मा” सभी के तत्त्वों के अन्दर निवास करनेवाली आत्मा। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्म (भगवान) इस संसार में रहनेवाले सभी जीवों की आत्मा में निवास करते हैं। भूत शब्द का मूल है “भू सततायाम” – वह जिसका अस्तित्व है। जिसका भी अस्तित्व है वह भगवान द्वारा है। यह भगवान की अंतर्यामी रूप में विध्यमानता है जो पदार्थ के अस्तित्व को बनाये रखते हैं। शास्त्र कहते हैं “यस्य आत्मा शरीरम, यस्य पृथ्वी शरीरम, …” – जीवात्मा भगवान के लिये शरीर है, पृथ्वी भगवान के लिये शरीर है, आदि। यहीं तत्व श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “परंध तण परवैयुल नीर तोरूम परंधुलन परंध अण्डम इधेन नील विसुम्बु ओलिवर करंध सील इडं थोरूम इडं थिगल पोरुल थोरूम करन्धेंगुम परंधुलन ईवै उण्ड करने” – भगवान सागर के ठण्डे जल के छोटी से बूँद में जिस तरह आराम से व्याप्त हैं उसी तरह इस विशाल ब्रह्माण्ड में भी स्वयं आराम से निवास करते हैं।
  • सभी तत्व हमारे लिये अनुकूल हैं क्योंकी उनमें स्वयं भगवान व्याप्त है इसलिये वें अनुकूल हीं हैं।
  • कुछ तत्व देखने में हमारे लिये अनुकूल नहीं होते हैं क्यों कि स्वयं को उस वस्तु की तरह संभ्रम समझते हैं यह बाधा है। यह केवल हमारी अज्ञानता दशा है कि हम अपने शरीर को ही आत्मा मानते हैं और यह विचार करते हैं कि वह हमारे प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: यह और इससे पहिले कि बात एक दूसरे से सम्बंधीत है। इसे थोड़ा हम समझें। जिसने जीवात्मा के लक्षणों को सही तरीके से समझा है, वह यह समझात है कि प्रतिकूल रूप से जीवात्मा सुखद है। यह तत्व तत्वत्रय के ७३ से ७६ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने बहुत ही सुन्दरता से समझाया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपनी व्याख्या में बड़े विस्तार से समझाया हैं। ७३वें सूत्र में कहते है कि सच्चे ज्ञान को पूर्ण विस्तार से देखेंगे तो लगेगा कि सुख खुशी का ही परिणाम है और यह जीवात्मा के सही लक्षणों के अनुकूल है। अगले सूत्र में वे समझाते हैं कि विष, हथियार, आदि दिखने में प्रतिकूल लगते हैं क्योंकी हमें शरीर और आत्मा के विषय में भ्रम है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि किसी को भी विष, आदि से ३ कारणों से भय लगता है – अ) यह समझना कि शरीर और हम स्वयं एक ही हैं और यदि कोई शरीर को प्रभावित करती है तो हमें स्वयं को भी प्रभावित करती है; आ) हमारे स्वयं के कर्म जो विचारों की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और इ) यह सच्चा ज्ञान न होना की विष, शस्त्र, आदि में वही भगवान व्याप्त हैं जो स्वयं में और शरीर में व्याप्त हैं। अगले सूत्र में वें समझाते हैं कि क्योंकि सभी तत्वों में भगवान व्याप्त हैं तो स्वाभाविक रूप से वे सहायक ही होंगे और उन्हें प्रतिकूल समझना यह अवधारणा संयोगवश ही है। इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई प्रमाण दिये हैं। अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। ७४वें सूत्र में वें कहते हैं “यदि कोई वस्तु अपने लिये अनुकूल है उसके लिये कोई दूसरा कारण भी हो सकता है (वह कारण जो भगवान में व्याप्त है उसे छोड़), एक निश्चित समय में वहीं चन्दन का लेप, पुष्प, आदि, किसी के लिये अनुकूल हो सकते हैं लेकिन कोई दूसरी जगह या समय में उसी के लिये यह प्रतिकूल हो सकती है या किसी ओर के लिये उसी स्थान या समय में पदार्थ प्रतिकूल हो सकती है – यह ऐसा नहीं होना चाहिये”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे अच्छी तरह समझाते हैं। किसी व्यक्ति के लिये चन्दन का लेप गर्मियों में अनुकूल है परन्तु वहीं चन्दन का लेप उसी व्यक्ति के लिये ठंड में प्रतिकूल है। उसी तरह एक तंदूरस्त व्यक्ति को गर्मियों में चन्दन का लेप अनुकूल रहता है लेकिन उसी गर्मी के मौसम में यदि कोई दूसरे व्यक्ति को बुखार है उसके लिये चन्दन का लेप प्रतिकूल हैं। इसलिये चन्दन के लेप का ठण्डक का लक्षण स्वयं यह तय नहीं कर सकता है कि वह किसी के लिये अनुकूल है या नहीं – परन्तु यह जिस व्यक्ति के शरीर को लगाना है उसके शरीर कि दशा तय करती है। इसलिये सच्चा अनुकूल चन्दन के लेप में व्याप्त है और कल्पित अनुकूल लक्षण उसके शरीर के सहयोग पर आधारीत है। और जब किसी को सही जानकारी हो जाती है कि यह शरीर भगवान का है – उस पर भगवान की कृपा होगी चाहे वे किसी भी शारीरिक अवस्था में क्यों न हो।
  • यह न जानना कि नित्य विभूति नित्य है भगवान के नित्य इच्छा के कारण – बाधा है। नित्य विभूति – श्रीवैकुण्ठ। इसके विपरीत लीला विभूति जिसका इस भौतिक क्रिया के एक हिस्से के रूप में निरन्तर सृजन और विनाश होता रहता है और जो बिना किसी भौतिक बदलाव के निरन्तर है उसे नित्य कहते हैं। इसका मूल भूत कारण भगवान का संकल्प है। अनुवादक टिप्पणी: नित्य विभूति – परमपदधाम के लक्षणों को पहिले कई ग्रन्थ में समझाया गया है। विष्णु सूक्तम कहता है “तद विश्णोर परमं पदम सदा पश्यंती सुरय:” – भगवान विष्णु के श्रेष्ठ महल में निरन्तर नित्य सूरिगण इनका दर्शन करते हैं। लिंग पुराण कहता है “वैकुंठेतु परे लोके … आस्ते विष्णुरचींत्यात्मा” – वैकुण्ठ में भगवान श्रीमन्नारायण और अम्माजी के सेवा कई भक्त करते हैं। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न में वैकुण्ठ का बड़ी सुन्दरता से वर्णन करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीवैकुण्ठ गध्य में भी इसको समझाते है। यह परमपदधाम को भगवान श्रीमन्नारायण का नित्य और आध्यात्मिक तिरुमाली ऐसा समझाते हैं।
  • अप्राकृत अचित्त (पवित्र पदार्थ) में बदलाव शुद्ध रूप से भगवान की ईच्छा के आधार पर होता है यह न जानना बाधा है। अचित्त जिसे परमपद में देखते है वह उसी तरह इस भौतिक संसार में नहीं दिखता है। यह पवित्र पदार्थ है जो शुद्ध सत्वम हैं। भगवान के इच्छानुसार वह कई रूप धरण करता हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में विस्तार से परमपदधाम के तत्वों को समझाते हैं। इसे सही आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करना चाहिये।
  • पवित्र पदार्थ में सूक्ष्म और स्थूल अवस्था जो इस भौतिक संसार में पाँच तत्वों से है इसे न समझना बाधा है। यह पवित्र पदार्थ पंच उपनिषध (जैसे भौतिक संसार में यह पदार्थ पाँच तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश से बने है) से बने हैं ऐसा कहा गया है। इसलिये वे जैसे भौतिक संसार में दिखते हैं वे वैसे पदार्थ नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: सांसारिक पदार्थ जीवात्मा के सही लक्षणों को ढक देता हैं और अज्ञानता से जीवात्मा को उत्तेजित करते हैं। परन्तु परमपद के दिव्य पदार्थ ज्ञान बढ़ाने में सहायक होते हैं और जीवात्मा जो वहाँ हैं इनके लिये अधिक सुख वह आनन्द देते हैं।
  • भगवान के दिव्य रूप इन दिव्य पदार्थ (जो पंच उपनिषध से बनी है) से बनी है यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया भगवान के दिव्य रूप पाँच विभाग के भीतर समझाये जाते हैं – पर, व्यूह, विभव, अर्चा, अन्तर्यामी। इन सभी स्थितियों में जहाँ कहीं भी भगवान का स्वरूप है वहाँ हमें यह समझना आवश्यक है कि यह सभी भगवान के दिव्य पदार्थ से बना है। यहाँ से प्रारम्भ कर हमारा ध्यान ईश्वर तत्व, उनके रूप और दिव्य सहायक पर केन्द्रित होता है।
  • भगवान के यह रूप उनके ६ गुणों को दर्शाते हैं, यह न जानना बाधा है। भगवान के यह सभी स्वरूप भगवान के दिव्य पदार्थ से बने हैं जो भगवान के सच्चे गुणों को दर्शाते हैं और अपनी ज्ञान को बढ़ाते हैं। मुख्य ६ गुण हैं ज्ञान, बल, वीर्य, ऐश्वर्य (धन, सभी को नियंत्रण करने योग्य), शक्ति, तेज। शेष भगवान के गुण इन्हीं मुख्य गुण से उत्पन्न होते हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवान का अक्षरश: अर्थ है वह जो इन ६ गुणों से परिपूर्ण हैं। इसलिये श्रीमन्नारायण ही हैं जो इन ६ गुणों के पूर्ण रूप से स्वामी हैं वे ही एक मात्र योग्य है जिन्हें भगवान कह सकते हैं। और किसीको जिन्हें भगवान कहते हैं (श्रीपराशर, श्रीव्यास, आदि) यह उनके प्रशंसा मात्र के लिये – सत्य में नहीं – क्योंकि दूसरे किसी में भी यह ६ गुण नहीं पाये गये हैं। भगवान के दिव्य स्वरूप उनके गुणों को स्पष्ट करते हैं।
  • हालाँकि भगवान और नित्य सूरिगण दोनों एक श्रेणी में हैं, फिर भी भगवान का स्वरूप एक विशेष है जो उनके तेजस्वी गुण के कारण है। यह न जानना बाधा है। श्रीअनन्त, श्रीगरुड़जी, श्रीविश्वकसेनजी, आदि नित्य मुक्त हैं। इनमे कोई भेद नहीं जैसे सांसारिक दुनिया के वर्णों में देखा जाता है। उनके स्वरूप भी विशेष हैं। क्योंकि उनका स्वरूप दिव्य पदार्थ से बना है उनका रूप उनके द्वारा किये गये कैंकर्य पर आधारित है। उदाहरण के लिये श्रीअनन्त शेष रूप धारण करते हैं, श्रीगरुडजी पक्षी का रूप और श्रीविश्वकसेनजी  मनुष्य रूप धारण करते हैं। यहाँ गजमुख (हाथी के सिर वाला मानव), सिंहमुख (सिंह के सिर वाला मानव), पुरुष नौकर, महिला नौकर, आदि। परन्तु हमें यह जानना चाहिये कि संसार कि तरह परमपदधाम में स्त्री-पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: विशिष्ट कैंकर्य के लिये नित्यसूरि विभिन्न रूप धारण कर सकते हैं और करते भी हैं। जैसे हमने पहिले देखा हैं परमपद में सभी पदार्थ दिव्य हैं और जैसे कि हम भौतिक संसार में देखते है वे पदार्थ बहुत ही भिन्न हैं। यह भी जानना आवश्यक है कि नित्यसूरि भगवान से स्पष्ट रूप से अलग हैं – जैसे नित्यसूरि जीवात्मा हैं और भगवान परमात्मा हैं। यह भी भगवान की दिव्य इच्छा है जिसके कारण नित्यसूरि अनन्तकाल तक मुक्त हैं। चांदोज्ञ उपनिषद में बताया गया है कि भगवान का स्वरूप तेजोन्मय बहुत ही प्रफुल्लित और आश्चर्य चकित करनेवाला स्वर्णिय स्वरूप है।
  • यह न जानना कि भगवान के रूप उनके अवतार के समय परमपदधाम में जो दिव्य पदार्थ हैं से बने हैं और यह न जानना कि शिवजी, आदि ने अपना रूप भगवान कि दिव्य इच्छा से प्राप्त किये हैं और यह सोचना कि भगवान का दिव्य रूप “सामान्य पदार्थ” से बना है। यह सभी बाधा है। उनके अर्चावतार रूप को इच्छगृहित अप्राकृत दिव्य मंगल विग्रह कहते है – वह दिव्य स्वरूप जिनको भगवान ने अपनी स्वयं की इच्छा से धारण किये हैं। हालाँकि यह रूप दिखने के लिये मनुष्य कि तरह है लेकिन वह उस पदार्थ से नहीं बना है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ४ अध्याय में हमने देखा हैं कि स्वयं भगवान अपने अवतार रहस्य को कई श्लोकों में दर्शाते हैं। भगवद्गीता के ४.९ में वें स्वयं कहते हैं – “जन्म कर्म च दिव्यमेवं” – मेरा जन्म और कार्य दोनों दिव्य हैं। गीता में स्वयं भगवान ९.११ में कहते हैं – “अवजानन्ति मां मूढा” – अज्ञानी जन मेरे अवतार के समय मेरी श्रेष्ठता को नहीं समझते है और मेरी निन्दा करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में ३०३ और ३०४ सूत्र में विस्तार से भगवत अपचार को समझाते हैं। इनमें से जो भगवान के अवतार को मात्र एक नश्वर मानव रूप समझना अपचार है। जब कि भगवान यह पवित्र रूप अपनी इच्छा से धारण करते हैं और अन्य देवता जैसे ब्रह्माजी, शिवजी, इन्द्र, आदि ऐसे पद हैं जिन्हें जीवात्मा इन रूप को धारण करके कई अन्य क्रियायें करते हैं। इसलिये इन संसार में जीवात्मा अपने कर्म के आधार पर और भगवान की इच्छा से ऐसे महत्त्व पूर्ण पदों को पाते हैं।
  • सभी चित्त और अचित मिलकर भगवान का शरीर बनाते हैं, यह न जानना बाधा है। जैसे “सर्वं विष्णुमयम जगत” में समझाया है – इस भूमण्डल में सबकुछ विष्णु में व्याप्त है – जो कुछ हम देखते सुनते हैं, भगवान अन्तर्रात्मा है – सब कुछ भगवान श्रीमन्नारायण के अंश है। अनुवादक टिप्पणी: हमने नारायण सूक्तम में देखा है “अंतर बहिश्च तत सर्वं व्याप्य नारायण स्तिथ:” और श्रीरामायण का श्लोक हैं “जगत सर्वं शरीरम ते”। विष्णु का अर्थ है जो सर्वव्यापी है इसलिये श्रीमन्नारायण ही सभी तत्त्वों में सर्वोच्च आत्मा के रूप में निवास करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-41.html

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