तत्व त्रय – ईश्वर

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

तत्व त्रय

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c21f8-srirangan

ज्ञानपूर्ण व्यक्तियों के शिक्षण के द्वारा ईश्वर तत्व को समझना

भूमिका

प्रथमतय भगवान के स्वरुप (विशिष्ट स्वरुप) को विस्तार से समझाया गया है। यह भी स्वतः ही स्थापित किया गया है कि वह अन्य सभी तत्वों से पुर्णतः भिन्न है।

स्वरुप – स्वरुप से ईश्वर

  • किसी भी अमांगलिक गुण से रहित (अर्थात सदा सभी दिव्य और कल्याण गुणों से परिपूर्ण है)
  • असीमित है,
    • समय/ काल के संदर्भ में – अर्थात भगवान नित्य/ अनादी है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी में उपस्थित है
    • स्थान के संदर्भ में – लौकिक और पारलौकिक संसार सभी स्थानों में उपस्थित है– सर्वव्यापी स्वरुप
    • जीवों/ वस्तुओं के संदर्भ में – अर्थात सभी में अन्तर्यामी परमात्मा
  • संपूर्ण ज्ञान और अपरिमित आनंद का भण्डार है,
  • अनेकों दिव्य कल्याण गुणों से परिपूर्ण है जैसे ज्ञान, बल, आदि,
  • वह है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, पोषण और संहार सभी को पुर्णतः नियंत्रित करते हैं,
  • वह है, जो 4 प्रकार के साधकों का आश्रय है (जैसा की श्रीमद भगवत गीता के 7.16 प्रकरण में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं)-
    • आर्त: – आकुल/ संतप्त
    • अर्थार्ती – वह जो नई संपत्ति को चाहता है
    • जिज्ञासु – वह जो कैवल्य को चाहता है
    • ज्ञानी – सच्चा भक्त
  • वे, जो चार प्रकार के पुरुषार्थ प्रदान करते हैं – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
  • वह जिनके अनेकों दिव्य स्वरुप है
  • वह जो श्रीमहालक्ष्मीजी, श्रीभूदेवीजी और श्रीनीलादेवीजी के प्राण प्यारे नाथ है
  • उनका प्रत्येक जीवात्मा में अन्तर्यामी परमात्मा होना, उनके स्वरुप को किंचिद भी प्रभावित नहीं करता, जिस प्रकार अनेकों देह धारण करने से जीवात्मा का स्वरुप प्रभावित नहीं होता।

भगवान के दिव्य कल्याण गुण

  • उनके दिव्य गुणों की विशेषताएं निम्न हैं-
    • नित्य/ अनंत है
    • असंख्य है – अनेकों दिव्य गुण है
    • अपरिमित है – उनमें से एक भी गुण सम्पूर्ण रूप से समझा अथवा अनुभव नहीं किया जा सकता
    • निर्हेतुक है – उनके दिव्य गुण किसी बाह्य तत्व से प्रभावित होकर प्रत्यक्ष नहीं है, अपितु वे स्वतः स्वाभाविक और प्राकृतिक है
    • दोषरहित है
    • अद्वितीय है – जिस प्रकार कोई भी अन्य भगवान के समान या उनसे बड़ा नहीं है, उसी प्रकार उनके गुणों से बढ़कर या उनके समान भी कुछ और नहीं है
  • उनके दिव्य गुण  तीन प्रकार के हैं-
    • ऐसे गुण जो उनके और उनके भक्तों के प्रति अनुकूल है
      • वात्सल्य – मातृ प्रेम

        श्रीवेंकटेश भगवान का प्रायः उनके वात्सल्य के लिए मंगलाशासन किया जाता है

        श्रीवेंकटेश भगवान का प्रायः उनके वात्सल्य के लिए मंगलाशासन किया जाता है

      • सौशील्य – दयालुता/ उदारता

        Untitled

        श्रीराम की महिमा उनके सौशील्य में है – गुहा, हनुमान आदि में हिलना मिलना

      • सौलभ्य – सुगमता से प्राप्त होने वाले

        भगवान श्रीकृष्ण की महिमा उनके सौलभ्य में है

        भगवान श्रीकृष्ण की महिमा उनके सौलभ्य में है

      • मार्ध्वं – कोमलता/ मृदुता (ह्रदय और अंगों दोनों की)
      • आर्जवं – सत्यता, आदि
    • ऐसे गुण जो उनके और उनके भक्तों के प्रति प्रतिकूल है
      • शौर्य – वीरता/ साहस
      • वीर्य – शक्ति /सामर्थ्य, आदि
    • ऐसे गुण जो सभी के लिए समान
      • ज्ञान – सभी का सम्पूर्ण ज्ञान
      • शक्ति – सामर्थ्य/ बल
      • बल – सभी का सहारा/ आश्रय प्रदान करने का सामर्थ्य
      • ऐश्वर्य – रक्षण/ नियंत्रण क्षमता
      • वीर्य – सभी कुछ नियंत्रित/ प्रबंधन करने पर भी, उनके स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं (अविकार)
      • तेजस – सभी को स्वयं संभालने की योग्यता
  • भगवान के दिव्य कल्याण गुण और उन गुणों के लक्ष्य-
    • भगवान का ज्ञान, उन जीवों की सहायता के लिए है, जो स्वयं को अज्ञानी स्वीकार करते हैं
    • भगवान की शक्ति, उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को दीन समझते हैं
    • भगवान की क्षमा, उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को अपराधी मानते हैं
    • भगवान की कृपा, उनके लिए है, जो स्वयं को इस संसार पीढ़ा से व्यथित जानते हैं
    • भगवान का वात्सल्य, उनकी सहायता के लिए है जो स्वयं को सदा दोषयुक्त समझते हैं
    • भगवान का शील (भव्यता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को दलित समझते हैं
    • भगवान का आर्जवं (सत्यता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को कपटी समझते हैं
    • भगवान का सौहाद्र (सह्रदयता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को अच्छा नहीं मानते हैं
    • भगवान का मार्धवं (ह्रदय की कोमलता), उनकी सहायता के लिए है, जो भगवान से वियोग सहन नहीं कर सकते
    • भगवान का सौलभ्यं (सुलभता), उनकी सहायता के लिए है, जो सदा उनके दर्शन को चाहते हैं
    • और इसी प्रकार और बहुत कुछ
  • उनके गुणों का प्राकट्य इनसे होता है-
    • भगवान इस संसार में पीड़ित जीवात्माओं के दुःख को देखकर व्यथित/ चिंतित रहते हैं और सदा उनके कल्याण के लिए सोचते हैं।
    • वे सदा उन जीवात्माओं की सहायता करने का प्रयत्न करते हैं, जो विपत्ति/ संकट में है।
    • जो भगवान के शरणागत होते हैं, उन जीवों के लिए
      • भगवान जन्म, ज्ञान, कर्मों आदि पर आधारित उनके किसी भी दोष को नहीं देखते हैं।
      • भगवान उनकी रक्षा तब करते हैं, जब जीव स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता, न ही कोई और उसकी रक्षा कर सकता है।
      • भगवान शरणागतों की प्रसन्नता के लिए अद्भुत/ आश्चर्यपूर्वक कार्य करते हैं, जैसे श्रीकृष्ण ने सांदीपनी मुनि (उनके मृत पुत्र को वापस लाना) और ब्रह्मा के लिए किया (उनके पुत्रों को वापस लाना जिन्हें श्रीमहालक्ष्मीजी परमपद में श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरुप के दर्शन करने परमपद ले गयी थी)।
      • भगवान स्वयं को पूर्ण रूप से उनके लिए प्राप्य बनाते हैं।
      • शरणागतों की सहायता के पश्चाद, वे उसी प्रकार संतुष्ट होते हैं, जिस प्रकार कोई व्यक्तिगत कार्य पूर्ण होने पर होता है।
      • शरणागतों पर किये गए अनेक उपकारों पर ध्यान न देकर, वे सदा उनके द्वारा किये गए अति सूक्ष्म सुकृत्यों की ओर ही देखते हैं और अनादी काल से जीव में विद्यमान लौकिक आकांक्षाओं को भूलाने में उसकी सहायता करते हैं।
      • भगवान शरणागतों के अपराधों को उसी प्रकार क्षमा करते हैं, जिस प्रकार एक पुरुष अपनी प्रिय स्त्री और बालकों के अपराधों को सहज ही क्षमा करता है।
      • यद्यपि श्रीमहालक्ष्मीजी शरणागत जीवात्मा में दोष चिन्हित कर भी दे, पर भगवान उस दोष पर ध्यान नहीं देते हैं।
      • वे अत्यंत प्रेम से शरणागतों के दोषों के साथ उन्हें अपनाते हैं, जिस प्रकार एक प्रेमी पुरुष अपनी स्त्री के स्वेद, आदि को भी अपनाता है।
      • वियोग में, उन्हें शरणागत जीवात्मा से अधिक पीड़ा होती है।
      • जिस प्रेम और चिंता से एक गाय अपने नये जन्में बछड़े के लिए बड़े बछड़ों को दूर कर देती है उसी प्रकार, भगवान भी नये जीवात्मा के शरणागत होने पर श्रीमहालक्ष्मीजी और नित्यसूरियों को पीछे करते हैं।

उनका कारणत्व -वे सभी सृष्टि के प्रधान कारण हैं

5.

ब्रह्मा, जो भगवान श्रीमहाविष्णु की नाभि से जन्मे

  • भगवान ही सभी जगत के कारण हैं।
  • कुछ लोग कहते हैं कि अणु (सबसे सूक्ष्म पदार्थ) प्रधान कारण है। परंतु क्योंकि यह सोच शास्त्र के प्रतिकूल है, उसे प्रधान कारण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • कुछ कहते हैं कि पदार्थ/ अचित जगत का प्रधान कारण है। परंतु क्योंकि पदार्थ में ज्ञान का आभाव है और भगवान की आज्ञा के बिना वह स्वयं से परिवर्तित नहीं हो सकता, वह सृष्टि का प्रधान कारण नहीं हो सकता है।
  • बद्ध चेतन (जीवात्मा) जैसे ब्रह्मा, रुद्र, आदि सृष्टि का प्रधान कारण नहीं है, क्योंकि वे कर्मो से बंधे हुए हैं और इस संसार में पीड़ित हैं, इसलिए वे सृष्टि का प्रधान कारण नहीं हो सकते।
  • इसलिए ईश्वर ही सृष्टि के प्रधान कारण हैं। ईश्वर अज्ञान, कर्म, दूसरों की आज्ञा आदि विषयों के आधार पर कारण नहीं हुए, अपितु स्वयं की इच्छा से इस सृष्टि के रचयिता हैं।
  • क्योंकि सृष्टि की रचना, पोषण और संहार केवल उनकी दिव्य इच्छा से होता है, इसलिए इनमें उनके लिए कोई कष्ट नहीं है।
  • यह सब सृष्टि उनकी क्रीड़ा के लिए है।
  • परंतु क्या संहार उनकी क्रीड़ा को बाधित नहीं करता? – नहीं, क्योंकि संहार भी उनकी लीला का एक अंश है, इसलिए कोई व्यवधान नहीं है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे सुंदरता से एक प्रत्यक्ष उदाहरण द्वारा समझाते हैं – बच्चे रेत के महल बनाकर खेलते हैं, और खेल के अंत में वे उसी महल को प्रसन्नता से गिरा भी देते हैं। उसी प्रकार, संहार भी भगवान के लिए एक क्रीड़ा है।
    • क्योंकि भगवान इस लौकिक संसार में अपना रूप परिवर्तित कर सकते हैं, वही सृष्टि के प्रधान कारण हैं। नोट: 3 कारण होते हैं: उपाधान कारण (महत्वपूर्ण कारण), निमित्त कारण (निहित कारण) और सहकारी कारण (सहायक कारण)। उदहारण के लिए, एक मिट्टी का पात्र बनाने में, मिट्टी और रेत महत्वपूर्ण कारक है, पात्र बनाने वाला निमित्त कारण है और, उसका डंडा और पहिया सहायक कारण है।
  • परंतु क्योंकि भगवान के स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं है, उन्हें निर्विकार भी कहा जाता है (अपरिवर्तनीय)।
  • सिर्फ उनकी देह (अर्थात चित और अचित तत्व) ही परिवर्तित होती है। मकड़ी अपनी ही लार से जाल बुनती है और फिर उसका ही उपभोग कर लेती है। जब मकड़ी ऐसा कर सकती है तो ईश्वर क्यों नही, जो सर्वशक्तिमान है।

सृष्टि, स्थिति, संहार

भगवान इस तीनों गतिविधियों के एक मात्र नायक है। समष्टि सृष्टि (पञ्च भूतों तक) की रचना स्वयं भगवान करते हैं और व्यष्टि सृष्टि (विभिन्न जीव-जंतु, प्रत्यक्ष, आदि) की रचना अप्रत्यक्ष रूप में अन्य जीवों में अन्तर्यामी होकर भगवान ही करते हैं।

1. सृष्टि (रचना)

  • सृष्टि अर्थात
    • सूक्ष्म पदार्थ का सकल पदार्थों में परिवर्तन
    • जीवात्माओं को देह और इन्द्रियाँ प्रदान करना
    • जीवात्मा के ज्ञान का विस्तार करना
  • सृष्टि रचना का कार्य ब्रह्मा, प्रजापतियों, काल (समय) द्वारा किया जाता है, यह सब भगवान उनके अन्तः मन में विराजकर करते हैं।
  • सृष्टि की रचना रजो गुण की स्थिति में होती है।

2. स्थिति (रक्षण- पोषण)

  • स्थिति अर्थात
    • जिस प्रकार जल धान की उपज का पोषण करते हैं, उसी प्रकार भगवान भी जीवात्मा का पोषण करते हैं, उनके अंतर में अनुकूल अभिप्राय जागृत करके और सभी स्थितियों में उनकी सहायता करते हैं।
  • स्थिति का कार्य भगवान इस प्रकार पूर्ण करते हैं
    • श्री विष्णु (इस संसार में भगवान का प्रथम अवतार) और ऐसे ही अनेकों अवतार लेकर प्रकट होते हैं।
    • मनु, ऋषियों आदि द्वारा जगत में शास्त्र स्थापित करते हैं।
    • धर्म और सत्य के मार्ग पर जीवात्माओं का मार्गदर्शन करते हैं
    • सभी प्राणियों और काल में अन्तर्यामी रहते हैं
  • स्थिति का कार्य सत्व गुण की अवस्था में होता है।

3. संहार

  • संहार अर्थात
    • जीवात्माओं को पुनः सूक्ष्म स्थिति में वापस खींचना, जिससे लौकिक आकांक्षाओं के प्रति उनका आकर्षण कम हो। यह उसी प्रकार है जैसे अपने उद्दंड पुत्र के हितार्थ उसे बंदी बनाकर रखना।
  • रूद्र, अग्नि, काल और सभी प्राणियों में अन्तर्यामी रहकर संहार को संचालित करते हैं।
  • संहार का कार्य तमो गुण (अज्ञान) की अवस्था में होता है।

सृष्टि में भगवान का सर्वोच्च/ श्रेष्ठ गुण

  • कुछ प्राणी आनंदित हैं और अन्य कुछ विपत्ति/ संकट में हैं, क्या यह भगवान का पक्षपात और निर्दयता नहीं?
  • नहीं, निसंदेह नहीं – क्योंकि सभी को अपने कर्मों के अनुसार ही शरीर प्राप्त होता है, और सभी कार्य जीवात्मा के कल्याण हेतु किये जाते हैं, इसलिए भगवान द्वारा कोई पक्षपात या निर्दयता नहीं है।
  • भगवान सृष्टि (रचना), स्थिति (पोषण) और संहार सभी अपने दिव्य रूप में करते हैं, जैसा की श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा तिरुवाय्मौली के 3.2.1 में बताया गया है।

भगवान के विभिन्न रूप

  • भगवान के रूप
    • उनके स्वरुप (स्वभाव), गुण आदि से भी अधिक रमणीय है।
    • नित्य है – सदा एक मनोहर रूप के साथ
    • एक समान है– वृद्धा अवस्था, आदि का कोई प्रभाव नहीं होता
    • उनका रूप शुद्ध सत्व, दिव्य पदार्थ से निर्मित है
    • उनका रूप लौकिक शरीर के विपरीत है, जो आत्मा के ज्ञान को आच्छादित कर देता है। भगवान का दिव्य रूप उनके सच्चे स्वरुप को पुर्णतः प्रकट करता है।
    • नित्य प्रकाशित/ आभायमान
    • उनका रूप सभी दिव्य गुणों को धारण करने वाला है जैसे सुंदरता, निर्मलता, आदि
    • वह रूप जिसका ध्यान योगियों द्वारा किया जाता है
    • वह रूप जिसके दर्शन मात्र से संसार से विरक्ति हो जाये
    • वह रूप जिसके दर्शन से नित्यसूरीगण और मुक्तात्मायें आनंदित होते है
    • वह जो सभी कष्टों/ विपत्तियों को दूर करने वाला है
    • उनके सभी अवतारों का स्तोत्र है
    • सभी प्राणियों के लिए आश्रय है
    • सभी उसमें व्याप्त है
    • दिव्य आयुधों (जैसे शंख, चक्र आदि) और आभूषणों (कंठमाला, हार, आदि) से सुशोभित है
  • भगवान के स्वरुप, 5 विभिन्न प्रकार के रूपों से सम्बंधित है, जो है
    • परत्वं – परमपद में विराजे
    • व्यूह – व्यूह स्थिति में रूप, जो सृष्टि रचना पर केन्द्रित है
    • विभव – भगवान के असंख्य अवतार
    • अन्तर्यामी – सभी जीवात्मा और अचेतन के अन्तः में विराजे स्वरुप
    • अर्चा – असंख्य मूर्ति रूप जो मंदिरों, मठों, घरों आदि में पूजे जाते है
    • इनका अधिक विवरण http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html पर देखा जा सकता है।

परत्व

paramapadhanathan

  • परमपद का वर्णन ऐसे स्थान के रूप में किया गया है, जहाँ नित्य आनंद है और असंख्य कल्याण गुण सुशोभित है और जहाँ काल (समय) का कोई नियंत्रण नहीं है। लौकिक संसार में समय ही नियंत्रक है – हम चाहे अथवा नहीं, समय स्वतः ही सब परिवर्तित कर देता है।
  • परमपद में सभी अध्यात्मिक है।
  • भगवान अपनी दिव्य महिषियों श्रीमहालक्ष्मीजी, श्रीभूदेवीजी और श्रीनीलादेवीजी के साथ परमपद के प्रधान है।
  • वे वहां नित्य सुरियों और मुक्तात्माओं (जो पहले संसार में थे, परंतु अब मुक्त होकर परमपद में है) के सम्पूर्ण आनंद के लिए उपस्थित है।
  • उनके दिव्य कल्याण गुण जैसे ज्ञान, शक्ति, आदि परमपद में पुर्णतः प्रत्यक्ष है।

व्यूह

6.

क्षीराब्धि नाथन रूप, भाग्वाब के व्यूह रूप का प्रतिनिधित्व करते है

  • वह रूप जो भगवान स्वीकार करते है
    • लौकिक जगत के पालन हेतु (सृष्टि, स्थिति, संहार के माध्यम से),
    • संसार में जीवात्मा का मार्गदर्शन और रक्षण-पोषण हेतु और
    • साधना करने वालों के लिए साधना के उपाय रूप में।
  • पर वासुदेव पहले स्वयं को व्यूह वासुदेव के रूप में विस्तारित करते है।
  • व्यूह वासुदेव स्वयं को तीन और रूपों में विस्तारित करते है- संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध।
  • संकर्षण
    • ज्ञान, बल (सभी का समर्थन करने की क्षमता) उनमें प्रधान है।
    • वे जीव तत्व पर अधिकार स्थापित करते है और चित और अचित तत्व के मध्य भेद कर, उन्हें नाम और रूप देने की प्रक्रिया का आरंभ करते है।
    • वे शास्त्र (वेद, वेदान्त, आदि) स्थापित करने और संहार के नियंत्रक है।
    • वे ही तदन्तर प्रद्युम्न रूप में विस्तृत होते है।
  • प्रद्युम्न
    • ऐश्वर्य (संपत्ति), वीर्य (शक्ति) उनमें प्रधान है।
    • वे मानस तत्व पर अधिकार स्थापित करते है।
    • वे निम्न कार्य संभालते है
      • धर्म के सिद्धांतों का निर्देश प्रदान करना,
      • मानव और चातुर वर्णों (चार वर्ग – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र) की रचना करना
      • शुद्ध सत्व में स्थित सभी प्राणियों की रचना (जो अंततः भगवान की ओर अग्रसर करते है)
  • अनिरुद्ध
    • शक्ति (बल) और तेज (सभी स्थितियों को नियंत्रित करने की क्षमता) उनमें प्रधान है।
    • इस स्वरुप में वे सभी कुछ संचालित करते है
      • सच्चे ज्ञान को प्रदान करते है
      • समय और सभी प्राणियों की रचना- सत्व, रजस और तमस गुणों के मिश्रण द्वारा करते है।

विभव

7.

दशावतार – 10 मुख्य अवतार

  • भगवान के असंख्य अवतार है।
  • उनके अवतारों को निम्न रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है
    • मुख्य अवतार
      • ये अवतार मुमुक्षुओं (जो मोक्ष की चाहना करते है) द्वारा अत्यधिक महत्वपूर्ण और पूजनीय है
      • भगवान स्वयं अनेकों दिव्य स्वरुप धारण करके प्रकट होते है जैसे मतस्य, कुर्म, वराह आदि
      • उनके दिव्य रूप दिव्य पदार्थों से निर्मित है (जैसे परमपद में है)।परमपद के समान ही इन रूपों में भी वे अपने सभी दिव्य कल्याण गुण धारण करते है।
      • जिस प्रकार दीया उसे प्रज्वलित करने वाली माचिस की तिली से अधिक रौशनी प्रदान करता है, उसी प्रकार भगवान के अवतार भी उनके परमपद के रूप से अधिक आभायमान है।
    • गौण अवतार
      • गौण अर्थात विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु भगवान, जीवात्मा को अपना स्वरुप अथवा शक्ति (बल) प्रदान करते है।
      • इस रूप को अन्य रूपों से कम महत्वपूर्ण माना जाता है और यह रूप मुमुक्षुओं द्वारा पूजनीय नही है, क्योंकि इन अवतारों का उद्देश्य केवल कुछ विशिष्ट कार्यों की पूर्ति है।
      • इनके 2 वर्गीकरण इस प्रकार है
        • स्वरुप आवेश – भगवान अपना दिव्य स्वरुप जीवात्मा को प्रदान करते है जो धरती पर प्रकट होते है। उदहारण के लिए: परशुराम, आदि।
        • शक्ति आवेश – भगवान विशिष्ट उद्देश्य से केवल अपनी शक्ति जीवात्मा को प्रदान करते है। उदहारण: ब्रह्मा, रूद्र, व्यास, आदि।
  • वे पुर्णतः अपनी दिव्य अभिलाषा से विभिन्न अवतारों को धारण करते है।
  • इन अवतारों का उद्देश्य स्वयं भगवान ने भगवत गीता 4.8 में समझाया है
    • परित्राणाय साधुनां – अपने भक्तों (साधुता) की रक्षा के लिए
    • विनाशाय च दुष्कृतां – दुष्टों के विनाश के लिए
    • धर्म संस्थापनार्थम् – धर्म की संस्थापना हेतु
  • यद्यपि यह भी कहा जाता है कि भगवान ऋषि के श्राप आदि के कारण अवतार लेते है, परंतु यह सब सिर्फ कहानी (अनर्गल कारण) है और वास्तविक कारण तों सिर्फ भगवान की दिव्य अभिलाषा ही है।

अन्तर्यामी

8.

  • अन्तर्यामी अर्थात जो सभी में व्याप्त है और सभी प्राणियों का अन्तः से सम्पूर्ण नियंत्रण करते है।
  • जहाँ भी जीवात्मा जाती है भगवान भी उसके साथ रहकर उसका मार्गदर्शन करते है।
  • वे प्राणी जो भगवान की साधना करना चाहते है, उनके लिए दिव्य रूप और दिव्य महिषियों के साथ उनके अंतर मन में करुणापूर्वक प्रकट होकर भगवान दर्शन देते है।
  • वे सदा सभी प्राणियों के साथ उनके अंतः में रहकर उनकी रक्षा करते है।

अर्चाविगृह

9.

 108 दिव्य देश – जिनका मंगलाशासन आलवारों द्वारा किया गया है

  • इन्हें भगवान के सभी रूपों का प्रतीक समझा जाता है।
  • जैसा की सरोयोगी स्वामीजी ने मुदल तिरुवंताधि के 44वे पासूर में समझाया है, भगवान सहर्ष वह रूप स्वीकार करते है जो उनके भक्त चाहना करते है।
  • अर्चावतार, अन्य रूपों (परम, व्यूह, आदि) के विपरीत सभी समय, सभी स्थानों पर, सभी के लिए उपस्थित है, जो सीमित है
    • विशिष्ट देश के अनुसार (परमपद, क्षीराब्धि, आदि स्थान)
    • विशिष्ट काल के अनुसार (त्रेता युग, द्वापर युग, आदि युगों में),
    • विशिष्ट अधिकारीयों के अनुसार (रामावतार में दशरथ आदि)
  • अपनी निर्हेतुक कृपा के वशीभूत ही वे अपने भक्तों के अपराधों को भी क्षमा करते है।
  • वे अपने सभी कार्यों के लिए अपने भक्तों पर निर्भर होकर रहते है जैसे उथापन, स्नान, भोजन, शयन आदि।
  • वे अनेकों मंदिरों (दिव्य देश, अभिमान स्थल, गाँव के मंदिर, आदि- सभी स्थानों पर, देश, प्रांत, प्रदेश आदि के भेद के बिना), मठों और हमारे गृहों में प्रकट होते है।
  • अर्चावतार का सम्पूर्ण स्वरुप
    • अपने अर्चावतार द्वारा, वे स्वयं के प्रति प्रीति और अनुराग उत्पन्न करते है।
    • वे सभी दिव्य कल्याण गुणों को धारण करने वाले है – उनके सभी गुण जैसे सौशील्य (उदारता), सौलभ्य (सुलभता), वात्सल्य (ममता), आदि पुर्णतः प्रत्यक्ष है। यह सभी गुण परमपद में प्रत्यक्ष नही है क्योंकि परमपद में सभी शुद्ध और पुर्णतः साधित है।
    • वे सभी प्राणियों के लिए आश्रय है, चाहे वह किसी भी जन्म, ज्ञान आदि से सम्बंधित हो।
    • भगवान सबसे अधिक आनंदप्रद है जैसा की आलवारों और आचार्यों द्वारा समझाया गया है। हम आलवार/ आचार्य अर्चावतार अनुभव में इसे पहले ही देख चुके है http://ponnadi.blogspot.in/p/archavathara-anubhavam.html
  • अर्चावतार में भगवान का उदार स्वरुप
    • यद्यपि वह नाथ है और अन्य सभी उनके आश्रित है, वे उदारतावश स्वयं को अपने भक्तों के आश्रित प्रकट करते है।
    • अर्चा स्वरुप में, वे स्वयं को निम्न प्रकार से प्रस्तुत करते है
      • अज्ञानी – क्योंकि वे अपने भक्तों के माध्यम से ही सभी कुछ समझते है
      • असमर्थ – क्योंकि वे अपने भक्तों द्वारा सभी कार्यों की प्रतीक्षा करते है जैसे स्नान, भोजन, वस्त्र, शयन आदि
      • अपने भक्तों पर पुर्णतः निर्भर रहते है जैसा की पहले बताया गया है
    • यद्यपि, अपने भक्तों के प्रति अपनी निर्हेतुक और असीमित कृपा, करुणा और प्रेम के वशीभूत, वे उनकी सभी अभिलाषाओं की पूर्ति करते है, बदले में कोई भी चाहना किये बिना, इसप्रकार अपने वात्सल्य गुण को प्रकट करते है।

सारांश

इस प्रकार हमने 3 तत्वों – चित, अचित और ईश्वर के विषय में विस्तृत चर्चा की। यह अत्यंत कठिन विषय वस्तु है क्योंकि इसमें बहुत से विशेष और गहन तत्व समाहित है। हमने अभी तक जो देखा वह बड़े से विषय की छोटी सी झलक थी- श्रीपिल्लै लोकाचार्य के तत्व त्रय नामक दिव्य ग्रंथ, जिसे कुट्टी भाष्य (श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य का सार) भी कहा जाता है, पर रचित व्याख्यान में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा और अधिक सुमधुर और सुंदर वर्णन प्रस्तुत है। आईये हम श्रीमन्नारायण भगवान, आलवारों और आचार्यों का मंगलाशासन करें जिन्होंने हमें ऐसा महान साहित्य प्रदान किया जो हमारे लिए अतुलनीय है।

10.

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – श्रीपेरुम्बुदुर

रहस्य तत्वत्रयतय विवृत्या लोकरक्षिणे।
वाक्बोशा कल्परचना प्रकल्पायास्तु मंगलम।।

श्रीमते रम्यजामातृ मुनींद्राय महात्मने।
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री नित्य मंगलं।।

मंगलाशासन परैर मदाचार्य पुरोगमै।
सर्वैश्च पूर्वैर आचार्यै सत्कृतायास्तु मंगलं।।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – तत्व त्रय

अंग्रेजी संस्करण – http://ponnadi.blogspot.in/2013/03/thathva-thrayam-iswara- who-is-god.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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One thought on “तत्व त्रय – ईश्वर

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