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अनध्ययन काल और अध्ययन उत्सव

 ॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥           ॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥    ॥ श्रीमतेरामानुजायनमः ॥

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कलियन अरुल पाडु और ६००० पड़ी गुरु परम्परा प्रभावम को आधार लेकर अँग्रेजी में श्रीमान परम भागवत सारथी तोताद्रीजी ने “ अनध्ययन काल और अध्ययन उत्सव ” लेख को प्रकाशित किया है, उसीको हिन्दी में अनुवाद किया गया है ।

श्रीरंगम में अध्ययन उत्सव चल रहा था । पराशर भट्टर स्वामीजी के माताजी ने स्वामीजी को द्वादशी का पारण करने के लिए कहा । स्वामीजी ने कहा “ भगवान के उत्सव में रहते समय एकादशी, द्वादशी का स्मरण कैसे हो जाता है ?”, इसका अर्थ है जब हम भगवद अनुभव में रहते है तब प्रसाद लेने का स्मरण भी नहीं होना चाहिये ( भूख नहीं लगनीचाहीये )।

यह अध्ययन उत्सव पूर्ण रूप से भगवद अनुभव में डूबा देता है, ऐसा दिव्य अनुभव हम लोगों को भी हो ऐसी प्रार्थना आचार्य चरणों में करते है । अध्ययन उत्सव की कुछ विशेषताओं को जानते हुये इस लेख का अनुभव करेगें ।

हमारा श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय उभय वेदान्तम पर आधारीत है । उभय याने “दो” और वेदान्तम याने वेद का अंतिम भाग । संस्कृत वेद ( ऋग, यजुर, साम, अथर्वण ) और वेदान्तम ( उपनिषद ) है, द्राविड (तमिल) वेद ( दिव्य प्रबन्ध ) और वेदान्तम ( व्याख्यान ) है । इन दोनों को नेत्रों की तरह बताया गया है और दोनों ही महत्वपूर्ण है । आलवार जिन्होने दिव्य प्रबन्ध की रचना की है और भगवान की कृपा से विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ है उन्होने संस्कृत वेद के सार को ४००० दिव्य प्रबन्ध के रूप में सांसारीयों के उद्धार के लिये प्रस्तुत किया है जिनके हम विशेष आभारी है ।

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अध्ययन याने पढ़ना / सीखना / दोहराना । वेदम को आचार्य की सन्निधि में उनके द्वारा सुनकर दोहराया जाता है । वेद मंत्रों को भी नित्यानुसन्धान के अंतर्गत पारायण किया जाता है । अनध्ययन याने पढ़ाई को रोकना । वर्ष के कुछ दिनों में वेदम का पाठ नहीं होता है । उस समय में शास्त्र के कुछ भाग जैसे स्मृति, इतिहास, पुराणों का अध्ययन किया जाता है । अमावस्या, पूर्णिमा, प्रतिपदा जैसे दिनों में भी वेदम का अध्ययन नहीं किया जाता है । द्राविड वेद ( ४००० दिव्य प्रबन्ध ) को संस्कृत वेद के बराबर माना गया है, दिव्य प्रबन्ध को कुछ समय के लिये पढ़ा / अध्ययन नहीं कीया जाता है । अब हम आगे दिव्य प्रबन्ध का अनध्ययन काल कैसे प्रारम्भ हुआ इसका इतिहास देखेगें ।

अनध्ययन काल और अध्ययन उत्सव एक ही समय में आते है और संपुटित होते है । शठकोपसूरी के परमपद गमन के वैभव को बताने के लिये अध्ययन उत्सव मनाया जाता है । श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में अनध्ययन काल और अध्ययन उत्सव का अत्यन्त निकट सम्बन्ध है । इसके पूर्ण इतिहास को “कलियन अरुल पाडु” नामक ग्रन्थ में बताया गया है, जिसका संग्रहण पेरियावाचन पिल्लै स्वामीजी ने कीया है ।

इस सुन्दर ग्रन्थ के कुछ विशेष अर्थों का सारांश देखेगें –

  • श्रीमन्नारायण भगवान विशेष कृपा करके हम लोगों के उद्धार हेतु संसार में अर्चावतार के रूप में अवतार लेकर श्रीरंगम, तिरुमला, काँचीपुरम जैसे अनेक स्थानों पर विराजमान है, जो की सेवा करने के लिये अत्यन्त सुलभ है ।

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  • परकालसुरी ( आलवारों की गोष्ठी में जिनका अंतिम स्थान है ) भगवान की विशेष कृपा के पात्र बनकर अनेक स्थानों पर भगवान के अर्चावतार की सेवा की और अंत में श्रीरंगम में विराजमान होकर अनेक विशेष कैंकर्य किये है । परकालसुरी “ इरुन्तमिल नूल पुलवन मंगैयालान ” के नाम से भी प्रसिद्ध है , ( इरुन्तमिल – तिरुवायमोली, नूल – प्रबन्ध, पुलवन – गायक जो तिरुवायमोलीमें निपुण है , मंगैयालान – परकाल सूरी )। आलवारों के प्रबन्धों के प्रति विशेष लगाव था और सदैव उनको दोहराते रहते थे ।

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  • एक बार तिरुकार्तिगै उत्सव में ( कार्तिक दीपोत्सव के दिन सामान्यतः कार्तिक मास, कार्तिक नक्षत्र और पुर्णिमा तिथि एक दिन आते है ) श्रीरंगनाथ भगवान अभिषेक के बाद भागवतों की गोष्ठी के बीच में विराजमान थे, परकालसूरी ने तिरुनेडूण्डगम प्रबन्ध की रचना करके संगीत के साथ भगवान को निवेदन किया । तिरुवायमोली के कुछ पाशुरों को भी संगीत के साथ निवेदन किया ।

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  • श्रीरंगनाथ भगवान परकालसूरी की रचनाओं को संगीत के साथ सुनकर अत्यन्त हर्षित हुये और परकालसूरी को पूछे की क्या कोई इच्छा की पूर्ति करना है ।
  • परकालसूरी ने दो इच्छाओं की पूर्ति के लिये कहा –
    • धनुर्मास के शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन भगवान का अध्ययन उत्सव ( शठकोपसुरी का परमपदगमन ) होता है तब पूर्ण रूप से तिरुवायमोली को सुनना ।
    • तिरुवायमोली को संस्कृत वेद के समान मान्यता देना ।
  • भगवान अत्यन्त प्रसन्न होकर हार्दिकता के साथ दोनों इच्छाओं की पूर्ति के लिये अनुग्रह किया।
  • एक बार भगवान ने गोष्ठी में कहा परकालसूरी बहुत समय से संगीत के साथ गान कर रहे है, उनका गला दर्द होता होगा इसलिये कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेरे अभिषेक के पश्च्यात जो तेल अवशेष है उसको परकालसुरी के गले को लागाइये ।
  • उसके पश्च्यात शठकोपसूरी को संदेश भेजा गया जो की आलवार तिरुनगरी ( अर्चा विग्रह के रूप में ) में विराजमान है । शठकोपसूरी संदेश पाकर आलवार तिरुनगरी से श्रीरंगम आये ।
  • वैकुण्ठ एकादशी से लेकर १० दिनों तक परकालसुरी ने तिरुवायमोली के पारायण का प्रबन्ध किया , सुबह में वेद पारायण होता है और रात्री में तिरुवायमोली का पारायण होता है । अंतिम दिन शठकोपसुरी भगवान के श्रीचरणों में शरणागती करते है(शठकोपसूरी भगवान के श्रीचरणों को स्पर्श करते है,इसे तिरुवड़ी तोजल कहते है ), जिसे विशेष रूप से दर्शाया जाता है । इस उत्सव के पश्च्यात शठकोपसूरी लौटकर आलवार तिरुनगरी आते है, इसी तरह हर वर्ष होता है ।
  • कुछ समय के बाद कलियुग के प्रभाव के कारण परीस्थिति अनानुकूल होती चली गयी, दिव्य प्रबन्ध लुप्त हो गये और शठकोपसूरी का श्रीरंगम आना भी बन्द हो गया ।
  • नाथमुनि स्वामीजी का अवतार होता है, भगवान की कृपा द्वारा वे आलवार और दिव्य प्रबन्धों के बारे में कुछ सुनते है । आलवार तिरुनगरी में आकर मधुरकवि स्वामीजी द्वारा रचित कण्णिनुणशिरुत्ताम्बु ( जो श्रीशठकोपसुरी के वैभव को दर्शाता है ) का अध्ययन किया और शठकोपसुरी के कृपा द्वारा ४००० दिव्य प्रबन्धों को अर्थ सहीत जानकर उनका अध्ययन किया ।

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  • नाथमुनि स्वामीजी श्रीरंगम आकर अपने शिष्यों को दिव्य प्रबन्धों का अध्ययन कराया और पूर्ण रूप से अध्ययन उत्सव को पुनः प्रारम्भ किया । आलवारों का और ४००० दिव्य प्रबन्धों का वैभव जानकर, नाथमुनि स्वामीजी ने शठकोपसुरी का श्रीरंगम आगमन पुनः प्रारम्भ किया ।
  • भगवान ने तिरुवायमोली को वेद के समान मान्यता दिया, वेदम के अनध्ययन काल की तरह तिरुवायमोली और अन्य प्रबन्धों के लिये भी अनध्ययन काल को प्रमाणित किया । कार्तिक दीपोत्सव के दिन अनध्ययन काल प्रारम्भ होकर अध्ययन उत्सव के प्रथम दिन तक दिव्य प्रबन्धों के लिये अनध्ययन काल होता है । दिव्य प्रबन्धों का अध्ययन अध्ययन उत्सव से प्रारम्भ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक रहता है ।
  • शठकोपसुरी को श्रीरंगम आगमन के लिये भगवान की आज्ञानुसार संदेश भेजने की प्रथा को पुनः प्रारम्भ किया । इस संदेश द्वारा श्रीवैष्णवों को भी दिव्य प्रबन्ध का पठन न करते हुये उनके अर्थों का अनुसन्धान करते हुये अनुभव करना चाहीये । ( सिर्फ पठन ही आवश्यक नहीं है किन्तु अनुसन्धान / अनुभव होना भी जरूरी है )
  • भगवान के तैलाभिषेक के तेल को शठकोपसूरी, परकालसुरी और अन्य आलवारों के गले को लगाया जाता है, उसके बाद प्रसाद के रूप में श्रीवैष्णवों को देने की प्रथा को नाथमुनि स्वामीजी ने प्रारम्भ किया ।
  • शठकोपसूरी के तिरुविरुतम, तिरुवासिरियाम, पेरीय तिरुवंतादि और तिरुवायमोली को चार वेदों के समान माना गया है और आलवारों के अन्य प्रबंधों को वेद के अंग ( शिक्षा, व्याकरण, कल्पम, निरुक्तम, छदांस, ज्योतिषम ) और उपांग( हिस्सा )बताया गया है । यह प्रबन्ध तिरुमंत्र, द्वय मंत्र और चरम मंत्र के दिव्य अर्थों को बताते है ।
  • नाथमुनि स्वामीजी ने अध्ययन उत्सव को इस तरह मनाना प्रारम्भ किया ।

ü  प्रथम १० दिनों तक ( वैकुण्ठ एकादशी के पहीले अमावस्या से प्रारम्भ होकर ) मुदलायीरम ( तिरुप्पल्लाण्डु, पेरीयालवार तिरुमोली, नचियार तिरुमोली, पेरूमाल तिरुमोली, तिरुच्चन्त विरुत्तम, तिरूमालै, तिरुप्पल्लीयेलूच्ची, अमलनादीपिरान, कण्णिनुणशिरुत्ताम्बु ), पेरीय तिरुमोली, तिरुक्कुरून्तण्डगम, तिरुनेडुन्तण्डगम के पारायण को प्रारम्भ कराया ।

ü  वैकुण्ठ एकादशी के दिन से तिरुवायमोली का पारायण प्रारम्भ होता है ।

ü  वैकुण्ठ एकादशी से लेकर १० दिनों तक सुबह के समय में वेद पारायण होता है शाम के समय में तिरुवायमोली का ( हर दिन १०० पाशुरों का ) पारायण होता है । अंतिम दिन भगवान के श्रीचरणों में शठकोप सूरी की शरणागती के साथ अत्यन्त विशेष शातूमोरा होता है ।

ü  २१वें दिन इयर्पा ( मुदल तिरुवन्तादी, इरण्डाम तिरुवन्तादी, मूनराम तिरुवन्तादी, नान्मुगन तिरुवन्तादी, तिरुविरुतम, तिरुवासिरियाम, पेरीय तिरुवंतादि,सीरिय तिरुमडल,तिरुवेलुक्कुर्रीरूक्कै, पेरीय तिरुमडल ) का पारायण होता है । ( नोट : रामानुज नुत्तन्दादि का पारायण श्रीरंगनाथ भगवान की आज्ञानुसार रामानुज स्वामीजी के समय से प्रारम्भ हुआ । २१ वें दिन इयर्पा शातुमुरा के बाद सवारी के समय इसका पारायण होता है । )

  • नाथमुनि स्वामीजी ने बुनियाद डाला की जैसे ब्राम्हण वेदम का अध्ययन करते है वैसे प्रपन्न श्रीवैष्णवों को दिव्य प्रबन्धों का अध्ययन करना चाहिये ।
  • धनुर्मास में सुबह के समय में भक्तान्घ्रिरेणु स्वामीजी द्वारा रचित तिरुप्पल्लीयेलूच्ची और गोदम्बाजी द्वारा रचित तिरुप्पावै का पारायण होता है । (ये दोनों प्रबन्ध भगवान और भागवतों के उत्थापन के लिये है, अनध्ययन काल होने पर भी धनुर्मास में इनका निवेदन किया जाता है ।)
  • यह प्रथा पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी, राममिश्र स्वामीजी, यामुनाचार्य स्वामीजी, महापुर्ण स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी के समय तक चली आयी है ।
  • एक बार रामानुज स्वामीजी के समय में कुछ सुरक्षा के कारण शठकोपसूरी श्रीरंगम नहीं आ पाये । रामानुज स्वामीजी ने शठकोपसूरी सहीत अन्य सभी आलवारों के अर्चा विग्रह की प्रतिष्ठापना श्रीरंगम सहीत सभी दिव्यदेशों में करने के लिये और अध्ययन उत्सव अत्यन्त विशेष रूप से आयोजित करने के लिये आज्ञा दी ।

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  • रामानुज स्वामीजी बहुत समय तक श्रीरंगम में विराजमान थे, अनेक श्रीवैष्णवों को विशेष और महत्वपूर्ण सम्प्रदाय के तत्वों का उपदेश दिया और सदैव श्रीरंगनाथ भगवान के मंगलाशासन में निरत थे ।
  • रामानुज स्वामीजी के परमपदगमन के पश्च्यात पराशर भट्टर स्वामीजी ( कुरेश स्वामीजी के पुत्र और रंगनाथ भगवान और रंगनायकी अम्माजी के दत्तक पुत्र ), पिल्लान ( रामानुज स्वामीजी के अभिमान पुत्र ), अरूला पेरुला येम्पुरूमानार, गोविन्दाचार्य स्वामीजी इन सभी लोगों ने मिलकर रामानुज स्वामीजी की आज्ञानुसार श्रीरंगम में रामानुज स्वामीजी के अर्चा विग्रह को प्रतिस्थापित किया । सभी दिव्य देशों में ऐसे ही किया गया ।
  • जैसे नाथमुनि स्वामीजी ने कण्णिनुणशिरुत्ताम्बुके वैभव को देखकर ४००० दिव्य प्रबन्ध में उसको स्थान दिया वैसे ही श्रीरंगनाथ भगवान ने रामानुज नुत्तन्दादि को ४००० दिव्य प्रबन्ध में स्थान देने के लिये आज्ञा की । जैसे प्रतिदिन गायत्री जप ब्राम्हणों के लिये जरूरी है वैसे ही प्रपन्न शरणागतों के लिये रामानुज नुत्तन्दादि का प्रतिदिन अनुसन्धान करने के लिये बताया गया है । इसे प्रपन्न गायत्री भी कहते है ।

आगे आनेवाले सभी आचार्यों ने संसार के उद्धार हेतु रामानुज स्वामीजी द्वारा प्रदर्शित मार्ग का प्रचार प्रसार किया । यहाँ पर कलियन अरुल पाडु प्रबन्ध का समापन होता है ।

पराशर भट्टर स्वामीजी मेलूकोटे में वेदांती के साथ शास्त्रार्थ करने के लिये आये, शास्त्रार्थ में विजय होकर वेदांती को अपना शिष्य बनाये । वेदांती भट्टर स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार करके सन्यास को ग्रहण किये । वेदांती “ नंजीयर ” के नाम से प्रसिद्ध हुये । वेदांती पर विजय पाकर भट्टर स्वामीजी अध्ययन उत्सव के प्रारम्भ में प्रथम दिन श्रीरंगम पहुँचे । श्रीरंगनाथ भगवान ने शास्त्रार्थ के बारे में पूछा, तब भट्टर स्वामीजी ने कहा परकालसूरी द्वारा रचित तिरुनेडूण्डगम दिव्य प्रबन्ध के कुछ सिद्धान्तों को वर्णन करते हुये वेदांती पर विजय प्राप्त की । श्रीरंगनाथ भगवान अत्यन्त प्रसन्न होकर भट्टर स्वामीजी को आज्ञा दि की श्रीरंगम में अध्ययन उत्सव का प्रारम्भ तिरुनेडूण्डगम पारायण के साथ हो । यहाँ पर अपने श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के अध्ययन उत्सव के इतिहास का समापन होता है ।

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अनेक दिव्य देशों में २१ दिन तक यह उत्सव इस तरह मनाया जाता है –

 

  • भगवान, अम्माजी, आलवार और आचार्य २१ दिनों तक एक बड़ी सभा में विराजमान होते है ।
  • भगवान और अम्माजी मध्य में विराजमान होते है, आलवार और आचार्य दोनों तरफ आमने सामने होकर मंडप में विराजमान होते है ।
  • बहुत सारे दिव्यदेशों में शठकोपसूरी आलवारों की गोष्ठी में आगे रहते है, इनके साथ ( पीछे )परकालसूरी और रामानुज स्वामीजी रहते है ( श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के लिये इनका योगदान विशेष रहने के कारण ) और अन्य आलवार और आचार्य भी साथ में रहते है।
  • वानमामलै, तिरुक्कुरुगुंडी जैसे अनेक दिव्यदेशों में शठकोपसूरी के अर्चा विग्रह नहीं है, इसलिये परकालसुरी और रामानुज स्वामीजी प्रमुख तौर पर उत्सव में उपस्थित रहते है ।
  • भूतपुरी में गोदम्बाजी आलवारों की गोष्ठी में ( भगवान और अम्माजी के साथ विराजमान न होते हुये ) विराजमान होती है । यहाँ पर रामानुज स्वामीजी की विशेषता है , गोदम्बाजी रामानुज स्वामीजी को बड़े भाई के रूप में स्वीकार करने के कारण यहाँ पर आलवारों की गोष्ठी में विराजमान होती है ।
  • वैकुण्ठ एकादशी के दिन वैकुण्ठ द्वार के सामने शठकोपसूरी सहीत अन्य आलवार आचार्य सवारी में आते है, द्वार खुलते ही भगवान का मंगलाशासन करते है और भगवान के साथ सवारी में शामिल होते है ।
  • वैकुण्ठ एकादशी के १० दिन पहीले मुदलायीरम और पेरीय तिरुमोली का पारायण दोपहर में होता है –पगल पत्तू ( प्रथम १० दिवस – तिरुमोली तिरुनाल )
  • वैकुण्ठ एकादशी से १० दिन तक तिरुवायमोली का पारायण रात में होता है–रापत्तु ( अगले १० दिवस – तिरुवायमोली तिरुनाल )
  • २० वें दिन भगवान के श्रीचरणों में शठकोपसूरी की शरणागती होती है और तिरुवायमोली का शातूमोरा होता है । श्रीशठकोपसूरी के शरणागती के समय अर्चक लोग शठकोपसूरी को हाथ में लेकर भगवान तक आते है और भगवान के श्रीचरणों में शठकोपसूरी के मस्तक को रखते ( नीचे चित्र में दिखाये अनुसार ) है। पूर्ण रूप से शठकोपसुरी को तुलसी से आवृत कर देते है । इसे तिरुवड़ी तोजल कहते है ।

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  • २१ वें दिन शाम के समय इयर्पा का पारायण होता है और रात्री में सवारी निकलती है और सवारी के समय रामानुज नुत्तन्दादि और इयल सार्रू का पारायण होता है ।
  • २२ वें दिन तिरुप्पल्लाण्डु और ४००० दिव्य प्रबन्धों का अनुसन्धान प्रारम्भ होता है ।

 

कुछ दिव्य देशों में अध्ययन उत्सव की कुछ विशेषतायें होती है –

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  • २२ दिन का उत्सव होता है, एक दिन जादा ( पहीला दिन ) । पहीले दिन तिरुनेडूण्डगम का पारायण होता है और आगे २१ दिनों का उत्सव होता है ।
  • अरयर स्वामी पाशुरों को अभिनय ( एक नृत्य नाटीका के प्रारूप में विभिन्न पहुलुओं द्वारा अभिनय करते है ) के रूप में भगवान, अम्माजी और आलवार आचार्य की गोष्ठी में निवेदन करते है ।
  • अरयर सेवा के समय रंगनाथ भगवान और रंगनायकी अम्माजी बड़े मंडप में विराजमान होते है और सामने बाजू आलवार और आचार्य विराजमान होते है ।

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  • तिरुवायमोली के पाशुरों को अभिनय के साथ अरयर स्वामी निवेदन करते है, पहीले दिन अरयर स्वामी जो निवेदन करते है, दूसरे दिन उसे अध्यापक गोष्ठी में निवेदन करते है ।
  • हर जगह शठकोपसूरी भगवान के श्रीचरणों में शरणागती करते है, लेकिन यहाँ पर अर्चक लोग भगवान को हाथ में लेकर आते है और शठकोपसूरी के मस्तक पर भगवान के श्रीचरणों को रखते है, इसे तिरुमुडी तोजल कहते है । यह दृश्य अत्यन्त विशेष और मनमोहक होता है । यहाँ पर भगवान की परगत शरणागती ( जीवात्मा को भगवान अत्यन्त उत्सुकता और आतुरता के साथ स्वयं स्वीकार करते है ) को देख सकते है ।
  • २२ दिनों का उत्सव होता है – एक दिन अंतिम में उत्सव होता है उसे “वीडु विडे तिरुमन्जनम ” ( विशेष अभिषेक होता है ) कहते है ।
  • जीवात्माओं के उद्धार हेतु उत्सव के अंतिम दिन भगवान शठकोपसूरी को पुनः लीला विभूति में भेजते है ।
  • विशाखा नक्षत्र से तिरुप्पल्लाण्डु का पारायण प्रारम्भ होता है ।

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श्री शठकोप स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी ( भगवान और अम्माजी की तरह ) के साथ शयन कर रहे है,

श्री वैकुंठ एकादशी केपहीले दिन आलवार तिरुनगरी के विशेष दर्शन

 

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  • तिरुवायमोली में शठकोपसूरी कहते है कि देवपीरान भगवान मेरे माता और पिता है । इस दिव्य देश के भगवान के साथ शठकोपसूरी का विशेष प्रेम ( लगाव ) है । पहीले शठकोपसुरी श्रीरंगम आते समय तुलैविल्लीमंगलम दिव्यदेश मेंभगवान के साथ कुम्भ मास के विशाखा नक्षत्र तक विराजमान रहकर बाद में आलवार तिरुनगरी के लिये प्रस्थान करते थे ।

 

  • इसकी स्मृति में कुम्भ मास के विशाखा नक्षत्र के दिन शठकोपसुरी इस दिव्य देश में आते है । पूर्ण दिवस भगवान के साथ विराजमान रहते है, अभिषेक, आराधन और गोष्ठी होती है और अंत में प्रस्थान करते है ।
  • अगले दिन से तिरुप्पल्लाण्डु का पारायण प्रारम्भ होता है, तब तक इस दिव्य देश में अनध्ययन काल माना जाता है ।

 

तिरुवाली / तिरुनगरी और तिरुनांगूर

  • सामान्यतःकार्तिक दिपोत्सव और परकालसूरी का तिरुनक्षत्र एक साथ आते है । अगर एक मास में दो कृतिका नक्षत्र आते है तो दूसरे नक्षत्र के दिन परकालसुरी का उत्सव मनाया जाता है । सभी दिव्य देशों में कार्तिक दिपोत्सव के दिन अनध्ययन काल का प्रारम्भ हो जाता है, परन्तु यहाँ पर ४००० दिव्य प्रबन्ध का निवेदन करते हुये परकालसूरी के उत्सव को मनाते हेतु तिरुनक्षत्र के बाद में अनध्ययन काल प्रारम्भ होता है ।

भूतपुरी

  • मकर मास के पुष्य नक्षत्र को गुरू पुष्य के रूप में मनाया जाता है, इसी दिन श्रीरामानुज स्वामीजी की अर्चा विग्रह की स्थापना होने के कारण इसे अत्यंत महत्व दिया गया है । अगर अध्ययन उत्सव साथ में आ जाता है तो उसे पहीले मनाया जाता है ।

श्रीवेंकटेश मन्दिर , मुम्बई – फनसवाडी

  • यहाँ पर उत्सव २१ दिनों का होता है , भगवान और अम्माजी सहीत शठकोपसूरी, परकालसूरी, विष्णुचित्त सूरी, रामानुज स्वामीजी और वरवरमुनि स्वामीजी २१ दिनों तक मण्डप में विराजमान रहते है ।
  • पहीले १० दिनों तक दोपहर में दिव्यप्रबन्ध का पारायण होता है । ( पगल पत्तू )
  • वैकुण्ठ एकादशी के दिन सुबह ५.३० बजे भगवान की सवारी निकलती है और वैकुण्ठ द्वार खुलता है, जहाँ आलवार आचार्यों की गोष्ठी दरवाजा खुलते ही भगवान का मंगलाशासन करते है और आलवारों आचार्यों की परिवट्ट मर्यादा होती है । दोपहर में अभिषेक होता है और रात में तिरुवायमोली का पारायण प्रारम्भ होता है ।
  • २० वें दिन रात में ८ बजे शठकोपसुरी की शरणागति होती है ।
  • २१ वें दिन इयर्पा शातुमुरा होता है और अगले दिन से तिरुप्पल्लाण्डु प्रारम्भ होता है ।
  • कार्तिक दीपोत्सव से लेकर अध्ययन उत्सव समाप्ति तक मास नक्षत्र, उत्सव मूर्ति अभिषेक और कल्याणोत्सव नहीं होता है । श्री प्रतिवादि भयंकर गादि स्वामीजी की उपस्थिती में उत्सव सम्पन्न होता है ।

इयर्पा शातुमुरै के पश्च्यात दूसरे दिन से हर दिव्य देश में तिरुप्पल्लाण्डु का पारायण होकर सभी सेवा सामान्य रूप में प्रारम्भ हो जाती है । और अनेक दिव्य देशों में अनेक विशेषतायें हम लोग देख सकते है ।

घरों में भी दिव्य देशों की प्रथानुसार अनध्ययन काल में दिव्यप्रबन्ध का पारायण नहीं होता है    

  • कार्तिक पूर्णिमा से लेकर इयर्पा शातुमुरा तक दिव्यप्रबन्ध का पारायण नहीं होता है ।इयर्पा शातुमुरा के दूसरे दिन से तिरुप्पल्लाण्डु का पारायण प्रारम्भ करते है । ( अपने नजदीक के दिव्य देश की प्रथानुसार अपने घरों में इसका अनुकरण किया जाता है )
  • कुछ लोग मकर मास के हस्त नक्षत्र तक याने कुरेश स्वामीजी के तिरुनक्षत्र तक पारायण नहीं करते है । इसका इतिहास है की श्रीरंगनाथ भगवान और शठकोप स्वामीजी के साथ अध्ययन उत्सव में भाग लेने के लिये श्रीरंगम जाते थे और पुनः घर लौटने के लिये बहुत समय लगता था । इसलिये मकर मास के हस्त नक्षत्र से प्रारम्भ करते थे ।

अनध्ययन काल में कौन से पाठ करना चाहीये और क्या सीखना चाहीये ?

  • सामान्यतःमंदिरों में अनध्ययन काल के दौरान तिरुप्पावै की जगह उपदेश रत्नमालै और कोईल तिरुवायमोली / रामानुज नुत्तन्दादी की जगह तिरुवायमोली नुत्तन्दादी का पारायण होता है ।
  • धनुर्मास में तिरुप्पल्लीयेलूच्ची और तिरुप्पावै का पारायण होता है ।
  • अध्ययन उत्सव के दौरान एक बार ४००० दिव्य प्रबन्ध का पारायण होता है ।
  • अनध्ययन काल के समय घरों में तिरुवाराधन के समय ४००० दिव्य प्रबन्धों के पाशुरों का निवेदन नहीं किया जाता, केवल धनुर्मास में तिरुप्पल्लीयेलूच्ची और तिरुप्पावै का पारायण होता है ।
  • पूर्वाचार्यों के संस्कृत स्तोत्र और तमिल प्रबन्ध जैसे ज्ञानसारम, प्रमेयसारम, उपदेश रत्नमालै, तिरुवायमोली नुत्तन्दादी का पारायण कर सकते है ।
  • रहस्य ग्रन्थों का अध्ययन और अनुभव करते हुये कालक्षेप करे ।

दिव्य प्रबन्धों का पारायण नहीं होता है परन्तु यह समय अत्यन्त मनमोहक होता है, जैसे की –

  • श्रीवैष्णवों के लिये अध्ययन उत्सव बहुत विशेष और महत्वपूर्ण है, २० दिनों तक पूर्ण भगवत अनुभव का आनन्द लेते हुये कालक्षेप करेगें ।
  • इसी समय में धनुर्मास आता है,जिसमे की गोदम्बाजी द्वारा रचित तिरुप्पावै का दिव्य अनुभव करते है ।
  • इसी समय पूर्वाचार्यों द्वारा रचित स्तोत्रों का निवेदन कर सकते है जो की शास्त्र का सार भाग अत्यन्त सरल संस्कृत भाषा में उपलब्ध है । तमिल के कुछ प्रबन्धों का भी निवेदन कर सकते है।

अध्ययन उत्सव और अनध्ययन काल की कुछ विशेषताओं का हम लोग अनुभव किए है ।

      वरवरमुनि स्वामीजी के अवतार के बाद शठकोपसुरी और तिरुवायमोली की विशेषता ओर बढ़ गयी, उन्होने जगत के उद्धार हेतु पूर्ण जीवन भर दिव्य प्रबन्ध के परम सिद्धातों का उपदेश दिया । आलवार और आचार्यों के साहित्यों में वर्णित श्रीवैष्णव के लक्षणों को प्रदर्शित करते हुये अपने ग्रन्थों में प्रमाणित किया । वरवरमुनि स्वामीजी के वैभव को जानकर रंगनाथ भगवान ने स्वयं आज्ञा करके भगवद विषय ( कलिवैरिदास स्वामीजी का व्याख्यान और अन्य तिरुवायमोली के व्याख्यानों का ) पर एक वर्ष तक कालक्षेप करने को कहा । मिथुन मास के तुला नक्षत्र के दिन कालक्षेप समापन हुआ और रंगनाथ भगवान बालक रूप में आकर “ श्रीशैलेश दयापात्रम ” तनैया का निवेदन किया और वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार किया ।

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॥ आलवार आचार्य जियर तिरुवडीगले शरणम  ॥

Source: http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/anadhyayana-kalam-and-adhyayana-uthsavam.html

In thamizh: http://srivaishnavagranthamstamil.wordpress.com/2013/12/02/anadhyayana-kalam-and-adhyayana-uthsavam/

यतिराज विंशति – 2

श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् ।
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं श्री वत्सचिह्नशरणं यतिराजमीड़े ॥ २ ॥

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श्री रङ्गनाथ भगवान

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श्री रङ्गराज चरणाम्बुज राजहंसं            : श्री रङ्गनाथ भगवान के चरणकमलों                       के राजहंस
श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम्    : श्रीशठकोपमुनि के चरणकमलोंके भ्रमर
श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रं     : श्री विष्णुचित्त श्री परकाल आदि                                                   आल्वारोंके मुख कमल खिलानेवाले सूर्य
श्री वत्सचिह्नशरणं                             : श्रीवत्सचिह्नमिश्र के आश्रयभूत
यतिराजम्                                        : श्री रामानुज मुनि की
ईडे                                                    : स्तुति करता हूँ

पिछले श्लोक में नतमस्तक होकर प्रणाम करने की बात कही गई। इस श्लोक में वाणी को सफल करने के लिए स्तुति करने की बात कही गई है। श्रीरामानुज मुनि की उपमा राजहंस एवं भ्रमर को संदेशवाहक बताया है। यहाँ पर आचार्य श्रीरामानुज को वही उपमा दी गई है।

श्रीरंगराज चरणाम्बुज राजहंसम् – जैसा कि जीवनवृत से ज्ञात होता है आचार्य श्रीरामानुज का श्रीरंगनाथ भगवान के प्रति विशेष अनुराग था। साथ ही श्रीरंगनाथ ने भी शरीर रहते तक श्रीरंगनगर में निवास करने का आदेश दे कर अपना विशेष अनुग्रह प्रदर्शित किया था। जिस प्रकार राजहंस कमल के समीप निवास करता है उसी प्रकार यतिराज श्रीरंगनाथ भगवान के चरणों में निवास करते थे। राजहंस के सारे गुण यतिराज में मिलते है। जिस प्रकार हंस दूध और जल को अलग – अलग करने की शक्ति रखता है , उसी प्रकार यतिराज में सार एवं असार को पृथक़् –पृथक़् करने की शक्ति है। हंसावतार भगवान ने वेदों का उपदेश दिया , यतिराज भी शिष्यों को उपदेश देते थे। राजहंस कीचड़ से प्रेम नहीं करता , उसी प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीरामानुज का संसार से प्रेम नहीं था। हंस स्त्रियों का अनुकरण करता है। यतिराज ने चेतन जीवों के पुरषकार भी अपेक्षित है। श्रीवेदान्तदेशिक स्वामीजी ने ‘दते रंगी निजमपि पदं देशिकादेशकांक्षी’  कहकर इसको बतलाया है।

श्रीमत्परांकुश पदाम्बुज भृंगराजम् – पिछले श्लोक में ‘ परांकुशपादभक्त ’ कहकर स्वरूपयुक्त दास्य का निर्देश किया गया था। इस श्लोक में गुणप्रयुक्त दास्य का उल्लेख किया गया था। कमल की मधुरिमा से भ्रमर आकर्षित होता है। उसी प्रकार आलवार श्रीशठकोप के चरणों को अमृतप्रापकत्व समझ कर यतिराज उधर आकर्षित हुए। भ्रमर चंचरीक है। वह एक स्थान पर ही सीमित नहीं रहता। उसी प्रकार यतिराज भी विभिन्न दिव्यदेशों में उपस्थित हो कर भगवान का अनुभव किया करते थे। श्री शठकोप के पद्यों को भी परांकुश पद कहा जा सकता है। अतः पद से सहस्त्रगीति का संकेत मानने पर यह अर्थ निकलता है कि श्रीशठकोप की सूक्तियों में भगवत्सम्बन्धी जो माधुर्य है उसको यतिराज भ्रमर की तरह ग्रहण करते हैं।

श्रीभट्टनाथ परकाल मुखाब्जमित्रम् – आलवार श्रीविष्णुचित एवं आलवार श्रीपरकाल के मुख कमल को विकसित करनेवाले सूर्य कहने का तात्पर्य यह है की जिस प्रकार श्रीविष्णुचित ने श्रीमन्नारायण का परत्व स्थापित किया उसी प्रकार उसी मार्ग से श्रीरामानुज ने परतत्व की सिद्धि की। श्रीपरकाल स्वामीजी ने मन्दिर, गोपुर, मण्डप आदि निर्माण कर दिव्यादेशों की सेवा की। श्रीरामानुज भी वही करते हैं जिससे परकाल संतुष्ट होते हैं। यहाँ पर ‘मुख’ शब्द से यह भाव भी निकलता है कि श्रीविष्णुचित्त एवं श्रीपरकाल स्वामीजी जिन आलवारों में प्रमुख हैं उन सभी आलवार रूपी कमलों को विकसित करने वाले सूर्य श्रीरामानुज हैं।

श्रीवत्सचिह्न शरणम् – श्रीभाष्यकार की शिष्य मण्डली में श्रीवत्सचिह्नमिश्र के सम्बन्ध में विशेष रुप से इस विशेषण का वर्णन क्यों किया गया है ? वस्तुतः उनमें यतिराज के प्रति विशेष प्रेम था जिसके फलस्वरूप उनको यतिराज का चरण स्थानीय माना जाता है। शिष्य दाशरथि में भी यह विशेषता थी। श्रीमद्वरवरमुनि ने यहाँ पर उनका उल्लेख किया है। ‘चरणं’ यह भी पाठ है ॥ २ ॥

यतिराज विंशति – 1

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशयपरांकुश पादभक्तम् ।
कामादि दोषहरमात्म पदाश्रितानां रामानुजं यतिपतिं प्रणमामि मूर्ध्ना ॥ १ ॥

श्रीमाधवाङ्घ्रि जलजद्वय                 : भगवान के कमल रूपी चरणों की
जलजद्वयनित्यसेवा प्रेमाविलाशय          : नित्य सेवामें प्रेम से जो व्याकूलित हैं
प्रेमाविलाशयपरांकुश पादभक्तम्             : ऐसे श्री शठकोप मुनि के चरणोंके भक्त
आत्म पदाश्रितानाम्               : अपने चरणोंका आश्रय लेने वालों के
कामादि दोषहरं                         : काम आदि दोषोंकों नष्ट करने वाले
यतिपतिं रामानुजं                 : यतिराज श्री रामानुज मुनि को
मूर्ध्ना प्राणमामि                  : सिर से प्रणाम करता हूँ

Nammazhwar-2परान्गुस

ramanujar-sriperumbudhur-2रामानुजाचार्य

mamuni-artश्री वरवरमुनि

श्रीशठकोप मुनि के चरणों के अनुरागी, अपने चरणानुरागियों के दोषों का निवारण करने वाले श्री रामानुज मुनि को प्रणाम करता हूँ। यद्यपि श्री रामानुज मुनि में उनकी महत्ता को व्यक्त करनेवाली अनेकों विशेषतायें मिलती हैं तथापि उन सब में उनका श्रीशठकोप मुनि के चरणों का रसिक होना बढ़ कर है। श्रीरग़ांमृत कवि एवं आचार्य हृदयकार ने इसका उल्लेख किया है। श्रीमद्वरवरमुनी ने  “परांकुशपादभक्तम्” कह कर इसी का निर्देश किया है।

श्री शठकोप मुनि कैसे थे ? इस प्रश्न का उत्तर श्लोक के पूर्वार्ध में मिलता है। भगवान के चरण कमलों को ही वे अपना परम प्राप्तव्य समझते थे। उनमें उनकी सतत प्रेमव्याकुलता थी। कर्म जनित व्याकुलता हेय होती है। चरणों की उपादेयता का संकेत यहाँ पर हैं। श्रीवचनभूषण और उसकी व्याख्या में बताये गये सिद्धोपाय का यहाँ पर स्मरण किया जा सकता है।

इस श्लोक में ‘ परांकुश ’ नाम से श्री शठकोप मुनि का उल्लेख किया गया है। ‘ परांकुश ’ शब्द की व्युत्पति दो प्रकार की होती है। पर अर्थात दूसरे लोगों के अंकुश तथा पर अर्थात परमतत्व के अंकुश। दूसरे लोगों से तात्पर्य उन लोगों का है जो परमात्मा परमतत्व को निर्गुण, निराकार एवं विभूतिहीन समझते हैं। श्री शठकोप अपनी दिव्य सूक्तियों के द्वारा उन पर अंकुश के रूप में स्थित हैं और उनकी प्रतिगामिता को रोकते हैं। परात्पर भगवान के अंकुश होने का तात्पर्य यह है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान स्वयं उनके वशीभूत हैं। यह श्रीशठकोप मुनि ने सहस्त्रगीति में स्वयं स्वीकार किया है।

श्लोक के उत्तरार्ध का आरम्भ ‘ कामादि दोषहर ’ से हुआ है। ‘आदि’ से क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अज्ञान, असूया अभिप्रेत है। ‘कामादि हरम्’ न कह कर ‘कामादि दोष हरं’ कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित कामना दोष नहीं। नियमानुकूल विहित कामना का प्रवेश गुणों कि कोटी में होता है। भगवान के सम्बन्ध में कामना, भगवान एवं भागवतों के विरोधी के प्रति क्रोध, मात्सर्य आदि गुण हैं, दोष नहीं। काम आदि दोषों के निवारण का सामर्थ्य होने के कारण ‘दोष हरं’ कहा गया है। नतमस्तक होकर प्रणाम करने कि बात ‘मुर्ध्ना प्रणमामि’ से व्यक्त होती है। मस्तक झुकाने के प्रयोजन आलवार – सूक्तियों में वर्णित हैं ॥ १ ॥

तनियन् श्लोक

तनियन् श्लोक

mamunigal-kanchi

श्रीमद्वरवरमुनि

eRumbiappA-kAnchi - original

देवराज गुरु

य: स्तुतिं यतिपतिप्रसादनीं व्याजहार यतिराज विंशतिम् |
तं प्रपन्नजन चातकाम्बुदं नौमि सौम्यवरयोगिपुङ्गवम् ||

य:                                  : जिन श्रीमद् वरवरमुनि ने
यतिपति प्रसादनीं           : यतिराज श्री रामानुज मुनि को प्रसन्न करनेवाली
यतिराजविंशतिं              : यतिराजविंशति नामक
स्तुतिं व्याजहार              : स्तुति अनुगृहीत की
प्रपन्नजन चातकाम्बुदं   : प्रपन्न जन रूप चातक के मेघ
तं सौम्यवरयोगि पुङ्गम् : उन श्रीमद् वरवर मुनि का
नौमि                             : स्तवन करता हूँ

यतिराज श्री रामानुज मुनि को प्रसन्न करने वाली यतिराजविंशति नामक स्तुति के रचयिता प्रपन्न जन के सभी अर्थों की वर्षा करने वाले श्रीमद्वरवरमुनि का स्तवन करता हूँ।

इस श्लोक के सम्बन्ध में ध्यान देने की बात यह है कि इसमें श्रीमद्वरवरमुनि का “ सौम्यवरयोगिपुगंव ”के नाम से स्मरण किया गया है। इस स्तुति की रचना उनहोंने गृहस्थाश्रम में ही कर ली थी किन्तु इस तनियन् श्लोक की रचना तब हुई जब उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था अतः इस श्लोक में ‘ योगिपुगंव ’ नाम से संकेत असंगत न होकर संन्यासी होने की भावी घटना का बोधक है।

यतिराज विंशति – अवतारिका

३० वें श्री तोदाद्रीपीठाधिपति श्रीमत्परमहंसेत्यादी जगद्गुरू
श्री श्री कलियन् वानमामलै रामानुज जीयर् स्वामीजी

द्वारा अनुगृहीत मङ्गलाशासन पत्र का अंश भाग

 

“भगवद् भाष्यकार श्रीरामानुजस्वामी के प्रति यह स्तोत्र श्रीरम्यजामातृयोगीन्द्र द्वारा रचित है। यद्यपि यह श्लोकों की संख्या की दृष्टि से छोटा स्तुति-ग्रंथ है, तथापि इसमें श्रीवरवरमुनीन्द्र स्वामी का जो भावोद्गार ललित और गम्भीर वाग्गुम्फनके द्वारा हुआ है वह परम प्रशंसनीय बिराजता है। इस श्रेष्ठ स्तोत्र – ग्रंथ के सभी श्लोक हम सबके लिए भी अनुसन्धेय हैं। आलवन्दार माने श्रीयामुनमुनि आदि महाचार्यवर्यों के “अमर्याद: क्षुद्र:” आदि वचनोंका स्मरण कराने वाले पद्य, नैच्यानुसन्धान के द्वारा आविष्कृत उनके असली महत्त्व के दर्पण हैं। “पापे कृते यदि भवन्ति” श्लोक के भाव की जानकारी हमें मिल जाए तो हम पापाचरण से अवश्य निवृत्त हो जाएँगे।

प्रियों, इस यतिराज विंशति का अनुसन्धान, हमारे श्रीवैष्णव सज्जनों के द्वारा, श्रीदेवराजगुरु (एरूम्बियप्पा) विरचित श्रीवरवरमुनीन्द्र पूर्व दिनचर्या तथा उत्तर दिनचर्या के मध्य में किया जाता है। अस्तु; ‘यतिराज विंशति’ स्तोत्र की संगृहीत व्याख्या महाविद्वन्मणि श्रीकांची प्रतिवादिभयंकर जगदाचार्य सिंहासनाधीश श्रीमदण्णगंराचार्यस्वामी द्वारा सरल हिन्दी में कि गयी है।“