Monthly Archives: November 2015

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ५

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४

२४) स्वस्वरूप विरोधी – जीवात्मा का सत्य स्वभाव समझने में बाधाएं

भागवत शेषत्वम – जीवात्मा का अंतस्थ स्वभाव

स्वस्वरूप यानि जीवात्मा का सत्य स्वभाव। जीवात्मा ज्ञान से बना है ऐसा समझा जाता है और उसमे ज्ञान, शेषत्व और पारतंत्र्य है। ज्ञान यानि विध्या। जिसके पास ज्ञान है उसे जैसे है वैसे समझना चाहिये। इस विषय में हम बाधाएं देखेंगे।

  • किसी भी वस्तु में ज्ञान (सत्य ज्ञान), ज्ञान अनुधयं (ज्ञान का अभाव ज्ञान रहित स्थिति), अन्यथा ज्ञान (वस्तु के गुण को नासमझना – शंख को पीले रंग का मानना) और विपरीत ज्ञान (वस्तु को हीं नहीं समझना – स्तम्भ को मनुष्य समझना)। इन ज्ञान में अनुधयं ज्ञान, अन्यथा ज्ञान और विपरीत ज्ञान बाधाएं है। अनुवादक टिप्पणी: इसे हम उदाहरण सहित समझेंगे।
  • ज्ञान अनुधयं – यह नहीं जानना कि आत्मा सचेतन है (ज्ञानी) और शरीर से भिन्न है (असचेतन) यह सम्पूर्ण ज्ञान के अभाव कि परिस्थिति है।
  • अन्यथा ज्ञान – यह मिथ्याबोध में रहना कि आत्मा भगवान श्रीमन्नारायण को छोड़ देवताओं का दास है यह परिस्थिति आत्मा के शेषत्वम को मिथ्याबोध समझना है।
  • विपरीत ज्ञान – जीवात्मा को स्वतंत्र समझना मिथ्याबोध है यह जीवात्मा के स्वयं के स्वभाव को मिथ्याबोध है।
  • जब भगवान जीवात्मा में रस लेते है और अगर वह जीवात्मा के शेषत्व को जीतते है यानि अगर वह जीवात्मा को उच्च स्थान पर रखते है और स्वयं नीचा स्थान ग्रहण करते है और जीवात्मा कि सेवा करने का प्रयत्न करते है जीवात्मा को पीछे नहीं हटना चाहिये यह विचार कर कि उसे हमेशा भगवान का दास बनकर रहना है जो शेषत्व की छटा दिखाता है। ऐसे पीछे हटना विरोधी है और भगवान के आनन्द में बाधा है। शेषत्व यानि भगवान का दास बनकर रहना और उनकी सेवा करने में तत्पर रहना। उदाहरण के तौर पर हमारे पारम्पारिक जीवन शैली में यह देखा जाता है कि स्त्री अपने पति कि बहुत तरिके से सेवा करती है। परन्तु अगर पति अपने विशेष प्रेम और स्नेह को छोड़ अपनी पत्नी कि सेवा करता है तो उस पत्नी को इससे पीछे हटकर “नहीं आप मेरी सेवा नहीं कर सकते है मुझे आपकी सेवा करना चाहिये” ऐसा नहीं कहना चाहिये – जिसे अपनी पत्नी कि सेवा करने में बहुत आनन्द आता है ऐसे पति के आगे यह बाधा है। परमात्मा और जीवात्मा के मध्य में पति पत्नी का सम्बन्ध है। इस मत से जीवात्मा (जो पत्नी है) को भगवान कि सेवा करनी चाहिये। परन्तु अगर भगवान को जीवात्मा कि सेवा कर आनन्द प्राप्त करना है तो जीवात्मा को भगवान के आनन्द को ध्यान में रखकर इसे सुगम करना चाहिये। इसी तत्त्व को श्रीपिलै लोकाचार्य स्वामीजी ने मुमुक्षुपड़ी के ९२ सूत्रं वही शब्दो के साथ समझाया है जैसे यहाँ इस व्याख्या में समझाया गया है।
  • शेष (दास) यानि वह जो शेषी (स्वामी) के कीर्ति को बढ़ाता है। पारतंत्रीयं यानि स्वामी के पूर्ण अधिकार में रहना जैसे अचित (अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई अपनी घड़ी को मेज पर रखता है या हाथो पर बांधता है तो सामान्यत: वह घड़ी अपने मालिक से कभी प्रश्न नहीं करेगी – जीवात्मा को भी भगवान के प्रति ऐसे हीं रहना चाहिये)। परन्तु पिछले बात कि तरह जब भगवान को जीवात्मा से आनन्द लेना हो तो बिना प्रतिक्रिया के जीवात्मा पत्थर बनकर रह नहीं सकता है। भगवान के आनन्द को बढाने के लिये जीवात्मा को सही तरीके से उत्तर देना चाहिये है। ऐसा न करना विरोधी है। (अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीसुदामाजी भगवान कृष्ण को देखने जाते है तब भगवान सुदामाजी कि चरण सेवा करते है और बहुत अच्छी तरह सुदामाजी का खयाल करते है जिसके लिये सुदामाजी तैयार हो जाते है क्योंकि यह भगवान को आनन्द दे रहा है। उसी तरह जब भगवान को श्रीशठकोप स्वामीजी कि सेवा करने कि इच्छा हुयी तब उन्होंने आल्वार के दाहिना चरण लिया और बहुत आनन्द से उनकी चरण सेवा करने लगे। शुरु में आल्वार व्याकुल हो गये परन्तु फिर उन्हें पता चला कि भगवान को क्या चाहिये। इसलिये बादमें उन्होनें अपना दाहिना चरण निकालकर बांया चरण भगवान के सामने रखा। भगवान को बहुत आनन्द आया और उनकी खुशी दुगनी हो गयी। इसलिये जो भगवान के दासों के कार्य को जवाब नहीं देता है और स्वयं के पारतंत्रीयं को बताता यह विरोधी है।
  • भागवत शेषत्व को दूसरा दर्जा देना (और भगवद शेषत्व को पहिला स्थाना देना) बाधा है। हम स्वाभाविक तरिके से भगवान के दास है। इसे आगे और स्पष्ट कर भागवतों के दासत्व कि उन्नति की और बढ़ना चाहिये। जब कोई उन्हें जोड़ उनके दासों कि सेवा करता है तो भगवान स्वयं यह पसन्द करते है । इसलिये भागवत शेषतत्व का महत्त्व कम है ऐसा नहीं समझना चाहिये। ऐसा समझना विरोधी है।
  • यही बात आचार्य के विषय में भी लागु होती है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को अपने आचार्य के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिये और उनकी हर स्थिति में सेवा करनी चाहिये। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण मे पूर्ण समर्पण होने का महत्त्व दर्शाते है। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी इसका मूल तत्त्व उपदेश रत्न माला में बताते है।

२५) पर स्वरूप विरोधी – भगवान के सत्य स्वभाव को समझने में बाधाएं

एक जिसे गरुड आल्वार ने उठाया है (वह जो वेदात्मा नाम से पुकारे जाते है) वही परम श्रेष्ठ भगवान है।

परस्वरूप यानि परमात्मा का सत्य स्वभाव। भगवान श्रेष्ठ, सब जाननेवाला, सर्वशक्तिमान, सारे संसार के स्वामी, जो दोषरहित है और जो सभी शुभ गुणों से भरा है। इस विषय में हम बाधाएं देखेंगे।

  • एक विषय के लगाव में और सांसारिक आनन्द में लगे रहना बाधा है। यह प्रकृति परदे के जैसे है जो भगवान के सत्य स्वभाव को छुपाता है। प्रकृति तीन गुणों से बनी है – सत्व, रजो और तमो गुण। शारीरिक आनन्द का दास बनकर रहना हमें भगवान से दूर करेगा। जब किसी व्यक्ति के शरीर में सत्व गुण बढ़ता है तो यह शरीर भगवान का स्वभाव समझने में बहुत प्रभावशाली होता है। परन्तु जब रजो / तमो गुण बढ़ता है तो भगवान से दूर लेकर जाता है। अत: शरीर के आनन्द का दास बनकर रहना विरोधी है।
  • सांसारिक सोचवाले मनुष्य को उच्च समझना बाधा है। उसी प्रकार देवता जैसे ब्रम्हा, रुद्र आदि भी जन्म मरण के चक्कर में फँसे है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के 10वें पाशुर में कहते है “नाट्टिनान देय्वम एडगुम ताने” सभी देवता को निर्धारित कार्य दिया गया है और उन्हें श्रेष्ठ माना भी नहीं जा सकता है।
  • यह विचार नहीं करना कि “यह देवता भी भगवान से हीं नियंत्रण किये गये है”। सभी जन भगवान के पूर्णत: आधीन है। ऐसा विचार न करना बाधा है।
  • भगवान कि सौलभ्य को देख उनकी श्रेष्ठता पर संदेह करना बाधा है। वात्सल्य, सौलभ्य, सौशिल्य आदि भगवान के सबसे इच्छुक गुण है। इन्हें बहुत प्यारा समझना। परन्तु अगर कोई यह विचार करता है कि “क्योंकि भगवान बिना कष्ट से प्राप्त होते है वह भी मेरे जैसा होना चाहिये” यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीकृष्ण गीताजी में कहते है (९॰११) “अवजानन्ति माम् मूद…” – मूर्ख पुरुष मुझे मनुष्य समझते है (मेरे अवतार के समय) और वह मेरी श्रेष्ठता को नहीं समझते है।
  • भगवद विषय में अज्ञान और अन्यता ज्ञान होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें भगवान के परत्वम और सौलभ्य को अच्छी तरिके से समझना चाहिये। सही तरीके से नहीं समझना हमे भगवद अपचार कि और ले जाता है।

२६) स्वानुभव विरोधी – स्वयं को अनुभव करने में बाधाएं

स्वानुभव यानि स्वयं के आत्मा के अनुभव / आनन्द एक निर्मल स्थिति में लेना। हालाकि भगवान के अनुभव / आनन्द से भी यह कम है फिर भी आत्मानुभव को आनंददायक समझा गया है। आत्मा जो सांसारिक शरीर में बंधा है वह स्वयं भी आत्मानुभव में बाधा है। इसमें बाधा इस प्रकार है:

  • देह वासना से आनन्द प्राप्त करना विरोधी है। हमारे पिछले देह आनन्द के अनुभव जो इंद्रियों से प्राप्त हुए उसका जो प्रभार है वह सत्य अनुभव के साथ भी रहेगा। यह वासना बहुत घातक है और यह हमें रुचि की ओर ले जाता है। अनुवादक टिप्पणी: वासना कम चेतन की छाप है और रुचि जान बूझकर उत्पन्न किया हुआ है।
  • प्रसन्नता / स्मरण उनसे जो इस शरीर से सम्बधीत है – पत्नी, बच्चे, धन, आदि बाधा है और आत्मनुभव को सीमित करता है।
  • रुची जो वासना से उत्पन्न हुई है विरोधी है। सामान्यत: कहा जाता है कि “बिल्ली जिसने दूध को चखा है उसे फिरसे चुराने के लिये लौट कर आयेगी”। अनुवादक टिप्पणी: एक बार हमारा शरीर प्रसन्नता और सुख का रस लेता है तो उसे छोड़ना बहुत कठिन हो जाता है और इंद्रियों पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। इसलिये हमारे ऋषी मुनियोंने हमे त्याग भावना सिखाई नाकि इंद्रियों के लिये प्रसन्न होना। कितना भी प्रसन्न हो इच्छायें कभी भी पूर्ण नहीं होती बल्कि वह इच्छाओं को और बढ़ाती है।

२७) परानुभव विरोधी परमात्मा का अनुभव करने में विरोधी

अर्चावतार – तिरुक्कुरुंगुड़ी नम्बी – सबसे अधिक मोहित करनेवाले

परानुभव यानि सच्चे तरिके से समझना और भगवान के स्वरूप, रूप, गुण, विभुति का अनुभव करना। भगवान के पाञ्च प्रकरण (रूप) है – पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी और अर्चा अवतार। इन सब में अर्चा अवतार को हीं हमारे इंद्रिया अनुभव कर सकती है जैसे श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुनेडुन्दाण्डगम के पाशुर में कहा है “पिन्नानार वणंगुम ज्योति” – तो आनेवाली पीढ़ी पुजा करेगी (विभव अवतार के पश्चात श्रीकृष्ण भगवान से समाप्त होकर)। अब बाकि सब मानस साक्षात्कार से अनुभव किया जा सकता है। अनुभव भगवान के प्रति प्रेम कि ओर ले जाता है। यह प्रेम भगवान के प्रति प्रेम सेवा कराता है। यह सभी अनुभव के भाग है – ऐसे अनुभव में जो भी अडचन है वह विरोधी है। इस विषय में हम बाधा देखेंगे।

  • स्वयं पर केन्द्रित कार्य विरोधी है। सहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अन्नाळ् नी तन्त आक्कैयिन् वळि उळल्वेन्” – मैं इस शरीर और इंद्रीयों के पीड़ा से दुखीत हूँ जो मुझे आप से प्रदान हुए हैं। शरीर और इंद्रीयों का उपयोग कर उपर बढ़ने को छोड़, स्वयं पर केन्द्रित कार्य पर उपयोग करना भगवद अनुभव में बाधा है।
  • भगवान के दिव्य गुणों से ईर्ष्या करना विरोधी है। स्वयं के अनगिनत पापों को छोड़ भगवान के गुणों से द्वेष करना विरोधी है जैसे शिशुपाल, दुर्योधन आदि ने किया। यह विरोधी है।
  • दूसरे संसारी (जो भूत ग्रस्त है) के बारे में सुनकर शोक हरण करना विरोधी है।
  • उसके श्रेष्ठता से अभिमत होना और उसे छोड़ना विरोधी है। श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुनेडुन्दाण्डगम के पाशुर में कहा है “अवरै नाम देवर एन्रञ्जिनोमे मैं यह सोच कर डर गया कि वह श्रेष्ठ है। परन्तु आल्वार के अनुसार उनमें और भगवान के मध्य में यह श्रेष्ठ वार्तालाप है – यह सोच के बाहर है परन्तु सामान्यत: यह सुझाव किया गया है कि भगवान के श्रेष्ठता के प्रति संतुष्ट होना और भगवान से दूर जाना बाधा है।

२८) संस्लेश विरोधी जीवात्मा का परमात्मा के साथ समागम होने में विरोधी

संस्लेश यानि भगवान के साथ अनुभव करना। यह मन का अनुभव हो सकता है या प्रत्यक्ष अनुभव। भगवान के साथ दोनों का अनुभव करने को संस्लेश कहा गया है। यह परानुभव के समान विषय है। हम इस विषय में बाधायें देखेंगे।

  • भगवान के श्रेष्ठता से अभिमत होना और उनके साथ को छोड़ना विरोधी है। पिछले विषय में चर्चा हो गयी है।
  • यह सोच कर कि आत्मा का महत्त्वपूर्ण नहीं भगवान के गुणों से संतुष्ट होना और उनके साथ से दूर होना यह बाधा है। इसे इस तरह समझाया गया है कि कम महत्त्व वाली आत्मा भगवान से जुड़े तो भगवान के गुण कम होंगे और ऐसे विचार किसी को भी भगवान से सम्बन्ध रखने में बाधा होंगे। इस दशा को “वलवेझुलगु तलैयेदुत्ताल” कहते है। सहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अडियॅ चिरिय ज्यानत्तन्, अरितलार्क्कुम् अरियानै – कण्णनै – अडियॅ काण्बान् अलट्रुवन्, इतनिल् मिक्कोर् अयर्वुण्डे” – मैं बहुत अज्ञानी हूँ और बड़े साधुओं को भी उनके दर्शन प्राप्त करना मुश्किल है और भगवान ने कृष्ण का अवतार लिया। मैं उनके दर्शन प्राप्त हेतु रो रहा हूँ। इससे बड़ा मूर्खता का कार्य और क्या है? भगवान और आल्वारों के बीच की ऐसी वार्तालाप को उनके मध्य में बहुत प्रेम ऐसा समझा जाता है। परन्तु हमारे लिये, हमे अपने आप में दोष देखकर भगवान से सम्बन्ध को नहीं तोड़ना है।
  • बिना माता लक्ष्मीजी के पुरुषकार के भगवान के निकट जाना विरोधी है। भगवान स्वतन्त्र है और किसी के नियंत्रण में नहीं है। अगर हम उनके समीप सीधे जाते जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “एन् पिळैये निनैन्तु अरुळात तिरुमाल्” – केवल मेरे दोष देख भगवान श्रीमन्नारायण मुझ पर कृपा नहीं करते है, भगवान हमारे कर्मानुसार फिर से संसार में डाल देंगे। परन्तु अगर हम माता लक्ष्मीजी के पुरुषकार के साथ जायेंगे तो हमारी इच्छा पूर्ण होगी। पुरुषकार यानि सिफारिश। वो जो हम सब कि माता है चाहती है कि भगवान हम सब कि गलतियों को माफ करें (वैसे हीं एक पिता माँ के कहने पर अपने ब्च्चों को क्षमा कर देता है)। यह पुरुषकार अम्माजी का स्वभाव है और इसका तिरस्कार करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: इस संसार में आचार्य अम्माजी को संबोधित करते है और हमें भगवान के निकट ले जाते है।
  • यह सोचना कि भगवान को प्राप्त करना बहुत कठिन है और उनके सम्बन्ध से दूर जाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: हालाकि जो स्वयं के बल पर निर्भर रहते है उनको भगवान कि प्राप्ति मुश्किल है परन्तु जिसने आचार्य के माध्यम से पूर्णत: भगवान कि शरणागति कर ली है उसके लिये बहुत आसान हो जाती है।

२९)विश्लेश विरोधी – जीवात्मा के परमात्मा से बिछड़ने में बाधाएं
विश्लेश यानि कोई प्रिय से बिछड़ना। इस व्याख्यान से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्लेश स्वयं बाधा है।

 

श्रीशठकोप स्वामीजी – श्रीरंगम

 

  • अधिक उपासना न करना या जुदाई के समय साधारण रहना विरोधी है। “भक्ति पार्वस्यं” (भगवान के भक्ति में पूर्णत: भिगना) को “परगुणाविश्ता” (भगवान के गुण प्राप्त करना) ऐसा समझा जाता है, श्रीशठकोप स्वामीजी कि पेरिया तिरुवंदादि के ३४वें पाशुर में “काल आलुम नञ्जलियुम” (चरण अपने आप खड़े नहीं होते, हृदय पूर्णत: पिघल जाता है) और श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “कन्गुलुम् पगलुम् कण्तुयिलऱियाळ् कण्ण नीर् कैगळालिरैक्कुम् – एन्गने दरिक्केन् उन्नै विट्टु(श्रीशठकोप स्वामीजी कि माता अपनी पुत्री के बारें में कहती है “मेरी पुत्री दिन रात सो नहीं पाती और निरन्तर रोती हुई यह विचार करती रहती है कि किस तरह बिना श्रीरंगनाथ के रहूँगी”)। बिछड़ने के समय कष्ट भोगने कि परिस्थिती को पार्वस्यं कहते है। भगवान से बिछड़ने के समय बिना कष्ट भोगे साधारण रहना विरोधी है।
  • भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता (१०.९) में कहते है “मच्चित्ता मद्गत प्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च माम् नित्यम् तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥” – मेरे भक्त निरन्तर मेरा स्मरण करते है, वह मुझे अपना जीवन समझते है और मेरे कार्य को आपस में चर्चा करते है। ऐसी मेरी श्रेष्ठ चर्चा से उन्हें (दोनों बोलनेवाले और सुननेवाले को) बहुत आनन्द और खुशी प्राप्त होती है। यह बटवारे और भगवान के चर्चा के कार्य और स्तुति, संतुष्ट और आनन्दमय रहने को सामान्यत: “बोधयंत: परस्परम” कहते है।
  • यह बहुत अभिलाषी है। ऐसी चर्चा में जो भाग लेते है उन्हें “उचाट तुणै” कहते है। वह सब के हृदय में बिछड़ने का दुख को दूर करेंगे। ऐसे भरोसा रखने वाले मित्र से बिछड़ते समय भगवद विषयम में चर्चा नहीं और दुख बढता है और वह बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “चेन्जुडर्त् तामरैक्कण् चेल्वनुम् वारानाल् – नेन्जिडर् तीर्प्पार् इनियार्? निन्रु उरुगुगिन्रेने” – जब लाल कमल नयन वाले भगवान नहीं आते है तो मैं पूर्णत: बिछड़ने के दुख में पिघल जाता हूँ। कौन मेरे हृदय से दुख को निकालेगा?

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्रीवानाचलमहामुनये नमः
श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३

२०) मुख्यप्रमाण विरोधी – प्राथमिक प्रमाण को समझने में बाधाए
 
प्रमा यानि सही ज्ञान। प्रमाण यानि वह जो एक विषय में सही ज्ञान प्रदान करें।

वेद तीन प्रकार के प्रमाणों को स्विकार करता है।

  • प्रत्यक्षम (अनुभव) – वह जो हमारे इंद्रियो आँख, नाक, कान, आदि से दिखायी पड़ता है। हालाकि इसे सत्य को वैसे ही बतलाना ऐसा मानना उसके लिये कुछ पाबन्धी है। उदाहरण के लिये अगर किसी को आंखों कि बीमारी है तो जो उसे दिखाता है वह सत्य और विश्वासयोग नहीं होगा। एक और उदाहरण जब रोशनी कम हो किसी को मनुष्य और खम्भ में ,साँप और रस्सी के बीच भ्रम पैदा कर सकते है। मृगतृष्णा झुठी रोशनी है (जल के कैसे दिखती है परन्तु सत्य में होती नहीं है)।

 

  • अनुमानं – पूर्व अनुभव के आधार पर शर्त लगाने को अनुमान कहते है। जहाँ धुआं होता है वहाँ अग्नि होती है – यह अनुमान के लिये उत्तम उदाहरण है। परन्तु इसमें भी भरपूर बाधाएं है। दोनों प्रत्यक्षम और अनुमानं को प्राथमिक प्रमाण नहीं माना जाता है।
  • शब्दं (यथार्थ ग्रन्थ) – सही ज्ञान के लिये वेद को यथार्थ और विश्वासयोग प्रमाण माना गया है। सभी आस्तिक (जो वेद जो प्रमाण मानते है) यह स्वीकार करते है कि वेद हीं अपौरुषेयम (जो किसी स्त्री या पुरुष से रचित नहीं है), नित्य (अनंतकाल तक है), निर्दोष (दोषरहित) है।

अब हम मुख्य प्रमाण में क्या बाधाएं है उसे देखेंगे और समझेंगे।

  • वेदान्त दोषरहित ज्ञान अर्पण करता है। वेदान्त का अर्थ वेद का अन्त या सबसे उपरी भाग है – मुख्यता उपनिषद। वेदों को सर्वोच्च अधिकारी न मानना विरोधी है।
  • वेदान्त को प्रत्यक्षम और अनुमानं के समान मानना विरोधी है। वेदान्त दूसरे प्रमाणों से सर्वोच्च है। अनुवादक टिप्पणी: महाभारत के प्रसिद्ध प्रमाण को स्मरण किजीए “सत्यम सत्यम पुनस सत्यम वेधात सास्त्रम परम नास्ति न दैवं केसवात परम”।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के अन्त में “मा शुच:” यह आज्ञा किये (चिन्ता मत करो)। उपनिषद का तत्त्व गीता का चरम श्लोक है। भगवान ने गीताचार्य का पद ग्रहण किया और दिव्य रथ पर विराजमान होकर गीता का यह उपदेश दीया, “सब उपायों का त्याग कर केवल मेरे हीं शरण में आ जावो। मैं तुम्हे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा। यह मेरे ज़िम्मेदारी है। चिन्ता मत करों, शंका मत करों, शोक मत करों”। इसे हीं “मा शुच:” कहते है। श्रीगोदाम्बाजी नाच्चियार तिरुमालि के “मेय्म्मैप्पेरु वारत्तै” पाशुर में यही दर्शाती है। सभी को इन शब्दों पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये। विश्वास नहीं होना बाधा है।
  • आल्वार दोष रहित ज्ञान के साथ भगवान के निर्हेतुक कृपा पात्र है। क्योंकि वें निर्मल ज्ञान से उत्पन्न हुए है वें परम सत्य है। वें वेद जो ज्ञान के प्राथमिक साधन है उतने कुशल है। ऐसा नहीं सोचना (जैसे आल्वारों के पाशुर हिन है ऐसा सोचना) विरोधी है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तक –जो आचार्य गुरु परम्परा में है उन्हें पूर्वाचार्य कहते है। इसी परम्परा में आचार्य से शिष्य को ज्ञान प्राप्त होता है। सभी आचार्य और उनके प्रिय शिष्य आल्वारों से हीं आशीर्वाद प्राप्त किये है। उनके उपदेश को ज्ञान का प्राथमिक साधन माना गया है। सभी को इसमें पूर्ण विश्वास होना चाहिये। इस तत्त्व में विश्वास न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी अपने स्तोत्र रत्न में यह दर्शाते है “त्वदीय गम्भीर मनोनुसारिणः” – वेद भगवान के भक्तों के निर्मल हृदय के पीछे आते है। सामान्यत: जाना जाता हुआ प्रमाण “धमज्ञ समयम प्रमाणं वेदास छ” भी इसी पर ज़ोर देता है – जो धर्म को जानते है वें मुख्य प्रमाण है और वेदम भी प्रमाण है। यह आल्वार और पूर्वाचार्यों जो नित्य धर्म में स्थापित करने में लगे थे उनको भी अधिक तूल देता है ।

२१) यावधात्मभावी विरोधी – आत्मा जब तक है उसमें बाधाएं
यावधात्म भावी का अर्थ है जब तक आत्मा है। आत्मा तो नित्य है- हमेशा रहती है। परन्तु बाधाए नहीं –आत्मा को सत्य ज्ञान कि प्राप्ति होती है तब वह निकल जाती है इसलिये यह सोचा जा सकता है यह बहुत समय तक है।

जीवात्मा का सत्य स्वभाव भगवान और भागवतों का नित्य दास बनकर रहने में है।

  • श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी लिखते है “देहेन्द्रिय मनः प्राण दीप्यो अन्यः” यह बताता है की आत्मा शरीर, इंद्रिया, मन, बुद्धि, आदि से भिन्न है। यह सामान्यत: देखा जाता है की लोग आत्मा और शरीर को एक ही मानते है और उसी प्रकार काम करते है। परन्तु यह सत्य नहीं है – यह केवल भ्रम है। शरीर जन्म, पैदावार, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु के अधीन है। परन्तु आत्मा निर्विकार है। इसलिये आत्मा और शरीरादि में भ्रम होना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: तत्त्वत्रय में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते है कि एक विस्तृत तरीके में आत्मा देह, इंद्रिया, मन, प्राण, बुद्धि, आदि से भिन्न है।
  • आत्मा को स्वतंत्र समझना गलत है। सर्वेश्वर आत्मा के मालिक है और वें हीं उसको नियंत्रण में रखते है। भगवान के प्रति दास भाव जीवात्मा की सही पहिचान है। आत्मा को स्वयं का समझना भगवान के वस्तु की चोरी करने के समान है। यह बहुत बड़ी बाधा है।
  • ईश्वर सब रूप से पूर्ण है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अवाप्त समस्त कामन और दोष रहित है। ऐसे ईश्वर को अपूर्ण समझना बाधा है।
  • ब्रह्मा, रुद्र, आदि को नियंत्रक समझना – श्रीमन्नारायण ही सभी देवताओं के स्वाभाविक नियंत्रक है। इसलिये आदि शंकराचार्य अपने सहस्त्रनाम भाष्य में यह दर्शाते है “ईशन्शील: नारायण एव” (श्रीमन्नारायण ही नियंत्रक है)। उपनिषद भी यही घोषणा करते है कि “श्रीमन्नारायण ही परब्रह्म है”। अत: श्रीमन्नारायण छोड़ अन्य को ईश्वर समझना बाधा है।
  • भगवान छोड़ अन्य को रक्षक मानना – भगवान हीं सबके रक्षक है। यह प्रणवं का अभिप्राय है जो सब वेदों का तत्त्व है। क्योंकि ब्रह्मा, रुद्र, जीवात्मा आदि वें नियंत्रक नहीं है। उन्हें ऐसा मानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने एक ग्रन्थ लिखा था “प्रपन्न परित्राणम” जो स्पष्ट स्थापित करता है कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं सच्चे रक्षक है। वह स्वयं मुमुक्षुपड़ी के ३९ सूत्र में यह लिखते है “‘ईश्वरनै ओळिन्तवर्गळ् रक्शकरल्लर्’ एन्नुमिडम् प्रपन्न परित्राणत्तिले चोन्नोम्“।
  • भागवत अपचार, आचार्य अपचार और आचार्य के भक्तों का अपचार सबसे बड़े बाधाएं है। भगवान भागवत अपचार करने वाले को कभी क्षमा नहीं करते। भगवान भू-देवी से कहते है “क्षिपामि, नक्षमामि वसुन्धरे” – “भू-देवी मैं उन्हें नीचे गीरा दूँगा और फिर कभी भी क्षमा नहीं करूँगा”। इसे पुराणों में बहोत से जगह समझाया गया है। भगवान भगवद अपचार करनेवाले को क्षमा कर देंगे। परन्तु वें भागवत अपचार और आचार्य अपचार करनेवाले को दण्ड देते हीं है। श्रीतिरुवरंगत्तु अमुधनार श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के १०७ पाशुर में श्रीरामानुज स्वामीजी से प्रार्थना करते है कि “ईरामानुज! उनतोण्डर्हटके अंबुत्तिरुक्कुम्बडि एन्नैयाक्कि अङ्गटडुत्ते” – श्री रामानुज! कृपया मेरे में सुधार किजीए ताकि मैं हमेशा आपके दासों से जुड़ा रहूँ। हमें भी इसी कि मनोकामना करनी चाहिये।

२२) नित्य विरोधी – नित्य बाधाएं (स्वयं के इंद्रियों से संबन्धित जो हमेशा उसके साथ रहती है)
इंद्रिया निरन्तर आत्मा के साथ रहती है। १० इंद्रिया होती है:

  • पञ्च ज्ञानेन्द्रिया – ५ ज्ञान कि इंद्रिया – कान, खाल, आँख, जिव्हा, नाक
  • पञ्च कर्मेन्द्रिय – ५ कर्म कि इंद्रिया – मुह, हाथ, पैर, मल त्याग, प्रसव।

भगवान जीवात्मा को इंद्रियों के माध्यम से कृपा करते है ताकि हम उन्हें भगवान कि सेवा और मंगलाशासन में उपयोग कर सके। वें बहुत मजबूत और ताकतवर होती है। सहस्त्रगिती में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “विण्णुळार् पेरुमार्क्कु अडिमै चेय्वारैयुम् चेऱुम् ऐम्पुलनिवै” – यह इंद्रिया इतनी ताकतवर होती है कि वह नित्यसूरी कि निष्ठा को भी डगमगा सकती है। इस विषय में हम बाधाएं देखेंगे।

  • सहस्त्रगिती में जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अन्नाळ् नी तन्त आक्कैयिन् वळि उळल्वॅ” – मुझे यह शरीर और इंद्रिया जो आपने प्रदान किया था मुझे पिडा देती है। इसलिये यह मुख्य समझने कि बात है कि इंद्रिया और इंद्रियों का भोग सबसे बड़ा विरोधी है।
  • इंद्रियों का दास बनकर रहना और इंद्रिय विषयक इच्छाओं को पूर्ण करना विरोधी है।
  • कोई यह विचार करता है कि “मैं बहुत बड़ा बुद्धिमान हूँ। मेरे सब इंद्रिया मेरे वश में है ”। यह बहुत बड़ी बाधा है। बहुत बड़े ऋषि जैसे श्रीविश्वामित्र, आदि इन इंद्रियों के भोग के कारण अपनी कीर्ति गवा बैठे है। अनुवादक टिप्पणी: हम आचार्य और आल्वारों के पाशुर और स्तोत्र में यह कहा है कि किस तरह वें इंद्रिय विषयक के भोग के स्वभाव से डरते थे। ऐसा इंद्रिय विषयक इच्छाओं कि ताकत है और सब को इन गढ्ढों से बचना चाहिये।
  • हमारे इंद्रियों को भगवद सौन्दर्य में हीं लगाना चाहिये और यह करते समय भागवत कैंकर्य को भूल जाना विरोधी है। हालाकि इंद्रिय विषयक एक तरह का गढ्ढा है और दूसरे   तरह का गढ्ढा पूरी तरह भगवान के सौन्दर्य में लीन है जैसे श्री शठकोप स्वामीजी पेरिया तिरुवंदादी ३४ में बताया गया है “कालाळुम्, नेन्जळियुम्, कण्सुळलुम्” – भगवान का सौन्दर्य देखकर कोई भी उसी क्षण गिर जायेगा अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पायेगा, हृदय पिघल जायेगा और अनुभव के कारण मूर्छा आ जायेगी। ऐसी दशा भगवद कैंकर्य और भागवत कैंकर्य से दूर करता है। श्रीरामायण के अयोध्या काण्ड में यह कहा गया है कि “सत्रुघ्नों नित्य सत्रुघ्न:” – सत्रुघ्न जिसने सभी नित्य दुश्मनों पर विजय पाया है। पेरियवाचन पिल्लै उसे इस तरह समझाते है “सत्रुघ्न श्रीराम के सौन्दर्य पर विजय प्राप्त (और ध्यान न दिया) कर निरन्तर श्रीभरतजी कि सेवा किये”। अत: भागवत कैंकर्य में जो भी बाधा है वह विरोधी समझा जाता है।

23) अनित्य विरोधी – अस्थाई बाधा (शारीरिक सुख और दु:ख से संभन्धित: )
अनित्य यानि अस्थाई – शारीरिक सुख और दुख। शरीर को स्व समझकर और सुख / दुख को महसुस कर शरीर के सुख / दुख को ध्यान में रखकर यह शरीर के चारों ओर घुमता है। इस विषय में बाधाओं को हम देखेंगे।

  • चन्दन के खुशबू, पुष्प, आदि मिलने वाले आनन्द को वास्तविक आनन्द समझना विरोधी है।
  • शस्त्र से या जहर से हमला आदि दुख को वास्तविक दुख समझना विरोधी है।
  • सांसारिक लाभ मिलते समय खुश होना और ना मिलने पर दुख होना विरोधी है।

अत: कोई भी सांसारिक सुख दु:ख से विचलित नहीं होना चाहिये और हमेशा समानता रखना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण विस्तार से आत्मा और शरीर के भेद के बारें में और कैसे सबको उस भेद से सचेत रहना चाहिये और शारीरिक सुख / दु:ख को सामान भाव से व्यवहार करना चाहिये इसे समझाते है ।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य –श्री वचन भूषण- तनियन

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना श्री वचन भूषण के विषय में चर्चा करेंगे। इस ग्रंथ की अवतारिका (परिचय) को देखने के पूर्व, पिल्लै लोकाचार्य के इस अद्भुत प्रबंध के वैभव को हम उसकी तनियन के माध्यम से समझते है।

यह श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र हमारे सत-संप्रदाय के सिद्धांतों को स्थापित करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्य है। पिल्लै लोकाचार्य के इस उत्कृष्ट रचना के वैभव का प्रचार करने के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने उपदेश रत्न माला नामक एक सुंदर प्रबंध की रचना की है।

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  • हमारे संप्रदाय में श्रीरामानुज स्वामीजी के विशेष स्थान और सत-संप्रदाय और विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत की सुदृढ स्थापना हेतु उनकी महान भूमिका का वर्णन करते है।

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  • तदन्तर, वे तिरुवाय्मौली के सभी व्याख्यानों और उनके रचयिताओं की महिमा को दर्शाते है।
  • तद्-पश्चाद वे दर्शाते है कि किस प्रकार नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईदू व्याख्यान का संरक्षण किया गया और आचार्य परंपरा के माध्यम से उसे आगे बढ़ाया गया।

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 नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी

  • इसके पश्चाद वे पिल्लै लोकाचार्य के वैभव और उनके श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के विषय में बताते है।

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 पिल्लै लोकाचार्य की कालक्षेप गोष्ठी

  • फिर वे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के सारतत्व को अत्यंत संक्षिप्त और सुंदर शैली में दर्शाते हुए, अपने आचार्य के चरणाश्रित होने के महत्त्व को समझाते है।
  • अंततः, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने पूर्वाचार्यों के उपदेशों को सम्पूर्ण हृदय से स्वीकार करने और विशुद्धतापूर्वक उनके प्रचार/प्रसार करने के महत्त्व को दर्शाया है।
  • यह भी समझाया गया है कि पूर्वाचार्यों के विशुद्ध निर्देशों का अनुसरण करने के परिणामस्वरूप हमें उच्चतम लाभ की प्राप्त होगी – अर्थात श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपापात्र होकर हमारा कल्याण होगा।
  • एरुम्बी अप्पा, उपदेश रत्न माला के अंत में एक अत्यंत सुंदर पासूर का समावेश करते है जो यह दर्शाता है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण संबंध मात्र से जीव स्वतः ही अमानव (परमपद के वाहक) द्वारा स्पर्शित होकर, विरजा नदी पार कर, सुगमता से परमपद धाम पहुँचेगा।

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श्रीवरवरमुनि स्वामीजी  – श्रीरंगम

इस प्रकार हम समझ सकते है की उपदेश रत्न माला का सम्पूर्ण उद्देश्य, श्रीवचन भूषण में समझाए गए सिद्धांतों को प्रदर्शित करना और उसके वैभव का प्रचार करना है।

अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के इस दिव्य रचना के कुछ पसूरों का अनुभव करेंगे:

पिल्लै लोकाचार्य  – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पासूर – 53
अन्न पुगल मुदुम्बै अण्णल उलगासीरियन
इंनरूलाल सेयद कलै यावैयिलुम
उन्निल थिगल वसन भूडणत्तिन सिरमै ओंरुक्किल्लै
पूगलल्ल इववार्त्तै मेय इप्पोदु

अर्थ: पिल्लै लोकाचार्य, जो बहुत प्रसिद्ध है और जो मुदुम्बै नामक ग्राम के एक परिवार से संबंधित है, उन्होंने अपनी निर्हेतुक कृपा से हमें बहुत से दिव्य ग्रंथ प्रदान किये। उन सभी में से, श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की महानता अतुलनीय है – यह मात्र महिमा वर्णन नहीं अपितु शाश्वत सत्य है।

पासूर  – 54
मुन्नम् कूरवोर मोलिंद् वसनंगल तन्नै 
मिगक कोण्डू कट्रोर तम् उयिर्क्र्कु
मिन्नणियाच सेरच समैत्तवरे
श्रीवसनभूडणम् एन्नुम पेर इक्कलैक्कु इट्टार पिन 

अर्थ: पिल्लै लोकाचार्य ने इस अद्भुत साहित्य की रचना हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों द्वारा की है। महान विद्वानों के लिए, यह श्रीवचन भूषण शास्त्र उस आभूषण के समान है जो उनकी आत्मा का श्रृंगार है और उनका अत्यंत प्रिय है। स्वयं पिल्लै लोकाचार्य ने इस सुंदर ग्रंथ को “श्रीवचन भूषण” नाम प्रदान किया, जिसका अभिप्राय एक आभूषण से है जो पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों से सुसज्जित है।

पासूर  – 55
आर् वसन भूडणत्तिन आल्पोरुल् एल्लाम अरिवार
आरदु सोल नेरिल अनुट्टीप्पार् 
ओर् ओरुवर उणडागिल अत्तनै काण उल्लमे
एल्लार्क्कुम अणडाददंरो अदु

अर्थ: श्रीवचन भूषण महा शास्त्र के गहन अर्थों को कौन भली प्रकार से समझता है? जीवन में कौन इन महान सिद्धांतों का प्रत्यक्ष अनुसरण कर सकता है? यद्यपि कोई एक मनुष्य भी इस ग्रंथ को समझकर इसका अनुसरण कर सके – तथापि वह अत्यंत प्रशंसनीय है क्यूंकि यह सभी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। पिल्लै लोकम जीयर, अपने व्याख्यान में दर्शाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही एक मात्र ऐसे महानुभाव है जिन्होंने इस वैभवशाली साहित्य को पूर्ण रूप से समझा और उसके अनुसार ही अपना जीवन निर्वाह किया।

पासूर – 61
ज्ञानं अनुष्ठानं इवै नंरागवे उडैयनान्
गुरुवै अडैन्दक्काल्
मानिलत्तीर् तेनार् कमलत तिरूमामगल् कोलुनन्
ताने वैकुन्तम् तरुं

अर्थ: एक बार जब मनुष्य, श्रीआचार्य के चरणशरण हो जाता है, जो सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों में सुविज्ञ है और जो स्वयं इन सिद्धांतों का सम्पूर्ण श्रद्धा से अनुसरण करते है, तब हे संसार के मनुष्यों ! श्री महालक्ष्मीजी, जो सुंदर कमलपुष्प पर विराजी है, श्रीमन्नारायण भगवान जिनके पति है, वे भगवान स्वतः ही हमें परमपद में उनकी नित्य सेवा प्रदान करेंगे।

श्रीवचन भूषण के अध्ययन से पूर्व, निम्न तनियन का गान करने का प्रचलन है। आइये अब हम अपने वैभवशाली आचार्यों और जन कल्याण हेतु रची गयी उनकी रचनाओं का संक्षिप्त वर्णन देखते है।

प्रथमतय श्रीशैलेश दयापात्रं…….. भूतं सरस्च तानियों का गान किया जाता है। उनके पश्चाद निम्न तनियों का गान किया जाता है।

लोकगुरुं गुरुबिस्सह पुरवै: कूर कुलोत्तम् दासं उदारं
श्रीनगपति अभिराम वरेसु दिप्रसयम् गुरुंच भजेहं (दिप्रसयम् वरयोगी नमिदे भी गया जाता है)

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गाया हुआ। मैं अपने पूर्वाचार्यों, अत्यंत उदार पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर, तिरुमलै आलवार (तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी) , अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के नानाश्री) और तिगलक्कीडन्तान तिरुनावीरूडैय पिरान तातर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पिताश्री) की आराधना करता हूँ। टिपण्णी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पिताश्री ने सत-संप्रदाय के सिद्धांतों का अध्ययन अपने ससुरजी कोट्टीयुर अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै की सन्निधि में किया, जो पिल्लै लोकाचार्य के प्रिय शिष्य थे।

लोकाचार्याय गुरवे कृष्णपादस्य सूनवे
संसार भोगी संदष्ट जीव जीवातवे नम:

अर्थ: इयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाल द्वारा गाया हुआ (नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के शिष्य इयुण्णि माधव पेरुमाल के पुत्र)। मैं पिल्लै लोकाचार्य नामक आचार्य के चरणों में प्रणाम करता हूँ, जो वडक्कू तिरुविधि पिल्लै के पुत्र है और जो संसार रूपी सर्प द्वारा ग्रसित बद्ध जीवात्माओं के लिए जीवन रक्षण औषधि के समान है।

लोकाचार्य कृपापात्रं कौन्टिन्य कुलभूषणं
समस्तात्म गुणावासं वन्दे कूर कुलोत्तमं

अर्थ: तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी द्वारा गाया गया। मैं कूर कुलोत्तम दासर की आराधना करता हूँ, जो पिल्लै लोकाचार्य के कृपापात्र है, जो कौन्तिन्य वंश में शिखर मणि है और जो सभी कल्याण गुणों के सागर है।

नम: श्रीशैलनाथाय कुन्तिनगर जन्मने
प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैंकर्य शालिने

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं श्रीशैलनाथ (तिरुमलै आलवार-तिरुवाय्मौली पिल्लै) की आराधना करता हूँ, जो श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा कृपापूर्वक प्रदान की गयी कैंकर्यश्री (सेवा की संपत्ति) की उज्वलता से दीप्तिमान है और जिनका जन्म “कुन्तिनगर” (आज का कोंथगै नगर) नामक क्षेत्र में हुआ।

लोकाचार्य पदाम्भोज राजहंसायितान्तरम्
ज्ञान वैराग्यजलधिम वन्दे सौम्य वरं गुरुं

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै (उनके नानाश्री) की आराधना करता हूँ, जो एक दिव्य हंस (जो कमलपुष्प के अनुरक्त होता है) के समान पिल्लै लोकाचार्य के चरण कमलों के अनुरक्त है और जो ज्ञान और विरक्ति के साग़र है।

श्री जिह्वा वतधिशदासं अमलं अशेष शास्त्रवितं
सुंदरगुरुवर करुणाकंदलित् ज्ञानमंदिरम् कलये

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं तिगलक्कीडन्तान तिरुनावीरूडैय पिरान की स्तुति करता हूँ, जिनके विवेक का उदय अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै की कृपा से हुआ जो सभी शास्त्रों में निपुण थे और निष्कपट थे।

श्रीवचन भूषण के लिए विशिष्ट तनियन

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में 6 प्रकरण (भाग) और 9 प्रकरण (भाग) होना बतलाया गया है। इस प्रबंध के 2 विविध वर्गीकरण को निम्न तनियों के द्वारा समझाया गया है।

पुरुष्कार वैभवं च साधनस्य गौरवं
तदधिकारी कृत्यं अस्य सतगुरूप सेवनं
हरिदयाम अहैतुकिम् गुरोरुपायथांच यो
वचनभूषणेवदज जगदगुरुं तमाश्रये

अर्थ: मैं पिल्लै लोकाचार्य के चरणों का आश्रय लेता हूँ, जिन्होंने कृपापूर्वक निम्न सिद्धांतों को श्रीवचन भूषण शास्त्र में समझाया।

  1. पिराट्टी का वैभव, जो जीवों पर पुरुष्कार करती है (भगवान के समक्ष जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है)
  2. सिद्धोपाय की महानता – भगवान ही सदा सिद्ध उपाय है
  3. ऐसे अधिकारीयों (योग्य जीवात्मा) का मनोभाव/ व्यवहार, जिन्होंने भगवान को उपाय रूप में स्वीकार किया है
  4. उस जीवात्मा की अपने आचार्य के प्रति अभिवृत्ति और कैंकर्य
  5. भगवान की निर्हेतुक कृपा की महिमा
  6. आचार्य चरण ही चरम उपाय (अन्तिमोपाय)

सांगाकिल द्रविड़ संस्कृतरूप वेद सारार्थ संग्रह महारस वाक्यजातं
सर्वज्ञ लोक गुरु निर्मितं आर्य भोगं वन्दे सदावचनभूषण दिव्य शास्त्र

अर्थ: मैं श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की निरंतर स्तुति करता हूँ, जिसकी रचना सर्वज्ञ पिल्लै लोकाचार्य ने की है, जो प्रबुद्ध विद्वानों के लिए अत्यंत आनंददायी है, जो वेद-वेदांत आदि के सार को कुशलता से प्रदर्शित करता है और जिसमें सुंदर उक्तियों और वाक्यों के बहुत से समोह निहित है।

अकूणटोत्गणट वैकुंटप्रियाणाम् कण्टभूषणं
गुरुणाजगतां उक्तं व्याप्तं वचन भूषणं

अर्थ: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र, जो उन मुमुक्षुओं के गले का सुन्दर आभूषण है जो श्रीवैकुंठ (परमपद) जाने के अभिलाषी है, जहाँ अनंत आनंद का निवास है और सभी जगह फैला हुआ है। ऐसे अद्भुत प्रबंध की रचना पिल्लै लोकाचार्य ने की है।

पेरू तरुविक्कूमवल् तन् पेरुमै (1) आरू (2) पेरुवान मुरै (3) 
अवन् कूरु गुरुवैप्पनुवल (4) कोल्वतिलैयागीय कुलिर्न्त अरुल्तान (5)
मारिलपुगल नर्गुरुविन वणमै (5) योड़ेलाम वचन भूडणमतिल
तेरिड नमक्करुल मुडुम्बै इरैयवन कलल्गल चेरेन्मनने

अर्थ: हे प्रिय ह्रदय! कृपया मुदुम्बै के स्वामी (पिल्लै लोकाचार्य) का आश्रय ग्रहण करना, जिन्होंने हमारे हितार्थ श्रीवचन भूषण शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्पष्टता से दर्शाया। इस प्रबंध में दर्शाए गए छः सिद्धांत निम्न है:

  1. पिराट्टी का वैभव, जो जीवों पर पुरुष्कार करती है (भगवान के समक्ष जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है)
  2. सिद्धोपाय की महानता – भगवान ही सदा सिद्ध उपाय है
  3. ऐसे अधिकारीयों (योग्य जीवात्मा) का मनोभाव/ व्यवहार, जिन्होंने भगवान को उपाय रूप में स्वीकार किया है
  4. उस जीवात्मा की अपने आचार्य के प्रति अभिवृत्ति और कैंकर्य
  5. भगवान की निर्हेतुक कृपा की महिमा
  6. आचार्य चरण ही चरम उपाय (अन्तिमोपाय)

    தீதில் வானவர் தேவன் உயிர்களை, ஏதுமின்றி எடுக்கும்படியையும் (8)
    மன்னியவின்பமும் மாகதியும் குருவென்னு நிலை பெறும் இன்பொருள் தன்னையும்
    அசைவிலாதவேதமதனுள் அனைத்தையும் (9) வசனபூடண வழியாலருளிய
    மறையவர் சிகாமணி வண்புகழ் முடும்பை இறையவன் எங்கோன் உலகாரியன்
    தேன்மலர்ச்சேவடி சிந்தைசெய்பவர் மாநிலத்து இன்பமது எய்தி வாழ்பவரே

तिरुमामगल् तन् सिररुलेट्रमुम् (1) तिरुमाल् तिरुवडी सेर्वली नन्मैयुम् (2)
अव्वली ओलिन्तन अनैत्तिन् पुन्मैयुम् (3) मेयवलियूंरिय मिक्कोर् पेरुमैयुम् (4)
आरणम् वल्लवर् अमरु नन्नेरीयैयुम् (5) नारणन्राल तरु नर्गुरुनीदियुम् (6)
सोतिवानरुल तूयमागुरुविन् पादमामलर् पणिबवर् तन्मैयुं (7)
तिदिल् वानवर् देवन् उयिर्गलै, एतुमिनरी एडुक्कुम् पडीयैयुम् (8)
मन्नीयविनभमुं मागतियुम् गुरुवेन्नु निलै पेरुम् इन्पोरुल तन्नैयुं
असैविलातवेदमदनुल अनैत्तैयुं (9)वचनभूडण वलियालरूलिय
मरैयवर शिखामणि वणपुगल मुडुम्बै इरैयवन एन्गोन् उलगारियन्
तेन्मलर्च्चेवडी चिन्तैचेयभवर मानीलत्तु इन्भमतु एय्ती वालभवरे

अर्थ: वह जो मेरे स्वामी पिल्लै लोकाचार्य के शहद के समान चरण कमलों का ध्यान करते है, जो मुदुम्बै के स्वामी है, जो वेदों में श्रेष्ठ विद्वानों के मुकुट में शिखरमणि के समान है और जो श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के माध्यम से शास्त्रों के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन करते है – ऐसे मनुष्य इसी संसार में रहकर अत्यंत महान आनंद (भगवत/ भागवत अनुभव और कैंकर्य) की अनुभूति करेंगे। पिल्लै लोकाचार्य ने इस प्रबंध में मुख्यतः नौ सिद्धांतों का वर्णन किया है।

  1. श्रीमहालक्ष्मीजी की महिमा जो भगवान से जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है (जिस प्रकार एक माता निरंतर अपने बालक का प्रतिनिधित्व पिता के समक्ष करती है)
  2. भगवान को प्राप्त करने के उपाय (साधन) स्वरूप स्वयं भगवान की महानता
  3. अन्य उपायों/ मार्गों जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग आदि की कठिनता
  4. एक मात्र भगवान को उपाय स्वरुप स्वीकार करने वाले प्रपन्न की महिमा
  5. ऐसे प्रपन्नों के व्यवहार और दैनिक गतिविधियाँ
  6. एक सच्चे आचार्य के आदर्श गुण और उनका व्यवहार
  7. एक सच्चे शिष्य के आदर्श गुण
  8. जीवात्माओं के कल्याण के लिए भगवान (जो नित्यसूरियों के स्वामी है) द्वारा किये गए प्रयत्न और उनकी निर्हेतुक कृपा और
  9. चरम सिद्धांत जो बतलाता है कि आचार्य चरण ही उपाय और उपेय है (चरम पर्व निष्ठा)

लोकाचार्य कृते लोकहिते वचनभूषणे
तत्वार्त्त दर्शिनो लोके तन्निष्टास्च सुदुर्लभा:

अर्थ: मात्र जीवात्माओं के कल्याण के लिए रचित श्रीवचन भूषण में समझाए गए सिद्धांतों को समझने और उनका अपने जीवन में अनुसरण करनेवाले मनुष्य दुर्लभ है।

जगदाचार्य रसिते श्रीमदवचनभूषणे
तत्वज्ञानांच तन्निष्टाम देहिनाथ यतित्रमे

अर्थ: हे यतिराज (श्रीरामानुज स्वामीजी)! कृपया मुझ पर कृपा करे जिससे मैं पिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में दर्शाए गए सिद्धांतों को समझकर उनका अनुसरण कर सकूँ।

इस प्रकार श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की तनियन का अनुवाद समाप्त हुआ, जो पिल्लै लोकाचार्य और इस अद्भुत प्रबंध की महिमा का प्रदर्शन करता है।

अगले अंक में हम श्री वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अवतारिका (व्याख्यान का परिचय) का अनुवाद देखेंगे।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

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तुला मास अनुभव – श्री वरवरमुनि स्वामीजी

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

हम तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/ आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद अनुभव कर रहे है। इस माह के वैभव को जानने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ देखें। जैसा कि कहा जाता है “मधुरेन् समापयेत्” – आइये हम भी इस वर्ष के तुला मास के मधुर अनुभव को इस अंक के साथ समाप्त करें। इस माह के अंत में आकर, अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की अपार महिमा का संक्षेप में वर्णन करेंगे, मुख्यतः हमारे सत संप्रदाय में उनकी विशेष व्याख्यात्मक रचनाओं के लिए।

आर्ति प्रबंध के 28वे पासूर में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं बताते है कि किस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण संसार के कल्याणार्थ अपना जीवन व्यतीत किया।

1.ramanujar-srisailesa-mamunigal    भविष्यदाचार्य (श्रीरामानुज स्वामीजी), तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पण्डू पल आरियरुम् पारुलगोर उय्यप् परिवुड़ने चेय्दू अरुलुम् पल्कलैगल् तम्मैक् कंण्डतेल्लाम् एलुदी
अवै कट्रु इरुन्तूम् पिर्रक्कुम् कातलुडन् कर्पित्तुम् कालत्तैक कलित्तेन्
पूण्डरिगै केल्वन् उरै पोन्नुलगु तन्निल् पोग नीनैवु ओंरूमिनरिप् पोरुन्ति इंगे इरुन्तेन्
एण्डिचैयुम् एत्तुम् एतिराचन् अरुलाले एलिल्वीचुम्बे अन्री इप्पोत्तु एन्मनम् एण्णाते

प्रथम 2 पंक्तियों में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बताते है कि उन्होंने, मुस्लिम आक्रमण में लुप्त हो गये सभी पूर्वाचार्य ग्रंथों को खोजा और प्राप्त किया। ये ग्रंथ हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा हम पर अत्यंत कृपा स्वरुप सभी भविष्य की पीढ़ियों के हितार्थ रचित किया गया था। जो भी ग्रंथ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने प्राप्त किये, उसे उन्होंने स्वयं ताड़ के पत्तों पर अभिलिखित किया, अपने आचार्यों (तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी, आदि) से उनका अध्ययन किया, उन ग्रंथों में विदित निर्देशानुसार अपना जीवन व्यतीत किया और अपने सभी अनुयायियों को भी सिखाया।

अगली 2 पंक्तियों में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है कि अपने आचार्य तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी की अनुकम्पा प्राप्त कर श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपानुग्रहित होने से पूर्व, श्रीवैकुंठ-परमपद गमन की उनकी कोई अभिलाषा नहीं थी, परंतु कृपा प्राप्त करने के पश्चाद एक पल के लिए भी परमपद जाने की अभिलाषा उनके ह्रदय से अलग नहीं हुई।

एक प्रसिद्ध तमिल पासूर, अत्यंत सुंदरता से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के इस दिव्य योगदान की महिमा का वर्णन करता है।

सेट्रुक् कमल वयल सुल अरंगर तम सिर तलैप्प
पोट्रित् तोलुम नल अंदणर वाळ, इप्पुदलत्ते
माट्रट्र सेम्पोन मणवाल मामुनिगल वंदिलने
अट्रिल् करैत्त पुलि अल्लवो तमिल आरणमे

2Nammalwar-mamunigal

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीआलवार तिरुनगरी

शब्दार्थ: इस संसार में, अनेकों महानुभाव श्रीरंगम, जैसे अत्यंत सुंदर दिव्य देश में निवास करनेवाले श्रीरंगनाथ भगवान की स्तुति में संलग्न है, परंतु यदि अतुलनीय और प्राचीन स्वर्ण के समान पवित्र श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अवतार नहीं होता, तो तमिल वेद (तिरुवाय्मौली) उसी प्रकार इस संसार से लुप्त हो जाते, जिस प्रकार नदी में गिरी हुई एक इमली लुप्त हो जाती है अर्थात बड़ी सी नदी के इतने अधिक जलस्तर में उस इमली का कोई प्रभाव नहीं होता। उसी प्रकार यदि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने व्यापक रूप से तिरुवाय्मौली दिव्य प्रबंध की क्षमता और भव्यता का वर्णन नहीं किया होता, तो इस संसार सागर में उसका महत्त्व नहीं होता।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपना जीवन, पूर्ण रूप से हमारे सत-संप्रदाय के विशाल ज्ञानभण्डार को एकत्रित करने में केन्द्रित किया और सभी के हितार्थ उन्होंने उस ज्ञान को अद्भुतरूप से अत्यंत संक्षिप्त रूप में संकलित किया। अब हम उनकी विभिन्न रचनाओं का आनंद लेते है और उनकी विवेकशीलता और कृपा को समझते है।

-संस्कृत ग्रंथ-

  • यतिराज विंशति – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, गृहस्थाश्रम में रहते हुए, अपने आचार्य तिरुवाय्मौली पिल्लै के आदेश पर, आलवार तिरुनगरी में भविष्यदाचार्य (श्रीरामानुज स्वामीजी) की सन्निधि में सेवा किया करते थे। उस समय, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने 20 श्लोकों के एक सुंदर प्रबंध की रचना की, जो यतिराज (श्रीरामानुज स्वामीजी) के प्रति उनके प्रेमानुराग को प्रदर्शित करता है। उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणकमलों में अपना सर्वस्व समर्पित किया और श्री रामानुज स्वामीजी के चरण कमल दर्शाने वाले, अपने आचार्य तिरुवाय्मौली पिल्लै की महान कृपा का स्मरण किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यति-पुनरावतार (श्रीरामानुज स्वामीजी के पुनः अवतार) है। यहाँ एक प्रश्न उत्पन्न होता है – यद्यपि वे स्वयं ही श्रीरामानुज स्वामीजी के पुनारावतार है, तथापि वे उनकी स्तुति क्यों करते है? हमारे पुर्वाचार्य बताते है कि, जिस प्रकार त्रेता युग में स्वयं श्रीराम ने श्रीमन्नारायण भगवान की स्तुति यह दर्शाने के लिए की – कि भगवान की उचित सेवा-आराधना कैसे की जाती है (क्यूंकि हम नहीं जानते कि भगवान की सेवा-आराधना कैसे करनी चाहिए), उसी प्रकार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति अपने दिव्य भाव दर्शाए है जिसके द्वारा हम समझ सके कि श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों को कैसे प्राप्त कर सकते है और हमें उनकी सेवा-स्तुति किस प्रकार करना चाहिए।

3.ramanujar-mamunigalश्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपूरी

  • देवराज मंगलं – कांचीपुरम की यात्रा के समय, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस सुंदर प्रबंध की रचना की, जो देव पेरुमाल की दिव्य कृपा को प्रदर्शित करता है। “मंगलाशासन” हमारे सत्-संप्रदाय का उच्चतम सिद्धांत है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अत्यंत सुंदरता से देव पेरुमाल भगवान का मंगलाशासन किया है। उन्होंने देव पेरुमाल भगवान के प्रति तिरुक्कची नम्बि द्वारा किये गए कैंकर्य का स्मरण कराया और आचार्य के माध्यम से भगवान को प्राप्त करने का उचित मार्ग दर्शाया।

4.mamunigal-emperumanar-thirukkachinambi-dhevaperumalश्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, तिरुक्कची नम्बि, देव पेरुमाल

– तमिल प्रबंधन

  • उपदेश रत्न मालापिल्लै लोकाचार्य और उनके “श्रीवचन भूषण” नामक दिव्य ग्रंथ की महिमा का विस्तार करने के लिए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने उपदेश रत्न माला में क्रमानुसार आलवारों के अवतार नक्षत्र/मास, श्रीरामानुज स्वामीजी के विशेष स्थान, श्रीरामानुज स्वामीजी की दिव्य अभिलाषा का वर्णन किया एवं तिरुवाय्मौली के व्याख्यान, ईदू व्याख्यान की यात्रा, नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी की महिमा, पिल्लै लोकाचार्य का दिव्य अवतरण, श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की महानता को समझाते हुए, उन्होंने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के सार तत्व, पूर्वाचार्यों के निर्देशों को जस के तस पालन करने और उनका प्रचार करने के महत्त्व को प्रदर्शित किया और अंततः बताया की इस प्रकार अनुसरण करने वाले शिष्य श्रीरामानुज स्वामीजी को अत्यधिक प्रिय है।

5.pillai_lokacharya_srirangam

पिल्लै लोकाचार्य – श्रीरंगम

  • तिरुवाय्मौली नूट्रन्तादि – यह श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की अत्यंत सुंदर रचना है। विद्वानों ने इसकी उपमा शहद की मधुरता से की है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी के तिरुवाय्मौली- ईदू व्याख्यान, में पूर्ण रूप से मग्न थे और इसी हेतु वे तिरुवाय्मौली के दिव्य अर्थों का पूर्ण विवेचन करने में समर्थ थे। उनकी इसी निपुणता के कारण, श्रीरंगनाथ भगवान ने श्रीरंगम मंदिर में अपनी सन्निधि के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को ईदु व्याख्यान की सहायता से तिरुवाय्मौली समझाने का निर्देश दिया। पिल्लै लोकम् जीयर ने इस ग्रंथ के लिए अपने व्याख्यान में दर्शाया है कि तिरुवाय्मौली के आकर (1112 पासूर) और उसके सारतत्व को गृहण करने की जटिलता को ध्यान में रखकर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने कृपापूर्वक इस ग्रंथ की रचना की जो तिरुवाय्मौली के सार को सुगमता से दर्शाता है। उन्होंने तिरुवाय्मौली दिव्य प्रबंध के सभी अद्भुत पक्षों को अत्यंत सुंदरता से प्रदर्शित किया है-

6.Nammazhwar

श्रीशठकोप स्वामीजीआलवार तिरुनगरी

  1. जिस प्रकार श्री रामानुज स्वामीजी की महिमा के स्मरण के लिए रामानुज नूट्रन्तादि की रचना की गयी थी, उसी प्रकार श्रीशठकोप स्वामीजी की महिमा का स्मरण करने के लिए इस तिरुवाय्मौली नूट्रन्तादि की रचना हुई।
  2. तिरुवाय्मौली के प्रत्येक दशक (11 पासूरों) को नूट्रन्तादि के एक पासूर के द्वारा समझाया गया है। पासूर उसी शब्द से प्रारंभ और समाप्त होता है, जिस शब्द से वह तिरुवाय्मौली दशक में होता है।
  3. प्रत्येक पासूर, उस तिरुवाय्मौली दशक में समझाए गए महत्वपूर्ण सिद्धांत को प्रदर्शित करता है। यह नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा उस विशिष्ट दशक के लिए रचित ईदू व्याख्यान के परिचय खंड में प्रदर्शित मुख्य बिन्दुओं के समान ही है।
  4. प्रत्येक पासूर से श्रीशठकोप स्वामीजी के एक विशेष नाम का बोध होता है जैसे सदगोपन, मारन, कारिमारन, वलुति नाडन, परांकुश, आदि।
  5. इसे वेणबा छंद के साथ अन्तादी क्रम (एक पासूर का अंत ही दुसरे पासूर का प्रारंभ है) की शैली में रचा गया है – इस प्रकार की छंद रचना करना अत्यंत कठिन है, यद्यपि स्मरण करने और गायन में यह उतनी ही सरल है।
  • आर्ति प्रबंधन – इस संसार में अपने अंत समय में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने आर्ति प्रबंध की रचना जो श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति उनके दिव्य मनोभाव का प्रवाह है जहाँ वे उनसे निवेदन करते है कि इस संसार सागर से उन्हें मुक्ति प्रदान करें, और परमपद प्रस्थान की आज्ञा दे। हमारे सत-संप्रदाय में इस प्रबंध का विशेष महत्त्व है क्यूंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस अद्भुत प्रबंध में बहुत से महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दर्शाया है। इस प्रबंध के परिचय खंड में पिल्लै लोकम जीयर अत्यंत सुंदरता से बताते है कि “श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपने चरम काल (अंतिम दिनों) में रचित चरम (अंतिम) प्रबंध में दर्शाया है कि चरमपर्व निष्ठा (आचार्यचरण ही चरम उपाय) का चरम सिद्धांत ही प्राप्यों में चरमावती है।

श्रीरामानुज स्वामीजी – भूतपूरी

  • जीयर पडी तिरुवाराधन क्रम – यह तिरुवाराधन (आराधना) का सरलतम संस्करण है। पञ्चसंस्कार विधि के अवयव के रूप में आचार्य हमें तिरुवाराधन क्रम (अर्चा विग्रह की सेवा) के विषय में बताते है और हम अपने गृह अर्चा भगवान का तिरुवाराधन उसी विधि से करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने संस्कृत रचना “नित्य ग्रंथ” में तिरुवाराधन क्रम के विषय में समझाया है। क्यूंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अवतरण, हमारे संप्रदाय के सभी महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रदर्शन द्राविड भाषा (तमिल) में करने के लिए हुआ था, उन्होंने तिरुवाराधन क्रम की व्याख्या तमिल में करके हम पर अत्यंत कृपा की।

 –   व्याख्यान

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नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी की ईदू कालक्षेप गोष्ठी

  • पेरियालवार तिरुमौली (के लुप्त खण्डों के लिए) – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की अर्जवं (प्रमाणिकता) अतुलनीय है। पूर्वकाल में पेरियवाच्चान पिल्लै ने पेरियालवार तिरुमौली के लिए एक सम्पूर्ण व्याख्यान की रचना की थी। परंतु दुर्भाग्यवश, उन ताड़ के पत्तों का अधिकांश भाग दीमक की वजह से क्षय हो गया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस दिव्य प्रबंध के लिए पुनः व्याख्यान की रचना की और जहाँ से पेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान उपलब्ध थे, वहां तक पहुँचकर वे रुक गए।
  • रामानुज नूट्रन्तादि – इस दिव्य प्रबंध को प्रपन्न गायत्री भी कहा जाता है और श्री रंगनाथ भगवान की दिव्य अभिलाषा से इस ग्रंथ को 4000 दिव्य प्रबंधनों में भी सम्मिलित किया गया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अमुदनार के इस वृहद ग्रंथ का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन प्रदान किया और इस प्रबंध में उपस्थित सभी अद्भुत अर्थों को दर्शाया।
  • ज्ञान सार और प्रमेय सारअरूलाल पेरुमाल एम्पेरुमानार (पुर्वाश्रम में यज्ञमूर्ति), श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने हमारे सत-संप्रदाय के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों जैसे आचार्य अभिमान, भगवान की निर्हेतुक कृपा, आचार्य/भागवत अपचार करने के दुष्प्रभाव, आदि को अपने ज्ञान सार और प्रमेय सार ग्रंथों में प्रदर्शित किया। पिल्लै लोकाचार्य ने बाद में आचार्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त इन सिद्धांतों को अपने रहस्य ग्रंथों में विस्तार से समझाया है।
  • मुमुक्षुप्पडी –शिष्य को आचार्य से रहस्य त्रय (तिरुमंत्र, द्वय और चरम श्लोक) का ज्ञान प्राप्त होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पिल्लै लोकाचार्य, ने अत्यंत कृपा कर इन सिद्धांतों को यथार्थ शैली में मुमुक्षुप्पडी ग्रंथ में संकलित किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन सिद्धांतों को अत्यधिक विवरणात्मक शैली में अपने प्रतिष्ठित व्याख्यान में समझाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित मुमुक्षुप्पडी के परिचय खंड को https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/02/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-mumukshuppadi/ पर देखा जा सकता है।
  • तत्व त्रय – मुमुक्षु (मोक्ष प्राप्त करने का अभिलाषी) के लिए तीन तत्वों का वास्तविक ज्ञान (चित, अचित और ईश्वर) सर्वोच्च महत्त्वपूर्ण है। पिल्लै लोकाचार्य ने इन सिद्धांतों को अपने इस प्रबंध, जिसे कुटी भाष्य (श्रीभाष्य का सूक्ष्म संस्करण) के रूप में सुप्रसिद्ध है, में समझाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा विभिन्न प्रमाणों के आधार पर प्रदत्त व्यावहारिक व्याख्यान के अभाव में इस ग्रंथ के गहन अर्थों को समझना अत्यंत दुष्कर था। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित तत्व त्रय के परिचय खंड को https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/09/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-tattva-trayam/ पर देखा जा सकता है। तत्व त्रय की संक्षिप्त और सरल प्रस्तुति को http://ponnadi.blogspot.com/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।
  • श्रीवचन भूषण – आचार्य अभिमान (आचार्य कृपा) हमारे सत-संप्रदाय का सारतम सिद्धांत है। पिल्लै लोकाचार्य ने विभिन्न आलवारों/आचार्यों की श्री सूक्तियों (दिव्य वचनों) के आधार पर इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को विस्तार से समझाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस वैभवशाली प्रबंध के लिए श्रेष्ठतम् और गहन व्याख्यान की रचना की है जिसकी सराहना महान विद्वानों द्वारा की गयी है।
  • आचार्य हृदयंअळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् (पिल्लै लोकाचार्य के अनुज भ्राता) ने आचार्य हृदयं (श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य ह्रदय) नामक ग्रंथ की रचना की है। इस ग्रंथ की रचना उन्होंने पुर्णतः आलवारों की श्रीसूक्तियों के आधार पर की एवं श्रीशठकोप स्वामीजी के यथार्थ मनोभाव का चित्रण किया है। इस ग्रंथ के प्रत्येक शब्द का अत्यंत गहन अर्थ है और यह अमूल्य है। परंतु इन दिव्य अर्थों को सामान्य मनुष्य द्वारा सुगमता से नहीं समझा जा सकता। इस हेतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस अद्भुत प्रबंध के लिए विस्तृत व्याख्यान की रचना की है, जो इस प्रबंध की स्वर्णिम कांती को प्रदर्शित करता है।

9.pillailokacharyar-nayanar-mamunigal

पिल्लै लोकाचार्य, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार्, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

इस भूलोक में अपने अंतिम समय में, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी अत्यंत पीड़ा में आचार्य हृदयं पर व्याख्यान की रचना कर रहे थे। जब अण्णन ने उनसे पूछा कि वे स्वयं को इतने अत्यधिक कष्ट क्यों दे रहे है, तब श्रीवरवरमुनी स्वामीजी ने उदारता से उत्तर दिया कि वे यह व्याख्यान अपने पुत्रों और पौत्रों (भविष्य में आनेवाली पीढ़ियों) के लाभ के लिए लिख रहे है। भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के हेतु भी उन्होंने ऐसी कृपा और करुणा की और कृपा कर प्रत्येक प्राणी के लिए कल्याण का मार्ग बताया।

इस लेख में हमने केवल श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की साहित्यिक भूमिका पर ही ध्यान केन्द्रित किया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का जीवन बहुत से गौरवशाली पक्षों से सुसज्जित है। यह प्रत्येक पक्ष “वाचा मगोचरम्” है अर्थात शब्दों की वर्णन क्षमता के परे है।

तत्रैय उपनिषद में, भगवान के कल्याण गुणों की चर्चा की गयी है। वेद-उपनिषद भगवान के असंख्य गुणों में से एक, आनंद को समझाने का प्रयत्न करते है, परंतु वे उस एक गुण को भी सम्पूर्णता से समझाने में विफल है। उसी प्रकार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा भी अगणित है। यह उनकी महिमा की एक झलक के समान है, वह भी दास की सिमित क्षमताओं के साथ।

इस तरह हमने अपने सत-संप्रदाय के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य साहित्यिक भूमिका की झलक मात्र देखी। हम भी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी चरण कमलों में प्रणाम करें और उनके कृपा पात्र बने।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-mamunigal.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – तत्वत्रय

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना तत्वत्रय के विषय में चर्चा करेंगे।

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श्रीरामानुज स्वामीजीपिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – तिरुप्पवल वण्णम्

तत्व त्रय ग्रंथ को कुट्टी भाष्य (अर्थात लघु श्रीभाष्य) के रूप में भी जाना जाता है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने ब्रह्म सूत्र के लिए विस्तृत व्याख्यान की रचना की जो श्रीभाष्य के रूप में प्रख्यात है और इसके रचयिता श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीभाष्यकार के रूप में प्रख्यात है। श्रीभाष्य में उल्लेख किये गए हमारे विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत के सभी प्रमुख सिद्धांतों का विस्तृत विवरण तत्व त्रय ग्रंथ में सुलभ तमिल स्तोत्रों के माध्यम से किया गया है। यह ग्रंथ तीन प्रमुख तत्वों के विषय में चर्चा करता है – चित (जीवात्मा), अचित (अचेतन/जड़ वस्तु) और ईश्वर। इस ग्रंथ का संक्षेप विवरण http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।

इस भूमिका के साथ, अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित तत्व त्रय के अद्भुत परिचय खंड के अनुवाद का अवलोकन करते है।

जैसे कि कहा गया है “अनादी मायया सुप्त:” अर्थात अनंत समय से, जीवात्माएँ इस संसार में अचेतन वस्तुओं के प्रति अपने संबंध/लगाव के कारण, अज्ञानवश (अन्धकार) और अपनी बुद्धि से मलित होकर, यह जाने बिना ही जीवन यापन कर रहे है कि उनका स्वरुप अचेतन जड़ वस्तुओं से भिन्न है अर्थात जीवात्मा ज्ञान और परमानंद से परिपूर्ण है और उसका अस्तित्व मात्र भगवान के आनंद/मुखोल्लास के लिए ही है।

उचित रूप से समझे बिना ही,जीवात्मा विचार करता है,

  • देवोहम् मनुष्योहम्” (मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ) और इस निर्जीव शरीर का ही आत्मा के रूप में बोध करता है
  • यद्यपि वह यह जान भी जाता है कि आत्मा और शरीर एक दुसरे से भिन्न है, तथापि “ईश्वरोहम् अहं भोगी” (मैं ही संचालक हूँ और मैं ही भोगता हूँ), अर्थात वह यह विचार प्रारंभ कर देता है कि वह पुर्णतः स्वतंत्र है
  • यद्यपि वह अपने स्वरुप को समझते हुए यह भी जानता है कि वह भगवान का दास है, तथापि नित्य कैंकर्य में संलग्न होने के बदले वह सांसारिक सुखों में ही डूबा रहता है

जैसा कि कहा गया है “योन्यथा संतमानम् अनन्यता प्रतिपत्यधे, किम् तेन न कृतं पापं चोरेनात्माबहारिणा“, जीवात्माएँ स्वयं के स्वरुप को न जानकर, सबसे बड़ा पाप कर रहां है (जो अन्य पापों का कारण है), अर्थात वह उस जीवात्मा की चोरी कर रहा है, जो भगवान की संपत्ति है (भगवान की संपत्ति को स्वयं अपना समझना ही पाप है) और तुच्छ और क्षण भंगुर/अस्थायी सांसारिक सुखों के भोग में लिप्त है।

जैसा कि कहा गया है “विचित्रा देह संपत्तिर् ईश्वराय निवेदितुम्, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुता“, जब जीवात्माएँ अति सूक्ष्म अवस्था (प्रलय के समय) में रहती है, उस अचेतन/जड़ वस्तु के समान (मलित बुद्धि से), जो विवेक/ देह से हीन है और सांसारिक सुखों का आनंद लेने अथवा मोक्ष के प्रयासों में असमर्थ है, तब अत्यंत कृपालु सर्वेश्वर, जीवात्माओं को विवेक/ शरीर आदि प्रदान करते है जिसके उपयोग से वह जीवात्मा भगवान के युगल चरण कमलों की और अग्रसर हो।

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श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरंगनाथ के “व्यूह सौहार्दम्” (सभी जीवात्माओं के हितैषी) नामक दिव्य गुण का अनुभव करते हुए

जीवात्माएँ, विवेक/ शरीर का उपयोग अपने कल्याणार्थ भगवान को प्राप्त करने के लिए न करते हुए, श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा तिरुवाय्मौली 3.2.1 में बताये गए “अन्नाल नी तंत आक्कैयीं वालि उलल्वेन“, “सांसारिक सुखों” में लिप्त हो जाते है, जिस प्रकार एक व्यक्ति को नदी पार करने के लिए बेडा उपलब्ध है, परंतु वह उस बड़े का उपयोग न करके, नदी के साथ उसकी दिशा में बहते हुए सागर में गिरता है, ठीक उसी प्रकार संसार सागर से तरने के लिए जीवात्माओं को जो ज्ञानेन्द्रियाँ भगवान द्वारा प्रदान की गयी है, वह उनका अनुचित उपयोग संसार में और अधिक संलग्न होने में कर रहा है। जीवात्मा ने अनंत समय से, अज्ञानता वश, अनंत पुण्य और पाप कर्मों के परिणाम स्वरुप संसार में असंख्य जन्म लिए है। उन जन्मों में, उसने अत्यंत अधम कष्टों को भोगा है (ताप त्रय – 3 प्रकार की पीड़ाएं) और उनके परिणाम के विषय में बिना समझे, कर्मों में प्रवृत्त होकर, गर्भ (उदार में रहना), जन्म, बाल्य (बालक होना, जो स्वयं अपनी देखभाल नहीं कर सकता), यौवन (युवा अवस्था जो इन्द्रियों के रस-स्वादन में आसक्त), वृद्ध, मरण (मृत्यु) और नरक (नारकीय स्थानों में जीवन) जैसे अनंत कष्ट सहन करते है। यह देखकर कि जीवात्मा, इस संसार सागर में अनंत कष्टों को भोग रहे है, सरस ह्रदयवाले अत्यंत कृपालु भगवान, जो सभी के कल्याण की अभिलाषा करते है और निरंतर जीवात्माओं के उद्धार के लिए प्रयासरत है, उन्हें कष्टों में देखकर उन पर कृपा करते है, जैसे की कहा गया है “एवं सम्श्रुती चक्रस्त्ते ब्राम्यमाने स्वकर्मभि: जीवे दुक्खाकुले विष्णो: कृपा कापी उपजायते“। अपने ह्रदय में उत्पन्न महान कृपा और करुणा के फल स्वरुप, “जायमानं ही पुरुषं यं पश्येन् यं पश्येन् मधुसुदन: सात्विकस् स् तु विज्ञेयस् स् वै मोक्षार्थ्थ चिन्तक:“, अर्थात भगवान, जन्म के समय जीवात्माओं को ज्ञान/विवेक प्रदान करते है जिस के परिणाम स्वरुप वह इस संसार सागर से तरने/ उद्धार का मार्ग खोजना प्रारंभ करता है। एक मुमुक्षु के लिए, सही ज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त करना असंभव है।

सच्चे ज्ञान को दो प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है: शास्त्रों के द्वारा अथवा आचार्यों/ गुरुओं के उपदेश के द्वारा।

प्रथमतय, शास्त्रों से अध्ययन करने की कुछ सीमाएं है:

      • शास्त्र ज्ञानं बहु क्लेशं” – क्यूंकि शास्त्र अनंत है और उनके बहुत से कथन विरोधाभासी प्रतीत होते है, एक सामान्य मनुष्य के लिए शास्त्रों का अध्ययन करना और उनका अभिप्राय समझना अत्यंत दुष्कर है। इसीलिए इसका अनुसरण करना कठीन है।
      • यद्यपि मनुष्य शास्त्रों के अध्ययन की कठनाइयों को सहन करने के लिए तत्पर भी हो, तथापि जैसा कि कहा गया है “अनंतभारं बहुवेदित्वयम् अल्पच्चा कालो भहवच्च् विघ्ना:“, अर्थात प्राप्त करने के लिए ज्ञान अत्यधिक है, परंतु  जीवात्माओं (बद्ध जीव) का विवेक और जीवन अवधि सिमित है और इस शास्त्र के अध्ययन के प्रयासों में अनेक बाधाएं है।
      • अंततः, यद्यपि स्त्रियों और बालकों को मुमुक्षु बनने की योग्यता है तथापि उन्हें शास्त्रों के अध्ययन की योग्यता नहीं है

द्वितीय यह कि , गुरु/आचार्य से अध्ययन करने में उपरोक्त कोई भी बाधाएं नहीं है (क्यूंकि वे शास्त्रों के सार और अभिप्राय को भली भांति समझते है और सुगम भाषा में उसे अपने शिष्यों/ अनुयायिओं को प्रदान करते है)।

इन्हीं को ध्यान में रखकर, सभी शास्त्रों में निपुण अत्यंत कृपालु श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने जीवात्माओं के कल्याणार्थ, तीन तत्वों (चित, अचित और ईश्वर) के सच्चे गुण और प्रकृति को अत्यंत सुगमता से समझाया है। ध्यान करें कि यह सिद्धांत शास्त्रों में उल्लेखित है, परंतु प्रत्येक प्राणी के लिए यह सुलभता से उपलब्ध नहीं है – इसिलिए अपनी महान कृपा से पिल्लै लोकाचार्य ने उन्हें अपने इस प्रबंध में संकलित किया (तत्व त्रय)।

पूर्वाचार्यों जैसे नडुविल तिरुविधि पिल्लै भट्टर, पेरियावाच्चान पिल्लै, आदि द्वारा इन अत्यंत जटिल सिद्धांतों को सुलभ शैली में लिखने का उद्देश्य यही है कि प्रत्येक जीवात्मा के कल्याण के लिए अत्यंत सुगमता से इस यथार्थ ज्ञान का प्रस्तुतीकरण हो। यहाँ कुछ प्रश्न उत्पन्न होते है –

हमारे पूर्वाचार्य,

  • पूर्णतः अहंकार से मुक्त,
  • सदैव सभी जीवात्माओं के कल्याण के विषय में विचार करनेवाले,
  • किसी भी व्यक्तिगत प्रसिद्धि के विषय में विचार न करनेवाले थे।

तब ऐसी स्थिति में अनेक आचार्यों ने समान विषय पर व्याख्या क्यों की?  क्या वे सभी प्रथम वर्णित ग्रंथ को स्वीकार करके उसी के माध्यम से सिद्धांतों का विवेचन नहीं कर सकते थे? (इस विषय पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अत्यंत सुंदर व्याख्यान को पढ़े)

  • यद्यपि आलवारों को एकगण्तर कहा गया है (एक देह और अनेकों मुख अर्थात वे सभी समान सिद्धांतों के विषय में चर्चा करते है), अनेकों आलवारों द्वारा एक ही सिद्धांत के कथन पर, वह सिद्धांत विश्वसनीय हो जाता है – जब बहुत से विश्वसनीय महानुभाव एक विशेष विषय की महिमा करते है, वह विषय स्थापित हो जाता है। उसी प्रकार, आचार्यों भी एकगण्तर के समान ही विभिन्न ग्रंथों के समान सिद्धांतों को समझाते है जिससे अत्यंत अल्प बुद्धि का प्राणी भी यह देखकर कि अनेकों महानुभाव भी एक ही सिद्धांत की विवेचना करते है उस सिद्धांत की वैद्यता के विषय में अस्श्वस्त हो जाते है।
  • इसके अतिरिक्त, एक ग्रंथ में संक्षिप्त में समझाया गया सिद्धांत ही अन्य ग्रंथ में विस्तार से समझाया गया है। इसीलिए सभी विविध ग्रंथ एक दुसरे के पूरक है।

यही सिद्धांत वहां भी लागू होता है जहाँ एक ही आचार्य द्वारा एक ही सिद्धांत पर कई ग्रथों की रचना की गयी है। ये सभी सिद्धांत पूर्णतः स्थापित हैं और विभिन्न ग्रंथों एक दूसरे के पूरक है।

3.PL-mamunigalपिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपुरी

इस प्रकार, तत्व त्रय का अत्यंत भव्य परिचय खंड यहाँ समाप्त होता है।इस ग्रंथ की सुप्रसिद्धि इसी बात में है कि इसने हमारे विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत के सभी प्रमुख/जटिल सिद्धांतों को सुगमता से प्रकट किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर और संक्षिप्त विवरण के साथ, यह हमारे लिए एक महान निधि है। इस ग्रंथ को किसी आचार्य के द्वारा सुनना और समझाना ही हितकर है। हम भी ऐसे महान आचार्य चरण कमलों में प्रणाम करें और उनकी कृपा को प्राप्त करें।

चित (जीवात्मा), अचित (पदार्थ) और ईश्वर इन तीन सिद्धांतों के विषय में सुगम रूप में हम पूर्व में चर्चा कर चुके है और इन्हें http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-tattva-trayam.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – मुमुक्षुप्पडि

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/ आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना मुमुक्षुप्पडि के विषय में चर्चा करेंगे।

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अत्यंत दयालु आचार्य – श्रीशठकोप आलवार, श्रीरामानुज स्वामीजी, पिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पिल्लै लोकाचार्य ने प्रमुख रूप से 18 रहस्य ग्रंथों (गोपनीय सिद्धांतों) की रचना की है। इन 18 ग्रंथों में से, मुमुक्षुप्पडि, तत्व त्रय और श्रीवचन भूषण को कालक्षेप ग्रंथों के रूप में जाना जाता है। कालक्षेप ग्रंथ से आशय उन ग्रंथों से है जिनका अध्ययन आचार्य की सन्निधि में शब्दशः, व्याख्यानों और विवरणात्मक समीक्षा के माध्यम से किया जाये।

इन 3 ग्रंथों का संक्षेप इस प्रकार है:

  • मुमुक्षुप्पडि ग्रंथ, तिरुमंत्रम, द्वयमंत्र (श्रीमन्नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये; श्रीमते नारायणाय नमः) और चरमश्लोक (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज; अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः) रूपी तीन रहस्यों का अत्यंत सटीक अभिलेख है।
  • तत्व त्रय ग्रंथ को कुट्टी भाष्य (अर्थात लघु श्रीभाष्य) के रूप में भी जाना जाता है क्यूंकि यह ग्रंथ, श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा रचित श्रीभाष्य (जो वेद व्यास के ब्रह्म सूत्र का व्याख्यान है) में समझाए गए सिद्धांतों के सार का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में तीन मूलभूत सिद्धांतों के विषय में चर्चा की गयी है – चित (जीवात्मा), अचित (पदार्थ) और ईश्वर। इस ग्रंथ का संक्षेप वर्णन http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।
  • श्रीवचन भूषण,एक अत्यंत ही वृहद ग्रंथ है,जो श्रीवैष्णव संप्रदाय के महत्वपूर्ण पक्षों की विवेचना करती है जैसे कि श्रीलक्ष्मीअम्माजी का पुरुष्कार (जीवात्मा को भगवान के शरण कराने का श्रीलक्ष्मी अम्माजी का कृपामय स्वभाव), भगवान का उपयात्व (भगवान को प्राप्त करने के लिए स्वयं भगवान ही साधन है), श्रीवैष्णव लक्षण, श्रीवैष्णवों की महिमा और अंततः आचार्य अभिमान (आचार्य की कृपा)।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने पिल्लै लोकाचार्य के इन 3 ग्रंथों के लिए विस्तृत और श्रेष्ठ व्याख्यान की रचना की है, जो अत्यंत गहन है और इस दिव्य ज्ञान की चाहना रखने वालों के लिए आनंददायी है।

इस भूमिका के साथ, आइये अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित मुमुक्षुप्पडि के परिचय के अनुवाद को देखते है।

मुमुक्षुप्पडि का सामान्य परिचय

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श्रीवैकुंठ में नित्यसूरियों द्वारा सेवित परमपदनाथ

सर्वेश्वर भगवान, श्री महालक्ष्मीजी के स्वामी है, वे नित्य और मुक्तों द्वारा सेवित, सदैव प्रसन्नचित, श्रीवैकुंठ (जहाँ नित्य आनंद है) में विराजते है। इस आनंदमय स्थिति में भी, वे संसार में प्राणियों को देखकर व्यथित होते है, जो परमपद के नित्य आनंद प्राप्त करने के लिए योग्य होते हुए भी इस अस्थायी संसार में असत् (जो ब्रह्म को नहीं जानते, वे मात्र अवचेतन, बिना बुद्धि के, जड़ वस्तु के सामान ही है) के समान रह रहे है, जिन्हें इस स्वर्णिम अवसर के विषय में कोई ज्ञान नहीं है। प्रलय के समय जीवात्मा विवेक और देह रहित होकर, उस पक्षी के समान हो जाती है जिसके पंख नहीं है (जो कुछ भी नहीं कर सकता), उन्हें इस प्रकार देखकर भगवान अत्यंत दुखी होते है और उनका कल्याण करने की कृपा करते है।

  • प्रथमतय वे जीवात्मा पर कृपा कर उसे विवेक और देह प्रदान करते है। विवेक और देह के अभाव में, जीवात्मा कोई भी कार्य करने में असमर्थ है। इसलिए भगवान सर्वप्रथम उन्हें विवेक और शरीर प्रदान करते है।
  • उसके पश्चाद, भगवान उस विवेक और देह का उचित उपयोग करने की सुगमता प्रदान करते है। भगवान, वेदों का ज्ञान प्रदान करते है और स्मृति, इतिहास, पुराण आदि के माध्यम से उसका विस्तृत व्याख्यान भी प्रदान करते है। शास्त्रों के अध्ययन एवं उनमें उल्लेखित सिद्धांतों के अनुसरण के द्वारा, प्राणी परमपद में भगवान को प्राप्त कर सकता है। वेदों के अपरिहार्य रूप से कुछ अद्वितीय गुण है। वे निम्न है:
  1. अपौरुषेयम् – इनकी रचना किसी प्राणी विशेष द्वारा नहीं की गयी। भगवान ने भी वेदों के रचना नहीं की (क्यूंकि वेद नित्य/ सदैव विद्यमान है) – भगवान वेदों के उत्कृष्ट ज्ञाता है और प्रत्येक सृष्टि (रचना) के समय, वे इसे उद्घाटित करते है। अनंत काल से सृष्टि (रचना), स्थिति (पालन) और प्रलय (संहार) का चक्र चलता आ रहा है।
  2. नित्यम् – वह जो सनातन है और सदैव विद्यमान है। क्यूंकि वेद अपौरुषेयम् है, वे सदैव विद्यमान है।
  3. निर्दोषम् – निष्कपट/ निष्कलंक – वेदों में वर्णित सभी निर्णय उत्तम है, क्यूंकि वे अपौरुषेयम् है। दोष की उत्पत्ति तब होती है, जब उनकी रचना किसी प्राणी द्वारा की जाती है, जिसमें भ्रम, विप्रलम्भम (छल – कपट करने की प्रवृत्ति), प्रमाद (उपेक्षा), अशक्ति (अयोग्यता) आदि भाव निहित होते है। (टिपण्णी: यद्यपि विभिन्न प्राणियों पर उनके स्वभाव (सत्व – अच्छाई, रजस् – राग, तमस् – आज्ञान) के अनुसार विभिन्न पक्ष प्रयुक्त होते है, परंतु वेदों में किंचित मात्र भी दोष नहीं है।
  4. स्वत: प्रमाणं – वेदों को स्थापित करने के लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है – वेदों में वर्णित सभी निर्णय स्वतः ही प्रमाणित है।
  • अपने कल्याणार्थ शास्त्रों की आज्ञा से ज्ञान का विकास करना और उनके अध्ययन हेतु अनेकों नियमों और निर्देशों का अनुसरण करना अत्यंत दुष्कर है, यह जानकार भगवान स्वयं कृपा कर आचार्य (प्रथम आचार्य) का रूप धारण कर, अत्यंत सुलभ शैली में सभी शास्त्रों का सारतत्व दर्शाये है। इस प्रकार, उन्होंने स्वयं ही सभी महत्वपूर्ण रहस्यों को प्रकट किया, जो निम्न सिद्धांतों को समझाते है:
  1. स्वरुप – भगवान और जीवात्मा का स्वभाव
  2. उपाय – भगवान को प्राप्त करने का साधान
  3. पुरुषार्थ – सेवा/ कैंकर्य ही चरम उपेयम्

भगवान ने ही श्रीबद्रिकाश्रम में नारायण ऋषि के रूप में नर ऋषि को (जो भगवान के ही अंश है), श्री तिरुमंत्र का उपदेश किया।

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श्री विष्णुलोक में उन्होंने अपनी प्रिय श्रीमहालक्ष्मीजी को द्वयमंत्र का उपदेश किया।

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कुरुक्षेत्र के रण में उन्होंने रथ के समीप श्रीकृष्ण के रूप में अर्जुन को चरम श्लोक का उपदेश प्रदान किया।

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भगवान द्वारा स्वीकार किये गए इस आचार्य रूप के फलस्वरुप ही, हम अपनी गुरु परंपरा के प्रारंभ में प्रथमाचार्य (प्रथम आचार्य) के रूप में उनका स्मरण करते है, जैसा कि श्रीकुरेश स्वामीजी द्वारा “लक्ष्मीनाथ समारंभाम् (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी से प्रारंभ करते हुए)” तनियन में दर्शाया गया है।

यद्यपि यह रहस्यत्रय आकार में सूक्ष्म है, तथापि उनमें अत्यंत गूढ़ अर्थ निहित है। इन अर्थों को किसी सुयोग्य आचार्य/ प्रबुद्ध विद्वान से ही श्रवण करना चाहिए और इस प्रकार के उचित अध्ययन के द्वारा ही हमारा कल्याण हो सकता है। इसलिए हमारे पूर्वाचार्यों ने अत्यंत ध्यान से रहस्यत्रय को अभिलिखित किया है। ऐसे ही महान आध्यात्मिक गुरुओं के वंश में प्रकट हुए, श्री पिल्लै लोकाचार्य ने अपनी निर्हेतुक कृपा से, उन सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख इस ग्रंथ (मुमुक्षुप्पडि) में किया है।

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पिल्लै लोकाचार्य – श्रीरंगम

इस ग्रंथ की रचना करने से पूर्व, उन्होंने इन रहस्यत्रय को तीन विविध ग्रंथों द्वारा समझाया है – याध्रुच्चिकप्पदी, श्रिय:पतिप्पदी और परंत-पदी। इनमें याध्रुच्चिकप्पदी अत्यंत संक्षेप रचना थी और परंत-पदी अत्यंत विवरणात्मक। यद्यपि श्रिय:पतिप्पदी न अत्यधिक दीर्घ थी, न ही अधिक संक्षेप थी तथापि वह संस्कृत वर्ण (वेदों) की शब्दावली से निहित थी, जो महिलाओं और अन्य मनुष्यों के अध्ययन के लिए मान्य नहीं थी। किसी ऐसे ग्रंथ की रचना की अभिलाषा से, जिसमें यह अभाव नहीं हो, पिल्लै लोकाचार्य ने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुमुक्षुप्पडि नामक इस अत्यंत सुलभ ग्रंथ की रचना की।

इसीलिए, सभी प्रबंधनों (ग्रंथों) में, यह मुमुक्षुप्पडि सभी के लिए प्रमुख है। इसके अतिरिक्त, इस ग्रंथ में वह सिद्धांत भी समझाए गए है, जो पूर्व प्रबंधनों में नहीं थे – इसलिए इस ग्रंथ की बहुत महिमा है।

द्वय प्रकरण का परिचय (द्वय महामंत्र की व्याख्या करने वाला खंड)

प्रथम रहस्य तिरुमंत्र के अर्थ को समझाने के बाद, पिल्लै लोकाचार्य ने कृपापूर्वक द्वय महामंत्र के दिव्य अर्थ को समझाया, जो उपाय और उपेय के स्वभाव को प्रदर्शित करता है, जो क्रमशः तिरुमंत्र के द्वितीय पद (नमः) और तृतीय पद (नारायण) में बताये गए है।

स्वयं पिल्लै लोकाचार्य ने अपने विगत 3 प्रबंधनों में क्रमशः तिरुमंत्र, चरम श्लोक और द्वय मंत्र को समझाया है, परंतु इस प्रबंधन में, वे चरम श्लोक से पूर्व द्वयमंत्र के अर्थ की व्याख्या करते है – क्यों? दोनों क्रम हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा समझाए गए है। पेरियवाच्चान पिल्लै ने अपने ग्रंथ, परंत रहस्य में और वादी आदि केसरी अलगिय मणवाल जीयर ने अपने रहस्य ग्रंथों में यह क्रम अपनाया है – तिरुमंत्र, द्वय और चरम श्लोक।

इन दो विविध क्रमों के पीछे क्या सिद्धांत है? इसके 2 अभिप्राय है:

  1. इन तीन रहस्यों को मंत्र, विधि और अनुष्ठान रहस्य के रूप जाना जाता है। तिरुमंत्र, मंत्र स्वरुप है (मंत्र वह है जिसके ध्यान से स्वयं के वास्तविक स्वरुप का अनुभव होता है), चरम श्लोक, विधि/ निर्देश स्वरुप है (इसके द्वारा भगवान दर्शाते करते है कि हमारे लिए क्या त्यागने योग्य है और क्या अनुसरण करने योग्य है) और द्वय महामंत्र, अनुष्ठान स्वरुप है (निरंतर अभ्यास करने योग्य)।
  2. तिरुमंत्र को दो प्रकरण में विभाजित किया जाता है – प्रणवं (ओमकारम्) और नमो नारायण (जो मंत्र का शेष है)। नमः पद – जो उपाय के विषय में बताता है और नारायण पद – जो उपेय के विषय में बताता है, इन्हें द्वय मंत्र के दो चरणों में समझाया गया है। इसके पश्चाद, द्वय महामंत्र के 2 चरणों को चरम श्लोक के दो खण्डों में समझाया गया है।

इसलिए दोनों ही क्रम उपयुक्त है। क्यूंकि पिल्लै लोकाचार्य ने अपने प्रथम 3 प्रबंधनों में इन्हें एक प्रकार के क्रमानुसार समझाया है (तिरुमंत्र,चरम श्लोक, द्वयं), इसलिए अन्य क्रम के अनुरूप(तिरुमंत्र, द्वयं, चरम श्लोक)व्याख्या करने की अभिलाषा से उन्होंने इस ग्रंथ (मुमुक्षुप्पडि) में द्वयमंत्र के महत्त्वपूर्ण अर्थों का रहस्योद्घाटन प्रारंभ किया।

चरम श्लोक प्रकरण का परिचय (चरम श्लोक की व्याख्या करने वाला खंड)

द्वितीय रहस्य, द्वयं की व्याख्या के पश्चाद, श्री पिल्लै लोकाचार्य चरम श्लोक समझाना प्रारंभ करते है, जिसका सार इस प्रकार है –

  • यह परम गोपनीय ज्ञान है,
  • यह गीतोपनिषद का अत्यधिक महत्वपूर्ण पक्ष है, गीतोपनिषद महाभारत का सार है जो पंचम् वेद के नाम से भी प्रचलित है,
  • यह द्वय महामंत्र का विस्तृत रूप है –
  1. द्वय मंत्र का प्रथम चरण जीवात्मा द्वारा श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों को अपने कल्याण का उपाय स्वीकार करने पर केन्द्रित है। यह उपाय चरम श्लोक के प्रथम चरण में स्वयं भगवान द्वारा आदेश किया गया है। उसी प्रथम चरण में भगवान दो अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों का भी प्रतिपादन करते है:
              • भगवान के अतिरिक्त किसी भी अन्य उपाय (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, आदि) का निष्ठापूर्वक त्याग करना
              • भगवान को अपना उपाय स्वरुप स्वीकार करना ही जीवात्मा का स्वाभाविक स्वरुप है, न की स्वयं द्वारा की गयी शरणागति को उपाय मानना (भगवान ही उपाय है, हमारे द्वारा उनकी शरणागति स्वीकार करने का स्व-प्रयास उपायस्वरुप नहीं है)

2. द्वय मंत्र का द्वितीय चरण श्रीमन्नारायण भगवान के मुखोल्लास हेतु स्वार्थ रहित कैंकर्य करने पर केन्द्रित है। नित्य कैंकर्य में सदैव संलग्न रहने हेतु, संसार से निवृत्ति अनिवार्य है और नित्य कैंकर्य प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने का आश्वासन भगवान स्वयं प्रदान करते है।

चरम श्लोक के अर्थों को प्राप्त करने हेतु, श्रीरामानुज स्वामीजी, 18 बार श्रीरंगम से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी के निवास स्थान, तिरुक्कोष्टियूर चलकर गये।

तिरुक्कोष्टियूर नम्बी चरम श्लोक के गहन अर्थों के लिए अत्यंत चिंतित रहते थे और उन्हें इस अत्यंत गोपनीय सिद्धांत को प्राप्त करने योग्य उपयुक्त अभ्यार्थी नहीं जँच रहा था। श्रीरामानुज स्वामीजी के आस्तिक्य (शास्त्र के प्रति उनकी श्रद्धा और विश्वास) को जांचने के लिए, नम्बि ने उन्हें 18 बार यात्रा करवाई, फिर उनसे शपथ लेने के लिए कहा कि वे इन अर्थों को किसी भी अयोग्य व्यक्ति को प्रदान नहीं करेंगे और अंततः चरम श्लोक के अत्यंत गोपनीय अर्थों को बताने के पहले उनसे एक महीने तक उपवास कराया।

श्रीरामानुज स्वामीजी के पहले पूर्वाचार्य चरम श्लोक के गोपनीय अर्थों को नहीं बताते थे क्यूंकि उन अर्थों को जानने के योग्य बहुत कम प्रत्याशी थे और यह अर्थ अत्यंत गूढ़ है। चरम श्लोक प्राप्त करने के योग्य और उपयुक्त अभ्यार्थी में निम्न योग्यताएं उपस्थित होनी चाहिए:

  • पुर्णतः सिर्फ सत्व गुणी होना
  • भगवान से प्रति संपूर्ण प्रीति और निष्ठा
  • सांसारिक सुखों से पुर्णतः निवृत्ति
  • प्रमाणों (वेदों आदि) पर पुर्णतः दृढ रहना
  • भगवान की अद्भुत लीलाओं को श्रवण करने पर उन पर सम्पूर्ण विश्वास करना
  • अत्यंत उच्च आस्तिक प्रवृत्ति (आस्तिक्य – शास्त्र के प्रति श्रद्धावान, आस्तिकों में सबसे उच्च – अग्रणी)

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तिरुक्कोष्टियूर नम्बी ने श्री रामानुज स्वामीजी की करुणा से प्रसन्न होकर,
उन्हें एम्पेरूमानार नाम प्रदान किया

परंतु श्रीरामानुज स्वामीजी ने संसारियों (बद्ध जीवों) के कष्टों को देखकर और दया और करुणा से अभिभूत होकर, उनके कष्ट उन्मूलन हेतु, चरम श्लोक के गहन अर्थों को सबके सामने उद्घोषित किया। चरम श्लोक के अर्थों की उनके द्वारा उद्घोषणा करने के कारण ही तिरुक्कोष्टियूर नम्बी ने उन्हें “एम्पेरूमानार” नाम से संबोधित किया।

यद्यपि श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा इसे दर्शाया गया है और अन्य पूर्वाचार्यों द्वारा भी समझाया गया है, तथापि पिल्लै लोकाचार्य, ने प्रत्येक प्राणी के कल्याणार्थ अपनी असीम कृपा से, अपने अनेकों प्रबंधनों में इन दिव्य अर्थों का संग्रह किया है। अन्य प्रबंधन, जो समझने में कठिन है उनके समान न होकर, इस प्रबन्ध में, उन्होंने सिद्धांतों की अत्यंत सुगमता से व्याख्या की है जिससे प्रत्येक प्राणी इन सिद्धांतों को सुलभता से समझ सके।

इस प्रकार मुमुक्षुप्पडि का अत्यंत भव्य, परिचय खंड यहाँ समाप्त होता है। इन गोपनीय सिद्धांतों को अत्यंत सुगमता से समझाने वाले, पिल्लै लोकाचार्य के अत्यंत कृपामय स्वभाव का हमें अभिवादन करना चाहिए। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अतिरिक्त कृपा कर, मुमुक्षुप्पडि के इन दिव्य सूत्रों को अत्यधिक स्पष्टता से सबके समझने और जीवन में उसे अपनाने के योग्य बनाया। इस ग्रंथ के सिद्धांतों को पुर्णतः समझने के लिए इनका अध्ययन आचार्य के सानिध्य में करना ही सबसे हितकर है। आइये हम भी ऐसे महान आचार्य के चरण कमलों में प्रणाम करें और उनकी कृपा प्राप्त करें।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-mumukshuppadi.html

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