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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३२)

६७) आश्रम विरोधी – अपने आश्रम में बाधाएं (जीवन का स्तर)

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आश्रम अर्थात जीवन का स्तर। वैदिक सम्प्रदाय में जीवन के ४ स्तर पहचाने गये है – ब्रह्मचर्य (उपनयन के पश्चात और विवाह से पूर्व), गृहस्थ (गृहस्थाश्रम – विवाहित जीवन), वानप्रस्थ (स्त्री के साथ वन में अलग से जीवन व्यतित करना) और सन्यास (जिसे तुरियाश्रम, उत्तमाश्रम भी कहते है – तपस्वी – अकेले रहना)। किसी आश्रम में रहने के लिये हर आश्रम के अलग अलग नियम और दिशा निर्देश है। सभी को अपने आश्रम के दिशा निर्देश को सीखना और बिना चूके पालन करना है। उस आश्रम के दिशा निर्देश के विपरित रहना बाधा है। विषय की लम्बाई को देखते हुए हर आश्रम के दिशा निर्देश को नहीं बताया गया है।

अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्रानुसार मनुष्य के जीवन को चार स्तर में बाँटा गया है।

पहला स्तर है ब्रह्मचर्य (विध्यार्थी / अविवाहित जीवन)। जब एक लड़का यज्ञोपवित संस्कार और ब्रह्मोपदेश (अपने आचार्य से पवित्र मन्त्र प्राप्त करना) प्राप्त करता है तब से प्रारम्भ होता है। हम आगे वर्ण के विषय में चर्चा करेंगे। केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य वर्णवाले ही यज्ञोपवित और ब्रह्मोपदेश प्राप्त करते हैं। वर्णानुसार यज्ञोपवित को इस आयु में ही प्राप्त करते हैं (ब्राह्मण – ८ वर्ष, क्षत्रीय – ११ वर्ष और वैश्य – १२ वर्ष; उम्र की गणना माँ का गर्भ धारण के समय से होती है)। एक बार ब्रह्मोपदेश प्राप्त हो जाने पर वह बालक वेद और उससे जुड़े विषयों को गुरुकुल में आचार्य के सन्निधी में शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। सामान्यत: वह बालक आचार्य के साथ उनके तिरुमाली- गुरुकुल में रहता है। वह लम्बे समय तक वहाँ शिक्षा प्राप्त करता है और मूल ग्रन्थ और वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण, स्मृति, आदि की अर्थ सहित शिक्षा प्राप्त करता है। क्षत्रीय बालक धनुर विद्या कि शिक्षा प्राप्त करता है – लड़ाई और शस्त्र का विज्ञान। शिक्षा प्राप्ति के समय विध्यार्थी को अपने शिक्षक के शारीरिक जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है। विध्यार्थी जंगल जाकर लकड़ी इकट्ठा कर लाएंगे, भोजन के लिये भिक्षा भी मांगेंगे, आदि। जो भी दान प्राप्त होता है उसे शिक्षक को दिया जाता है और शिक्षक उसे विध्यार्थी को सही तरीके से प्रयोग करने को कहता है। विध्यार्थी भी गुरु की अच्छे से सेवा करते हैं। ब्रह्मचार्य का एक और अर्थ है ब्रह्म विध्या पर केंद्रित होना और एक साधारण और अलग से जीवन व्यतीत करना। आनन्द और खुशी के लिये कोई स्थान नहीं है जैसे सुगंधित द्रव्य लगाना, ताम्बूल पाना, आदि। जीवन के इस स्तर पर अगर सही शिक्षा प्राप्त हो तो वह पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित होगा और आध्यात्मिक जीवन की ओर सही रवैया रहेगा।

फिर जब वह गुरुकुल से बाहर आता है तो वह युवा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य हो जाता है। गृहस्थाश्रम विवाहित जीवन है। जब कोई वैदिक विवाह के बन्धन में बंध जाता है तो वह अपनी स्त्री की रक्षा करने कि प्रतिज्ञा करता है। वह यह भी वचन लेता है कि उससे जो संतान जन्म लेगी उसे भी सही वैदिक धर्म में शिक्षा प्रदान करायेगा। भागवत में ऋषभ देव (भगवान के एक अवतार) कहते हैं हमें देव, पति, आचार्य और पिता का स्थान तभी ग्रहण करना चाहिये जब हम स्वयं पर निर्भर जनों को मोक्ष की राह पर ले जाने के लिये सक्षम हो। गृहस्थ का मुख्य कर्तव्य ब्रह्मचारी और सन्यासी का ध्यान रखना हैं। गृहस्थाश्रम जनों को चाहिये कि वे अनपेक्षित अतिथि का बड़े आदर से स्वागत कर उनका ध्यान रखें। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी गृहस्थाश्रम में सही तरीके से रहनेवाले कि “नल्ल कोट्पट्टुलगन्गल् ……….नल्ल पथत्ताल मनै वाल्वार कोण्ड पेण्डिर् मक्कले” ऐसे स्तुति करते है। यह पदिगम “नेदुमार्कदिमै” भागवतों के प्रति कैंकर्य के महत्त्व और स्तुति को स्थापित करता है। इस पदिगम के अन्त में श्रीशठकोप स्वामीजी यह कहते हैं कि जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों की सेवा पर केन्द्रित है उनका गृहस्थाश्रम जीवन बहुत सुन्दर होगा जो ऐसे कैंकर्य पर केन्द्रित होगा वह इस संसार में भी एक सुन्दर जीवन व्यतीत करेगा। यहाँ श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से एक मुख्य तत्त्व को समझाते है – वे कहते हैं आदर्श परिवार का अर्थ है जब पति श्रीवैष्णवों की सेवा करना चाहता है तो उसकी पत्नी और बच्चे भी उसी के विचार पर चलेंगे और सेवा भी करेंगे नाकि स्वार्थी बन बैठेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी शेल्व नम्बी के जीवन की एक घटना को उदाहरण के तौर पर दर्शाते हैं। सेल्व नम्बी जिनकी श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी बहुत प्रशंसा किये है हमारे पूर्वाचार्यों ने भी अपने व्याख्यानों में उन्हें एक आदर्श गृहस्थ कहा है। एक बार जब वे बाहर गये हुये थे तो कुछ श्रीवैष्णव उनके तिरुमाली में पधारे जिनका उनकी पत्नी ने स्वागत किया। परन्तु उसे जब पता चला कि उनके प्रसाद हेतु उसके पास चावल नहीं है तो उसने अगले साल की खेती के लिये जो धान (इसे बहुमूल्य माना जाता है क्योंकि अगले साल की जीविका उस पर ही निर्भर है) बचा के रखा था उस धान से चावल निकालकर उन अतिथि के लिये प्रसाद बनाती है। जब सेल्व नम्बी लौटकर आते है तो धान के विषय में पत्नी से पूछते है। वह कहती है “मैंने अभी धान को बो दिया है जिसका फल श्रीवैकुण्ठ में प्राप्त होगा” अर्थात “मैंने उसे श्रीवैष्णवों को दे दिया है और यही उच्च कैंकर्य है”। यह सुनकर सेल्व नम्भी अत्यन्त आनंदित होते है – ऐसा सेल्व नम्बी और उनकी पत्नी का समर्पण भाव था। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी तोण्डनूर, एच्चान, आदि का उदाहरण देते हैं कि कैसे वे गृहस्थ जीवन भक्तों का कैंकर्य करते हुए निर्वाह करते हैं।

अगला आश्रम है वानप्रस्थम (दम्पति का वन में अलग अलग रहना)। एक अवस्था के पश्चात (५० वर्ष के बाद) दम्पति अपनी दिनचर्या से सन्यास लेकर वन की ओर प्रस्थान कर वहाँ निवास करते हैं। यह क्यों जरूरी हैं? क्योंकि जब यहीं कार्य अपने बच्चों, सम्बन्धियों के संग निरन्तर करते रहेंगे तो हम इसके आदि हो जाते हैं और भगवान की ओर अपना ध्यान कम कर देते है। जीवन का एक बहुमूल्य पहलू है भगवान के विषय में निरन्तर ध्यान करना। अपनी जरूरतों को कम से कम करना और अलग-अलग साधारण ढंग से जीवन निर्वाह करने से यह कार्य आसान हो जाता है। इस स्तर पर एक साधारण तिरुमाली में निवास करता है, साधारण प्रसाद बनाता है जो भी वन में उपलब्ध हो, कम से कम वस्त्र हो और पूरे समय भगवान का ध्यान करना। ऋषी मुनि जो वन में है उनकी सेवा का अवसर भी प्राप्त होता है। परन्तु श्रीवैष्णवों का जीवन पहले ही से साधारण है जो अर्चावतार भगवान और भागवतों के कैंकर्य मे लगा हुआ है और जिनको भगवान की स्तुति सुनने का बहुत अवसर प्राप्त होता है इसलिये उन्हें वानप्रस्थम आश्रम अलग से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

अन्तिम आश्रम है सन्यासाश्रम। इस अवस्था में मनुष्य अपने सभी लगावों का त्याग कर सन्यासी हो जाता है। सन्यासाश्रम अर्थात धन, परिवार, सम्बन्धी, आदि का त्याग कर पूर्णत: भगवद विषय में समय व्यतीत करना। श्रीवैष्णव सन्यासी को परमहंस परिवारजाक आचार्य से जाना जाता है। परमहंस का अर्थ बहुत बुद्धीमान जैसे हंस जो जल को दूध से (सार को असार) अलग करता है। और हंस को दलदल / किचड़ में आसानी से रहने की आदत है लेकिन उससे प्रभावित नहीं होते हैं – उसी तरह सन्यासी जो इस सांसारिक दुनिया में रहता है उसे सांसारिक सुख से कुछ भी फरक नहीं पड़ता है। ब्रह्मचर्य में जैसे ब्रह्म विध्या के निर्देशानुसार और सांसारिक सुख को सही तरीके से पालन करना चाहिये। परिवारजाक आचार्य का अर्थ है वह जो निरंतर भ्रमण करता है और सभी को उच्च ज्ञान प्रदान करता है। वे न केवल उपदेश देते हैं अपितु वे उच्च तत्त्वों के उदाहरण हैं। और श्रीवैष्णव सन्यासी के पास त्रीदण्ड, कमण्डल, शिखा, यज्ञोपवित, आदि होता है। श्रीयादव प्रकाशाचार्य अन्त में श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना गुरु मानकर और उनसे सन्यासाश्रम ग्रहण कर एक नूतन नाम गोविन्दाचार्य पाते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य को निर्देश देते हैं कि सन्यासाश्रम के तत्त्वों पर शास्त्र के आधार पर एक लेख तैयार करें और जिसका परिणाम है “यति धर्म समुच्चयम”। हालाकि सन्यासी एक स्थान पर ३ दिन से अधिक नहीं रह सकते हैं परन्तु श्रीवैष्णव सन्यासी एक मठ (दिव्य देश के मन्दिर से जुड़े) में रहते है और उच्च तत्त्वों को सिखाते है। फिर भी कई सन्यासी भ्रमण कर उच्च ज्ञान का प्रसार प्रचार करते है।

हमने आश्रम रीति को थोडा देखा है। जहाँ आश्रम पद्धत्ती पुरुषों के लिये है महिलाओं की जीवन शैली भी पुरुषों के आश्रम अनुसार बदलती रहती है। सामान्यता स्त्री का पालन पोषण उसके विवाह तक उसके पिता करते है तत् पश्चात उसका पति करता है। पति के वैकुंठवास होने के पश्चात उसके बच्चे करते है। यही वैदिक धर्म है। स्त्री का पालन पोषण बहुत अच्छे से होता है और वह समाज और तिरुमाली में एक अहम भूमिका निभाती है। सामान्यता वह यह सुन्दर तत्व अपने पिता और पति से आसानी से सीख लेती है। वह अपने बच्चो को कम उम्र में ही सांच देती है और भविष्य के लिये तैयार कर देती है। एक पत्नी जैसे अपने पति के कैंकर्य में मदद करती है। चाहे वह तिरुवाराधन हो या अतिथि सत्कार हो वह पति के कैंकर्य में शामील होती है। सामान्यतया एक निर्मल वातावरण में वे दोनों शास्त्र के ज्ञान और समझ को आसानी से विकसित कर सकते हैं। धर्म शास्त्र में यह कहा गया है कि अगर हमारे आचरण, अनुष्ठान, आदि में कुछ भी शंका हो तो एक बुजुर्ग औरत से ही पूंछकर उसे स्पष्ट कर लेना चाहिये – ऐसे वैदिक परिवारों में औरतों का स्थान था। श्रीकुरेश स्वामीजी की धर्मपत्नी आण्डाल, पिल्लै उरंग विल्ली धासर की धर्मपत्नी पोण्णाचियार, श्रीकोंगिलाचान की धर्मपत्नी कोंगिल पिराट्टी, आदि कुछ जाने माने श्रीवैष्णव हैं जिनकी ज्ञान, अनुष्ठान और कैंकर्य के लिये उनकी बढ़ाई हुई है। ऐसे कई उदाहरण हैं। इस परिचय के साथ इस अंश को देखेंगे।

यह मानना कि मैं एक आश्राम से हूँ और यह न मानना कि मैं केवल भगवान का सेवक हूँ,  बाधा है। कोई किसी भी आश्रम से क्यों न हो परन्तु जीवात्मा का स्वरूप शेषत्व और पारतंत्रय है। “दास भूता स्वस्थस सर्वे” सामान्य प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा अप्रधान / दासत्त्व /भगवान के सेवक है। यह सेवा नित्य और शाश्वत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार सुन्दरता से कैंकर्य के महत्त्व को सामान्य कर्मानुष्ठान से दर्शाते है। ३१वें चूर्णिकै में कहते “जात्याश्रम दीक्शैकलिल भेदिक्कुम धर्मंगलपोले अत्ताणिच चेवगत्तिल पोधुवानतु नलुवुम” – जैसे धर्म के कुछ पहलू को छोड़ देते है उनके वर्ण, आश्राम, संकल्प के आधार पर जब कोई भगवान और भागवतों की एकान्तिक कैंकर्य कर रहा हो तो इस कैंकर्य के समय सामान्य वर्णाश्रम, धर्म अनुष्ठान का त्याग किया जा सकता है। इस चूर्णिकै के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या बहुत सुन्दर है। वह बड़ी सुन्दरता से वर्ण, आश्रम और दीक्षा को समझाते है और फिर यह समझाते है की एक सच्चे ज्ञान प्राप्त करनेवाले मनुष्य के लिये कैसे सामान्य धर्म अनुष्ठान तुच्छ हो जाता है। अन्त में वह इस तरह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य अभी तक अपने वर्ण/आश्रम अनुष्ठान का बड़े दया से पालन किये हैं। इसलिये हमे यह समझना चाहिये कि जब हम कैंकर्य में हो तो कर्मानुष्ठान का त्याग कर सकते हैं या कुछ समय पश्चात कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी यथार्थ में इसे बताये है – एक बार संध्या के समय जब वे नम्पेरुमाल का कैंकर्य कर रहे थे तो किसी ने उन्हें यह स्मरण कराया कि संध्यावंदन का समय हो गया है तो उन्होंने कहा कि हम अभी कैंकर्य में हैं तो उस पल की चिन्ता करने कि जरूरत नहीं है।

  • उत्तमाश्रम (सन्यासी) में होने का घमण्ड करना बाधा है। जब कोई सन्यासी बन जाता है तो कई जन उसके चरणों में आकर उसकी पूजा और स्तुति “यति”, “जीयर स्वामी”, आदि कहकर करते है, क्योंकि सन्यासी कठोर जीवन बिताते हैं। परन्तु सन्यासी को स्तुति सुनकर घमण्ड नहीं करना चाहिये – उन्हें यह निरन्तर सोचना चाहिये कि वह भगवान और भागवतों के सेवक हैं और उसके अनुसार रहना चाहिये।
  • अवैष्णव आश्रमी (सन्यासी) स्वपच से भी हीन होता है। यह न जानना बाधा है। स्वपच अर्थात जो कुत्ते को पकाकर खाता है। आश्रमी यहाँ सन्यासी को कहते हैं। क्योंकि अवैष्णव आश्रमी शिखा, यज्ञोपवित, नित्यकर्म जैसे संध्यावन्धन, आदि का त्याग कर देते हैं और मुख्य बात वे भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वोंत्तम नहीं मानते इसलिये उन्हें हीन समझना चाहिये। ऐसे अवैष्णव सन्यासी को पाखण्डी कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार भागवतों की महिमा बड़े विस्तार से समझाते है। वो उन जनों का उपहास भी करते है जो की अपने वर्ण और आश्रम पर केन्द्रीत होते हैं न कि वर्णाश्रम के धर्म के तत्त्वों को समझने की ओर जो भगवान श्रीमन्नारायण के पूजा की ओर है। ८६ चूर्णिकै में वे समझाते है वह वर्ण, आश्रम, ज्ञान और अनुष्ठान जो भगवान पर केन्द्रीत न हो वह निरर्थक है। सन्यासी जिसमें भक्ति न हो वह स्वपच से भी नीचा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी पहलू को बड़े सुन्दरता से शास्त्र के प्रमाण सहित समझाते हैं। वे कहते हैं “श्वपचोपि महिपाल विष्णुभक्तो ध्विजातिक: विष्णु भक्ति विहिनस्तु यतिच्च स्वपचाधम” – जब एक स्वपच पूर्णत: भगवान विष्णु की पूजा करता है तो उसे ब्राह्मण और सन्यासी से भी बड़ा समझना चाहिये। अगर वह भगवान विष्णु की पूजा नहीं करता है तो वह स्वपच से भी गिरा हुआ है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने २१७ सूत्र में इसी तत्त्व को समझाया है।
  • अपने स्वयं के आश्रम में सेवा कैंकर्य भाव नहीं होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये वे जो भी कर्म करते हैं वह कैंकर्य का एक हिस्सा हो जाता है। मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१वें सूत्र में यह समझाते हैं कि “कर्मम कैंकर्यत्थिले पुगुम” – प्रपन्नों द्वारा शास्त्रानुसार जो भी कार्य किया जाता है उसे भगवान की सेवा ही समझी जाती है। इसलिये हमारे कर्म को सेवा भाव से ही करना चाहिये।
  • अन्य के आश्रम को विपरीत आदर देना बाधा है। हाथ, पैर, आदि धोने के लिये जल सभी श्रीवैष्णवों को देना चाहिये। परन्तु चन्दन का लेप, पुष्प, ताम्बूल, सुपारी, आदि ब्रह्मचारी और सन्यासियों को निवेदन नहीं करना चाहिये। इसके जैसे अन्य कई तत्त्व भी हैं जिन्हे अपने अपने आश्रम के सम्बन्ध में समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र ३०३ और ३०४ में भगवद अपचार के विषय में विस्तार से समझाते है। एक ऐसा अपचार वहाँ पहचाना गया हैं “वर्णाश्रम विपरीतमान उपचारम”– अन्य को सम्मान करते समय वह कार्य को वर्णाश्रम धर्म के विपरित है। क्योंकि वर्णाश्रम शास्त्र द्वारा स्थापित किया गया है और जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय है, हमें इसमें दिये हुए दिशा निर्देशानुसार चलना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिये कुछ सुन्दर उदाहरण देते हैं – क्षुद्र का वेद मन्त्र का उच्चारण करना अन्यों के सम्मान के लिये (जो केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य हीं उच्चारण कर सकते है), सन्यासी का ताम्बूल, सुपारी, आदि का अर्पण करना, आदि कर्म। इसलिये हमें बड़ी सावधानी से उस कार्य से बचना चाहिये जो हमारे वर्ण और आश्रम के लिये वर्जित है।
  • उच्च तत्त्वों को समझने के पश्चात भी अगर कोई सामान्य धर्म का त्याग करने से डरता है तो यह बाधा है। इसे हम पहले ही विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। एक बार हम जीवात्मा के सच्चे स्वभाव जैसे नित्य दास इसको समझलें तब कैंकर्य कर्मानुष्ठान से भी उच्च हो जाता है।
  • अपने आश्रम के विपरीत कार्य करना बाधा है। हमें इससे बचना चाहिये। उदाहरण के तौर पर यह कहा गया है कि सन्यासी को अग्नि से दूर रहना चाहिये और इसलिये वे होम, यज्ञ, आदि को करने से अयोग्य हो जाते है। वे भोजन भी नहीं बना सकते हैं क्योंकि उसमें अग्नि लगती है। वे पान, ताम्बूल भी भगवान (स्वयं के अर्चाविग्रह) के तिरुवाराधन के समय अर्पण नहीं कर सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सभी आश्रम में कई बंधन है – ब्रह्मचारी और सन्यासी को कठोर जीवन बिताना चाहिये। ब्रह्मचारीयों को ज्ञान प्राप्त करने में और आचार्य सेवा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। गृहस्थ को भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य, सन्यासीयों कि सेवा, आदि पर केन्द्रीत होना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। सन्यासी को दिव्य ज्ञान का प्रचार सभी के लिये करना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये। सभी भागवतों को किसी भी आश्रम से क्यों न हो भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य में निरत होना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये।
  • ऐसे बाधाओं का त्याग न करना जो अपने आश्रम के विपरित हो बाधा है।
  • सन्यासी होने के कारण स्वयं को महान मानना और आचार्य कैंकर्य करने में शर्म करना बाधा है। श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होने पर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की सेवा किये जो एक गृहस्थ थे। उसी तरह श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल जीयर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की सेवा किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (सन्यास ग्रहण करने से पूर्व) कि सेवा किये। ये घटनायें हमें दिखाती हैं कि शिष्य का आचार्य की जो किसी भी आश्रम में हो सेवा करने का महत्त्व। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होकर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की बड़े आदर पूर्वक पूजा किये। एक बार जब वे अपने आचार्य की पालकी सेवा कर रहे थे तब उन्होंने कहा कि अगर यह त्रीदण्ड मेरे आचार्य की सेवा के मध्य में आता है तो मैं उसे तोड़ कर फेंक दूँगा। श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव था और उनके प्रति छोटे से छोटा कैंकर्य भी किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बनकर उनकी सेवा किये। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि शिष्य अगर सन्यासी हो तो भी उन्हैं अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये यद्यपि आचार्य गृहस्थ हो।
  • हमें अपने आश्रम के लक्ष्य को सीखना और समझना चाहिये और अपने आश्रम की सीमा में रहकर आचरण करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-33.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३२

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३१)

६६) दर्शन (सम्प्रदाय) विरोधी – तत्वज्ञान समझने में बाधाएं
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श्रीरामानुज – श्रीभूतपूरी

सम्प्रदाय का अर्थ है, एक धर्म के दार्शनिक पक्ष। हमारे धर्म को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय कहते हैं। क्योंकि श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस धर्म का पोषण किया और सभी जगह प्रतिष्ठित किया इसलिये इसे श्रीरामानुज सम्प्रदाय के नाम से भी जानते है। इस धर्म का मुख्य तत्व है- भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ अर्चावतार हैं और उनके समान या उनसे श्रेष्ठ और कोई नहीं हैं। यह धर्म परम वेदों पर आधारित है। यह धर्म इस तत्व का परिणाम है कि वेद नित्य और दोषरहित हैं। इस धर्म के अनुयायियों को यह समझना चाहिये कि आल्वारों पर स्वयं भगवान की पूर्ण कृपा थी और उनके दिव्य प्रबन्ध वेदों के समान है। उन्हें दिव्य प्रबन्ध में भी अच्छी जानकारी होनी चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: आगे बढ़ने से पहिले हम हमारे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के बारें में एक प्रस्तावना देखेंगे।

हमारे सत सम्प्रदाय का नाम “श्रीरामानुज सम्प्रदाय” स्वयं भगवान श्रीरंगनाथ ने ही दिया है – यह “उपदेश रत्नमालै” में    ने भी स्पष्ट दर्शाया है। इस सम्प्रदाय को उभय वेदान्त सम्प्रदाय भी कहकर बुलाते हैं। संस्कृत में वेद हैं जिन्हें वेदान्त, स्मृति, इतिहास, पुराण, पञ्चरत्न, आदि का समर्थन प्राप्त हैं। वेद को नित्य, अपौरुषेयम (किसी व्यक्ति द्वारा न रचित – भगवान द्वारा भी नहीं, यह केवल भगवान द्वारा नियत समय में प्रगट होते हैं), निर्दोष (दोषरहित), आदि से भी जाना जाता है। फिर द्राविड वेद है (आल्वारों द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबन्ध पाठ) जिन्हें हमारे पूर्वाचार्यों के व्याख्या का समर्थन प्राप्त है। हालाँकि आल्वारों ने दिव्य प्रबन्ध की रचना की है हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते हैं कि यह भी नित्य है और भगवान इन्हें निरन्तर प्रगट करते हैं। अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार इस तत्व को अपने “आचार्य हृदयम” नामक ग्रन्थ में समझाते हैं। क्योंकि दिव्यप्रबन्ध वेद और वेदान्त के तत्वों को दर्शाते हैं – हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़े आदर के साथ इनकी स्तुति की है और सम्प्रदाय का श्रेष्ठ प्रमाण माना हैं।

संस्कृत वेद और द्राविड वेद दोनों में श्रीमन्नारायण को ही श्रेष्ठ भगवान ऐसा सिद्ध किया है। श्रीमन्नारायण भगवान के दो प्रमुख गुण हैं – सभी पवित्र गुणों से परिपुर्ण और अपवित्र गुणों के बिल्कुल विरुद्ध है। उनकी स्तुति उभय विभूति (नित्य विभूति और लीला विभूति के स्वामी) नाथ ऐसे भी कि गयी है। श्रीमन्नारायण भगवान में कुछ ऐसे भी अद्भुत गुण देखे गये हैं जो और किसी में नहीं देखे जाते हैं – श्रिय: पतित्वम (श्रीमहालक्ष्मीजी के पति), अनन्तसायित्वम (जो शेषशैय्या में शयन किये हैं), गरुडवाहनत्वम (वह जो गरुडजी की सवारी करते हैं), आदि। इसमें श्रिय: पतित्वम मुख्य गुण हैं – श्रीभक्तिसार स्वामीजी अपने पाशुर में यह घोषित करते हैं कि “तिरुविल्लात तेवरैत् तेरेन्मिन तेवु” – वह जो श्रीमहालक्ष्मी से सम्बंधित नहीं हैं, मैं उन्हें भगवान नहीं मानूँगा। वेद कहते हैं “श्रद्धया देवो देवत्वमश्नुते ” –  श्रीमहालक्ष्मीजी से सम्बन्ध होने के कारण ही भगवान श्रीमन्नारायण को श्रेष्ठता / धार्मिकता प्राप्त है। श्रीमन्नारायण भगवान को पुष्प और श्रीमहालक्ष्मीजी को सुगन्ध ऐसा समझाया गया है। इसलिये किसी भी देवता को श्रेष्ठ और सच्चा भगवान नहीं मान सकते हैं क्योंकि शास्त्रानुसार भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ भगवान हैं।

भगवान श्रीमन्नारायण सभी स्थिति में प्रवेश करते है – दोनों स्थिति चित्त और अचित्त। वे अन्तरयामी हैं – सभी के अंत: में उपस्थित। सभी देवताओं को भी भगवान श्रीमन्नारायण ने जीवात्मा की अनुकम्पा के लिये स्थापित किया है जो इन गुणों (सत्व, रजो, तामस) के आधार पर देवता को चुनते हैं। अगर यह देवता न हो तो वें पूरी तरह नास्तिक हो जायेंगे और इस संसार चक्र में भटकते रहेंगे। कम से कम इन देवताओ के समक्ष जाने से वैदिक धर्म के प्रति कुछ विश्वास आयेगा और वें धीरे धीरे ऊपर के चेतना की ओर बढ़ेंगे। अत: इस संसार में देवतान्तर भगवान कि आज्ञा पालन के लिये है, जीवात्मा को सही मार्ग कि ओर ले जाते हैं ताकि वें अन्त में भगवान श्रीमन्नारायण की ओर जा सके। परन्तु देवतान्तर स्वयं विवश जीवात्मा है और अपने स्थान से घबड़ा जाते हैं और कभी कभी भगवान को ललकार देते हैं। इसलिये श्रीवैष्णव कभी भी उनकी पूजा नहीं करते हैं। क्योंकि श्रीवैष्णव सत्व गुण वाले हैं और देवतान्तर सत्व, रजस और तमो गुणों के मिश्रण के हैं – शास्त्र कहता है सत्व गुण निष्ठावाले को रजस और तामस गुणवालों की पूजा नहीं करना चाहिये।

यह हमारे सत सम्प्रदाय के तत्वों का संक्षिप्त में परिचय है। इस परिचय के साथ इस भाग में हम आगे बढ़ते हैं।

  • देवता जैसे ब्रह्मा, रुद्र, आदि की श्रेष्ठता पर शंका करना, त्रिमूर्ति साम्यम (ब्रह्मा, विष्णु और शिव को समान मानना) पर शंका करना, यह शंका करना कि ब्रह्मा, रुद्र, आदि की पूजा कर सकते हैं क्यों कि वे श्रीमन्नारायण के दास हैं बाधा हैं। सामान्यता ३ देवताओं को विशेषकर दर्शाया जाता है – ब्रह्माजी उत्पत्ति के लिये, पोषण के लिये श्रीविष्णु और विनाश के लिये शिवजी। फिर भी तीनों में श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं जो स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण है। ब्रह्माजी और शिवजी दोनों को भगवान श्रीमन्नारायण ने ही उत्पन्न किया है और वे दोनों उत्पत्ति और विनाश का कैंकर्य भगवान श्रीमन्नारायण की आज्ञा से करते हैं। इन दोनों की कभी भी भगवान विष्णु से श्रेष्ठ देवता ऐसी तुलना नहीं करनी चाहिये। हालाँकि तीनों को त्रीमूर्ति कहते हैं परंतु समान नहीं हैं। जैसे श्रीभक्तिसार स्वामीजी नांमुगन तिरुवंदादि में कहते है “नान्मुगनै नारायणन पडैत्तान नान्मुगनुम तान मुगमायच्चङ्करनैत्तान पडैत्तान” – भगवान श्रीमन्नारायण ब्रह्मा को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माजी शंकरजी को जन्म देते हैं – इससे हम यह समझ सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण जो सभी कारणों के कारण हैं वे ही सर्वश्रेष्ठ परमात्मा हैं। दोनों ब्रह्मा और शिव जीवात्मा हैं जो एक पद पर हैं और एक समय पूरा होने पर प्राण त्याग कर देते है जैसे सामान्य मनुष्य त्याग करते है। क्या एक श्रीवैष्णव यह विचार कर सकता है कि ब्रह्मा/शिव दोनों पूजनीय हैं क्योंकि भगवान श्रीमन्नारायण उनके अन्तरयामी है और वे भी अपनी भक्ति समय समय पर भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति प्रगट करते हैं? उत्तर -नहीं। क्युंकि उनके रजो और तमो गुणों के कारण और उनमें जो अभिमान है उन्होंने स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण का विरोध कर उनसे युद्ध भी किया है। इसलिये वे श्रीवैष्णवों द्वारा पूजने के योग्य नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुवन्दादि में ७२वें पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इस तत्व को समझाते हैं। “मुदलाम तिरुवुरुवम मून्रेन्बर ओन्रे मुदल आगुम मून्रूक्कुम एन्बर मुदल्वा निगर इलगु कार उरुवा! निन अगत्तदन्रे पुगर इलगु तामरैयिन पू” – कुछ्लोग कहते हैं कि वे तीनों देवता श्रेष्ठ हैं; दूसरे कहते हैं इन्हें छोड़ इनसे भी श्रेष्ठ एक और देवता है; है श्रेष्ठ कारणों के कारण जिनके पास सुन्दर मेघ के समान पवित्र रामवर्ण रूप है! आपकी पवित्र नाभ कमल पुष्प की जड़ है (जहां से ब्रह्माजी का जन्म हुआ – जो भगवान श्रीमन्नारायण के श्रेष्ठता को स्थापित करता है)। यही तत्व श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी “श्रीरंगराज स्तव” पूर्व शतकम के ११६वें श्लोक में समझाते हैं। इन संकेतों से हम यह समझ सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं सभी के लिये श्रेष्ठ कारण हैं। श्रीवैष्णवों को केवल भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्तों की ही पूजा करनी चाहिये। उनके भक्त का अर्थ है वह जो उनके प्रति विश्वास रखता हो और जिसमें स्पष्ट रूप से रजो तमो गुण न हो। एक बात हमें स्पष्ट रूप से समझना चाहिये कि ब्रह्मा, रुद्र, आदि जो उत्पत्ति, विनाश, आदि के स्वामी हैं एक विशेष पद के लिये ही हैं। जीवात्मा अपने कर्मानुसार उस दशा को प्राप्त करता है – जिसने कठोर तपस्या किया हो वह ब्रह्म, शिव, आदि का जन्म प्राप्त करता है। परन्तु विष्णु ऐसा कोई पद है हीं नहीं – वह स्वयं ही भगवान श्रीमन्नारायण हैं। श्रीरंगराज स्तव पूर्व शतकम के ५२वें श्लोक में श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी समझाते हैं कि अपनी निर्हेतुक कृपा से भगवान श्रीमन्नारायण इस संसार में अवतार लेते हैं और अपने आपको दोनों देवता के मध्य में रखते हैं। हालाँकि ब्रह्माजी, शिवजी, आदि ने यह समझ लिया है कि भगवान श्रीमन्नारायण के कारण ही उन्हें इस संसार में यह उच्च पद प्राप्त हुआ है। पर उन्हें अभिमान भी हुआ और वे अपने सच्चे स्वभाव को भूल गये हैं। इस परिस्थिति में वें स्वयं भगवान से ही विरोध कर लेते हैं। कृष्णावतार में ब्रह्माजी भगवान की गायों को चुरा लेते हैं और फिर भगवान कृष्ण उन्हें सबक सिखाते हैं। कठोर चेतावनी के पश्चात ही ब्रह्माजी को अपनी गलती का अहसास होता है और भगवान से क्षमा की भीख माँगते हैं। उसी तरह शिवजी भी बाणासुर की रक्षा हेतु भगवान कृष्ण से लड़ाई कर बैठे। अन्त में उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ और भगवान कृष्ण की स्तुति किये। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भगवद अपचार के विषय में विस्तार से समझाए हैं। इसमें सबसे पहली गलती यह है कि इन देवतान्तरों को भगवान श्रीमन्नारायण के समान मानना। अत: थोड़ा भी यह संशय होना कि यह देवतान्तर भगवान श्रीमन्नारायण के समान हैं यह बाधा है। अत: श्रीवैष्णवों को यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ हैं।
  • बाह्य (जो वेद को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते) और कुदृष्टियों (जो वेद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं परन्तु अपने अनुकूल व्याख्या करते हैं) जैसे बौद्ध, शैव, मायावादी, आदि के समझाने और तत्वों से अस्त व्यस्त (भ्रमित) होना बाधा है। बुद्ध के अनुयायी को बौद्ध कहते हैं। जैन भी थोड़े उनके जैसे हैं। यह दोनों पूर्णत: वेद की महानता का तिरस्कार करते हैं। शैव पशुपत ऐसे जाने जाते हैं और शिवजी को श्रेष्ठ मानते हैं। उनके लिये शैव आगम परम है। मायावादी वे हैं जो सम्पूर्ण उत्पत्ति को माया मानते हैं और केवल ब्रह्म ही सत्य है और ऐसे ब्रह्म का कोई नाम, आकार, गुण, आदि नहीं होता है। हमें यह समझना चाहिये कि ये तत्व व्यर्थ हैं और इन तत्वों से दूर रहना चाहिये। तिरुमालै के ७वें पाशुर में श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी कहते हैं “पुलै अरम आगि निन्र पुत्तोडुशमणम एल्लाम कलै अरक्कट मांदर काण्बरो केटपरो ताम” – जब कोई वेद शास्त्र का ज्ञानी हो तो क्या वह दूसरे तर्क शास्त्र जैसे बौद्ध, जैन, आदि का अभ्यास करेगा? अनुवादक टिप्पणी: हालाँकि हम यह देखते हैं कि बौद्ध गौतम बुद्ध से सम्बंधित है (जो इतिहासकारों के अनुसार २५०० वर्ष पुराना है), व्यास मुनि ने स्वयं यह स्थापित किया कि वेद ही बौद्ध, जैन, आदि धर्म से श्रेष्ठ हैं। यह समझाया गया है कि भगवान स्वयं जो बुद्ध का अवतार लेकर असुर जो वेदों में सुशिक्षीत हैं उनके धर्म को नीचा दिखाते हैं। उन्हें भ्रमित करने हेतु उन्हें शून्यवाद सिखाया और उनका शास्त्र में विश्वास पराजित किया। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर के लिये ईडु व्याख्या में विस्तार से समझाते हैं – “कल्ल वेदत्तै कोंणडु पोय…”। इस पाशुर में बुद्ध को रामवर्णवाला सुन्दर और बलवान शरीरवाला, लम्बे कान और हाथों में ग्रन्थ ऐसी कल्पना की गई है। उनका रूप इतना सुन्दर है कि सभी जन वे जो कहेंगे उस पर विश्वास कर लेंगे। वे अहिंसा ही उच्च तत्व ऐसा कहते हैं और लोग आसानी से उनके और उनके तत्व के प्रति प्रेम आदर भाव रखते है। इस तरह उन्होंने असुरों का धोखे से वेदों के प्रति विश्वास कम किया और अन्त में उन्हें मार दिया। यहाँ एक बहुत मुख्य विषय को समझना है। हालाँकि बौद्ध तत्व का उपदेश भी स्वयं भगवान ने ही दिया परन्तु वेदों ने उन तत्वों को स्वीकार नहीं किया (यह समझकर कि वे दूसरों के लिये है)। अगर भगवान भी वेदों के विरुद्ध कुछ कहते हैं तो भी महान सन्त उसे अस्वीकार कर देते हैं। “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार यह दर्शाते है, श्रीसहस्रागीति जो तमिल भाषा में हैं उसकी स्तुति करने हेतु इस विषय को समझाते हैं। वे कहते हैं कि अगर केवल भाषा के आधार पर हमें कोई साहित्य को स्वीकार करना हो तो हमें बौद्ध साहित्य को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वह संस्कृत में है और स्वयं भगवान द्वारा इसका प्रयोग किया गया है। क्योंकि यह वेद के विपरित है इसलिये महान वेदों के तत्व ज्ञानियों ने इसे अस्वीकार किया है।
  • सामान्य शास्त्र (वर्णाश्रम धर्म) पर केन्द्रीत होना और विशेष शास्त्र (वैष्णव धर्म) को नजर अंदाज करना बाधा है। सामान्य शास्त्र अर्थात दैनिक जीवन के लिये सामान्य दिशा निर्देश। इसका भी पालन करना आवश्यक है। परन्तु इससे भी अधिक कुछ और है जिसे विशेष शास्त्र कहते हैं। विशेष धर्मानुसार भगवद/भागवत कैंकर्य ही सर्वोंपरी हैं। यही अन्तिम लक्ष्य हैं। जो भगवान को उपाय और उपेय मानता है, जो भगवान के ही शरण होता है और जिसकी उत्पत्ति केवल भगवान के आनन्द के लिये हुई हो उसे परमैकान्तिक कहते हैं। ऐसे महान जन, सामान्य धर्म का पालन पवित्र हृदय के साथ करते हैं और इस समझ के साथ कि वे भी भगवदाराधन का एक हिस्सा बन सकें जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुपडि में समझाते हैं कि “कर्मम कैंकर्यत्तिल पुगुम”। यह हो सकता है कि विशेष धर्म का पालन करते समय सामान्य धर्म को त्याग करें या उसे बाद में भी कर सकते हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि भगवद / भागवत कैंकर्य करते समय सामान्य धर्म का पालन को बाद में / छोड़ कर करना कोई पाप नहीं है। “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार (और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में) यह दर्शाते हैं कि विल्लीपुत्तुर पगवर (एक तपस्वी) एक बार घाट पर स्नान के लिये गये। कुछ ब्राह्मणों (बिना भागवत धर्म को समझे जो केवल वर्णाश्रम पर केन्द्रीत थे) को देखकर वह घाट से बाहर आकर कहने लगा “आप केवल वर्ण धर्मी हो परन्तु हम तो भगवान के दास हैं। हम किसी से आसानी से नहीं घुल मिल सकते हैं”। इस विषय में जो हमारे पूर्वाचार्यों ने पालन किया है हमें उसका ही पालन करना चाहिये। यद्यपि वर्णाश्रम धर्म का पालन न करना पाप है लेकिन जब हम विशेष धर्म का कैंकर्य कर रहे हो वर्णाश्रम धर्म को बाद में करना / छोड़ना कोई पाप नहीं है।
  • केवल बाह्य स्वरुप, आभूषण और वैष्णव दास नाम होना और भागवतों का अपचार करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इस तत्व को १९९ और २०० सूत्र में समझाते हैं। वह “आरुड पतितन” – उन्नत स्थान से गिरना – इस पद का प्रयोग कर समझाते हैं। एक भागवत होना अर्थात एक उच्च स्थान पर पहुँचना। परन्तु उच्च स्थान पर पहुँचकर भागवत अपचार करना अर्थात उस उच्च स्थान से नीचे गिरना है। अगर हम ऊपर से गिरेंगे तो हमें अधिक चोट लगेगी। इसलिये हमें कभी भी भागवतों से मधुर शब्दों से बात करनी चाहिये।
  • सच्चे आचार्य की शरणागति को स्वीकार न करना बाधा है। हमें एक सच्चे आचार्य के शरण होना चाहिये और वैष्णव बनने हेतु उनसे पञ्च संस्कार ग्रहण करना चाहिये। समाश्रयण स्वीकार करना साधारण संस्कार जो होते है उनसे रुकता नहीं है। जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया है “चंथंगल आयिरमुम अरियक कर्रु वल्लार वैत्ट्टणवर” जिसने श्रीसहस्रगीति का अध्ययन किया हो, जिसने उसके अर्थ को सही समझा हो और उसे अपने दैनिक जीवन में अनुकरण करता हो वही सच्चा श्रीवैष्णव होने योग्य है। अनुवादक टिप्पणी: कई जन पञ्च संस्कार को अन्तिम या लक्ष्य मानते हैं। परन्तु यह वैष्णव यात्रा का प्रारम्भ है। हमें पूर्ण निष्ठा से आचार्य के समर्पित होना, पूरे तत्वों को सीखना और एक श्रीवैष्णव जैसे आचरण करना चाहिये। अगर कोई पञ्च संस्कार ग्रहण कर संसारी जैसे जीवन व्यतित करता है तो पञ्च संस्कार स्वीकार करना व्यर्थ है। यहाँ आचार्य का कार्य सर्व मुख्य हैं। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी आचार्य का वैभव अन्त में समझाते हैं। वे आचार्य के माध्यम से भगवान को पाने का उद्देश इस अंश में बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं।
  • श्रीवैष्णव लक्षण न होना बाधा है। श्रीवैष्णव लक्षणम में दो पहलू हैं – बाह्य और आंतरिक। बाह्य – भुजाओं पर शंख चक्र धारण करना, १२ स्थान पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, तुलसी / कमल की माला और प्राकृतिक बदलाव जैसे रोमांच, नेत्रों में आँसु, आदि, जो निरन्तर भगवद / भागवत अनुभव में लगने से होता है। आंतरीक – पवित्र हृदय होना, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, दूसरों के लिये दर्द, सभी के लिये अच्छा सोचना, आदि। दोनों मुख्य हैं।
  • द्वयाधिकारी (द्वय महा मन्त्र के योग्य पुरुष) न होना बाधा है। नाच्चियार तिरुमोझी में श्रीगोदम्बाजी कहती है “मेय्म्मैप पेरु वार्त्तै विष्णुचित्तर केट्टिरुप्पर” – श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी चरम श्लोक को पूरी तरह समझे हैं (भगवद्गीता के ६६वें श्लोक – सर्व धर्मान …) और उसका पालन करते हैं। जैसे कहा गया है हमें रहस्य त्रय (तिरुमन्त्र, द्वयम, चरम श्लोक) को समझना चाहिये और विश्वास से पालन करना चाहिये। इन तीनों में क्योंकि द्वय महा मन्त्र की स्तुति मन्त्र रत्न ऐसी होती है उस पर अधिक प्रभाव होता है। शरणागति गद्य में श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगनाथ भगवान यह निर्देश देते हैं कि “द्वयम अर्थानुसंधानेन सह यावच्चरिरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” – द्वय महामन्त्र का निरन्तर अर्थानुसन्धान करने से आप श्रीरंगम में आनन्द से रह सकेंगे। द्वय महामन्त्र का अर्थ पूर्णत: श्रीसहस्रागीति में प्रगट किया गया है। आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने २१०वें चूर्णिकै में “द्वयार्थम धीर्ग शरणागति एंरथु सार संग्रहत्तिले” दर्शाया है – यह श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित सार संग्रह में स्थापित हो गया है कि श्रीसहस्रागीति द्वय महामन्त्र का अर्थ समझाता है। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुपड्डी में द्वय प्रकाशन के प्रारम्भ में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी पहले सूत्र में ही श्रीवैष्णव के गुण को विस्तार से समझाते हैं। अगले कुछ सूत्रों में द्वय महामन्त्र को समझाने से पहले ऐसे श्रीवैष्णवों के गुण को सुन्दरता से समझाया गया है। श्री शैलेश स्वामीजी के निर्देशानुसार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीभाष्य का एक बार अध्यन करते हैं और अपना पूर्ण जीवन श्रीसहस्रागीति (जो द्वय महामन्त्र के पवित्र अर्थों से भरा है) के प्रचार में लगा देते हैं। यद्यपि वे वेदान्तम में निपुण थे, वे वेदान्त को आल्वारों के मधुर शब्दों से समझाते थे। श्रीएरुम्बी अप्पा स्वामीजी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या में यह दर्शाते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का अनुसन्धान करते हैं और उनका मन पूर्णत: निरन्तर द्वय महामन्त्र का सुन्दर अर्थानुसन्धान करता है।
  • दिव्य प्रबन्ध में शामिल न होना बाधा है। श्रीवैष्णवों की विशेषतः उभय वेदान्त ऐसी स्तुति होती है। श्रीसहस्रागीति को तमिल वेद कहा गया है और अन्य दिव्य प्रबन्धों को अंग/उपांग कहा गया है। यह सब संस्कृत वेद और स्मृति, इतिहास और पुराण जैसे अच्छे विशेषज्ञ हैं। हमें एक आचार्य से दिव्य प्रबन्ध को अर्थ सहित सीखना चाहिये और उसमें समझाये हुए तत्वों पर चलना चाहिये। यह हमें वैष्णव कहलाने की पूर्ण योग्यता प्रदान करता है। अनुवादक टिप्पणी: इसे श्रीसहस्रागीति के आधार पर पहले ही समझाया गया है “चंथंगल आयिरमुम अरियक कर्रु वल्लार वैट्टणवर”। वार्तामाला में श्रीपेरियावाचन पिल्लै एक सुन्दर बात बताते है। वे कहते हैं “मुलैगलिलैयान युवतियैप्पोले काणुम, उमैयल्लात वैष्णवन अरुलिच्चेयलिले अंवयियाथोलिगै” – यदि एक श्रीवैष्णव गूंगा नहीं है और दिव्य प्रबन्ध, आदि का गान नहीं करता है वह ऐसा ही है जैसे बिना स्तन की एक लड़की। जैसे बिना स्तन की लड़की, लड़की होने की योग्य नहीं है वैसे ही एक श्रीवैष्णव बिना दिव्य प्रबन्ध पठन के एक श्रीवैष्णव होने के योग्य नहीं है।
  • रहस्य ग्रन्थों और उनके मुख्य तत्वों में सही शिक्षा न मिलना बाधा है। तत्व अर्थात चित्त, अचित्त और ईश्वर को अच्छी तरह समझना। रहस्य ग्रन्थ गोपनीय साहित्य हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय मे इन तत्वों को मुखाग्र पढ़ाया / प्रचारित किया जाता था। परन्तु श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी जो स्वयं देव पेरुमाल (श्रीवरदराज भगवान) के अपरावतार हैं इन सभी को १८ ग्रन्थों में लिखकर रखे जिन्हें अष्ठादश रहस्य ग्रन्थ से जाना जाने लगा। अनुवादक टिप्पणी: हमें सत सम्प्रदाय के अंतरंग महत्त्वपूर्ण तत्वों में सही तरीके से शिक्षित होना चाहिये। यहाँ “शिक्षयी” शब्द का प्रयोग हुआ है। शिक्षयी का अर्थ केवल पढ़ना लिखना नहीं हैं। इसका अर्थ “पूर्ण सुधार या कठोर सुधार” – अगर शिष्य कोई तत्व नहीं समझता है तो उस शिष्य को समझे ऐसे आचार्य उस तत्व को समझाना चाहिये और शिष्य को उसका पालन कर उसका लाभ भी लेना चाहिये।
  • शिष्टाचार में विश्वास न रखना और उसका पालन न करना बाधा है। शिष्टाचार का अर्थ अपने बड़ों की आदते। “धर्मग्य समयम प्रमाणम वेदास च” जिसका अर्थ “महान जन जो शास्त्र पढ़े हैं उनकी आदतों का पालन करना आधिकारिक है, वेद भी आधिकारिक है” – यह एक स्थापित वाक्य है। तिरुप्पावै के २६वें पाशुर में श्रीआण्डाल कहती हैं “मेलैयार शेय्वनहल्” – वह जो पूर्वजों द्वारा अभ्यास किया गया है। वह दूसरे पाशुर में भी कहती हैं कि “चेय्यातन चेय्योम” – हम वह नहीं करेंगे जो हमारे पूर्वजों ने नहीं किया है। हमें अपने पूर्वजों के अनुष्ठान में पूर्ण विश्वास होना चाहिये।  अनुवादक टिप्पणी: यहाँ एक मुख्य तत्व को समझना चाहिये। श्रीएरुम्बी अप्पा अपने “विलक्ष्ण मोक्ष अधिकारी निर्णय” में इस मुख्य तत्व को स्थापित करते हैं। वें दर्शाते हैं कि “पूर्वज” का अर्थ “पूर्वाचार्य” है और हमें अपने पूर्वाचार्यों के पत (मार्ग) पर चलना चाहिये। कभी कभी हम देखते हैं कि कुछ गलत चलन (प्रथायें) जैसे देवतान्तर, व्रत करना, सांसारिक सुख के लिये पूजा करना या दुखों का निवारण, आदि में श्रीवैष्णवों के परिवार भी उलझे हैं। एक बार सही आचार्य से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात ऐसे विषम दस्तूर को उसी क्षण छोड़ देना चाहिये क्योंकि यह हमारे परिवार में कई परिस्थितियों में आगयी होगी जैसे अज्ञान। हम हर बार यह नहीं कह सकते कि हमारे पूर्वज इसका पालन करते थे।
  • ज्ञान, भक्ति और वैराग्य न होना बाधा है। यहाँ ज्ञान का अर्थ है अर्थ पञ्चक का ज्ञान। हमें परमात्मा और जीवात्मा के स्वभाव और उनके मध्य में सम्बन्ध को समझना चाहिये अर्थात स्वामी–दास भाव, उपाय, पुरुषार्थ और बाधाएं जो हमें हमारे लक्ष्य को पाने में बाधक हैं। भक्ति का अर्थ भगवान के प्रति दृढ़ निष्ठा। वैराग्य का अर्थ त्याग। हमें देवतान्तर के प्रति लगाव से बचना चाहिये। और हमें विषयान्तर से भी दूर रहना चाहिये। विषयान्तर का अर्थ जो भगवद भागवत विषय से बाहर हो। स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान द्वारा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्तुति में जो तनियन प्रस्तुत किया है “धीभक्त्यादि गुणार्णवम” वह महत्त्वपूर्ण है। यहाँ धी का अर्थ ज्ञान, भक्ति का अर्थ पूजा है और आदि वैराग्य को दर्शाता है। श्रीरंगनाथ भगवान कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ऐसे सुन्दर अद्भुत गुणों के समुद्र हैं।
  • एक अच्छे शिक्षित श्रीवैष्णव के चरणों में शरण न लेना बाधा है। हमें एक आचार्य के शरण होना चाहिये जो शिष्य को गोपनीय बातों का भी निर्देश देंगे। भागवतों को भी अच्छा आचार्य माना गया है। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इनके शरण होने से हमारा उद्धार होगा। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी अपने अन्तिम दिनों में ६ उपदेश देते हैं – हमें श्रीभाष्य सीखना और सिखाना चाहिये। अगर यह न हो सके तो दिव्य प्रबन्ध को सीखना और सिखाना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो दिव्य देशों में कैंकर्य करना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो तिरुनारायणपुरम में एक तिरुमाली बनाकरा वहीं पर निवास करना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो निरन्तर द्वय महामन्त्र का अर्थानुसन्धान करना चाहिये। और अगर यह भी न हो सके तो हमें एक श्रीवैष्णव की शरण हो जाना चाहिये और उनकी पूर्णत: देख रेख करना चाहिये। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यदि कोई किसी श्रीवैष्णव की शरण में जाता है तो वह पूर्व में दर्शाये गये पाँच उपदेशों में अपने आप ही स्थित हो जाता है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसी विषय को मुमुक्षुप्पड़ी के ११६वें सूत्र में श्रीवैष्णव लक्षणम को समझाते समय कहते है। वे इस सूत्र में १० विषय पहचानते हैं। ६ विषय है “इप्पडि इरुक्कुम श्रीवैष्णवर्गल एर्ट्रमरिण्तु उगंतिरुक्कैयुम” – श्रीवैष्णव जिनके पास ऐसे सुन्दर अद्भुत गुण है उनके स्तुति को समझना और उनके प्रति बड़ी भक्ति और आदर रखना। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं इस गुण को प्राप्त करना बड़ा कठिन है। यहाँ दसवें विषय में यह ज़ोर देकर कहा गया है कि हमें ऐसे श्रीवैष्णवों की संगत में रहना चाहिये जो शान्त चित्त व शांति से परिपूर्ण हो। इस तरह हम हमेशा श्रीवैष्णवों के संगत का महत्त्व समझ सकते हैं और उनका मार्ग दर्शन पा सकें।
  • जो श्रीरामानुज सम्प्रदाय से वैर करें उनसे मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कृपाहीन जनों से मित्रता करने से बचना चाहिये। ऐसी मित्रता हमारे मन पर तीव्र धक्का पहूंचाता है और हमें नीचे गिरा देता है। सभी सांसारिक पदार्थ में ऐसी शक्ति होती है – जब हम सांसारिक कार्य की ओर बढ़ते है तो हम आध्यात्मिक वस्तु से दूर हो जाते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-32.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३१

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३०

६५) समर्पण विरोधी – अर्पण करने में बाधाएं

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी

समर्पण का अर्थ देना या अर्पण करना है। साधारणतया बड़े व्यक्ति जैसे भगवान, आचार्य, आदि को अर्पण करने को “समर्पण” कहते हैं। वैदिक रीतियों में सामान्यतया यह देखा गया है कि जब भी हम किसी श्रीवैष्णव को कुछ अर्पण करते हैं तो हम कहते हैं “श्रीवैष्णवेभ्यो सम्प्रदात्ते – न मम”। इसका अर्थ हैं “यह श्रीवैष्णवों को दे दिया गया है और अब यह मेरा नहीं है”। इस भाग में आत्म समर्पण पर विस्तार और स्पष्टता से चर्चा की गयी है। आत्म समर्पण का अर्थ भगवान के चरण कमलों में स्वयं को अर्पण करना। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “एनधावी तन्तोलिन्तेन… इनि मिल्वतेनबथुण्डे” – मैंने स्वयं को अर्पण कर दिया है … कुछ वापस नहीं आयेगा और स्वयं को भगवान को अर्पण कर देते हैं। आल्वारों के पथ पर चलते हुए श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के श्लोक में कहते हैं “तदयं तव पादपद्मयोः अहमध्यैव मया समर्पित:” और स्वयं को भगवान के चरण कमलों में अर्पण कर देते हैं। अनुवादक टिप्पणी: कण्णिनुण्शिरुत्ताम्बु के ५वें पाशुर में श्रीमधुरकवि स्वामीजी कहते हैं “नम्बिनेन् पिरर्नन्पोरुल तन्नैयुम” – मैं स्वयं से जुड़ा था (नन्पोरुल – आत्मा) जो भगवान की संपत्ति है (इसलिये इसे “पिरार नन्पोरुल” कहते हैं जहाँ पिरार भगवान को संबोधित करता है)I जीवात्मा भगवान की संपत्ति है। भगवान स्वामी हैं और जीवात्मा संपत्ति। अगर यह स्थिति है तो कैसे जीवात्मा भगवान को अर्पण कर सकता है। हमारे पूर्वाचार्य इस कार्य को बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि यह इस प्रकार हुआ कि रात को भगवान के आभूषण चुराना और सबेरे वहीं आभूषण लेकर भगवान के निकट बड़े उत्साह के साथ जाकर भगवान को अर्पण करना जैसे कि हम स्वयं की कोई वस्तु दे रहे हैं और उनकी नहीं। फिर आल्वार और आचार्य भी ऐसा करते हैं। इसे हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़ी सुन्दरता से समझाया है। श्रीसहस्रगीति में आल्वार पहले स्वयं को भगवान को अर्पण करते हैं परन्तु तत्पश्चात अपनी गलती स्वीकार कर भगवान से कहते हैं “एनधावियार? यान आर? थनध नी कोण्डाक्किनैये” – “मैं कौन हूँ? मैं पहले ही आपका हूँ”। आप अपनी स्वयं की संपत्ति अब स्वीकार कर रहे हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि अगर समर्पण नहीं हैं तो वह सर्व मुक्ति प्रसंगम की ओर ले जाता है (भगवान को सभी को परमपदधाम लाना पड़ेगा क्योंकि किसी को शरणागति करने की कोई आवश्यकता नहीं है)। परन्तु अगर हम आत्म समर्पण करते हैं तो इसका अर्थ भगवान की संपत्ति भगवान को ही अर्पण करना हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक भाव समझाते हैं कि – संसार को देखते हुए प्रपन्न कभी कभी बहुत भय महसूस करते हैं इसलिये वों स्वयं को भगवान को अर्पण करते हुए यह ज़ोर देते हैं कि वे भगवान के शरण हो गये हैं। इसे भ्रम परिस्थिति की तरह समझाते हैं। परन्तु भगवान को देखते ही उनका भय दूर हो जाता हैं – क्योंकि उनको यह स्मरण करवाया जाता है कि वों भगवान कि संपत्ति है और वों (भगवान) अपने सभी विषयों कि रक्षा करने में सक्षम हैं और इसलिये उन्हें यह अहसास होता है भगवान की संपत्ति भगवान को अर्पण कर उन्होंने एक बहुत बड़ी भूल की है और अपने आत्म समर्पण के लिये प्रायश्चित करता है। जब तक इस संसार में हैं तो यह निरन्तर होता रहता हैं – क्योंकि वें संसार और भगवान दोनों ही देखते हैं। यही तत्व श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के ५२वें श्लोक में समझाकर अर्पण करते है परन्तु फिर ५३वें श्लोक में वे भगवान से पूछते हैं “अथवा किम नु समर्पयामि” – आ! मैं कौन हूँ? मैं आपको क्या अर्पण कर रहा हूँ? मैं आपको कुछ भी अर्पण करने में स्वतन्त्र नहीं हूँ आप तो पहले ही मेरे स्वामी हैं। श्रीपेरियावाचन पिल्लै अपने व्याख्या में इस श्लोक को समझाते हैं। अत: हम यह देख सकते हैं कि जीवात्मा के लिये आत्म समर्पण सही नहीं हैं फिर यह भय/अज्ञानता के कारण करते हैं और एक बार जीवात्मा के स्वभाव को भगवान की संपत्ति है यह जानने के पश्चात प्रायश्चित करता है।

  • अहंकार (देह को आत्मा मानना) और ममकार (भगवान की संपत्ति को स्वयं का मानना) जो जीवात्मा को अपनी संपत्ति भगवान और भागवतों को अर्पण करने से रोकता है, बाधा हैं। स्वयं को स्वतन्त्र मानना बहुत बड़ा अपचार है। सच्ची बात है कि “सबकुछ/सभीजन भगवान के आधीन हैं”। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं “याने एन्नै अरियगिलाते याने एन्तनते एन्रिरुन्तेन” – मैं पहले यह नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ और मैं यह सोचता था कि मैं स्वतन्त्र हूँ – जीवात्मा के प्रति सच्चा ज्ञान पाने की यह स्थिति है। इसी पाशुर में आगे कहते हैं “याने नी एन्नुडैमैयुं निये” – में आपकी संपत्ति हूँ और मेरा शरीर भी आप ही की संपत्ति हैं – जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात की यह स्थिति है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी का सभी को सबसे पहला उपदेश यह है “नीर नुमतु एनरीवै वेर मुथल मायत्तु” – हमको हमसे सम्पूर्णता से अहंकार और ममकार को मिटाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आध्यात्मिक यात्रा में सबसे पहली शिक्षा है आत्मा देह से अलग है यह समझना है। हम नित्य आत्मा हैं और हमारे इस शरीर से भिन्न हैं। अधिकतर जन आत्मा और शरीर में भेद नहीं करते हैं और केवल शरीर यात्रा को ही सब कुछ मान लेते है। दूसरी बात हमें यह समझना चाहिये कि भगवान श्रेष्ठ स्वतन्त्र हैं और वे सभी के मालिक हैं। इस पूरे सृष्टी में हमारा कुछ भी नहीं हैं। अगर इन दोनों तत्त्वों में सही तरह से समझ गये हो तो हम स्वाभाविकता से भगवान जो सभी के स्वामी हैं उनके आनन्द के लिये कार्य करेंगे। अहंकार और ममकार यह दोनों हमारे आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं। भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में अर्जुन को भगवान के प्राप्ति का सच्चा ज्ञान को स्पष्टता से समझाते हैं। २.१२ में वे आत्मा देह से भिन्न हैं इससे प्रारम्भ करते हैं और आगे कहते है आत्मा कई हैं और हर आत्मा दूसरे से भिन्न हैं और भगवान ही सर्वश्रेष्ठ हैं। आचार्य से शरणागति प्राप्त करने के पश्चात भी इन दो बाधाओं से बहुत बार हम घबरा जायेंगे। हमें यह निरंतर स्मरण रखना चाहिये कि हम जीवात्मा हैं देह से अलग और भगवान पर निर्भर। इस निरंतर द्रढ़ता के साथ हम स्वयं को अच्छे स्वभाव में रख सकते हैं।
  • स्वयं का समझकर कुछ पकड़ना, यह जानने के बाद भी कि हम भगवान के दास हैं। यह बाधा है। एक बार भगवान के सेवक हूँ ऐसा सच्चे स्वभाव का ज्ञान हो जाये तो स्वाभाविक रूप से जो हमारा है वह भगवान का ही है। इसलिये बिना हिचकिचाहट के उसी क्षण सब कुछ भगवान को अर्पण कर देना चाहिये।
  • यह सोचकर कि हम मालिक हैं और भगवान को अर्पण कर रहे हैं बाधा है। भगवान ही सब के मालिक हैं यह सत्य है। स्वयं को स्वामी मानना मन की विशुद्ध स्थिति है और यह मानना कि सबकुछ भगवान का है मन की स्पष्ट स्थिति है।
  • यह न जानना कि हमारी पिछली अज्ञान स्थिति जिसमें भगवान कि सम्पत्ति चुराई है (आत्मा और देह को स्वयं के उपभोग के लिए उपयोग करना) यह वैसा ही है जैसे भगवान को कुछ अर्पण कर यह सोचना कि वह मेरी ही सम्पत्ति है, यह बाधा है। स्वयं को भगवान को अर्पण करना वैसा ही है जैसे उसी मन्दिर से रात में बहुमूल्य आभूषण को चुराना और दूसरे दिन वहीं आभूषण भगवान को अर्पण करना। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्रानुसार सबसे बड़ा पाप/चोरी स्वयं को स्वतंत्र समझना और उसके अनुसार कार्य करना – इसे महाभारत में इस तरह समझाया गया हैं “किम तेन न कृतं पापं चोरेण आत्मापहारिणा” – आत्मा जो भगवान की संपत्ति है उसे स्वयं का मानता है वह सब प्रकार के पाप/चोरी किये समान है। अर्पण करने से पूर्व या अर्पण करने के पश्चात अगर यह विचार आए कि आत्मा स्वयं की है तो यह गलत है।
  • स्वयं को यह सोचकर अर्पण नहीं करना कि “यह तो भगवान की संपत्ति है तो मैं कैसे उसे स्वयं को अर्पण करूँ?” हालाँकि हमारे पूर्वाचार्यों ने स्वयं को अर्पण किया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने आत्म समर्पण किया था। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी कहते “अहं अध्यैव मया समर्पित:”। हालाकि आत्मा भगवान की है फिर भी हमें उसे भगवान को अर्पण करना हीं पड़ेगा। परन्तु अगले श्लोक में वे स्वयं इसपर यह कहकर पश्चाताप करते हैं “अथवा किम णु समर्पयामि”। यहाँ वे कहते हैं कि अगर एक बार उन्हें यह अहसास हो जाता है कि मेरे स्वामी भगवान हीं हैं तो मैं कैसे स्वयं को उन्हें अर्पण करूँ? श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रागीति में पहिले आत्म समर्पण कर फिर प्रायश्चित करते हैं “एनधावी तंतोलिन्तेन …इनि मिल्वतेनबथुण्डे” और कहते हैं “एनधावियार? यान आर? तंध नी कोण्डाक्किनैये”। इस संदर्भ में व्याख्यान के चक्रवर्ती श्रीपेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी स्तोत्र रत्न की व्याख्या में समझाते हैं कि “संसार भीतियाल समरप्पीक्कैयुं, स्वरुप याधात्म ज्ञानत्ताल अनुसयिक्कैयुं. इरण्डुम् यावनमोक्षं अनुवर्त्तिक्कक कडवतु” – संसार से डर कर भगवान को स्वयं को अर्पण करना और फिर स्वयं के सच्चे स्वभाव को जानकार पश्चाताप करना, यह क्रम संसार से मुक्त होंगे तब तक चलता रहेगा – इससे बच नहीं सकते हैं। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि प्रपत्ती को उपाय मानना और सिद्धोपाय निष्ठा प्रकरण में ऐसे तत्त्वों में अभाव देखना। सूत्र १४६ में वों समझाते हैं कि “प्रपत्ती को उपाय” मानना भी गलत है क्योंकि भगवान ही उपाय हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी गद्यत्रय में कहते हैं जहाँ श्रीरामानुज स्वामीजी पहिले प्रपत्ती करते हैं और फिर भगवान से अपनी गलती की क्षमा माँगते हैं – तो हम अपने सभी पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों से यह देख सकते हैं कि स्वयं को पहिले भगवान को अर्पण करना और फिर उसके लिये पश्चाताप करना चाहिये।
  • यह न समझना की भगवान स्वयं की सम्पत्ति को स्वीकार कर रहे हैं बाधा हैं। क्योंकि भगवान सभी के स्वामी हैं वह केवल अपनी सम्पत्ति को स्वीकार कर रहे हैं – इसे सही नहीं समझना बाधा है।
  • स्वयं या अन्यों से “यह मेरा हैं” उसे अर्पण करना बाधा हैं। जैसे पहले कहा गया है भगवान ही सभी के स्वामी हैं। यह सोचना कि मैं मालिक हूँ और भगवान को अर्पण कर रहा हूँ, यह सही नहीं है। फिर भी हमें स्वयं को भगवान को प्रेम से अर्पण करना चाहिये। भगवान भगवद्गीता में कहते हैं जो भी मुझे प्रेम से अर्पण करता है मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये जो भी हम अर्पण करते हैं उसे प्रेम से अर्पण करना चाहिये न कि घमण्ड से की मैं आपको कुछ अर्पण कर रहा हूँ। इस तरह के दोषपूर्ण स्वामीत्व की कोई भी वस्तु जीवात्मा के स्वभाव के अनुकूल न हो और ऐसी वस्तुओं को यहाँ दण्डित किया जाता है।
  • यह मानना कि भगवान पूरी तरह संतुष्ट और आत्मनिर्भर नहीं हैं और यह सोचकर उन्हें अर्पण करना कि उन्हें हमसे कुछ चाहिये यह बाधा है। भगवान को अवाप्त समस्त कामन (वह जिनकी इच्छाएं पहले ही पूरी हो चुकी हैं) कहते हैं। फिर भी उनके भक्त प्रेम से उन्हें जो भी कुछ अर्पण करते हैं वे उसे खुशी से स्वीकार करते हैं।
  • यह मानना कि हम कुछ अर्पण कर रहे हैं वे भगवान के पास नहीं है, बाधा है। हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि “उसके पास यह वस्तु नहीं है। मैं यह इसलिये ताकि भगवान इसके मालिक बन जायें”।
  • यह न सोचना कि सभी में वह हीं है और वह केवल हमारी सेवा को पूर्ण करने हेतु हमारे अर्पण को स्वीकार करता है और हमें ऊपर उठाता है। यह बाधा है। हमें यह न सोचना चाहिये कि “देहिमे – ददामि ते” (मैं आपको कुछ प्रदान करता हूँ और बदले में आप भी कुछ मुझे प्रदान कीजिए) – यह मन की परिस्थिती संभ्रम हैं। जब लोग कष्ट में होते हैं तब वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि “कृपया मुझे इस दुख से छुटकारा प्रदान करें मैं बदले में यह काम कर दूँगा” – इसे सामान्यता संस्कृत में प्रार्थना कहते हैं। परन्तु भगवान की एक ही इच्छा है कि हम उनकी शरणागति स्वीकार करें और उनके प्रति पवित्र भक्ति रखें। फिर भी हमें प्रेम से अपनी सामर्थ्यानुसार उन्हें अर्पण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस तरह की सांसारिक प्रार्थना जीवात्मा के सांसारिक कष्ट के निवारण के लिये सही नहीं है। हमें भगवान और भागवतों के पास नित्य कैंकर्य के लिये प्रार्थना करनी चाहिये क्योंकि जीवात्मा के स्वभाव के लिये यही सही है। अपने आध्यात्मिक प्रगति के लिये कोई भी भौतिक उद्देश की प्रार्थना हमें कठिनाई की ओर लेजाती है।
  • भगवान से हमने लाभ प्राप्त किया इसलिये उन्हें कुछ अर्पण करना। अनुवादक टिप्पणी: भगवान को भक्ति कृषक कहते हैं। वह जीवात्मा में भक्ति का बीज लगाते है, कर्म के लिये स्थान उपलब्ध करवाते हैं, मार्गदर्शक के रूप में शास्त्र प्रदान करते हैं, आचार्य से मिलाते है, भागवत सम्बन्ध प्रदान करते है, बाधाओं से छुड़ाते है, आदि और जीवात्मा का पोषण करते है और अन्त में जीवात्मा को परमपदधाम में लाते हैं। जीवात्मा इस कृपा को कभी भी लौटा नहीं सकता है। इसलिये जीवात्मा केवल आश्चर्य कर सकता है कि कैसे वह भगवान के उपकार को लौटा सकता है।
  • भगवान द्वारा किये गये हमारे प्रति उपकार को कैसे चुकाना है, इससे घबराना नहीं चाहिए। कण्णिनुण्शिशिरुत्ताम्बु के १०वें पाशुर में श्रीमधुरकवि स्वामीजी कहते हैं “मुयलहिन्नेन उन्तन्मोयकलर्क्कन्बैये” – मैं आपके चरण कमलों में प्रेम से सेवा करना चाहता हूँ परन्तु आपके उपकारों के अनुरूप कुछ भी कर नहीं पा रहा हूँ – इसलिये श्रीमधुरकवि स्वामीजी बहुत चिन्तित हैं और वे श्रीशठकोप स्वामीजी से प्रार्थना के बदले में कुछ भी नहीं कर पा रहे है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के प्रति अपनी दिव्य भावना इस तरह प्रगट करते है “एनधावी उल कलंत पेरूनल्लुतविक कैम्मारु” – आप बेड़े प्रेम से मुझसे घुल मिल गये परन्तु मैं कैसे आपके उपकार का बदला चुका पाऊंगा।
  • आत्म समर्पण करते समय यह मानना कि हम स्वयं आत्मा के स्वामी हैं, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम इस पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। आत्मा भगवान की सम्पत्ति है और भगवान अपनी सम्पत्ति स्वीकार कर रहे हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-31.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

६४) सख्य विरोधी – मित्रता में बाधाएं

सभी जनों के प्रति श्रीकुरेश स्वामीजी की दयाभाव के कारण उनकी बहुत प्रशंसा है

सख्य का अर्थ मित्रता / परिचित है। मित्रता अर्थात एक दूसरे के प्रति हितकारी भावना। शत्रुता न दिखाना मित्रता की ओर पहला कदम है। सात्विक जनों (भागवत – भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त) की ओर मित्रता और आदर दोनों होना चाहिये और वह जो पवित्र ज्ञान से भरा हो, नित्य दिनचर्या में यथार्थ ज्ञान का प्रयोग करना है। हमें यह समझना चाहिये कि सच्ची मित्रता पवित्र है। भगवान श्रीराम का श्रीगुहा के साथ मित्रता को अध्यात्मिक समझना चाहिये। उनकी सुग्रीव महाराज के साथ मित्रता भी ऐसी ही है। अनुवादक टिप्पणी: दो प्रकार की मित्रता है। एक शारीरिक वेदिका पर आधारित – हम उनसे मित्रता करते हैं जो हमारे शरीर का पोषण करते है अथवा हमारे शरीर पर अनुग्रह करते है। उदाहरण के लिये जब हम गिरते हैं तो कोई हमें उठाता है और हम उससे मित्रता करते हैं। या हमारे साथ पढ़नेवाले के साथ हम मित्रता करते हैं। फिर अध्यात्मिक वेदिका पर भी मित्रता होती है – अर्थात यह समझना कि हम सभी भगवान और भागवतों के दास हैं और ऐसे भागवतों के साथ मित्रता करना जो हमारे मन को समझते हैं। इन भागवतों को आत्म बन्धु (जो आत्मा से सम्बंधित हैं) कहते हैं। सच्चे भागवत निरन्तर भगवद विषय की चर्चा करते हैं, भगवान/ आल्वार/ आचार्य, आदि के सुन्दर अनुभव को सभी के साथ बाँटते हैं। ऐसे भागवतों के साथ मित्रता प्रशंसनीय है क्यूंकि इस लीलाविभूति में हमारे अन्त श्वास तक वे ही हमारे साथ रहेंगे। सांसारिक जनों के साथ मित्रता का त्याग करना चाहिये क्योंकि वे हमें इस संसार में खींचते हैं और सांसारिक कार्य में लगाते हैं।

  • नीच सांसारिक जनों से मिलना बाधा है। यह वे हैं जो निरन्तर भोजन, मकान, कपड़ा, आदि के पीछे भागते हैं। वे हमेशा सांसारिक कार्य में लगे रहते हैं और ऐसे जनों में घुलना मिलना अर्थात समय नष्ट करना है और यह हमें हमारे अध्यात्मिक जीवन में उन्नत्ती करने से रोकते हैं।
  • महान भागवतों से मित्रता करना और उन्हें अपने बराबर मानना बाधा हैं। हमें कभी भी अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर नहीं समझना चाहिये – उन्हें हमेशा उच्च स्थान देना चाहिये। फिर भी हमें उनसे मित्रता रखनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र के २२२ से २२५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भागवतों से कैसे व्यवहार करें यह समझाते हैं। हमें भागवतों को पने आचार्य के समान, यहाँ तक की स्वयं और भगवान से भी उच्च मानना चाहिये। भागवतों के प्रति आदर न होना अपचार माना गया है।
  • भागवतों से मित्रता रखना और उनमें दोष देखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे पूर्ण विस्तार से समझाते हैं। हमें किसी में (संसारियों में) भी दोष नहीं देखना चाहिये। हमें हमेशा स्वयं में ही सभी गलतियों को देखना चाहिये। तिरुप्पावै के १५वें पाशुर में आण्डाल अम्माजी कहती हैं “नाने दान आयिडुक” (सभी दोष मेरे ही रहने दो)। श्रीरामायण में जब श्रीभरतजी अयोध्या से लौटते हैं और उन्हें जब ज्ञात होता है कि भगवान राम वन के लिये चले गये हैं और श्रीदशरथजी परमपद को प्राप्त हुए है तो वह पहले कैकयी के पास जाते हैं। वह पूरी घटना के लिये दशरथजी, कैकयी, मंथरा, आदि को दोष देते हैं परन्तु अन्त में कहते हैं “यह मेरे स्वयं के दोष हैं जो मुझे भगवान से बिछड़ने की परिस्थिति में लाये हैं”। ऐसी स्थिति से उभरना बड़ा कठिन है परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने हमारे लिये यह राह बनायी है और हम ऐसे भाव की चाह कर सकते हैं।
  • यह मानना की सबकुछ/सभी जन भगवान की वस्तु / सेवक हैं। सभी को सभी के साथ मित्रतापूर्वक रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही इस नित्यविभूति और लीलाविभूति के स्वामी हैं। और हर एक जीवात्मा किसी न किसी तरीके से भगवान की ही सेवा कर रही हैं। अगर एक आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव हो जाता है तो वह भगवान की सेवा अपने प्राकृतिक स्थान पर रहकर सीधे कर सकता है। अगर आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव नहीं होता है तो वह भगवान की सेवा अनुचित ढंग से करता है (जैसे देवतान्तर, माता-पिता, मित्र, सम्बन्धी, स्वयं के शरीर, आदि)। यह समझकर एक श्रीवैष्णव को प्राकृतिक दया दिखानी चाहिये और अन्य को अध्यात्मिक विषय में मदद करनी चाहिये।
  • अन्य जीवात्मा की ओर बैर की भावना रखना, जो भगवान के ही शेषी हैं, बाधा है। यह देखना चाहिये कि सबकुछ/ सभी में भगवान अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं – ऐसे व्यक्ति जिनकी ऐसी दृष्टी हो वे महान ज्ञानी हैं। अत: सभी को सभी से मित्रता रखनी चाहिये और किसी से दुश्मनी नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सबकुछ / सभी में अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं। चित और अचित दोनों में भगवान ही प्रवेश करते हैं – इसे भगवान का सर्व व्यापकत्वम ऐसा समझाया गया है। शरीर का अर्थ देह है और शरीरि का अर्थ हैं जो शरीर में है। शास्त्र कहता हैं “यस्य आत्मा शरीरं, यस्य पृथ्वी शरीरं, …” (आत्मा उसी का शरीर है, धरती उसी का शरीर है, आदि)। जैसे जीवात्मा एक शरीर में है वैसे ही भगवान उस जीवात्मा में हैं। अत: यह समझना कि सबकुछ /सभी का शरीर भगवान का है हमें दूसरों से बैर नहीं करना चाहिये। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं “सुकृतं सर्व भूतानाम्” (मैं सभी का मित्र हूँ)। हमारे आचार्य भी सभी की ओर बहुत अनुकम्पा दिखाते थे ओर भगवान के पवित्र सन्देश का प्रचार करते थे।
  • श्रीवैष्णवों के साथ मित्रता कर उनको दुख या धोखा देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ जन बाहर से अच्छे मित्र दिखते हैं परन्तु भीतर से दूसरों के प्रति उनमें घृणा भावना होती है। और ऐसी भावना चेतना या अवचेतना दोनों स्थितियों में बाहर आ जाती हैं। ऐसे आचरण की यहाँ निन्दा की गयी है।
  • कुछ चाह कर किसी से मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई किसी से कोई चाह करके मित्रता करता है तो ऐसे आचरण को यहाँ नीचे देखा गया है। मित्रता प्रेम के आधार पर होनी चाहिये जिसमें किसी से कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिये।
  • दूसरों की गलतियों को भी उनके अच्छे गुण के समान मानना चाहिए, ऐसा न करना बाधा है। गहरे मित्रों के संग उनके दोष को भी अच्छे गुण माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों तत्वों (चित – जीवात्मा, अचित – वस्तु, ईश्वर – भगवान) को तत्वत्रय में विस्तार से समझाते हैं। ईश्वर प्रकरणम भाग में सूत्र १५० तक भगवान के कई सुन्दर गुणों को समझाया गया हैं विशेषकर १५१वें सूत्र में वात्सल्य गुण जहाँ भगवान अपनी पत्नी श्रीमहालक्ष्मी और नित्यसूरियों से भी अधिक अपने नवीन भक्तों के प्रति गहरी मित्रता और लगाव दिखाते हैं। इस भाग में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जैसे एक गाय अपने बछड़े को अपने सींग से धकेलती है परन्तु अपने अभी जन्मे बछड़े से प्रेम करती है भगवान वैसे ही अपने शरण में आये हुए से बड़ा प्रेम करते हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ज्ञानसारम के २५वें पाशुर में समझाते हैं “एट्रे कन्रिन् उडम्बिन वलुवन्रो कादलिप्पदु अन्रदनै ईन्रुगन्द आ” – जब एक गाय बछड़े को जन्म देती है तो उस बछड़े के शरीर पर लगी गंदगी को अपनी जीभ से साफ करती है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी एक और विशेष उदाहरण देते हैं – वे कहते हैं एक पुरुष प्रेमी को उसकी प्रेमीका का पसीना पसन्द आता है उसी तरह भगवान हमारे उन दोषों पर ध्यान न देकर हमसे प्रेम करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से कई उदाहरण के साथ समझाते हैं। उसी तरह हमारे आचार्य अन्य श्रीवैष्णवों में कुछ दोष हैं तो भी उनके गुणों की प्रशंसा किये हैं और उन्हें सकारात्मकता से लिये हैं।
  • जो हमारे प्रति प्रेम भाव रखते हैं उन्हें प्रेम दिखाना और जो हमारे प्रति बैर रखते हैं उनके प्रति बैर रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को सभी के साथ स्नेह के साथ रहना चाहिये न कि उनके साथ पक्षपात करना चाहिये।
  • जो अपने आचार्य के साथ दुश्मनी रखता हो उससे सम्बन्ध रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि हमें सभी के प्रति करुणामय होना चाहिये परन्तु हमें भगवान और आचार्य से बैर रखने वालों से सावधान रहना चाहिये। आचार्य ही वे हैं जो जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध को प्रज्वलित करते हैं। जीवात्मा और परमात्मा दोनों पर कृपा दृष्टी रखने के कारण उनकी बड़ी स्तुति होती हैं। जीवात्मा को उसके सच्चे स्वभाव को स्मरण कराते हैं कि वह भगवान का सेवक हैं। परमात्मा अपनी सम्पत्ति (जीवात्मा) को अपने निकट लाते हैं, जीवात्मा को सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में इसे समझाते हैं।
  • आचार्य के शिष्यों / भक्तों के साथ स्नेह सम्बन्ध न रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४५१वें सूत्र में समझाते हैं कि जिनमें आचार्य निष्ठा हैं उनको दूसरे आचार्य निष्ठावालों से हितकारी सम्बन्ध प्राप्त होता हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि उनके ऐसे सम्बन्ध से हमारी आचार्य निष्ठा में वृद्धी होगी अत: हमें ऐसे अधिकारी से ही मित्रता करनी चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

६३) दास्य विरोधी – दासत्व में बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी – दास्य भाव के आदर्श उदाहरण। श्रीरामानुज स्वामीजी जो स्वयं आदि शेष अवतार है, वे दासत्व के श्रेष्ठ उदहारण है. श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति उत्तम सेवक के प्रत्यक्ष उदाहरण है।

दास्य का अर्थ पूर्णत: नियंत्रण में रहना – अर्थात स्वामी की सेवा में रहना। यहाँ यह समझाया गया है कि हम सभी जन भगवान श्रीमन्नारायण के सेवक हैं जो सभी के स्वामी हैं। “दास भूता: स्वतस्सर्वे ही आत्मन: परमात्मन:” यह शास्त्र में से एक मुख्य और प्रामाणिक प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा परमात्मा के स्वाभाविक सेवक हैं जो सर्वस्वामी हैं – यहाँ “ही” का अर्थ प्रसिद्ध है। हमारी भगवान के प्रति सेवा निर्हेतुक और जीवात्मा और परमात्मा के मध्य नित्य सम्बन्ध पर आधारित है। इस संसार में दूसरों के प्रति हमारी सेवा औपाधिक है (एक विशेष कारण पर आधारित है जैसे हमारा कर्म हमें एक निश्चित जन्म/ सम्बन्ध की ओर ले जाता है और हम इस सम्बन्ध के कारण सभी की सेवा करते हैं)। भगवान के प्रति हमारी सेवा दो प्रकार की हैं “स्वरूप पर्युक्त दास्य” और “गुण कृत्य दास्य”। “स्वरूप पर्युक्त दास्य” का अर्थ है जीवात्मा की भगवान के प्रति सेवा जो परमात्मा के साथ नित्य सम्बन्ध के कारण है, क्योंकि केवल भगवान स्वामी हैं और जीवात्मा स्वाभाविक सेवक है, जीवात्मा भगवान की सेवा करता है। “गुण कृत्य दास्य” का अर्थ जीवात्मा का भगवान के कई शुभ गुणों के कारण उनकी सेवा करना (सामान्यता जब भी किसी के पास दया, सौन्दर्य, सुन्दरता, ज्ञान, धन, बल, आदि गुण हो तो उनकी सेवा करना सब चाहेंगे)। हम में दोनों तरह के दास्य विद्यमान हैं। क्योंकि भगवान हमारे नित्य स्वामी हैं हम उनकी सेवा करते हैं और क्योंकि उनके पास कई शुभ गुण हैं हम उनकी सेवा करते हैं। फिर भी स्वरूप पर्युक्त दास्य होना अधिक प्रधान और मुख्य है, क्योंकि यह जीवात्मा के लिये सामान्य है। अनुवादक टिप्पणी: इस दास्य तत्व को हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़े विस्तार से समझाया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के ईडु महा व्याख्यान के पाशुर में बड़े विस्तार से समझाया है। इस पाशुर में श्रीपरांकुश नायकी की सहेली उनका ध्यान एक क्षण के लिये भगवान से दूर करने के लिये कहती हैं कि “भगवान कृष्ण बहुत बुरे, निर्दयी, आदि है” और देखती है कि कैसे उसे भगवान से बिछड़ने से दुख होता है। परंतु यह सुनते ही श्रीपरांकुश नायकी (श्रीशठकोप स्वामीजी स्त्री भाव में) अपनी सखी से कहती है अगर वो ऐसे भी हैं तो भी वह उन्हीं से प्रेम करेंगी क्योंकि यह उनका स्वभाव है। इस व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी स्वरूप पर्युक्त दास्य का तत्व विस्तार से समझाते हैं। श्रीरामायण से एक उदाहरण देते हैं कि जब माता सीता माता अनुसुया (श्रीगौतम महर्षि कि धर्म पत्नी) से मिलती हैं तो उनसे कहती हैं कि अगर भगवान श्रीराम इतने महान न होते तो भी वह उनसे इतना और इसी तरह प्रेम करती – क्योंकि यह उनके लिये स्वाभाविक है। श्रीपरकाल स्वामीजी ने भी पाशुर में इसे सुन्दरता से कहा है “वेम्बिन पुलु वेम्बनरी उण्णातु” – एक कीट जिसका जन्म नीम के फल में हुआ है वह बाहर जाकर गन्ने के रस के लिये तलाश नहीं करेगा – यद्यपि नीम कड़वा और गन्ने का रस मीठा है। वह कीट उसके और नीम के मध्य के सम्बन्ध के कारण नीम के फल को ही पायेगा। यही ही तत्व श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०८ से ११४वें सूत्र में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने प्रवचनों में इन सूत्रों की व्याख्या से इतनी सुन्दरता से अपने पूर्वाचार्यों के तत्व को बताया है। इस प्रस्तावना के साथ हम इस भाग में आगे बढ़ते हैं।

  • स्वयं को स्वतन्त्र मानना और उस पर अभिमान करना बाधा है। यह बहुत बड़ी बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि हम पूर्णत: भगवान पर हीं निर्भर हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ८३ और ८४वें सूत्र में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से तिरुमन्त्र में “नम:” विषय द्वारा समझाते हैं। वे कहते हैं “नम:” (न मम – मेरे लिये नहीं) यह दिखाता है कि कोई भी स्वयं के लिये नहीं है परन्तु भगवान के प्रगट होने के लिये है। वो यह भी पहचानता है कि जब भी कोई स्वयं को दूसरे देवता का सेवक समझता है तो भगवान बड़ी आसानी से उसे अपनी प्रधानता, शुभ गुण, आदि बताते हैं और जीवात्मा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। परन्तु जब कोई पूर्णत: अपने को स्वतन्त्र मानता हैं तो वह अपना मुलभुत शिक्षण शेषत्व को सिद्ध करने के लिये खो देता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “त्वमे” (तुम मेरे हो) और “अहमे” (मैं मेरा हूँ) क्रम को बड़ी सुन्दरता से दर्शाते हैं। जब भगवान कहते हैं “तुम मेरे हो” और जीवात्मा कहता है “मैं मेरा हूँ” तब भगवान इस स्थिति में घबरा जाते हैं, अचरज करते हैं कि इस जीवात्मा को ऊपर कैसे उठाऊँ।
  • भगवान श्रीमन्नारायण और भागवतों को छोड़ अन्य किसी का सेवक होना मूल्यहीन है, यह बाधा है। यहाँ पर विशेषकर देवतान्तरों के भजनो पर ध्यान केन्द्रीत है – श्रीवैष्णव को कभी भी अन्य देवताओं की सेवा में नहीं लगना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारा सच्चा मूल्य तो भगवान और भागवतों की सेवा पर ही आधारीत है। श्री गोदाम्बाजी नाच्चियार तिरुमोलि में यह समझाती हैं “वानिडै वालुम अव्वानवरक्कु मरैयवर वेल्वियिल वगुत्त अवि कानिडैत्तिरिवदोर नरि पुगुन्दु कडप्पदुम मोप्पदुम शेय्वदोप्प ऊनिडै आलि शङ्गुत्तमरक्केन्रु उन्नित्तेलुन्द एन तड मुलैगल मानिडवरक्केन्रु पेच्चुप्पडिल वालगिल्लेन कण्डाय मन्मदने” – जब ब्राह्मण यज्ञ करते हैं तो वे देवताओं के लिये भेंट तैयार करते हैं और स्वयं रख लेते हैं – और अगर कोई जंगली लोमड़ी उस भेंट को छूले तो वह मूल्यहीन हो जाता है। उसी तरह मेरे द्वारा प्रगट की हुई भक्ति विशेषकर भगवान श्रीमन्नारायण के लिये ही प्राप्य है – यदि यह चर्चा होती है कि मेरी भक्ति दूसरे के लिये है तो उसी क्षण मैं अपना प्राण दे दूँगा। इसी तरह का विषय श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा मुमुक्षुप्पडि के ६२वें सूत्र में समझाया गया है “देवर्गलुक्कु शेष्मान पुरोडासत्तै नाय्क्कु इडुमापोले, ईश्वर शेष्मान आत्म वस्तुवै संसारीगलुक्कु शेष्माक्कुगै” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि जिसप्रकार जो भेंट पूजनीय देवताओं के लिये है अंततः कुत्ते को दी जाती है (जिसे सामान्यतया देखना और छूना भी नहीं चाहिये), उसीप्रकार जीवात्मा (जो भगवान का हैं) वह संसारियों की सेवा में लगा है (जो देवतान्तर, आदि हैं – जो भी इस संसार में हैं और अपने सच्चे स्वभाव को न जानते हुये है संसार के सुख भोगने में लगा है ऐसे संसारी) । अत: हमारे पूर्वाचार्यों ने हमें सचेत किया है कि हमें देवतान्तर से सम्बंधित कार्य को नहीं करना चाहिये जिसका हमारे स्वरूप पर विपरीत प्रभाव पड़े।
  • अपने वर्णानुसार स्वयं को किसी देवतान्तर का सेवक मानना बाधा है। सभी जीवात्मा केवल भगवान श्रीमन्नारायण के ही सेवक हैं। सभी वर्णों में कुछ भी भेद भाव नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: यह एक मनोहर पहलू है। वार्ता माला के ४५०वें प्रवेश में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदाशरथी स्वामीजी को श्रीवैष्णव यज्ञोपवित से साथ और श्रीवैष्णव बिना यज्ञोपवित के साथ को समझाते हैं। वें दोनों श्रीवैष्णव वर्गों में १० अन्तर बताते हैं। खासकर अन्तर का केन्द्र उन यज्ञोपवित धारण श्रीवैष्णव के बारें में हैं जिन्हें वेद की शिक्षा लेनी पडती है और नित्य/नैमितिक कर्म करना पड़ता है जिसमें देवतान्तर सम्बन्ध (इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) और सात्ताध्य शामिल है (जो यज्ञोपवित धारण नहीं करते हैं)। श्रीवैष्णवों का वेदों से प्रत्यक्ष कोई प्रयोजन नहीं हैं और वे पूर्णत: दिव्यप्रबन्ध और उसके व्याख्यानों, कैसे भगवद, भागवत और आचार्य का कैंकर्य कर सकें ऐसे विषयों पर केन्द्रित होना चाहिए है। जब हम इसे देखते हैं तब हम यह सोचते हैं कि जब हम नित्य/नैमितिक कर्म कर रहे हैं तो हम देवतान्तर की पूजा कर रहे हैं। परन्तु इस संभ्रम को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत सुन्दरता से समझाते हैं। एक व्यक्ति श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के पास आकर पूछता है “आप देवतान्तर (जैसे इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) आदि की पूजा अपने नित्यकर्मों में करते हो तब फिर आप उनकी पूजा उनके मन्दिरों में क्यों नहीं करते हो?”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उसी क्षण दीप्तमान उत्तर देते हैं कि “आप यज्ञ में अग्नि कि पूजा करते हैं परन्तु धरती में आच्छादित करते समय क्यों अग्नि से दूर रहते हो? उसी तरह क्यों कि शास्त्र कहता हैं नित्यकर्मों को भगवद आराधना मानकर करना चाहिये यह समझकर कि भगवान सभी देवता के लिये भी अन्तरयामी हैं। वही शास्त्र यह भी कहता है कि मन्दिर में हमें भगवान को छोड़ अन्य देवता की पूजा नहीं करनी चाहिये और इसलिये हम उनके मन्दिर भी नहीं जाते हैं। और जब इन देवताओं को मन्दिर में स्थापित करते हैं तो वे रजो गुण उत्पन्न करते हैं और अपने आप को श्रेष्ठ विचार हैं और क्योंकि हम सत्वगुणी हैं हम देवता जो रजोगुणी हैं उनकी पूजा नहीं करते हैं”। इसलिये श्रीवैष्णव (यज्ञोपवित वाले) जब नित्य/नैमितिक कर्म करते हैं तब यह नहीं मानना चाहिये कि वे देवतान्तर कि सेवा कर रहे हैं – श्रीवैष्णव के लिये ये सभी कार्य भगवद कैंकर्य का एक अंग है जो भगवान कि ही आज्ञा है।
  • केवल जन्म देने के कारण हमें अपने माता पिता का सेवक मानना बाधा है। हमारा जन्म एक विशेष परिवार में विशेष माता पिता के यहाँ होना हमारे कर्म पर आधारित है और शास्त्र के आधार पर उनके प्रति हमारी सेवा सीमित है। परन्तु भगवान सभी के लिये माता और पिता हैं। इसलिये भगवान के प्रति सेवा अति श्रेष्ठ है। अनुवादक टिप्पणी: अगर माता पिता श्रीवैष्णव हैं तो हमें स्पष्ट रूप से उनकी सेवा अच्छी तरह से करनी चाहिये जैसे अन्य श्रीवैष्णवों की करते हैं जो पहिले समझाया जा चुका है।
  • केवल विवाह सम्बन्ध मात्र से पति की सेवक होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण परम पुरुष हैं। भगवान और जीवात्मा के मध्य एक मुख्य सम्बन्ध है भार्तृ – भार्या (पति – रक्षक और पत्नी रक्षिका)। यद्यपि एक स्त्री अपने कर्म के कारण एक पुरुष से विवाह करती है परन्तु सभी जीवात्मा के सच्चे पति तो भगवान ही हैं। यद्यपि एक स्त्री को धर्म शास्त्रानुसार अपने पति की ही सेवा करनी हैं – फिर भी भगवान के संग नित्य सम्बन्ध के मूलभूत को समझना और निरन्तर स्मरण रखना चाहिये। जैसे पहिले समझाया गया है कि अगर पति श्रीवैष्णव है तो उससे बड़े आदर और सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिये। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य हैं उनको दो पत्नियाँ थी। वो एक बार अपनी पत्नियों से अलग अलग एक प्रश्न पूछते हैं। पहले वों अपनी पहली पत्नी से पूछते हैं “तुम मेरे बारें में क्या सोचती हो?”। पहली पत्नी उत्तर देती है “मैं आपको स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान के समान और मेरे आचार्य ऐसे देखती हूँ”। वह बहुत खुश होकर उसे तिरुवाराधन और उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर वही प्रश्न वें अपनी दूसरी पत्नी से पूछने पर वो कहती है “मैं आपको मेरा पती मानती हूँ”। वो उसे अपनी पहली पत्नी को प्रसाद बनाने में सहायता करने को कहते हैं। परन्तु जब उनकी पत्नी के मासिक काल के समय वो प्रसाद नहीं बना सकती तब वें अपनी दूसरी पत्नी से प्रसाद बनाने को कहते हैं परन्तु वह अपने प्रिय शिष्य को उस प्रसाद को पहिले छूने को कहकर फिर पाते हैं। अत: हम समझ सकते हैं कि सच्चे श्रीवैष्णव का उनकी पत्नी द्वारा आदर होना चाहिये।
  • सांसारिक लाभ के लिये सांसारिक जनों का सेवक बनना बाधा है। हमें कैंकर्य का नित्य लक्ष्य रखना चाहिये न कि अस्थाई लाभ पाना। अनुवादक टिप्पणी: एक बार एक राजा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की कीर्ति सुनकर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को उससे मिलकर आर्थिक मदद लेने को कहते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं अगर भगवान श्रीरंगनाथ के अभय हस्त भी अपनी दिशा बदल दे तब भी वे किसी के पास मदद के लिये नहीं जायेंगे। हमारे पूर्वाचार्यों की ऐसी निष्ठा थी। किसी भी परिस्थिती में वे पूर्णत: भगवान पर ही निर्भर रहते थे और कभी भी किसी के लिये भी सांसारिक जनों के पास नहीं जाते थे।
  • तुच्छ सांसारिक सुख की ओर लगाव रखना और अपना मान गँवाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यता श्रीवैष्णवों की राजकुमार जैसी स्तुति होती है – अति आनंदमय श्रीमन्नारायण के सुन्दर और धनी सन्तान। किसी को उस अवस्था से नीचे नहीं आना चाहिये और सांसारिक जनों कि सेवा कर के अपना मान न गवाँये।
  • यह न जानना बाधा है कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण की ही सेवक हैं, जो सभी जीवों के नित्य संबंधी है, जो सभी जीवात्मा के नित्य रक्षक है और सभी जीवात्मा के नित्य स्वामी हैं। जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के नव विध सम्बन्ध में कहा गया है कि भगवान ही ऐसे पूर्ण व्यक्ति हैं जो पूर्णत: कई रीति से जीवात्मा के सम्बन्धी हैं। जीवात्मा की पूर्ण सेवा ही तिरुमन्त्र का मुख्य विषय हैं जो सभी वेदों व वेदांतों का तत्व है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वस्वामी, लोकभर्ता (पती या सबका रक्षक), जगन्नाथ (संसार के स्वामी), आदि कहकर बुलाते हैं। अत: हमें इस सत्य को मानना चाहिये कि हम ऐसे महान भगवान के सेवक हैं और उसी तरह कार्य करना चाहिये।
  • अपने आप को पूरी तरह भगवान की ओर जो कि स्वामी है, उपलब्ध नहीं करना बाधा है। किसी की सेवा की अन्तिम स्थिति को पारतंत्रय कहते हैं – भगवान ही जीवात्मा को नियंत्रित करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण में श्रीभरतजी पूर्णत: भगवान राम को समर्पित रहते हैं। भगवान श्रीराम की जो भी इच्छा है भरतजी उसका पालन कर उस इच्छा को पूर्ण करते थे। सभी जीवात्मा को अपना सच्चा स्वभाव स्थापित करने के लिये ऐसे ही होना चाहिये।
  • पूर्णत: भगवान का होना आर्थात भागवतों का सेवक होना। यह न जानना बाधा है। तत शेषत्व (भगवान की ओर सेवा) तदिय शेषत्व (भागवतों कि ओर सेवा) की ओर ले जाता है। विशेषकर सभी को अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये – यह सभी जीवात्मा के स्वभाव के लिये मुख्य और योग्य है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा की सामान्य स्थिति भगवद दास्यत्व है और पूरी तरह भगवान कि सेवा में रहना। इससे भी मुख्य – स्वरूप यातात्मयम (सच्चे स्वभाव का तत्व) – भागवत दास्य (भागवतों के सेवक होना)। पेरिया तिरुमोली में श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं भगवान को ही तिरुमन्त्र का तत्व इस तरह घोषित करते हैं “निन तिरुवेट्टेळुत्तुम् कट्रु नान उर्ट्रथुम उन्नडियार्क्कडिमै कण्णपुरत्तुरेयम्माने” (हे तिरुक्कण्णपुरम के प्रिय भगवान तिरुमन्त्र का तत्व सीखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं आपके दासों का दास हूँ)। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नान्मुगन तिरुवन्दादि के पाशुर में यह दर्शाते हैं “एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मटवरै शारत्ति इरूप्पार तवम” (भागवतों कि ओर भक्ति स्वयं भगवान से अधीक है)। एत्तियिरुप्पवर – भगवत शेष भूतर – वह जो भगवान के शरण हो गया हो। ऐसे भक्तों की शरण में जो हुए हो उनकी स्थिति और अधिक महान है। श्रीरामायण में श्रीलक्ष्मणजी और श्रीभरतजी पूर्णत: श्रीरामजी के शरण थे। श्रीशत्रुघ्नजी पूर्णत: श्रीभरतजी के शरण थे। श्रीरामायण में कहा गया है कि “चत्रुघ्नो नित्यचत्रुघ्न:” (वह जिसने नित्य बाधाओं को पाराजित किया है)। हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं कि “श्रीशत्रुघ्नजी भगवान राम के सुन्दर और दिव्य गुणों का पूरी तरह त्याग कर श्रीभरतजी की सेवा किये”। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अवनदियार सिरुमामनिसराय एन्नैयाण्दार” – सिरुमामनिसर – वो जो पूर्णत: भगवान के शरण हुए हैं जो छोटे हैं पर बड़े ज्ञानी हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसे भक्तों को अपना स्वामी मानते हैं, यह घोषणा किये हैं। जब ऐसे भागवात हैं तो कोई कैसे उन्हे निर्लक्ष्य कर भगवान के श्रीचरण कमलों की सेवा कर सकता है? अत: जीवात्मा के लिये भागवत कैंकर्य भगवद कैंकर्य से भी अधिक मुख्य है।
  • यह न जानना कि अपने स्वामी की रुचि और अरुचि ही हमारी रुचि और अरुचि होना चाहिये। इस विषय में श्रीवैष्णवों को अपने बड़ों की राह पर चलना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कैंकर्य के पहलू को समझाते हैं। २७५वें सूत्र में वे कहते हैं भगवद कैंकर्य हमें शास्त्र के जरिये सिखना चाहिये और आचार्य कैंकर्य शास्त्र और स्वयं आचार्य के जरिये सिखना चाहिये। फिर वें २७६वें सूत्र में समझाते हैं कि कैंकर्य में दो पहलू हैं। २७७वें सूत्र में वे क्या हितकारी (भगवान/आचार्य की पसन्द) हैं और क्या अहितकारी (भगवान/आचार्य की ना पसन्द) हैं कहते हैं। २७८वें सूत्र में समझाते हैं कि हितकारी / अहितकारी पहलू वर्णाश्रम धर्म और आत्मा स्वरूप के आधार पर हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस २७८वें सूत्र पर विस्तार से व्याख्या देते हैं। वे इस सूत्र के लिये ३ अलग व्याख्या देते हैं परन्तु अन्त में स्वयं कहते हैं पहली व्याख्या ही योग्य हैं। पहिले व्याख्या का तत्व हैं:
    • वर्णाश्रम में हितकारी उतने ही (नित्य / नैमित्तिक) कर्म करना जो शिष्य व बच्चों को वैधिक धर्म पालन करने के लिये आवश्यक हो और दूसरों के प्रति दया भाव से – यह अन्य जीवों के कल्याण पर केन्द्रित है (दया भाव)
    • नित्य / नैमित्तिक कर्मों को इस तरह से निभाना कि ऐसा न करने से पाप लगेगा, यह वर्णाश्रम के प्रतिकूल है – यह स्वयं को पापों से बचाने पर केन्द्रित है (स्वार्थ भाव)।
    • आत्म स्वरूप में हितकारी कर्म- स्वयं को भगवान के पूर्ण आधीन रखना।
    • आत्म स्वरूप में प्रतिकूल कर्म – ऐसे कर्म जिसमें भगवान को भागी नहीं बनाना जो हमारे दास्य स्वभाव को प्रभावित करता है (भगवान हमारे स्वामी है और हम उनके दास हैं) । उदाहरण के लिये एक पिता (जो उच्च है) प्रेमवश और खेल-खेल में अपने स्वयं के पुत्र को उठाता है और उसके पैरों को अपनी छाती से लगाता है। परन्तु उस पुत्र को यह कहकर अपने पैरों को नहीं हटाना चाहिये कि “पिताजी आप मुझसे उच्च है मैं कैसे अपने चरणों से आपके मस्तक को छु सकता हूँ” बजाय इसके वह अपने पिता को इसका पूर्ण आनन्द लेने दे।
  • अपने स्वयं के दासत्व के डर से भगवान को पूर्ण आनंदित न होने देना बाधा है। एक दास का धर्म है कि व अपने स्वामी को खुश रखें। इसके लिये उसे अपना सम्मान ही क्यों न खोना पड़े। हमें अपने स्वामी की खुशियों को लाने के लिये हमेशा उनकी सेवा के लिये तैयार रहना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के १७७वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि एक शेष्दभूत (दास) को अपने शेषी (स्वामी) की खुशी को लाना स्वरूप (सच्चाधर्म) और प्राप्यम (लक्ष्य) है। इसलिये जीवात्मा को हमेशा इसके लिये कार्य रत रहना चाहिये।
  • भगवान जब जीवात्मा के शेषत्व को नष्ट करते हैं तब घबराना बाधा है। जब स्वयं भगवान नीचे आकर जीवात्मा की प्रेम से सेवा करते हैं तब जीवात्मा को भगवान को रोकना नहीं चाहिये – उन्हें सेवा करने देना चाहिये – ऐसे न करना हानिकारक हैं। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के ९२वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसी तत्व को समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। भगवान जो श्रेष्ठ हैं आल्वार श्रीशठकोप स्वामीजी को ऊपर उठाने के लिये उनके हृदय में प्रवेश करते हैं। परन्तु आल्वार के प्रति प्रेम के कारण भगवान उनके सेवक बन जाते हैं और उनकी सेवा करते हैं। उस समय आल्वार यह नहीं कहते हैं कि “मैं साधारण जीवात्मा हूँ भगवान मेरी सेवा क्यों कर रहे हैं? मैं उन्हें ऐसे करने से रोकूँगा क्योंकि कि मुझे शास्त्र तत्व का ज्ञान है कि जीवात्मा सेवक है और भगवान स्वामी”। इससे विपरीत आल्वार ने भगवान को उनकी इच्छा पूर्ण करने दी यह जानते हुए कि भगवान को क्या चाहिये और यही मुख्य पहलू है।
  • सेवा में न रमकर (शामील होकर), बाधाओं में जुड़े रहना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी:  शास्त्र में कहा गया हैं “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” – भगवान कि सेवा करना जीवात्मा का स्वभाव है, अगर यह सेवा स्पष्ट नहीं है तो वह जीवात्मा स्वयं अपनी पहचान खो देता है। सभी को बाधाओं से बचना चाहिये – जैसे कोई अपने शरीर पर आनेवाली बाधाओं से बचता है वैसे ही हमें आत्मा को जो हानी पहुँचाता है उससे बचना चाहिये।
  • आचार्य की ओर हमारी सेवा अस्थाई / नियमबद्ध मानना बाधा है। आचार्य को भगवान के अपरावतार माना गया है – इसलिये आचार्य-शिष्य के मध्य के सम्बन्ध को भी नित्य मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। श्रीवचन भूषण के ४२७ सूत्र में इस तत्व को सुन्दरता से श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं। भगवान के निकट सीधे जाना अर्थात “उनके हाथ पकड़ना और सहायता माँगना” और भगवान के निकट आचार्य के जरिये जाना अर्थात “उनके चरण कमलों को पकड़ना और उनकी सहायता माँगना” – स्पष्ट रूप से दूसरा विकल्प ही सही है। इस समझ से आचार्य के साथ सम्बन्ध भी नित्य माना जाता है।
  • यह न जानना कि हम भगवान के नित्य सेवक हैं, और भगवान नित्य स्वामी हैं, बाधा है। भगवान और जीवात्मा के मध्य स्वामी-दास्य भाव स्थायी है। यह समय, स्थान और परिस्थिति के सीमा से परे है।
  • देवतान्तर और पितृ (पूर्वज) की सेवा करना बाधा है। क्योंकि हम भगवान के नित्य सेवक हैं देवतान्तर, पितृ, आदि की सेवा का यहाँ त्याग किया गया है। यहाँ पितृ तर्पण, आदि (नैमितिक कर्म) जो शास्त्र से नियत किया गया है उसका त्याग नहीं करना है – क्योंकि इसे हम पहिले ही समझ चुके हैं कि हम आज्ञा कैंकर्य की सीमा में हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीशठकोप स्वामीजी कि स्तुति “कृष्णा तृष्णा तत्वम” ऐसी कि गयी है – भगवान के प्रति भक्ति का मूर्त रूप

६१) स्नेह विरोधी – लगाव / मित्रता में बाधाएं

स्नेह का अर्थ मित्रता, स्नेह, लगाव, प्रेम आदि है। स्नेह कि परिपक्व स्थिति भक्ति है। छोटे जनों का श्रेष्ठ जनों के प्रति स्नेह भी भक्ति कहलाता है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिये हनुमानजी (तिरुवड़ी – जीवात्मा) का श्रीराम भगवान (पेरुमाल – परमात्मा) के प्रति प्रेम को भक्ति कहते है। और भगवान श्रीराम का हनुमानजी के प्रति प्रेम को स्नेह कहते हैं। इस भाग में हर बात के लिये दो पहलू पर चर्चा कि गयी है – पहला पक्ष है किससे बचना चाहिये और अगला पहलू किसका पालन करना चाहिए। यहाँ सारतत्व यह है कि हम प्रथम पक्ष को सामान्यत: होते देखते है परन्तु इस संसार में दूसरा पहलू बहुत कम देखने को मिलता है। यह जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही नहीं है। हमें पहिले में कम या लगाव होना ही नहीं चाहिये और दूसरे में अधीक लगाव होना चाहिये। यह समझना बहुत आसान है।

  • प्राकृत बन्धुओं (सांसारिक सम्बन्धी – वह सम्बन्धी जो हमारे शारीरिक जन्म से जुड़े है) से लगाव रखना और आत्म बंधुओं (वह जो भगवद, भागवत और आचार्य के जरिये हमसे जुड़े हैं) से लगाव नहीं रखना बाधा है।
  • सांसारिक पहलू से लगाव रखना और भगवद विषय से लगाव नहीं रखना बाधा हैं। हमें भगवद विषय में लगाव को आगे बढ़ना चाहिये और सांसारिक पक्षों में लगाव का त्याग करना चाहिये। श्रीमहद्योगी स्वामीजी मून्राम तिरुवन्दादि के १४वें पाशुर में समझाते है कि “मार्पाल मनम शुलिप्प मङगैयर तोल कैविट्टु” जब हम भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति लगाव को बढ़ाएंगे तो औरतों (और अन्य सांसारिक खुशियों) के प्रति हमारा लगाव अपने आप समाप्त हो जायेगा।
  • अपने शारीरिक सुख कि ओर लगाव रखना और आचार्य के शारीरिक सुख कि ओर लगाव न रखना। उपदेश रत्नमाला के ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयिरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” आचार्य का अर्थ वो जो शिष्य (आत्मा और आत्मा से जुड़े पक्षों जैसे ज्ञान, भक्ति आदि) का पालन पोषण करता है और शिष्य का अर्थ वो जो आचार्य के पवित्र शरीर का पोषण करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्व को उपदेश रत्नमाला के पाशुरों से बड़ी सरल और सुन्दर रूप से प्रस्तुत करते हैं। श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य और शिष्य अपने कार्य को बदल नहीं सकते है। अर्थात आचार्य को केवल शिष्य के आत्म यात्रा (आत्मिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये और शिष्य को केवल आचार्य के देह यात्रा (शारीरिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये। और अगर आचार्य शिष्य के देह कि जरूरतों के बारें में विचार करें और शिष्य आचार्य के आत्मिक जरूरतों के विषय में विचार करें तो गड़बड़ी हो जायेगी – क्योंकि यह उनके लिये करने में असामान्य हैं।
  • जो हमें सांसारिक सुख प्रदान करते हैं उन जनों से लगाव रखना और आचार्य जो हमें तिरुमन्त्र के तत्व को प्रदान करते हैं उनसे लगाव न रखना बाधा हैं। सांसारिक सुख अर्थात खाना, वस्त्र, घर आदि। तिरुमन्त्र अर्थात अष्टाक्षर मन्त्र और उसकी स्तुति पेरिया तिरुमन्त्र ऐसे की जाती है क्यूंकि उसमें सभी महत्वपूर्ण ज्ञान समाहित है।
  • जहाँ हम निवास करते हैं उस स्थान में लगाव रखना और जहाँ आचार्य निवास करते हैं उस स्थान में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। सभी को उस स्थान या शहर पर अधीक लगाव होना चाहिये जहाँ हमारे आचार्य निवास करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम स्मरण कर सकते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला के ६४वें पाशुर में कहते हैं “तन्नारियुनुक्कुत्तानडिमै शेयवदु अवन इन्नाडुतन्निलिरुक्कुम नाल, अन्नेररिन्दुमदिलाशैयिन्नि आचार्यनैप्पिरिन्दिरुप्पारार् ? मनमे पेशु” –जब तक हमारे आचार्य इस संसार में है तब तक हम उनकी सेवा कर सकते है (वह सेवा उनके लिये सच में लाभ दायक रहेगी)। यह जानने के पश्चात कौन अपने आचार्य से अलग रहना चाहेगा?
  • देह यात्रा में लगाव रखना और आत्म यात्रा में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। श्रीवैष्णवों को शारीरिक जरूरतों का पालन पोषण करना जरूरी नहीं है। उनको आत्मिक पक्ष पर केन्द्रीत होना चाहिये जैसे भगवद, भागवत और आचार्य कि सेवा करना।
  • पत्नी, बच्चे आदि जो भगवान और भागवतों से विरोधी/ शत्रुता कि भावना रखते हैं उनके साथ स्नेह रखना बाधा हैं। ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग उतना ही सम्बन्ध रखना चाहिये जितना शास्त्र अनुमती देता है (जैसे खाना, वस्त्र, घर आदि) और किसी को भी ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग प्रेम सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। उस पत्नी, बच्चों आदि से प्रेम सम्बन्ध रखने में कोई गलत नहीं हैं जो भगवद भागवत विषय कि ओर हितकारी हो क्योंकि वें भागवत होने के योग्य है।
  • अर्चावतार भगवान और मुख्य मन्दिर/दिव्यदेश जैसे कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति) आदि कि ओर लगाव न रखना बाधा हैं। अर्चावतार कि स्तुति तिरुनेडुन्दाण्डगम में श्रीपरकाल स्वामीजी ने “पिन्नानार वणन्गुम सोदि” ऐसे की है –जो कोई भी विभव अवतारों (जैसे राम, कृष्ण आदि) का दर्शन करने में असफल रहे है उनके लिए अर्चावतार ही दीप्तिमान चमकती रोशनी है। हमें यह पूरी तरह समझ लेना चाहिये कि अर्चावतार भगवान ही हमारे पूर्ण रक्षक हैं। हमारे आल्वार और आचार्यों को दिव्य देश और इन दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार भगवान से बहुत लगाव था। इन दिव्य देशों में भी हमें कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति), पेरुमाल कोइल (काञ्चीपुरम) और तिरुनारायणपुरम (मेलकोटे) क्षेत्रों में विशेष स्तुति होने के कारण अधीक लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीरंगम जैसे दिव्यदेश कि अधीक बढाई या स्तुति होती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि अन्य दिव्यदेश नीचे है। उदाहरण के लिये हमारे सम्प्रदाय के लिये श्रीरंगम मुख्य स्थान है और हमारे सभी आल्वार और आचार्य को इस दिव्यदेश के प्रति अधीक लगाव था। आल्वार और आचार्य के इस अधीक लगाव के कारण श्रीरंगम को अन्य दिव्यदेश से अधीक महत्ता (विशिष्टता) है।
  • मन्त्र रत्न को छोड़ अन्य मन्त्र कि ओर लगाव रखना बाधा हैं। मन्त्र रत्न अर्थात द्वय महा मन्त्र। हम इसे रहस्य त्रय से भी जोड़ सकते है। इन्हें अपने आचार्य से सिखा जा सकता है। यह रहस्य त्रय जीवात्मा के स्वभाव को समझाता है और जीवात्मा को मोक्ष के पथ पर ले जाता है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वदिनचर्या में श्रीएरुम्बी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या को लिखते है। ९वें श्लोक में वें इस तरह दर्शाते हैं: मन्त्र रत्न अनुसन्धान सन्तत स्फुरिताधरम तदर्थ तत्व निध्यान सन्नद्ध पुलकोग्दमम् – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महा मन्त्र (जिसे मन्त्र रत्न भी कहते है – सभी मंत्रों में रत्न) का जाप करते रहते है। द्वयम का निरन्तर अर्थानुसंधान करने के कारण उनका शरीर एक स्पष्ट दिव्य पवित्र प्रतिक्रिया देता है जो ओर कुछ नहीं श्रीसहस्रगीति है। नायनार ने यह बताया है कि श्रीसहस्रगीति दिव्य ग्रंथ द्वय महामन्त्र का ही पूर्ण स्पष्टीकरण करता है। यह आचार्य हृदय के चूर्णिका २१० में दर्शाया गया है। अत: हमें मन्त्र रत्न कि ओर ही पूर्ण लगाव होना चाहिये। आजकल हम यह देखते हैं कि श्रीवैष्णव जन अन्य सम्प्रदाय के जनों के प्रभाव में आकर अन्य मन्त्र का जाप करते है। इससे बचना चाहिये और हमारे ऐसे विषयों में पूर्वाचार्यों के आर्दशों का पालन करना चाहिये।
  • अन्य मन्त्र देनेवाले कि ओर लगाव रखना और जिन्होंने तिरुमन्त्र दिया हैं उनकी ओर लगाव न रखना बाधा है। जो पेरिया तिरुमन्त्र (अष्टाक्षर) सिखाते हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। यहाँ अन्य मन्त्र अर्थात वह मन्त्र जिनका प्रयोग उपासना में होता हैं। हमारे आचार्य कभी भी मन्त्र सांसारिक लाभ के लिये कहने को नहीं कहे हैं। इसीलिए जिन्होंने हमें पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया हैं उन आचार्य कि ओर हमें हमेशा पूर्ण लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी सबसे पहिले पाशुर में श्रीमन्नारायण भगवान का नाम बतलाते है “एन पेरुक्कन्नलत्तु ओण पोरुलीरिल वण पुगल नारणन थीण कलल सेरे” आपको भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों में आत्मसमर्पण करना हीं होगा – श्रीमन्नारायण भगवान सभी में अन्तरयामि रूप से विराजमान है, वह जिसके पास पवित्र गुण है और वह जो कभी भी अपने भक्तों कि रक्षा करने से नहीं चुकते है। ईडु महा व्याख्या अवतारिका (प्रस्तावना) में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी यह समझाते हैं कि यह पाशुर तिरुमन्त्र पर केन्द्रीत है जो भजन द्वारा भगवान कि ओर ले जाता है। वह यह भी समझाते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य इस मन्त्र के पवित्र अर्थों पर केन्द्रीत थे और अपने शिष्यों को भी यहीं सिखाते थे परन्तु अन्य लोग इस मन्त्र का प्रयोग जप, याग, होम आदि के लिये और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये करते थे। इससे यह स्थापित होता हैं कि हमें ऐसे जप, होम आदि अगर तिरुमन्त्र का उपयोग करके भी किया जा रहा हो तो भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखना है। और श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जिसने पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया है (जो रहस्यत्रय का एक अंग है) वों हीं हमारे आचार्य है।

६२) भक्ति विरोधी भक्ति में बाधाएं

भक्ति अर्थात अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति/ तत्व से स्नेह, प्रेम। एक आस्तिक की भगवान के प्रति पूजा को भक्ति कहते है। इसे काधल ऐसा समझाते है (तमिल में प्रेम)। शास्त्र में मोक्ष प्राप्ति के लिये भक्ति को उपाय समझाया गया है – इसे साधना भक्ति कहते है। भगवान के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात, निरन्तर उनका प्रेम से ध्यान करने को भक्ति योग कहते है जिसे मोक्ष साधन (मोक्ष प्राप्त करने का उपाय) ऐसा समझाते हैं। केवल योग्य जीव ही भक्ति योग को कर सकते है। (अनुवादक टिप्पणी: साधन भक्ति केवल तीन वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य) ही कर सकते है, क्योंकि कर्म योग और ज्ञान योग उसके अंग है जिसे केवल वें ही निभा सकते हैं)।

आल्वारों कि भक्ति (जो सबसे उच्च भक्त है) स्वयं भगवान की कृपा से है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के प्रारम्भ में ही कहते है “मयर्वर मदि नलम अरुलिनन” –भगवान मुझ पर दोषरहित ज्ञान/पूजा का आशिर्वाद प्रदान किये है – यह भगवान की निर्हेतुक कृपा का परिणाम है। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य मंगल श्लोक में भगवान से उनकी इसी तरह के भक्ति कि अपेक्षा से प्रार्थना करते है “भवतु मा परस्मिन शेमुषी भक्ति रूपा”। क्योंकि भगवान अपने भक्तों को ऐसी भक्ति का आशिर्वाद प्रदान करते है, तो वह भक्ति प्राप्य (अन्तिम लक्ष्य – कैंकर्य) का एक अंग हो जाता है। इसलिये इसे साध्य भक्ति (अधिकारी के पूजा के आधार पर भक्ति जो स्वयं भगवान प्रदान करते है) और यह साध्य भक्ति साधन भक्ति से भिन्न है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार बड़ी सुन्दरता से कई प्रकार की भक्ति और चूर्णिका ९५ से १०२ तक श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वारों) की भक्ति के स्वभाव को स्थापित करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने निपुण व्याख्यान से हम पर आशिर्वाद प्रदान करते है जिसके मदद से हम यह पवित्र तत्व को समझ सकते है। ३ प्रकार कि भक्ति पहचानी गयी है – साधन भक्ति, साध्य भक्ति और सहज भक्ति।

  • साधन भक्ति वह भक्ति है जो स्वयं के परिश्रम से बढ़ती है और भगवद प्राप्ति के लिये इसे उपाय माना गया है – यह भक्ति योग है जिसे शास्त्र में समझाया गया है।
  • साध्य भक्ति पवित्र योग है जो उच्च आचार्य जैसे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी आदि द्वारा प्रगट कि गयी है। यह आचार्य पहिले ही भगवान के शरण हो चुके है और केवल भगवान को ही उपाय स्वीकार किये है। ऐसे साध्य भक्ति भूख के समान है – केवल जब कोई भूखा हो तभी वो अपनी पूर्ण संतुष्टी तक भोजन खा सकता है उसी तरह जब पवित्र भक्ति होती है तब वह जो कैंकर्य करते है उससे उन्हें पूर्ण संतुष्टी मिलती है। इसलिये यह साध्य भक्ति कैंकर्य का एक अंग हो जाता है।
  • सहज भक्ति ऐसे अधिकारी का जन्म इस पवित्र भक्ति के साथ ही हुआ है। उदाहरण के तौर पर श्रीशठकोप स्वामीजी का जन्म भगवान कि तरफ पवित्र भक्ति के साथ हुआ और ऐसी भक्ति स्वयं भगवान ने ही प्रदान की है। सहज का अर्थ “वह जो स्वयं से जन्म लिया हो”। यह सहज भक्ति साधन भक्ति और साध्य भक्ति से भिन्न हैं। इसी कारण से आल्वारों को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है – भगवान की भक्ति करने के लिए भगवान की निर्हेतुक कृपा से वें भगवान के सीधे कृपा प्राप्त बने।

इस प्रस्तावना के साथ इस विषय के भिन्न पहलू पर हम चर्चा करेंगे।

  • भगवान को पाने के लिये भक्ति को साधन मानना बाधा है। जब हम भक्ति को मोक्ष का साधन मानते है तब उसमें स्व प्रयास हैं। परन्तु कुछ पाने के लिये स्व प्रयास करना सीधा उसके शेषत्व और पारतंत्र्य के विरुद्ध है। अत: भक्ति को साधन मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तो स्थापित हो ही गया है कि केवल “भगवान” ही उपाय है। हमारा चरम श्लोक भी इसी तत्व को समझाता है। चरम श्लोक में “मामेकं” (केवल में) भगवान हीं उपाय इस तत्व को स्वीकार करने पर ज़ोर देता हैं। इसलिये भक्ति को उपाय मानना दोषपूर्ण है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ११५वें सूत्र में बड़े विस्तृत रूप से सिखाते हैं। वह कहते हैं “प्रापकांतर परित्यागत्तुक्कु अज्ञान असक्तिकलन्रु, स्वरुप विरोधमे प्रधान हेतु” – अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का त्याग करने का मुख्य कारण है वें आत्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत हैं (जो पूर्णत: भगवान पर निर्भर है) और ज्ञान/योग्यता के कमी के कारण नहीं। कोई कहते है कि जिनमें क्षमता है वे भक्ति योग कर सकते हैं और जो सक्षम नहीं हैं वें भगवान के शरण हो सकते हैं। ऐसे तर्क शास्त्र को हमारे पूर्वाचार्यों ने पूरी तरह अस्वीकार किया हैं। चाहे समर्थ हो या असमर्थ यह जीवात्मा का स्वभाव हैं की अपनी रक्षा और ऊपर उठाने के लिये भगवान के शरण होना।
  • स्मरण, संकिर्तन आदि सभी साध्य (परिणाम- कैंकर्य) के अंग है, यह न जानना बाधा हैं। भक्ति के प्रारम्भ दशा में जब भगवान रक्षा के लिये आते है तब जीवात्मा कि ओर से एक अद्वेष होता है। जब भगवान “त्वममे” (तुम मेरे हो) कहते है तब हमें “अहममे” (में मेरा हूँ) यह नहीं कहना चाहिये। हमें यह मानना चाहिये कि भगवान को अस्वीकार न करने की सोच भी भगवान ही उत्पन्न करते हैं।
  • हमारी भक्ति में सांसारिक इच्छाओं का मिश्रण होना और पवित्र भक्ति में स्थित नहीं होना बाधा हैं। सांसारिक इच्छाओं को हृदय में घर करने से बचाना चाहिये। उसी तरह सभी को निरन्तर पवित्र भक्ति के लिये प्रयास करना चाहिये।
  • प्रपत्ति और साध्य भक्ति को समान मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति भगवान के शरण होने का कार्य और भगवान को उपाय रूप में स्वीकार करना हैं। जैसे पहिले देखा गया हैं साध्य भक्ति हमारी भक्ति पवित्र हो सके इसीलिए भगवान से प्रार्थना के लिए है – दोनों भिन्न है। प्रपत्ति स्वरूप से सम्बन्धीत हैं और साध्य भक्ति हम कैसे अपना कैंकर्य बड़े प्रेम से करें इससे सम्बन्धीत हैं।
  • प्रपन्न के लिये यह न जानना कि साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करने से प्रपत्ति प्रभावहीन हो सकती है, यह बाधा हैं। यह बात स्पष्ट नहीं हैं – मैंने (डॉ व्ही व्ही रामानुजम स्वामी) अपने बड़ों से यह सुना हैं कि जब साध्य भक्ति निभाई जाती हैं तो सामान्यत: उसका अन्त प्रपत्ति में ही होता हैं।
  • जब प्रपन्न जन साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करते हैं तो यह भक्ति उनके कैंकर्य का एक अंग है यह न जानना बाधा हैं। क्योंकि प्रपन्न ऐसी श्रद्धा और भक्ति के लिए उच्च उत्कंठा के साथ प्रार्थना करते हैं, यह उसी प्रकार है जैसे भोजन के लिये भूख हैं जो कैंकर्य करना और भी सुगम कर देता हैं।  अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१ सूत्र में समझाते है कि एक प्रपन्न के लिये उनके कर्म हीं उनके कैंकर्य का एक अंग होगा, ज्ञान उनके स्वयं के ज्ञानाभिवृद्दि का अंग होगा, भक्ति कैंकर्य के प्रति लगाव का अंग, स्वयं प्रपत्ति जीवात्मा के सच्चे स्वभाव का अंग होगा।
  • आल्वारों कि भक्ति जो स्वयं भगवान कि निर्हेतुक कृपा से प्राप्त हुई है वह आल्वारों का आधार है, यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे सामान्य जन भोजन, जल आदि से पोषण करते है वैसे हीं आल्वार जिन पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा है उनका पोषण भगवान के प्रति भक्ति से ही होता है। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा किये हैं कि “उण्णुम सोरु परुगु नीर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन् एम्पेरुमान” – प्रसाद, जल, ताम्बूल आदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हीं हैं।
  • यह मानना कि जब हम भगवान को सब जरूरत कि वस्तुएं देते हैं तो वह तृप्त और खुश होते है बिना यह जाने कि यह उनकी हीं कृपा हैं जो हमें सब कुछ प्राप्त हुआ हैं। यह बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ९.२६ में भगवान कहते हैं “पत्रं पुष्मं फलं तोयं यो मे भकत्या प्रयच्छति। तदहं भकत्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:” – एक पत्ता, फूल, फल और जल – जब भक्ति से मुझे अर्पण किया जाता है तो मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये यह समझना अति जरूरी है कि भक्ति एक मुख्य अंग है – न कि महँगे भोजन/वस्तु जो हम अर्पण करते हैं। भगवान के पास यह सब पहिले ही है –हम उन्हें कुछ नया नहीं दे सकते हैं। यह हमारी भक्ति हैं जिसे वें देखते हैं और यह हीं उन्हें सबसे अधिक संतुष्टी प्रदान करेगी।
  • भगवान के प्रति भक्ति हमारे हृदय में उत्पन्न होती हैं ऐसी भक्ति और परम भक्ति कि वृद्धि भगवान कि कृपा का ही फल हैं। यह न जानना बाधा हैं। ऐसी परम भक्ति की प्रार्थना श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगनाथ गद्य में कहते हैं “पारभक्ति परज्ञान परमभक्ति युक्तां माम कुरुश्व”। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार १०४ चूर्णिका में यह समझाते है कि भगवान को भक्ति उळवन (भक्ति किसान) कहते हैं – जैसे एक किसान अपने खेत में चावल बुआई करता है, खाद डालता है, घास निकालता हैं, अनाज काटता है और अन्त में चावल घर लाता है। भगवान निरन्तर जीवात्मा को जोतते है, भक्ति का बीज बोवते है, जीवात्मा को अध्यात्मिक कार्य में लगने के लिये कई अवकाश प्रदान करते है, बाधाओं से निकालने में सहायता करते है, एक बार जीवात्मा में भक्ति आ जाती है अन्त में जीवात्मा पर कृपा कर मोक्ष प्रदान कर जीवात्मा को नित्य कैंकर्य में लगाते हैं।
  • सभी अन्य उपायों का त्याग करने से किसी के सच्चे स्वभाव को कोई क्षती नहीं पहूंचेगी यह नही जानना बाधा हैं क्योंकि इसे भगवान पर पूर्ण विश्वास के आधार पर और उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करके किया जाता है। क्योंकि स्वयं भगवान भगवद्गीता में कहते हैं “सर्व धर्मान परित्यज्य” (सभी धर्मों का त्याग कर दो) कर्म, ज्ञान, भक्ति योग उपाय रूप में त्याग करने में कोई गलत नहीं है क्योंकि हम भगवान के शरण होने के लिये उन्हीं के हीं नियमों का पालन कर रहे हैं।
  • पवित्र श्रद्धा से भगवान का मंगलाशासन करना ही जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही है, यह नही जानना बाधा है। यद्यपि भगवान से यह कहना कि “आपका सब मंगल हो” सही नहीं दिखता है (वह पहले से ही सबसे श्रेष्ठ और पवित्र है)। परन्तु वह जो भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन है वह भगवान की सुन्दरता, कोमल स्वभाव आदि को देखेगा और यह विचार करेगा कि ऐसे कृपालु भगवान का कुछ अशुभ न हो जाये और इसलिये मंगलाशासन प्रगट करता है। उपदेश रत्नमाला में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं –“पोंगुम परिवले विल्लिपुत्तुर पट्टरपिरान पेट्रान पेरियाल्वार एन्नुम पेयर” – पट्टरपिरान की भगवान के प्रति अपरिहार्य भक्ति के कारण उन्हें पेरीय आल्वर (बड़े आल्वार) नाम प्राप्त हुआ। हालाकि उन्होंने स्वयं श्रीमन्नारायण कि प्रधानता मदुरै राजा के दरबार में स्थापित कि परंतु जब उन्होंने बाहर आकर भगवान को गरुड वाहन में उन्हें आशिर्वाद प्रदान करते देखा तो वे गाने लगे “पल्लांडु पल्लांडु .. उन सेवडी सेव्वी तिरुक्काप्पू” (जीते रहो जीते रहो … आपके सुन्दर चरण कमल सुरक्षीत रहे)। यह हमारे स्वभाव के विपरीत नहीं है – अपितु यह तो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के सर्वथा योग्य है। इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है। इसे एक आचार्य के मार्गदर्शक में पढ़ा जा सकता हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/06/virodhi-pariharangal-28.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

६०) सम्बन्ध विरोधीसम्बन्ध में बाधाएं।

भगवान ही उनके माता पिता हैं, श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसी घोषणा करते हैं। श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी ही उनके माता पिता हैं ऐसी घोषणा करते हैं।

सम्बन्ध का अर्थ है रिश्ता। वह इन आधार पर हो सकता है १) शरीर से संबंधी, २) मित्रता और ३) आध्यात्मिक पर आधारीत आत्म सम्बन्ध और आत्मा से संबंधीत विषय। इन तीनों में हमें यह समझना है कि तीसरा पक्ष ही मुख्य और स्तुति करने योग्य है। शरीर के संबंधी अर्थात पिता, माता, भाई, बहन और अन्य संबंधी। यह एक विशेष व्यवस्था के अंतर्गत होता है कि अपने कर्मानुसार जीव एक विशिष्ट परिवार में, विशिष्ट माता पिता के यहाँ जन्म लेता हैं। उसीतरह माता पिता के कर्मानुसार उन्हें वह सन्तान प्राप्त होती है जो तंदरुस्त/ कमजोर, अच्छे/ बुरे गुणवाला आदि हो। नाच्चियार तिरुमौली में आण्डाल अम्माजी वारणमायिरम के अन्तिम पाशुर फल श्रुति समझाते है (वह १० पाशुर गाने का परिणाम) “तूय तमिल मालै ईरैन्दुम वल्लवर वायु नन मक्कलैप् पेट्रु मगिल्वरे” (वह जो इन १० पाशुरों को पढ़कर प्रामाणीकता से पालन करेगा उन्हें अच्छी सन्तान प्राप्त होगी और वें सुख से जीवन व्यतित करेंगे)। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी यही तत्व को समझाते हैं “इवैयुम पत्तुम वल्लार्गल नल्ल पदत्ताल् मनै  वाल्वर कोण्ड पेण्डिर मक्कले” (जो भागवत कैंकर्य को समझते है और इन १० पाशुरों को पढ़ते/पालन करते है उनको विशिष्ट परिवार सुख प्राप्त होगा जिसमें सभी भगवान और भागवतों के प्रति कैंकर्यरत होते है)। तिरुमौली में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते हैं “कणपुरम कै थोलुम पिल्लैयै पिल्लै एन्रेण्णप् पेरुवरे?” (अगर वो हमारा बालक भी हो और अगर वह बालक तिरुक्कण्णपुरम कि आराधना करता हैं तो उस बालक को छोटा नहीं बल्कि एक बड़ा भक्त मानना चाहिये)। वे तिरुनेडुन्दाण्डगम के २०वें पाशुर में कहते “पेरालन पेर ओदुम पेण्णै मण्मेल पेरुन तवत्तल एन्रल्लाल पेचलामे” (एक छोटी लड़की (स्वयं कि बिटिया) जो भगवान कि स्तुति करती हैं उसे नित्यसूरी (परमपदधाम कि नित्य निवासी) के समान समझना चाहिये)। भगवान कि कृपा से अपनी स्वयं का बच्चा भगवान के बहुत करीब हैं तो उसे को “मेरे छोटा बच्चा” ऐसे न समझना चाहिये बल्कि उसे बड़े आदर के साथ “सुकृतिना (पुण्यात्मा)” ऐसे समझना चाहिये। (अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी कि धर्मपत्नी आण्डाल को सम्प्रदाय में बहुत बड़ी विद्वान माना गया हैं। उनके दो पुत्र श्रीपराशर भट्टर और श्रीवेदव्यास भट्टर जिनका जन्म भगवान श्रीरंगनाथ के प्रसाद से हुआ हैं। दोनों में से श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी विशेषकर उनकी बुद्धीमत्ता और पाण्डित्य के कारण विशेष कीर्ति योग्य है। उनको जन्म देनेवाली माँ आण्डाल अम्माजी भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी का श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करती थी। ऐसे पूंछने पर उन्होंने समझाया कि शिल्पकार भगवान कि मूर्ति बनाता हैं परन्तु एक बार उस मूर्ति कि प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर वह शिल्पी भी उसकी पूजा करता हैं। इसी तरह यद्यपि मैंने उसे जन्म दिया हैं परन्तु जैसे हीं उस पर भगवान कि कृपा हो गयी वों मेरे लिये भी पूजनीय हो गया। वह तिरुमौली के ८.२.९ पाशुर को बताती हैं जो इस तत्व को स्थापित करता हैं। इसी संदर्भ में अगर हमारे सांसारिक संबंधी सच्चे भागवत हो तो ऐसे सम्बन्ध का तो बहोत मन बढ़ाना और स्तुति भी करनी चाहिये। इस बात पर ज़ोर दिया गया हैं कि सांसारिक सम्बन्ध से अधीक भगवद, भागवत और आचार्य से उत्पन्न सम्बन्ध को अधिक महत्व देना चाहिये। इस पर भी ज़ोर दिया गया हैं कि जीवात्मा कि उन्नती के लिये केवल सांसारिक सम्बन्ध को महत्व नहीं देना चाहिये। मुख्य तत्व को स्पष्ट रूप से जानने के लिये एक लम्बी प्रस्तावना देना बहुत जरूरी था। इस प्रस्तावना के साथ हम इस विषय के आतंरिक तत्व को आसानी से समझ सकते हैं।

  • देह (सांसारिक) संबंधीयों को संबंधी मानना और भागवत संबंधीयों को संबंधी न मानना बाधा हैं। देह सम्बन्ध हमारे कर्मों से उत्पन्न होते हैं। परन्तु भागवत हमारे स्वरूप ज्ञान से उत्पन्न होते हैं और उसकी स्तुति भी होती हैं।
  • प्रपन्न होने के बावजूद सांसारिक सम्बन्ध रखना और श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध नहीं रखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपन्न वों हैं जो पूर्णत: आचार्य कृपा से भगवान के शरण हो गया हैं। ऐसे जनों को सांसारिक जनों से नाता रखने में कोई चाह नहीं होती हैं। वें पूरा ध्यान भगवान और भागवतों के कैंकर्य में हीं केन्द्रीत करते हैं।
  • केवल जन्म देनेवाले माता पिता को मोल देना और ज्ञान देनेवाले (आचार्य) माता पिता को मोल न देना बाधा हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियाधन अरिवित्त अत्ता! नी चेय्वन अडियेन अरियेने” – यहाँ आल्वार भगवान कि स्तुति आचार्य के समान करते हैं जो पवित्र और मुख्य तत्वों को सिखाते हैं। आचार्य वह हैं जो शिष्य में सच्ची समझ लाते हैं। माता पिता वों हैं जो देह देते हैं और आचार्य वह हैं जो सच्ची समझ देते हैं जो जन्म से भी उच्च हैं। हमें अपने जन्म देनेवाले माता पिता को भी पूर्ण सम्मान देना चाहिये और ज्ञान देनेवाले आचार्य को भी उच्च माता पिता मानना चाहिये जैसे सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं कि “मेलात ताय् तंतैयरुम अवरे इनियावारे” – आज से भगवान हीं मेरे श्रेष्ठ माता पिता हैं जिन्होंने में कौन हूँ इस सत्य का अनुभव कराया हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस मुख्य तत्व को हम श्रीमधुरकवि स्वामीजी के कण्णिनुण शिरूत्ताम्बु के चौथे पाशुर से जोड़ सकते हैं “अन्नैयाय अत्तनाय एन्नै आण्डिडुम तन्मैयान शडगोपन एन नम्बिये” श्रीशठकोप स्वामीजी जो पूर्णत: पवित्र गुणोंवाले हैं उनका मुझ पर माता पिता की तरह पूर्ण नियन्त्रण हैं। यहीं बात आलवन्दार में बताते हैं “माता पिता ….” जहाँ आलवन्दार यह घोषित करते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी हीं उनके माता, पिता आदि सब कुछ हैं।
  • सांसारिक भाई बहन को भाई बहन मानना और अपने स्वयं के आचार्य के शिष्यों को भाई बहन न मानना बाधा। हमारे माता पिता के जन्में बच्चों को जैसे हम भाई बहन मानते हैं वैसे हीं आचार्य जो हमारे पिता हैं और उनके शिष्य उनके पुत्र/पुत्री ही है – तो ऐसे शिष्य हमारे स्वाभाविक भाई बहन है।
  • देह संबंधीयों को औपाधिक न मानना और भागवत संबंधीयों को निरुपाधीक न मानना बाधा हैं। हम सब अपने पूर्व कर्मानुसार उसी ही परिवार में जन्म लिये हैं – इसलिये वह नियमबद्ध हैं। परन्तु भागवत सम्बन्ध और आचार्य सम्बन्ध अनियमित हैं।
  • यह न जानना कि अचित सम्बन्ध (शरीर और शारीरिक सम्बन्ध) हटाये जाने योग्य और अस्थाई हैं और अयन सम्बन्ध (भगवान से सम्बन्ध – अयन का अर्थ शरणागतों की तिरुमाली) हटाने जाने योग्य नहीं है और स्थाई हैं, यह बाधा हैं। जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध वहीं हैं जो सेवक और स्वामी के मध्य में हैं। भगवान स्वामी है और जीवात्मा भगवान का सेवक हैं – यह सम्बन्ध नित्य है और कभी समाप्त नहीं हो सकता हैं। सभी परिस्थिती में जीवात्मा भगवान का सेवक हैं। इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • यह न मानना कि अचित सम्बन्ध जीवात्मा के स्वभाव को नाश करता हैं और अयन सम्बन्ध जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठायेगा, बाधा हैं। क्योंकि यह शरीर पदार्थ से बना हैं जिसके ३ गुण हैं – सत्व, रजस और तम, यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को पहचान ने से हमेशा रोकेगा। परन्तु एक बार वह जीवात्मा भगवान के शरण हो जाये तब भगवान उसे उसके सच्चे स्वभाव से अवगत करायेंगे। अनुवादक टिप्पणी: माणिक्क मालै में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वों अचित और ईश्वर के मध्य में बहुत सुन्दर समानता लाते हैं। जब हम सांसारिक सुख कि ओर खिंचे जाते हैं तब अचित यह निश्चित करता हैं कि हम सांसारिक सुख में डुबे रहे और हम कही भी न जाये विशेषकर भगवान कि ओर। उसी तरह जब हम भगवान कि ओर जाते हैं तो भगवान यह निश्चय करते हैं कि हम अपने सच्चे स्वभाव में रहे और उनकी ओर बड़ी भक्ति रखे। वो एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। हिरण्यकशिपु प्रकृति कि शरण लेता है और भगवान का विरोध करता हैं – उसका सर्वनाश हो गया। प्रह्लादजी भगवान कि शरण लेते हैं और प्रकृति से दूर रहते है – उनकी उन्नति हो गयी। किसी भी वस्तु कि ओर हम जितना जुड़े रहेंगे हम उतने ही अज्ञानी हो जायेंगे। हम जितना अधिक भगवान से जुड़ेंगे ज्ञान में वृद्धि के कारण हम उतने आनंदित होंगे। अन्त में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै सुन्दरता से सम्पन्न करते हैं –भगवद सम्बन्ध (आचार्य के जरिये) स्थापित करने के पश्चात अगर किसी को अपने शरीर और शारीरिक गतिविधियों से डर नहीं हैं तो ऐसे व्यक्ति के ज्ञान पर सन्देह करना चाहिये।
  • सभी सांसारिक पक्षों को भागवत सेवा में प्रयोग न करना और श्रीमन्नारायण भगवान (वह जो अन्तरयामी है) के साथ का सम्बन्ध ही हमारा पोषण करता हैं, यह न मानना बाधा हैं। श्रीमन्नारायण जगदीश्वर हैं जो सब जगह और सभी में रहते हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “उडल्मिसै उयिरेनक करनथेंगुम परंथुलन” – जैसे जीवात्मा पूरे शरीर में होता हैं (अपने धर्म भूत ज्ञान के जरिये) वैसे हीं भगवान स्वयं हर जगह होते हैं। वेदों में यह दर्शाया गया हैं कि भगवान सभी विषय में अनगिनत जीवात्मा के द्वारा प्रवेश करने कि इच्छा प्रगट करते हैं और अत: यह संसार का जन्म जीवन के विभिन्न रूप में होता हैं।
  • यह मानना कि हम उन सभी सांसारिक जनों से जुड़े है क्यूंकि उनका भगवान से सम्बन्ध है (क्योंकि सांसारिक जन भी भगवान से जुड़े होते है) और यह न मानना कि श्रीवैष्णव जिनके पास पवित्र चेतना हैं उनके साथ हमारा नित्य सम्बन्ध हैं, बाधा है। यद्यपि शरीर के संबंधो का उनके मनुष्यत्व के कारण सम्मान करना चाहिये, पर यह अन्त नहीं हैं। हमें उन श्रीवैष्णवों कि सराहना करनी चाहिये जो निरन्तर दूसरों की प्रगती और उनकी सेवा के बारे में सोचते रहते हैं। हमें यह भी समझना चाहिये कि ऐसे श्रीवैष्णवों के साथ सम्बन्ध नित्य हैं। अनुवादक टिप्पणी: आलवान्दर अपने स्तोत्र रत्न के दूसरे श्लोक में यह घोषित करते है कि “नाथाय नाथ मुनये अत्र परत्र चापि नित्यं यदीय चरणौ शरणम मदीयं” इस संसार और परमपदधाम इन दोनों में श्रीनाथमुनि स्वामीजी (जो उनके दादाजी है) के चरण कमल हीं नित्य शरण हैं।
  • यह न सोचना कि भगवद सम्बन्ध दोनों बन्धन (संसार में बंधना) और मोक्ष (संसार से छुटना) के लिये सामान्य है और आचार्य सम्बन्ध केवल मोक्ष पर हीं केन्द्रीत है, यह बाधा हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के व्याख्या के ४३३वें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि भगवान के शरण होने पर भगवान या तो हमारे असंख्य पाप कर्मों को देखते हुए हमें इस संसार में फिर से कुछ समय अधिक के लिये रखते है अथवा भगवान कृपा कर हमें इस संसार से उठाकर (क्योंकि भगवान स्वाभाविक कृपा करनेवाले हैं) इस संसार के दु:खों से मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये कि भगवान निरंकुश स्वतन्त्र है (पूर्णत: स्वतन्त्र और किसी से भी नियंत्रण या कोई भी उन्हें प्रश्न नहीं कर सकता हैं) – यह पूर्णत: अन्त में उन्हीं कि इच्छा हैं। परन्तु आचार्य मुख्य रूप से दया करनेवाले है जो उनके शरण में आते हैं वों हमेशा उसे ऊपर उठाने का ही विचार करते हैं। श्रीलक्ष्मी अम्माजी हमेशा जीवात्मा कि ओर करुणामय रहती है और भगवान से निरन्तर जीवात्मा के उद्धार के लिये सिफारिश करती है – आचार्य भी ऐसे हीं होते है वें कृपा कर यह सुनिश्चित करते है कि शिष्य का कल्याण हो जाये। यह ४४७वें सूत्र में समझाया गया हैं – आचार्य अभिमानमे उत्थार्गम  – आचार्य कि कृपा हीं केवल हमारा उद्धार कर सकती हैं।
  • यह न मानना कि आचार्य के साथ सम्बन्ध हमारी प्राणवायु के समान है और यह मानना की यह सम्बन्ध केवल आचार्य द्वारा शिष्य को मुख्य तत्वों को देने से उत्पन्न होता है, बाधा है। जैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला में समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप पेनुमवन” (आचार्य वह है जो जीवात्मा का पोषण कराते है) – वह केवल उपदेशक नहीं है, उन्हें सबकुछ समझना चाहिये और उन्हें पूर्ण आदर, सेवा और सत्कार सहित व्यवहार करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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