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अन्तिमोपाय निष्ठा – ११ – एम्बार और अन्य शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

<< श्री रामानुज के शिष्यों की निष्ठा

पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – १० – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के शिष्य) में हमने श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के शिष्यों की दिव्य महिमा देखी। हम इस लेख में ऐसी घटनाओं (मुख्य रूप से श्रीएम्बार् स्वामीजी की निष्ठा) का क्रम जारी रखेंगे।

श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी)

श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) का जन्म वट्टमणिकुल (एक विशेष पारिवारिक वंशावली) में हुआ था। आपश्री सबसे जानकार और बहुत अलग थे। आपश्री युवावस्था में यथारूप से अनुष्ठानों का पालन कर रहे थे। उस समय, आपश्री शिव के भक्त बन गये, शिवागम में प्रवेश किया, रुद्राक्ष माला धारणकर श्रीकालहस्ति की ओर प्रयाण किया और कई वर्षों तक श्रीकालहस्ति मे विराजमान रहें। आपश्री वहां शिव मंदिर के मुख्य पुजारी और नियंत्रक बन गए। श्रीशिव प्रसन्नपरक छड़ी / पत्तियां से शोभायमान आपश्री के करकमल थे। तमिल-भाषा-विशेषज्ञ आपश्री का श्रीमुख सदैव शिव महिमागान मे सेवारत था। उस समय, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी तिरुमलै से किसी विशेष कारण (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी में सुधार) के लिए श्रीकालहस्ति में आते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी अपने शिष्यों के साथ एक जंगली इलाके में बैठकर अपने शिष्यों के साथ चर्चा प्रारम्भ किया। उसी समय मे, आपश्री उस क्षेत्र में श्रीरुद्रदेव के लिए फूल तोड़ने हेतु आए। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के सत्संग के निकटस्थ वृक्ष पर फूल तोड़ने हेतु आपश्री चढ़ने लगे। श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) की इस स्थिति को देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी उनके लिए बहुत खेद महसूस करते हैं और मन ही मन सोचते हैं “चूंकि यह जीवात्मा (आपश्री) एक महान विद्वान और बहुत अलग व्यक्ति हैं, अगर आपश्री स्वयं की वर्तमान भक्ति (जो बहुत नीच गति प्रदाता है और जो जीवात्मा के लिए कदापि वास्तविक नहीं है) को छोड़कर, भगवान् श्रीमन्नारायण (जो जीवात्मा के उपयुक्त स्वामी है) के भक्त बन जाए जो वह भक्ति सबसे उच्चतम कहलायेगी और यह पूरी दुनिया के लिए अत्यन्त लाभप्रद होगा”। ” आपश्री जिस निकटस्थ वृक्ष पर चढ़कर श्रीरुद्रदेव के लिए फूल तोड़ रहे थे ठीक उसी वृक्ष के करीब जाकर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी भगवान् श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता स्थापित करने वाले वेदान्त छंदों को समझाते हुए अपने शिष्यों के साथ चर्चा कर रहे थे। आपश्री मंदिर में स्व-सेवाओं को और उद्यान मे फूल तोडने का उद्देश्य भूलकर, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी के दिव्य वाणी का श्रवण करते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी की दिव्य वाणी का श्रवणकर उत्साहित आपश्री और लंबे समय तक वहां रहते हैं।

श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) के अनुकूल दृष्टिकोण को देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) सोचते हैं, “हम इनके दिमाग को शुद्ध करने के लिए श्रीनम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी) के दैवीय श्रीसूत्ति से एक पासुर को समझाएंगे” और तिरुवाय्मोऴि (२.२.४) से निम्नलिखित पासुर को विस्तार से समझाते हैं।

तेवुम् एप्पोरुळुम् पडैक्क
पूविल् नान्मुगनैप् पडैत्त
तेवन् एम्पेरुमानुक्कु अल्लाल्
पूवुम् पूशनैयुम् तगुमे?

सरल अनुवादः एम्पेरुमान् (श्रीमन्नारायण) ने ब्रह्मा को बनाया है, जो सभी प्राणियों और विभिन्न पहलुओं को बनाने के लिए व्यष्टि सृष्टि, यानी, भगवान् सबसे पहले स्वयं समष्टि सृष्टि करते/बनाते हैं – जहां वह पंच भूत बनाते हैं और ब्रह्मा के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से व्यष्टि सृष्टि का प्रदर्शन करते हैं)। एम्पेरुमान् (श्रीमन् नारायण) के अलावा, क्या कोई और फूल और प्रार्थना स्वीकार करने के लिए योग्य है? (कोई और योग्य नहीं है)।

यह सुनकर, तमिल-भाषा-विशेषज्ञ, आपश्री हाथों मे पकडे हुए फूल की टोकरी छोड़कर पेड़ के नीचे उतरकर बोल पडे “नहीं! नहीं!” और कहते हैं, “मैंने अपने जीवन में इतना समय व्यर्थ कर दिया है इस तमो गुण से भरे हुए देवता के लिये नियमित रूप से उनके स्नानादि के लिए जल लाने की सेवा, इत्यादि” और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के कमल चरणों में गिरते हैं। उद्देश्यकी पूर्तीसे प्रसन्न श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी आपश्री के शुद्धीकरण हेतु बाह्य स्नान करने का उपदेश देते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करने की महान इच्छा के साथ आपश्री ने स्वयं की रुद्राक्ष माला, पाषण्ड वेश (घमंडी जहर / घमंड) को हटाकर, पवित्र जल की धारा मे नहा कर आद्र वस्त्र सहित श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के समक्ष लौटे। अति प्रसन्न श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी आपश्री का तुरंत पंच संस्कार करते हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि त्याज्य (क्या छोड़ना है) और उपादेय (क्या स्वीकार किया जाना चाहिए) और निर्देश “भगवान के अलावा अन्य सभी चीज़ों को सभी छोड़ दें, श्रीमन् नारायण को पकड़ो और हमारे धर्म के प्रति वफादार रहो “। श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी के साथ तिरुमलै जाने के लिए प्रारम्भ करते हैं।

उस समय, श्रीकालहस्ति के कई पाषण्डि (घमंडी) वहां आते हैं और कहते हैं, “आपश्री हमारे प्रमुख हैं इसलिए आपश्री हमें नहीं छोड़ सकते हैं” और श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) दूर से जवाब देते हैं “अपनी छड़ीयों और पत्तियों को पकडे रहो; मैं इस कब्र में और नहीं रहूंगा”। सीता पिराट्टि (सीता मैय्या) ने जैसे किसी भी लगाव के बिना लंका छोड़ दिया और जैसे मुक्तात्मा अर्चिरादि गति में यात्रा करने के लिए हार्दन् (एम्पेरुमान् / भगवान् का एक रूप) के मार्गदर्शन के साथ परमपद की ओर जाते हैं, वैसे ही श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) तिरुमलै (जिसको भूलोक वैकुण्ठ माना जाता हैं) जाते हैं श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) के मार्गदर्शन के साथ, वहां श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) नंबी के करीबी विश्वासी के रूप में रहते हैं और हमेशा उनकी सेवा करते हैं।

उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) तिरुमलै (तिरुपति) आकर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) से श्रीमद्रामायण के आवश्यक सिद्धांतों को सीखते हैं और सीखने के पश्चात श्रीरंगम लौटने की योजना बनाते हैं। एक विशेष अवतार के रूप में श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी को देखते हुए और उन्हें खुद को आळवन्दार (श्री यामुनाचर्य) के रूप में देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) अपने बेटों को उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) का आश्रय लेने के लिए कहते हैं और उन्हें बताते हैं, “मैं अब भी आपको कुछ मूल्यवान पेशकश करना चाहता हूं”। उडयवर (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी), आपश्री के स्वाचार्य की ओर आपश्री की भक्ति को देखकर, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) से आपश्री को उनके साथ भेजने का आशीर्वाद देने का अनुरोध करते हैं। आपश्री को, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) खुशी से उदगदारा (दान करने के लिए पवित्र पानी का उपयोग करके ताकि लेनदेन पूरा हो सके) की प्रक्रिया के माध्यम से श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी को दान करते हैं। उडयवर् के साथ आपश्री श्रीरंगम के लिये निकलते हैं और ४/५ दिनों तक यात्रा करते हैं और आपश्री स्वाचार्य से अलग होने के कारण उदासीन हो जाते हैं। उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) पूछते हैं “आप इतने दुखी क्यों हैं?” और कहते हैं “यदि आप अपने आचार्य से अलगाव से निपटने में असमर्थ हैं, तो आप तिरुवेङ्गडम् (तिरुपति व तिरुमला) वापस चले जाएं”। आपश्री खुशी से ४/५ दिनों तक यात्रा करते हैं और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) के तिरुमालिगै (निवास) तक पहुंचते हैं और उनके चरणकमलों पर गिरते हैं। आपश्री को देख कर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ने कहा, “मैंने उदगदारा प्रक्रिया के द्वारा आपको उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) को दे दिया है। अब आप यहां क्यों लौट आए?” और आपश्री बताते हैं कि वह उनसे अलग होने में असमर्थ हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) कहते हैं, “हम उस गाय को चारा नहीं दे सकते हैं जो किसी और को बेचा गया था। अब आपको पूरी तरह श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए” और प्रसाद दिये बिना ही बाहर निकाला जाता है। अपने आचार्य के इरादों को समझते हुए, आपश्री ने फैसला किया कि उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमल ही एकमात्र शरण हैं और पुनः श्रीरंगम लौटते हैं। पुनः लौटकर आपश्री रामानुजाचार्य स्वामीजी की खुशी से सेवा करते हुए श्रीरंगम मे निवास करते हैं।

एक बार एक सभा (जनसमूह) में जहां उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) और उनके शिष्य उपस्थित थे, उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के शिष्यों ने आपश्री के ज्ञान, भक्ति, वैराग्य इत्यादि की महिमा शुरू कर दी। आपश्री इसे स्वीकार करते हैं और हाँ कहते हैं ”हाँ! यह सही है” और दूसरों से ज्यादा स्वयं की महिमा करते हैं। इसे देखते हुए, श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यदि अन्य आपकी महिमा करते हैं, तो आपको बहुत विनम्र होना चाहिए और कहें कि आप उनकी प्रशंसा के योग्य नहीं हैं। इसके बजाय आप स्वयं की महिमा कर रहे हैं। क्या यह उचित शिष्टाचार है?” प्रत्युत्तर मे श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) कहते हैं “स्वामी! अगर ये श्रीवैष्णव मेरी महिमागान करते हैं तो इसमे क्या आपत्ति है । हाथों में छड़ी और मटका, गर्दन पर रुद्राक्ष माला इत्यादि से शोभित इस देह का कालहस्ति निवास ही प्रशंसा के योग्य है अर्थात इतनी ही है इस दास की महिमा। लेकिन, हे महाराज, आपकी उच्चता ने मुझे शुद्ध करने में इतना एहसान किए हैं जैसा कि कहा गया है ”पीतगवाडैप्पिरानार् बिरमगुरुवाय् वन्तु‘, (भगवान् स्वयं प्रथम गुरु के रूप में प्रकट होते हैं)। मैं इतना गिर गया था – एक नित्य संसारि से अधिक गिर गया – लेकिन आपने मुझे ऐसा बदल दिया है कि ये श्रीवैष्णव मेरी महिमा कर रहें हैं। इसलिए, हर बार जब मैं या कोई मेरी महिमा करता है, तो वास्तविक्ता में आपकी उच्चता की महिमा ही हो रही है “। उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) कहते हैं, “प्रिय गोविंद पेरुमाळ् (भगवान्)! शानदार! शानदार!” और श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) की निष्ठा को देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता हैं।

एक आचार्य अपने शिष्य को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि क्या स्वीकार किया जाना चाहिए और क्या त्यागना है। शिष्य सिद्धांतों का पालन करने में असमर्थ है। आचार्य तब उसे ठीक करता है जहां वह गलती करता है (जैसा कि ‘स्कालित्ये सासितारम्‘ में कहा गया है)। शिष्य एक विद्वान से मिलते हैं जो देखता है कि शिष्य आचार्य द्वारा निर्देशित आदेशों का पालन करने के लिए तैयार नहीं है और विद्वान परेशान हो जाता है और कहता है, “आचार्य को केवल उन शिष्यों को निर्देश देना चाहिए जो आचार्य के निर्देशों के आधार पर पूरी तरह से कार्य करने के लिए तैयार हैं। आपके आचार्य ने क्यों निर्देश दिया?” – यह मेरे आचार्य (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा समझाया गया था।

  • आचार्य को उन शिष्यों निर्देश / निर्देशित करना चाहिए जो पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर रहे हैं
  • एक असली आचार्य का निर्देश एक सच्चे शिष्य के लिए अंतिम लक्ष्य का हिस्सा है

श्रीवेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के एक शिष्य जो एक अलग जगह पर रहते हैं श्री वेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के पास जाते हैं और उनकी कुछ समय तक सेवा करते हैं। फिर वह अपने शहर वापस लौटने का फैसला करते हैं। श्रीवेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के एक करीबी विश्वासी (शिष्य) ने इन श्रीवैष्णव को वापस लौटते देखा और उन्हें दुख के साथ कहा “ओह! यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको जीयर् के चरणकमलों को छोड़ना पड़ा और अपने निवास पर लौट आये” और वह श्रीवैष्णव जवाब देते हैं “जहां भी मैं हूं, मेरे पास अभी भी है मेरे आचार्य की दया “और खुद को सांत्वना देते हैं। एक श्रीवैष्णवी (श्रीवेदान्ति जीयर् (नन्जीयर्) के करीबी शिष्य) इस वार्तालाप को सुनते हैं, और यह देखते हैं कि घर लौटने वाले श्रीवैष्णव अपने आचार्य से अलगाव के बारे में परेशान नहीं है और कहते हैं, “एनत्तु उरुवाय् उलगिडन्द ऊऴियान् पादम् मरुवादार्क्कु उण्डामो वान्?” – मुदल् तिरुवन्तादि ९१ – यदि कोई व्यक्ति पृथ्वी को बचाने वाले श्रीवराह पेरुमाल् के चरणकमलों की पूजा नहीं करता है, तो वह परमपद कैसे पहुंचेगा? – संदर्भ यह है – यदि यह एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) के चरणकमलों के बारे में कहा जाता है, तो आचार्य के चरणकमलों की रोज पूजा ना करने के बारे में क्या कहना)। यह घटना मेरे आचार्य (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा सुनाई गई है। इससे, हम समझ सकते हैं कि यदि शिष्य अपने सदाचार्य से दूर चला जाता है, तो वह नहीं जान पाएगा कि क्या स्वीकारने योग्य है और क्या त्याज्य है। फिर, अज्ञानता उनका उपभोग करेगी और परमात्मा के पास पहुंचने के अंतिम परिणाम को पूरा नहीं करेगी।

जब अकाल से कोङ्गुनाडु (कोयंबटूर क्षेत्र) प्रभावित हुआ, तो एक ब्राह्मण और उनकी पत्नी वहां रहने के लिए श्रीरंगम से आते हैंं। उन दिनों, एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) ७ घरों में मधुकरी (भोजन के लिए प्रार्थना / भिक्षा) करते थे। जब वह सड़कों पर चलते थे, अगळङ्गनाट्टाऴ्वान् प्राक्रार (मंदिर के चारों ओर सात परतों में से एक) के पास, सभी श्रीवैष्णव श्रीरामानुजाचर्य स्वामीजी के चरणकमलों पर झुकते थे। ब्राह्मण और उनकी पत्नी (जो उस पड़ोस में रहते थे) अपने घर के ऊपरी छत से श्रीरामानुजाचर्य स्वामीजी की ओर देखते थे। एक दिन, एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) उनके घर जाते हैं और महिला ऊपर से नीचे आती है। वह एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) से पूछती है “सभी राजा आपके कमल पैरों पर झुकते हैं, लेकिन यहां आप भोजन के लिए भिक्षा मांग रहे हैं। इसका क्या कारण है?” और एम्पेरुमानार् ((श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) जवाब देता हैं “चूंकि मैं उन्हें अच्छे निर्देश देता हूं वे मेरी पूजा कर रहे हैं”। वह उनके चरणकमलों पर झुकती है और पूछती है, “कृपया मुझे भी अच्छे निर्देश दें”। एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) उनकी दिव्य कृपा के कारण तुरंत (द्वय महामंत्र) निर्देशित करते हैं। इसके बाद, सामान्य स्थिति उनकी मूल भूमि पर लौटती है और वह श्रीरंगम छोड़ने के लिए तैयारी करते हैं। महिला चिंतित हो जाती है कि वह छोड़ने से पहले एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वमीजी) से मिलने में सक्षम नहीं हो सकती हैं। उस समय, एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वमीजी) मधुकरी के लिए वहां पहुंचे और वह उनसे (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) से कहती है, “हम अपने मूल स्थान लौट रहे हैं; कृपया उन दिव्य निर्देशों को दोबारा दोहराएं ताकि यह मेरे दिल में गहरी जड़ें जैसे रह सके।” एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दया के कारण उसे तुरंत निर्देश देते हैं। वह फिर से पूछती है “कृपया मुझे हमेशा बचाने के लिए कुछ और आशीर्वाद दें”। उडयवर (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) तुरंत अपने पदुका को निकाल कर उन्हें उस महिला को देते हैं जिसका नाम पेरिय पिराट्टियार् है। उस दिन से, उसने उन पदुका को अपने तिरुवाराधन (पूजा) में रखा और प्यार के साथ उनकी पूजा की। यह घटना वार्तामाला से अच्छी तरह से जाना जाता है। इससे हम समझते हैं कि, इस संसार में लोग एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) को भी अनदेखा करेंगे – इस तरह के मामले में आचार्य की ओर पूर्ण भक्ति विकसित करना और उन आचार्य से संबंधित कुछ स्वीकार करना (जैसे इस मामले में पादुकाओं) और उनको कुल शरण के रूप में स्वीकार करना दुर्लभ है। ऐसे लोग जिन्होंने आचार्य में विश्वास विकसित किया है, कोङ्गु देश के पेरियपिराट्टियार् की तरह होना चाहिए। हम पोन्नाचियार् (पिळ्ळैयुऱङ्गाविल्लि दास की पत्नी), तुम्बियूर्क्कोण्डि, एकलव्य, विक्रमादित्य के जीवन को भी याद कर सकते हैं जो सभी आचार्य निष्ठावान थे।

अनुवादक टिप्पणीः इस प्रकार, हमने श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) और उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के अन्य शिष्यों को देखा की कैसे उन्होंने श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी पर कुल निर्भरता प्रकट की।

जारी रहेगा………..

अडियेन् भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/06/anthimopaya-nishtai-11.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १२ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ११ – ३

भगवान वेल्वी से प्रसन्न थे। वह यज्ञ का आनंद लेते है क्योंकि यह उसके मन के बहुत निकट है। उनका नाम यज्ञ: भी है । इसका अर्थ है, वह यज्ञ का व्यक्ति रूप है।

श्री भागवत गीता में….

“अहम् क्रतुरहम यज्ञ स्वधाहम अहमौशदम I मंत्रोहम अहमेवाज्यम अहमाग्निरहम हुतं II

(गीता  ९ – १६)

वे प्रकट करते है की “मैं याग हूं। मैं महा याग हूं। मैं पिंड (तर्पण) पूर्वजों (पित्रों) को पोषण (स्वथा) के रूप में हूं। मैं शब्द हूं (वेद मन्त्र)। मैं हविस हूं, मन्त्र हूं, घी हूं, मैं अग्नि हूं और मैं होम हूं “।

सहस्रनामम उपाधि देति है याग से लेकर यज्ञगुह्य्म तक के लिए विस्तृत परिपूरक के रूप में दिखाई देते हैं।  एक उपयुक्त भोजन है यह विचार के लिए।

” सिगिन्रा किथियेल्लम याने” – नम्माळ्ळवार कहते है (सभी शास्रविधियां मेरे (भगवान्) लिए निभाये जाते है)

कलियन भी सहमत थे “वेल्वीयुम थानाए निनरा एम्पेरुमान” – (यज्ञ भी हमारे सर्वोच्च भगवान का एक अभिव्यक्ति है)।

वे अनुष्ठान है। वे तपस्या है। वे अर्पण है।

वे सभी में अदृश्य रूप में उपस्थित है। इस कारण, ब्रह्मा भयभीत नहीं हुए थे। जहां असली विश्वास है, वहां भय के लिए कोई जगह नहीं है। भय विश्वास का मित्र नहीं है।

यह निश्चित रूप से वही है जो प्रहलाद ने घोषित किया था। वह शिक्षालय के विद्यार्दियों के आयु वर्ग में सबसे छोटे थे। परंतु उन्हें साधुओं (प्रचण्ड भक्त) में प्रमुख माना जाता है। कारण साफ है। वह कभी भयभीत नहीं थे।

हिरन्य आश्चर्य चकित थे। उसने अपने पुत्र से पूछा कि “मेरे पुत्र! क्या आप को कभी भय नहीं होता”?

मुस्कुराते हुए, बालक उत्तर देता है – ” जिससे भय भी भयभीत होता है, वह मेरा निरंतर साथी है। मुझे कोई चिंता या कष्ट नहीं है। ” केवल, इस निरंतर विश्वास एकमात्र ही, अंत तक कवच के रूप में दृढ़ता से खड़ा रहेगा।

हमें भी इस विश्वास को प्राप्त करने की आवश्यकता है – भगवान में विश्वास। ईश्वर भी हम से कुछ भी नहीं आशा करते है – महा विश्वास (भगवान के प्रति दृढ़ विश्वास और निष्ठा)।

ब्रह्मा में यह पर्याप्त था। सरस्वती द्वारा किये गए किसी भी आक्रमण पर वे दुखी नहीं थे।

केवल सरस्वती ने गलत अनुमान लगाया था। इसके ऊपर, असुरों द्वारा दुष्ट मार्गदर्शन हुआ। असुरों का क्रोध का कई कारण था। प्रवृत्ति से, वे अच्छों के विपरीत थे। इसके अलावा उन्हें शिकायत थी कि ब्रह्मा के वेल्वी ने देवताओं को प्रमुखता दी थी और उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया था।

वे अपने लाभ के लिए सरस्वती का उपयोग करना चाहते थे, प्रतिशोध (अपमान) लेने के लिए और इसलिए यग्न का विनाश का कारण बनने का प्रयास किया था।

असुर सरस्वती को उपयोग में लेके अपने दुष्ट राक्षस कार्य को पूरा करने के इरादे से थे। सरस्वती भी सहमत थी। एक तेज धारा में बदलके उनकी तपस्या के स्थान से प्रारंभ होके, वे दक्षिण की तरफ बढ़ी और इस जगह पर पहुंची, क्रोद्ध में नदी, जलप्रलय बनकर ब्रह्मा के वेल्वी को धरती पर गिरा देने का प्रयत्न हुआ।

सरस्वती “वेगवती” में बदल गयी। उनका प्रकोप दर्शकों के लिए स्पष्ट था जब उन्होंने अचानक बहाव का उग्र रूप से रास्ते में आये सभी को नष्ट कर दिया। भाग लेनेवाले ने खुद को और उनके सामान को हिंसक नदी वेगवती के क्रोध से बचाना चाहते थे। इस कारण, वे सुरक्षित, ऊंचे स्तान दूंडे थे । ऊंचे तरंगे ऐसा लग रहे थे कि सामने समुद्र खड़ा हो, और भय का कारण बन गया।

वेगवती तेजी से यागशाला के पास आ रही थी। मन की गति या पवन की गति भी बढ़ती नदी वेगवती के सामने कम लग रहा था।

परन्तु यह वेगवती नदी पूरी तरह से हमारे द्वारा मिटा दिया गया लगता है; अब इसका कोई निशान नहीं है। यह हमारे लिए अविश्वसनीय लग सकता है अगर यह कहा जाता है कि एक समय में यह नदी को सात शाखाओं में बहने का गौरव था। वेगवती नदी के साथ उपनदीयों का बहार नष्ट करने का पूरा श्रेय (दोष), अतिक्रमण के माध्यम से, केवल हमे जाना चाहिए।

वेगवती कि प्रतिष्ठा, नदी स्नान के लाभ  (पुराण) में हस्थिगिरी महात्मम और देशिकन के हमससन्देशं में लिखा गया है।

हमने वेगवती नदी को मिटा के हमने अपने पापों को अधिक कर लिया है, हमें मुक्त करने के लिए प्रकट हुई नदी को हमने मुक्त कर दिया है ।

“आप एव हि सुमानस:” और “जल पवित्र है” – इस प्रकार हम पवित्र महिमा का उदाहरण देते हैं और आगे हम घोषणा करते हैं कि “पृथ्वी बिना पानी के जीवित नहीं रह सकती है”। परंतुब हम नदियों और जल राशियों को गायब होने के लिए जिम्मेदार हैं।

हम कई अनैतिक, दुष्ट कृत्यों में शामिल होते हैं। इन सभी के लिए मुक्ति हो सकता है।। लेकिन पापों में सबसे बड़ा, अर्थात् पानी के राशियों को नष्ट करने के लिए कोई मोक्ष प्रतीत नहीं होता है।

परेशान और क्रोधित सरस्वती (वेगवती के रूप में) उग्र रूप से बह रही थी। लेकिन भगवान भी उसे नष्ट करने का इच्छा नहीं रखते थे, बल्कि एक जलबंधक (बांध) की तरह उसकी गति को नियंत्रित करके उसे बचाया।

पर हम !

हमने पूरी तरह से वेगवती और उसके सात उपनदियों (शाखाओं) को समाप्त कर दिया है। क्या हम कम से कम इन नामों को जान लें?

अगले भाग में ..

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी में जल्द ही, हम तिरुपर्काडल, पल्लिकोंडान, और तिरुवेक्का – उनकी प्रतिष्ठा सुनेंगे।

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

आधार – https://srivaishnavagranthamwordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-12-1/

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – ३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ११ – २

तिरु अत्तबुयगरम कांची में एकमात्र पवित्र स्थान है जिसमें वैकुंट वासल (वैकुंट के द्वार) हैं। यहाँ भगवान अष्ठ भुजाओं के साथ स्वयं को प्रकट करते हैं।

दाहिने तरफ, उनकी चार भुजाओं में चक्र, खड्ग, कमल और वाण है । बाईं तरफ उनकी चार भुजाओं में शंख, धनुष, ढाल और अधिकारीगण हैं। आज भी, यहां सुरक्षा प्रदान करने के लिए भगवान इस तरह सशस्त्र होके खड़े है।

उन्हें आदिकेशवन, गजेन्द्र वरदन और अट्टबुयकरत्तन के नाम से श्रद्धापूर्वक और प्यार से बुलाया जाते है।

इस स्थान का नाम अष्टभुजम भी है क्योंकि वे इधर निवास करते हैं। तिरुमंगै आळ्ळ्वार (श्री परकाल) के “परकालन पनुवल” हमें इस महान शहर की कहानी का आनंद लेने में मदद करता है।

कलियन के पास सर्वशक्तिमान के पराक्रम के प्रति विशाल प्रेम था। इस प्रेम में वे अपने आपको स्त्री में परिवर्तित होने का अहसास करते थे, अपने असली अस्तित्व को भूल जाते थे I (शास्त्र के अनुसार सभी आत्मा स्त्री हि हैं)। उन्होंने “परकाल नायकी” नाम ग्रहण करके एक स्त्री के अनुरूप बात किया करते थे।

आळ्ळवार एक स्त्री के अनुभव में, उनसे वियोग का विरह वेदनानुभव करते थे। उनके छंद इस पीड़ा को अपने मुंह से वाण चलाने के रूप में बताते हैं, जैसा कि माँ और मित्र द्वारा बोली जाती है।

पवित्र स्थान की प्रशंसा में उनके गीत, तिरुविडवेनडै (तिरुविडवेन्दै )निम्नलिखित उपाख्यानों को संदर्भित करता है। पुत्री (परकाल नायकी) के दुःख को देख कर माँ भगवान से निवेदन करती है कि – “मेरी पुत्री आपके वियोग से कष्ट में है। हे इडवेनडै के भगवान! आप का क्या प्रस्ताव हैं? आपके मन में क्या चल रहा है? इन पंक्तियों से तिरुमोलि आगे बढता है।

भगवान ने स्वयं को आळ्ळवार के लिए दृष्टिगोचर हुए जो स्त्री (उनके मन के अनुसार) में परिवर्तित हुए थे। भगवान ने स्वयं को, अष्ठ भुजाओं के साथ एक रमणीय आकृति के रूप में दिखाया, जो नेत्रों के लिए मनोहर था। उन्होंने व्यथा से भरे आळ्ळवार को सान्त्वना देने के लिए ऐसा किया।

परकाल नायकी ने उसे देखा, आश्चर्य हुआ “इतना प्यारा व्यक्ति है! जानने की इच्छा है कि वह व्यक्ति कौन था, उसने जानबूझकर प्रत्यक्षतः पूछताछ से अपने आप को रोका और बगल में किसी एक से पूछा कि ‘यह सुन्दर मनोहर व्यक्ति कौन खड़ा है वहां ?’। उसी स्तान के निवासी इच्छापूर्वक से उत्तर ‘मैं अत्ताबुयगरम में रहता हूं’ के जवाब के साथ आगे आया।

वह उचित रूप से उत्तर दे सकते थे “मैं अष्ठभुजन हूं (आठ भुजाओं वाला)”। यह विस्तृत हो जाता कि वे भगवान्, सर्वशक्तिमान है। पर ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था / न ही वे स्वयं को किसी अन्य अवास्तविक व्यक्ति के रूप में चित्रित करने की इच्छा रखा था। तो, उन्होंने दक्षता से उत्तर दिया, “मैं अष्ठभुज क्षेत्र का निवासी हूं” हम अनुमान लगाते हैं। यही कारण है कि इस प्रबंध की प्रत्येक कविता में, हम “इवारार्कोल एन्न अट्टबुयगरत्तेन एन्रारे” शब्द आते हैं – जब पूछताछ की कि वह कौन है, उन्होने उत्तर दिया – अत्ताबुयगरम के निवासी।

अपने अष्टभुजाष्टकम में, वेदान्त देसिकन ने भी इस भगवान को “अष्ठभुजापदेषा” के रूप में संबोधित किया (भगवान जो अष्ठभुज देश में निवास करते हैं)।

इनसे हमें जानने को मिलता हैं कि इस दिव्य स्थान का नाम अष्ठभुज है।

इस भगवान ने सभी का उद्धार किया ब्रह्मा से लेके परकाल नायकी तक, जो उनके श्रद्धापूर्ण भक्त हैं।

इस तरह उनकी प्रेममय लक्षण है। उनका मानना ​​है कि यह उनका भाग्य है कि वे उनके भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते है ।

ब्रह्मा ने उनकी दयापूर्ण संरक्षण पर ध्यान देना प्रारंभ किया। “हे भगवान! आपने प्रसिद्ध रूप से सम्मानित “गजेंद्र वरधन” प्राप्त किया है क्यों कि उसे आश्रय और संरक्षित किया जिनके चेहरे पर सूंड था (गजेंद्र, हाथी) “।

कितना मनोहर कथा है!

भाग्य ने एक राजा को हाथी में बदल दिया था। राजा के रूप में उन्होंने एक दिन भी अपनी प्रार्थना छोडा नहीं था। भगवान् कि दिव्य कृपा से एक हाथी में बदलने के बाद भी, उन्होंने पुष्पों का अर्पण करना जारी रखी और भगवान कि पूजा की। उनके आत्मा का असली स्वरूप उनकी स्मृति से मिटा नहीं था।

एक दिन हाथी ने कमल के फूल लाने के लिए एक कुण्ड में प्रवेश किया। उस समय मौजूद एक बड़ा मगरमच्छ (मकर) ने  हाथी का एक पैर पकड़ लिया।

भय भीत गज ने स्वयं को चंगुल से मुक्त होने का प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हुआ। वहां मौजूद मादा हाथियों ने भी अपनी अल्प मात्रा में प्रयत्न किया, परंतु तब भी सफलता नहीं मिली।

यह संघर्ष, युद्ध एक हजार देव वर्षों (1000 साल देव तिथिपत्र के अनुसार) के लिए चला था। लम्बे समय  के बाद यह हाथी समझ गया कि वह स्वयं संरक्षण नहीं कर सकता; उनका प्रयास व्यर्थ थे। उन्होंने दिव्य हस्तक्षेप का निवेदन की “ओह मनिवन्ना(मनिवण्णा! आप जो सर्प को अपने शय्या के रूप में रखते हो। कृपया प्रकट हो I मेरा इस शोचनीय पीडा का नाश करे I आदिमूलम! आदिकेशवा !! – गज तीव्र विलाप किया।

अन्य सभी देवता पीछे हट गए कि “मुझे नहीं! मैं नहीं! “(मैं आदिमूलम नहीं हूँ – मूल निर्माता)।

केवल भगवान तुरंत आये और मगरमच्छ का संहार किया और गजेन्द्र का रक्षा किया।

गजेन्द्र ने उद्धारकर्ता को गंभीरता से धन्यवाद दिया। अष्ठ भुज भगवान ने अपने मुंहकी हवा से छाती पर पहने ऊपरी वस्त्र को उड़ा दिया और इस के साथ घावों को प्यार से अपना स्पर्श दिया।

हाथी खुशी के आँसूऑ को रोक नहीं पाया। कहा “हे आदिकेशवा ! क्या मैं आपकी प्रशंसा में गाऊ? क्या मैं आपके उदारता और प्रेम की प्रशंसा करूं! या क्या मैं उस शीघ्रता को श्रद्धांजलि दूं जिससे आप मुझे अभय देने पहुंचे थे।

पराशर भट्टर कहते हैं, “भगवथस्थवरायै नमः” वे इस प्रकार शीग्रता को प्रणाम करते है जिसके साथ वे अपने भक्त, गजेन्द्र को अभय देने पहुंचे।

“ओह भगवान! आप जानते हैं कि आपको आदी क्यों संबोधित किया जाता है “?

अन्य देवताओं हालांकि वे आप की प्रशंसा करते हैं और फिर खुद को सर्वोच्च मानते हैं और निर्लज्ज, निरर्थक और व्यर्थ बोलते हैं।

ओह! आप कृपा और दया की वर्षा करते हो !! आप त्रिनेत्र शिव, ब्रह्मा, इंद्र और देवों द्वारा गौरवान्वित हो। इन देवों को आप केवल साधारण पुरस्कार प्रदान करते हैं। परंतु आप स्वयं को ऐसे लोगों को अर्पण करते हो जो आपको सर्वस्व मानते हैं। आपने मुझे स्वयं को उपहार में दिया है। यही कारण है कि आप अनाधि हो।

श्री पराशर भट्टर से मापित राय यह है कि गजेन्द्र रक्षक भगवान की यह विवरण (आनै काथ्थ कण्णन्) विष्णु सहस्रनम के छंद ९१२ से ९४५ में विस्तृत है।

ऐसा कहा जाता है (दृढ़ विश्वास के साथ) कि हम बुरे सपनों के कारण प्रतिकूल परिणामों से मुक्त होंगे, अगर हम अष्ठ भुज पेरुमाल पर मनन करेंगे जिसे गजेंद्र रक्षक (संरक्षण और शरण) भी कहा जाता है – जैसे हम सुबह उठते हैं। सहस्रनम भी सहमति देता है: “उधध आरणो दुष्क्रुथिह पुण्यो धुस्वप्न नासन:”।

व्यापक रूप से उनके लोकप्रिय नाम आदिकेशवन और गजेंद्र वरदन द्वारा जाने जाते है, अच्छा है कि आज तक वे हमारी अनुरक्षण के लिए अष्ठ भुज पेरुमाल के रूप में प्रस्तुत हैं।

ब्रह्मा वेल्वी के साथ चले गये।

परास्त काली अपने सिर को नीचे करके, सरस्वती के पास गई।

सरस्वती अगले आक्रमण के लिए तैयार थी।

जैसा कि सरस्वती अपनी अगली कदम प्रतिबिंबित करती हैं, हम भी अगले भाग की प्रतीक्षा करेंगे।

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthamwordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-11-3/

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अन्तिमोपाय निष्ठा – १० – श्री रामानुज के शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – ९ – श्री कलिवैरि दास (नम्पिळ्ळै) का वैभव २) में हमने नम्पिळ्ळै की दिव्य महिमा देखी। हम इस लेख में श्री रामानुज के विभिन्न शिष्यों के साथ घटित विभिन्न घटनाओं का क्रम जारी रहेगा।

एक बार श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के समय के दौरान, अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी) बीमार पड गये थे। उनकी रोगावस्था को जानकर भी श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेश स्वामीजी) तुरंत नहीं गए लेकिन चार दिनों के बाद उनसे मिलने के लिए गये और उनसे पूछा, “जब आप बीमार थे तो आपने स्वयं का प्रबंधन कैसे किया?” तब अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि) जवाब देते हैं “आपके और मेरे बींच की मित्रता के स्थर पर, मैंने सोचा था कि आप आएंगे और मुझसे मिलेंगे जैसे ही आपने मेरी बीमारी के बारे में सुना होगा, लेकिन आपने मुझे अनदेखा कर दिया है और इस कारण मुझे गहराई से चोट लगी है। जब तक मैं श्रीआळवन्दार् (यामुनाचार्य स्वामीजी) के पास नहीं जाता हूं और उनके चरणकमलों की पूजा नहीं करता तब तक यह ठीक नहीं होगा “। इस घटना को पोन्नौलागाळीरो (तिरुवाय्मोऴि ६.८.१) पासुर व्याख्या में स्पष्ट रूप से समझाया गया है। (अनुवादक टिपण्णीः यहां संदर्भ यह है की, पोन्नौलागाळीरो पदिग में, श्रीनम्माऴ्वार (श्रीशठकोप) एक पक्षी को दूत के रूप में एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) के पास भेजते हैं और उन्हें पूरा भरोसा है कि पक्षी एम्पेरुमान् (श्रीरंगनाथ) को अपने नियंत्रण में लेने में पूरी तरह से सक्षम है। लेकिन पक्षी तुरंत श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) की मदद नहीं कर रहा है। इसी प्रकार, अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (देवराज मुनि) यह जानकर की श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्री कूरेश) के पास एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) हैं, उनके नियंत्रण में और उन्हें तुरंत परमपद भी मिल सकता था लेकिन वह लंबे विलंब के बाद आए। इसलिए, वह कह रहे हैं, वह भावना केवल तब ठीक होगी जब वह परमपद तक पहुंच जाए और आळवन्दार् (यामुनाचार्य) के सामने झुक जाए जो पहले से ही परमपद में है)।

श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के परमपद पहुँचने के बाद कुछ समय तक श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) जीवित थे। लेकिन, अंत में वह भी परमपद पहुँच गये। एक श्रीवैष्णव भट्टर् के पास जाता है और उनहें बताता है “श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण) परमपद पहुँच गये”। भट्टर् जवाब देते हैं, “आपको श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) के लिए ऐसा नहीं कहना चाहिए”। श्रीवैष्णव पूछता है “क्यों नहीं? क्या हम नही कह सकते हैं कि वह परमपद पहुँच गये?”। भट्टर् ने स्पष्ट रूप से समझाया कि परमपद प्रपन्नों और उपासकों के लिए आम है (जो भक्ति योग से गुजरते हैं और अपने स्वयं के प्रयासों से परमात्मा प्राप्त करते हैं) – श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) का ध्यान / केंद्र-बिंदु ऐसा नहीं है। फिर, श्रीवैष्णव पूछता है “तो, क्या उनके मन में कुछ और जगह है?” और भट्टर् बताते हैं “हां। आपको कहना चाहिए कि श्रीवडुगनम्बि (श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी) एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमलों को प्राप्त हुए” – यह मेरे आचार्य (मामुनिगल् / श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा समझाया गया है। श्रीआळवन्दार् (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने स्तोत्र-रत्न की शुरुआत में घोषणा की “अत्र परत्रचापि नित्यम् यदीय चरणौ शरणम् मदीयम्” – संसार और परमपद में, मैं हमेशा नाथमुनि के कमल पैरों की सेवा करना चाहता हूं)। तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगनाथगुरु स्वामीजी) कहते हैं रामानुज-नूट्रन्दादि के ९५ वें पासुर “विण्णिन् तलै निन्ऱु वीडळिप्पान् एम्मिरामानुशन् मण्णिन् तलत्तुदित्तु मऱै नालुम् वलर्त्तनने” – परमपद से हमारे श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी जीवात्माओं को परमपद में कैङ्कर्य के अंतिम लक्ष्य का आशीर्वाद प्रदान करेंगे और जब वह इस संसार में प्रगट होंगे, उचित रूप से वेद शास्त्र स्थापित कर इस संसार के दोषों से मुक्त करेंगे)।

प्रज्ञ अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्रीदेवराजमुनि स्वामीजी), (श्रीकूरत्ताऴ्वान्) श्रीकूरेशस्वामीजी के सुपुत्र भट्टर् हैं, परमाचार्य आळवन्दार् (श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी), तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगनाथगुरु स्वामीजी) जो श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी), (श्रीकूरत्ताऴ्वान्) श्रीकूरेशस्वामीजी इत्यादि की दिव्य महिमाओं को आचार्य निष्ठा के माध्यम से पूरी तरह से प्रकाशित करते हैं । इस प्रकार यह स्थापित किया गया है कि आचार्य के चरणकमलों पर कुल निर्भरता जो संसार और परमपद में शिष्य के लिए अतुल्य स्वामी है, संसार और परमपद में भगवान् के चरणकमलों पर कुल निर्भरता से कहीं अधिक है, जो सभी के लिये बराबर कहा जाता है, जिसे जितन्ते स्तोत्र के रूप में कहा गया है “देवानाम् दानवाञ्च सामान्यम् अदिदैवतम्” – भगवान् सभी प्राणियों के लिए आम है)। यही कारण है कि मामुनिगल् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी ) ने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी की ओर भी प्रार्थना की, “मैं आपके चरणकमल कब प्राप्त करूं?”, “हे यतिराज! (श्री रामानुज!) कृपया मुझे हमेशा अपनी सेवा में खुशी से संलग्न करें”।

हमारे जीयर् निम्नलिखित घटना बताते हैं। एक बार श्रीवैष्णव प्रसाद खा रहा था और श्रीकिडाम्बि-आचान् (श्रीप्रणतार्तिहर) स्वामीजी उसे पीने के लिये पानी दे रहे थे। लेकिन इसे विपरीत दिशा से सीधे देने (सेवा करने) के बजाय, वह इसे बाजु से दे रहे थे और इसके कारण श्रीवैष्णव को पानी को स्वीकार करने के लिए अपनी गर्दन को थोड़ा झुकाना और मोड़ना पड़ा। उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) ने यह दृश्य देखा और तुरन्त श्रीकिडाम्बि आचान् (प्रणतार्तिहर) को उनके रीढ़ (पीठ) पर धक्का देकर बताते हैं की “हमें अत्यधिक देखभाल के साथ श्रीवैष्णव की सेवा करनी चाहिए”। यह सुनते ही श्रीकिडाम्बि-आचान् (श्रीप्रणतार्तिहर) स्वामीजी उत्साहित होकर कहते हैं, “आप मेरे दोषों को साफ़ कर रहे हैं और मुझे सेवा में और अधिक आकर्षक बना रहे हैं और मैं इस तरह की दया के लिए बहुत आभारी हूं” और उनका आभार व्यक्त करते हैं।

मणिक-माला (मानिक्क-मालै) में, पेरियवाचान्-पिळ्ळै स्वामीजी निम्नलिखित घटना की पहचान कराते हैं। एक बार, श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) के साथ परेशान हो जाते हैं। वहां मौजूद कुछ लोग श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) से पूछते हैं “अब श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) ने आपको धक्का दिया है, अब आप क्या सोच रहे हैं?” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) जवाब देते हैं “चूंकि मैं पूरी तरह से श्रीभाष्यकार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के अधीन हूं, वह जो भी करते हैं उसे मैं स्वीकार करूंगा – चिंता करने के लिए कुछ भी नहीं”।

निम्नलिखित घटना की पहचान वार्तामाला में की जाती है। पिळ्ळै-उऱङ्ग-विल्लि-दास (धनुर्दास) स्वामीजी एक बार श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि) स्वामीजीके पास जाते हैं, उनके चरणकमलों पर झुकते हैं और पूछते हैं, “एक शिष्य को अपने आचार्य की ओर कैसे होना चाहिए?” और श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि) कहते हैं, “आचार्य के लिए, शिष्य एक पत्नी, शरीर और एक गुण की तरह होना चाहिए – यानी, एक पत्नी जो भी पति उसे बताएगा वह करेगी, एक शरीर जो भी आत्मा चाहता है वह करेगा और वस्तु द्वारा पैदा किया जाएगा “। पिळ्ळै-उऱङ्ग-विल्लि-दास (धनुर्दास) स्वामीजी इसके बाद श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) के पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं, “अाचार्य को अपने शिष्य के प्रति कैसे होना चाहिए?” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) जवाब देते हैं, “शिष्य के लिए, आचार्य को पति, अात्मा और वस्तु को पसंद करना चाहिए – यानी, एक ऐसे पति की तरह जो पत्नी को सही तरीके से निर्देशित करता है, जैसे कि आत्मा, जो शरीर को नियंत्रित करता है और वह वस्तु जो गुण को धारण करता है” ।

एक बार, श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) और श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) के बीच दिव्य मामलों पर चर्चा हुई और एक विषय सामने आया “क्या हम स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य (एक आचार्य जो शिष्य को दिव्य ज्ञान से आशीर्वाद देने से पहले कई कठोर परीक्षणों में डालते हैं) द्वारा मोक्ष के अंतिम लक्ष्य का आशीर्वाद देते हैं या कृपामात्र प्रसन्नाचार्य (एक आचार्य जो शिष्य में शुद्ध इच्छा के आधार पर शिष्य को दैवीय ज्ञान का आशीर्वाद देता हैं)? “। श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) कहते हैं, “मोक्ष केवल स्वानुवृत्ति प्रसन्नाचार्य के माध्यम से है” और श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) कहते हैं, “मोक्ष कृपामात्र प्रसन्नाचार्य के माध्यम से है”। श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) का कहना है कि पेरियाऴ्वार (श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी) कहते हैं, “कुट्रमिन्ऱि गुणम् पेरुक्कि गुरुक्कळुक्कु अनुकूलराय्” – किसी को अपने दोषों को दूर करना चाहिए और अपने आचार्य के प्रति अनुकूल कार्य करना चाहिए), हमें ऐसा भी करना चाहिए। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) कहते हैं, “ऐसा नहीं है”, जैसा कि मधुरकवि आऴ्वार् कहते हैं, “पयनन्ऱागिलुम् पाङ्गल्लरागिलुम् शेयल् नन्ऱागत् तिरुत्तिप् पणिकोळ्वान् कुयिल् निन्ऱार् पोऴिल् शूऴ् कुरुगूर् नम्बि” – यहां तक ​​कि अगर हम योग्य नहीं हैं और पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं, तो उद्यानों से घिरे आऴ्वार-तिरुनगरि में रहने वाले श्रीनम्माळ्ळवार् (श्री शठकोप स्वामीजी) हमें शुद्ध करेंगे और हमें अपनी सेवा में संलग्न करेंगे) । हमें इसे अपने आप करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और इसके बजाय हमें मोक्ष के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आचार्य की दया पर निर्भर होना चाहिए। यह सुनकर कि श्रीमुदलियाण्डान् (श्रीदासरथि स्वामीजी) बहुत खुश थे। यह घटना मेरे आचार्य (मामुनिगल् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी)) द्वारा सुनाई गई थी।

श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दिव्य दया के द्वारा, एक कारण के रूप में किरुमिकण्डन् (क्रिमिकण्ठ शैवराजा) उद्धृत तिरुनारायणपुरम् कि यात्रा की। चूंकि मंदिर में कैङ्कर्य करने वाले इस वजह से पीड़ित थे, सोचते हैं, “हम केवल श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के कारण इन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, इसलिए कोई भी जो श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) से संबंधित है, मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए”, इस तरह के प्रभाव पर एक आदेश दिया गया था। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) हमारे सिद्धांत को स्थापित करने और किरुमिकण्डन् (क्रिमिकण्ठ शैवराजा) की सभा में जाकर स्वनेत्रों को सदा के लिए खो दिया और अंततः श्रीरंगम लौट आए। मंदिर में स्थिति को जाने बिना, वह पेरिय पेरुमाळ् (श्री रंगनाथ्) की पूजा करने जाते हैं और द्वार का रखवाला कूरताज़्ह्वान् (श्री कूरेश) को रोकता है। इसका अन्य साथी द्वारपाल श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) को मंदिर में प्रवेश करने को कहा। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) द्वारपालों के दो अलग-अलग विचारों को सुनकर आश्चर्यचकित हुए और उनसे पूछा, “यहां क्या हो रहा है?”। वे जवाब देते हैं “राजा का आदेश है कि मंदिर के अंदर जाने की अनुमति श्रीउडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) से संबंधित किसी भी व्यक्ति को नहीं है”। श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) पूछते हैं “लेकिन तुम मुझे क्यों अनुमति दे रहे हो?”। उन्होंने जवाब दिया “श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) ! दूसरों के विपरीत आप आत्म गुण संपन्न एवं निर्मल हृदय वाले हो, इसलिए हमने आपको मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दी”। यह सुनकर श्रीकूरत्ताऴ्वान् (श्रीकूरेशस्वामीजी) चौंक गये और पानी में एक चंद्रमा की तरह कांपना शुरू कर देते हैं। वह कुछ कदम पीछे चलते हैं और कहते हैं, “शास्त्र कहता है कि एक व्यक्ति आत्म गुण को अाचार्य संबंध (रिश्ते) का नेतृत्व करता है, लेकिन यहां मेरे मामले में, आत्म गुण एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के साथ अपने रिश्ते को गहरे दुःख के साथ छोड़ने के लिए अग्रणी हैं। वह आगे कहते हैं, “मेरे लिए, एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमल अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त हैं; मुझे एम्पेरुमानार् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) के रिश्ते को छोड़कर भगवान् की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है” और एम्पेरुमान् की पूजा किए बिना अपने तिरुमालि (निवास) लौट आते हैं। यह घटना हमारे जीयर् द्वारा सुनाई गई है।

तिरुविरुत्तम् व्याख्यान में समझाया गया है कि आळवन्दार् (श्रीयामुनाचार्य) पेहचानते हैं की एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दया से कारण, खुद श्रीनम्माळ्ळवार (श्री शठकोप स्वामीजी) के रूप में दिखाई दिये। अऴगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् (रम्यजामात्रुदेव स्वामीजी) अपने आचार्य-हृदय में भी आश्चर्य करते हैं कि क्या चतुर्थ वर्ण में प्रगट हुए श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) कलियुग के अवतार हैं अर्थात् इससे पिछले युगों (सत्, त्रेता, द्वापर) मे क्या वह ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य वर्णस्थ अत्रि, जमदग्नि, दशरथ, वसुदेव/नन्दगोपाल इत्यादि के पुत्र के रुप में प्रगट हुए। (अनुवादक की टिपण्णी ः श्रीनम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) की महिमा हर किसी को आश्चर्यचकित करती है कि क्या वह एम्पेरुमान् अर्थात् भगवान् के अवतार हैं, लेकिन वास्तव में हमारे पूर्वाचार्यों ने स्पष्ट रूप से समझाया की वह भगवान् के अवतार नही है। यहां संदर्भ यह है कि एम्पेरुमान् अर्थात् भगवान् यह दिखाने के लिए है कि वह स्वयं आचार्य पद को ग्रहण करना चाहता है क्योंकि यह वह सर्वोच्च स्थान है जिसपर जीव निर्भर कर सकता है)।

अनुवादक की टिपण्णीः इस प्रकार, हमने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के विभिन्न शिष्यों की निष्ठा और श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी में उनकी कुल निर्भरता का प्रकटीकरण को देखा।

जारी रहेगा………….

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ११ – १

सवोर्च्च भगवान  अष्ठ भुज, आयुध और कवच के साथ प्रकट हुए । वह ब्रह्मा और उनके यग्न को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पहुंचे थे।

अपने मुख पर एक मुस्कुराहट लेके उन्होंने काली और उसके सहयोगी, क्रूर असुरों को ललकार कर विरुद्ध किया। कुछ हि समय में, जीत और विजय से वे  विभूषित हुए। काली को भगा दिया गया था और असुरों का नाश कर दिया गया था।

ब्रह्मा के लिए, वे तत्क्षण पहुंचे और शीघ्रता से इस कार्य को पूरा किया जिसके लिए वह अपने इस रूप में आये हैं। क्या कृपा है? प्रसन्न होने से नहीं रोक सकते I

“पुम्साम ध्रुष्टि चित्तापहारिनाम” – उनकी उत्कृष्ट सुन्दरता ऐसा था कि यहां तक ​​कि पुरुष भी उन्हें देखकर स्त्री की भावना विकसित करेंगे I

“मेरे प्रति कितने उदार हैं! उन्होंने मेरी रक्षा के लिए अपने अष्ठ भुजायें सहित दौडे चले आये”।

उनके शरीर के सभी अंग ऐसे थे कि जैसे किसी एक अत्युत्तम चित्रकारी से लिया गया हो। यहां तक ​​कि मनमध भी उनकी बराबरी नहीं कर सकते हैं और वह उनके सामने कांतिहीन और फीके होके तुच्छ लगेंगे। उनके पास अविनाशी शाश्वत सौन्दर्य का आधिपत्य है। वह नित्य युवा (नित्य योवन) हैं और कई मात्रा में प्रशंसनीय है; प्रशंसा के सबसे श्रेष्ट शब्द भी अतिरंजित नहीं हो सकते हैं।

विशेषज्ञ, कुशल कलाकारों द्वारा प्रदान किए गए चित्र की भाँती, उनके पास कमल नेत्र, सुंदर शरीर और अष्ठ भुजायें है। अयन ने कहा, “वे मेरे हृदय में पूर्णत: बस गए हैं !!”

हम तिरुवरन्गक् कलमबकम में पिळ्ळैप् पेरुमाळ् अय्यंगार के वर्णन को याद कर सकते हैं। उनकी तिरुवरन्गन् की ओर अटल भक्ति थी। वह एक चित्र में तिरुवरंगनाथन को चित्रित करके अपनी इच्छा पूरी करना चाहते थे।

वह एक सुंदर चित्र था, अरंगन् का एक सटीक प्रतिरूप था। लेकिन पिळ्ळैप् पेरुमाळ् अय्यंगार खुश नहीं थे और विलाप करने लगे। चित्रकारी पूर्ण थी। दर्शकों ने यह भी राय दिया कि यह एक सटीक छवि थी। फिर अय्यंगार शोक क्यों थे!

कारण के लिए पूछा तो, उन्होंने कहा….

“वालुम मवुलित्तुलय मनामुम मगराकुल्लई तोय विलियरुलुम मलरन्ध पवलात तिरुनगैयुम मार्विलन्निंद मन्निच्छुदरुम तालुमुल्लरित तिरुनाबित तड़त्तुलाडन्गुम अनैत्तुयिरुम चरना कमलत्तुमैकेल्वन स्द्यिरपुनलुम कानेनाल अलमुडैय करूँगडलिन अगडू किलिय्च चुलित्तोडी अलैक्कुम कूड़क्कविरि नाप्पन्न ऐवायरविल तुयिलमुडै एलुपिरप्पिल अदियवरै एलुधाप पेरिय पेरुमानै एलुधवरिय पेरुमानेंर्रेन्नाधु एलुधियिरून्धेने!!”

“चित्र में, देखों कि तुलसी माला उनके शरीर को सुशोभित कर रही है। परंतु यह सुगंध व्यक्त नहीं कर रही है “।

भगवान के नेत्र लग रहे हैं कि वार्तालाप कर रहे हैं (इतना सजीव है), परंतु उपकार और उदारता का प्रवाह नहीं है। मैंने क्या भूल किया?

यह चित्र मुस्कराहट कि धारा नहीं दर्शाता है; हम उस भावना को प्रदान करने में विफल रहे हैं।

नीले रंग का रत्न चमक का विकिरण नहीं करता। हम यह उदर (पेट) को देख नहीं पा रहे हैं जिसमें सप्त लोक हैं, जो उनके द्वारा उदरित है।

दृढ़ विश्वास के साथ कि अरंगन के पवित्र चरण ही एक मात्र आश्रय हैं, भगवान शिव को यह पवित्र जल धारण करने का विशेष सम्मान मिला है जिसने अरंगन के चरणों को स्पर्श किया है। यह चित्र बहती गंगा को नहीं दर्शाता है, शिव के शीर्ष पर, जिसे वो जल कहा जाता है जो हरि के कमल चरणों को शुद्ध किया था।

वह भगवान जो अपने शय्या (पांच फनों वाला सर्प) पर विश्राम करते हैं, उन लोगों को मुक्ति प्रदान करते हैं जो उन्हें आत्मसमर्पण और शरणागति  प्रस्तुत करते हैं।

उन्हें “पेरिय पेरुमाल” के नाम से जाने जाते है। उनका सौंदर्य ऐसा है कि उस शोभा को पूरी तरह से चित्र में चित्रित नहीं किया जा सकता है।

मैं इस सत्य से विस्मरणशील हो गया और उनकी छवि की प्रतिलिपि बनाने का साहस किया। मैं कितना अज्ञानी रहा हूँ? इस प्रकार उन्होंने स्वयं को दोष दिये।

पिळ्ळैप् पेरुमाळ्पि अय्यंगार कि स्थिति उसी सामान थी जैसे ब्रह्मा का जब उन्होंने अष्ठ भुजाओं और शस्त्र के साथ भगवान का दर्शन पाया था।

“क्या मैं उनके मनोरम मुख को देखूँ या उनकी सुंदर नाक को जो कली समान है और कर्पग व्रुक्ष के अनुरूप हिस्सों को देखूँ? मैं नष्ट में हूँ! या मैं उनके सुंदर लाल अधरों को देखूँ?

मैं क्या प्रयास करूं? मैं क्या खोऊँगा?

“तिन्कैम्मा तुयर तिर्तवन, एन कैयानै एन मुन निर्पधे” – वोह जिन्होंने गजेंद्र, जिनने शक्तिशाली गज की रक्षा कि, वो भगवान मेरे सामने अष्ठ भुज के रूप में खडे हैं ” ब्रह्मा ने कहा।

गजेन्द्र पर कृपा वर्षा बरसाने वाले भगवान का इस वृत्तान्त के बारे में पुराण भी कहते है –

“स पिद्यमानो बलिना मकरेना गाजोत्तमा I प्रभेते चरणं देवं तत्रैव अष्टभुजम हरिम I I”

ब्रह्मा ने इन शब्दों से अराधना करना प्रारंभ किया “आप धर्मनिष्ठकों के लिए एक मात्र अंतरंग सहायक (विश्वासयोग्य संरक्षक) हैं।

आपका धर्माचरण गुणों की सूची अनंत है (प्रयास करना व्यर्थ है) I

“आदिकेशवन” से नामांकित होके आपने  मुझ जैसे आत्माओं की रक्षा का एक मात्र उद्देश्य से इस स्थान को शाश्वत निवास के रूप में चुना है “।

पुराण ने गजेंद्र के उद्धारकर्ता के रूप में यहां भगवान (अष्ट भुज पेरुमाल) को स्थापित किया गया है।

पेयाळवार (श्री महताह्वय स्वामीजी) के छंद (“तोट्टपडैयेट्टुम…..”) भी भगवान के इस गजेंद्र मोक्ष की कहानी का वर्णन करते हैं।

क्या आप जानते हैं कि बुरे सपनों के कारण डर से छुटकारा पाने के लिए, आश्रय गजेंद्र वरदन् दूसरा नाम ​​”अष्ट भुज पेरुमाल” है?

“वास्तव में?” .. यदि आप आश्चर्य होके पूछते हैं, इसी स्थिती में अगले भाग का स्वागत करते है।

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी के भाग 11-3 में, अष्ठ भुज पेरुमाल अहम् स्थान लेते है। यह उनके प्रति समर्पित है। भिजगिरी क्षेत्र, तिरुपारकडल क्षेत्र और तिरुवेक्का की महानता के साथ है। केवल तभी अत्तिगिरी अप्पन का आनंदमय वर्षा की झलक मिलेगी । पाठकों के धीरज और समर्थन  के लिए  धन्यवाद।

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अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १० – २

ब्रह्मा देवतओं के सर्वोच्च नेता को देखने के लिए तीव्र आग्रह के साथ तपस्या कर रहे थे! वशिष्ट, मारिची और समान रूप से महान विद्वानो के सात अपरिमित ज्ञानी यग्न में भागी थे I यज्ञ के वीक्षण के लिए बड़ी संख्या में जन एकत्र हुए थे।

ब्रह्मा ने यग्न में आने वाले निरंतर बाधाओं पर और कैसे भगवान् ने उन्हें तत्क्षण निष्फल किया उन पर विचार कर रहे थे। अनैच्छिक रूप से ब्रह्मा भगवान कि प्रशंसा कर रहे थे।

क्या उदारता के साथ भगवान, जो वेदांत के शोभायमान सार हैं, दीपक के प्रकाश के रूप में प्रकट हुए; बाद में नरसिम्ह के रूप में प्रकट हुए और असुरों का संहार किया! – ये शब्द हर किसी के मुंह में था।

ऐसा कहा जाता है कि महान कार्यों के लिए बहुत बाधाएं आएंगी; हाँ! हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि केवल अगर बाधाएं हैं, तो कार्य वास्तव में महान कार्य है।

एक साधारण, पवित्र कार्य में लौटने के दौरान हमें कितनी बाधाएं आती हैं? गलत, प्रयास किए जाने पर, खतरे के बिना संपन्न हो जाता है। तरीके कितने विचित्र हैं!

इन पर ध्यान देते हुए अयन का मन, इन विचारों में खो गया था। उन्होंने दृढ़ता से विश्वास किया कि वे और वेल्वी को इस समय भी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। परंतु वे चिंतित नहीं थे I

निकट में किसी ने अयन से प्रश्न किया “ब्रह्मा .. क्या अब भी समस्याएं जारी रहेंगी?”

ब्रह्मा ने उत्तर दिया “हां। निश्चित रूप से”।

ब्रह्मा से इस अनपेक्षित उत्तर ने प्रश्नकर्ता को स्तंभित और भयभीत कर दिया। उन्होंने ब्रह्मा को आंखें गाड़कर देखा, उसकी आंखों बाहर निकल जाएंगी ऐसा लगाI

एक काँपते हुए स्वर में, उन्होंने पूछताछ किया कि “अयन! क्या आप खतरे का सामना करने के लिए तैयार और सशस्त्र हैं? ”

“निश्चित रूप से नहीं!” अयन ने उत्तर दिया। “मुझे विश्वास नहीं है कि मेरे पास सरस्वती के क्रोध को पराजित करने की क्षमता है।”

इससे प्रश्नकर्ता और चकित हो गए I

अयन ने मुसकुराये और कहा “मैंने केवल इतना कहा कि मैं सुसज्जित नहीं हूं और व्यवस्था नहीं कर सकता परंतु यह नहीं कहाता कि यह भगवान की शक्ति और सुविधा से परे है। क्या हमें उन पर अविश्वास करना चाहिए, इतनी रक्षा करने के बाद भी? उन्होंने बार-बार प्रस्तुत किया हैI  उनके उत्तम मन में यह विचार है कि, कान्चि शहर में हर जगह अपनी उपस्थिति अनुभूत करना चाहते हैं, मुझे साधन के रूप में उपयोग करके I

मैंने यह अशरीरी की आवाज़ सुनने के उपरांत यग्न आरम्भ किया। आरंभ से बाधाएं आयी हैं परंतु वे उनके संरक्षण से ध्वस्त हो गये।

(हमें यह निरिक्षण आवश्यक है। अनेक बाधाएं आएंगी I यह अत्यावश्यक है कि हमें एक दृढ़ विश्वास रहे कि वोह हमारे साथ हैं और हमारी अनुरक्षण कर रहे हैं। वह हमें कभी नहीं त्यागेंगे)।

ब्रह्मा इन शब्दों को एक शांतचित्त होके बोले। “मेरी परिकल्पना इस विषय में है कि वोह आगे कैसे प्रकट होंगे और कैसे मैं उनके उद्भव के उपरांत अपना आभार व्यक्त करु I

दीपक के प्रकाश के रूप में और सिम्हेंद्र (सिंह के राजा) के रूप में आने के उपरांत अगला आलंकारिक अवतार क्या होगा – यही वह है जो मैं अब अनुमान लगा रहा हूं। ”

इस तरह से बात करते हुए सुनकर, वशिष्ट उतावले हो कर उनकी निष्ठा कि प्रशंसा करते हुए उनके पास पहुचे।

“आदरणीय ब्रह्मा! भगवान में आपके विश्वास और निष्ठा से निश्चित रूप से कल्याण होगा !! “आप के माध्यम से, हम भी उच्चता प्राप्त करेंगे।

वशिष्ट ने आगे बात जारी रखने का प्रयत्न किया, कि “सिवाय सरस्वती…..”। हाथों को जोड़ कर, ब्रह्मा ने वशिष्ट को रोक दिया I

जब कोई विचलित और क्रोधित हो तो बुद्धि पीछे हो जाती है। लेकिन इस स्तिथि में, बुद्धि (बुद्धी – सरस्वती) खुद क्रोधित हैं। वह निश्चित रूप से शांति से विश्राम नहीं करेंगी। परंतु भयभीत न होना I श्री हरि ध्यान रखेंगे “।

ब्रह्मा के इस संभाषण को सुनने पर, सभी भावनाओं से अभिभूत थे और परमन (सर्वोच्च व्यक्ति) की प्रशंसा में गाये थे।

उधर सरस्वती नदी तट पर , सरस्वती असुरों के साथ विचार-विमर्श में व्यस्त थी। चैंपरासुर और कई अन्य राक्षस ने प्रयत्न किया परंतु यग्न में बाधा डालने में विफल रहे। अचानक कलै अरसि (कला और ज्ञान की देवी) के मन में कुछ चमक उठा, और उन्होंने काली का नाम उच्चारित किया।

काली सरस्वती के सामने उपस्थित हुई। ज्ञान कि शोभायमान अध्यक्ष ने आदेश दिया “काली। आप तत्क्षण प्रस्थान करो। लोगों का समूह लेके उस स्थान पर जाएं जहां ब्रह्मा यग्न की व्यवस्था कर रहे है I

कई आसुरों के साथ, काली तत्क्षण प्रस्थान किया।

वह तपस्या स्थल पहुंची, एक भयंकर हंसी से, जिसमें रक्त से रंगें हुए दांत बाहर की ओर लटकते हुए, आंखें आग प्रज्वलित करते हुए, कई शास्त्रों के साथ क्रूर लग रही थीं। सभी निराश थे।

लेकिन एकमात्र ब्रह्मा हाथों को जोड़कर मुस्कुराते हुए काली के विपरीत दिशा में देख रहे थे।

इस अवसर पर, भगवान् विपत्तियों के आगमन के उपरांत नहीं उभरे, किन्तु काली स्वयं को दिखाने से एक पल पहले।

यह वही थे जिनकी ब्रह्मा ध्यान कर रहे थे।

आंखें प्रतिभाशाली चित्रकारों द्वारा खींचे गए कमल जैसे थी, सबकुछ – उसकी ऊपरी भुजाएँ, मुंह उत्तम और समुचित थी। सभी व्यापक रूप से विभाजित होंठ से चकित थे। वह कौन थे?

क्या हम जानने के लिए प्रतीक्षा करें…?

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १० – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १० – १

मुकुंध नायकन वेलुकै के भगवान का शीर्षक है, जो सिंह और मनुष्य का मिश्रण है। मुकुंद का अर्थ है कि जो सांसारिक जीवन की व्याधी (रोग) से मुक्त होने के लिए मोक्ष या मुक्ति प्रदान करते हैं (संसार)। वह सर्वरोगहारी, अमृत, उपाय है।

हिरन्य वध के उपरांत, भगवान ने  विश्राम करने के लिए जगह की तलाश की। यह जगह (तिरुवेळ् इरुकै) उनकी रुचि और पसंद थी। यही कारण है कि वे आज भी यहां स्थित हैं।

नरसिम्ह अवतार…..

उन्होंने यह भूमिका धारण किया था प्रहलाध (असुर पुत्र) को अभय देने के लिए । ब्रह्मा ने वर प्रदान (हिरन्य को) किया था। भगवान ब्रह्मा के शब्दों को सम्मान देना चाहते थे और सिर्फ इस कारण, वह स्तंभ से उभरे और हिरन्य का वध किया।

उन्होंने क्या व्याकुलता और चिंता प्रदर्शित किया कि ब्रह्मा के शब्द झूठा और असफल प्रदर्शित न हो!

उनके अवतारों को समझने के लिए कई कारणों की प्रस्तुती की गयी है। कृष्ण ने स्वयं गीता में सूची दिए हैं कि “साधु की रक्षा करने के लिए, दुष्ट का नाश करने, धर्म परिरक्षण और पोषण करने (सत्यनिष्ठा और धर्म)”, वह धरती पर उतरते हैं। यह उनके मुख से निकले शब्द हैं।

धर्म स्थापना क्या है?

अगर हम यह जानना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले समझना होगा कि धर्म क्या है।

श्री पराशर भट्टर के अनुसार, धर्म एक नैतिक सदगुण / सदाचार है, धार्मिक और उत्कृष्टता है।

इस कारण से  लगता है कि वह अपने असंख्य गुणों का अनावरण करने के लिए अवतार लेते हैं।

“अजायमान: बहुध विजायते” – वेद घोषित करते है I अर्थात, “वोह अजन्मा, कई तरीकों से पैदा हुआ है”। (“वे अजन्म है, कई तरीकों में जन्में हुए”) I

हम अपने कर्म (भाग्य और कर्म) के परिणाम स्वरूप जन्म लेते है। हम से भिन्न, वह कर्म परिणाम स्वरुप से नहीं जन्म लेते हैं। फिर भी वह स्वयं कि इच्छा से और हमारे प्रति प्रेम और चिंता के कारण जन्म लेते है।

“इच्छा गृहीतोपिमधोर देह:” –  विष्णु पुराण के अनुसार, प्रत्येक अवतार का अर्थ उनके गुणों में से एक को प्रकट करने के लिए है I

(साधारणता से हम हर अवतार में उनकी सभी गुणों को देख सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से उनकी अनूठी विशेषताओं में से एक, एक अवतार में विशिष्ट रूप से प्रकाशित होती है)

नरसिम्ह अवतार में, उनके सर्वव्यापी पन (हर जगह मौजूद, भीतर और बाहर, कोई शून्य नहीं छोड़कर) प्रदर्शित किया गया है।

वह उपनाम “अन्तर्यामी” द्वारा भी जाने जाते हैं। वह हमारे भीतर रहते हैं और हमारे कार्यों को नियंत्रित  और क्रियात्मका रूप में लाते है।

वेद भी पुष्टि करता है “अंतर बहिश्च तथा सर्वम व्याप्य नारायण स्तिता:” –  वह पूरी जगह में फैले हुए है, अन्तर्गत और अतिरिक्त, सर्व व्यापि होके ।

यह अनूठी विशेषता हमें नरसिम्हावतार में प्रबुद्ध होता हैं। प्रहलाद ने भगवान की विशेषता और इस पहलू को “तून्नीलम इरुप्पान तुरुम्बिलुम इरुप्पान” के रूप में घोषित किया (वे स्तम्भ के भीतर रहते है एक क्षुद्र अंश में भी ) – यह इतनी सरलता से दिया गया है कि एक बालक को भी सुस्पष्ट होगा I

आळवार इस विचार की पुष्टि करते हुए कहते है कि “एन्गुमुलान कन्ननेरा मगनायक कायन्तु” –  अत्याचारी के पुत्र ने प्रमाणित किया कि किर्ष्ण हर जगह हैंI

हमारी अवधारणा से परे सिंहपेरुमाल की महिमा नहीं है?

वेलुकै आलरि (नर – सिंह सम्मिश्रण ) जो वेल्वी का रक्षा के किये आये थे ब्रह्मा को भी सुरक्षित करदिया असुरों का संहार करके I

ब्रह्मा ने अपनी तपस्या जारी रखी।

सरस्वती, अपमानित और असुरों द्वारा दूषित एक और योजना की कल्पना की। वह योजना क्या थी?

खोजने के लिए प्रतीक्षा करें …

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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