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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३२

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३१)

६६) दर्शन (सम्प्रदाय) विरोधी – तत्वज्ञान समझने में बाधाएं
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श्रीरामानुज – श्रीभूतपूरी

सम्प्रदाय का अर्थ है, एक धर्म के दार्शनिक पक्ष। हमारे धर्म को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय कहते हैं। क्योंकि श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस धर्म का पोषण किया और सभी जगह प्रतिष्ठित किया इसलिये इसे श्रीरामानुज सम्प्रदाय के नाम से भी जानते है। इस धर्म का मुख्य तत्व है- भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ अर्चावतार हैं और उनके समान या उनसे श्रेष्ठ और कोई नहीं हैं। यह धर्म परम वेदों पर आधारित है। यह धर्म इस तत्व का परिणाम है कि वेद नित्य और दोषरहित हैं। इस धर्म के अनुयायियों को यह समझना चाहिये कि आल्वारों पर स्वयं भगवान की पूर्ण कृपा थी और उनके दिव्य प्रबन्ध वेदों के समान है। उन्हें दिव्य प्रबन्ध में भी अच्छी जानकारी होनी चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: आगे बढ़ने से पहिले हम हमारे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के बारें में एक प्रस्तावना देखेंगे।

हमारे सत सम्प्रदाय का नाम “श्रीरामानुज सम्प्रदाय” स्वयं भगवान श्रीरंगनाथ ने ही दिया है – यह “उपदेश रत्नमालै” में    ने भी स्पष्ट दर्शाया है। इस सम्प्रदाय को उभय वेदान्त सम्प्रदाय भी कहकर बुलाते हैं। संस्कृत में वेद हैं जिन्हें वेदान्त, स्मृति, इतिहास, पुराण, पञ्चरत्न, आदि का समर्थन प्राप्त हैं। वेद को नित्य, अपौरुषेयम (किसी व्यक्ति द्वारा न रचित – भगवान द्वारा भी नहीं, यह केवल भगवान द्वारा नियत समय में प्रगट होते हैं), निर्दोष (दोषरहित), आदि से भी जाना जाता है। फिर द्राविड वेद है (आल्वारों द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबन्ध पाठ) जिन्हें हमारे पूर्वाचार्यों के व्याख्या का समर्थन प्राप्त है। हालाँकि आल्वारों ने दिव्य प्रबन्ध की रचना की है हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते हैं कि यह भी नित्य है और भगवान इन्हें निरन्तर प्रगट करते हैं। अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार इस तत्व को अपने “आचार्य हृदयम” नामक ग्रन्थ में समझाते हैं। क्योंकि दिव्यप्रबन्ध वेद और वेदान्त के तत्वों को दर्शाते हैं – हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़े आदर के साथ इनकी स्तुति की है और सम्प्रदाय का श्रेष्ठ प्रमाण माना हैं।

संस्कृत वेद और द्राविड वेद दोनों में श्रीमन्नारायण को ही श्रेष्ठ भगवान ऐसा सिद्ध किया है। श्रीमन्नारायण भगवान के दो प्रमुख गुण हैं – सभी पवित्र गुणों से परिपुर्ण और अपवित्र गुणों के बिल्कुल विरुद्ध है। उनकी स्तुति उभय विभूति (नित्य विभूति और लीला विभूति के स्वामी) नाथ ऐसे भी कि गयी है। श्रीमन्नारायण भगवान में कुछ ऐसे भी अद्भुत गुण देखे गये हैं जो और किसी में नहीं देखे जाते हैं – श्रिय: पतित्वम (श्रीमहालक्ष्मीजी के पति), अनन्तसायित्वम (जो शेषशैय्या में शयन किये हैं), गरुडवाहनत्वम (वह जो गरुडजी की सवारी करते हैं), आदि। इसमें श्रिय: पतित्वम मुख्य गुण हैं – श्रीभक्तिसार स्वामीजी अपने पाशुर में यह घोषित करते हैं कि “तिरुविल्लात तेवरैत् तेरेन्मिन तेवु” – वह जो श्रीमहालक्ष्मी से सम्बंधित नहीं हैं, मैं उन्हें भगवान नहीं मानूँगा। वेद कहते हैं “श्रद्धया देवो देवत्वमश्नुते ” –  श्रीमहालक्ष्मीजी से सम्बन्ध होने के कारण ही भगवान श्रीमन्नारायण को श्रेष्ठता / धार्मिकता प्राप्त है। श्रीमन्नारायण भगवान को पुष्प और श्रीमहालक्ष्मीजी को सुगन्ध ऐसा समझाया गया है। इसलिये किसी भी देवता को श्रेष्ठ और सच्चा भगवान नहीं मान सकते हैं क्योंकि शास्त्रानुसार भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ भगवान हैं।

भगवान श्रीमन्नारायण सभी स्थिति में प्रवेश करते है – दोनों स्थिति चित्त और अचित्त। वे अन्तरयामी हैं – सभी के अंत: में उपस्थित। सभी देवताओं को भी भगवान श्रीमन्नारायण ने जीवात्मा की अनुकम्पा के लिये स्थापित किया है जो इन गुणों (सत्व, रजो, तामस) के आधार पर देवता को चुनते हैं। अगर यह देवता न हो तो वें पूरी तरह नास्तिक हो जायेंगे और इस संसार चक्र में भटकते रहेंगे। कम से कम इन देवताओ के समक्ष जाने से वैदिक धर्म के प्रति कुछ विश्वास आयेगा और वें धीरे धीरे ऊपर के चेतना की ओर बढ़ेंगे। अत: इस संसार में देवतान्तर भगवान कि आज्ञा पालन के लिये है, जीवात्मा को सही मार्ग कि ओर ले जाते हैं ताकि वें अन्त में भगवान श्रीमन्नारायण की ओर जा सके। परन्तु देवतान्तर स्वयं विवश जीवात्मा है और अपने स्थान से घबड़ा जाते हैं और कभी कभी भगवान को ललकार देते हैं। इसलिये श्रीवैष्णव कभी भी उनकी पूजा नहीं करते हैं। क्योंकि श्रीवैष्णव सत्व गुण वाले हैं और देवतान्तर सत्व, रजस और तमो गुणों के मिश्रण के हैं – शास्त्र कहता है सत्व गुण निष्ठावाले को रजस और तामस गुणवालों की पूजा नहीं करना चाहिये।

यह हमारे सत सम्प्रदाय के तत्वों का संक्षिप्त में परिचय है। इस परिचय के साथ इस भाग में हम आगे बढ़ते हैं।

  • देवता जैसे ब्रह्मा, रुद्र, आदि की श्रेष्ठता पर शंका करना, त्रिमूर्ति साम्यम (ब्रह्मा, विष्णु और शिव को समान मानना) पर शंका करना, यह शंका करना कि ब्रह्मा, रुद्र, आदि की पूजा कर सकते हैं क्यों कि वे श्रीमन्नारायण के दास हैं बाधा हैं। सामान्यता ३ देवताओं को विशेषकर दर्शाया जाता है – ब्रह्माजी उत्पत्ति के लिये, पोषण के लिये श्रीविष्णु और विनाश के लिये शिवजी। फिर भी तीनों में श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं जो स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण है। ब्रह्माजी और शिवजी दोनों को भगवान श्रीमन्नारायण ने ही उत्पन्न किया है और वे दोनों उत्पत्ति और विनाश का कैंकर्य भगवान श्रीमन्नारायण की आज्ञा से करते हैं। इन दोनों की कभी भी भगवान विष्णु से श्रेष्ठ देवता ऐसी तुलना नहीं करनी चाहिये। हालाँकि तीनों को त्रीमूर्ति कहते हैं परंतु समान नहीं हैं। जैसे श्रीभक्तिसार स्वामीजी नांमुगन तिरुवंदादि में कहते है “नान्मुगनै नारायणन पडैत्तान नान्मुगनुम तान मुगमायच्चङ्करनैत्तान पडैत्तान” – भगवान श्रीमन्नारायण ब्रह्मा को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माजी शंकरजी को जन्म देते हैं – इससे हम यह समझ सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण जो सभी कारणों के कारण हैं वे ही सर्वश्रेष्ठ परमात्मा हैं। दोनों ब्रह्मा और शिव जीवात्मा हैं जो एक पद पर हैं और एक समय पूरा होने पर प्राण त्याग कर देते है जैसे सामान्य मनुष्य त्याग करते है। क्या एक श्रीवैष्णव यह विचार कर सकता है कि ब्रह्मा/शिव दोनों पूजनीय हैं क्योंकि भगवान श्रीमन्नारायण उनके अन्तरयामी है और वे भी अपनी भक्ति समय समय पर भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति प्रगट करते हैं? उत्तर -नहीं। क्युंकि उनके रजो और तमो गुणों के कारण और उनमें जो अभिमान है उन्होंने स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण का विरोध कर उनसे युद्ध भी किया है। इसलिये वे श्रीवैष्णवों द्वारा पूजने के योग्य नहीं हैं। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुवन्दादि में ७२वें पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इस तत्व को समझाते हैं। “मुदलाम तिरुवुरुवम मून्रेन्बर ओन्रे मुदल आगुम मून्रूक्कुम एन्बर मुदल्वा निगर इलगु कार उरुवा! निन अगत्तदन्रे पुगर इलगु तामरैयिन पू” – कुछ्लोग कहते हैं कि वे तीनों देवता श्रेष्ठ हैं; दूसरे कहते हैं इन्हें छोड़ इनसे भी श्रेष्ठ एक और देवता है; है श्रेष्ठ कारणों के कारण जिनके पास सुन्दर मेघ के समान पवित्र रामवर्ण रूप है! आपकी पवित्र नाभ कमल पुष्प की जड़ है (जहां से ब्रह्माजी का जन्म हुआ – जो भगवान श्रीमन्नारायण के श्रेष्ठता को स्थापित करता है)। यही तत्व श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी “श्रीरंगराज स्तव” पूर्व शतकम के ११६वें श्लोक में समझाते हैं। इन संकेतों से हम यह समझ सकते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण हीं सभी के लिये श्रेष्ठ कारण हैं। श्रीवैष्णवों को केवल भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्तों की ही पूजा करनी चाहिये। उनके भक्त का अर्थ है वह जो उनके प्रति विश्वास रखता हो और जिसमें स्पष्ट रूप से रजो तमो गुण न हो। एक बात हमें स्पष्ट रूप से समझना चाहिये कि ब्रह्मा, रुद्र, आदि जो उत्पत्ति, विनाश, आदि के स्वामी हैं एक विशेष पद के लिये ही हैं। जीवात्मा अपने कर्मानुसार उस दशा को प्राप्त करता है – जिसने कठोर तपस्या किया हो वह ब्रह्म, शिव, आदि का जन्म प्राप्त करता है। परन्तु विष्णु ऐसा कोई पद है हीं नहीं – वह स्वयं ही भगवान श्रीमन्नारायण हैं। श्रीरंगराज स्तव पूर्व शतकम के ५२वें श्लोक में श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी समझाते हैं कि अपनी निर्हेतुक कृपा से भगवान श्रीमन्नारायण इस संसार में अवतार लेते हैं और अपने आपको दोनों देवता के मध्य में रखते हैं। हालाँकि ब्रह्माजी, शिवजी, आदि ने यह समझ लिया है कि भगवान श्रीमन्नारायण के कारण ही उन्हें इस संसार में यह उच्च पद प्राप्त हुआ है। पर उन्हें अभिमान भी हुआ और वे अपने सच्चे स्वभाव को भूल गये हैं। इस परिस्थिति में वें स्वयं भगवान से ही विरोध कर लेते हैं। कृष्णावतार में ब्रह्माजी भगवान की गायों को चुरा लेते हैं और फिर भगवान कृष्ण उन्हें सबक सिखाते हैं। कठोर चेतावनी के पश्चात ही ब्रह्माजी को अपनी गलती का अहसास होता है और भगवान से क्षमा की भीख माँगते हैं। उसी तरह शिवजी भी बाणासुर की रक्षा हेतु भगवान कृष्ण से लड़ाई कर बैठे। अन्त में उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ और भगवान कृष्ण की स्तुति किये। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भगवद अपचार के विषय में विस्तार से समझाए हैं। इसमें सबसे पहली गलती यह है कि इन देवतान्तरों को भगवान श्रीमन्नारायण के समान मानना। अत: थोड़ा भी यह संशय होना कि यह देवतान्तर भगवान श्रीमन्नारायण के समान हैं यह बाधा है। अत: श्रीवैष्णवों को यह पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि भगवान श्रीमन्नारायण ही श्रेष्ठ हैं।
  • बाह्य (जो वेद को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते) और कुदृष्टियों (जो वेद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं परन्तु अपने अनुकूल व्याख्या करते हैं) जैसे बौद्ध, शैव, मायावादी, आदि के समझाने और तत्वों से अस्त व्यस्त (भ्रमित) होना बाधा है। बुद्ध के अनुयायी को बौद्ध कहते हैं। जैन भी थोड़े उनके जैसे हैं। यह दोनों पूर्णत: वेद की महानता का तिरस्कार करते हैं। शैव पशुपत ऐसे जाने जाते हैं और शिवजी को श्रेष्ठ मानते हैं। उनके लिये शैव आगम परम है। मायावादी वे हैं जो सम्पूर्ण उत्पत्ति को माया मानते हैं और केवल ब्रह्म ही सत्य है और ऐसे ब्रह्म का कोई नाम, आकार, गुण, आदि नहीं होता है। हमें यह समझना चाहिये कि ये तत्व व्यर्थ हैं और इन तत्वों से दूर रहना चाहिये। तिरुमालै के ७वें पाशुर में श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी कहते हैं “पुलै अरम आगि निन्र पुत्तोडुशमणम एल्लाम कलै अरक्कट मांदर काण्बरो केटपरो ताम” – जब कोई वेद शास्त्र का ज्ञानी हो तो क्या वह दूसरे तर्क शास्त्र जैसे बौद्ध, जैन, आदि का अभ्यास करेगा? अनुवादक टिप्पणी: हालाँकि हम यह देखते हैं कि बौद्ध गौतम बुद्ध से सम्बंधित है (जो इतिहासकारों के अनुसार २५०० वर्ष पुराना है), व्यास मुनि ने स्वयं यह स्थापित किया कि वेद ही बौद्ध, जैन, आदि धर्म से श्रेष्ठ हैं। यह समझाया गया है कि भगवान स्वयं जो बुद्ध का अवतार लेकर असुर जो वेदों में सुशिक्षीत हैं उनके धर्म को नीचा दिखाते हैं। उन्हें भ्रमित करने हेतु उन्हें शून्यवाद सिखाया और उनका शास्त्र में विश्वास पराजित किया। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर के लिये ईडु व्याख्या में विस्तार से समझाते हैं – “कल्ल वेदत्तै कोंणडु पोय…”। इस पाशुर में बुद्ध को रामवर्णवाला सुन्दर और बलवान शरीरवाला, लम्बे कान और हाथों में ग्रन्थ ऐसी कल्पना की गई है। उनका रूप इतना सुन्दर है कि सभी जन वे जो कहेंगे उस पर विश्वास कर लेंगे। वे अहिंसा ही उच्च तत्व ऐसा कहते हैं और लोग आसानी से उनके और उनके तत्व के प्रति प्रेम आदर भाव रखते है। इस तरह उन्होंने असुरों का धोखे से वेदों के प्रति विश्वास कम किया और अन्त में उन्हें मार दिया। यहाँ एक बहुत मुख्य विषय को समझना है। हालाँकि बौद्ध तत्व का उपदेश भी स्वयं भगवान ने ही दिया परन्तु वेदों ने उन तत्वों को स्वीकार नहीं किया (यह समझकर कि वे दूसरों के लिये है)। अगर भगवान भी वेदों के विरुद्ध कुछ कहते हैं तो भी महान सन्त उसे अस्वीकार कर देते हैं। “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार यह दर्शाते है, श्रीसहस्रागीति जो तमिल भाषा में हैं उसकी स्तुति करने हेतु इस विषय को समझाते हैं। वे कहते हैं कि अगर केवल भाषा के आधार पर हमें कोई साहित्य को स्वीकार करना हो तो हमें बौद्ध साहित्य को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वह संस्कृत में है और स्वयं भगवान द्वारा इसका प्रयोग किया गया है। क्योंकि यह वेद के विपरित है इसलिये महान वेदों के तत्व ज्ञानियों ने इसे अस्वीकार किया है।
  • सामान्य शास्त्र (वर्णाश्रम धर्म) पर केन्द्रीत होना और विशेष शास्त्र (वैष्णव धर्म) को नजर अंदाज करना बाधा है। सामान्य शास्त्र अर्थात दैनिक जीवन के लिये सामान्य दिशा निर्देश। इसका भी पालन करना आवश्यक है। परन्तु इससे भी अधिक कुछ और है जिसे विशेष शास्त्र कहते हैं। विशेष धर्मानुसार भगवद/भागवत कैंकर्य ही सर्वोंपरी हैं। यही अन्तिम लक्ष्य हैं। जो भगवान को उपाय और उपेय मानता है, जो भगवान के ही शरण होता है और जिसकी उत्पत्ति केवल भगवान के आनन्द के लिये हुई हो उसे परमैकान्तिक कहते हैं। ऐसे महान जन, सामान्य धर्म का पालन पवित्र हृदय के साथ करते हैं और इस समझ के साथ कि वे भी भगवदाराधन का एक हिस्सा बन सकें जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुपडि में समझाते हैं कि “कर्मम कैंकर्यत्तिल पुगुम”। यह हो सकता है कि विशेष धर्म का पालन करते समय सामान्य धर्म को त्याग करें या उसे बाद में भी कर सकते हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि भगवद / भागवत कैंकर्य करते समय सामान्य धर्म का पालन को बाद में / छोड़ कर करना कोई पाप नहीं है। “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार (और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में) यह दर्शाते हैं कि विल्लीपुत्तुर पगवर (एक तपस्वी) एक बार घाट पर स्नान के लिये गये। कुछ ब्राह्मणों (बिना भागवत धर्म को समझे जो केवल वर्णाश्रम पर केन्द्रीत थे) को देखकर वह घाट से बाहर आकर कहने लगा “आप केवल वर्ण धर्मी हो परन्तु हम तो भगवान के दास हैं। हम किसी से आसानी से नहीं घुल मिल सकते हैं”। इस विषय में जो हमारे पूर्वाचार्यों ने पालन किया है हमें उसका ही पालन करना चाहिये। यद्यपि वर्णाश्रम धर्म का पालन न करना पाप है लेकिन जब हम विशेष धर्म का कैंकर्य कर रहे हो वर्णाश्रम धर्म को बाद में करना / छोड़ना कोई पाप नहीं है।
  • केवल बाह्य स्वरुप, आभूषण और वैष्णव दास नाम होना और भागवतों का अपचार करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से इस तत्व को १९९ और २०० सूत्र में समझाते हैं। वह “आरुड पतितन” – उन्नत स्थान से गिरना – इस पद का प्रयोग कर समझाते हैं। एक भागवत होना अर्थात एक उच्च स्थान पर पहुँचना। परन्तु उच्च स्थान पर पहुँचकर भागवत अपचार करना अर्थात उस उच्च स्थान से नीचे गिरना है। अगर हम ऊपर से गिरेंगे तो हमें अधिक चोट लगेगी। इसलिये हमें कभी भी भागवतों से मधुर शब्दों से बात करनी चाहिये।
  • सच्चे आचार्य की शरणागति को स्वीकार न करना बाधा है। हमें एक सच्चे आचार्य के शरण होना चाहिये और वैष्णव बनने हेतु उनसे पञ्च संस्कार ग्रहण करना चाहिये। समाश्रयण स्वीकार करना साधारण संस्कार जो होते है उनसे रुकता नहीं है। जैसे श्रीसहस्रगीति में बताया गया है “चंथंगल आयिरमुम अरियक कर्रु वल्लार वैत्ट्टणवर” जिसने श्रीसहस्रगीति का अध्ययन किया हो, जिसने उसके अर्थ को सही समझा हो और उसे अपने दैनिक जीवन में अनुकरण करता हो वही सच्चा श्रीवैष्णव होने योग्य है। अनुवादक टिप्पणी: कई जन पञ्च संस्कार को अन्तिम या लक्ष्य मानते हैं। परन्तु यह वैष्णव यात्रा का प्रारम्भ है। हमें पूर्ण निष्ठा से आचार्य के समर्पित होना, पूरे तत्वों को सीखना और एक श्रीवैष्णव जैसे आचरण करना चाहिये। अगर कोई पञ्च संस्कार ग्रहण कर संसारी जैसे जीवन व्यतित करता है तो पञ्च संस्कार स्वीकार करना व्यर्थ है। यहाँ आचार्य का कार्य सर्व मुख्य हैं। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी आचार्य का वैभव अन्त में समझाते हैं। वे आचार्य के माध्यम से भगवान को पाने का उद्देश इस अंश में बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं।
  • श्रीवैष्णव लक्षण न होना बाधा है। श्रीवैष्णव लक्षणम में दो पहलू हैं – बाह्य और आंतरिक। बाह्य – भुजाओं पर शंख चक्र धारण करना, १२ स्थान पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, तुलसी / कमल की माला और प्राकृतिक बदलाव जैसे रोमांच, नेत्रों में आँसु, आदि, जो निरन्तर भगवद / भागवत अनुभव में लगने से होता है। आंतरीक – पवित्र हृदय होना, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, दूसरों के लिये दर्द, सभी के लिये अच्छा सोचना, आदि। दोनों मुख्य हैं।
  • द्वयाधिकारी (द्वय महा मन्त्र के योग्य पुरुष) न होना बाधा है। नाच्चियार तिरुमोझी में श्रीगोदम्बाजी कहती है “मेय्म्मैप पेरु वार्त्तै विष्णुचित्तर केट्टिरुप्पर” – श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी चरम श्लोक को पूरी तरह समझे हैं (भगवद्गीता के ६६वें श्लोक – सर्व धर्मान …) और उसका पालन करते हैं। जैसे कहा गया है हमें रहस्य त्रय (तिरुमन्त्र, द्वयम, चरम श्लोक) को समझना चाहिये और विश्वास से पालन करना चाहिये। इन तीनों में क्योंकि द्वय महा मन्त्र की स्तुति मन्त्र रत्न ऐसी होती है उस पर अधिक प्रभाव होता है। शरणागति गद्य में श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगनाथ भगवान यह निर्देश देते हैं कि “द्वयम अर्थानुसंधानेन सह यावच्चरिरपादम अथरैव श्रीरंगे सुकमास्व” – द्वय महामन्त्र का निरन्तर अर्थानुसन्धान करने से आप श्रीरंगम में आनन्द से रह सकेंगे। द्वय महामन्त्र का अर्थ पूर्णत: श्रीसहस्रागीति में प्रगट किया गया है। आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने २१०वें चूर्णिकै में “द्वयार्थम धीर्ग शरणागति एंरथु सार संग्रहत्तिले” दर्शाया है – यह श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित सार संग्रह में स्थापित हो गया है कि श्रीसहस्रागीति द्वय महामन्त्र का अर्थ समझाता है। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुपड्डी में द्वय प्रकाशन के प्रारम्भ में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी पहले सूत्र में ही श्रीवैष्णव के गुण को विस्तार से समझाते हैं। अगले कुछ सूत्रों में द्वय महामन्त्र को समझाने से पहले ऐसे श्रीवैष्णवों के गुण को सुन्दरता से समझाया गया है। श्री शैलेश स्वामीजी के निर्देशानुसार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीभाष्य का एक बार अध्यन करते हैं और अपना पूर्ण जीवन श्रीसहस्रागीति (जो द्वय महामन्त्र के पवित्र अर्थों से भरा है) के प्रचार में लगा देते हैं। यद्यपि वे वेदान्तम में निपुण थे, वे वेदान्त को आल्वारों के मधुर शब्दों से समझाते थे। श्रीएरुम्बी अप्पा स्वामीजी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या में यह दर्शाते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का अनुसन्धान करते हैं और उनका मन पूर्णत: निरन्तर द्वय महामन्त्र का सुन्दर अर्थानुसन्धान करता है।
  • दिव्य प्रबन्ध में शामिल न होना बाधा है। श्रीवैष्णवों की विशेषतः उभय वेदान्त ऐसी स्तुति होती है। श्रीसहस्रागीति को तमिल वेद कहा गया है और अन्य दिव्य प्रबन्धों को अंग/उपांग कहा गया है। यह सब संस्कृत वेद और स्मृति, इतिहास और पुराण जैसे अच्छे विशेषज्ञ हैं। हमें एक आचार्य से दिव्य प्रबन्ध को अर्थ सहित सीखना चाहिये और उसमें समझाये हुए तत्वों पर चलना चाहिये। यह हमें वैष्णव कहलाने की पूर्ण योग्यता प्रदान करता है। अनुवादक टिप्पणी: इसे श्रीसहस्रागीति के आधार पर पहले ही समझाया गया है “चंथंगल आयिरमुम अरियक कर्रु वल्लार वैट्टणवर”। वार्तामाला में श्रीपेरियावाचन पिल्लै एक सुन्दर बात बताते है। वे कहते हैं “मुलैगलिलैयान युवतियैप्पोले काणुम, उमैयल्लात वैष्णवन अरुलिच्चेयलिले अंवयियाथोलिगै” – यदि एक श्रीवैष्णव गूंगा नहीं है और दिव्य प्रबन्ध, आदि का गान नहीं करता है वह ऐसा ही है जैसे बिना स्तन की एक लड़की। जैसे बिना स्तन की लड़की, लड़की होने की योग्य नहीं है वैसे ही एक श्रीवैष्णव बिना दिव्य प्रबन्ध पठन के एक श्रीवैष्णव होने के योग्य नहीं है।
  • रहस्य ग्रन्थों और उनके मुख्य तत्वों में सही शिक्षा न मिलना बाधा है। तत्व अर्थात चित्त, अचित्त और ईश्वर को अच्छी तरह समझना। रहस्य ग्रन्थ गोपनीय साहित्य हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय मे इन तत्वों को मुखाग्र पढ़ाया / प्रचारित किया जाता था। परन्तु श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी जो स्वयं देव पेरुमाल (श्रीवरदराज भगवान) के अपरावतार हैं इन सभी को १८ ग्रन्थों में लिखकर रखे जिन्हें अष्ठादश रहस्य ग्रन्थ से जाना जाने लगा। अनुवादक टिप्पणी: हमें सत सम्प्रदाय के अंतरंग महत्त्वपूर्ण तत्वों में सही तरीके से शिक्षित होना चाहिये। यहाँ “शिक्षयी” शब्द का प्रयोग हुआ है। शिक्षयी का अर्थ केवल पढ़ना लिखना नहीं हैं। इसका अर्थ “पूर्ण सुधार या कठोर सुधार” – अगर शिष्य कोई तत्व नहीं समझता है तो उस शिष्य को समझे ऐसे आचार्य उस तत्व को समझाना चाहिये और शिष्य को उसका पालन कर उसका लाभ भी लेना चाहिये।
  • शिष्टाचार में विश्वास न रखना और उसका पालन न करना बाधा है। शिष्टाचार का अर्थ अपने बड़ों की आदते। “धर्मग्य समयम प्रमाणम वेदास च” जिसका अर्थ “महान जन जो शास्त्र पढ़े हैं उनकी आदतों का पालन करना आधिकारिक है, वेद भी आधिकारिक है” – यह एक स्थापित वाक्य है। तिरुप्पावै के २६वें पाशुर में श्रीआण्डाल कहती हैं “मेलैयार शेय्वनहल्” – वह जो पूर्वजों द्वारा अभ्यास किया गया है। वह दूसरे पाशुर में भी कहती हैं कि “चेय्यातन चेय्योम” – हम वह नहीं करेंगे जो हमारे पूर्वजों ने नहीं किया है। हमें अपने पूर्वजों के अनुष्ठान में पूर्ण विश्वास होना चाहिये।  अनुवादक टिप्पणी: यहाँ एक मुख्य तत्व को समझना चाहिये। श्रीएरुम्बी अप्पा अपने “विलक्ष्ण मोक्ष अधिकारी निर्णय” में इस मुख्य तत्व को स्थापित करते हैं। वें दर्शाते हैं कि “पूर्वज” का अर्थ “पूर्वाचार्य” है और हमें अपने पूर्वाचार्यों के पत (मार्ग) पर चलना चाहिये। कभी कभी हम देखते हैं कि कुछ गलत चलन (प्रथायें) जैसे देवतान्तर, व्रत करना, सांसारिक सुख के लिये पूजा करना या दुखों का निवारण, आदि में श्रीवैष्णवों के परिवार भी उलझे हैं। एक बार सही आचार्य से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात ऐसे विषम दस्तूर को उसी क्षण छोड़ देना चाहिये क्योंकि यह हमारे परिवार में कई परिस्थितियों में आगयी होगी जैसे अज्ञान। हम हर बार यह नहीं कह सकते कि हमारे पूर्वज इसका पालन करते थे।
  • ज्ञान, भक्ति और वैराग्य न होना बाधा है। यहाँ ज्ञान का अर्थ है अर्थ पञ्चक का ज्ञान। हमें परमात्मा और जीवात्मा के स्वभाव और उनके मध्य में सम्बन्ध को समझना चाहिये अर्थात स्वामी–दास भाव, उपाय, पुरुषार्थ और बाधाएं जो हमें हमारे लक्ष्य को पाने में बाधक हैं। भक्ति का अर्थ भगवान के प्रति दृढ़ निष्ठा। वैराग्य का अर्थ त्याग। हमें देवतान्तर के प्रति लगाव से बचना चाहिये। और हमें विषयान्तर से भी दूर रहना चाहिये। विषयान्तर का अर्थ जो भगवद भागवत विषय से बाहर हो। स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान द्वारा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्तुति में जो तनियन प्रस्तुत किया है “धीभक्त्यादि गुणार्णवम” वह महत्त्वपूर्ण है। यहाँ धी का अर्थ ज्ञान, भक्ति का अर्थ पूजा है और आदि वैराग्य को दर्शाता है। श्रीरंगनाथ भगवान कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ऐसे सुन्दर अद्भुत गुणों के समुद्र हैं।
  • एक अच्छे शिक्षित श्रीवैष्णव के चरणों में शरण न लेना बाधा है। हमें एक आचार्य के शरण होना चाहिये जो शिष्य को गोपनीय बातों का भी निर्देश देंगे। भागवतों को भी अच्छा आचार्य माना गया है। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इनके शरण होने से हमारा उद्धार होगा। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी अपने अन्तिम दिनों में ६ उपदेश देते हैं – हमें श्रीभाष्य सीखना और सिखाना चाहिये। अगर यह न हो सके तो दिव्य प्रबन्ध को सीखना और सिखाना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो दिव्य देशों में कैंकर्य करना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो तिरुनारायणपुरम में एक तिरुमाली बनाकरा वहीं पर निवास करना चाहिये। अगर यह भी न हो सके तो निरन्तर द्वय महामन्त्र का अर्थानुसन्धान करना चाहिये। और अगर यह भी न हो सके तो हमें एक श्रीवैष्णव की शरण हो जाना चाहिये और उनकी पूर्णत: देख रेख करना चाहिये। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यदि कोई किसी श्रीवैष्णव की शरण में जाता है तो वह पूर्व में दर्शाये गये पाँच उपदेशों में अपने आप ही स्थित हो जाता है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसी विषय को मुमुक्षुप्पड़ी के ११६वें सूत्र में श्रीवैष्णव लक्षणम को समझाते समय कहते है। वे इस सूत्र में १० विषय पहचानते हैं। ६ विषय है “इप्पडि इरुक्कुम श्रीवैष्णवर्गल एर्ट्रमरिण्तु उगंतिरुक्कैयुम” – श्रीवैष्णव जिनके पास ऐसे सुन्दर अद्भुत गुण है उनके स्तुति को समझना और उनके प्रति बड़ी भक्ति और आदर रखना। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं इस गुण को प्राप्त करना बड़ा कठिन है। यहाँ दसवें विषय में यह ज़ोर देकर कहा गया है कि हमें ऐसे श्रीवैष्णवों की संगत में रहना चाहिये जो शान्त चित्त व शांति से परिपूर्ण हो। इस तरह हम हमेशा श्रीवैष्णवों के संगत का महत्त्व समझ सकते हैं और उनका मार्ग दर्शन पा सकें।
  • जो श्रीरामानुज सम्प्रदाय से वैर करें उनसे मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कृपाहीन जनों से मित्रता करने से बचना चाहिये। ऐसी मित्रता हमारे मन पर तीव्र धक्का पहूंचाता है और हमें नीचे गिरा देता है। सभी सांसारिक पदार्थ में ऐसी शक्ति होती है – जब हम सांसारिक कार्य की ओर बढ़ते है तो हम आध्यात्मिक वस्तु से दूर हो जाते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १५ – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १५ – १

ब्रह्मा ने भगवान् से प्रार्थना की कि ईश्वरीय रूप से थिरु अथ्थिगिरी (तिरु अत्तिगिरि) में स्थायी रूप से रहें जो प्रकाश के रूप में खड़ा हो, जो भक्तों द्वारा पूजित हो। और भगवान के मुंह से यह शब्द निकले कि “तो यही हो” …

ब्रह्मा भी काँची में स्थिर रहने की अभिलाषा करते थे। “आरावमुधु” का यह आनंद और स्वाद लेने के बाद, (अनंत सुधा, अमृत) आनंद लेने के बाद, सत्यलोक वापस जाने के लिए अनिच्छुक थे ।

उन्होंने वेळमलई के भगवान को अपनी इच्छा व्यक्त की कि “निथ्यम निरपरादेशु कैंकर्येशु नियङ्गश्व माम” – उन्हें यहां स्वयं काँची के देव पेरुमाळ् के चरणों में सेवा करने की आज्ञा दे दीजिये।

परंतु भगवान ने अन्य रूप में सोचा “चतुर्मुख! मैं आपकी भक्ति का अभिवादन करता हूं। परंतु (याद रखों) आप मेरे निर्णय द्वारा ब्रह्मा पद पर आसीन हो और तदनुसार अपने कर्तव्यों को कार्यान्वित कर रहे हो। सत्यलोक के लोग आपकी अनुपस्थिति के कारण आपको याद कर रहे हैं और वे उत्सुकता से आपकी वापसी का इंतजार कर रहे हैं। यह मेरी इच्छा है कि आप वहां जाए। मै हमेशा के लिए आपके पवित्र, निश्कल्क मन में बसा रहूँगा । भय भीत न हो। शीघ्रता से आप अपने लोंक पहुंचें।

मैं वेल्वी (वेळ्वि) के दौरान आपके आचरण और प्रेम से प्रसन्न हूँ। आपने देवतओं के बजाय हविर्बागस सीधे मुझे अर्पण की। दु:खी, देवतओं ने आपको इसके बारे में पूछा तो आपका उत्तर स्वर्णाक्षरों (अत्यधिक प्रशंसा योग्य) में मुद्रित करने योग्य है।

रीति के अनुसार अलग-अलग देवताओं को हविर्भागम (हविर का आहार) अर्पण की जाती है। परंतु अक्सर यह याग क्षुद्र प्रतिफल और आनंद के उद्देश्य से किये जा रहे हैं। परंतु यह याग किसी भी पुरस्कार या प्रतिफल के लक्ष्य से नहीं था। यह उनकी अराधना करना था जो पुरस्कारों को पुरस्कृत करता है। तो आपने सीधे सर्वोच्च भगवान् को हैविस अर्पण करने का प्रयास किया और आपने ऐसा हि किया।

मैं आपके संकल्प का अभिवादन करता हूँ और आपको शुभकामना देता हूं” वरदराज भगवान् ने कहा।

चतुर्मुख (ब्रह्मा) ने याद किया कि पेररुराल ने क्या कहा था। उन्होंने उल्लेख किया था कि आने वाले दिनों में उनके पास काँची में पूरा करने के लिए कुछ कार्य थे। विवरण जानने के लिए उत्सुक, ब्रह्मा ने हरि से पूछा।

“सुनो” भगवान् ने कहना प्रारंभ किया “यह पहले युग में, क्रुत युग, आपने मेरी पूजा की। इसी प्रकार, अगले युग, त्रेता युग में, गजेंद्र प्रार्थना करेंगे।

ध्वापर युग में, ब्रुहस्पाती जिसे पहले आपने शाप दिया था और कुछ अन्य शापों से भी पीड़ित, मुझे प्रार्थना करने के लिए यहां आएगा (पाठक ब्रह्मा और ब्रुस्पाथी के बीच आपसी शाप का आदान-प्रदान याद करें)।

कलियुग में आदिशेष प्रार्थना अर्पण करेंगे।

निरंतर मैं यहां अथ्थिगिरी (अत्तिगिरि)  में मामनिवन्नन के रूप में स्थित रहूंगा, जो पवित्र सनातन धर्म को स्थायी रखने के लिए अनुग्रह और लाभ प्रदान करता रहूँगा, साधु संरक्षण करता रहूँगा । ऋषि भृगु की पुत्री पेरुन्देवी के साथ परिणय करूंगा । जैसा कि पेरुन्देवी मनालन (पति), कलि युग वरदराज भगवान् के रूप में, सही राह की मार्गदर्शक के रूप में, भक्तों के लिए सुलभ रूप से प्राप्त करने योग्य, मैं यहां स्थित होके सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करता करूँगा।

मणवाल मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि) ने भी प्रस्तुत किया है

“अत्यापि सर्वभूतानाम अभिष्ट पल ध्यायिने I प्राणतार्ति हरायास्तु प्रभवे मम मंगलाम II”

– उस नेता के प्रति मैं अभिनंदन करता हूँ जो अब भी सभी आंखों का लक्ष्य बने हए है, जो उदारता से अनुग्रह प्रदान करके भक्तों को दुःखों से विमुक्त करते हैं।

मैं आपको विशिष्ट उत्सव (पवित्र अनुष्ठान कार्य), ब्रह्मोत्सव को अनोखे रीति से प्रशासित करता हूं, जो मेरे लिए तीर्तवारी (पवित्र स्नान) में समाप्त होता है (हस्त दिवस – चैत्र मॉस में जन्म हुआ)।

यह श्रवन नक्षत्र के दिन वैशाख महीने में मनाया जाएगा।

ब्रह्मा ने सम्मति दिया कि वे आदेशानुसार कार्य करेंगे।

वह एक उपयुक्त विधि से उत्सव को संपन्न करने के बाद अपने लोक वापस प्रस्थान कर गये।

वारदराज भगवान् ने अपने मन में विवेचन किया।

मैंने ब्रह्मा को सूचित किया है कि आदिशेष कलीयुग में मेरी अराधना करेंगे । मेरे अलावा और किसे पता होगा कि मेरे पास और कौन सी योजनाओं है।

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के पवित्र सिद्धांत को पोषित करने के लिए, नम्माळ्ळवार (श्री शठकोप स्वामीजी) को “मयर्वरा माधिनलम” (मन और ज्ञान इस संसार के काले बादलों से मुक्त) से धन्य किया जाना होगा । मुझे अपने गरुड़ सेव की प्रशंसा में भूदत्ताळ्ळवार (श्री भूत योगी स्वामीजी) के गीत को सुनकर आनंद लेना है। मुझे तिरुमंगै आळ्ळवार (श्री परकाल स्वामीजी) को ऐश्वर्य और धन दान देना है ताकि वे चोळ राजा के कारागार में दिन काटना न पड़े “वाडिनेन वाडि” (पेरिय तिरुमोली १-१-१)।

मुझे आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) को मार्गदर्शन करना है जो मुझे सम्मानित करेगा, फिर मेरे रामानुज – भूतपुरीसर्, यतिराजा (साधुओं के राजा) को आमुधलवन (सर्वप्रथम और सबसे प्रमुख) के रूप में पहचाने जायेंगे।

मुझे पेरुन्देवी के साथ मिलकर मेरे बच्चे रामानुज को विन्ध्या पर्वत के जंगल से रक्षा करना है। मुझे अपना मन संतुष्ट होने तकरामानुज द्वारा सालैक् किणरु (सड़क के किनारे का एक कुवा) से लाया गया मीठा पानी पीना है I

मुझे थिरुक्कछि नंबि से कितना बात करना है, आवश्यक रूप से रामानुज के लिए छह शब्द है। और मैं तिरुक्कच्चि नंबी (श्री कान्ची पूर्ण स्वामीजी) के अलवट्टम (हाथ से चलाने वाला पंका) कि हवा का आनंद लेने का इंतजार कर रहा हूं।

मुझे रामानुज को अरैयर के साथ श्रीरंगम भेजना है। मुझे कुरेश दुवार गाया हुआ वरदराज स्तवम् को सुनने का आनंद लेना है। मुझे नडातुर् अम्माळ् द्वारा अर्पित किया गए दूध पीना है। मैं पिल्लैलोकाचार्य के रूप में जन्म लूँगा और अष्टादश रहस्य को प्रदान करूंगा। श्री भाश्य और ईडू पोषित किया जायेगा। मुझे वेन्कटेश घण्टा के अवतार वेदान्त देसिक पर कृपा वर्षा करना है जो आत्मा रूप में अपना हर एक सांस और जीवन मेरे साथ रहेंगे।

महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिदिन उभय वेदांत (संस्कृत और तमिल में वेदांत) सुनके आनंद लेना है। यह इस जगह के लिए अद्वितीय होना चाहिए, कहीं और अभ्यास नहीं किया जाना चाहिए।

मुझे प्रसिद्धि “अरुलिच्चेयल पिथ्थन ” आर्जित करना है  (जो दिव्य प्रबंध पसंद करता हो)

यदि मुझे यह सारी शोभा हो तो क्या मै नज़र ( नज़र का प्रभाव) से पीड़ित नहीं होंगा? यह अच्छा होगा यदि अगर कोई महान चित वाला एक दयालु व्यक्ति मंगालासनम (इस दृष्टी कि बुराई को दूर करने के लिए) गाता है तो।

मनवाळ मामुनि (श्री वरवरमुनि स्वामीजी), जिसे विशतवाक् शिकामणि के रूप में सम्मानित किया जाता है, श्लोकों को चिंता और लगाव के साथ मंगलाशासन के रूप में व्याख्यान करेंगे । मुझे वह श्रवण करना है।

मुझे “सम्प्रदायप्पेरुमल” (भगवान् जो पवित्र रीती रिवाज़ का ध्यान रखते हैं) का नाम आर्जित करना है, पीररुलालन ने मनन किया I

मेरे भीतर इतनी सारी इच्छाएं हैं I

उन्होंने क्रुथ युग में योजना बनाई और यह संपत्ति उनकों कलि युग में मिला।

वरदराज भगवान् के यह अद्वितीय उपकारी है। ववरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी अन्य सभी कहानियों के लिए बीज है। हम इसे पढ़ने का मौका पाने के लिए भाग्यशाली हैं।

“हम दुनिया में अतुलनीय हैं” हम हमेशा ये कहेंगे !!!

समाप्त

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १५ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १४ – ३

अथ्थिगिरी के बेदाग़ भगवान, अयन को देखकर बोले….

“मेरे पुत्र, ब्रह्मा! आपने कुछ परीक्षणों और विपत्तियों (आपके इस प्रयत्न में) का सामना किया है, परंतू इस बात से अनजान हो कि आपने सफलतापूर्वक याग संपन्न किया और उपयुक्त रूप से भी किया है। आपका अविश्वसनीय मन और दृढ़ संकल्प ने मुझे प्रसन्न किया है। मुझसे मांगो आप कौन सा वरदान मांगना चाहते हो। मैं प्रदान करने के लिए तैयार हूँ।

“वरं वरय तस्मात् त्वं यताभिमतं आत्मनः I
सर्वम सम्पथ्स्यते पुम्साम मयी दृष्टिपधम कते”

“अब मैंने स्वयं मनुष्यों को दृष्टिगोचरित हो रहा हूँ। उनके लिए भी सब लाभदायक होगा। मुझसे पूछो,  मिल जाएगा”, भगवान ने कहा।

भगवान करिगिरी कण्णन् को देखते हुए, उनके सामने कमल के निवासी, एक विनम्र स्वर में सर्वोच्च भगवान से बात की। “स्वामी! यह वास्तव में दुर्लभ है कि सौभाग्य स्वयं ही पूछ रहा है कि किस सौभाग्य की मांग करना है।

मुझे विश्वास नहीं है कि मैंने अपने प्रयास के माध्यम से कुछ हासिल किया है। आपके दयालु सहायता और समर्थन के अलावा मेरे पास कोई शरण नहीं है। यह स्पष्ट रूप से सच है।

ओह श्रेष्ठ हस्ती (पेरुमाल)! केवल ऊंचे आत्माओं (महात्मा) जैसे अनंत, गरुड़, विष्वक्सेन जैसे प्रतिभासंपन्न को ही आपके रूप को देखने का भाग्य है। अब मुझे यह भाग्य का आशीर्वाद मिला है। क्या कोई वरदान है जो इसके अतिरिक्त लाभकारी हो ?

मेरी स्थिति या अस्तित्व क्षणिक है। आपकी सृष्टि में पर्याप्त मात्रा में ग्रह समूह (ब्रह्माण्ड) होते है। और वहां, कई ब्रह्मा भी होते होंगे, कौन जानता है?

इस समय मैं आपकी कृपा से उन ब्रह्माण्डों में से एक में एक सत्य लोक में एक ब्रह्मा हुआ। इन सब ब्रह्मा के संख्या को गिनना कठिन है, जो अब तक ब्रह्मा के पद में हैं, क्योंकि यह गंगा नदि में रेत के टुकड़ों की संख्या या इंद्र के बारिश में बूंदों कि संख्या को गिनना जैसा है I

मेरे नेत्रों ने अमृत (आपकी दर्शन) का स्वाद चका है, कुछ और नहीं मांगना – “एन्नामुधिनैक कन्नदा कन्न्गल मर्रोंरिनैक कनाधु”

मेरा आपसे  केवल एक निवेदन है! आप इस स्थान (काँची) को सुशोभित करें और आने वाले सभी समय के लिए यही पर रहे।

“वैकुंटे तु यता लोके यधैव क्षीर सागरे I
तता सत्यव्रत क्षेत्रे निवासस्ते भवेधिहII

हस्तिशैलस्य शिखरे सर्व लोक नमस्कृते I पुन्यकोटि विमानेस्मिन पस्यन्तु त्वं नरास सधा II ”

आपके प्रशंसनीय, इष्ट स्थानों में वैकुंट और क्षीरसागर है, यहां इस सत्यव्रत क्षेत्र में भी, इस तिरु अथ्थिगिरी में पुण्य कोटी विमान पे भी दृष्टि प्रदान करें जिसकी वजह से लोग प्रार्थना कर सकें और किसी भी समय पूजा कर सकें।

“मेरे दयालु भगवान (माँ की तरह)! यही मैं प्रार्थना करता हूं ” ब्रह्मा ने याचिका दायर की।

भगवान भी सहमत हुए “ब्रह्मा! मैं आश्वासन देता हूं कि मैं यहां हमेशा के लिए स्थित रहूंगा ताकि सभी मेरा दर्शन प्राप्त कर सकें।

क्या तुम खुश हो? मैंने पहले युग में तुम्हारे नेत्रों को दर्शन दिया था और आने वाले युगों में मुझे पूरा करने के लिए कई और कार्य हैं।

“मै सूची सुनाताहूँ सुनो ” भगवान ने कहा।

विषय सूची जानने के लिए, हम अगले भाग में प्रवेश करेंगे …

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १४ – ३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १४ -२

उदारचरित और शानदार पेररुराळन् (वरदराज भगवान्) ब्रह्मा की श्रद्धा और भक्ति को स्वीकार करते हुए एक मुस्कुराहट दिया था। ब्रह्मा ने भी भगवान की उदारता और करुणा पर विचारमग्न होके नमस्कार किया।

“हे भगवान! आमुधल्वा (सर्वप्रथम और सर्वाधिक)! यह पुनः साबित हो गया है कि एकमात्र आप ही उनका मार्गदर्शन और अगुवाई करते हो जो आप में विश्वास रकते हैं।

आप अद्वितीय हैं I आपकी शक्ति स्वतंत्र हैं। आपके कोषागार में अपने भक्तों के लिए कितना प्रेम है? ओ भक्ति वत्सला! (जो भक्तों की संरक्षण करता है) मैं भ्रुहस्पति के अभिशाप और सरस्वती के क्रोध से बिखर गया था। मैं बिना अस्तित्व के रह्जाता अगर आप अपना कृपा वर्षा मेरे ऊपर  नहीं बरसायी होती तो।

आप अशरीरि के रूप में आए; मुझे सथ्यवृथ क्षेत्र जाने का आदेश दिया; मुझे कांची दिखाया; यग्न के लिए यह पर्वत धन्धावल गिरी उपहार में दिया;

आपने सरस्वती और असुरों द्वारा किये गए भंग प्रयासों को नष्ट कर दिया; जब चम्पासुर से खतरा आया, तो आप दीपक (विल्लक्कोलिप्पेरुमालl) के रूप में आये; जब बाधा डालने असुर का समूह आया, तो आपने खुद को नरसिम्ह (वेलुक्कई आल्लरी) के रूप में दर्शाये। जब सरस्वती ने काली और असुरस को नियोजित किया, तो आपने स्वयं को अष्टभुज पेरुमाल् (भगवान) के रूप में प्रकट किया। आपने दुष्टता को नष्ट कर दिया।

आपने खुद को शयनेषण (पल्लिकोंडान में) के रूप में दर्शन दिया। आप थिरुपर्कडल (तिरुपारकड्ल) में रांगनाथ के रूप में दर्शन दिए। आपने वेह्कनैप्पेरुमाल के रूप में अपना आशीर्वाद कि वर्षा की।

अब इस पल में, अग्नि के बीच में खड़े होके मुस्कुराते हुए अपनी कृपा की वर्षा बरसा रहे हो।

आपके प्रेम और धर्माचरण कि सम्पूर्ण प्रशंसा कौन कर सकता है? चार वेद , अगर वे खोज करें, आपकी स्थिति का पता लगाने में असफल होंगे । जब मैं आपको देखने अपने प्रयासों में विफल रहा, निराश्रय होके खड़ा था, आप अपनी स्वतंत्र इच्छा से ही  मेरी आंखों के सामने दर्शन दिए।

वेद इस संसार के लिए नेत्र हैं; और आप उस नेत्र के केंद्र बिंदु हैं। क्या कृपवार्षा करने में आपकी कोई बराबरी कर सकता है? आप महासागर समान हो I आपके पूर्ण रूप को कौन देख सकता है? जल के सामान आप इस संसार की रक्षा करते हो। भूमि फिर भी उन लोगों का भोज उठा लेता है जो पृथ्वी का दुरुपयोग करते हैं। आप हमारे दोष और दुष्कर्मो को सहन करने में धरती सामान हो (भुमी)।

यदि हम आपके गुणों की विवेचन करने कि साहस करते हैं, तो हम इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होते हैं कि आपके जैसे कोई अन्य नहीं है।

आपका वर्ण नील मेघ का है; आप है गज राज के उद्धारक!

मेरे प्यारे कान्हा !!

क्या मैं आपकी प्रशंसा कर रहा हूं या क्या मैं बकवास कर रहा हूं?

मुझे पता नहीं है। मैं पूरी तरह से अज्ञानी हूँ।

मैं आप से पर्वत करिगिरि पे मिला था। आपका दर्शन के उसी पल में मेरे दुःख पूरी तरह से नष्ट हो गये जैसा मैंने महसूस किया है।.

मैं भाग्यशाली हूँ।  भावनात्मक होक ब्रह्मा ने कहा, “मैं कृपापात्र हूँ,”।

““कान्तगु तोळण्णल् तेन्नत्तियूरर् कण्णन्”” (वह, जिनके भुजायें हैं जो नेत्रों के लिए एक पर्व हैं) – अत्तिगिरि के भगवान, वरदराज भगवान् मुस्कुराये। उनके हस्त संकेत दिया कि “भयभीत न हो”। उन्होंने  ब्रह्मा से बात करना शुरू किया।

उन्होंने क्या कहा?…

हम प्रतीक्षा करें ..

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

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अन्तिमोपाय निष्ठा – १२ – आचार्य भगवान् के अवतार हैं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

<< एम्बार और अन्य शिष्य

पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – ११ – एम्बार और अन्य शिष्य) में हमने एम्बार के दिव्य दृष्टिकोण और कुछ अन्य घटनाओं को देखा। इस लेख में, यह स्थापित किया गया है कि आचार्य भगवान् के अवतार हैं और उन्हें केवल इसी तरह माना जाना चाहिए।

पुरुषार्थ (एक जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य) चार प्रकार का है यथा

  1. साक्षात्कार – भगवान् की दिव्य दृष्टि (दिमाग में) – यह एक विशेष प्रकार का ज्ञान है जहां हम समझते हैं कि भगवान् कौन है।
  2. विभूति साक्षात्कार – भगवान् की दिव्य दृष्टि उनके भौतिक अभिव्यक्ति के साथ – यह वह स्तिथि है जहां हम विशेष प्रकार के ज्ञान के माध्यम से वास्तविक बाधा (इस भौतिक शरीर और भौतिक संसार) को समझते हैं।
  3. उभय विभूति साक्षात्कार – भगवान् की दिव्य दृष्टि उनके आध्यात्मिक और भौतिक अभिव्यक्तियों के साथ – यह वह स्तिथि है जहां हम विशेष प्रकार के ज्ञान के माध्यम से कैङ्कर्यों के वास्तविक लक्ष्य को समझते हैं।
  4. प्रत्यक्ष साक्षात्कार – भगवान् की दिव्य दृष्टि हमारी आंखों के माध्यम से – यह वह स्तिथि है जहां हम निम्नलिखित का एहसास करते हैं
    • प्रक्रिया और लक्ष्य एक ही है, यानी, दोनों ही एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ / भगवान्) हैं
    • भगवान् का कैङ्कर्य (प्रेमपूर्णभावनामृत सेवा करना) अंतिम लक्ष्य है और
    • जो कुछ भी हम करते हैं, उपाय (प्रक्रिया) भी केवल कैङ्कर्य है

भले ही पहले ३ को पुरुषार्थ (अंतिम लक्ष्य) का हिस्सा माना जाता है, जब तक हम प्रत्यक्ष साक्षात्कार प्राप्त नहीं करते हैं, अन्य ३ किसी वास्तविक उपयोग के नहीं हैं। केवल हम अंतिम लक्ष्य को सीधे देखते हैं, अन्य ३ पूरा नहीं होते हैं।

भगवान् के निम्नलिखित ६ रूपों में प्रत्यक्ष दृष्टि को पूरा किया जा सकता हैः

  1. परत्व – परमपद में भगवान का दिव्य रूप – यह निथ्यों और मुक्तों के लिए है।
  2. व्यूह – भगवान् का दिव्य रूप क्षीराब्दि में – यह सनक, आदि के लिए है (ब्रह्मा के ४ पुत्र जो उनके दिमाग से पैदा हुए थे), देवों आदि।
  3. विभव – भागवान् के अवतार जैसे श्री राम, कृष्ण, इत्यादि – वे उन लोगों के लिए हैं जो श्री राम, कृष्ण, आदि जैसे दशरथ, वासुदेव, नंद गोपाल आदि के समय दौरान रहते थे।
  4. अन्तर्यामित्व – भागवान् प्रत्येक इकाई में स्थायी रूप से उपस्थित है – यह रूप योगियों और उपासकों के लिए है।
  5. अर्चावतार – मंदिरों, मठ और घरों में भगवान् का रूप – यह हर किसी के लिए है।
  6. आचार्यत्व – भगवान के रूप में ज्ञान प्रदान करने के रूप में आचार्य – यह उन लोगों के लिए है जिनके पास कोई अन्य शरण नहीं है।

इनमें से, पहले ४ की उपगम्यता इन सीमाओं के कारण (नहीं पहुंचा जा सकता) नहीं हैं अर्थात् उपगम्यता इन बिन्दुओं पर आधारित है

  • देश – स्थान – परमपद, क्षीराब्दि हर किसी की पहुंच में नहीं है
  • काल – समय – विभवावतार विभिन्न युगों में होता है – जो लोग उस समय / युग का हिस्सा नहीं हैं, वे चूक जाएंगे।
  • करण – इंद्रियां – अन्तर्यामित्व हमारी सकल इंद्रियों के लिए दृश्यमान नहीं है – केवल उन लोगों के लिए जो अपनी इंद्रियों पर बहुत अधिक नियंत्रण रखते हैं, वे अन्तर्यामि एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ / भगवान्) को देख सकते हैं ज्ञान के माध्यम से।

आखिरी २ में से, क्योंकि अर्चावतार एम्पेरुमान् (अर्चाविग्रह) व्यक्तिगत रूप से सभी के साथ बातचीत नहीं करते हैं, अर्चावतार की तुलना अन्य एम्पेरुमानों (अर्चाविग्रह) के साथ भी की जाती है। सभी शास्त्रों के माध्यम से जानने के बाद, यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है कि, केवल एक आचार्य से प्रदत्त दैवीय ज्ञान को प्राप्त कर ही एक जीवित व्यक्ति (जीवात्मा) को मुक्तात्मा बन सकता है। तो, जो ज्ञान प्रदान करता है वही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। और जो कि अंतिम लक्ष्य है, वह ही उपाय (साधन) होना चाहिए। तो, आचार्य के प्रति कैङ्कर्य अंतिम लक्ष्य है। चूंकि, नम्माळ्ळवार (श्रीशठकोप स्वामीजी) जिन्हें भगवान द्वारा निर्दोष ज्ञान का आशीर्वाद मिला था, स्वयं घोषित करते हैं कि भगवान् जिन्होंने उन्हें निर्दोष ज्ञान का आशीर्वाद दिया वह भगवान् उनकी पूजा का अंतिम उद्देश्य हैं, आचार्य जो शिष्य को दिव्य ज्ञान के साथ आशीर्वाद देते हैं, शिष्य के लिए एकमात्र साधन हैं। अन्य सभी उपाय केवल उपायान्तर (अन्य साधन जिन्हें छोड़ दिया जाना चाहिये) हैं। नञ्जीयर् (श्रीवेदान्ती-जीयर्) ने तिरुमुडिक्कुऱै रहस्य में श्रीनम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरिदास) को बताया – चूंकि इस प्रत्यक्ष साक्षात्कारम् (अाचार्य की प्रत्यक्ष दिव्य दृष्टि) के बिना मोक्ष को प्रदान करने की कोई संभावना नहीं है, आचार्य परम उपाय (प्रक्रिया) है।

पिळ्ळै-लोकाचार्य स्पष्टता से अपने अर्थपंचक (रहस्य ग्रन्थ) में आचार्य अभिमान (आचार्य की दया) की महानता को निम्नानुसार बताते हैंः

आचार्य अभिमानमावदु इवैयोन्ऱुक्कुम् शक्तनन्ऱिक्के इरुप्पानोरुउवनैक् कुऱित्तु इवनुडैय इऴवैयुम्, इवनैप्पेर्ऱाल् ईश्वरनुक्कु उण्डान प्रीतियैयुम् अनुसन्धित्तु, स्तनन्दयप्रजैक्कु व्याधि उण्डानाल् तन् कुऱैयाग निनैत्तुत् तान् औषद सेवै पण्णि रक्षिक्कुम् मातावैप्पोले इवनुक्कुत्तान् उपायानुष्टानम् पण्णि रक्षिक्क वल्ल परमदयाळुवान महाभागवत अभिमानत्तिले ओदुन्गि, “वल्लपरिसु वरुविप्परेल् अदु काण्डुमे” एन्गिऱपडिये सकल निवृत्ति प्रवृत्तिगळुम् अवनिट्ट वऴक्काय्.

सरल अनुवादः आचार्याभिमान का अर्थ है – एक जीवात्मा जिसके पास कोई अन्य उपाय (कर्म, ज्ञान, भक्ति, प्रपती) करने की कोई क्षमता नहीं है, आचार्य जीवात्मा के भारी नुकसान को देखकर (जीवात्मा जब खुद्का एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ / भगवान) के साथ के संबंध को महसूस नहीं कर रहा है) और ईश्वर की खुशी को देखते हुए जब वह (ईश्वर) जीवात्मा (अपने पावन / शुद्ध सेवक के रूप में) प्राप्त करते हैं, जैसे एक मां की तरह जो खुद दवा का उपभोग करती है जब स्तनपान करने वाला बच्चा बीमार हो जाता है जैसे के वह (मां) खुद बीमार हो गई हो, आचार्य स्वामीजी शिष्य के बदले स्वयं शरणागति करते हैं एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ / भगवान) की तरफ। एक शिष्य को खुद को इस तरह के शुद्ध भागवत के नियंत्रण में पूरी तरह से दे देना चाहिए जो सबसे दयालु है और भगवान (एम्पेरुमान) के आशीर्वाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं, यह सोचकर कि “अगर भगवान आचार्य के प्रति प्रतिबद्ध महसूस करते हैं (जो वह (भगवान) करेंगा) तो उन्हें आने दें और आशीर्वाद दें” (जैसा कि आण्डाल् नाचियार् द्वारा नाचियार् तिरुमोऴि में पहचाना गया है)।

यह बहुत स्पष्ट है कि श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य हमारे पेररुळाळन् (काञ्ची देव पेरुमाळ्) के अवतार हैं जैसा कि मणर्ऱप्पाक्कदु नम्बि द्वारा देखा गया है। इस घटना (पिळ्ळै लोकाचार्यर् का देव पेरुमाळ् का अवतार होना) को स्पष्ट रूप से जीयर् (मामुनिगल् (श्री वरवरमुनिस्वामीजी) ने श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र की व्याख्या अवतारिका में समझाया है। इसके अलावा, सदाचार्य-सच्छिष्य लक्षण से संबंधित इतने सारे खूबसूरत स्पष्टीकरण हैं जिन्हें हमारे जीयर् (मामुनिगल् (श्री वरवरमुनिस्वामीजी) ने समझाया है।

इस प्रकार, एक ही आवाज में यह जोर से दावा किया जाता है कि “श्रीमन्नारायणन् (श्रीमहालक्षमी के पति) दयालु रूप से आचार्य के रूप में प्रकट होते हैं”

  • सभी वेदों में
  • वह जो वेदों को समझाते हैं – स्मृति, इतिहास, पुराण
  • ऋषि जैसे पराशर, पराशर्य (व्यास), बोधायन, शुक, आदि – जिन्होंने वेदों, वेदान्त आदि का सार देखा है।
  • आऴ्वार जैसे प्रपन्न जन कूटस्थर् पराङ्कुश (नम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी), परकाल (तिरुमङ्गै आऴ्वार (श्री परकाल स्वामीजी)), भट्टनाथ (पेरिय-आऴ्वार), आदि
  • सभ कुछ जानने वाले आचार्य स्वामीजी जैसे श्रीनाथमुनि स्वामीजी, यामुनाचार्य, यतिराज (श्री रामानुज स्वामीजी), आदि, जो तत्काल आऴ्वारों के पद कमलों का पालन करते हैं

जैसा कि मुमुक्षुप्पडि की शुरुआत में पिळ्ळै लोकाचार्य द्वारा समझाया गया है – जीवात्मा इस संसार (भौतिक संसार) में स्मरणातीत काल से स्वयं के वास्तविक प्रकृतिक ज्ञान से अनभिज्ञ हैं, भगवान् की वास्तविक प्रकृति और जीवात्मा और परमात्मा के बीच के संबंध और उसके ऊपर यह भी नहीं जानते कि वे एम्पेरुमान के  कैङ्कर्य में शामिल होने के शानदार अवसर पर अनुपस्थित हैं। इसके बजाय संसारी स्मरणातीत काल से संसार के इस महासागर में पीड़ित हैं। भगवान् जिनके पास पांच अलग-अलग श्रेणियां हैं (परत्वादि पञ्चक – http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html) सबसे दयालु रूप से इन संसारीयों को तिरुमंत्र के माध्यम से शुद्ध करना चाहते हैं, उन्हें ले जाने / मार्गदर्शन करने के लिए अचिरादि गति (मोक्षम के मार्ग में यात्रा) सूर्य ग्रह के माध्यम से तोड़ने, अमानवन् (स्वयं का एक रूप) स्वयं के स्पर्श से विरजा नदी पार करने में मदद करते हैं, एक आध्यात्मिक शरीर को आशीर्वाद देते हैं और शाश्वत कैङ्कर्य में जीवात्मा को संलग्न करते हैं। इसे पूरा करने के लिए वह जैसे बद्रीकाश्रम में नर और नारायण के रूप में दिखाई दिए, अब वह भी इस संसार से मुक्त होने के लिए जीवात्मा की मदद करने के लिए संसार में दिखाई दे रहे हैं। इस प्रकार, हमें यह स्वीकार करना होगा कि भगवान् स्वयं (प्रथम पर्वम – प्रारंभिक चरण) आचार्य (चरम पर्वम – परम चरण) के रूप में प्रकट होते हैं। इस शलोक में यह समझाया गया हैः

साक्षान् नारायणो देवः कृत्वामर्त्यमयीम् तनुम्
मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्र पाणिना

सरल अनुवादः श्रीमन्नारायणन् खुद सर्वोच्च देवता हैं, जो दिव्य निर्हेतुक दया से, इस दुनिया के जीवात्माओं को अपने हाथों (आचार्य के रूप में) की सहायता से ऊपर उठाने के लिए एक मानवीय रूप लेते हैं।

अब तक हमने कई प्रमाणों (सबूत) के माध्यम सेदेखा है कि एक सच्चे शिष्य को अपने असली आचार्य की पूजा करनी चाहिए जो एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ / भगवान) का एक विशेष अवतार हैं। अब, हम कुछ प्रामाणों को यह स्थापित करने के लिए देखेंगे कि हमें आचार्य को आम आदमी की तरह नहीं व्यवहार करना चाहिए। इन दोनों के साथ, यह स्थापित किया गया है कि, जो लोग अपने आचार्य को एक आम आदमी के रूप में मानते हैं वे नरक क्षेत्रों में आ जाएंगे और वह जो आचार्य को भगवान के रूप में पूजा करते हैं, वह स्वयं परमपद में आ जाएगा। चूंकि अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् ज्ञानसार ३२ में कहते हैं “एक्कालुम् नण्णिडुवर् कीळहाम् नरगु” (यानी जो अपने आचार्य को एक साधारण प्राणघातक इंसान के रूप में मानते हैं, हमेशा के लिए नरक ग्रहों में गिर जाएंगे) ऐसे विचारों को पूरी तरह से छोड़ दिया जाना चाहिए और हमें यह सोचना चाहिए कि “पीतकवाडैप् पिरानार् बिरमगुरुवागिवन्दु” (भगवान् खुद आचार्य के रूप में दिखाई दिए हैं) जैसा कि पेरिय-आऴ्वार (श्री विष्णुचित स्वामीजी) ने कहा था। यह सिद्धांत उन लोगों के दिलों में गहरा होगा जो शास्त्र के प्रति सबसे वफादार हैं और हमेशा प्रमाणों के अनुसार कार्य करते हैं।

इस प्रकार, जैसा कि यह कहा जाता है कि “यत्सार भूतम् तदुपासितव्यम्” (किसी को उसकी पूजा करनी चाहिए जो सार है), “भजेत् सार तमम् शास्त्र” (एक को शास्त्र के उस हिस्से का पालन करना चाहिए जो परम सार है) इत्यादि। आचार्य (और आचार्य आभिमान) के आधार पर, जो केवल जीवात्मा को मोक्ष प्रदान करने के लिये केंद्रित हैं, जैसा कि “उपाय उपेय भावेन तमेव शरणम् व्रजेत्” में कहा गया है (आचार्य के कमल पैरों में आत्मसमर्पण करें उपाय / साधन और उपेय / लक्ष्य के रूप में) और “पेऱोन्ऱु मट्रिल्लै निन् चरणन्ऱि” (आपके कमल पैरों की तुलना में मेरा कोई अन्य लक्ष्य नहीं है – अमुदनार् ने रामानुज नूट्रन्तादि ४५), यह आचार्यत्व (आचार्यन्) है

  • सभी शास्त्रों का सार
  • श्री मधुरकवि, श्री नाथमुनि, आदि से शुरू होने वाले हमारे गुरु परम्परा में हमारे पूर्वाचार्य द्वारा सिखाया गया
  • प्रत्यक्ष प्राकृतिक पूजा करने योग्य वस्तु
  • सबसे दयालु और स्वातन्त्रय के साथ कभी मिश्रित नहीं
  • सबसे आसानी से सुलभ और पहुंचने योग्य

लेकिन आचार्य (जो हमें ऊपर उठाएंगे) पर कुल शरण लेने के बजाए, अगर हम भगवान् को पकड़ते हैं, तो उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) के रूप में पूरी तरह से स्वतंत्र सर्वोच्च व्यक्ति कौन है, अगर कोई आचार्य को छोड़ देता है जो खुली आंखों से दिखाई देते हैं और भगवान् को पकड़ने की कोशिश करें इसे बहुत मूर्ख माना जाता है (यह हाथों में जो पानी है उसे छोड़ने और बारिश के लिए आसमान को देखने जैसा है, जब कोई वास्तव में प्यासा होता है)। भगवान् को इस प्रकार समझाया गया हैः

  • तैत्तिरीय उपनिषद्यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह (भगवान् का एक गुण स्वयं मन से समझ में नहीं आता है और कल्पना करने योग्य सबसे बुद्धिमान व्यक्ति के लिए भी शब्दों द्वारा समझा नहीं जा सकता है।)
  • सुलभम् स्वगुरुम् त्यक्त्वा दुर्लभम् य उपासते (अपने गुरु (आचार्य) को छोड़कर जो आसानी से सुलभ हैं और एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) के लिए कठिन पूजा करना मूर्खता है।)
  • स्तोत्र रत्नविदि शिव शङ्काद्यैर् ध्यातुम् अत्यन्त दूरम् (ब्रह्मा, शिव, सानका कुमरों जैसे गीट योगियों के लिए भी आपकी सेवा करना समझ से परे है।)
  • तिरुमालै ४४ – पेण्णुलाम् चडैयिनानुम् बिरमुनुम् उन्नैक् काण्बान् एण्णिलावूऴियूऴित् तवम् चेय्तार् वेळ्गि निर्प – रुद्र, जिनके गद्देदार बालों मै गंगा हैं और ब्रह्मा, जिन्होंने आपको देखने के लिए इतने सालों तक तपस्या की है, लेकिन वे आपको देखने में असमर्थ हैं, उनके सिर शर्म में लटक रहे हैं।
  • सिद्धिर्भवति वा नेति संशयोच्युत सेविनाम् – यहां तक कि जो लोग अच्युतन की सेवा करते हैं, उनके लिए भी यह संदेहजनक है कि वे उसे प्राप्त करते हैं या नहीं।
  • तिरुछन्द विरुत्तम् ८५ – वैत्त सिन्तै वान्गुवित्तु नीन्गुविक्क – आप पूरी तरह स्वतंत्र हैं और मेरे दिमाग को आप से दूर करने में सक्षम हैं और इसे अन्य भौतिक चीजों में ध्यान बदल देते हैं।
  • क्षिपामि, न क्षमामि – मैं उन्हें दंड दूंगा, मैं उन्हें माफ नहीं करूँगा – इन्हें आम तौर पर यह दिखाने के लिए प्रकाशित किया जाता है कि एम्पेरुमान् (भगवान्) आचार्य के जितने दयालु नहीं है जो हमेशा जीवात्मा को मोक्ष की तरफ झुकाव और निर्देशित करना चाहता हैं।

ऐसा समझाया गया है कि उन्हें पाना सबसे ज्यादा मुश्किल है , जो संसार में जीवात्मा को बाध्य करने और जीवात्मा को मुक्त करने के लिए हैं, कभी-कभी क्रूर होते हैं कि उन्होंने भरतजी को धक्का दिया जो पूरी तरह आत्मसमर्पण कर चुके थे और सीता मां जो मछली और पानी की तरह पेरूमल (भगवान) से अविभाज्य है, जंगल में अलगाव में रहने के लिए, वह अर्जुन को प्रपत्ति बताते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें अपने लीला आदि में संलग्न करता हैं।

पूर्णतया से नम्माऴ्वार के प्रति आत्मसमर्पित मधुरकवि आऴ्वार की छलक

इसलिए, शिष्य को अपने आचार्य को उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) के रूप में स्वीकार करना चाहिए जैसा कि “उत्तारयति सम्सारात् तदुपायप्लवेन तु; गुरुमूर्त्त्य् स्थितस्साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तमः” – भगवान् आचार्य के रूप को स्वीकार करते हैं ताकि वह जिवात्मा को इस संसार से ऊपर उठा सकें उपयुक्त साधन से) और आळवंदार (श्रीयामुनाचार्य) स्तोत्र रत्न में “सर्वम् यदेव नियमेन” नम्माऴ्वार के कमल पैर हमेशा मेरे लिए सब कुछ हैं)। शिष्य, आचार्य को गुरु, शरण और सबसे सुखद वस्तु जिसे प्राप्त किया जा सकता है के रूप में स्वीकारना चाहिए। ऐसा करने के बजाए, अगर कोई सिर्फ अपने आचार्य को केवल उपकारक (एम्पेरुमान की ओर बढ़ने में मदद करते हैं) के रूप में स्वीकार करता है, जैसा कि “मुन्नोर् मोऴिन्द मुऱै तप्पामल् केट्टुप् पिन्नोर्न्तु तामतनैप् पेशादे तन्नेन्जिल् तोर्ऱिनते शोल्लि इदु शुद्ध उपदेश वरवार्ऱतेन्बर् मूर्क्करावार्” उपदेश रत्न माला ७१), जैसा कि पूर्वाचार्यों से श्रवण किया है और उनके दिव्य निष्कर्षों और उन शब्दों को जानने के लिए जो उनके मानस के अन्तरंग को प्रकट करते हैं, लेकिन उनका पालन नहीं करते हैं और वे दर्शन के रूप में जो सोचते हैं उसे निर्देश देते हैं और कहते हैं, “यह सिद्धांत हमारे पूर्वाचार्यों से आ रहा है” उन लोगों द्वारा किया जाता है जो खुद को स्वतंत्र मानते हैं और दुर्भाग्यपूर्ण लोग जो अपने स्वयं के आचार्यों की तरफ पूरी तरह से समर्पित नहीं हैं और सूखे दिल से हैं। चूंकि वे हमारे संप्रदाय के गहरे सिद्धांतों को नहीं जानते हैं, इसलिए उनके निर्देश नकली सजावट की तरह नहीं रहेंगे और गायब हो जाएंगे। मेरा आचार्य (मामुनिगल् / श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने समझाया है कि एक को अपने स्वाचार्य के प्रति पूरी तरह से वफादार होना चाहिए जैसे कई प्राणमों में उद्धृत है यथा –

  • आचार्यायाहरेदर्त्तान् आत्मानञ्च निवेदयेत्; तदधीनस्च वर्त्तेत साक्षान्नारायणो हि सः – आत्म-समर्पण करने वाले लोगों को धन, आत्मा, आदि को आचार्य में पूरा करके और पूरी तरह से उनके नियंत्रण में रहने से, एक निश्चित रूप से श्रीमन् नारायण के निवास तक पहुंचने के लिए निश्चित हैI
  • यस्य साक्षात् भगवति ज्ञानदीपप्रदे गुरौ – चूंकि आचार्य ज्ञान के मशाल के साथ शिष्य को उजागर करते हैं, इसलिए उन्हें भगवान के रूप में माना जाना चाहिए।
  • आचार्यस्स हरिस्साक्षाच् चररूपी न संशयः आचार्य श्री हरि के समान ही हैं – इसमें कोई संदेह नहीं है – लेकिन वह भगवान के विपरीत घूमते हैं (जो (भगवान) मंदिर में एक स्थान पर रहते हैं)।
  • गुरुरेव परम्ब्रह्म – गुरु (आचार्य) खुद परब्रह्म हैं।
  • गुरुमूर्त्त्य् स्तितस् साक्शात् भगवान् पुरुशोत्तमः – भगवान स्वयं गुरु। (आचार्य) के रूप को स्वीकार करते हैं, इत्यादि।

पिळ्ळै लोकाचार्य भी इस सिद्धांत को श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र के  ४४३वे सुत्र में बताते हैंः

स्वाभिमानत्ताले ईश्वराभिमानत्तैक् कुलैत्तुक्कोण्ड इवनुक्कु आचार्याभिमानमोऴिय गतियिल्लै एन्ऱु पिळ्ळै पलकालुम् अरुळिच्चेय्यक् केट्टिरुक्कैयायिरुक्कुम्.

सरल अनुवादः मैंने श्रीकृष्णपाद (वडक्कुतिरुवीधिपिळ्ळै) से अक्सर सुना है कि, जीवात्मा जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता से ईश्वर की दया खो दी, उनके लिए आचार्य कृपा ही एकमात्र शरण है।

चूंकि यह सिद्धांत (आचार्य कृपा को उपाय के रूप में स्वीकार करना) हमारे सत्संप्रदाय का निष्कर्ष है, एक को चाहिए:

  • स्वाचार्य को श्रीमन्नारायणन (जो श्री महालक्ष्मी के पति हैं) के रूप में मानना चाहिए,
  • साधनों और लक्ष्य के रूप में स्वाचार्य चरणकमलों पर ध्यान करना चाहिए
  • अंतिम लक्ष्य के रूप में स्वाचार्य कमल चरणकमलों की सेवा पर विचार करना
  • परम उद्देश्य और केंद्र-बिंदु के रूप में स्वाचार्य की खुशी पर विचार करें
  • परम स्थान के रूप में उनके निवास (या जहां वह मौजूद हैं) पर विचार करें
  • जैसे उण्णुम् चोऱु में नम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी) द्वारा समझाया गया है, उनके दिव्य रूप की सेवा करने पर विचार करें जो कि बनाए रखता है, पोषण देता है और आनंद देता है
  • उत्तारयति सम्सारात् श्लोक (पहले समझाया गया) में बताया गया है कि उन्हें जीवात्मा को संसार के बंधन से ऊपर उठाने के रूप में मानें
  • उनसे प्रार्थना करें जैसे मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने आर्तिप्रबंध में प्रार्थना की “यतिराशा एन्नै इनिक् कडुक इप्पवत्तिनिन्ऱुम् एडुत्तरुळे” – यतिराज! कृपया मुझे इस क्रूर संसार से तुरंत उठाएं
  • आचार्याभिमानमे उत्तारकम्” पर विचार करें – श्रीवचन भूषण ४४७) – आचार्य की दया उत्थान के लिए एकमात्र शरण है
  • गौर करें कि आचर्य ने हमारे पिछले सभी पापों को हटा दिया है जैसा कि रामानुस नूट्रन्दादि ९३ में कहा गया है “एन् पेरुविनैयैक् किट्टिक् किऴ्न्गोडु तन्नरुळेन्नुम् ओळ्वाळुरुवि वेट्टिक् कळैन्त इरामानुशन्” और कण्णिनुण् शिरुताम्बु ७ “कण्डुकोण्डेन्नैक् कारिमाऱप्पिरान् पण्डै वल्विनै पाट्रि अरुळिनान्

इस प्रकार, चरम पर्व (परम स्थिति) में स्थित शिष्य के लिए और उनके आचार्य को वांछनीय परिणाम प्रदान करने वाले व्यक्ति के रूप में मानते हैं और एक जो उस लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाले बाधाओं को हटा देने वाले और इस संसार से शिष्य को उपार उठाने वाले के रूप में उनके आचार्य के प्रति वफादार होता है, दोनों प्रकार की स्वीकारता अर्थात् स्वगत-स्वीकारता (शिष्य आचार्य का पीछा (लक्ष्य के जैसे रखना) करते हुए) और परगत-स्वीकारता (आचार्य अपनी दिव्य दया से शिष्य का पीछा) अंतिम परिणाम प्रदान करेंगे। फिर भी, शिष्य के लिए, आचार्य के पास आने / पीछा करने से स्वतंत्र / गर्वपूर्ण रवैये से भर जाता है और यह एक अंगूठी पहनने जैसा है जो काल (हमारे अपने हत्यारे) द्वारा आशीर्वादित है, स्वगत स्वीकारम् जीवात्मा की प्रकृति के लिए उपयुक्त नहीं है। इसीलिए, शिष्य को इसे छोड देना चाहिए और पूरी तरह से आचार्य की निर्दोष दया (परगत स्वीकारता) पर निर्भर रहना चाहिए और खुशी से विचार करना चाहिए।

  • संसारावर्त्त वेग प्रसमन सुबधृक् देशिक प्रेक्षि – तोहम् – मैं संसार के प्रभाव की शक्ति को खत्म करने की सक्षमता मैं अपने आचार्य कृपा मे देखता हूं अतः मै ठीक हूँ ।
  • निर्भयो निर्भरोस्मि – संसार में निडर और बोझ रहित रहो
  • आचार्यस्य प्रसादेन मम सर्वमबीप्सितम्; प्राप्नुयामीति विश्वासो यस्यास्ति स सुखी भवेत् – जिसे विश्वास है कि वह अपने आचार्य की कृपा से अपनी सभी इच्छाओं को प्राप्त करेगा, वह खुश होंगे
  • तिरुवाय्मोऴि तनियन्दनत्तालुम् एतुम् कुऱैविलेन् एन्तै शडगोपन् पादङ्गळ् यामुडैय पट्रु – मैं अपने धन (भौतिक और आध्यात्मिक) से संतुष्ट हूं क्योंकि मैं अपने आध्यात्मिक पिता नम्माऴ्वार को आत्मसमर्पण कर रहा हूं

इसके अलावा, पुण्य और पाप दोनों से अलग होने के कारण, इस संसार में खुशी से रहना ठीक है, बिना किसी भी बाधा के नित्य विभूति (परमपद) और लीला विभूति (संसार) के बीच, जैसे बताया गया हैः

  • प्रमेय सार१ – इव्वाऱु केट्टिरुप्पार्क्कु आळेन्ऱु कण्डिरुप्पार् मीट्चियिला नाट्टिरुप्पार् एन्ऱिरुप्पन् नान् – जिन लोगों ने तिरुमंत्र के अर्थों को सुना और एक आचार्य से भागवत शेशत्वम् को समझ लिया और उनकी (आचार्य) सेवा की, निश्चित रूप से परमपद पहुंचेगा जो अंतिम गंतव्य है और वापसी नहीं है।
  • प्रमेय सार ९ – तत्तम् इऱैयिन् वडिवेन्ऱु ताळिणैयै वैत्तवरै – जो अपने आचार्य को भगवान् का अवतार के रूप में मानता है और पूजा करता है, वह परमपद पहुंचेगा ये निश्चित है।
  • उपदेश रत्न माला ७२ – .इरुळ् तरुमा ज्ञालत्ते इन्बमुट्रु वाऴुम् तेरुळ् तरुमा देशिकनैच् चेर्न्तु – पूर्वाचार्यों और उनके जीवन के दिव्य निर्देशों को सुनकर और उनका पालन करके और एक आचार्य को स्वीकार करते हुए जो शिष्य को दिव्य ज्ञान देता है, शिष्य इस संसार में भी खुशी से रह सकता है जो अंधेरे से भरा हुआ है।

इस कारण से, पेरियवाचान् पिळ्ळै स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकालते हैं कि आचार्य के चरणकमलों को भौतिक / आध्यात्मिक दोनों दुनिया के रूप में और उसे दृश्यमान / अदृश्य लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने से ज्यादा और कुछ नहीं है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि ऐसे शिष्य (जिसकका आचार्य में पूर्ण विश्वास है) के लिए सय संसार स्वयं ही परमपद बन जाता है? एक बार, नम्बि तिरुवऴुदि वळनाडु दास स्वामीजी कण्णिनुण् शिरुताम्बु का उच्चारण करते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं “मधुरकवि शोन्नशोल् नम्बुवार् पदि वैकुण्दम् काण्मिने” जो मधुरकवी आऴ्वार के दिव्य शब्दों में विश्वास करता है, जहां भी वह है वह स्थान वैकुंठ बन जाते हैं)। उस समय, श्रीवैष्णव वहां उनसे पूछते हैं, “यदि इस संसार (लीला विभूति) में एक श्रीवैष्णव निष्ठापूर्वक कण्णिनुण् शिरुताम्बु का पाठ करता है, तो वह जगह वैकुण्ठ (निथ्य विभूति) कैसे बनती है?” और वह जवाब देते है “मेरी बात सुनो – मैं समझाऊंगा कि कैसे। कूरत्ताऴ्वान के दिव्य पुत्र (भट्टर्) के जन्म के बाद, दोनों दुनिया के बीच प्रतिबंध (नाका) नष्ट हो गई और दोनों एक बन गए” – यह घटना कण्णिनुण् शिरुताम्बु व्याख्या में समझाई गई है।

अनुवादक टिप्पणीः इस प्रकार, हमने देखा है कि कैसे आचार्य भगवान् के सबसे दयालु अवतार हैं और उनकी सेवा करना शिष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

संस्कृत प्रमाणों का अनुवाद करने में मदद करने के लिए श्री रंगनाथ स्वामी को धन्यवाद एवं साभार।

जारी रहेगा…

अडियेन् भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/06/anthimopaya-nishtai-12.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३१

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३०

६५) समर्पण विरोधी – अर्पण करने में बाधाएं

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी

समर्पण का अर्थ देना या अर्पण करना है। साधारणतया बड़े व्यक्ति जैसे भगवान, आचार्य, आदि को अर्पण करने को “समर्पण” कहते हैं। वैदिक रीतियों में सामान्यतया यह देखा गया है कि जब भी हम किसी श्रीवैष्णव को कुछ अर्पण करते हैं तो हम कहते हैं “श्रीवैष्णवेभ्यो सम्प्रदात्ते – न मम”। इसका अर्थ हैं “यह श्रीवैष्णवों को दे दिया गया है और अब यह मेरा नहीं है”। इस भाग में आत्म समर्पण पर विस्तार और स्पष्टता से चर्चा की गयी है। आत्म समर्पण का अर्थ भगवान के चरण कमलों में स्वयं को अर्पण करना। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “एनधावी तन्तोलिन्तेन… इनि मिल्वतेनबथुण्डे” – मैंने स्वयं को अर्पण कर दिया है … कुछ वापस नहीं आयेगा और स्वयं को भगवान को अर्पण कर देते हैं। आल्वारों के पथ पर चलते हुए श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के श्लोक में कहते हैं “तदयं तव पादपद्मयोः अहमध्यैव मया समर्पित:” और स्वयं को भगवान के चरण कमलों में अर्पण कर देते हैं। अनुवादक टिप्पणी: कण्णिनुण्शिरुत्ताम्बु के ५वें पाशुर में श्रीमधुरकवि स्वामीजी कहते हैं “नम्बिनेन् पिरर्नन्पोरुल तन्नैयुम” – मैं स्वयं से जुड़ा था (नन्पोरुल – आत्मा) जो भगवान की संपत्ति है (इसलिये इसे “पिरार नन्पोरुल” कहते हैं जहाँ पिरार भगवान को संबोधित करता है)I जीवात्मा भगवान की संपत्ति है। भगवान स्वामी हैं और जीवात्मा संपत्ति। अगर यह स्थिति है तो कैसे जीवात्मा भगवान को अर्पण कर सकता है। हमारे पूर्वाचार्य इस कार्य को बड़ी सुन्दरता से कहते हैं कि यह इस प्रकार हुआ कि रात को भगवान के आभूषण चुराना और सबेरे वहीं आभूषण लेकर भगवान के निकट बड़े उत्साह के साथ जाकर भगवान को अर्पण करना जैसे कि हम स्वयं की कोई वस्तु दे रहे हैं और उनकी नहीं। फिर आल्वार और आचार्य भी ऐसा करते हैं। इसे हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़ी सुन्दरता से समझाया है। श्रीसहस्रगीति में आल्वार पहले स्वयं को भगवान को अर्पण करते हैं परन्तु तत्पश्चात अपनी गलती स्वीकार कर भगवान से कहते हैं “एनधावियार? यान आर? थनध नी कोण्डाक्किनैये” – “मैं कौन हूँ? मैं पहले ही आपका हूँ”। आप अपनी स्वयं की संपत्ति अब स्वीकार कर रहे हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि अगर समर्पण नहीं हैं तो वह सर्व मुक्ति प्रसंगम की ओर ले जाता है (भगवान को सभी को परमपदधाम लाना पड़ेगा क्योंकि किसी को शरणागति करने की कोई आवश्यकता नहीं है)। परन्तु अगर हम आत्म समर्पण करते हैं तो इसका अर्थ भगवान की संपत्ति भगवान को ही अर्पण करना हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक भाव समझाते हैं कि – संसार को देखते हुए प्रपन्न कभी कभी बहुत भय महसूस करते हैं इसलिये वों स्वयं को भगवान को अर्पण करते हुए यह ज़ोर देते हैं कि वे भगवान के शरण हो गये हैं। इसे भ्रम परिस्थिति की तरह समझाते हैं। परन्तु भगवान को देखते ही उनका भय दूर हो जाता हैं – क्योंकि उनको यह स्मरण करवाया जाता है कि वों भगवान कि संपत्ति है और वों (भगवान) अपने सभी विषयों कि रक्षा करने में सक्षम हैं और इसलिये उन्हें यह अहसास होता है भगवान की संपत्ति भगवान को अर्पण कर उन्होंने एक बहुत बड़ी भूल की है और अपने आत्म समर्पण के लिये प्रायश्चित करता है। जब तक इस संसार में हैं तो यह निरन्तर होता रहता हैं – क्योंकि वें संसार और भगवान दोनों ही देखते हैं। यही तत्व श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न के ५२वें श्लोक में समझाकर अर्पण करते है परन्तु फिर ५३वें श्लोक में वे भगवान से पूछते हैं “अथवा किम नु समर्पयामि” – आ! मैं कौन हूँ? मैं आपको क्या अर्पण कर रहा हूँ? मैं आपको कुछ भी अर्पण करने में स्वतन्त्र नहीं हूँ आप तो पहले ही मेरे स्वामी हैं। श्रीपेरियावाचन पिल्लै अपने व्याख्या में इस श्लोक को समझाते हैं। अत: हम यह देख सकते हैं कि जीवात्मा के लिये आत्म समर्पण सही नहीं हैं फिर यह भय/अज्ञानता के कारण करते हैं और एक बार जीवात्मा के स्वभाव को भगवान की संपत्ति है यह जानने के पश्चात प्रायश्चित करता है।

  • अहंकार (देह को आत्मा मानना) और ममकार (भगवान की संपत्ति को स्वयं का मानना) जो जीवात्मा को अपनी संपत्ति भगवान और भागवतों को अर्पण करने से रोकता है, बाधा हैं। स्वयं को स्वतन्त्र मानना बहुत बड़ा अपचार है। सच्ची बात है कि “सबकुछ/सभीजन भगवान के आधीन हैं”। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में कहते हैं “याने एन्नै अरियगिलाते याने एन्तनते एन्रिरुन्तेन” – मैं पहले यह नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ और मैं यह सोचता था कि मैं स्वतन्त्र हूँ – जीवात्मा के प्रति सच्चा ज्ञान पाने की यह स्थिति है। इसी पाशुर में आगे कहते हैं “याने नी एन्नुडैमैयुं निये” – में आपकी संपत्ति हूँ और मेरा शरीर भी आप ही की संपत्ति हैं – जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात की यह स्थिति है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी का सभी को सबसे पहला उपदेश यह है “नीर नुमतु एनरीवै वेर मुथल मायत्तु” – हमको हमसे सम्पूर्णता से अहंकार और ममकार को मिटाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आध्यात्मिक यात्रा में सबसे पहली शिक्षा है आत्मा देह से अलग है यह समझना है। हम नित्य आत्मा हैं और हमारे इस शरीर से भिन्न हैं। अधिकतर जन आत्मा और शरीर में भेद नहीं करते हैं और केवल शरीर यात्रा को ही सब कुछ मान लेते है। दूसरी बात हमें यह समझना चाहिये कि भगवान श्रेष्ठ स्वतन्त्र हैं और वे सभी के मालिक हैं। इस पूरे सृष्टी में हमारा कुछ भी नहीं हैं। अगर इन दोनों तत्त्वों में सही तरह से समझ गये हो तो हम स्वाभाविकता से भगवान जो सभी के स्वामी हैं उनके आनन्द के लिये कार्य करेंगे। अहंकार और ममकार यह दोनों हमारे आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं। भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में अर्जुन को भगवान के प्राप्ति का सच्चा ज्ञान को स्पष्टता से समझाते हैं। २.१२ में वे आत्मा देह से भिन्न हैं इससे प्रारम्भ करते हैं और आगे कहते है आत्मा कई हैं और हर आत्मा दूसरे से भिन्न हैं और भगवान ही सर्वश्रेष्ठ हैं। आचार्य से शरणागति प्राप्त करने के पश्चात भी इन दो बाधाओं से बहुत बार हम घबरा जायेंगे। हमें यह निरंतर स्मरण रखना चाहिये कि हम जीवात्मा हैं देह से अलग और भगवान पर निर्भर। इस निरंतर द्रढ़ता के साथ हम स्वयं को अच्छे स्वभाव में रख सकते हैं।
  • स्वयं का समझकर कुछ पकड़ना, यह जानने के बाद भी कि हम भगवान के दास हैं। यह बाधा है। एक बार भगवान के सेवक हूँ ऐसा सच्चे स्वभाव का ज्ञान हो जाये तो स्वाभाविक रूप से जो हमारा है वह भगवान का ही है। इसलिये बिना हिचकिचाहट के उसी क्षण सब कुछ भगवान को अर्पण कर देना चाहिये।
  • यह सोचकर कि हम मालिक हैं और भगवान को अर्पण कर रहे हैं बाधा है। भगवान ही सब के मालिक हैं यह सत्य है। स्वयं को स्वामी मानना मन की विशुद्ध स्थिति है और यह मानना कि सबकुछ भगवान का है मन की स्पष्ट स्थिति है।
  • यह न जानना कि हमारी पिछली अज्ञान स्थिति जिसमें भगवान कि सम्पत्ति चुराई है (आत्मा और देह को स्वयं के उपभोग के लिए उपयोग करना) यह वैसा ही है जैसे भगवान को कुछ अर्पण कर यह सोचना कि वह मेरी ही सम्पत्ति है, यह बाधा है। स्वयं को भगवान को अर्पण करना वैसा ही है जैसे उसी मन्दिर से रात में बहुमूल्य आभूषण को चुराना और दूसरे दिन वहीं आभूषण भगवान को अर्पण करना। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्रानुसार सबसे बड़ा पाप/चोरी स्वयं को स्वतंत्र समझना और उसके अनुसार कार्य करना – इसे महाभारत में इस तरह समझाया गया हैं “किम तेन न कृतं पापं चोरेण आत्मापहारिणा” – आत्मा जो भगवान की संपत्ति है उसे स्वयं का मानता है वह सब प्रकार के पाप/चोरी किये समान है। अर्पण करने से पूर्व या अर्पण करने के पश्चात अगर यह विचार आए कि आत्मा स्वयं की है तो यह गलत है।
  • स्वयं को यह सोचकर अर्पण नहीं करना कि “यह तो भगवान की संपत्ति है तो मैं कैसे उसे स्वयं को अर्पण करूँ?” हालाँकि हमारे पूर्वाचार्यों ने स्वयं को अर्पण किया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने आत्म समर्पण किया था। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी कहते “अहं अध्यैव मया समर्पित:”। हालाकि आत्मा भगवान की है फिर भी हमें उसे भगवान को अर्पण करना हीं पड़ेगा। परन्तु अगले श्लोक में वे स्वयं इसपर यह कहकर पश्चाताप करते हैं “अथवा किम णु समर्पयामि”। यहाँ वे कहते हैं कि अगर एक बार उन्हें यह अहसास हो जाता है कि मेरे स्वामी भगवान हीं हैं तो मैं कैसे स्वयं को उन्हें अर्पण करूँ? श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रागीति में पहिले आत्म समर्पण कर फिर प्रायश्चित करते हैं “एनधावी तंतोलिन्तेन …इनि मिल्वतेनबथुण्डे” और कहते हैं “एनधावियार? यान आर? तंध नी कोण्डाक्किनैये”। इस संदर्भ में व्याख्यान के चक्रवर्ती श्रीपेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी स्तोत्र रत्न की व्याख्या में समझाते हैं कि “संसार भीतियाल समरप्पीक्कैयुं, स्वरुप याधात्म ज्ञानत्ताल अनुसयिक्कैयुं. इरण्डुम् यावनमोक्षं अनुवर्त्तिक्कक कडवतु” – संसार से डर कर भगवान को स्वयं को अर्पण करना और फिर स्वयं के सच्चे स्वभाव को जानकार पश्चाताप करना, यह क्रम संसार से मुक्त होंगे तब तक चलता रहेगा – इससे बच नहीं सकते हैं। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि प्रपत्ती को उपाय मानना और सिद्धोपाय निष्ठा प्रकरण में ऐसे तत्त्वों में अभाव देखना। सूत्र १४६ में वों समझाते हैं कि “प्रपत्ती को उपाय” मानना भी गलत है क्योंकि भगवान ही उपाय हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी गद्यत्रय में कहते हैं जहाँ श्रीरामानुज स्वामीजी पहिले प्रपत्ती करते हैं और फिर भगवान से अपनी गलती की क्षमा माँगते हैं – तो हम अपने सभी पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों से यह देख सकते हैं कि स्वयं को पहिले भगवान को अर्पण करना और फिर उसके लिये पश्चाताप करना चाहिये।
  • यह न समझना की भगवान स्वयं की सम्पत्ति को स्वीकार कर रहे हैं बाधा हैं। क्योंकि भगवान सभी के स्वामी हैं वह केवल अपनी सम्पत्ति को स्वीकार कर रहे हैं – इसे सही नहीं समझना बाधा है।
  • स्वयं या अन्यों से “यह मेरा हैं” उसे अर्पण करना बाधा हैं। जैसे पहले कहा गया है भगवान ही सभी के स्वामी हैं। यह सोचना कि मैं मालिक हूँ और भगवान को अर्पण कर रहा हूँ, यह सही नहीं है। फिर भी हमें स्वयं को भगवान को प्रेम से अर्पण करना चाहिये। भगवान भगवद्गीता में कहते हैं जो भी मुझे प्रेम से अर्पण करता है मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये जो भी हम अर्पण करते हैं उसे प्रेम से अर्पण करना चाहिये न कि घमण्ड से की मैं आपको कुछ अर्पण कर रहा हूँ। इस तरह के दोषपूर्ण स्वामीत्व की कोई भी वस्तु जीवात्मा के स्वभाव के अनुकूल न हो और ऐसी वस्तुओं को यहाँ दण्डित किया जाता है।
  • यह मानना कि भगवान पूरी तरह संतुष्ट और आत्मनिर्भर नहीं हैं और यह सोचकर उन्हें अर्पण करना कि उन्हें हमसे कुछ चाहिये यह बाधा है। भगवान को अवाप्त समस्त कामन (वह जिनकी इच्छाएं पहले ही पूरी हो चुकी हैं) कहते हैं। फिर भी उनके भक्त प्रेम से उन्हें जो भी कुछ अर्पण करते हैं वे उसे खुशी से स्वीकार करते हैं।
  • यह मानना कि हम कुछ अर्पण कर रहे हैं वे भगवान के पास नहीं है, बाधा है। हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि “उसके पास यह वस्तु नहीं है। मैं यह इसलिये ताकि भगवान इसके मालिक बन जायें”।
  • यह न सोचना कि सभी में वह हीं है और वह केवल हमारी सेवा को पूर्ण करने हेतु हमारे अर्पण को स्वीकार करता है और हमें ऊपर उठाता है। यह बाधा है। हमें यह न सोचना चाहिये कि “देहिमे – ददामि ते” (मैं आपको कुछ प्रदान करता हूँ और बदले में आप भी कुछ मुझे प्रदान कीजिए) – यह मन की परिस्थिती संभ्रम हैं। जब लोग कष्ट में होते हैं तब वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि “कृपया मुझे इस दुख से छुटकारा प्रदान करें मैं बदले में यह काम कर दूँगा” – इसे सामान्यता संस्कृत में प्रार्थना कहते हैं। परन्तु भगवान की एक ही इच्छा है कि हम उनकी शरणागति स्वीकार करें और उनके प्रति पवित्र भक्ति रखें। फिर भी हमें प्रेम से अपनी सामर्थ्यानुसार उन्हें अर्पण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस तरह की सांसारिक प्रार्थना जीवात्मा के सांसारिक कष्ट के निवारण के लिये सही नहीं है। हमें भगवान और भागवतों के पास नित्य कैंकर्य के लिये प्रार्थना करनी चाहिये क्योंकि जीवात्मा के स्वभाव के लिये यही सही है। अपने आध्यात्मिक प्रगति के लिये कोई भी भौतिक उद्देश की प्रार्थना हमें कठिनाई की ओर लेजाती है।
  • भगवान से हमने लाभ प्राप्त किया इसलिये उन्हें कुछ अर्पण करना। अनुवादक टिप्पणी: भगवान को भक्ति कृषक कहते हैं। वह जीवात्मा में भक्ति का बीज लगाते है, कर्म के लिये स्थान उपलब्ध करवाते हैं, मार्गदर्शक के रूप में शास्त्र प्रदान करते हैं, आचार्य से मिलाते है, भागवत सम्बन्ध प्रदान करते है, बाधाओं से छुड़ाते है, आदि और जीवात्मा का पोषण करते है और अन्त में जीवात्मा को परमपदधाम में लाते हैं। जीवात्मा इस कृपा को कभी भी लौटा नहीं सकता है। इसलिये जीवात्मा केवल आश्चर्य कर सकता है कि कैसे वह भगवान के उपकार को लौटा सकता है।
  • भगवान द्वारा किये गये हमारे प्रति उपकार को कैसे चुकाना है, इससे घबराना नहीं चाहिए। कण्णिनुण्शिशिरुत्ताम्बु के १०वें पाशुर में श्रीमधुरकवि स्वामीजी कहते हैं “मुयलहिन्नेन उन्तन्मोयकलर्क्कन्बैये” – मैं आपके चरण कमलों में प्रेम से सेवा करना चाहता हूँ परन्तु आपके उपकारों के अनुरूप कुछ भी कर नहीं पा रहा हूँ – इसलिये श्रीमधुरकवि स्वामीजी बहुत चिन्तित हैं और वे श्रीशठकोप स्वामीजी से प्रार्थना के बदले में कुछ भी नहीं कर पा रहे है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के प्रति अपनी दिव्य भावना इस तरह प्रगट करते है “एनधावी उल कलंत पेरूनल्लुतविक कैम्मारु” – आप बेड़े प्रेम से मुझसे घुल मिल गये परन्तु मैं कैसे आपके उपकार का बदला चुका पाऊंगा।
  • आत्म समर्पण करते समय यह मानना कि हम स्वयं आत्मा के स्वामी हैं, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम इस पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। आत्मा भगवान की सम्पत्ति है और भगवान अपनी सम्पत्ति स्वीकार कर रहे हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-31.html

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वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १४ – २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

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सोने के पर्वत के रूप में बढ़ती हुई, “पुण्य कोटी विमान” (भगवान का वाहन) दिखाई दे रहा था। अंदर वरदराज भगवान् एक  प्रकाश के रूप में दिखाई दिये जो सूरज को भी लज्जित करदे।

“चैत्र मासी सिथे पक्षे चतुर्धस्याम तिथौ मुने:

शोभने हस्त नक्षत्रे रविवार समन्विते I

वपाहोमे प्रवृथ्थे तू प्राथस सवन कालिके:

धातुरत्तर वेध्यंथ: प्रातुरासीत जनार्धना II”

चैत्र मॉस का रविवार का दिन था, मामनिवण्णन् प्रकट हुए। यह शुभ दिन हस्त नक्षत्र में नये चांद के चौथे दिन था।

प्रातः सवनम (प्रातस् सवन) का समय, भगवान ब्रह्मा के नेत्रों के लिए पर्व हुए।

वेल्वी सुबह, दोपहर और शाम को तीन बार किया जाना है। क्रमानुसार, इन्हें प्रातः सवनम, मध्यानिक सवनम और सायम सवनम के नाम से जाने जाते है।

सुबह याग में जानवरों के आंतरिक भाग का मांस आवश्यक है।

उस समय पेररुरालन (वरदराज भगवान्) धर्मार्थ रूप से प्रकट हुए थे।

नारायण स्वयं वरदराज भगवान् के रूप में प्रकट हुए हैं।

सर्वान्तर्यामी भगवान्, उनके बाहों में, शंख, चक्र और गदा सहित अब हमारे लिए वरदराज भगवान् का रूप लिया है।

वेदांत का सार प्रकाश के रूप में अब हमारे लिए (वरदराज भगवान् के रूप में) आये है। वह जो हमें उद्धार का मार्ग  (वैकुंट) गोचारित करते है, वे हमारे लिए नीचे उतर आये है। सभी उन्हें देखकर वरदराज भगवान् की महिमा कर रहे थे।

वहां एकत्र सभी वरदराज भगवान् के मनमोहित आकर्षण में वे स्वयं को खो दिया, जिन्होंने “मंजुयूर पोन्मलै मेलेलुन्ध मामुगिल” सोने के एक ऊंचे पहाड़ के ऊपर एक बादल का रूप याद दिलाया था I

ऐसा दिखाई दिया, ब्रह्मा उन्हें देखकर, जो साधारणतः आंखों को पता लगने योग्य नहीं होते है, भ्रांत चित्त हो गये ।

तिरुमंगै आळ्ळवार कहते है “अथथा अरिये एंर्रालैक्का पिथथा एनरू पेसुगिन्रार पिरार एन्नैय”  – अगर मैं आपको पिता, राजा इत्यादि के रूप में पुकारता हूं, तो अन्य जन मुझे पागल कहते है। भक्ति के चरम पर जो होते है वे अन्य लोगों के लिए पागल हि होंगे।

नारद भक्ति सूत्र  – उन्मथ्थवथ , जडवथ और पिशाचवथ के तीन लक्षणों का वर्णन करती है।

भक्ति (भगवान से प्रेम और समर्पण) का अनुभव मनुष्यों में भिन्न भिन्न  हो सकता है। यह किसी किसी को जगह जगह ब्रमण करवाती है, एक स्थान पर टिकने नहीं देता, पागल प्रतीत होते है। और किसी को एक निर्जीव वस्तु के समान एक हि स्थान पर स्थिर रखता है और कुछ लोगों को प्रेत के रूप में।

“मीरा हो गयी मगन…ओह गली गली हरिगुण गाने लगी”

(मीरा कृष्ण के पीछे पागल थी। वह गलियों में चारों ओर घूमती थीं और हरि के गुण गाती थीं)। मीरा की भक्ति भजन के रूप में बहने कि यह स्थिथि को “उन्मथ” अवस्था को दर्शाती है।

जट भरत एक उत्कृष्ट भक्त थे, आस पास कि दुनिया से अचेतन होके एक स्थान पर स्थित थे। यह जडवथ भक्ति का एक उदाहरण है। शंकर भगवथ्पाद आश्चर्य होते थे कि क्या भक्ति से परे कुछ और शक्ति भी है।

वरदराज भगवान् की दर्शन से ब्रह्मा आश्चर्यचकित हो गए । एक मनुष्य की तरह, कई दिनों के भूखे, जो भोजन देखने पर प्रतिक्रिया होगी,  वरदराज भगवान् का दर्शन अयन के नेत्रों के लिये पर्व हुआ । उसके मुंह से निकला था “आरावमुदे! आरावमुदे! “।

खुशी के आँसू  निकलने लगे थे , उनका शरीर काँपता हुआ, यहां और वहां दौड़ते और नहीं जानते कि क्या करना है । ब्रह्मा ने अपने नेत्र वरदराज भगवान् पर स्थिर रखा था I

समय समय पर, अपने हाथों से ताली बजाते और एक या दो शब्द बोलते कि “वरदराजा !! देवराजा !! दयानिधि !! पेरारूराला !! “(वरद राज भगवान के अलग-अलग नाम), नृत्य करते हुए और चक्कर काटते हुए (प्रदक्षिणा कर रहे थे) I इस प्रक्रिया में अनजाने में उन्होंने उल्टा भी गुमे (अप्रदक्षिणा)।

पुराण ने स्पष्ट रूप से ब्रह्मा की यह स्थिति को चित्रित किया –

“प्रदक्षिणाम प्रैति तधाप्रदक्षिणाम प्रयाति धूरम पुनरेति सन्निधिम I

करेन पस्पर्स ममार्ज तत्वपू: प्रियेंन गातं परिषस्वजे क्षनाम II”

शास्त्र भी इस स्थिति को औचित्य देते हैं –

“अत्यंत भक्ति युक्तस्य न शास्त्रं नैव च क्रम:”

जो भक्ति में डूबे हुए हो वे शास्त्र, नियम, अधिनियम वगैरह के निश्चित रूप से (भक्त) अधीन नहीं है । ब्रह्मा ने सोचा, “वरदराज भगवान् पास से इतने सुंदर और सुरुचिपूर्ण दिखते है। और दूर से?”

तुरंत वह दूर गये और उन्हें देखा।

वह और भी सुन्दर दिखायी दिए। और कुछ दूर गये और आराधना की। वह वरदराज भगवान् के पास गये और अपनी उंगलियों से उनको स्पर्श किया, धीरे-धीरे उनके गालों को निचोड़ा, और गले लगा लिया। परंतु शिशु वरदराज भगवान् को ज़ोर से गले लगाने से दर्द हो सकता सोचके है, झिझके ब्रह्मा। अपने हाथ वापस ले लिये। चारों ओर लोग ब्रह्मा के यह कृत्यों से आश्चर्यचकित थे। चतुर्मुख एक काँपते आवाज़ में एक भावनात्मक श्रद्धांजलि अर्पित की वरदराज भगवान् को।

वास्तव में कैसे?

अगले भाग में …

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

आधार  – https://srivaishnavagranthamwordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-14-2/

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