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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 7

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 6

 

श्री पेरुमाळ कोईल महामहोपाध्याय जदगाचार्य सिंहासनाधिपति उभय वेदान्ताचर्य प्रतिवादि भयंकर श्री अणंगराचार्य स्वामीजी के कार्य पर आधारितII

समुद्र और भगवत्कल्याणगुण

साधारणतः हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों मे सागर को उपमान मानते हुए भगवान को समस्त-कल्याण-गुण-सागर (तिरुक्कल्याणगुणसागरं) से निर्दिष्ट किया है अर्थात भगवान ऐसे कल्याण गुणों के समुद्र है

स्वामि रामानुजाचार्य भी कुछ इसी तरह सकलहेयरहित-समस्तदिव्यगुणसंपन्न भगवान श्रीमन्नारायण के असीमित विशेष कल्याण गुणों को प्रकाशित करते हुए अपने कई ग्रंथों मे इनका वर्णन करते है । स्वामि रामानुजाचार्य के ग्रंथों मे हम यह भलि-भांति देख सकते है ।

शब्द जैसे – ” अनन्त-गुण-सागरं “, ” अपरिमितोदार-गुण-सागरं “ स्वामि रामानुजाचार्य के श्री-भाष्य ग्रंथ मे परब्रह्म श्रीमन्नारायण के विषय मे बरामद है । उदाहरण मे श्री-भाष्य के दूसरे अध्याय के शुरुवात मे कहा गया है –

प्रथमे अध्याये प्रत्यक्षादि प्रमाण गोचरात् अचेतनात्, तत्संसृष्टाद् वियुक्तास्च  चेतनात्, अर्थान्तरभूतं निरस्त-निखिल-अविद्यादि अपुरुषार्थगंधम् अनन्तज्ञानानन्दैकटानम् अपरिमितोदार-गुण-सागरं निखिल जगद्-एककारणं सर्वान्तरात्मभूतं परं ब्रह्म वेदान्तवेद्यं इतियुक्तं ” ।

सरलार्थ – वेदान्तसूत्रों के प्रथम अध्याय मे कहा गया है – परब्रह्म (जो), अचेतन तत्व (जिनकों हम अनुभव और समझ सकते है) से , भौतिक जगत मे बद्ध जीवात्मावों से , और  भौतिक जगत से विमुक्त जीवात्मावों से, भिन्न है , (जो) अज्ञानता और कलंक रहित है,  (जो) अपरिमित ज्ञान और आनन्द के भण्डार है, (जो) सागर रूपी असीमित असंख्य विशेष कल्याण श्रेष्ठ गुणों से संपन्न है, (जो) इस जगत के आधारभूत तथ्य है, (जो) सभी (अचेतन तत्व, चेतन तत्व इत्यादि) के अन्तर्यामी है, (ऐसे भगवान) वेदान्त से जाने जाते है।

यहा ध्यान पूर्वक समझना चाहिये की पूर्व उल्लिखित वाक्य मे ‘परब्रह्म’ शब्द का प्रयोग प्रथमा विभक्ति (कर्ताकारक/कर्तृवाच्य) मे किया गया और ना की द्वितीय विभक्ति (कर्मकारक) । यह ध्यान मे रखते हुए उपरोक्त वाक्य का अर्थनिर्णय/अनुवाद करना चाहिये । ” अपरमित-उदार-गुण-सागरं “ वाक्य तत्पुरुष समास से विग्रह कर अर्थ समझा नही सकते है । इसका कारण यह है की – अगर इस वाक्य मे प्रस्तुत शब्दों का समास – ” गुणानाम्-सागरः (विशेष गुणों के सागर) “ से किया जाये तो सागरः (सागर) पुल्लिंग शब्द हो जाता है और अतः यह वाक्य ” अपरमित-उदार-गुण-सागरः “ से प्रस्तुत होता । बजाय इस शब्द का प्रयोग नपुंसकलिंग मे किया गया है । इसीलिये इस वाक्य का समास बहुव्रीहि समास से किया जाना चाहिये और यही उचित है जो इस प्रकार है ” अपरिमितः उदारगुणसागरः यस्य तत् ” या “अनन्तः गुणसागरः यस्य तत् “ (जो अनन्त या अपरिमित कल्याण गुण रूपी सागर से सम्पन्न है, वही परब्रह्म है ) । श्रृतप्रकाशिकर ने भी तत्पुरुष समास के माध्यम से इस तथ्य को समझाया है ।

यहा इन दोनों समासों मे अंतर कुछ इस प्रकार से दर्शाया गया है – तत्पुरुष समास मे, भगवान को समुद्र से तुलना करते है, वे पानी वाले समुद्र नही बलकी असंख्य कल्याणगुणों के सागर(समुद्र) है । इसके विपरीत बहुव्रीहि समास मे, भगवान के प्रत्येक गुण सागर बनते हैं और भगवान इस गुणरूपीसागर का आश्रय है । दूसरा अनुवाद इस वाक्य का सच्चा अर्थ व्यक्त करता है अतः यह अनुवाद/अर्थनिर्णय यतार्थ है ।

भगवान को गुणों का सागर कहलाने वाले पद तो हर कहीं मिलते हैं किन्तु उनके गुणों को सागर कहलाने वाले पद भगवद्रामानुजाचार्य की रचनाओं मे ही मिलते हैं | यह तुलना या इस प्रकार का वर्णन केवल श्रीवैष्णव सांप्रदाय से संबंधित आचार्य ही कर सकते है और अगर किसी अन्य ग्रन्थ मे ऐसा प्रयोग मिल जाय तो वह अवश्य श्रीवैष्णव आचार्य की रचना होगी |

स्वामि रामानुजाचार्य ने यह तुलना संयोगवश नही किया है । बलकी वे आऴ्वारों के दिव्यप्रबंधो से भलि-भाँन्ति परिचित थे और इन सभी ग्रंथों को जांच कर उनका अनुसन्धान करने के पश्चात ही वे ऐसी तुलना कर पाएँ । पेरियतिरुवन्दादि मे, स्वामि नम्माऴ्वार कहते है – ‘‘ मिगुन् तिरुमाल्सीर्क्कड़लै युऴ्पोडिन्ड सिंदनैयेन् (६९) “ । इस स्तुति मे, भगवान से असंख्य प्रत्येक कल्याणगुण की तुलना महासागर से की गई है यानि उनके प्रत्येक गुण एक महासागर जैसे असीमित और विशाल है । जिस प्रकार अगस्त्य ऋषि ने खारे समुद्र का उपभोग किया उसी प्रकार अमृत-सदृश भगवान के ऐसे मधुर असंख्य कल्याणगुण रूपी सागर का उपभोग स्वामि नम्माऴ्वार ने किया । कहते है जिस प्रकार एक बादल ( मेघ ) समुद्र के पानि का भोग करता है उसी प्रकार स्वामि नम्माऴ्वार और हमारे पूर्वाचार्यों ने असिमीत विशाल समुद्र जैसे भगवान के प्रत्येक मधुर गुणो का उपभोग किये है । यहा यह व्यक्त किया जा रहा है की – स्वामि नम्माऴ्वार ने बजाय तत्पुरुष समास के बहुव्रीहि समास का प्रयोग किया है ।

स्वामि नाथमुनि

श्री यामुनाचार्य

स्वामि नम्माऴ्वार

स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार

 

 

 

 

 

श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै

श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक)

एक और तुल्य अनुवाद (व्याख्या) इसी प्रसंग मे बताने के योग्य है ।  परमाचार्य स्वामि आळवन्दार अपने स्तोत्र-रत्न के प्रारम्भ मे स्वामि नाथमुनि ( अपने पूज्य पितामह ) का गुणगान करते हुए कहते है – ” अगाध-भगवद्-भक्ति-सिंधवे “ । यहा एक प्रश्न उठ सकता है की – स्वामि नाथमुनि भक्ति के सागर है ( तत्पुरुष-सामास ) या वे सागर जैसे समान भक्ति से युक्त है ( बहुव्रीहि समास) । व्याख्यान मे निपुण भाष्यकार चक्रवर्ती श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै इस वाक्य का अनुवाद आऴ्वारों के व्याक्यांशो का अनुसरण करते हुए ” काडल् कड़लिन् मिगप्पेरिडु (स्वामि नम्माऴ्वार का तिरुवाय्मोऴि ७-३-६) और “आशयेन्नुम् कड़ल्” (स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार का पेरियतिरुमोऴि ४-९-३) इत्यादि पासुरों के आधार पर भक्ति को ही सागर मान कर बहुव्रीहि दृष्टि से निर्वाह किए हैं । इसी तुलना का वर्णन और इसका समर्थन देते हुए श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक) ने अपने टिप्पणि मे कहा है | उन्होने पहले तत्पुरुष समास के आधारपर अर्थ बतलाया है और उसके बाद बहुव्रीहि समास पर आधारित अर्थ को बतलाया है – ” भक्तिम् वा सिंधुत्वेन रूपयित्वा बहुव्रीहि “ । बहुव्रीहि समास का उपयोग करते हुए लाक्षणिक रूप से उल्लिखित भक्ति ही महासागर के समान है ।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/05/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-7/

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 6

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 5

आल्वार् और भगवद्रामानुजाचार्य – २

परित्राणाय साधूनाम्

श्रीमद्भगवद्गीता का चतुर्थाध्याय श्लोक सर्वप्रसिद्ध है |

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

” सामान्य व्यक्ति को भी यह अर्थ समझ पडता है कि भगवान श्रीकृष्ण साधुओं का रक्षण व दुष्टों का विनाश करते हुए धर्म का स्थापन करने हर युग अवतार करते हैं | यह अर्थ आसानी से मिल जाता है | लेकिन, अगर हम पूछें कि “धर्म” का क्या अर्थ है?  साधु कौन बनता है और दुष्ट कौन है? तो इन पदों का वास्तविक अर्थ निश्चय करना कठिन हो जाता है | रक्षण और विनाश शब्दों का क्या अर्थ है?  यहीं भाष्यों ही अपेक्षा उठती है | गीता के लिए उपलब्ध अनेक भाष्यों में भी यह प्रश्न उठता है कि क्या इन सब भाष्यों मे प्रतिपादित अर्थ गीता-संदेश से अविरोधित हैं |

विविध भाष्यों मे कहे गए अर्थों की परीक्षा हम इस प्रसङ्ग में नहीं करेंगे | इतना ही हमारा अनुभव का विषय बनेगा कि भगवद्रामानुजार्य से प्रतिपादित अर्थ न सुन्दर ही है, पर यही उत्तम अर्थ भी है |

साधु कौन बनता है?

सर्वप्रथम यह जानने योग्य है कि साधु कौन है जो कृष्ण का प्रिय है और उनसे सुरक्षित है?  इस पद का भाष्य करते समय रामानुजाचार्य को आल्वारों की स्मृति चलती है | वे ऐसे विशेषणों का उपयोग करते हैं जिनसे आल्वारों का स्वभाव स्पष्ट होता है |  ऐसे करने से आचार्य श्रीवैष्णव सम्प्रदाय ज्ञान न होने वालों को भी आल्वार-महात्माओं का परिचय देते हैं |

आचार्य अपने भाष्य में ऐसे लिखे हैं :

साधव: – उक्तलक्षण-धर्मशीला वैष्णवाग्रेसरा:, मत्समाश्रयणे प्रवृत्ता: मन्नामकर्म-स्वरूपाणां वाङ्मनसागोचारतया मद्दर्शनेन विना स्वात्मधारणपोषणादिकमलभमाना: क्षणमात्रकालं कल्पसहस्रं मन्वाना: प्रशिथिल-सर्वगात्रा भवेयुरिति मत्स्वरूप-चेष्टितावलोकनालापादिदानेन तेषां परित्राणाय |

धर्मशीलाः – वे  धर्म नियमों को आचरित करने वाले हैं | धर्म का अर्थ सामान्य धर्म या विशेष वैष्णव धर्म हो सकता है | सामान्य धर्म का अर्थ लेने पर “यदा यदा हि धर्मस्य” श्लोक से सङ्गति है | वैष्णव धर्म का अर्थ लेने पर भाष्य का “वैष्णवाग्रेसरा:” पद से सङ्गति है |

वैष्णवाग्रेसरा: – वैष्णवों में अग्रगण्य हैं | यही मुख्य लक्षण है | आचार्य के सम्प्रदाय में आल्वार सर्वोत्तम वैष्णव माने जाते हैं | यामुनाचार्य भी स्तोत्र रत्न में शठकोप मुनि को प्रपन्न वैष्णवों के कुलपति कहलाते हैं |

मत्समाश्रयणे प्रवृत्ता: – जो मुझे (कृष्ण) संसारनिस्तरण के लिए आश्रय मानते हैं | यह विवरण आल्वारों के वचन – “तुयररु चुडरडि तोलुदु”, “आलिवण्ण ! निन् अडियिनै अडैन्देन्”, एत्यादि पर आधारित है |

मन्नामकर्म-स्वरूपाणां वाङ्मनसागोचारतया – आल्वार भगवान के दिव्य नाम और रूप का सात्क्षात्कार पहचानते हुए उनको वचन और चिन्तन से अपार मानते हैं | उनके वचनों में यह स्पष्ट है – “एनसोल्लि सोल्लुगेन्”, नेञ्जाल् निनैप्परिदाल् वेण्णैयूणेन्नुम् ईनच्चोल्ले!”, इत्यादि |

मद्दर्शनेन विना स्वात्मधारणपोषणादिकमलभमाना: – भगवद्दर्शन और अनुभव विना आल्वार पोषित नहीं बनते, न ही वे जी पाते हैं | यह उनके शब्द – “तोल्लैमालै कण्णारक्कण्डु कलिवदोर कादलुट्रार्क्कुम् उण्डो कण्कल् तुञ्जुदले”, “काणवाराय् एन्ड्रेन्ड्रु कण्णुम् वायुम् तुवर्न्दु” से सिद्ध है |

क्षणमात्रकालं कल्पसहस्रं मन्वाना: – क्षणमात्र काल के लिए भगवान और उनके अनुभव से वियोगित होने पर भी, उनको वह काल सहस्रकल्प जैसा प्रतीत होता है | “ओरुपगल् आयिरम् ऊलियालो”, “ऊलियिल् पेरिदाय् नालिगै एन्नुम्”, “ओयुम् पोलुदिन्ड्रि ऊलियाल् नीण्डदाल्”, इत्यादि वचनों से यह भाव हमें स्पष्ट निकलता है |

प्रशिथिल-सर्वगात्रा: – भगवदुनभव के सम्बन्ध और वियोग में आल्वार के सर्व अङ्ग शिथिल बनते हैं | अनुभव काल में आनन्द की तीव्रता और वियोग में दु:ख की तीव्रता शैथिल्य का कारण बनते हैं | यह स्वभाव इनके अनेक  वचनों से समझ सकते हैं जैसे – “कालालुम् नेञ्जलियुम् कण्चुललुम्”, कालुम् एला कण्णनीरुम् निल्ला उडल् सोर्न्दु नडुङ्गि कुरल् मेलुमेला मयिर्क्कूच्चमरा”, इत्यादि |

साधु वह बनता है जो धर्मशील है, जो वैष्णवाग्रेसर है, जो कृष्ण को ही आश्रय मानता है, जो भगवान के नाम और रूप को सात्क्षात्कार करते हुए उनको वचन और चिन्तन से अपार मानता है, जो भगवान को दर्शन किए विना नहीं जी पाता है, जो भगवान से क्षण काल वियोग को भी कल्प-सहस्र मानता है, जो अनुभव और वियोग में भिन्न कारणों से सर्वथा शिथिल बन जाता है|

ऐसे साधुओं का रक्षण करने के लिए ही भगवान अनेक अवतार लेते हैं | वे उन महात्माओं को अपना सात्क्षात्कार दर्शन को दिलाते हैं | अपने कार्यों से, अपने गुणों से, अपने दिव्य रूप से उनका पोषण करते हैं | भक्ति बीज का उत्पन्न और उस भक्ति सस्य का विकास उनके अवतार से सिद्ध होता है | ऐसे करने से वे आप को, सनातन धर्म को, जगत में स्थापित करते हैं |

आचार्य की महिमा

इस भाष्य द्वारा, श्रीरामानुजाचार्य गीता के वास्तविक हृदय को याद रखते हुए, सभी जनों को आल्वार जैसे आदर्श भक्तों का परिचय दिए हैं | भक्ति ही गीता का तात्पर्य है और आचार्य यह याद रखते हुए साधु शब्द भाष्य में महान भक्तों की व्याख्या आल्वारों के स्वभाव कथन से किए हैं | ऐसे करने से, गीतार्थ और आल्वारों की महिमा साथ साथ गोचर बनता है |

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/04/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-6/

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द्रमिडोपनिषत प्रभाव् सर्वस्वम् 5

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 4

 

आल्वार और भगवद रामानुज स्वामीजी 

श्री वरवरमुनी स्वामीजी

श्री वरवरमुनी स्वामीजी कहते हैं, “यह वास्तव में रामानुज दर्शन है, जैसे श्री शठकोप स्वामीजी ने बताया था।” श्रीवैष्णव संप्रदायेतर संप्रदाय भी यह मानते हैं की देशव्यापी (और विश्वव्यापी) भक्ति आंदोलन श्री रामानुज स्वामीजीने जो बीज बोये थे उसी के कारण प्रचलन में है। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है की हम द्रमिडोपनिषत का वैभव हमारे स्वामीजी के ग्रंथोंके माध्यम से समझें।

पिछले लेखोंमें श्री रामानुज स्वामीजी का आ वर्णन एक शिक्षक तथा एक दिव्य प्रबंध के विद्यार्थी के रूप में, आल्वारोंके आश्रित के रूप में, और अपने अनेक शिष्योंके माध्यम से संप्रदाय का प्रचारक के रूप में किया गया।

12 आल्वार

आने वाले लेखोंमें, हम श्री रामानुज स्वामीजी और श्री आल्वारोंके कार्य में सीधा संबंध का अनुभव करेंगे।

श्री रामानुज स्वामीजी के साहित्य की और उनके व्याख्यानोंकी एक विशेषता है। जब भी भगवान का विषय आता है तो श्री रामानुज स्वामीजी आल्वारोंके तरह भगवान के स्वरूप, अनन्त दिव्य कल्याण गुण, उनकी दिव्य लीलाओं का विषद वर्णन करना प्रारम्भ कर देते हैं। ऐसा एक भी अवसर नही जहाँ उन्होने ऐसा करनेमें संकोच किया हो। वे भगवान का विषद अनुभव करते हैं, जिससे पाठक और श्रोता के मन में दिव्य परमानन्द प्राप्त हो। आल्वारोंके कृपा पात्र होने के कारण श्री रामानुज स्वामीजी भगवद अनुभव करनेका कोई भी अवसर छोड नहीं सकते। जिन्हे इस दिव्य आनंद का अनुभव लेना हो, उन्हे श्रीभाष्य, श्री गीताभाष्य, और श्री गद्यट्राय अवश्य पढ़ना चाहिए।

मन्मना भव!

भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ९ में कहते हैं:

मन्मना भव मद्भक्तो  मद्याजी  माँ  नमस्कुरु ।

मामेवैश्यसी यूक्तैवमात्मानं मत्परायणम् ॥

सरल शब्दार्थ है: “तेरा मन मुझमें स्थिर कर, मेरा भक्त बन, मेरी सेवा कर, मुझे प्रणाम कर, अंतिम लक्ष्य की तरह मेरा अनुभव कर। इस प्रकार मन को बनानेसे तू केवल मुझे ही प्राप्त करेगा।”

श्री मध्वाचार्यजी

श्री शंकराचार्य

“मन्मना भव” का अर्थ है, तेरा मन मुझमें स्थिर कर। यह शब्द इतने सरल प्रतीत होते हैं की श्री मध्वाचार्यजी  नें इसका विशेष गौर नहीं किया। श्री शंकराचार्य लिखते हैं, “मयि वासुदेवे मनः यस्य तव स त्वं मन्मना भव”। सीधे अर्थ के साथ साथ उन्होने विशेष बात यह बताई की “मैं” का अर्थ “वासुदेव” है। “तेरा मन मुझ वासुदेव में स्थिर कर”। श्री शंकराचार्य “मैं” को विशेष महत्त्व देकर “मैं” का अर्थ वासुदेव बताते हैं। यह विश्लेषण इन सरल शब्दोंके लिए पर्याप्त प्रतीत होते हैं।

 

परंतु, श्री रामानुज स्वामीजी का विश्लेषण सुन किसी पाषाण हृदय वालेको भी अश्रु आजायेंगे।

मन्मना भवमयि सर्वेश्वरे निखिलहेयप्रत्यनीककल्याणैकताने सर्वज्ञे सत्यसङ्कल्पे निखिलजगदेककारणे परस्मिन् ब्रह्मणि पुरुषोत्तमे पुण्डरीकदलामलायतेक्षणे स्वच्छनीलजीमूतसंकाशे युगपदुदितदिनकरसहस्रसदृशतेजसि लावण्यामृतमहोदधौ उदारपीवरचतुर्बाहौ अत्युज्ज्वलपीताम्बरे अमलकिरीटमकरकुण्डलहारकेयूरकटकभूषिते अपारकारुण्यसौशील्यसौन्दर्यमाधुर्यगाम्भीर्यौदार्यवात्सल्यजलधौ अनालोचितविशेषाशेषलोकशरण्ये सर्वस्वामिनि तैलधारावदविच्छेदेन निविष्टमना भव!

 

श्री कृष्ण और अर्जुन

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से नित्य भगवान का स्मरण करना, भगवान का भक्त बनना, भगवान से प्रेम करना, भगवान के भक्ति करनेको कहते हैं। भगवान कहते हैं की ऐसा करनेसे अर्जुन को उसका अंतिम लक्ष्य याने भगवान प्राप्त हो जाएँगे। व्याख्यान करने वाले को यहाँ सरल शब्दार्थ से ज्यादा क्या करना चाहिए? श्री रामानुज स्वामीजी उससे आगे बढ़ते हैं और भगवान के समस्त दिव्य कल्याण गुणोंका वर्णन करते हैं। क्या भगवान अर्जुन को यह सब भावरहित उपासना की तरह करने को कहते हैं? वो उसे भगवान को पूर्ण प्रेम करनेको और मन को भगवान को समर्पित करनेको कहते हैं। श्री कृष्ण कौन हैं? क्या वो एक सामान्य शिक्षक हैं जो अपने विद्यार्थी को कुछ करनेको कह रहे हैं? वो पूर्ण पुरुषोत्तम सर्वोच्च परब्रह्म भगवान हैं, जो अति सुंदर हैं, अति पवित्र हैं, अति आश्चर्यजनक हैं, और ऐसे हैं जिनके विचार से ही भक्त का हृदय गद् गद् हो जाता है और वे परमानन्द प्राप्त करते हैं। श्री कृष्ण सब चेतन-अचेतन मात्र के भगवान हैं। तो भी वे सुलभ हैं और कृपालू हैं। जिस तरह भी आप उनके पास देखो, भगवान से भिन्न और प्रेम और सेवा के योग्य कौन हो सकता है?

अर्जुन के लिए, यह स्पष्ट है। तो भी श्री रामानुज स्वामी यह विषयका विशेष रूप से वर्णन करना चाहते हैं। श्री आल्वारोंके कृपापात्र और उनके परंपरा में आनेवाले श्री रामानुज स्वामीजी आप खुद ही भगवान में पूर्ण रूप से समर्पित हैं, वो भगवान को विशेष प्रेम करते हैं, और अपना मन भगवान में दृढ़ करते हैं। श्री कुरेश स्वामीजीने रामानुज स्वामीजी का वर्णन इस प्रकार किया है, “नित्यमच्युतपदाम्बुजयुग्मरुक्मव्यामोह”। अत: इन शब्दोंके केवल उच्चारण से ही दिव्य अनुभव प्रारम्भ हो जाता है। श्रोताओं और पाठकों के हृदय में भक्ति का संचार करनेकी शक्ति उनमें हैं, जो भगवान श्री कृष्ण का उद्देश्य है। संक्षिप्त में श्री रामानुज स्वामीजी ३ कार्य एक साथ करते हैं, “भाष्यकार, आचार्य, और प्रेमी भक्त”। जब भगवान श्री कृष्ण के शब्द आल्वारोंके दिव्य प्रबंधोंमें निरत आचार्य (श्री रामानुज स्वामीजी) के हृदय से मिलते हैं तो फल अतिविशेष होता है।

“तेरा मन मुझमें स्थिर कर” मैं अर्थात जो सभी देवताओंके भी भगवान हैं, जो दोष रहित हैं, दिव्य कल्याण गुणोंके भंडार हैं, जो अंतर्यामी परमात्मा हैं, जिनका संकल्प सत्य होता है, जो समस्त चराचर विश्व के एकमात्र कारण हैं, जो परब्रह्म है, जो सर्वोच्च हैं, जिनके नयन अभी अभी खिले हुये कमलदल के समान हैं, जिनके दिव्य स्वरूपमें अद्वितीय तथा निर्दोष नीले रंग की छटा है, जिनका स्वरूपमें सहस्रो सूर्योंकी कान्ति है, जो रूप के महासागर हैं, जिन्हे चार शक्तिशाली एवं मनोहर भुजाएँ हैं, जो चमकीला पीताम्बर धारण करते हैं, जो मुकुट, कुंडल, कंठहार, बाजूबंद, नूपुर आदि अनेक आभूषणोंकों विभूषित करते हैं, जिनका प्रेम अद्वितीय है, जो सुलभ हैं, जो अतिसुंदर हैं, जो मधुर हैं, जो महान हैं, जो अपार करुणा के सागर हैं, जो प्रेममय और दयावान हैं, जो सब के लिए एकमात्र शरण्य हैं, जो सबके भगवान हैं। अर्जुन, तेरा मन मुझमें अविरल तैलधारा के समान स्थिर कर।

इस व्याख्या से श्री रामानुज स्वामीजी भक्ति के कारणोंकी सुंदर रचना करते हैं – जैसे उनका दिव्य मनोहर स्वरूप, उनका प्रभुत्व, उनके आनंदमय एवं पवित्र कल्याण गुण, इत्यादी – और अपने शिष्योंके हृदय को लुभाते हैं। वे उन्हे परमानंद की अवस्था में पहुंचादेते हैं, जहाँ उनका मन भगवान के दिव्य कल्याण गुण और वैभवमें आकर्षित हो जाता है और भगवान की प्रेममय सेवा करनेके लिए इच्छा करता है। इस व्याख्या को अध्ययन करनेवाले का मन त्वरीत कृष्णभक्ति में डूब जाता है और भगवद्गीता का संदेश यथार्थ में परिणित हो जाता है।

यह कहनेकी आवश्यकता नहीं की श्री रामानुज स्वामीजी की भक्ति की समृद्धि उनको मिली हुयी आल्वारोंकी प्रसादी है। इसी कारण श्री अमूघनार गाते है:                                                                                                        पण् तरू मारन् पशु्न्दमिल् आनन्दम् पाये मदमाय् विण्डिड एगंल इरामानुज मुनि वेलम!

कलि मिक्क शेन्नल कलनि क्कुरैयल कला प्परूमान् ओलिमिक्क पाडलै उण्डु तन उल्लम् तडित्तु अदनाल वलि मिक्क सीयम इरामानुशन!

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 4

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 3

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी और श्री आल्वार

श्रेष्ठ सन्यासी

श्री यामुनाचार्य

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी श्री नाथमुनी स्वामीजी (जिन्होने दिव्य प्रबंधोंकों का पुनरुज्जीवन किया) के पौत्र हैं। श्री यामुनाचार्य स्वामीजी आलवंदार, यमुनै तुरैवर, और यामुन मुनी नाम से भी जाने जाते हैं। वें श्री रामानुज स्वामीजी के परम आचार्य हैं। ऐसा कहा जा सकता है की उनके बाद के सभी आचार्योंने उन्होने बताए हुये मार्ग का अनुसरण किया। बाद के आचार्योंने ऐसी कोई बात भी नहीं बताई जो श्री यामुनाचार्यजी ने नहीं बतायी हो।

जिन्होने विद्वानोंके ग्रंथोंका अध्ययन किया है आसानी से घोषित करेंगे की श्री यामुनाचार्य स्वामीजी जितना निपुण और कुशाग्र बुद्धीवाला ना आजतक कोई हुआ है न आगे भविष्य में भी कोई होगा – श्रीयामुनार्यसमो विद्वान् न भूतो न भविष्यति। वें श्रेष्ठ सन्यासी भी हैं, जैसे श्री थिरुवरन्गरत्तु आमुदनर् स्वामीजी कहते हैं: “यतिकट्किरैवन् यमुनैट्टुरैवन्”

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी की बहू-आयामी निपुणता अनेक प्रकार से समझ सकते हैं। एक तरफ तो श्री यामुनाचार्य स्वामीजी के निर्मित ग्रंथोंकों देख सकते हैं (स्तोत्र-रत्न, सिद्धित्रय, आगाम प्रामाण्य में पांचरात्र आगम का बचाव) और निर्णय कर सकते हैं की स्वामीजी काव्य, दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र और पांचरात्र में अनुभवी एवं निपुण थे। अथवा कोई स्वामीजी के अपने वचनोंपर ध्यान दे –

न वयं कवयस्तु केवलं, न वयं केवल-तन्त्र-पारकाः,

अपितु प्रतिवादिवारण-प्रकटाटोप-विपाटन-क्षमाः।

“हम कवी मात्र नहीं हैं; हम आगाम तंत्र के विद्वान मात्र नहीं हैं, परंतु घमंडी हाथियोंके समान प्रतिवादियोंकी घोषणाओंकों शांत करनेमेभी हम उतनेही समर्थ हैं।” एक समझदार समझ सकता है की यह अभिमान युक्त वचन नहीं हैं बाकी एक मात्र सत्य है।

हमारे संप्रदाय के तत्त्ववेत्ताओंने अनेक संस्कृत रचनाएँ की है जिनमे उन्होने सामान्य रूप से स्वीकृत ग्रंथोंके आधारपर हमारे तत्त्व प्रस्थापित किए हैं। इन ग्रंथोंमें हमें आल्वारोंके सीधे वचन नहीं मिलेंगे। यह मुख्य रूप दार्शनिक चर्चा के दायरे और पहुँच के कारण है। अपितु, संप्रदाय के ग्रंथोमें (जो केवल श्रीवैष्णवोंके लिए बनाए गए हैं) उन्होनें आल्वारोंके ग्रंथोंसे संदर्भ लिए हैं और आल्वारोंकी तनियन से उनका गुणगान भी किया।

प्रपन्न कुलपति

श्री शठकोप स्वामीजी

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी की श्री शठकोप स्वामीजी के प्रति निष्ठा का प्रमाण स्तोत्र रत्न के पांचवे श्लोक में मिलता है – “माता पिता…” इस श्लोक में श्री यामुनाचार्य स्वामीजी सीधे श्री शठकोप स्वामीजी का नाम नहीं लेते हैं। अपितु उपाधि देते हैं – आद्यस्य नः कुलपतेः – सबसे महत्वपूर्ण और हमारे प्रपन्न कुल के मार्गदर्शक। “वकुलाभिरामम्” – वकुल पुष्प से सुशोभित – से यह स्पष्ट होता है। यह पहचान खुद श्री शठकोप स्वामीजी ने दिया है। “णट्कमल् मकिल्मलै मर्पिनन् मारन शटकोपन्”।  पश्चात के आचार्योंने भी श्री शठकोप स्वामीजी का गुणगान किया है “वकुलाभरणं वन्दे जगदाभरणं मुनिम्”।

“आद्यस्य नः कुलपतेः” ऐसे उपाधि से पता चलता है को श्री शठकोप स्वामीजी श्री यामुनाचार्य स्वामीजी के परंपरा के सभी आचार्योंके कुलपति हैं।

मुख्य प्रश्न

श्री नाथमुनी स्वामीजी

श्रीवैष्णव गुरूपरम्परा में श्री शठकोप स्वामीजी के बाद श्री नाथमुनी स्वामीजी आते हैं और बाद में श्री यामुनाचार्य स्वामीजी आते हैं। स्तोत्र-रत्न में श्री यामुनाचार्य स्वामीजी प्रथम थीं श्लोक श्री नाथमुनी स्वामीजी के लिए समर्पित करते हैं। पांचवा श्लोक श्री शठकोप स्वामीजी को समर्पित करते हैं। परंतु चौथा श्लोक श्री पराशर मुनी (श्री विष्णु पुराण के रचयिता) को समपरपित किया है – नमो मुनिवराय पराशराय.

 

श्री पराशर मुनी

इन श्लोकोंके क्रम पर कोई शंका कर सकता है। एक तो श्री यामुनाचार्य स्वामीजी ने सर्वा प्रथम श्री पराशर मुनी का एक संस्कृत वेदान्त के प्रतिनिधि आचार्य के रूप में गुणगान करना चाहिए और बाद में श्री नाथमुनी स्वामीजी (अपने आचार्य के रूप में) और बाद में श्री शठकोप स्वामीजी (गुरु परंपरा के मुख्य आचार्य के रूप में) गुणगान करना चाहिए। अथवा प्रथम श्री नाथमुनी स्वामीजी, फिर श्री शठकोप स्वामीजी और बाद में श्री पराशर मुनी का गुणगान करना चाहिए। श्री पराशर मुनी को श्री नाथमुनी स्वामीजी और श्री शठकोप स्वामीजी के बीच में बिराजमान करना अपरिचित लगता है। ऐसा किसी आचार्योंने अपने ग्रंथोंमें किया हुआ नहीं देखने में आता है।

ऐसा श्री यामुनाचार्य स्वामीजी ने क्यों किया?

 

सुंदर रहस्य

यह रहस्य द्रमिडोपनिषत के एक महत्त्वपूर्ण पहलू से समझा जा सकता है। श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी कहते हैं:

अथ पराशरप्रबन्धादपि वेदान्तरहस्यवैशद्य-अतिशयहेतुभूतैः सद्य परमात्मनि चित्तरञ्जकतमैः सर्वोपजीव्यैः … नाथमुनेरप्युपकर्तारं … सर्वोपनिषत्सारोपदेष्टारं पराङ्कुशमुनिं “माता पिता भ्राता” इत्यादि उपनिषत्प्रसिद्ध-भगवत्स्वभाव-दृष्ट्या प्रणमति – मातेति |

श्री नाथमुनी स्वामीजी के बाद श्री शठकोप स्वामीजी की तनियन है इसका कारण यह की श्री शठकोप स्वामीजी से द्रमिडोपनित पाप्त हुआ। यह समझना सुलभ है। परंतु श्री शठकोप स्वामीजी को श्री पराशर मुनी के बाद भी क्यों? श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी कहते हैं, “श्री शठकोप स्वामीजी ने वेदान्त के गूढ अर्थ श्री पराशर मुनी से भए बढ़िया दिये हैं। श्री शठकोप स्वामीजी के वचन भगवान को तत्काल प्रसन्न करते हैं और वे वचन सम्पूर्ण जगत का उज्जीवन करने में समर्थ हैं। श्री शठकोप स्वामीजी द्वारा दिये गए अनंत उपकार को याद करके श्री यामुनाचार्य स्वामीजी सोचते हैं की जीवोंपर अनंत उपकार करनेवाले श्री शठकोप स्वामीजी केवल भगवान से ही तुलना करने योग्य हैं। उपनिषदोंमें कहा है भगवान ही सबके माता है, पिता हैं, बंधु हैं, इत्यादी। इसे संदर्भ से श्री यामुनाचार्य स्वामीजी कहते हैं, श्री शठकोप स्वामीजी ही मेरे माता-पिता इत्यादि सब कुछ हैं, और उनके वकुल पुष्प से सुशोभित चरणोंमें शरणागति की – “वकुलाभिरामं श्रीमत्तदङ्घ्रियुगलं मूर्ध्ना प्रणमामि।”

हमारे पुर्वाचार्य भी कहते हैं की श्री शठकोप स्वामीजी भगवान का अंश ही हैं जो भगवान के श्री चरणकमल ही हैं। श्री यामुनाचार्य स्वामीजी भगवान का गुणगान (जो स्तोत्ररत्न का मुख्य विषय है) उनके चरण रूपी श्री शठकोप स्वामीजी की वंदना करके प्रारंभ करते हैं।

स्तोत्र रत्न के अनेक श्लोक आल्वारोंकी सीधी गाथाएँ ही हैं अथवा उनके विश्लेषण हैं। उनमें कुछ संदर्भ के लिए दिये हैं (यह सब एक-एक कालक्षेप के विषय हैं)

1. कः श्रीः श्रियः (१२) और श्रियः श्रियम् (४५): श्री परकाल स्वामीजी रचित  तिरूवुक्कुन्तिरूवागीय चेल्वा.

2. निरासकस्यापि न तावदुत्सहे (२६): श्री कुलशेखर स्वामीजी रचित तरूतुयरण्तादायै उन चरणल्लाल चरणी ल्लै ,वैरैकुलुवुमलप्प्रीलील्चुल वित्तूवक्कोत्तम्मानै

3. गुणेन रूपेण विलासचेष्टितैः सदा तवैवोचितया तव श्रिया (३८): श्री शठकोप स्वामीजी रचित उनक्केकु्म कोलमलप्पार्वैक्कन्बा

4. निवास-शय्यासन (४०): श्री सरोयोगी स्वामीजी रचित चेनराल कूडैयाम.

5. धिगशुचिमविनीतम् (४७): श्री शठकोप स्वामीजी रचित वालवैलुलगु

6. वपुरादिषु (५२) and ममनाथ(५३): श्री शठकोप स्वामीजी रचित “एनधावि तन्तोलीन्तेन एनतावियार यानार तांत नल कोडाक्कीनैये

7. महात्मभिः (५६): श्री शठकोप स्वामीजी रचित -ओरूनाल कानावाराये नाम्मै योरूकाल काट्टी नडन्ताल नाड्गालुय्युमै एम्मावित्तुत्तिरामुम चेप्पम और भी सदृश गाथा

8. न देहं न प्राणान् (५७): श्री शठकोप स्वामीजी रचित एरालुमीरैयोन

यह सिद्ध हो जाता है की श्री यामुनाचार्य स्वामीजी ने अपने ग्रंथोंके निर्माण के लिए दिव्य प्रबंधोंका आधार लिया।

स्वाधयन्निह सर्वेषां त्रय्यन्तार्थं सुदुर्ग्रहं | स्तोत्रयामास योगीन्द्रस्तं वन्दे यामुनाह्वयम् ||

[मैं श्री यमुनाचार्य स्वामीजी को नमन करता हूँ, जो यतियोंमें श्रेष्ठ हैं, जिन्होने वेदोंके दुर्गम और गूढ अरठोंको अपने श्लोकोंसे सुलभ बना दिया।]

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 3

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 2

श्री तैत्तरीय उपनिषद:

सहस्रपरमा देवी शतमूला शताङ्कुरा |

सर्वं हरतु मे पापं दूर्वा दुस्स्वप्ननाशिनी | |

इस श्लोक में दिव्य प्रबंध अथवा द्रमिडोपनिषद के प्रति की हुयी प्रार्थना है।

“देवी” शब्द मूल “दिवु” से आता है। दिवु – क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु। अनेक अर्थोमें से यहाँ स्तुति यह अर्थ विशेष है। “देवी” यह श्लोकोंकी मालिका है जो भगवान के गुणोंपर स्तुतियोंद्वारा प्रकाश करती है।

देवी दूर्वा शब्द से विशेषण प्राप्त है।इसका अर्थ है “हरभरा”।  आल्वारोंके प्रबंध हरेभरे माने जाते हैं।इससे यह प्रतीत होता है की इन पाशूरोंमें उष्णता नहीं है जो संस्कृत में होती है परंतु तमिल हरिभरी होने के कारण शीतल है।

सहस्रपरमा: जिसमे श्री शठकोप स्वामीजी के १००० पाशूर सबसे महत्त्वपूर्ण भाग के रूप में हैं।इसका आचार्य हृदय के सूत्र में उल्लेख किया गया है। वेदोंमें पुरुष सूक्त, धर्म शास्त्रोंमें मनु, महाभारत में गीता, पुरानोंमें श्री विष्णु पुराण जैसे महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं वैसेही सहस्रगिती द्रविड़ वेदोंमें महत्त्वपूर्ण भाग/सार मानी जाती है।

शतमूला – जिसका आधार १०० श्लोक में वर्णित हैं। श्री सहस्रगिती के १००० पाशूरोंका आधार १०० पाशूर के तिरुविरुथ्थम् में है।  श्री अझगीय मणवाल पेरुमाल स्वामीजी आचार्य हृदय में इसका वर्णन करते हैं।जब ऋग्वेद संगीतमें सुंदर रिती से गाया जाता है तो वो साम वेद के रूप में परिवर्तित हो जाता है।  वैसेही, जब तिरुविरुथ्थम के १०० पाशूर संगीत के साथ गाये गए, तो उनका सहस्रगिती के मधुर १००० पाशूरोंमें परिवर्तन हो गया।  इसलिए, श्री सहस्रगिती के १००० पाशूरोंका आधार १०० पाशूर के तिरुविरुथ्थम् को माना गया है। और इसी कारण इसको शतमूला ऐसे संबोधित किया है।

शताङ्कुरा – वह जो एक सौ पाशूरोंसे से अंकुरित है।सम्पूर्ण दिव्य प्रबंध का योगीत्रय (श्री भूतयोगी, श्री सरोयोगी, श्री महाद्योगी) के मुदल तिरुवंदादी, इरांदम तिरुवंदादी, और मुंद्रम तिरुवंदादी से उगम हुवा है।

 

 

 

 दिव्य प्रबन्ध का स्वरूप क्या है?

श्री परकाल स्वामीजी

दुस्स्वप्न-नाशिनी – यह बुरे स्वप्न नष्ट कर देता है। यहाँ सोते समय आने वाले स्वप्न का संदर्भ नहीं है। श्री परकाल स्वामीजी कहते हैं, “भगवान को जाने बिना बिताए गए दिन एक मूर्ख के स्वप्न से ज्यादा निरर्थक हैं।” स्वप्वनास्था वह अवस्था है जिसमे कोई चेत नहीं होता।  इसी तरह, भगवान को जाने बिना बिताए दिन बुरे स्वप्न के समान हैं।  यह स्वप्न बुरा है क्योंकि जब तक जीव भगवान को नहीं जानता है तब तक वो अनंत यातनाएं सहन करता हुआ समय व्यतीत करता है।  द्रविड़ वेद भगवान के बारे में जीवोंकों ज्ञान देता है और संसार के प्रभाव को नष्ट करता है।   सहस्रगितीमें श्री शठकोप स्वामीजी कहते हैं कीभ्रामक मृगतृष्णा की तरह यह संसार पाशुरोंके के इस दशक से नष्ट हो जाता है।  जो द्रविड वेदोंके ज्ञान से प्रकाशित हैं, उनका दु:स्वप्न रूपी संसार नष्ट हो जाता है।

सर्वं हरतु मे पापंमे सर्वं पापं हरतु। कृपा करके मेरे सभी पापों को नष्ट करो। तत्त्व-हित-पुरुषार्थ के अनुभूति में जो बाधा करते हैं वो पाप हैं।  ऐसे पापोंको नष्ट करने के लिए यह प्रार्थना है।

संक्षेप में, यह श्लोक प्रार्थना करता है की सदा हरेभरे रहनेवाले द्रविड वेद पढ़ने वाले के पाप नष्ट कर दे। दिव्य प्रबन्ध भगवान का महिमा गान करते हैं। उसमें श्री सहसरगिती के १००० पाशूर अधिकतम महत्त्वपूर्ण हैं, जो तिरुविरुथ्थम के १०० पाशूरोंसे विकसित हुआ है।यह योगीत्रय आल्वारोंके प्रत्येकी १०० पाशूर के तिरुवंदादी से अंकुरित है और दु:स्वप्न रूपी संसार का नाशक है।

सांतवे काण्ड के पांचवे प्रश्न में यह कहता है, “वेदेभ्यस्स्वाहा” और तुरंत कहता है “गाथाभ्यस्स्वाहा”। यहाँ वेद से संस्कृत वेद और गाथा से दिव्य प्रबन्ध प्रतीत होते हैं।यह देखा जा सकता है की गाथा यह शब्द श्री देशिकन स्वामीजी द्वारा द्रमिडोपनिशत तात्पर्य रत्नावली में द्रविड़ वेदोंकों संबोधित करने के लिए अनेक बार उपयोग में आया है। उदाहरण के लिए, द्रमिडोपनिशत तात्पर्य रत्नावली के द्वितीय श्लोक में कहा है:

प्रज्ञाख्ये मन्थशैले प्रथितगुणरुचिं नेत्रयन् सम्प्रदायं

तत्तल्लब्धि – प्रसक्तैः अनुपधि – विबुधैः अर्थितो वेङ्कटेश: |

तल्पं कल्पान्तयूनः शठजिदुपनिषद् – दुग्ध – सिन्धुं विमथ्नन्

ग्रथ्नाति स्वादु – गाथा – लहरि – दश – शती – निर्गतं रत्नजातम् | |

सदा सुकुमार श्रीमन्नारायण भगवान का विश्राम स्थल और जिसकी लहरें मधुर १००० पाशुरोंके रूप में उत्पन्न होती हैं ऐसा क्षीर सागर हैं। उस क्षीरसागर समान श्री शठकोप स्वामीजी के उपनिषत का मंथन करके प्राप्त धन संपत्ति का आनंद लेने की जो इच्छा रखते हैं ऐसे निर्मल हृदय के पंडितोंसे अनुरोध होनेपर मैं, वेंकटेश, प्रसन्न होता हूँ।

वेदोंमें वर्णित द्रविड़ वेदोंका वर्णन सम्पन्न हुआ।

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 2

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 1

श्री कुरेश (श्री कुरथ अझवान)

अभी तक यह चर्चा की गई की श्री शठकोप स्वामीजी वेदान्त के सर्वोच्च आचार्य है और श्री रामानुज स्वामीजी का श्री दिव्य प्रबंध के साथ गहरा संबंध था। आगे अब यह दर्शाया जाएगा की संस्कृत वेद, उनके उपब्राह्मण, और पूर्वाचार्योंका संस्कृत साहित्य (विशेष रूप से श्री यामुनाचार्य, श्री कुरेश, श्री पराशर भट्टर और श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी के साहित्य) दिव्य प्रबंध और आल्वारोंके वैभव का ही गान करते हैं।

 

श्री यामुनाचार्य

श्री वेदान्त देशिक स्वामीजी

 

वेदों में द्रमिडोपनिषत- श्री शठकोप स्वामीजी (सूर्य)

श्री शठकोप

    श्री मधुरकवी स्वामीजी एक बार उत्तर यात्रा में थे, जब उन्होने दक्षिण से एक विलक्षण प्रकाश को आते देखा। बड़ी उत्सुकता से इस प्रकाश का स्रोत ढूंढते ढूंढते वो सीधे दक्षिण में श्री आल्वार तिरुनगरी पहुंचे और उनको पता चला की श्री शठकोप स्वामीजी ही इस प्रकाश का स्रोत हैं।
श्री अझगीय मणवाल पेरुमाल नयनार स्वामीजी आचार्य हृदय ग्रंथ में कहते हैं,
अज्ञान रूपी अंध:कार सूर्य के द्वारा नष्ट नहीं हो सकता। संसार रूपी विशाल महासागर भगवान श्री राम रूपी सूर्य से नहीं सूख सका। हमारे हृदय भगवान श्री कृष्ण रूपी सूर्य से पूरी तरह से खिले नहीं। बकुल पुष्प से सुशोभित श्री शठकोप स्वामीजी रूपी एक नए सूर्य से यह सब संभव हुआ।
श्री नाथमुनी स्वामीजी ने श्री शठकोप स्वामीजी की तनियन की रचना की:

श्री नाथमुनी

यद्गोसहस्रमपहन्ति तमांसि पुंसां, नारायणो वसति यत्र सशंखचक्रः |
यन्मण्डलं श्रुतिगतं प्रणमन्ति विप्राः तस्मै नमो वकुलभूषणभास्कराय | |

जिसके सहस्र किरण (सहस्रगिती के पाशूर) जीवोंका अंध:कार दूर करते हैं, जिनमें श्री नारायण भगवान शंख चक्र सहित बिराजमान होते हैं, शास्त्रोंमें जैसे वर्णन है वैसे जिनका स्थान यथार्थ ज्ञानियोंद्वारा पूजित है, ऐसे सूर्य जो बकुल पुष्पोंसे सुशोभित श्री शठकोप स्वामीजी हैं उनकी में आराधना करता हूँ।
श्री नाथमुनी स्वामीजी सामान्य रूप सी गाये जानेवाले एक श्लोक का अर्थ बताते हैं,

ध्येयस्सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः |
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशंखचक्रः | |

यह श्लोक में वर्णन है की नारायण जो विशेष रूप से सुशोभित हैं और शंख चक्र धारण करते हैं, वे सविता मण्डल में बिराजमान हैं और उनका ध्यान सदा करना चाहिए। श्री नाथमुनी स्वामीजी दर्शाते हैं की सविता मण्डल या सूर्य का संदर्भ श्री शठकोप स्वामीजी से ही है, जो श्री सहस्रगीति के सहस्र किरणोंसे दैदीप्यमान हैं, जहां भगवान श्री नारायण अति आनंद के साथ बिराजते हैं, जिनका प्रकाश जगत के अज्ञान का विनाश करता है, और जिनके प्रकाश ने श्री मधुरकवी स्वामीजी को उत्तर से दक्षिण तक मार्गदर्शन किया। सवित्रा प्रातुर्भावितं सावित्रम्. – सवितृ से जो उत्पन्न होता है उसे सावित्र कहते हैं। इसी कारण श्री सहस्रागिती को सावित्र कहा गया है। इंद्र ने भारद्वाज को सावित्र का अध्ययन करनेका निर्देश दिया था।

भारद्वाज की समस्या पर इंद्र का समाधान

श्री यजुर्वेद के कटक अनुभाग में प्रथम प्रश्न यजुर्वेद इंद्र के शब्द से संबंधित है.
भरद्वाजो ह त्रिभिरायुर्भिर्ब्रह्मचर्यमुवास। तं ह जीर्णं स्थविरं शयानम्। इन्द्र उपव्रज्योवाच। भरद्वाज। यत्ते चतुर्थमायुर्दद्याम्। किमेनेन कुर्या इति। ब्रह्मचर्यमेवैनेन चरेयमिति होवाच॥ तं ह त्रीन्गिरिरूपानविज्ञातानिव दर्शयाञ्चकार। तेषां हैकैकस्मान्मुष्टिमाददे। स होवाच। भरद्वाजेत्यामन्त्र्य। वेदा वा एते। अनन्ता वै वेदाः। एतद्वा एतैस्त्रिभिरायुर्भिरन्ववोचथाः। अथ तम् इतरदननूक्तमेव। एहीमं विद्धि। अयं वै सर्वविद्येति॥ तस्मै हैतमग्निं सावित्रमुवाच। तं स विदित्वा। अमृतो भूत्वा। स्वर्गं लोकमियाय। आदित्यस्य सायुज्यम् इति॥

भारद्वाज मुनी की इच्छा थी की तीनों वेदोंपर प्रभुत्त्व प्राप्त करें। इसी इच्छा से उन्होने इंद्रा से वर प्राप्त किया की वो तीन मनुष्य की आयु प्राप्त करेंगे। एक जीवन में एक वेद का अध्ययन करेंगे।  तीन जीवन के अंत में भारद्वाज मुनी अशक्त होगये।  इंद्र ने उनसे पूछा की अगर में तुम्हें और एक जीवन प्रदान करूँ तो तुम उसे कैसे व्यतीत करोगे? भारद्वाज जी ने बताया, “में वेदोंका पुन: अध्ययन करूंगा।

इंद्रा को समझ गया की भारद्वाज जी वेदोंपर प्रभुत्त्व प्राप्त करना चाहते हैं।    इंद्र ने अपनी योग शक्ती से तीनों वेदोंकों भारद्वाज जी के सामने तीन विशाल पर्वत के रूप में दर्शाया।     इन्द्र ने भारद्वाज जी को बताया की तीन जीवन के अंत में उन्होने तीनों वेदोंका कुछ ही अंश सीखा है।   इंद्र ने यह भी बताया के वेद अनंत हैं और उनपर कोई भी प्रभुत्त्व नहीं प्राप्त कर सकता।

भारद्वाजजी उदास हो गए।   चिंतायुक्त शब्दोंसे उन्होने पूछा, “फिर क्या वेदोंकों जाननेना कोई मार्ग नहीं है?”  भारद्वाज जी की निराशा देखकर इंद्र ने उन्हे परम ज्ञान बताया की जिसे जानने से सब कुछ जाना जा सकता है और इस संसार बंधन से छुटकारा भी मिल सकता है।  और वो ज्ञान का स्रोत है सवित्र अथवा श्री सहस्रगिती।

श्री भट्ट भास्कर का कथन इस प्रकार है, “इमं सावित्रं विद्धि, अयं हि सावित्रः सर्वविद्या तस्मात्तत्किं वृथाश्रमेण? इदमेव वेदितव्यमित्युक्त्वा तस्मै भरद्वाजाय सावित्रमुवाच.”

“इस सवित्रा को जानो।   यह सवित्रा के माध्यम से वेदोंके समस्त ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है।  जब यह सवित्रा उपलब्ध है तो फिर तुम क्यों व्यर्थ में संघर्ष करते हो?  केवल सवित्रा को जननेकी आवश्यकता है।    इसी कारण इंद्र ने भारद्वाज जी को सवित्र का अध्ययन कराया।

वेद अनंत हैं।  इनके सीधे अध्ययन से उन्हें पूरी तरह से जानना असंभव है।  अगर कोई उन्हे पूरी तरह जानना चाहता है तो हमे सवित्रा के ज्ञान को जानना होगा जिसे जानने से वेदोंका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सकता है।  हमारे आचार्योंने उस सवित्रा (जो सूर्य के किरण हैं) उनको श्री सहस्रगिती के समान समझा। श्री सहस्रगिती , श्री वकुल भूषण भास्कर श्री शठकोप स्वामीजी के सहस्र पाशूर।

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 1

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

श्री रामानुज स्वामीजी और दिव्य प्रबन्ध

श्री दिव्य प्रबन्ध साक्षात आल्वारोंद्वारा प्रदत्त ज्ञान होने के कारण हमे श्री रामानुज स्वामीजी का श्री दिव्य प्रबन्ध के साथ जो संबन्ध है उसका अवलोकन करना आवश्यक है। ज्ञान की प्रणाली के साथ किसी के भी संबन्ध को विभिन्न दृष्टिकोणोंसे देखा जा सकता है।व्यक्ति एक छात्र के रूप में इस विषय का अध्ययन करने के लिए चुन सकते हैं. कोई एक छत्र के रूप में इसका अध्ययन करना चाहते हैं तो कोई और आगे बढ़कर एक विद्वान आचार्य बन सकता है ताकि वो इतरोंकों इस ज्ञान का प्रकाश कर सके। छात्र रूप में हो अथवा आचार्य रूप में हो, यह तो प्रमाणित होही जाता है की उसका संबन्ध इस विषय है।हम प्रवचन के प्रारम्भिक स्थिति में होने के कारण तर्क वितर्क करने वालोंकी आवश्यकता पूर्ण करनेके लिए तथा उन्हे और पढ़नेके लिए प्रोत्साहित करनेके लिए हमे इतनी जानकारी पर्याप्त है।

श्री रामानुज स्वामीजी – दिव्य प्रबन्ध के छात्र श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य प्रबन्ध के छात्र हैं इसके अनेक उदाहरण श्री गुरूपरम्परा ग्रंथोंमें प्राप्त होते हैं। श्री गुरूपरम्परा सारम् ग्रंथ के अनुसार श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री मालाधार स्वामीजी से सहस्रगीती का अध्ययन किया। श्री रामानुज नूट्रन्दादि (प्रपन्न गायत्री) में भी कई बार श्री रामानुज स्वामीजी के दिव्य प्रबंध के अध्ययन का उल्लेख किया गया है। इतिहास में तथा विविध स्तोत्रोमें श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य प्रबंध के विद्यार्थी होने के अनेक प्रमाण मिलते हैं। साथ में यह भी जानना जरूरी है की यह केवल ऊपरी अध्ययन अथवा व्यक्तिगत रुचि पे आधारित अध्ययन नहीं था। यह अध्ययन तो श्री नाथमुनी स्वामीजी से प्रणित आचार्य शिष्य परंपरा से दिव्य प्रबंध को जाननेकी व्यवस्था थी। यह कहना यथार्थ होगा की यह दिव्य आचार्य शिष्य परंपरा सहस्र वर्षोंसे चले आने का कारण एकमात्र श्री दिव्य प्रबंध ही हैं और श्री दिव्य प्रबंध इस परम्पराका अविभिन्न घटक है। अत: यह कहने में यत्किंचित भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए की श्री रामानुज स्वामीजी श्री दिव्य प्रबंध के एक समर्पित विद्यार्थी थे

 एम्पेरुमानार्  तिरुमलिअन्डन   र्श्रपाततिले्  तिरूवैमोज्हिकु अर्तम क्ए्ट्टरूलिनार

श्री रामानुज स्वामीजी – दिव्य प्रबन्ध के आचार्य

परंपरागत रूपसे श्री आलवारोंके दिव्य प्रबन्ध के पूर्व कुछ श्लोक निवेदन किए जातेए् हैं, जो श्लोक दिव्य प्रबन्ध का हिस्सा नहीं हैं। उन श्लोकोंको “तनियन” कहा जाता है।

हर दिव्य प्रबन्ध के लिए तनियन की संख्या परिवर्तनशील होती है। तनियन के कुछ उद्देश्य होते हैं, जो इस प्रकार हैं:
(I) यह दिव्य प्रबन्ध के महत्व को बताते हैं।
(II) जिन आल्वारोंने दिव्य प्रबन्ध की रचना की उनका महत्त्व बताते हैं।
(III) जिन आल्वारोंने दिव्य प्रबन्ध की रचना की उनका अवतारस्थल, अवतारदिन, या और कोई विशेषता बताते हैं।
(iv) दिव्य प्रबन्ध से जो संदेश मिलता है उसे संक्षिप्त रूप में समझाते हैं।
तनियन के उपरोक्त उद्देश्य स्पष्ट हैं। हमारे पूर्वाचार्योंकों दिव्य प्रबंधोंसे जो बोध हुआ और जो संदेश मिला वो सरल भाषा में तनियन हमे संक्षिप्त काव्य रूप में देते हैं।

परन्तु हमे ऐसे भी तनियन मिलते हैं जो उपरोक्त उद्देश्योंसे अलग हैं। यहाँ सहस्रगिती और पेरीय तिरुमोलि से कुछ तनियन प्रस्तुत कर रहे हैं।

सहस्रगिती में एक संस्कृत तथा पाँच तमिल श्लोक तनियन के रूप में हैं। उनमेसे दो तनियन हमारा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। एक श्री अनन्तालवान स्वामीजी से रचित है तो दूसरी श्री पराशर भट्टर स्वामीजी से रचित है। दोनों आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के समकालीन शिष्य एवं परम शिष्य हैं।

एयन्दवाबरूगींरत्ति ,इरामानुशमुनि तन ,वायन्दमलर प्पादम वणड्ंगुगिन्रेन,आयन्द पेरूम् , शीरार शडगोबन शैन्दमिळ वेदम तरिक्कम् पेराद उळ्ळम् पेर ,                                                                                      

तनियन में निवेदन किया है की शठकोप स्वामीजी दूारा रचित दिव्य प्रबंघोको ठीक तरह से आत्मसात करने के श्री रामानुज स्वामीजी के चरणकमलोकी वंदना करता हूं

वान तिगळुम् शोलै मदिळरगॅंर वण् पुगळ्मेल् , आन्र तमिळ्मरैगळ् आयिरमुम  ईन्र   मुदल्दाय् शडगोबन्  मोयम्बाल वळरत्त , इदत्ताय् इरामानुशन्                

  तनियन में निवेदन किया है की शठकोप स्वामीजी  एक माॅं की तरह  सहस्त्रगिती के १००० पाशुरोकों जन्म दिया‍‍ सहस्त्रगिती रूपी इस बालक का पालन पोषण धात्रेय माता के रूप मे श्री रामानुज स्वामीजी ने किया

पेरीय तिरुमोलि में एक संस्कृत तनियन तथा तीन तमिल तनियन हैं। उसमेसे एक विशेष तनियन श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी से रचित है।

एगंल गदिये इरामानुज मुनिये,शगैं केडुत्ताण्डदवराशा,पोड्ंगु पुगळ्,मगैंयरकोनीन्द मरैयायिरम आनैत्तम् तगुंमनम नीयेनक्कु त्ता

यह तनियन श्री रामानुज स्वामीजी से निवेदन करता है की मेरे मन को आशीर्वाद दीजिये की मेरा मन श्री परकाल स्वामीजी के पेरीय तिरुमोलि को धारण कर सकें।

श्री रामानुज स्वामीजी का उल्लेख ही इन सब तनियन के मुख्य भाग है। यह विचित्र है क्योंकी कोई सीधे उन प्रबन्ध करता श्री आल्वार को निवेदन कर सकता है ।अथवा वो सीधे श्रीमन्नारायण भगवान को भी निवेदन कर सकता है। अथवा वो श्री लक्ष्मी अम्माजी को भी निवेदन कर सकता है। अथवा वो लूप्त दिव्य प्रबन्ध का पता लगानेवाले श्री नाथमुनी स्वामीजी को भी निवेदन कर सकता है। परन्तु वो मुख्य रूप से श्री रामानुज स्वामीजी के तनियन ही निवेदन करना पसन्द करते हैं।

इस रहस्य का उत्तर श्री पराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा रचित तनियन से मिलता है। यह तनियन सहस्रगिती के संदर्भ में होनेपर भी सामान्य रूप में सभी प्रबंधोंके लिए लागू है।इसका उत्तर यह है: दिव्य प्रबन्ध श्री आल्वारोंके द्वारा रचित होनेपर भी उन प्रबंधोंका पालन पोषण करके उनको सामान्य अतिसामान्य जीवोंके उपयुक्त बनानेका कार्य श्री रामानुज स्वामीजी ने ही किया। श्री रामानुज स्वामीजी का महत्वपूर्ण योगदान है की उन्होने अपने शिष्योंकी की टिप्पणियों के माध्यम से दिव्य प्रबंधोंके अर्थोंको सुरक्षित बनानेकी व्यवस्था की। श्री रामानुज स्वामीजी के विषय में एतिह्य तथा निर्वाह दिव्य प्रबंधोंके टिप्पणियोंमें उपलब्ध हैं।
यह सब ध्यान रखते हुये श्री वरवरमुनी स्वामीजीने आर्ति प्रबन्धं में द्रविड़ वेदोंका पालन पोषण करने वाले श्री रामानुज स्वामीजी का मंगलशासन किया है।मारन् उरै  सैइद ठमिल् मरै वलर्तोन् वा्ज्हिडये
इस तरह श्री रामानुज स्वामीजी का दिव्य प्रबन्ध के आचार्य के रूप में जाना जा सकता है।

श्रीरामानुज स्वामीजी का संचलन
श्री रामानुज स्वामीजी उनके समय में अपने संचलनसे कैसे प्रसिद्ध हुये?
क्या वे एक महा विद्वान के रूप में जाने जाते थे या एक निपुण वेदांति के रूप में जाने जाते थे?
श्री रामानुज स्वामीजी के आचरण के प्रत्यक्ष साक्षी श्री तिरुवरंगथ्थु अमूधनार स्वामीजी थे। वो कहते है:

उऱू पेरूञ्जेल्वमुम् तन्दैयुम तायुम, उयर कुरूवुम् वेरि तरू पूमगळ् नादनुम, मारन विळडि्गय श नेरि  तुरूम शन्दमिळ् आरणमे एन्रिन नीळ् निलत्तोर ,अरिदर निन्र इरामानुशन एनक्कारमुदे

श्री रामानुज स्वामीजी ने अपने आप को ऐसा संचालित किया की समस्त विश्व यह जान जाये की श्री शठकोप स्वामीजी द्वारा रचित द्रविड़ वेद उनके माता हैं, पिता हैं, धन है, गुरू हैं, और भगवान भी हैं।
श्री रामानुज स्वामीजी का द्रविड़ वेदोंके प्रति समर्पण इससे श्रेष्ठतर रूप से नहीं कहा जा सकता।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/01/30/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-1/

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