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कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:
श्रीवानाचल महामुनये नम:

यह हिन्दि लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे कृष्णस्वामी य्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन है ।

यह लेख “श्रीमन्नम्पाडुवान्” के जीवन का वर्णन करती है जो तिरुक्कुरुन्गुडि एम्पेरुमान् (भगवान्) – नम्बि पेरुमाळ् (भगवान्) के परम पावन भक्त थे । इसी वर्णन मे एकादशि कि रात को इनका एक ब्रह्म राक्षस से वार्तालाप भी उपलब्ध है ।

ब्रह्म राक्षस — वह सद्ब्राह्मण जो पूर्व जन्म मे यागेत्यादि मे गलति कर राक्षस रूप मे पैदा हुआ हो ।

बहुत समय पहले, पृथ्वी (धरती) प्रलयजाल (कारणजल) मे डूब गयी थी । उस समय, धरती को बचाने भगवान् श्रीमन्नारायण ने वराह रूप धारण कर, इस कारणजल मे कूद गये । ब्रह्माण्ड के दीवारों मे फसी धरती को अपने तेज़ दन्तों (जो गजदन्त समान दिखे) से रक्षा कर, धरती को यथारूप व्यवस्थित करने के लिये योग्य क्षक्ति प्रदान कर, श्रीभूमि पिराट्टि (भगवान् कि मुख्य पत्नी जो धरती कि मुख्य देवी है) को सराहते हुए आलिङ्गन किये । उस समय श्रीभूदेवी धरती पर त्रस्त समस्त चेतनों के प्रति कृपा दर्शाते हुए अपने स्वामी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीवराह रूपावतार से नम्र निवेदन की – हे भगवन् ! आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ दासी की रक्षा की है । इस धरातल पर रहने वाले समस्त चेतनों (मेरे पुत्रों / पुत्रियों) का सुगम उद्धार हेतु मार्ग दर्शन करावें । भगवान् तुरन्त बोले – हे देवी ! मेरा नामोच्चारण ही सरल और सुगमोपाय है । इसी से इनका समस्त कल्याण व उद्धार होगा । इस उपलक्ष मे, मै तुमको एक सरल सद्भक्त नम्पाडुवान् की महिमा प्रस्तुत करूँगा जिससे नामोच्चारण (नाम-सङ्कीर्तन) कि महिमा प्रकाशित स्वत: होगी ।

यह दिव्य चरित्र गाथा भगवान् ने इस प्रकार से बताया :

भगवान् तिरुक्कुरुन्गुडि नामक दिव्यदेश मे स्वपत्नी समेत (श्री-भू सहित) अर्चारूप मे कृपावशात वास कर रहे है । इस दिव्यदेश के भीतर प्रान्त मे, एक चाण्डाल वंश (यह चातुर्वर्ण के अन्तर्गत् नही है) मे जन्मे भगवान् के महद्भक्त । इनको बचपन से ही भगवान् का नाम-सङ्कीर्तन करने का बहुत बडा शौक था । अत: इस प्रकार से प्रेरित भगवद्भक्त, प्रतिदिन रात्रि समय मे, इस दिव्य देश के अर्चारूप भगवान् को वीना-गान संयुक्त अपनी भक्ति को भगवन्नाम सङ्कीर्तन के जरिये, शास्त्र सम्मत दूरी से, दिव्य देश के वासियों के उठने से पहले स्वकैङ्कर्य (नाम-सङ्कीर्तन) कर चले जाते थे । अत: इस प्रकारेण आप श्री पाडुवान् के नाम से विख्यात हुए । पाडुवान् — जो मधुर गान गाता है । भगवान् ने स्वयं आप श्री को नम्पाडुवान् कि उपाधि देकर आपके नाम-सङ्कीर्तन के स्वारस का अनुभव करने लगे । अत: इस प्रकार से बहुत समय तक नित्य रात्रि समय मे भगवद्-कैङ्कर्य मे अपने आप को सम्लग्न किया ।

एक समय, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात मे, जागरण-व्रत हेतु तिरुक्कुरुन्गुडि भगवान् के प्रति प्रगतिशील नम्पाडुवान् की भेंट एक ब्रह्मराक्षस से हुई । यह ब्रह्मराक्षस अपनी भूख मिताने के लिये इन्तेज़ार कर रहा था । अचानक आप श्री को देखकर वह सन्तुष्ट हो गया कि उसको उसका आहार स्वयं चल कर आया है । अत: यही निवेदन ब्रह्मराक्षस ने आप श्री के समक्ष रखा और आप से परस्पर चर्चा कर अपना जीवन वृत्तान्त बताया कि वह पिछले जन्म मे सोम शर्मा नाम का ब्राह्मण था और जिसने यज्ञ-यागादि मे त्रुटि कर ब्रह्मराक्षस रूप धारण किया । तब आप श्री ने उसको सराहते हुए कहा – हे ब्रह्मराक्षस ! आपकी बातों से बहुत प्रसन्न हुआ । आपकी महती कृपा से आज मै अपने प्राण त्याग सकता हूँ । लेकिन एक बात है कि मै अभी आपकी इच्छा पूर्ति नही कर सकूँगा । मै नित्य रात्रि को समीप मे स्थित भगवान् के मन्दिर जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन करता हूँ । मेरा यह सुवसर छोडने पर मजबूर न करें और मुझे जाने की आज्ञा दे । मुझे मेरा स्वगान से जागरण-व्रत सम्पूर्ण कर, भगवान् को सन्तुष्ट कर आने दे । मै अवश्य आवूँगा । यह मेरा वचन है । ब्रह्मराक्षस ने कहा : हे नम्पाडुवान् ! यह तुमहारा कोई छल लग रहा है । अगर तुमको छोड दूँ तो तुम मुझसे छुटकारा प्राप्त कर सकते हो और पुनः लौटोगे नही । यह सुनकर आप श्री ने इस ब्रह्मराक्षस को आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहा :

अगर मै नही लौटा तो निम्नलिखित पापों के फल का अधिकाधिक फल मुझे प्राप्त हो :

१) असत्यता का पाप (श्लोक ३३)
२) कामवासना से आवृत अन्यों कि पत्नियों के साथ अवैध सम्बन्ध का पाप (श्लोक ३४)
३) जब मै और कोई अन्य भोजन करते समय भोजन मे भेदभाव दिखाने का पाप (श्लोक ३५)
४) ब्राह्मण को दान मे स्थल दे कर पुनः उससे छीनने का पाप (श्लोक ३६)
५) युवनावस्था कि लडकी का सम्भोग करना और बुढापे उसमे दोष देखकर उसका परित्याग करने का पाप (श्लोक ३७)
६) पित्रु-तर्पण के दिन स्वपत्नी का सम्भोग का पाप (श्लोक ३८)
७) उस व्यक्ति का अपमान करना जिसने भोजन प्रदान किया है वह पाप (श्लोक ३९)
८) अपनी बेटी का विवाह करने का वचन देना और तत्पश्चात् उस व्यक्ति से उसका विवाह न करना का पाप (श्लोक ४०)
९) षष्ठी, अष्टमी, अमावास्य, चतुर्दशि के दिन बिना स्नान किये भोजन ग्रहण करने का पाप (श्लोक ४१)
१०) दान करने का वादा कर दान नही करने का पाप (श्लोक ४२)
११) स्वयं के मित्र की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखना जिसका बहुत बडा एहसान स्वयं पर हो का पाप (श्लोक ४३)
१२) स्वाचार्य एवं राजा की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने का पाप (श्लोक ४४)
१३) दो स्त्रियों से विवाह करना और तदुपरान्त एक का पक्षपात करने का पाप (श्लोक ४५)
१४) एक पतिव्रता स्त्री का यौवनावस्था मे त्यागना (जो पूर्णतया निर्भर है) का पाप (श्लोक ४६)
१५) उस गोवृन्द को रोकना का पाप जो जल पीने के लिये जा रहे है (श्लोक ४७)
१६) ऐसे पूर्वपीढी कृत पञ्च महापापों (जैसे ब्राह्मण हत्या) का फल (श्लोक ४८)
१७) अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने का पाप (श्लोक ४९)
१८) अन्य देवी-देवताओं को श्रीमन्नारायण के तुल्य मानने का पाप (श्लोक ५०)

जब तब अठारहवाँ पाप के बारे मे नही बताया, तब तक ब्रह्मराक्षस पूर्वोक्त पापों को नही माना । जब आप श्री ने अठारहवाँ पाप के बारे मे बताया, ब्रह्मराक्षस को पूर्ण विश्वास हुआ क्योंकि यह ऐसा महामहापाप जिसे करने से हर एक जीव इस सम्सार चक्र मे नित्य बन्धित हो जाता है । ऐसे विश्वास से ब्रह्मराक्षस ने आप श्री को छोडकर आपके वापसी की प्रतीक्षा करने लगा ।

अनुवादक टिप्पणी : अठारहवाँ पाप – अन्य देवतान्तरों को भगवान् श्रीमन्नारायण के तुल्य मानना महद्पाप है । इस पूराण का महदुदेश्य यही है कि ज्ञानी जन इसको जानकर इसका पूर्ण परित्याग करे ।

अत: इस प्रकारेण वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् अपने प्रिय भगवान् के समक्ष जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन कर, भगवान् को प्रसन्न किये और स्वदेह त्याग की अन्तिम इच्छा से ब्रह्मराक्षस की ओर अति शीघ्रता से चले । पुनः स्वाहार को देखकर प्रसन्न ब्रह्मराक्षस ने आप श्री की महिमा को जान गया । ब्रह्म राक्षस ने वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् से उनके मधुर गान के फल को माँगा । श्रीमन्नम्पाडुवान् ने यह सुनकर उत्तर दिया – यह तो असम्भव है श्रीमन् ! मुझे पता नही आपको इसका फल भी दे पावूँगा कि नही क्योंकि वह स्वकैङ्कर्य के प्रति किछु भी नही चाहते थे । पुनः पुनः निवेदन करने पर उनके एक गान का फल देने के लिये राज़ी हो गये आप श्री । इस प्रकार कैशिक छन्द मे गान का फल प्राप्त कर यह ब्रह्म राक्षस मुक्त हो गया । इस स्थिति से मुक्त ब्रह्मराक्षस ने राक्षस देह त्यागकर, परलोक प्राप्त किया । तदनन्तर पुनः स्वकैङ्कर्य प्राप्त कर श्रीमन्नम्पाडुवान् भगवन्नाम-सङ्कीर्तन सेवा मे सम्लग्न हुए और अन्तत: भगवद्धाम प्राप्त किये ।

यह दिव्य चरित्र का वर्णन श्रीमन्नारायण (वराह भगवान्) ने स्वपत्नी श्रीभूदेवी को किया । अत: इस प्रकारेण यह सङ्क्षिप्त वर्णन सम्पूर्ण हुआ ।

इस पुराण का पाठ अनेक दिव्यदेशों मे इस दिन किया जाता है । तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्य देश मे नाटक रूप मे यह दिव्य चरित्र दर्शाया जाता है ।

इस पुराण का मङ्गल श्लोक :

नमस्तेस्तु वराहाय लीलोद्धराय महीम् ।
कुरमध्यतोऽयस्य मेरु:गणगणायथे ॥

अर्थात् : मै उन वराह भगवान् को भजता हूँ, जिनने इस भू (धरातल) को बिना विशेष प्रयास से उठा लिया और जिनकी तुलना मे मेरुपर्वत तिनके के समान है ।

यही भाव पेरिय तिरुमोऴि ४.४.३ – ” शिलम्बिनिडैच् चिरु परैपोल् पेरिय मेरु तिरुक्कुरुळम्बिल् कणकणप्पा ” मे है ।

प्रलयोदन्वदुत्तीर्णम् प्रपद्येऽहम् वसुन्धराम् ।
महावराह दम्श्ट्राग्र मल्लीकोसमधुव्रतां ॥

मै उन भूदेवी के शरणागत हूँ जिनको महावराह भगवान् ने कारणजल से उठाया, और उनके (भगवान् के) मल्लिका पुष्प तुल्य दन्तों मे कृष्णवर्ण भौंरे के समान है ।

श्रीपराशर भट्ट ने इस पुराण की व्याख्या लिखी है और इस महद्कार्य के लिये उनको भी प्रणाम करते है :

श्रीपराशर भट्टार्यः श्रीरङ्गेश पुरोहित: ।
श्रीवत्साङ्कसुत: श्रीमान् श्रेयसेऽमेस्तु भूयसे ॥

(वह) श्रीपराश्रभट्ट स्वामी मुझे सभी शुभ प्रदान करे, (जो) श्रीरङ्ग भगवान् के पुरोहित है, (जो) श्रीवत्साङ्क (कूरेश) के सत्पुत्र है और जो कैङ्कर्यश्री भाव से सर्वदा पुरित है ।

आऴ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं
जीयर् तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन् सेट्टलूर कार्तीक श्रीहर्ष रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/11/kaisika-mahathmyam.html

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