Author Archives: Karthik Sriharsha

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १२

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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१११) मुक्तात्मानुक्कु लीलाविभूति तदीयत्वाकारत्ताले उद्देश्यमाग निन्रतिरे

मुक्तात्मा के लिए, लीलाविभूति (यह भौतिक संसार) भोग्य वस्तु ही है क्योंकि यह भी भगवान् की ही सम्पत्ति है । यह हमने १०५ वें  सूत्र मे विस्तारपूर्वक देखा है ।

११२) उरङ्गिनानागिल् परक्क्षणत्तुक्कु उडलायिरुक्कुम् । उणर्तिरुन्तानागिलुम् अप्पडिये ।

 

जैसे कहा गया है — उरङ्गुवान् पोल् योगु शेय्द परुमाळ् अर्थात् वह परब्रह्म भगवान् जो शयन (योग-निद्रा) का छल कर निरन्तर सभी चिदाचित वस्तुओं का संरक्षण और श्रेय का चिन्ता कर रहे है। यथारूप वही भगवान् सबका संरक्षण जागृक अवस्था मे भी करते है ।

अनुवादक टीका: इस पासुर व्याख्यामे, श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी कहते है – भगवान् स्वनेत्र बन्द (योग-निद्राका छल कर) करते है ताकि वह विभिन्न योजनाओंसे जीवोंका संरक्षणेत्यादि कार्यों पर दीर्घ आलोचन कर सकें (जैसे हम सभी किसी कार्य के सन्दर्भ में स्वनेत्र बन्द कर दीर्घ आलोचन करते है)। आऴ्वार नित्य इंगित करते है कि सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने वाले एक मात्र भगवान् ही है। भगवान् के इस दिव्य गुण से प्रभावित आऴ्वार परम श्रद्धा से अपना निर्वाह कर रहें है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् छल (योग-निद्रा) अवस्था और जागृक अवस्था दोनों अवस्थाओं में सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने में तत्पर रहते है। यह प्रतिपाद्य विषय श्रीमद्रामायण की लीलाओं में दृग्गोचर है। भगवान् श्रीरामचन्द्र का शिविर समुद्रतट के किनारे पर था। हर रात्रिमे भगवान् के शिविर के चारों ओर तैनात वानर सेना टहलते है। भगवान् के शिविरके चारों ओर टहलते वानर सेना में प्रत्येक वानर बारी-बारी मे थक कर विश्राम करने चले जाते और अन्तोगत्वा शिविर की रक्षा करने मे कोई भी तैनात नही बचता। शिविर के अन्दर से यह दृश्य देखकर भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वयं शिविर के भीतर आकर विश्राम करते हुए वानर सेना के चारों ओर स्वयं चलकर उनका संरक्षण करते थे।  देखिए यह कितना सुन्दर दृश्य है। हमारे पूर्वाचार्य अतः बारम्बार कहते है की भगवान् ही जीवके परमकल्याण कारक और श्रेयोभिलाषी है क्योंकि जीवके जागृक-अवस्था और निद्रावस्था दोनों अवस्थाओं मे भगवान् जीवका संरक्षण करते है।

११३) चक्करवर्ति तिरुमगनुक्कु विल्लुकैवन्दिरुक्कुमापोलेयायिट्रु कृष्णनुक्कु कऴल् कैवन्दिरुक्किपडि

जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रको उनके शार्ङ्ग धनुष पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे धनुषका प्रयोग करते है, ठीक उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को भी उनकी मुरली पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे मुरली का प्रयोग सुन्दर मधुर वेणु-ध्वनि का है।

अनुवादक टीका: यथा श्रीमद्रामायण मे उल्लिखित है – भगवान् श्रीरामचन्द्र का शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी तिरुप्पल्लाण्डु दिव्य-प्रबंध के अन्तिम पासुर ‘शार्ङ्गमेन्नुम् विल्लाण्डान्मे यही दर्शाते है की वह जो स्व धनुष का पूर्ण नियंत्रण करता है अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्रका शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। इस पासुर टीका मे टीक कर (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामाजी) यह दर्शाते है की भगवान् का शार्ङ्ग धनुष सभी आयुधों का प्रतिनिधि है। इसका यह अर्थ हुआ की भगवान् सभी जीवों (नित्यसूरिगणों, मुक्तात्माओं, अन्य जीवात्माओं) के एक मात्र नियंत्रक है। यहां आण्डान् शब्द का केवल यह अर्थ नही की भगवान् यह दिव्यायुध को धरे है परन्तु भगवान् के परिपूर्ण नियंत्रण को भी दर्शाता है यथा एक राजा स्वप्रजा को परिपूर्ण नियंत्रण मे रखता है।

भगवान् श्रीरामचन्द्र

श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ३.६ ‘नावलम् पेरियतीविनिल् पदिग‘ मे श्रीकृष्ण भगवान् की वेणु माधुर्य कुशलता और वेणुधुण के आकर्षक प्रभाव का वर्णन अति सुन्दरता से करते है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामाजी, श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य शरीर के अंगों का वर्णन आकर्षक ढंग से करते है (जैसे उनके दिव्य करकमलों का सुन्दर स्थान/स्थिति, उनकी वेणु को स्पर्श करते हुए उनके अधर ताकि वेणु को बजा सकें, उनका एक तरफ़ा दिव्य अर्गभाग, वायु उच्छश्वसन और निश्वसन के कारण भगवान् के कोष्ठ का विस्तार और निपात होना)। श्रीकृष्ण भगवान् की दिव्य वेणुधुण के श्रवण से मन्त्रमुग्ध वृन्दावन की गोपिकाएँ, गाएँ और अन्य पशु, देवलोक के नृत्यक ऐसे खडे है जैसे उनके सभी के नेत्रों की गतिविधि प्रतिबन्धित है। इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् का उनकी वेणु पर नियंत्रण और प्रभुत्व है।

 

११४) गणत्तारुण्डायिरुक्कच् चेय्देयुम् भारमिल्लैये अहङ्कार स्पर्शमुडैयार् इल्लामैयाले


श्रीभगवान् के दिव्य धाम (परमपद) मे ऐसे अनेक दिव्यसूरिगण है जो परिपूर्ण ज्ञानी (सुविज्ञ) है परन्तु उनमे स्वल्प मात्रा मे अभिमान व गर्व नही है। अतः ऐसे दिव्यसूरिगण को भार नही माना जाता है।अनुवादक टीका: श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ४.४.६ पासुर मे कहते है की जो सुदर्शनचक्र से सुशोभित तिरुक्कोष्ठियूर के अर्चाविग्रह भगवान् का ध्यान नही करता और भगवान् को नही भजता,वह केवल भू-भार है। इसी प्रकारेण तिरुप्पावै के मंगलाचरण पासुर – ‘पातङ्गळ् तीर्क्कुम्’ मे पासुर रचनाकार कहते है – वह सभी जो तिरुप्पावै के (३०) तीस पासुरों के ज्ञाता नही है वह भूमि के द्वारा कदापि स्वीकृत नही है। इनकी तुलना मे परमपद के दिव्यसूरिगण पूर्णतया सिद्ध और सुविज्ञ है अतैव किसी के लिए भी भार नही माना जाता है।

११५) शेषिक्कुपायभावम् स्वरूपानुबन्धियान पिन्बु शेषत्वनुक्कुम् प्रावण्यम् स्वरूपानुबन्धियागक् कडवदु

जैसे भगवान् (शेषि) का मोक्षोपाय (जीवका संरक्षण कर जीवको मोक्ष प्रदान करना) होना स्वाभाविक है वैसे ही जीवात्मा (शेष) का भगवान् मे रति होना भी स्वाभाविक है।

आऴ्वारों को भगवान् मे अत्यन्त रति का दृश्य

अनुवादक टीका: मोक्ष का एक मात्र उपाय भगवान् ही है। जीवों का संरक्षण करना भगवान् का स्वाभाविक गुण है। अतः इस प्रकारेण जीवात्मा का भगवद्-कैङ्कर्य (स्वस्वामी का कैङ्कर्य) करना स्वाभाविक है। भगवान् के प्रति इस स्वाभाविक-कैङ्कर्य को अत्यन्त प्रेम, भक्तिभाव, और रतियुक्त से करना चाहिए। इस विषयको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्रके ८०वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में बहुखूबी से समझाते है।

सर्वप्रथम, भगवद्-कैङ्कर्य विषय मे, इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी), पेरिय-उडयार् (जटायु), पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामीजी और चिन्तयन्ती को प्रेरणास्तोत्र मानकर श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उनका वर्णन ८०वें सूत्र मे करते है।

श्रीमद्रामायण से अभिज्ञात है की इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) सदैव श्रीरामचन्द्रजी के साथ ही रहते थे। श्रीरामचन्द्र की सन्निकटता मे इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) ने उनकी सेवा विभिन्न प्रकार और अवस्थाओं मे की है। पेरिय-उडयार् (जटायु) और पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी के विषयमे कहते है की इन दोनों ने स्वदेहकी चिन्ता छोड़कर भगवान् के लिये शरीर को त्याग दिया। चिन्तयन्ती नामक गोपी ने भगवद्-विप्रलम्ब भावमे शरीर को त्याग दिया।

८० वें सूत्रकी व्याख्या मे, पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्यचरित्र का वर्णन विस्तार पूर्वक है। पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्य जन्म श्रीरङ्गम के कुछ कोस दूर तोट्टियम् तिरुनारायणपुरम नामक दिव्य क्षेत्र मे हुअा था। एक बार कुछ भगवद्-विरोधि भगवद्विग्रह को आग लगाने की कुचेष्टा करते है। यह जानकर पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी तुरन्त जलते भगवद्विग्रह को आलिंगन कर और इसके पारिणाम स्वरूप शरीर को त्याग देते है। यहां एक प्रश्न उठता है – क्या भगवान् के लिये शरीर को त्यागना क्या उपाय है ? – श्रेष्ठ एवं सिद्ध भगवान् ही उपायोपाय तत्त्वमे परम निष्ठ पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का इस प्रकार के कार्य मे संलग्नता कितना उचित है।

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी ८० वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में इस तत्त्व का वर्णन करते है जिसकी अभूत पूर्व व्याख्या श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने हम भगवद्-बन्धुओं के लिये प्रेषित किया है यथा :

  • सूत्र ८६ – भगवद्-प्रेम से येन-केन प्रकारेण किया गया कार्य कदाचित भी उपाय नही माना जाता है। इस प्रकार का व्यक्तिकरण भगवद्प्रपन्नों मे भगवद्-प्रेम का ही परम स्वरूप है।
  • सूत्र ८७ – उपाय भावना से किए गए कार्य त्याज्य है और कैङ्कर्य भावना से किए गए कार्य सर्वदा स्वीकृत है।
  • सूत्र ८८ – भौतिक वस्तुओं मे रुचि रखने वाले भौतिकवादि, उन भौतिक वस्तुओं को पाने के लिये जिस प्रकार स्वप्राण त्यागने के लिये सदैव तत्पर रहते है ठीक उसी प्रकार भगवद्-प्रेम से ओत-प्रोत भगवद्प्रपन्नों के विभिन्न कार्य भगवद्-प्रेम के कारण स्वाभाविक है।
  • सूत्र ८९ – ऐसे भगवान् से अत्यन्त आसक्त एवं अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्नजनों का अनुष्ठान (शास्रविधि) और अननुष्ठान (अशास्रविधि) उपाय (अन्य मार्ग के माध्यम और स्वप्रयासों से भगवान् को प्राप्त करना) के भाग नही होते है।
  • सूत्र ९० – ऐसे कार्य जैसे भगवान् के प्राकट्य अप्राकट्य मे विलम्ब होने से उत्पन्न मनोवेदना को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना ,भगवान् को संदेशवाहकों के द्वारा संदेश भेजना इत्यादि आऴ्वारोंमे द्रष्टव्य है परन्तु यह केवल भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम और भक्ति का ही व्यक्तिकरण है।
  • सूत्र ९१ – ऐसे कार्य जो विशेष और महान व्यक्तित्वों मे द्रष्टव्य है, वह सदा स्मरणीय और कीर्तनीय है क्योंकि आप सभी सर्वज्ञ है तथापि भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम से संभ्रांत है।
  • सूत्र ९२ – ऐसे कार्य भगवदनुभव और कैङ्कर्य के अङ्ग है। भगवान् स्वयंकी सम्पूर्ण हर्षता के लिये नियुक्त अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्न जनों को दिव्यानुग्रह से आऴ्वारों मे परिवर्तन करने का स्वप्रयत्न का प्रतिफल ऐसे कार्य होते है।

११६) प्राप्त विषयप्रावण्यम् स्वरूपमागैयाले अवध्यकरमन्रु । सीआज्ञमामित्तनै ।

चूंकि भगवान् के प्रति रति (जो जीव के स्वाभाविक रति विषय वस्तु है) जीव के लिये स्वाभाविक है और तुच्छ नही है।  वास्तव मे यह सराहनीय है।

अनुवादक टीका: भगवान् के प्रति रति और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने की लालसा जीव के लिये स्वाभाविक है। इस तत्त्वको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे सुन्दर ढंग से समझाया है और इन सूत्रों पर श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने अभूतपूर्व व्याख्या लिखा है यथा :

  • सूत्र ५२ – शेषत्वम् दु:खरूपमागवन्रो नात्तिल् काण्गिरदु एन्निल् – ऐसा माना जाता है की इस भौतिक जगत् मे किसी व्यक्ति की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है। श्रीवरवरमुनि स्वामाजी मनुस्मृति के श्लोक ‘सर्वम् परस्वं दु:खम्‘ – (अर्थात् किसी की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है) और ‘सेवा श्व वृत्ति‘ (अर्थात् सेवा श्वान की वृत्ति है अत: त्याज्य है) का उदाहरण से समझाते है की शेषत्व दु:ख पूरित है ।
  •  सूत्र ५३ – अन्द नियमम् इल्लै; उगन्द विषयत्तुक्कु शेषमायिरुक्कुम् इरुप्पु सुखमागक्काणगैयाले – सेवा वृत्ति दु:ख पूरित है यह असत्य है। आत्मीय जनों का भृत्य बनना सदैव सुखदायक और आनन्दप्रद है।
  •  सूत्र ५४ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। प्रणव मे अ-कार वाच्य शब्द भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के निधित्व का प्रतीक है। हमारा (जीवों) का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है और उनकी सेवा करने का फल सदैव आनन्दप्रद और सुखदायक है।
  •  सूत्र ५५ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। यह पूर्ववर्ति सूत्र मे संशय प्रश्न का उत्तर है।  अगर जीवों का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है तो क्या यह स्वाभाविक है या अस्वाभाविक है। क्या यहां यह कहना उचित होगा की भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के अभाव मे जीव स्वशेषत्व त्याग देगा ? इसका उत्तर यह है -भगवान् का शेष होना जीव का वास्तविक और स्वाभाविक रूप है जैसा शास्त्रों मे निर्देषित है।
  •  सूत्र ५६ –  शेषत्वम् इल्लादपोदु स्वरूपमिल्लै – जब शेषत्व नही है तो जीवात्मा स्वस्स्वरुप को त्याग देता है।

११७) जीवपरङ्गळ् इरुवरुक्कुम् अपहतपाप्मत्वादिगळ् उण्डायिरुक्कच्चेय्तेयुम् जीवात्मावुक्कु हेयमुण्डाय् भगवदनुग्रहत्ताले कऴियुम् परमात्मा हेय सम्सारग्गनर्हनाये इरुक्कुम्

भगवान् स्वत: विशुद्ध और निष्कलंक है

अपहतपाप्मा गुण से शुरूवात होकर जीवात्मा और परमात्मा दोनों मे आठ गुण समान है। यह गुण जीवात्मा मे तभी प्रकट होते है जब जीवात्मा देह को त्यागकर भगवान् की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। इसे स्वरूपाविर्भाव कहते है। भगवान् का कोई भौतिक शरीर नही है जो उनके कल्याण गुणों को गुप्त रखता है अर्थात् भगवान् का स्वरूप विशुद्ध और पारलौलिक है। आठ समान गुण है –

  • अपहतपाप्मत्वम् –  अपराधों और दोषों से असम्बन्धित या मुक्ति
  • विरजत्वम् –  वृद्धावस्था से मुक्ति
  • विमृत्यत्वम् – मृत्यु से मुक्ति
  • विशोकत्वम् – शोक से मुक्ति
  • विजिगत्सत्तवम् – क्षुधा से मुक्ति
  • अपिबासत्वम् – पिपासा से मुक्ति
  • सत्यकामत्वम् – दिव्य गुण जो रसास्वादनीय है
  • सत्यसङ्कल्पत्वम् –  स्वसङ्कल्पों को पूरा करने की क्षमता

अनुवादक टीका : जीवात्मा स्वाभाविक रूपसे विशु्द्ध और सत्त्वगुणों से सम्पन्न है। भौतिक जगत् मे कर्मसे बन्धित जीवोंका ज्ञान और आनन्द प्रतिबन्धित होता है। भगवान् की कृपासे उन जीवोंका उद्धार होता है अर्थात् कर्म के बन्धन से मुक्त होता है तो मुक्तात्मा कहलाते है और अन्ततोगत्वा परमपद को पहुँचते है। उस समय, मुक्तात्मा सम्पूर्ण ज्ञान, आनन्द और भगवान् की कृपासे प्राप्त आठ सत्त्व गुणों को भली-भाँती समझता है।

भगवान् कदापि कर्म से बन्धित नही होता है। वास्तविकता मे, जीवोद्धार हेतु भगवान् इस भौतिक जगत् मे निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है। अत एव ऋगवेद कहता है – ‘ स उ श्रेयान् भवति जायमान: ‘ – अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् के प्राकट्य से भगवान् स्वयं  प्रशंनीय हो जाते है। जब भगवान् परमपद से भौतिक जगत् मे प्रगट होते है तो वह अपने सत्त्वगुणों को यथारूप और दिव्य पारलौलिक शरीर सहित पधारते है। उनका शरीर जीवात्माओं के शरीर से भिन्न है। इस विषय को अति उत्तम से श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ – ‘ अदियम् शोदि उरुवै अङ्गु वैत्तु इङ्गुप् पिरन्दु ‘ पासुर मे समझाते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस पासुर मे यह कहते है की परमपदमे भगवान् (जो नित्य है) का जो दिव्य मंगल आकर्षक स्वरूप द्रष्टव्य है वही स्वरूप इस भौतिक जगत् मे प्रगट होता है।

११८) नीर्मैक्केल्लैयान तिरुमलै अाश्रयणीयस्थलम् ; मेन्मैक्केल्लैयान परमपदमनुभवस्थानम्

नीर्मै – सरलता, सौलभ्यता – अर्थात् सरलता से कोई भी भगवान् की सन्निकटता (का सान्निध्य) प्राप्त कर सकते है। ऐसी सरलता केवल तिरुमला (श्रीनिवास भगवान्) मे दृश्यमान है। परत्व की पराकाष्ठा परमपद मे दृश्यमान है जहां जीव भगवान् के गुणों का नित्य रसास्वादन करता है।

अनुवादक टीका : श्रीनिवास भगवान् सरलता और सौलभ्यता के प्रतीक है। तिरुमऴिशै आऴ्वार नान्मुगन् तिरुवन्दादि ४५ पासुर मे कहते है की श्रीनिवास भगवान् नित्य सूरियों और संसारियों के लिये समान है। उत्तरवर्ति पासुर मे तिरुमऴिशै आऴ्वार कहते है की तिरुमला मे जन्तु (जानवर) भी श्रीनिवास भगवान् की सौलभ्यता का लाभ उठाते है। कुलशेखराऴ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि ४.५ – अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडन्तियन्गुम्  पासुर मे कहते है सभी प्रकार के जीव तिरुमला मे रहकर तिरुमला के अधिपति श्रीनिवास भगवान् की सेवा और वन्दना करते है। पूर्वाचार्य आगे कहते है यह जीव त्रिश्रेणी के होते है – १) अनन्य प्रयोजनपरर जीव – अन्याभिलाषा रहित अनन्य भक्त जिन्हें अडियार् कहते है। २) प्रयोजनान्तरपरर जीव व वानवर् — वह सारे देव जो साम्सारिक सुखों की अभिलाषा रखते है। ३) अन्यशेषपरर व अरम्बै – रम्भा, ऊर्वशी इत्यादि जो अन्य देवों की सेवा करते है।

परमपद आनन्दप्रद और हर्षमय है। वहां आनन्द की कोई सीमा नही होती है। वहां भगवान् ही पूर्ण केन्द्रबिन्दु है और भगवान् का परत्त्व पूर्णतया दृष्टिगोचर है।

119) स्वरूपानुरूपमान प्राप्यानुसन्धानम् पण्णिनाल् पोय्प्पुक्कल्लन्दु निर्क वोण्णादु

जीवात्मा भगवान् के प्रति स्वदासत्व तत्त्व को समझकर तथा (स्वस्वरूपानुरूप ज्ञान के फलसे प्राप्त) स्वस्वरूपानुरूप कैङ्कर्य की अभिलाषा, का नित्यानुसन्धान करते रहने से, वह (जीवात्मा) अवश्य भगवद्धाम को पहुँचता है।

अनुवादक टीका : श्रीशठकोप स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ३.३ पासुर ‘ओऴिविल् कालम्’ मे कैङ्कर्य प्राप्तिकी अत्यन्त इच्छा को व्यक्त करते है। भगवान् की निर्हेतुक कृपासे जीवके वास्तविक स्वरूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है इस सिद्धतत्त्वको समझकर श्रीशठकोप स्वामीजी स्वरुपानुरूप कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना ३.३ पासुर मे करते है। इस पासुर मे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की दोषरहित वह भगवान् की सेवा हर अवस्था, हर समय, हर रूप और भगवान् की सन्निकटता मे सेवा करते है। हमारे पूर्वाचार्य कहते है हम प्रपन्नजनों को सदैव कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना भगवान् से करते रहना चाहिए जो भगवान् को आनन्ददायक है।द्वयमहामन्त्र जाप का प्रतिफल और ध्येय (लक्ष्य) यही तो है। द्वयमहामन्त्र के दो खण्ड (भाग) है – प्रथम भाग मे हम पहले श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से भगवान् के दिव्य चरणों को उपाय मानते है। दूसरे भाग मे अन्याभिलाषा रहित केवल दिव्य दम्पति के परमसुख के लिये दिव्य दम्पति के प्रति हम विशुद्ध सेवा की प्रार्थना करते है। एरुम्बियप्पा स्वामीजी, पूर्वदिनचर्या स्तोत्र मे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या का सुन्दर वर्णन लिपिबद्ध किये है। इस स्तोत्र मे, एरुम्बियप्पा स्वामीजी कहते है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अधर सदा द्वयमहामन्त्रका जाप करते है और उनका मन सदा द्वयमहामन्त्र के अर्थांका (अर्थात् तिरुवाय्मोऴि का) अनुसन्धान करता है। इस प्रकिया से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को दिव्यानुभूति होती है और उनके दिव्य शरीर मे अनेकानेक रूपान्तरण जैसे रौंगटे खडे होना इत्यादि द्रष्टव्य है।


१२०) नम् मुदलिगळ् गुरुपरम्परै मुन्नाग द्वयानुसन्धानम् पण्णुगिरदु

गुरु परम्परा

द्वयमहामन्त्र (मन्त्ररत्न – मन्त्रों मे रत्न मन्त्र) का विषय – श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् – जीवों का एकमात्र शरण

 

अनुवादक टीका : हम सभी इस विषय से परिचित है की हमारे पूर्वाचार्य सदा द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करते थे। इससे यह बात और भी सुस्पष्ट होती है की द्वयमहामन्त्र का उच्चारण व जाप स्वतंत्र भाव से कदापि नही किया जा सकता है अर्थात् गुरुपरम्परा का अनुसन्धान किये बिना द्वयमहामन्त्र का उच्चारण करना वर्जित है। जीव कदापि द्वयमहामन्त्र के विषय अर्थात् श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्वतंत्र भाव से उनकी शरण नही लेता परन्तु केवल गुरुपरम्परा के माध्यम से ही उभय का शरण लेता है। अत एव हमारे पूर्वाचार्य सदैव द्वयमहामन्त्र जाप के पहले सर्वप्रथम गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करते थे।

अस्मद्गुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य )  
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य के आचार्य – परमाचार्य )
अस्मद् सर्व गुरुभ्यो नम:  (सभी पूर्वाचार्य और वर्तमानाचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुश दासाय नम: (श्रीपेरियनम्बि – श्रीपराङ्कुशदास स्वामीजी)
श्रीमद्यामुनमुनये नम: (आळवन्दार – श्रीयामुनमुनि स्वामीजी)
श्री राम मिश्राय नम: (मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (उय्यकोण्डार् – श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन् नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनिगळ् – श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (नम्माऴ्वार – श्रीशठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वकसेनाय नम: (सेनै मुदलियार् – श्रीविष्वकसेन)
श्रियै नम: (पेरिय पिराट्टि – श्रीमहालक्ष्मी)
श्रीधराय नम: (पेरिय पेरुमाळ् – श्रीरङ्गनाथ भगवान्)

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उपरोक्त विषय का विवेचन श्रीवचनभूषण २७४ सूत्र मे अती सुन्दर ढंग से करते है। वह कहते है – जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – प्रत्येक प्रपन्न को नित्य गुरुपरम्परा सहित द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिए।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-12.html

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प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ११

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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१०१) पिरिविल् गुणानुसन्धानम् पण्णि दरिक्कलाम् । अवन् सन्निदियिल् अवनैयोऴिय अरैक्षणमुम् मुकम् मारियिरुक्कुमतुक्कु मेर्पट्ट मुडिविल्लै

              सीता पिराट्टि श्रीरामचन्द्र और आण्डाळ् नाच्चियार् श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए

भगवद्विप्रलम्भ भाव मे, हमे भगवान् के दिव्य कल्याण गुणों का चिन्तन और अनुसन्धान करना चाहिये । परन्तु उनके समक्ष यानि उनके सङ्ग मे, हम अपने नेत्र और उन पर केन्द्रित विचारों को क्षण भर भी अलग नही कर सकते है । उनकी उपस्थिति मे अन्य वस्तु पर विचार करने का नीचाति नीच कार्य और कुछ भी नही है ।

अनुवादक की टिप्पणि — सीता पिराट्टि ने अशोक वन मे स्वयं का निर्वाह मात्र केवल भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य कल्याण गुणों का आश्रय लेकर इन गुणों का चिन्तन और अनुसन्धान किया । इस संसार मे रहते हुए आऴ्वारों ने भी भगवान् के दिव्य कल्याण गुणों का आश्रय लिया और विभिन्न दिव्यदेश सेवाओं मे सम्लग्न थे । परन्तु भगवती श्री आण्डाल देवी इन सभी से अलग थी । आण्डाल देवी प्रश्न करती है कि – मात्र गुणानुसन्धान से मै स्वयं की यह विप्रलम्भ भावोत्पन्न दुःख को कैसे दूर करूँ ? यह प्रश्न उस स्थिति से उत्पन्न हुआ है जब इनका विप्रलम्भ भाव इनको बहुत दुःख देने लगा । यही भाव भगवती श्री नाच्चियार तिरुमोळि ८.३ पद मे कहती हैं – गोविन्दन् गुणम् पाडि आविकात्तिरुप्पेने । देखिये क्या भाव है । इसी लिये तो वह सबसे अलग श्रेणि मे थी । जब भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन हो, हम स्वतः भगवान् के अतिरिक्त कुछ और भी नही देख सकते है । विष्णुसूक्त मे कहा गया है यथा – “सदा पश्यन्ति सूर्यः ” । अर्थात् नित्यसूरिगण सदैव भगवान् का ही दर्शन करते है । अमलनादिपिरान दिव्यप्रबन्ध मे तिरुप्पाणाळ्वार कहते हैं – “एन् अमुदिनैक् कण्ड कण्गळ् मत्तोन्रिनैक् काणावे” अर्थात् मेरे इन उभय नेत्रों को अमृत रूपी श्रीरङ्गनाथ का स्वरूप के अतिरिक्त कुछ और दर्शन ही नही करना है ।

१०२) तन्तामयरियाविट्टाल् आप्तर्वायिले केट्टरियवेणुम्

भगवद्रामानुजाचार्य और शिष्य वृन्द – आदर्श आचार्य और आदर्श शिष्य

जब जीव स्वस्वरूप ज्ञान से अनभिज्ञ रहता है तो ज्ञानराशिस्वरूप आचार्य से यह ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ।

अनुवादक की टिप्पणि — जीवात्मा भगवान् का नित्य दास है । वह प्राप्त जड़ शरीर से भिन्न है । जब तक वह इस ज्ञान को यथारूप मे नही समझता है उसको तुरन्त आचार्य का उपागम प्राप्त करना चाहिए । आप्त का अर्थ है विश्वसनीय स्त्रोत । एक आचार्य जो अटूट आध्यात्मिक परम्परा जो भगवान् से प्रारम्भ होता है मे आते हैं वह अत्यन्त विश्वसनीय स्त्रोत हैं क्यों कि वह पूर्णतया शास्त्र पर निर्भर हैं और स्वयं भी आत्म-सिध्द हैं अतः दूसरों को यह सारभूततत्त्व समझाने के योग्य हैं । भगवान् श्री कृष्ण भगवद्गीता ४.३४ मे कहते हैं – तद्विद्धि प्रणिपातेन परि प्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः – अर्थात् उस व्यक्तित्व का सान्निध्य प्राप्त करो जो जिसने सत्य का दर्शन किया है, उसकी सेवा करो और भजो मन से । ऐसा गुरु जो स्वरूपसिद्ध तुम्हे यथार्थ ज्ञान प्रदान कर सकते है क्योंकि उन्होने सत्या का दर्शन किया है ।

१०३) आर्तनुक्कन्रो पलप्राप्तियुळ्ळतु

नम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामी) – जल्द भगवद्धाम पहुँचना चाहते थे

आर्त वह है जो इस भौतिक जगत मे स्वयं के निर्वाह को कठिन मानकर दुःखी होता है मानो जैसे अग्नी के कुण्ड मे बैठा हो । ऐसे भगवद्भक्त जो भगवान् पर पूर्णतया निर्भर है और इस शरीर और भौतिक जगत् से मुक्त होना चाहते है, मोक्ष प्राप्ति उनके लिये निश्चित है ।

अनुवादक की टिप्पणि — हमारे सत्साम्प्रदाय मे पूर्वाचार्य कहते हैं – दो प्रकार के प्रपन्न भक्त होते हैं यथा – 1) आर्त प्रपन्न (वह प्रपन्नात्मा जो एक और क्षण इस भौतिक जगत् मे नही रहना चाहता है) और तृप्त प्रपन्न (वह जो भगवद्-भागवत कैङ्कर्य करते हुए कुछ और समय तक इस भौतिक जगत् मे निर्वाह कर सकता है) । इन दोनों मे आर्त प्रपन्न को उच्चश्रेणि का माना गया है और उनकि मानसिक परिस्थिति समझाया गया है यथा – एक और क्षण इस अनित्य संसार मे नही रहने की इच्छा मानो जैसे अग्नी मे खडे हो । इस संसार की अग्नी उनको दहने लगी और असहनीय पीडा का अनुभव होने लगता है । वह शीघ्र इस संसार से मुक्त होकर परमपद मे पूर्णरूपेण भगवद्-कैङ्कर्य करना चाहते हैं । श्रीशठकोप स्वामी जी और अन्य आऴ्वार आर्तप्रपन्न की श्रेणि के अनन्य भक्त शिरोमणि हैं जैसे हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं । श्रीशठकोप स्वामी प्रथम पासुर मे ही स्वयं की आर्तता को दर्शाते हुए कहते हैं – इस दास से और प्रतीक्षा नही होगी । मै और एक क्षण इस संसार मे रहने मे असक्षम हूँ ।

१०४) पुरुषकारम् मुन्नागत् तनपक्कल् पुगुन्तार्क्कुत्तन् तिरुवुळ्ळमिरन्गुम्

भगवती सीता देवी काकासुर को  भगवान् श्रीरामचन्द्र के प्रकोप से बचाते हुए

जब हम भगवान् का सान्निध्य भगवती (पिराट्टि) के पुरुषकार से प्राप्त करते हैं, भगवान् कृपा कर रक्षा करते हैं ।

अनुवादक टिप्पणि : पुरुषकार शब्द का क्या अर्थ है ? पुरुषकार का अर्थ इस प्रकार से है – वह कार्य जिसके माध्यम से नेक मनुष्य स्व-वचनबद्धता और स्वयं के विशेष गुणों को न्यायसङ्गत सिद्ध करता है । यहां पुरुषकार शब्द श्रीमहालक्ष्मी की ओर इंगित है जो भगवद्-विमुख एवं दुराचारी पापी जीवों को भगवान् के चरणों का सन्मार्ग मे लाने की विशेष भूमिका का कार्य निभाती हैं और इन जीवों के लिये भगवान् से विशेष प्रार्थना करती हैं ताकी भगवान् इन जीवों को अपना सके । ऐसे जीवों को स्व-चरणों का आश्रय देकर भगवान् मे कृपा, दया, वात्सल्येत्यादि गुण प्रकाशित होते हैं । कदापि इसका यह अर्थ नही की भगवान् मे ये गुण अलब्ध है परन्तु श्रीमहालक्ष्मी के विशेष अनुनय से भगवान् मे ये गुण स्वतः प्रकाशित होते हैं । श्रीमहालक्ष्मी का यह अनुरोधाभिनय है । जब हम भगवान् का सान्निध्य इस अनुरोध माध्यम से नहीं जाएंगे या प्राप्त नही करेंगे, (तो) जीवों के प्रति तटस्थ-स्वभाव भगवान् का होना और जीवों के कर्मााधार पर उन जीवों को यथोचित दण्ड देना का गुण प्रकाशित हो सकता है क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र हैं । इसी लिए कहते कि भगवान् का सान्निध्य (को) भगवती श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से ही प्राप्त करना है । पिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि मे इस विषय को लोकमान्य उदाहरण से समझाते हैं ।

१०५) संसारि मुक्तनानाल् अवनुडैय लीलोबकारणमुम् बोगोपकरणमुम् सममाय्त् तोट्ट्रक्कडवतु । आकान्तरमाण स्मृतियिल्लैये । तदीयत्वाकारत्ताले नित्य विभूतियोडोक्कत् तोट्टृमत्तनै

जब एक संसारि जीव (वह जीवात्मा जो भवसागर मे बद्ध है) मुक्त (भवसागर से मुक्ति पाकर परमपद पहुँचता है) होता है तो ऐसे मुक्त जीवों को भवसागर (लीला-विभूति) और भगवद्धाम (नित्य-विभूति) सदृश्य है । चूंकि मुक्तात्मा के विचार अब और कर्म-बद्ध नही है, अतः वह परलोक और इहलोक मे भेद नही करता क्योंकि यह दोनों ही भगवान् की सम्पत्ति है और पूर्णतया उनके अधीन मे है ।

अनुवादक की टिप्पणि : भगवान् सर्वव्यापी है । जब एक बद्ध जीवात्मा कर्म बन्धन से मुक्त होकर मुक्तात्मा होता है, वह भगवान् के सर्वव्यापकत्व को समझता है । यह ऐसी अवस्था है जब जीव समस्त वस्तुओं को स्वयं के अनुकूल मानता है । इसी कारणार्थ आऴ्वारों ने भगवान् के बहुरंगाभिव्यक्तित्व भौतिक जगत् का स्तवन किया है । श्रीशठकोप स्वामी इस बहुरंगाभिव्यक्तित्व भौतिक जगत् से स्तंभित है जिसका वैभव भगवान् ने स्वयं श्रीशठकोप स्वामी को तिरुवाय्मोऴि के ७.८  “माया वामने” पदिग (पासुर-दशक) मे दिखाया है । ” भगवान् का समस्त वस्तुओं मे सर्वव्यापकत्व, जीवात्माओं के लिए सदैव अनुकूल है ” इस भाव का अर्थ स्वयं पिळ्ळै लोकाचार्य ने यथा युक्त रीति से तत्त्वत्रय के चित-प्रकरण मे समझाया है और यथारूप समझने के लिए श्रीवरवरमुनि की व्याख्या अत्यन्त लाभ कारी है । श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी स्वयं उदाहरण देकर कहते हैं – जैसे एक राजा के सु्न्दर राज भवन और विकराल कारागृह होते है परन्तु राज कुमार के लिए दोनों ही उसकी संपत्ति है । यथाभाव मे मुक्तात्माओं (या आऴ्वार जो इन मुक्तात्माओं के सदृश्य है या उनसे बेहतर है जब वह बद्धजीव थे) के लिए भगवत्संपत्ति (लीला और नित्य) विभूति दोनो ही सुखदायक है । यह भी तिरुवाय्मोऴि के ६.३.१ की व्याख्या मे समझाया गया है ।

१०६) स्वरूपम् विसतमानाल् नान् एन्नवुमाय् अडियेन् एन्नवुमाय्क काणिरुप्पतु

जब जीवात्मा का स्वस्वरूप ज्ञान यथार्थ भाव मे समझ जाए, तब ‘मै अर्थात् जीवात्मा’ शरीर नही अपितु आत्मा है और “मै भगवान् का नित्य दास हूँ” भाव दृढ़ता से स्थापित होता है ।

अनुवादक की टिप्पणि : तिरुवाय्मोऴि ८.८ – “कङ्गळ् शिवन्दु …” दशक मे, भगवान् जीवात्मा के स्वरूप तत्व को प्रकाशित करते हैं । इस दशक के प्रथम और द्वितीय पासुर मे, भगवान् प्रथमतः स्वस्वरूप और स्वयं की महत्ता दर्शाते हैं । तदनन्तर पासुरों मे, भगवान् , जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप और महत्ता को प्रकाशित करते है । इस दशक के द्वितीय पासुर मे, श्रीशठकोप स्वामी कहते हैं – “अडियेन्‌ उळ्ळान् उडल् उळ्ळान् …” अर्थात् आप (भगवान्) जीवात्मा (अडियेन्‌ – यह दास) के अन्तर निवासी (अन्तर्यामी अर्थात् जो जीवात्मा मे परमात्मा स्वरूप मे विराजमान) है । श्रीशठकोप स्वामी विशेषतः यहाँ “एन् (अहम् वा मै)” शब्द का प्रयोग न कर “अडियेन्‌” शब्द का प्रयोग कर यह स्थापित करते हैं कि मुख्यतः जीवात्मा परमात्मा का नित्य दास है । अन्ततोगत्वा यह जीवात्मा शरीर से भिन्न है क्यों कि श्रीशठकोप स्वामी तुरन्त कहते हैं “उडल् उळ्ळान्” अर्थात् परमात्मा स्वरूप भगवान् मेरे अंदर विराजमान हैं ।

१०७) अभिमत विषयत्तै पिरिन्ताल् काण्डतेल्लाम् अतुवाय्त्तोत्तुम्

      श्रीसीता माता की खोज़ मे भगवान् श्रीराम
जब हम अपने प्रिय या प्रियतमा से विछिन्न या विलग होते हैं, तो वह सब उस व्यक्ति की तरह दिखेगा।
अनुवादक की टिप्पणि :

श्रीशठकोप स्वामी तिरुवाय्मोऴि ७.५.२ पासुर मे भगवान् श्रीरामचन्द्र के असंख्य एवं अपरिमित गुणों का वर्णन करते हैं । कर्म से बन्धित एक जीवात्मा की तुलना मे भगवान् श्रीरामचन्द्र को अनेक दुःखों को भोगना पड़ा जैसे उनकी प्रियतमा श्री सीता मैया से वियोग अर्थात् श्रीसीता मैया का राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण । श्रीमद्रामायण मे श्रीवाल्मीकि भगवान् कहते हैं जब श्रीसीता मैया का राक्षसराज रावण के द्वारा अपहरण होने के बाद, भगवान् श्रीरामचन्द्र अधोमुख होकर प्रियतमा श्रीसीता मैया को ढूँढना प्रारंभ करते हैं । इस विरह दशा के संभ्रम मे भगवान् श्रीरामचन्द्र को हर दृष्टिकोण, हर वस्तु मे श्रीसीता मैया ही दिखने लगी । ठीक इसी प्रकार इस दशक गाथा मे विप्रलंभ भाव मे पूरित श्रीशठकोप स्वामी को सर्वत्र और सर्व वस्तु भगवान् के संबंधित दृग्गोचर हुई । इस उक्त वाक्य की पुष्ठि श्रीशठकोप स्वामी के तिरुवाय्मोऴि ४.४ मण्णै इरुन्दु तुऴावि पदिग (दशक) मे दृग्गोचर है । इस विषय की और अधिक पुष्ठि और स्पष्टीकरण श्रीवरवरमुनि स्वामी तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि ३४वें पासुर मे करते हैं

यथा

मन्नुलगिल् मुन्कलन्दु माल्पिरिगयैयाल्
मारन् पेण्णिलमयैयाय्क्कादल् पित्तेरि
एन्निदिल् मुन् पोलि मुदलान पोरुलै अवनाय्निनैन्दु
मेल्विऴुन्दान् मयल्दनिन् वीरु

अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् श्रीशठकोप स्वामी को दिव्य मानसिक अनुभव का सर्वप्रथम देते है । तदनन्तर श्रीशठकोप स्वामी को अनुभूति प्रदानकर भगवान् अन्तर्धान हो गए । भगवान् के अन्तर्धान होने से श्रीशठकोप स्वामी के मानस मे प्रगट विप्रलंभ भाव से उनको और अत्यन्त कष्ट हुआ । तत्पश्चात् अपरिमित भगवद्-प्रेम के प्रभाव प्रवाह से श्रीशठकोप स्वामी एक गोपकन्या (पराङ्कुशनायकी) का मानसिक रूप धारण कर भगवान् से तुल्य वस्तुओं को देखकर उनको स्वयं भगवान् मानने लगे और पुनः इन तुल्य वस्तुओं को देखकर अपरिहार्य भावावेश से संभ्रांत हुए ।

१०८) शेषियोरुवनानाल् शेषवस्तुक्कळेल्लाम् ओरुमिडरायिरुक्कुमिरे । ओरुवनक्कुप् पलवडिमै उण्डानै तङ्गळिल् एल्लार्गळुमोत्तिरुप्पर्गळिरे कृत सङ्गेदिगळाय् ।

पूर्वाचार्यों ने एक दूसरे से केवल भगवान् के विभिन्न माधुर्य लीलाओं की चर्चा से अपना समय बिताया है

भगवान् ही सभी चेतनाचेतनों के परम स्वामी एवं सर्वशेषी है । उनके सभी भक्तों का मनोभाव एक जैसा होता है । जब इस जगत् के किसी भी क्षेत्र का राजा है, उनके एक स्थिति वाले सेवकगण एक दूसरे से अपने राजा के वैभव चर्चा मे अपना समय व्यतीत करते हैं ।

अनुवादक की टिप्पणि :  इसी तरह भगवद्भक्त भगवद्-चर्चा मे अपना समय व्यतीत करते हैं । भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता १०.९ श्लोक मे अपने भक्तों के स्वभाव और दिव्य कार्यों का वर्णन करते हुए कहते हैं

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ।

निरंतर मुझ में मन लगाने वाले और मुझ में ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं ।

१०९) तन्नैयोऴिन्त वस्तुक्कळेल्लावत्तुक्कुम् कोटि विकारत्तैप् पण्णि अविकृतनायिरुप्पान् ओरुवनिरे ईश्वरन्

आरावमुदन् (तिरुक्कुदन्तै – कुम्भकोणम) और श्रीशठकोप स्वामी (आऴ्वार्-तिरुनगरि)

सभी चेतना चेतनों के स्वामी अर्थात् भगवान् को अविकाराय शुद्धाय शब्दों से श्री भीष्म पितामह ने सहस्रनाम मे संबोधित किया है  । अविकाराय अर्थात् अविकारि वा अपरिवर्तनशील । शुद्धाय अर्थात् परम सात्विक वा विशुद्ध । हालांकि भगवान् अविकारि वा अपरिवर्तनशील है परन्तु उनसे भिन्न सभी वस्तुओं मे विकार वा परिवर्तन को प्रवृत्त करते है ।

अनुवादक की टिप्पणि : तिरुवाय्मोऴि ४.८.१ पासुर में, श्रीशठकोप स्वामी कुम्भकोणम मे स्थित तिरुक्कुदन्तै दिव्यदेश के एम्पेरुमान् आरावमुदन् के सौन्दर्य का वर्णन कर रहे है की उनका अर्चा सौन्दर्य इतना अद्भुत है कि यह दास (श्रीशठकोप स्वामी) पूर्णतया द्रवित हो गया । ऐसे दिव्यदेश और अभिमान क्षेत्र अनेक है जिनके अर्चा प्रभाव से अन्य आऴ्वार् एवं आचार्यगण द्रवित हो गए । भगवान् को अविकारि वा अपरिवर्तनशील कहने मे तात्पर्य केवल यह है की भगवान् कर्म से बाध्य नहीं है । जीवों के प्रति दया, कृपा इत्यादि भगवद्गुणों के प्रभाव स्वरूपोत्पन्न भावों से भगवान् मे विकारत्व प्रतीत होता है ।

११०) वस्तु सत्भावम् कोळ्ळुम्पोतु विशेषणम् व्यावर्त्तकमायल्लतिरातु । ओन्ऱुक्कोन्ऱु विशेषणमाम्पोतु, अन्ययोगव्यवच्छेदम् पण्णिक्कोण्डल्लतु विशेषमागमात्ततु

मोक्ष दर्शाने वाला शास्त्र सदैव सविशेष (सगुण) ब्रह्मम् का ही प्रतिपादन करता है । एक वस्तु को जानते वा परखते समय, (उस) वस्तु के विशेष गुण (उस) वस्तु को अन्य वस्तुओं से भिन्न करता है ।  किसी भी वस्तु के गुण (उस) वस्तु का विशेष गुण एवं गुण तब माना नहीं जाएगा जब तक वह गुण उस वस्तु को दूसरें वस्तुओं के भिन्न करें ।

अनुवादक की टिप्पणि : “अयोग्य-व्यवच्छेदम्” अर्थात् वह वस्तु जो एक से अधिक गुणों से अभिज्ञात है । “अन्ययोग्य-व्यवच्छेदम्” अर्थात् वह वस्तु जो वस्तु विशेष गुण से अभिज्ञात है अर्थात् वह विशेष गुण केवल उसी वस्तु मे निहित है । उदाहरणार्थ अनन्त-शायित्व गुण वह गुण है जो केवल भगवान् श्रीमन नारायण के लिए ही अनुकूल और उनमे ही निहित है और यह गुण किसी अन्य वस्तु के लिए अनुकूल कदापि नहीं है । तिरुवाय्मोऴि के ६.३.१ पासुर नल्कुरुवम् चेल्वुम् के सन्दर्भ मे, श्रीनम्पिळ्ळै इस पङ्क्ति को निर्दिष्ट करते है । इस दशक मे भगवान् के विरुद्ध-विभूति का वर्णन करते हुए श्रीशठकोप स्वामी कहते है चेतनाचेन वस्तुओं का आश्रय भगवान् है और भगवान् मे विरोधाभास भाव है । उदाहरणार्थ — श्रीशठकोप स्वामी कहते है भगवान् दरिद्रता-धनता, स्वर्ग-नरक, मित्रता-रिपुता, इत्यादि विरोधाभास गुणों के धाम है । देखिए, वास्तविक्ता मे कोई भी वस्तु मे विरोधाभास गुणो का सामंजस्य होना असंभव है । लेकिन भगवान् से भिन्न वस्तुओं का आश्रय भी भगवान् ही है अत एव भगवान् मे ऐसे विरोधाभास गुण प्रतीत या प्रकाशित होते है । इस दशक मे श्रीशठकोप स्वामी भगवान् के विरोधाभास गुणों का आस्वादन कर परमानंद की अनुभूति प्राप्त करते है ।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-11.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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९१ ) शेषत्वम् आत्मावुक्कु स्वरूपमानाल् देहत्तुक्कु विरोधियाय् निर्कुम् निलै कुलैन्दु

यथा आत्म दास्यम् हरेः स्वाम्यं  अर्थात् भगवान् श्रीमन्नारायण ही परमात्मा एवं सर्व शेषी है और अन्य चेतन उनके शेष व दास है । जीवात्मा अगर यह समझ जावें तो जीवात्माके भौतिक शरीर को अऴुक्कु उडम्बु नही माना जाएगा ।

अनुवादक टिप्पणी ः प्रायः मनुष्य देह को आध्यात्मिकता के दृष्टिकोण से बाधा माना जाता है क्योंकि देहात्मक बुद्धि और देहाभिमान हमे भगवद्विमुख कर देते है। लेकिन जीव जब वास्तविक स्वरूप को समझ जावें तो प्राप्त देह से प्रारंभ कर जीव समस्त वस्तुओं को स्वरूपानुरूप भाव से भगवद्-सेवा मे प्रयोग करता है। इस दृष्टिकोण मे, प्राप्त देह बाधक नही है। इस तत्त्व को श्रीतिरुमालै-आण्डान् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के पंचाचार्यों मे से एक आचार्य) की दिव्य वचन से समझ सकते है। श्रीनाच्चियार्-तिरुमोऴि ११.६ व्याख्या मे, श्रीपेरियवाच्चान्-पिळ्ळै स्वामीजी श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी की आचार्य भक्ति का उदाहरण स्व शब्दों मे देते है। श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी कहते है कि हालांकि जीव को देह मे आसक्ति और देह संबंधित सर्व वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। श्रीतिरुमालै-आण्डान् स्वामीजी आगे कहते है कि उनका यह देह अर्थात् जीव के देह को उपेक्षित नही करना चाहिए क्योंकि उनके इस देह से ही उनकों श्रीआळवन्दार का दिव्य संबंध प्राप्त किया है जो अन्ततः अपेक्षित लक्ष्य अर्थात् परमपद मे नित्य किङ्करता प्रदान करेगा।

९२) शेषवस्तुविन् व्यापारमडैय शेषितानक्कडिमैयाग निनैत्तिरुक्किरप्पडि

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन का पूर्ण संरक्षण किया।सर्व शेषी भगवान् जीवात्माओं के सभी क्रियाओं को, उनके प्रति समर्पित क्रियाओं के रूप मे मानते क्योंकि जीवात्मा स्वयं भगवान् का दास व शेष है।

अनुवादक टिप्पणी: जब जीवात्मा भगवान् का शरणागत होता है तो भगवान् जीवात्मा का पूर्ण भार लेकर, उसके जीवन का पूर्ण नियत्रण स्वयं करते है। पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी के स्व ग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि २५८वे सूत्र मे चरमश्लोक के विवेचन मे इस विषय को कहते है। चरमश्लोक मे भगवान् कहते है ‘मोक्षयिष्यामि’ अर्थात् मोक्ष व मुक्ति प्रदान करूंगा अर्थात् मै जीव का संरक्षण करूंगा। पिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामीजी स्व सूत्र मे कहते है इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित् तारेन् , एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक्कोळ्ळेनो मै तुमको तुम्हारा ख्याल रखने नही दूंगा। क्या मै स्वशरीर की गंदगी को साफ स्वयं नही करूंगा। इस सूत्र के व्याख्याकार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अभूतपूर्व दृष्टिकोण मनमोहक है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते है – अब तक तुम अपने आपको स्वतंत्र मानते रहे। परन्तु अब स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त कर अर्थात् यह जानकर मै (जीव) स्वतंत्र नही परतन्त्र हूं इस भाव से मेरी शरणागति किए। जैसे शरीर आत्मा पर निर्भर है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी परमात्मा पर निर्भर है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को सांत्वना देते हुए कहते है – हे अर्जुन, तुम्हारे मन की अज्ञानता को दूर करने का संरक्षण का पूरा भार भगवान् का है।

९३) अवतार कालत्तिल् उदवातवर्कुम् इऴक्क वेण्डातपडियिरे कोयिलागिळिले वन्दु काण्वळर्तु

तिरुमूऴिक्कळत्तनान् – तिरुमूऴिकळक्कळम्

भगवान् इस जगत् मे अनेकानेक अवतारों के माध्यम से अवतरित होकर स्वाश्रित भक्तों के तापत्रयों को हरते है। जो जीवात्माएँ भगवान् के इन विभिन्न अवतारों का लाभ नही उठा सकें उन सभी के लिए भगवान् स्वयं निर्हेतुक कृपा से अर्चावतार रूप मे श्रीरङ्गमित्यादि दिव्य क्षेत्रों मे अवतरित होकर शयन करते है।

अनुवादक टिप्पणी : श्रीमद्भगवद्गीता ४.५-४.९ श्लोकों मे, भगवान् श्रीकृष्ण अपने अवतारों के रहस्य का प्रतिपादन किया है।  भगवान् श्रीकृष्ण कहते है वह समय समय पर भक्त संरक्षण, दुष्ट शिक्षण और अधर्मों का संहार और धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए अवतार लेते है। प्रायः उनके अवतार हर युग मे होते है। त्रेता और द्वापर युग मे भगवान् श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप मे प्रकट हुए। जिन जीवात्माओं ने भगवान् के इन अवतारों के अनुग्रह का अवलोकन नही किया उन सभी के लिए भगवान् स्वयं निर्हेतुक कृपा से विभिन्न दिव्यदेशों मे अर्चावतार रूप मे प्रकट होते है। श्रीतिरुमङ्गै-आऴ्वार स्व ग्रन्थ तिरुनेन्डुदाण्डगम् के १०वें पासुर मे इस विषय का प्रतिपादन किए है – पिन्नानार् वाणाङगुम् शोदि तिरुमुऴिक्कळत्तानाये – उन जीवों के लाभ के लिए भगवान् ने तेजोमय तिरुमूऴिक्कळम् अर्चावतार रूप मे प्रकट हुए है जिनने भगवान् के पर,व्यूह, विभव अवतारों का दिव्य अनुभव नही किया है।

 

९४) उगन्तरुळिन निलङ्गळिले मेय्ये प्रतिपत्ति विळैन्दार्क्कु अन्गुळ्ळवरै एल्लाम् उद्देश्यमाय्त्तोन्रुम्


श्रीरङ्गम – प्रमुख दिव्यदेश

जिन भक्तों को इन दिव्यदेशों (श्रीरङ्गम, तिरुमला, मेलुकोटा) मे अपार विश्वास है जो भगवान् के लिए अत्यन्त प्रिय है, उन भक्तों को इन दिव्यदेशों मे सर्व वस्तुएं वांछनीय है।

अनुवादक टिप्पणी : दिव्यदेश भगवान् को सदैव अत्यन्त प्रिय है। भगवान् इन दिव्यदेशों मे प्रगट होकर आश्रित भक्तों और अन्य जीवों को उनके माधुर्य सुलभ स्वरूप के प्रति आकर्षित कर विशेष कृपा करते है। अतः हमारे आऴ्वार् और आचार्यों ने इन दिव्यदेशों के प्रति विशेष लगाव सदा दिखाया है। जिन भक्तों को भगवान् के अत्यन्त प्रिय दिव्यदेशों (श्रीरङ्गम, तिरुमला, मेलुकोटा) मे अपार विश्वास और रति है, इन दिव्यदेशों मे प्रस्तुत सर्व वस्तु सदा वांछनीय और अनूकल है। पूर्वाचार्यों के जीवन मे ऐसे अनेक घटनाएँ है जो पूर्वोक्त वाक्यों को प्रतिपादित करते है। एक ऐसी घटित घटना मे, श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी जी का उदाहरण बार बार दिया जाता है। एक बार, श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी श्रीतिरुवेंकट से उतरने के बाद, प्रसाद पाने के लिए प्रसाद पोटली को खोलते है। पोटली को खोलते ही श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी यह देखते है कि उनकी प्रसाद पोटली मे कई छोटे से बड़े चींटीयां है। श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी तुरन्त प्रसाद पोटली को बन्दकर श्रीतिरुवेंकट पहुँचकर इन चींटीयों को श्रीतिरुवेंकट पर्वत पर छोड देते है। इस दृष्टान्त से यह दर्शा रहें कि श्रीअनन्ताळ्वान् स्वामीजी को पूर्व आऴ्वारों के दिव्य वचनों मे अपार विश्वास है। आऴ्वारों का कथन है कि श्रीतिरुवेंकट मे श्रीनिवास भगवान् के सेवाभिलाषी देवगण एवं नित्यसूरीगण वहां विभिन्न रूपों मे उपस्थित रहते है। श्रीपराशरभट्ट स्वामी कृत श्रीरङ्गराजस्तव मे श्रीपराशरभट्ट स्वामी कहते है कि श्रीरङ्गम मे, नित्यसूरीगण, वृक्षों और पौधों के रूप मे प्रकट रहते है।

९५) अप्राकृत संस्थानत्तै इतर सजातीयमाक्का निर्पदु, तन् जन्मत्तै अनुसन्धित्तारुडैय जन्मङ्गळ् पोम्पडियायिरुप्पदु

भगवान् के प्रमुख दश अवतार – तिरुचेरै

संस्थान – रूप, अप्राकृत संस्थान – दिव्य रूप

आपके दिव्य (कलंकरहित) स्वरूप का, मनुष्य, पशु, पक्षी इत्यादि मे रूपान्तरण होना आपके विभिन्न अवतारों का एक विशेष अङ्ग और कला है जिसके माध्यम से आप जीवात्माओं को आपके इन दिव्य स्वरूपों का ध्यान करने का लाभ प्रदान कर उनके जन्म-मृत्यु चक्र को रोकते है।

अनुवादक टिप्पणी : परमपद मे विराजमान भगवान् का वास्तविक कलंकरहित दिव्य स्वरूप इस भौतिक जगत् मे भी दृष्टिगोचर है। श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ३.५.५ अङ्गु वैत्तु इङ्गुप्पिरन्दु पासुर मे यही बताये है। श्रीनम्पिळ्ळै इस पासुर व्याख्या अर्थात् ईडु व्याख्या मे भगवान् के दिव्य शब्दों भगवद्गीता ४.६ श्लोक – प्रकृतिम् स्वां अधिष्ठाय – का पुनः उद्धृत कर सुन्दरता से पासुर भाव को समझाते हुए कहते है भगवान् स्वयं इस भौतिक जगत् मे अहैतुकी कृपा से अवतार लेते है। जो जीव भगवान् के इस दिव्य जन्म के प्रति रतिवान होते है वह जीव इस जन्म-मृत्यु चक्कर से मुक्त होते है। भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता ४.४ श्लोक जन्म कर्म च मे दिव्यं मामेति सो$र्जुन – हे अर्जुन ! वह जो मेरे दिव्य जन्म अौर कार्यों को जानता है, वह (जीव) देह त्याग ने के पश्चात् इस भौतिक जगत् मे पुनः नही आता।

 

९६) ओरु प्रयोजनत्तिर्कागप् पोवार्गळन्रो अदुकोण्डु मीळलावदु। तन्नैये प्रयोजनमागप् पट्रप् पोवार्क्कुम् मीळविरङ्गुण्डो? इप्पडियिरे भगवदत् प्रावण्यमुडैयार् पडि।

जब जीव भगवान् के अलावा अन्य वस्तुअों की अभिलाषा से भगवान् की अोर बढता है तो अभिलाषित प्राप्त कर फल प्रदाता भगवान् को जीव भूल जाता है। परन्तु भगवान् को उपेय (लक्ष्य) मानने वाले जीवों को भगवान् को भूलने या छोडने का कोई कारण नही होता है। भगवान् मे पूर्णतया भावुक जीवों की यह वास्तविक स्थिति है।

अनुवादक टिप्पणि : अन्याभिलाषा रहित भगवान् की सेवा करना ही जीवों का स्वभाव है। विभिन्न प्रकार के जीव भगवान् का आश्रय लेते है जैसे भगवान् कृष्ण स्वयं भगवद्गीता ७.१६ श्लोक मे कहते है :

चतुर्विधा भजन्ते माम् जनस्सुकृतिनोर्जुन । अार्तो जिज्ञासुरार्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी (जीव के यथार्थ रूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है को जानने वाला) – ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।

आगले श्लोकों मे, भगवान् कहते है की इन भक्तजनों मे ज्ञानी उनका सर्व प्रिय है क्योंकि ज्ञानी और भगवान् मे एक दूसरे के प्रति पारसपरिक अनुरक्ति है। आगे यह भी कहते है की ऐसे ज्ञानी जन उनके आत्मा के समान है – ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्

इस विषय की सम्मति श्रीपोइगै-आऴ्वार् मुदल्-तिरुवन्दादि के २६वें पासुर मे कहते है –

एऴुवार् विडै कोळ्वर्
ईन् तुऴायानै वऴुवा वगै निनैन्दु वैगल् तोऴुवार्
विनैच्चुडरै नन्दुनिक्कुम् वेङ्गडमे
वानोर् मनच्चुडरैत्तूण्डुम् मलै

ईन् तुऴायानै – (वह) जो अति सुन्दर तुलसी माला से सुशोभित है, एऴुवार् – (वह) जो धन की अभिलाषा से प्रार्थना कर, वांछित फल पाकर भगवान् को छोड देता है, विदै कोळ्वर् – (वह) जो कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर, वांछित फल पाकर भगवान् को सदैव के लिए छोड देता है, वऴुवा वगै निनैन्दु वैगल् तोऴुवार् – (वह) जो भगवान् के साथ नित्य रहने और उनकी सेवा करने के लिए प्रार्थना करता है।

इन तीन प्रकार के भक्तजनों के लिए, तिरुवेंकट पर्वत ही, उनके पापों का नाश करेगा। श्रीनम्पिळ्ळै स्वामीजी इस पासुर व्याख्या मे उपरोक्त भगवद्गीता के श्लोक का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देकर समझाते है।

९७) अनन्तशायित्वम् सर्वाधिक वस्तुक्कु लक्षणमागैयाळे सर्वाधिकने शरण्यन् एन्गिरदु

अनन्तपद्मनाभ पेरुमाळ् , तिरुवनन्तपुरम – सभी के नियन्त्रक

भगवान् की भगवत्ता को इंगित करने वाला विशेष गुण यह है की भगवान् आदिशेषजी के स्वामी है जो श्रीआदिशेषजी पर योगनिद्रावस्था मे शयन करते है। ऐसे परात्पर परमात्मा भगवान् सभी के आश्रय है।

 अनुवादक टिप्पणी : ऐसे कई विशेष गुण है जो केवल भगवान् मे ही विराजमान है। उभयविभूतिनाथत्व – दोनों विभूतियों अर्थात् त्रिपादविभूति (आध्यात्म जगत्) और एकपादविभूति (भौतिक जगत्) के स्वामी भगवान् है। उभयलिंगत्व – दोनों प्रकार के तादात्म्य से भगवान् ज्ञेय है अर्थात् कल्याणमय एवं मंगलमय गुणों का संगम स्थल एवं अमंगलमय गुणों के विपरीत गुणों (कल्याणमय गुणों) का संगम स्थल भगवान् है – कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् मे केवल कल्याणमय एवं मंगलमय गुण सन्निहित है। अनन्यशायित्व – वह भगवान् जो श्रीआदिशेषजी पर योगनिद्रावस्था मे शयन करते है। पुण्डरीकाक्षत्व – वह भगवान् जिनके नयन सुन्दर कमल के फूलों के समान है अर्थात् कमल नयन भगवान्। गरुडवाहनत्व – वेदात्मा शब्द से गौरान्वित गरुडजी पर विराजमान (आरोही) भगवान् अर्थात् वह भगवान् जिनकी सवारी (वाहन) वेदात्मा रूपी गरुडजी है। ऐसे विशेगुण किसी अन्य व्यक्तित्व मे विराजमान होना असंभव और नामुमकिन है। ऐसे विशेषगुण सम्पन्न व्यक्तित्व ही सभी जीवों का आश्रय है। श्रीशठकोप स्वामीजी स्व ग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ५.१०.१० पासुर – नागणै मिशै नम्पिरान् चरणे शरण् नमक्कु मे उपरोक्त भाव को प्रगट किए है। श्रीनम्पिळ्ळै स्वामीजी उपरोक्त पासुर के स्व व्याख्या मे इसी प्रसंग को निर्दिष्ट किए है।

९८) आचार्यन् वार्त्तै केट्टु धरित्तल्, अवन् अभिमानत्ताले धरित्तलोऴिय वेरोन्रिल्लै

एक सच्चे आचार्य और सच्चे शिष्य का सच्चा संबंध – श्रीरामानुजाचार्य और उनके शिष्यों का दृश्य

स्वाचार्य के निर्दिष्ट उपदेशों का अनुपालन और उनकी कृपा का अवलंब से निर्वीह करना ही एक शिष्य का कर्तव्य है और कुछ नही।  

अनुवादक टिप्पणी : सभी उपायों मे, आचार्याभिमान जीवोत्थापन का सबसे सरल और योग्य उपाय है। आचार्य सर्व प्रथम भगवद्विषय के प्रमुख विषय तत्त्वों का प्रतिपादन कर शरणागत जीव को समझाते हुए सतत कहते है – हे जीव, परमात्मा और तुम्हारा संबंध नित्य है। श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र ग्रन्थ के अन्तिम प्रकरण मे पिळ्ळै लोकाचार्य स्वीमीजी इस विषय तत्त्व का प्रतिपादन किए है। इस ग्रन्थ मे पञ्चमोपाय के गौरवमय तत्त्व को समझाकर, आचार्याभिमानमे उत्ताकरम् सूत्र मे तत्त्व सार प्रस्तुत करते है। इस सूत्र की टीका मे टीकाकार कहते है – शिष्य की परिस्थिति भौतिक जगत् मे देखकर एक आचार्य की कृपा दृष्टि एवं अनुग्रह ही शिष्य का उत्तारक है अर्थात् शिष्य के प्रति आचार्य का परगत स्वीकारता। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सत्साम्प्रदाय के प्रमुख तत्त्व को प्रकाशित करते हुए कहते है की पिळ्ळै लोकाचार्य स्वीमीजी इसी प्रमुख तत्त्व को प्रकाशित कर रहे है। यथा कर्म, ज्ञान, भक्ति, स्वगत आचार्य स्वीकारता (अर्थात् जीव स्व प्रयासों से एक आचार्य को स्वीकारना और मानना की यह जीव का पसन्द है) इत्यादि मोक्ष के उपाय माने जाते है, परन्तु वास्तविकता मे ये सभी असली उपाय नही है क्योंकि यह सभी जीव के स्वरूप के प्रतिकूल है। भगवान् के प्रति प्रपत्ति करना भी एक दृष्टिकोण से भयानक है क्योंकि स्वतन्त्र भगवान् जीव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते है। अतः वह आचार्य जो शिष्य के कल्याण की सदा चिन्ता करता है और जो अद्वितीय कृपा के निधि है ऐसे आचार्य की निर्हेतुक कृपा कटाक्ष ही शिष्य के उत्थापन का एक मात्र आश्रयोपाय है।

९९) स्वरूपान्तरगतैयान कृपैक्कऴिविल्लैयिरे। अदु सत्तैयुळ्ळतनैयुम् विलैच्चेल्लुमिरे

कोलप्पिरान् – तिरुवल्लवाऴ्

कृपा भगवान् का स्वाभाविक गुण है। भगवान् की कृपा कभी भी क्षीण नही होती है। जब तक कृपा है तब तक भगवान् का महिमागान निश्चित है।

अनुवादक टिप्पणी ः भगवान् की कृपा भगवान् का सबसे प्रमुख और महत्त्वपूर्ण गुण है। आपकी यह स्वाभाविका कृपा निर्हेतुक है जिससे आप जीवात्माओं का उत्थान सतत करने मे प्रयत्नशील है। आप जीवात्माओं के हृदय मे आपकी इस निर्हेतुक कृपा से आपके प्रति रति को जागृक करते है। जीवात्मा जब भगवान् के सम्मुख होकर सतत उत्थान करने वाली आपकी कृपा का अवलंब करता है तो स्वतः जीवके हृदय मे स्वस्वरूप का तेजोमय ज्ञानका प्रकाश होता है। अऴगिय-मणवाळ-पेरुमाळ्-नायनार् स्वामीजी का अद्भुत ग्रन्थ श्रीसम्प्रदाय का अनोखा एवं श्रेष्ठ ग्रन्थ है। इस श्रेष्ठ ग्रन्थ मे ग्रन्थ रचना कारने श्रीशठकोप स्वामीजी के विभिन्न दिव्य मनोभावों और उनके सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। २१८ सूत्र मे ग्रन्थरचनाकार कहते है – तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक शतक भगवान् के प्रत्येक गुणों को प्रकाशित करते है और तदनुसार कृपा के प्रभाव से श्रीशठकोप स्वामीजी के शरीर मे प्रगट विभिन्न दिव्य मनोभावों का रसमय परिचय विस्तार से करते है। इस सूत्र मे ग्रन्थ रचनाकार कह रहे है की तिरुवाय्मोऴि का पाँचवाशतक भगवान् की कृपा व करुणा का द्योतक है। पूर्वाचार्यों का मत है की इस करुणा के अवलंब से श्रीशठकोप स्वामीजी मे भगवान् के प्रति असीमित प्रेम का उद्भव हुआ था। ग्रन्थ रचनाकार १६५ सूत्र मे कहते है की श्रीशठकोप स्वामीजी को भगवान् की कृपा की दिव्यानुभूति तिरुवल्लवाऴ् दिव्यदेश (तिरुवाय्मोऴि ५.९ – मानेइ् नोक्कु – मेलिविलुम् चेमम् कोळ्विक्कुम् कृपै तेन्नगरिले नित्यम्) मे हुआ। अतः भगवान् की दिव्य एवं गौरव मय कृपा का स्वभाव स्पष्टता से निर्दिष्ट हुआ और ऐसी कृपा का प्रभाव का प्रकाशन श्रीशठकोप स्वामीजी के वैभवमय जीवन और प्रतिपादित सिद्धान्तों से हुआ।

 

१००) नम्माचार्यर्गळ् व्यापक मन्त्रङ्गळ् मून्रिलुम् द्वयत्तैये आधारिप्पर्गळ्

श्रीनम्पेरुमाळ् (श्रीरङ्गनाथ-भगवान्) और श्रीनाच्चियार् (श्रीमहालक्ष्मी-अम्माजी) – द्वयमहामन्त्र का प्रतिपाद्य विषय

भगवान् का स्वभाव और उनकी महिमाका वर्णन दो श्रेणियों के मन्त्रों मे वर्णित है। मन्त्रों की कई श्रेणियाँ है परन्तु मुख्य श्रेणियाँ दो है – व्यापक औऱ अव्यापक। व्यापक श्रेणि मन्त्रों को अव्यापक श्रेणि मन्त्रों की तुलना मे सर्वाधिक माना जाता है। व्यापक श्रेणि के तीन सर्वविदित मन्त्र है – तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर) (भगवान् श्रीमन्नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र), तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र), षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र) जो सर्वश्रेष्ठ है। इन सभीकी तुलना मे पूर्वाचार्यों ने द्वयमहामन्त्र को अधिक महत्त्व दिया है।

अनुवादक टिप्पणी : श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ मुमुक्षुप्पडि के प्रारम्भ मे ही कहते है की मन्त्रों की श्रेणियाँ दो प्रकार है। मन्त्र का यह अर्थ है कि वह जो जापक व पाठक की रक्षा करता है। साधारणत: मन्त्र के तीन भाग होते है – प्रणव (यह जीवात्मा और परमात्मा के यथार्थ संबंध को बतलाने वाला भाग है), तिरुनाम (दिव्यनाम) – दूसरा भाग भगवान् का ऐसा नाम जो ध्यान का केन्द्र बिन्दु है,  नम: – तीसरा भाग यह स्वीकारना की भगवान् ही उपाय है। व्यापक मन्त्र तीन है – तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर) (भगवान् श्रीमन्नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र), तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र), षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र)। अव्यापक मन्त्र भगवान् के कल्याण गुणों, लीलाओं का महिमागान करते है यथा केशव नाम का अर्थ केशि राक्षस का नाश करने वाला व सुन्दर केश वाला हुआ। व्यापक मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि भगवान् श्रीमन्नारायण के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करते है।

उपरोक्त तीन व्यापक मन्त्रों का संक्षिप्त अर्थ :

१) षडाक्षरमन्त्र (श्रीविष्णुमन्त्र) – अोम् विष्णवे नम: – विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति (विषि – व्याप्ति) के अनुसार अर्थ – वह जो व्याप्त है।
२) तिरुद्वादशाक्षरमन्त्र (श्रीवासुदेवमन्त्र) – अोम् नमो भगवते वासुदेवाय – सर्वस्य वसतीति वासुदेव: – वह जो सर्व व्याप्त है। यह मन्त्र कहता है कि भगवान् सर्व व्याप्त है लेकिन मन्त्र प्रतिपाद्य भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित नही करता। इस मन्त्र मे भगवते शब्द से षाडगुण सम्पन्न भगवद्-स्वरूप प्रतिपाद्य है परन्तु मन्त्र पूर्ण नही है।
३) तिरुमन्त्र (तिरुवष्टाक्षर – अष्टाक्षरमन्त्र) – अोम् नमो नारायणाय – नारायण शब्द षाडगुण सम्पन्न भगवद्-स्वरूप एवं भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित करता है। नारायण शब्द से हम यह समझते है की भगवान् चिदाचित मे व्याप्त है (सर्वव्यापकत्व) और सभी चिदाचित वस्तुओं का संपोषण भगवान् स्वयं करते है (आधारत्व)। अत: यह मन्त्र भगवान् का मुख्य कल्याण गुण को पूर्णतया प्रकाशित करता अत: यह मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है।

तिरुमन्त्र का अधिक विस्तारक रूप द्वयमहामन्त्र है। द्वयमहामन्त्र भगवान् श्रीमन्नारायण और भगवती श्रीमहालक्ष्मी के संबंध का प्रतिपादन सुस्पष्टता से करता है। अतः हमारे पूर्वाचार्यों ने श्रद्धा से इस महामन्त्र को अधिक मान्यता दिया और इस महामन्त्र मे अत्यन्त रति दिखाया भी है।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-10.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ९

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

८१) अनुष्ठानम् साधनमागातु

भगवान् ही सभी फलों के सर्वोत्कृष्ट प्रदायक है

अनुष्ठान साधन नही होता अर्थात् सही साधन नही है ।

अनुवादक टिप्पणी : भगवद्प्राप्ति के लिये भगवान् ही एक मात्र उपाय साधन है । केवल उनके सङ्कल्प मात्र से ही सब कुछ होता है । कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग केवल अचेतन यत्न ही है क्योंकि यह मात्र अज्ञानपरक ही है । इसके विपरीत देखें तो भगवान् तो सर्वदा ज्ञानमय, आनन्दमय तत्त्व और परम चेतन है । जब जीव कर्म, ज्ञान, भक्ति योग यत्नों द्वारा भगवद्प्राप्ति के पथ पर विश्वासपूर्वक चलता है तो अकारणकरुणालय भगवान् इन यत्नों के फलस्वरूप फल को प्रदान करते है । अत: वह जो परम ध्येय (लक्ष्य) प्रदान करता है, वह ही परम साधन है । ऐसे अनुष्ठान तो एक प्रपन्न के लिये सेवा (कैङ्कर्य) परक ही है जो वर्णाश्रम और शिष्टाचार के अनुसार वह करता है पर इन क्रियाओं के फलों (के प्रति अनासक्त रहता है) और फल प्रदाता अर्थात् भगवान् से भी कुछ माँगता भी नही है । इस विषय को विस्तारपूर्वक भगवद्प्रिय पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने स्वग्रन्थ “मुमुक्षुप्पडि” के २७१वें सूत्र मे कहते है – “कर्मम् कैङ्कर्यत्तिल् पुगुम्” अर्थात् ऐसे नित्य-नैमित्त क्रिय कैङ्कर्य के अंश है ।

८२) निषिद्धाचरणमुम् नमक्कु रक्षकमन्रु

पाप कर्म भगवान् को संतुष्ट कदापि नही करते। पाप कर्म और अधिक आपत्ति का कारण है

निषिद्धाचरण (शास्त्रों के विरुद्धाचरण) प्रपन्नों का शरण नही है अर्थात् हमारे रक्षक नही कह सकते है ।

अनुवादक टिप्पणी : यह सूत्र पिछले सूत्र से सम्बन्धित है । जब जीव समझ जाये कि उपरोक्त कर्मानुष्ठान पालन परम लक्ष्य के लिये साधन नही है तो एतद् प्रतिकूल विचार उत्पन्न हो सकता है कि – ” शास्त्र प्रतिकूल कार्य करें ” । परन्तु यह भी श्रेयस्कर (उपयुक्त) नही है क्योंकि इससे भगवद्मुखोल्लास नही होता । इस तत्त्व को स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी “मुमुक्षुप्पडि” के चरम-श्लोक प्रकरण “२०५-२१०” सूत्र संख्या मे समझाते है । उसी का सारांश निम्नलिखित है :

भगवान् कृष्ण भगवद्गीता मे कहते है – “सर्वधर्मान् परित्यज्य” इति अर्थात् सभी धर्मों का परित्याग करो अत: कुछ लोग इसके विपरीत अधर्म का पालन करो ऐसा सोचते है (इसका प्रतिकूल अर्थ ऐसा निकालते है) । यह ग्राह्य नही है क्योंकि प्रतिकूलाचरण का उपदेश भगवान् ने नही दिया । आगे यह विचार भी आ सकता है कि – क्या यह प्रतिकूलता बोधक नही है ? जब कहा गया है सर्व-धर्म का त्याग करो इसका सर्व-अधर्म अर्थ ही बोध होता है । यह भी ग्राह्य नही है क्योंकि “धर्म” का अर्थ “अधर्म त्याग” नही है । यहाँ फिर किस धर्म की बात भगवान् ने की है ? यहाँ धर्म अर्थात् शास्त्राज्ञान है । अगर मान भी ले कि “धर्म” “अधर्म-त्याग” है तो “धर्म-त्याग” अर्थात् अधर्म-त्याग अर्थात् अधर्म की स्वीकृति मानी जायेगी तो यह भी अग्राह्य है और इस संदर्भ मे यह अयोग्य है ।

भगवान् , प्रपन्न और लक्ष्य परक की दृष्टिकोण से देखें तो अधर्म-स्वीकृति अग्राह्य है क्योंकि भगवान् स्वाभाविक रूप से चाहते है कि सभी अधर्माचरण मे प्रवृत्त न हो । प्रपन्न जो भगवद्मुखोल्लास चाहता है वह कदापि अधर्माचरण मे प्रवृत्त नही होगा ।
अधर्माचरण प्रवृत्ति से भगवद्मुखोल्लास नही होता है ।

८३) विहिधाचरणमुम् नमक्कु रक्षमन्रु

शास्त्रोक्त आचरण भी हमारा शरण (रक्षक) नही है ।

अनुवादक टिप्पणी : ८१वें सूत्र मे निहित लक्ष्य अर्थात् भगवान् के अलावा अन्य कोई रक्षक (शरण) नही है ।

८४) तिरुवडिगळिल् कैङ्कर्यमे यात्रैयागप् पेरवेणुमेन्रु वाक्यशेषमाय्क् किडक्किरतु

श्रीनम्पेरुमाळ् के दिव्य चरणकमल

यात्रै : अर्थात् जीवन व्यापन ।
द्वयमहामन्त्र के द्वितीय भाग के अनुसार प्रपन्न जीव को सदैव भगवान् के दिव्यपादपद्मों की सेवा करने की प्रार्थना करना चाहिये और ऐसा  जीवन व्यापन करना चाहिये ।

अनुवादक टिप्पणी : द्वयमहामन्त्र दो भाग (वाक्य सम्युक्त) मन्त्र है । प्रथम भाग मे जीव भगवान् श्रीमन्नारायण के पादपद्मों का आश्रय ग्रहण कर भगवच्छरणागत होता है । दूसरे भाग मे, वह भगवद्पादपद्मों की सेवा प्रार्थना (करता है कि) केवल मात्र श्रीमहालक्ष्मी समेत श्रीमन्नारायण की सन्तुष्टी के लिये अन्याभिलाषिता रहित आजीवन सेवा तत्पर रहे । यहाँ दूसरा भाग – ” श्रीमते नारायणाय नम: ” के अर्थ विवरण मे पूर्वाचार्य कहते है – “श्रीमते नारायण” शब्द से दिव्य-दम्पति (युगल) है अर्थात् श्री समेत भगवान् नारायण । “आय” शब्द कैङ्कर्य प्रार्थना है – हे भगवन् ! मुझे अपनी सेवा मे नियुक्त करो । मुझे आपकी सेवा करने का अवकाश दे । “नम:” शब्द आनन्द बोधक है – सेवा (कैङ्कर्य) फलस्वरूप आनन्दमय रस की प्राप्ति अर्थात् अन्याभिलाषिताशून्य भगवद्सेवा फल रस है । भगवद्मुखोल्लास से प्राप्त आनन्द पुन: जीव के लिये आनन्दप्रदायक है क्योंकि भगवद्सेवाफल का इतर लाभ यही तो है । परम लाभ भगवद्मुखोल्लास ही तो है ।

८५) नूरायिरम्वरि एऴुदिक्किडन्तालुम् अवत्तिल् (अवट्ट्रिल्) पोगाते तात्पर्यत्तै ग्रहित्तिरुक्कुमवर्गळ् “मादवन् (माधवन्) पेर् सोल्लुवते (शोल्लुवते) ओत्तिन् सुरुक्कु (शुरक्कु)” एन्रिरुक्कुमवर्गळ्

श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ

अर्थ : शास्त्रों मे सहस्त्राधिक वाक्य है । बुद्धिजनों कि मति केवल उन सरतम विषय प्रतिपादक वाक्यों मे अनुरक्त है जो भगवन्नाम महिमा परक है । इस विषय को भूतदाऴ्वार सुन्दर पासुर मे प्रस्तुत करते हुए कहते है :

ओत्तिन् पोरुळ् मुडिवुम् इत्तनैये
उत्तमन् पेर् एत्तुम् तिरम् अरिमिन् एऴैगाळ्
ओत्तदनै वल्लीरेल् नन्रु अदनै मात्तीरेल्
मादवन् पेर् सोल्लुवदे ओत्तिन् सुरुक्कु

अनुवादक टिप्पणी : इस पासुर मे, भगवन्नाम महिमा कि यशोकीर्ति युक्त “माधव” को आऴ्वार् ने बताया गया है । माधव शब्द का अर्थ है : श्रीमहालक्ष्मी के पति अर्थात् श्रिय:पति । आऴ्वार् कह रहे है कि : हे मन्दमतियों ! हे अनभिज्ञयों ! अगर वेद का उच्चारण कर सकते हो तो ठीक है परन्तु अगर नही कर सकते तो, वेदों का आशय भगवन्नाम प्रतिपादन करना ही तो है और अन्तत: सभी इन दिव्य नामों से भगवान् की गुणगान करे । वेद सार इस नाम महिमा को ही तो जानना है और जिसे जानकर इन भगवन्नामों से भगवान् की स्तुति कर सकें । पूर्वाचार्य कहते है कि यह “माधव” नाम द्व्यमहामन्त्र से अभिज्ञात है क्योंकि यह युगलस्वरूप प्रतिपादक है अर्थात् भगवान् श्रीमन्नारायण “श्रिय:पति” है ।

८६) त्वरित्तिअलागिल् अवन् वैलक्षण्यत्त्तिल् ज्ञानम् इल्लैयागक् कडवतु इन्गे काल् पावित्तागिल् (पाविट्ट्रागिल्) सम्सारत्तिल् तण्मैयिल् ज्ञानमिल्लैयागक् कडवतु

अर्थ : वैलक्षण्यम् (वैलक्षण) – विशिष्टता / महत्ता । काल् पावुतल् – स्थितप्रज्ञता । तण्मै – नृशंसता

भगवान् की विशिष्टता कि अनभिज्ञता से, भगवान् को पाने कि तृष्णा जीव को नही होती है । अगर कोई जीव इस भौतिक जगत् मे शान्त व स्थितप्रज्ञता से जीवन व्यतीत कर रहा है तो वह इस भौतिक जगत् कि नृशंसता और निरर्थता से अनभिज्ञ है ।

अनुवादक टिप्पणी : पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी जी श्रीवैष्णव लक्षण का वर्णन मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के ११६वें सूत्र मे करते हुए कहते है – प्रपन्न जीव का मूल स्वभाव यह होना चाहिये कि चतुर्थ पुरुषार्थ व मोक्ष प्राप्ति व परमपद मे नित्य भगवद्सेवा की त्वरता (अत्यन्त चाहना) होनी चाहिये “पेत्तुक्कु त्वरिक्कै” । जब हम यथार्थ रूपेण समझ जायेंगे कि भौतिक जगत् के माया जालों के खिंचाव से इस घोर संसार मे पुन: वापसी है और हमारे कृत्य केवल तुच्छ प्रतीक है तो विवशता से उत्पन्न अन्तरंगिकि दर्द को जीव महसूसता है और इस संसार चक्र मे रहना उस के लिये असहनीय हो जाता है । इस परिपूर्ण क्षोभ पीडानुभव का उल्लेख भगवद्प्रिय श्रीशठकोप स्वामीजी ने तिरुविरुत्तम् नामक दिव्यप्रबन्ध के प्रथम पासुर मे किया है । श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है – “इनियाम् उरामै” – अब मै और सहन नही कर सकता – मानो कि ज्वालाग्नि पर खडा हूं ।

८७) ईश्वरनैप्पत्तिन (ईश्वरनैप्पट्ट्रिन) ऊत्तत्ताले (उट्ट्रत्ताले) उपायान्तरन्गळै नेगिऴुगैयोऴिय नास्तिक्यत्ताले विडुमन्रु; अतु विषयान्तरप्रावण्यहेतु

अर्थ : ऊत्तम् – इच्छा ; नेगिऴुगै – त्यागना ;
इसका यह अर्थ हुआ कि जब ईश्वर के प्रति अनुराग बढता है तो इतरोपायान्तर स्वयं छोड देते है । इसके विपरीत जब ईश्वर के प्रति अनुराग कम होता है तो विषयान्तरों के बन्धन मे फंस जाते है ।

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्च श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र के ११५वें सूत्र मे कहते है : “परित्यागत्तुक्कुम् अज्ञान असक्ति (अशक्ति) गलन्रु; स्वरूप विरोतमे (विरोधमे) प्रतान (प्रधान) हेतु” अर्थात् कर्म-ज्ञान-भक्ति योग त्यागना उनमे अज्ञानता और अशक्ति की वजह से नही अपितु जीव के स्वरूपानुरूप नही होने के कारण त्याज्य है क्योंकि जीव भगवद्परतन्त्र है । अत: ऐसे स्वप्रयासों (हलांकि पूर्ण शक्य होते हुए भी) मे चरम लक्ष्य “चतुर्थ-पुरुषार्थ व भगवद्सेवा” पुष्टि हेतु नही पडना चाहिये । इस विषय का विस्तार पुष्टिकरण पिळ्ळै लोकाचार्य तदनन्तर सूत्रों मे करते है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन सूत्रों की अद्भुत व्याख्या मे इस तत्त्व को और सुन्दरता से दर्शाया है ।

८८) कळवु वेळिप्पडुगैयिरे आत्म समर्प्पणम् पण्णुगैयावतु

अर्थ : जीव भगवद्सम्पत्ति है । भगवान् पर पूर्णतया निर्भर है और भगवद्परतन्त्र है । आत्मा को स्वयं है समझना चोरी है । आत्म समर्पण (स्वयं अर्पण) (जो स्वाभाविकता से भगवद्सम्पत्ति है) भगवान् को करना इस चोरी को प्रदर्शित करता है ।

अनुवादक टिप्पणी : जब हम किसि वस्तु को दूसरों को देते है तो हम यही समझते है कि यह हमारी सम्पत्ति या हम इसके मालिक है । इसी दृष्टान्त मे देखें, जब जीव भगवान् को आत्म-समर्पण करता है , तो जीव की स्वतन्त्रता परक बुद्धि प्रकाशित होती है अत: उस भावना से अपने आपको समर्पित करता है । इस विषय पर पूर्वाचार्य श्रीशठकोप स्वामी का पासुर उदाहरण देते हुए कहते है : श्रीशठकोप स्वामी ने कहा : मैने अपने आप को (भगवान्) के प्रति समर्पण किया परन्तु इस कृत्य पर पुण: विचार कर कहते है कि पूर्वोक्त कथन असत्य है और इस कृत्य के लिये वह शर्मिंदित है । यह ६३वें सूत्र मे पूर्व चर्चित है ।

८९) परत्वम् पोले वेदम् ; अवतारम् पोले इतिहास पुराण्न्गळ् ; अर्चावतारम् पोले तिरुवाय्मोऴि

तिरुक्कुडन्तै – नाच्चियार् सहित आरावमुदन् भगवान् – वह भगवान् जिनने तिरुवाय्मोऴि और अन्य प्रबन्धों के प्रकाशन मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई

अर्थ : परत्वम् – परत्व (अर्थात् वह स्वरूप जो परमपद मे नित्य और मुक्तों को दर्शनीय है) ; अवतारम् – (अर्थात् वह स्वरूप जो भगवान् के अवतार काल मे दर्शनीय है) ; अर्चावतारम् – (अर्थात् वह स्वरूप जो सभी के लिये दर्शनीय है)

इस सूत्र का यह अर्थ हुआ कि वेद परत्व तुल्य है, इतिहास-पुराण अवतार तुल्य है, तिरुवाय्मोऴि अर्चावतार तुल्य है । इसका विस्तार अर्थ कुछ इस प्रकार से है : वेद, इतिहास-पुराण सभी की बात नही है । योग्य व्यक्तियों के लिये ही है । पर इन योग्य व्यक्तियों को भी समय अनुसार ही यह योग्यता प्राप्त है । इसके विपरीत देखें तो, अर्चावतार तुल्य तिरुवाय्मोऴि परम सुलभ है अर्थात् अन्य दिव्यप्रबन्ध भी परम सुलभ है और सभी के लिये है । आचार्य हृदय मे अऴगियमणवाळ पेरुमाळनयनार् स्वामी इस तत्त्व को विस्तार से समझाते है । सूत्र ७०वें स्वामी जी कुछ इस प्रकार कहते है :

आचार्य हृदय सूत्र ७० : ” अतवा वेदवेद्यन्यायत्ताले परत्वपरमुदुवेदम् व्यूह व्याप्ति अवतारणान्गळिल् ओतिननीति केट्टमनु पडुकतैगळाय् आगमूर्त्तियिल् पण्णिय तमिळानवारे वेदत्तै द्राविडमागच् चेय्तारेन्नुम् “

अर्थात् श्रीमद्रामायण श्लोक “वेदवेद्येपरेपुंसि जाते दशरथात्मजे वेदः प्राचेतसादासीत् रामायणात्मना” से प्रतिपादित करते हुए स्वामी कह रहे है कि वह परमेश्वर भगवान् श्रीमन्नारायण, जो वेद के विषय है, महाराज दशरथ के आत्मज (पुत्र) के रूप मे अवतरित हुए तो वेद स्वयं श्रीमद्रामायण के रूप मे प्रकट हुआ । इस वेदवेद्य न्याय के अनुसार, भगवान् के विभिन्न अवतार (परवासुदेवोद्भव) का प्रतिपादन, वेदोद्भव विभिन्न प्रमाण देते है । वेद परत्व सूचक है अर्थात् परत्व की परिभाषा वेद मे है, व्यूह की परिभाषा पाञ्चरात्र मे है, अन्तर्यामित्व मनुस्मृति मे प्रतिपादित है, विभवावतार इतिहास और पुराणों मे उल्लिखित है, भगवान् का अर्चावतार जो कृपा करुणा का दिव्यसाकार स्वरूप है जो सर्वसुलभ है आऴ्वार के दिव्यप्रबन्ध (तिरुवाय्मोऴि) मे प्रतिपादित है ।

आचार्य हृदय सूत्र ७३ मे, श्रीसहस्रगीती के विशुद्ध सत्त्व का प्रतिपादन करते है हुए कहते है :

घट का उदाहरण

मृत् घटं पोलन्रे पोर्कुडम् – अर्थात् मिट्टि का घडा स्वर्ण घडा के समान नही होता है । स्वर्ण घडा स्वाभावत: शुद्ध होता है । इस घडे को कोई भी कभी स्पर्श कर सकता है । परन्तु मिट्टि के घडे को स्पर्श करने के लिये बहुत से नियम है जैसे योग्य व्यक्ति ही अनुकूल समय मे स्पर्श कर सकते है । अगर अयोग्य व्यक्ति इसको गलती से भी स्पर्श कर ले तो यह पात्र अयोग्य हो जाता है । इसी के अनुसार दिव्यप्रबन्ध भी स्वर्ण घडे के समान यह अत्यन्त विशुद्ध है और सभी इसका अवलोकन कर सकते है ।

९०) किण्णगत्तिल् इऴिवार् देशिकरैप् पिडित्तुक्कोण्डु इऴियुमापोले पेरिय पेरुमाळै अनुभविक्कुम्पोतु पिराट्टियैक् कूडक्कोण्डायित्तु इळिवतु

पेरिय पेरुमाळ् और पेरिय पिराट्टि

बाढ़ के प्रभाव से प्रवाहित तीव्रगति नदी जल मे अनुभवी व्यक्तियों कि सहायता से प्रवेश करना चाहिये । ठीक उसी प्रकार, बाढ़ रुपी गुण सागर स्वरूप भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य गुणों का अनुभव केवल अनुभवी श्रीजगन्माता श्रीजी की सहायता से ही हो सकती है । इसका उदाहरण श्रीमद्वाल्मीकि रामायण मे है यथा ” सहपत्न्या विशालाक्ष्या नारायणुपागमत् ” ।

अनुवादक टिप्पणि : पूर्वाचार्य इस श्लोकोद्धरण से यह कहते है कि जब भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वपरिवार उपास्य देव के तिरुवाराधन करते थे तो श्रीसीता (श्रीविशालाक्षि – विशाल नेत्रों वाली श्रीजी) सदैव साथ देती थी । यहाँ श्रीरामचन्द्र उपास्य देव की उपासना (अर्थात् श्रीमन्नारायण) कर हमे भगवद् आराधन कैसे करना है यह दर्शा रहे है । हमारे पूर्वाचार्य सर्वदा कहते है कि भगवान् का सन्निकर्ष पाना है तो आचार्य माध्येन (अर्थात् श्रीजी के पुरुषकार) से ही लभ्य है और युगल सेवा ही हम भगवद्दासों का मुख्य उद्देश्य है । श्रीशठकोप स्वामीजी इस तथ्य को प्रतिपादित करते हुए स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि १०.७.१ पासुर मे कहते है : सेन्जोर्कविगाळ् उयिर्कात्ताट्चेय्म्मिन् अर्थात् भगवान् अनेक दिव्य सागर रूपी गुणों का साकार स्वरूप है । हे महान कवियों ! ऐसे भगवत्तत्त्व मे प्रवेश करते हुए (भगवान् के दिव्य असंख्य कल्याण गुणों की महिमा गान करते हुए) स्वयं कि रक्षा करो क्योंकि इस सागर रूपी गुणाश्रय स्वरूप मे दूब जावोगे ।

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अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार्

71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।

 भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार्

भक्त की भक्ति भक्ति-योग (भक्ति-शास्त्र) के नियमों के अनुसार ही होती है । परन्तु प्रपन्न के लिए भगवद्विषयोत्पन्नासक्ति ही भक्ति कहलाती है । साधना-भक्ति से भक्तिमान भगवान् को प्राप्त करता है । प्रपन्न के लिए, भक्ति का उपयोग स्वरूपानुरूप जीवन व्यापन मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे इन तत्त्वों को बहुत सुन्दर रूप से समझाया है । सूत्र 271 मे स्वामी कहते है ः- प्रपन्न के लिए भक्ति भगवद्विषयासक्तिरूप धारण करती है । श्रीवरवरमुनि स्वामी इस सूत्र व्याख्या मे कहते है जिस प्रकार अत्यन्त भूखा जैसे अन्नादि ग्रहण करता है ठीक वैसे ही भक्ति से ही एक प्रपन्न भगवद्कैङ्कर्य को यथारूप  से कर सकता है ।

72) भक्तिमानुक्कु पलत्तिल् स्रद्दै इल्लातपोतु तविरलायिरुक्कुम्, प्रपन्नुक्कु स्वरूप-प्रयुक्तमाय् वरुमतागैयाले ओरुकालम् तविरातायिरुक्कुम्

तिरुप्पाणाऴ्वार – पूर्णतया पेरियपेरुमाऴ् के प्रति आसक्त

भक्तिमान जब उपेय (लक्ष्य) के प्रति निरुत्साहित या रुचि या इच्छा को खोता है तो उसकी भक्ति मे रुकावट होती है अतः भक्ति सफलीकृत नही होती । चूँकि प्रपत्ति जीव के स्वरूपानुरूप है अतः एक बार करने से उस जीव की रुचि (मे रुकावट) प्रतिबंधित नही होती ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भक्तियोगानुयायी को प्रतिक्षण भगवद्चिन्तन करते रहना है । अगर गलती से भी एक क्षण के लिए भगवद्विस्मृति हो तो उसकी भक्ति मे बाधा आती है और अन्ततः रुक जाती है । चूँकि प्रपत्ति सिद्धोपाय (भगवान् ही उपायोपेय है और भगवान् अपने शरणागत की रक्षा करने मे सक्षम है) है अतः भगवान् को उपायोपेय स्वीकृति ही जीव (जो नित्य भगवद्दास है) का यथार्थ स्वरूप है ।

73) अवन् गुण निबन्धनमन्रु, अवनोट्टै सम्बन्धम् सत्ताप्रयुक्तमेङ्गै

जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भगवद्गुणों पर आधारित नही है अपितु यह स्वाभाविक सम्बन्ध भगवच्छेषत्व (जो स्वरूपानुरूप) है के आधार पर है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः नम्माऴ्वार  तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ “कडियन् कोडियन्  . . . आगिलुम् कोडिय एन् नेन्जम् अवन् एन्रे किडक्कुम् ” पासुर मे कहते है भगवान् पाषाण-हृदयी है फिर भी इस दास का मन आप पर ही केन्द्रित है और सदैव आप के ही मनन चिन्तन मे है । नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे अनसूया और श्री सीता देवी के संवाद का उदाहरण देते है । जब अनसूया कहती है कि ” एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति साक्षात् भगवान् है ” तो भगवती सीता कहती है –  सभी का ऐसा विचार है कि मै भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य गुणाधार पर उनके प्रति आसक्त हूँ । अगर मेरे स्वामी स्वगुणों को त्याग दे और बदसूरत भी हो जाए फिर भी उनके प्रति मेरी आसक्ती को नही त्यागूँगी । पर मै स्वकथन का निरूपण नही कर सकती क्योंकि मेरे प्रिय स्वामी कदाचित भी स्वगुणों का त्याग नही करेंगे । पिळ्ळै लोकाचार्य इसी तत्त्व को श्रीवचनभूषण के 111वें सूत्र मे कहते है ” गुण कृत दास्यत्तिलुम् काट्टिल् स्वरूप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानम्” अर्थात् स्वरूपारूप भगवच्छेषत्व, गुणानुरूप भगवच्छेषत्व की तुलना मे श्रेष्ठ है । अगर मान लिया जाए कि यह भगवच्छेषत्व गुणानुरूप है तो जिस दिन यह गुण नज़र नही आयेंगे उस दिन (समय) दासत्व को छोड़ देंगे और इसी को वास्तविक आत्महत्या कहते है । परन्तु यह स्वाभाविकानुरूप (जो अपरिवर्तनशील है) है तो हम इसका (भगवच्छेषत्व का) परित्याग कदापि नही करेंगे ।

74) भगवद्विषयत्तिलोरडिवर निन्रवर्गळ् स्लाकनीयर्

जो कोई भी भगवान् के प्रति छोटा सा कार्य (करता) (कदम उठाता) है वह सदा कीर्तन (प्रशंसा) के योग्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः इस भौतिक जगत् मे जीवों के लिए जब इन्द्रिय तृप्ति के अनेकानेक साधन है तो उन जीवों मे अगर एक भी जीव भगवान् के प्रति आसक्त हो, वह सदा प्रशंसा के योग्य है । ऐसे आसाक्त अगर किसी श्रीवैष्णव का नित्य मार्गदर्शन प्राप्त हो तो वह अतीव शीघ्रता और सरलता से स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त करता है और सद्व्यवहार से स्वस्वरूप को समझता है ।

75) अत्तलैयाले वरुमतोऴियत् तान्तामोन्रै आशैयप्पडुगैकूडप्पऴि

सब कुछ भगवदेच्छा (भगवान् की इच्छा) अनुसारेण होना चाहिए । स्वमनोरथ पूर्ती भगवान् से याचना करना स्वदोष है । सदैव भगवद्मुखोल्लास से कार्य करना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् शेषी (स्वामी) है और जीव शेष (किंङ्कर) है । स्वामी को इच्छा कर आशीर्वाद देना चाहिए जो उस (दास) (सेवक) के लिए अनुकूल हो । शेषी होने की वजह से जीव का स्वतन्त्र इच्छा होना दोषयुक्त है और स्वरूप नाश कारक है ।

76) उडैयवने नम् कार्यत्तुक्कुक्कडवन्

भगवान् स्वामी है और जीवात्मा उनका सेवक है । शरणागतों का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः आत्मा देह द्वारा कार्य करता है और इन्हीं कार्यों को करने का मार्गदर्शन आत्मा देता है । भगवान् जीवात्मा का आन्तरिक आत्मा के रूप मे आवास करते है और यही जीव उनका शरीर । अतः शरीर रूपी जीव का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है । पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के चरमश्लाक विवरण 258 वें सूत्र इसी विषय को समझाते हुए कहते है ःः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है – “मोक्षयिष्यामि” अर्थात् ” उद्धार करूँगा ” “मै रक्षा करूँगा” । सूत्र मे स्वामी कहते है – ” इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित्तरेन् एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक् कोळ्ळेनो ” । इस सूत्र व्याख्या मे श्रीवरवरमुनि कहते है – अब तक तुम (अर्जुन) स्वयं को स्वतन्त्र मानते थे ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा । परन्तु अब तुम परतन्त्र मानकर (जैसे देह आत्मा पर निर्भर होता है उसी प्रकार) मुझ मे शरणागति किये । वरवरमुनि स्वामी कहते है यहाँ अर्जुन का भ्रम (दोष) निवारण कर्तव्य भगवान् का है और अर्जुन का शुद्धी एवं उद्धार का फलस्वरूपी भगवान् ही हैं।

77) वस्तुवुक्कु गुणत्तालेयिरे उत्कर्षम्  । अन्द गुणाधिक्यमेङ्गेयुण्डु, अङ्गेयिरेयेत्तम् (अङ्गेयिरेयेट्रम्)

एक वस्तु के प्रति उत्कर्ष का कारण उस वस्तु मे उपलब्ध विशेष गुण ही है । जब ऐसे गुणाधिक्यता हो तो ऐसे गुण उत्कृष्टता (विशिष्टता) प्राप्त करते है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् मे मुख्यतः दो विशेष गुण है – पहला कि वह विशिष्ट असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार राशि है और दूसरा असद् गुणों के विपरीत है वह । इसी कल्याण गुणों के सान्निध्य की वजह से उनकी वन्दना (स्तुति) सभी करते है ।

78) शेषभूतन् स्वरूपम् पेट्ट्रडिमै सेइगै शेषिक्कु पेट्ट्रिरे

जैसा कहा गया है “मेय्याम् उयिर् निलै” (तिरुवाय्मोऴि तनिया) – अर्थात् भगवद्मुखोल्लास तभी होता है जब जीव भगवच्छेशत्व को स्वीकार कर भगवद्सेवा करें । ऐसा करने पर भगवान् को अत्यन्तहर्ष प्राप्त होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः कहा गया है – “चेतन लाभं ईश्वरनुक्कु” अर्थात् जब भगवद्सम्पत्ति जीव भगवद् निष्ठा मे परिपूर्ण रूप मे सिद्ध होता है, भगवान् ही इससे लाभ प्राप्त करते है ।

भगवान् ही जीव को मोक्ष प्राप्ति के सम्मुख लाने के लिए नित्य संसार की सृष्टि कर, विभिन्न अवतार लेकर, आऴ्वार एवं आचार्य रूप मे इस दिव्य ज्ञान का प्रसार करते है । अन्ततः यह कार्य से जब उनकी सम्पत्ति की शुद्धि होती है तो यह उनके लिए ही श्रेयस्कर है ।

79)  स्वनिकर्षम् सोल्लुगै ज्ञानकायम् । ईश्वरोऽहं एन्रिरुक्कै अज्ञान कार्यम् ।

जैसे अमुदानर (तिरुवरङ्ग स्वामी) रामानुज नूत्तन्दादि के 48वे पासुर मे कहते है – –  स्वदोष गुणानुसन्धान ही असली पहचान है सच्चे आत्मज्ञान की । अर्थात् मुझ समान कोई तुच्छ नही है ।

मै ईश्वर हूँ कहना अज्ञानता और अहं कारणोत्पन्न है ।

80) तीर्थङ्गळिळे वर्त्तिक्किर सत्त्वङ्गळुक्कु पापम् पोगिरतिल्लैयिरे ज्ञानमिल्लामैयाले

कहते है की तीर्थ स्थलों के जलों मे रहने वाले विभिन्न जीवों का आत्मोद्धार नही होता है क्योंकि उनको स्वरूपानुरूप ज्ञान नही होता है अतः दोष निवारण नही होता है । केवल और केवल स्वरूपानुरूप ज्ञान से ही जीव दोषों से मुक्ति पाता है । अतः केवल तीर्थ जल मे स्नान मात्र से उद्धार नही होता ।

अनुवादक टिप्पणी ःः उदाहरणार्थ गङ्गा मे कोई स्नान करता है तो उसको यह ज्ञान होना चाहिये कि यह दिव्य गङ्गाजल का उद्भव भगवान् श्रीमन्नारायण के दिव्य चरणारविन्दों के चरणामृत से हुआ है जो इस सम्पूर्ण जगत् के सर्वरक्षक है । जब तक ऐसा ज्ञान वर्धन विचार नही होता है और केवल सोचता है कि यह सिर्फ दिव्य नदी जल है तो कोई उद्धार नही होता है ।

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अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ७

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

६१) एम्पेरुमानार् दर्शनस्तरिल् एत्तनैयेणुम् कल्वियिल्लात स्त्रीप्रायरुम् देवतान्तरगळै अडुप्पिडु कल्लोपादियाग निनैत्तिरुक्कुम्

श्रीरामानुज दर्शनान्तर्गत अनुयायियों मे, एक अशिक्षित स्त्री (जिसको प्राथमिक शिक्षा भी अप्राप्त हो वह) भी जानती है कि परतत्त्व, परमेश्वर, परब्रह्म श्रीमन्नारायण ही है और अन्य देवतान्तर (देवी-देवता) उस पत्थर (ईंट) की भाँति है जिसका प्रयोग व्यन्जन बनाने मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व परमेश्वर परब्रह्म है । ब्रह्मा,रुद्रादि देवी-देवता गण श्रीमन्नारायण के सेवक हैं । वह सभी कर्म से लिप्त (कर्म से बन्धित) हैं और रजो तमो गुण से पूरित हैं । तोण्डरडिप्पोडि आल्वार तिरुमालै दिव्य-प्रबन्ध के दसवे पासुर मे कहते हैं ” भगवान्  श्रीमन्नारायण अकारणकरुणालय अहैतुकी कृपा से, अन्य देवी-देवताओं को उन सभी के लिए स्थापित करते हैं जो पूर्ण रूप से भगवान् के प्रति शरणागत नहीं हो सकते ” । ऐसे सामान्य जन इन देवी-देवताओं के प्रति समर्पित होकर भक्ति भावना मे प्रगतिशील होते हैं और अन्ततः विष्णु भक्ति का बीज उगता है । अगर ये भी नही होते तो सामान्य जन सभी नास्तिक हो जाते और उनका पूर्णतः पतन हो जायेगा । अतः श्रीरामानुज दर्शन के अनुयायी जन उपरोक्त कथन तत्त्व ” देवतान्तर गण विशेष कार्यार्थ रत (अन्यकों के हितकारी) हैं ” को भलीभाँति जानकर इनके प्रति कोई विशेष लगाव (रुचि) नही होता जैसे व्यंजन बनाने मे ईंट का केवल मात्र उपयोग होता है और उसके प्रति कोई आसक्ति (रति) नहीं होती ।

६२) मोक्षपलम् (मोक्षफलम्) सिद्दिक (सिद्धिक) वेणुम् एन्रिरुक्किरवर्गल् क्षुद्र देवतैगलैप् पिन् चेल्लार्गलिरे 

वह (जो) मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रतिक्षण स्थिरचित्त है (वह) क्षुद्र देवी देवताओं के शरणागत नहीं होता ।

परमपद – नित्य आनंद का निवास और मुमुक्षुयों का परम लक्ष्य

अनुवादक टिप्पणी :

उपेय (लक्ष्य) पुरुषार्थ है – – पुरुष की इच्छा (कामना) है । पुरुषार्थ चतुष्टय 1) धर्म [शास्त्र वचन का पालन] 2) अर्थ [लक्ष्मी – धन] 3) काम [विपर्य लिंग के प्रति आकर्षण (काम वासना) ] 4) मोक्ष (मुक्ति) है । श्रीमन्नारायण को मुकुन्द कहते हैं – – जो मोक्ष दाता है । अन्य देवी देवता स्व अनुयायियों के लौकिक तुच्छ इच्छापूर्ति कर सकते हैं लेकिन मोक्ष प्रदान करना केवल श्रीमुकुन्द ही कर सकता है । अतः मुमुक्षु जन भगवान् श्रीमन्नारायण का ही शरण लेते हैं । ऐसे अन्य कर्म बन्धित देवतान्तरों के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती ।

६३) गरुड़ध्वज, गरुड़वाहन एन्रु चोल्लप्पडुमवनायित्तु मोक्ष प्रदनावान् 

मोक्ष प्रदाता (वह) भगवान् है (जिसका) वाहन गरुड़ (जी) है और (जिसके) विजय पताका पर गरुड़ (जी) विद्यमान हैं । वह भगवान् श्रीमन्नारायण (विष्णु) हैं ।

गरुड़ वाहन में श्रीरंगनाथ 

अनुवादक टिप्पणी : गरुड़ जी वेदात्मा के नाम से जाने जाते हैं । भगवान् श्रीमन्नारायण को वहन करने के कारण वेदुद्देश्य परमात्मा भी वह ही है ।

६४) ” कारणन्तु ध्येयः ” एङ्गिरपडिये जगत्कारण वस्तुवेयिरे उपास्यमावतु

शास्त्र कहता है “कारणम् तु ध्येयः”। वह जो इस सृष्टि का मूल कारक, सृष्टि संहारक, सृष्टि पोषक है (सृष्टि, स्थिति, संहार कारक है) (वह) ही ध्येय वस्तु है ।


अनुवादक टिप्पणी :

तैत्रीय उपनिषद् कहता है – -” यतो वा इमानि भूतानि,  येन जातानि जीवन्ति, तद् विजिज्ञास्य, यत् प्रयन्त्याभिसम्विसन्ति, तद् ब्रह्मेति ” अर्थात्  (वह) जिससे सकल चित-अचित पदार्थ प्रकट होते हैं, जो सकल पदार्थ का निवास स्थान है, अन्ततः सकल पदार्थ समा जाते हैं – – वह सदा अनुसन्ध्येय ब्रह्म है । श्रीमन्नारायण ही सर्व सृष्टि कारण कारक है (पंच भूत निर्माण तक) तदुपरांत ब्रह्मा को निर्दिष्ट शक्ति से व्यष्टि सृष्टि का निर्माता बनाते हैं । वह परब्रह्म ही महाविष्णु रूप मे सकल पदार्थों मे स्वयं विद्यमान होकर पोषण धर्ता के रूप मे विराजमान है । वह ही रुद्रादि देवतान्तरों को यथा शक्ति प्रदान कर सृष्टि संहारेत्यादि संपन्न कर अन्ततः सभी का संहार करते हैं । अतः भगवान् श्रीमन्नारायण ही परतत्त्व और सर्व कारण कारक हैं ।

६५) मोक्ष प्रदानुमाय सर्वनियन्तावुमान सर्वेस्वरनुक्कु अडिमै पुगुवाते कर्त्तव्यम् 

जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह उस सर्वेश्वरेश्वर की सेवा करें जो मोक्ष प्रदाता है ।

आदिशेष जो निरंतर भगवदकैंकर्य में तल्लीन हैं – जीवात्मा की स्वरूप का प्रधान उदाहरण

अनुवादक टिप्पणी : श्रीमन्नारायण ही परात्पर परतत्त्व हैं जो सर्व चेतनाचेतन वस्तुओं के शेषी (स्वामी) हैं । स्वाभाविक रूप से प्रत्येक चेतन का कर्तव्य है की वह स्वाभाविक स्वामी की सेवा करे न कि अन्यों की।

६६) सेय्य (शेय्य) वेण्डुवतोन्रिल्लै. अवनडुमैयै अवनुकाग इसैय (इशैय) अमैयुम्

जीवात्मा को कुछ करने की जरूरत नही है । उसे तो केवल सत्य को स्वीकारना है कि वह भगवान् का है ।

अनुवादक टिप्पणी :

सभी चेतनाचेतन वस्तुएं भगवान् के हैं अर्थात् भगवत्सम्पत्ति है । जीवात्माओं को इस सत्य को स्वीकरना है । इस स्वीकृति से भगवद् कृपा का दिव्यानुभव का प्रभाव दिखता है और तुरन्त भगवद् कृपा की वर्षा स्वकार्य करती है । इस सन्दर्भ मे पूर्वाचार्य एक सुन्दर उदाहरण देते हैं – – एक समय की बात है –  एक राजा और उसका पुत्र राजकुमार शिकार हेतु जंगल गये । पर दुर्भाग्यवश वह राजकुमार जंगल मे खो गया और दुःखित राजा स्वराज्य को लौट गया । इस दौरान एक शिकारी ने इस खोये नन्हे राजकुमार को प्राप्त कर उसका देखभाल करने लगा । तदुपरान्त वह राजकुमार स्वयं को शिकारी का ही बेटा मानकर शिकारी की तरह व्यवहार करने लगा और इस प्रकार शिकारी बन गया । पर एक दिन किसी व्यक्ति ने उसे पहचाना और उसके राजकुमार होने का सत्य प्रकाशित किया । अब उसे उसके राजकुमारत्व को स्वीकारना है और इस प्रकार से खोये राज गद्दी को पुनः प्राप्त करना है । अतः इसी प्रकारेण जीवात्मा भी इस जन्म मृत्यु जाल चक्र मे बंधा सोचता है कि वह स्वतंत्र है या केवल देहाभिमान से युक्त जीवन व्यतीत करता है । पर जब वह अपने भगवद्परतन्त्र स्वरूपानुरूप स्थिती को स्वीकारता है तो तत्क्षण भगवदानुग्रह का मंगल पात्र हो जाता है और भगवद् कृपा का प्रवाह उसमे होता है ।

६७) अवन् कोडुत्त उपकरणगळैक् कोण्डु अप्राप्त विषयङ्गळिल् पोगाते, ” तन्तनी कोण्डाक्किनै ” एङ्गिरपडिये वागुत्त विषयत्तुक्के शेषमाक्किक् कोण्डु कित्तुगै 

उस परब्रह्म द्वारा प्रदत्त उपकरण (जीवात्मा के लिए इन्द्रिय और देह) का सही उपयोग करना चाहिए अर्थात् भगवद्-सेवा और भागवत-सेवा मे ही होना चाहिए न कि इन्द्रिय तृप्ति मे |

अनुवादक टिप्पणी :

भगवान् ही शेषी (स्वामी) है और चेतन तत्त्व शेष (भगवद्दास) है| अतः जीवात्मा का स्वाभाविक रूप से स्व इन्द्रियों से नित्य भगवद्-सेवा करना ही परम उद्देश्य है. भगवान् जीवात्मा को देह और इन्द्रिय प्रदान इसी लिए करते हैं ताकि (वह) जीव उनकी सेवा करें| भगवद्-पार्षद भगवद्भक्त श्रीनम्माळ्वार (शठकोपसूरि) स्व पासुर मे “तन्तनी कोण्डाक्किनै” (तिरुवाय्मोळि 2.3.4) कहते हैं वह भगवद्-कृपा से भगवान् के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ हैं । वह कहते हैं, “अनन्त काल से मैं इस भौतिक जाल चक्र मे बंधा था और आपकी अहैतुकी कृपा से आप बहुत समीप आकर मेरे हृदय मन्दिर मे विद्यमान और प्रकाशवान है । इस कृत्य के लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ । इस कृतज्ञता को कैसे व्यक्त करूँ ? मैं अपने आप को समर्पित करता हूँ । लेकिन यह भी कैसे हो सकता है क्योंकि मैं आपकी सम्पत्ति हूँ और मेरी मान्य सम्पत्ति भी असल में आपकी ही सम्पत्ति है । आपकी देन ही यह मेरा देह है और आप स्वयं ही मुझसे आपकी सेवा करवा रहे हैं । ” लोकाचार्य स्वामीजी (नम्पिळ्ळै) ईडु व्याख्या मे कहते हैं कि आत्मसमर्पण करने का कारण सर्व मुक्ति प्रसंग से बचने के लिए किया जाता है । “सर्व मुक्ति प्रसंग” – –  सभी जीवों का परमपद मे होना भगवदेच्छा (भगवान् का निर्वाचन) है क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि सभी जीव परमपद का आस्वादन करे (नित्य उनके साथ ही रहे) । परन्तु यह जीव के लिए स्वाभाविक (स्वरूपानुरूप) नहीं है और ऐसा कदाचित भी नहीं करना चाहिए । मोह वश जीव आत्मसमर्पण करता है और स्वरूपानुरूप ज्ञान प्राप्त कर यह कृत्य अनुचित मानकर ऐसे सोचता है ” मैं जो भगवद्सम्पत्ति ही हूँ अपने आपको पुनः कैसे उस भगवान् को समर्पण करूँ जैसे कुछ नया वस्तु समर्पण कर रहा हूँ ” और उसके लिए प्रायश्चित करता है । वास्तव मे यह छल है ।

६८) एकान्त भोगत्तुक्कागप् पोन्त (पोन्द) पिराट्टि अशोकवनिकैयिळे इरुन्ताप्पोले तोट्रा निन्रतायित्तु स्वरूप ज्ञानम् पिरन्त (पिरन्द) पिन्बु देहत्तिले इरुक्क इरुप्पु

भगवती सीता देवी ने भगवान् श्रीरामचन्द्र के साथ एकान्त मे भोग करने की इच्छा से ही उनके साथ वनवास किया परन्तु यह इच्छा प्रतिकूल हुई और अन्ततः अशोक वन मे विरह भावना से रही । इसी प्रकार जब जीवात्मा को स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त होता है (भगवद् सम्बन्ध) तब इस देह मे रहना शोक पूरित होता है ।

६९) तिरन्तुकिडन्त वासल्तोरुम् नुळैन्तु तिरियुम् पदार्त्तम् पोले, कर्मानुगुणमाग देवादि सरीरङ्गळ्तोरुम् प्रवेशित्तुत्तिरियुम्

जैसे खुले घर मे कुत्ता प्रवेश करता है ठीक उसी प्रकार जीवात्मा भी देव, मनुष्य, पक्षी, जानवर, पेड़, इत्यादि शरीरों मे स्वकर्मवश प्रवेश करता है और इस संसार चक्र मे फँसता है ।

अनुवादक टिप्पणी : स्वकर्मवश जीव देह (मे प्रवेश) प्राप्त करता है । इस संसार मे अनेकानेक वर्ण दृश्य हैं । भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता मे कहते है अन्त काल मे जीव जैसा इच्छा करता है उसी प्रकार अगला देह प्राप्त होता है । मनु स्मृति मे कहा गया है – जब जीव मन से अपराध करता है तो अगले जन्म मे चण्डाल रूप (इस रूप मे कोई उच्चतम सोच विचार नही होता है) धारण करता है, वाचिक अपराध से तिर्यक (पक्षी) रूप मे (इस रूप मे वाक् का कोई प्रयोजन नही होता) जन्म लेता है, कार्मिक अपराध से पेड़ के रूप मे जन्म लेना पड़ता है (क्योंकि इस देह मे कुछ कर्म नही कर सकता है) ।

७०) भक्तिमानुक्कुम् भक्तियुण्डु । प्रपन्नुक्कुम् भक्ति उण्डु । रुचियै ओऴिय प्रपत्ति पण्णकूडाते

भक्तिमान (भक्तिमार्गानुयायी) और प्रपन्नों (शरणागत मुमुक्षुओं) दोनों में भक्ति होता है । बिना भक्ति के (भक्ति को छोड़कर) शरणागति नहीं करना चाहिए ।

भक्ति भगवान् के प्रति प्रेम या आसक्ति है। दोनों – भक्तिमान (भक्तियोग अनुयायी) और प्रपन्न (भगवान् का शरणागत) मे भक्ति होती है । बिना भक्ति के जीव शरणागति नही कर सकता है । अगर बिना भक्ति के जीव शरणागति कर भी लें तो कोई प्रयोजन नही होता है ।

अनुवादक टिप्पणी : भक्तिमान (भक्तियोग निष्ठ) और प्रपन्न (शरणागत निष्ठ) की भक्ति मे यही भेद है कि भूतपूर्व के लिए भक्ति उपाय है और उत्तरवर्ती के लिए भगवान् सिद्धोपाय (उपायोपाय) है अर्थात् भगवद्कैङ्कर्य मे आसक्ति (रति) ही भक्ति है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-7.html

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कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:
श्रीवानाचल महामुनये नम:

यह हिन्दि लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे कृष्णस्वामी य्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन है ।

यह लेख “श्रीमन्नम्पाडुवान्” के जीवन का वर्णन करती है जो तिरुक्कुरुन्गुडि एम्पेरुमान् (भगवान्) – नम्बि पेरुमाळ् (भगवान्) के परम पावन भक्त थे । इसी वर्णन मे एकादशि कि रात को इनका एक ब्रह्म राक्षस से वार्तालाप भी उपलब्ध है ।

ब्रह्म राक्षस — वह सद्ब्राह्मण जो पूर्व जन्म मे यागेत्यादि मे गलति कर राक्षस रूप मे पैदा हुआ हो ।

बहुत समय पहले, पृथ्वी (धरती) प्रलयजाल (कारणजल) मे डूब गयी थी । उस समय, धरती को बचाने भगवान् श्रीमन्नारायण ने वराह रूप धारण कर, इस कारणजल मे कूद गये । ब्रह्माण्ड के दीवारों मे फसी धरती को अपने तेज़ दन्तों (जो गजदन्त समान दिखे) से रक्षा कर, धरती को यथारूप व्यवस्थित करने के लिये योग्य क्षक्ति प्रदान कर, श्रीभूमि पिराट्टि (भगवान् कि मुख्य पत्नी जो धरती कि मुख्य देवी है) को सराहते हुए आलिङ्गन किये । उस समय श्रीभूदेवी धरती पर त्रस्त समस्त चेतनों के प्रति कृपा दर्शाते हुए अपने स्वामी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीवराह रूपावतार से नम्र निवेदन की – हे भगवन् ! आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ दासी की रक्षा की है । इस धरातल पर रहने वाले समस्त चेतनों (मेरे पुत्रों / पुत्रियों) का सुगम उद्धार हेतु मार्ग दर्शन करावें । भगवान् तुरन्त बोले – हे देवी ! मेरा नामोच्चारण ही सरल और सुगमोपाय है । इसी से इनका समस्त कल्याण व उद्धार होगा । इस उपलक्ष मे, मै तुमको एक सरल सद्भक्त नम्पाडुवान् की महिमा प्रस्तुत करूँगा जिससे नामोच्चारण (नाम-सङ्कीर्तन) कि महिमा प्रकाशित स्वत: होगी ।

यह दिव्य चरित्र गाथा भगवान् ने इस प्रकार से बताया :

भगवान् तिरुक्कुरुन्गुडि नामक दिव्यदेश मे स्वपत्नी समेत (श्री-भू सहित) अर्चारूप मे कृपावशात वास कर रहे है । इस दिव्यदेश के भीतर प्रान्त मे, एक चाण्डाल वंश (यह चातुर्वर्ण के अन्तर्गत् नही है) मे जन्मे भगवान् के महद्भक्त । इनको बचपन से ही भगवान् का नाम-सङ्कीर्तन करने का बहुत बडा शौक था । अत: इस प्रकार से प्रेरित भगवद्भक्त, प्रतिदिन रात्रि समय मे, इस दिव्य देश के अर्चारूप भगवान् को वीना-गान संयुक्त अपनी भक्ति को भगवन्नाम सङ्कीर्तन के जरिये, शास्त्र सम्मत दूरी से, दिव्य देश के वासियों के उठने से पहले स्वकैङ्कर्य (नाम-सङ्कीर्तन) कर चले जाते थे । अत: इस प्रकारेण आप श्री पाडुवान् के नाम से विख्यात हुए । पाडुवान् — जो मधुर गान गाता है । भगवान् ने स्वयं आप श्री को नम्पाडुवान् कि उपाधि देकर आपके नाम-सङ्कीर्तन के स्वारस का अनुभव करने लगे । अत: इस प्रकार से बहुत समय तक नित्य रात्रि समय मे भगवद्-कैङ्कर्य मे अपने आप को सम्लग्न किया ।

एक समय, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात मे, जागरण-व्रत हेतु तिरुक्कुरुन्गुडि भगवान् के प्रति प्रगतिशील नम्पाडुवान् की भेंट एक ब्रह्मराक्षस से हुई । यह ब्रह्मराक्षस अपनी भूख मिताने के लिये इन्तेज़ार कर रहा था । अचानक आप श्री को देखकर वह सन्तुष्ट हो गया कि उसको उसका आहार स्वयं चल कर आया है । अत: यही निवेदन ब्रह्मराक्षस ने आप श्री के समक्ष रखा और आप से परस्पर चर्चा कर अपना जीवन वृत्तान्त बताया कि वह पिछले जन्म मे सोम शर्मा नाम का ब्राह्मण था और जिसने यज्ञ-यागादि मे त्रुटि कर ब्रह्मराक्षस रूप धारण किया । तब आप श्री ने उसको सराहते हुए कहा – हे ब्रह्मराक्षस ! आपकी बातों से बहुत प्रसन्न हुआ । आपकी महती कृपा से आज मै अपने प्राण त्याग सकता हूँ । लेकिन एक बात है कि मै अभी आपकी इच्छा पूर्ति नही कर सकूँगा । मै नित्य रात्रि को समीप मे स्थित भगवान् के मन्दिर जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन करता हूँ । मेरा यह सुवसर छोडने पर मजबूर न करें और मुझे जाने की आज्ञा दे । मुझे मेरा स्वगान से जागरण-व्रत सम्पूर्ण कर, भगवान् को सन्तुष्ट कर आने दे । मै अवश्य आवूँगा । यह मेरा वचन है । ब्रह्मराक्षस ने कहा : हे नम्पाडुवान् ! यह तुमहारा कोई छल लग रहा है । अगर तुमको छोड दूँ तो तुम मुझसे छुटकारा प्राप्त कर सकते हो और पुनः लौटोगे नही । यह सुनकर आप श्री ने इस ब्रह्मराक्षस को आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहा :

अगर मै नही लौटा तो निम्नलिखित पापों के फल का अधिकाधिक फल मुझे प्राप्त हो :

१) असत्यता का पाप (श्लोक ३३)
२) कामवासना से आवृत अन्यों कि पत्नियों के साथ अवैध सम्बन्ध का पाप (श्लोक ३४)
३) जब मै और कोई अन्य भोजन करते समय भोजन मे भेदभाव दिखाने का पाप (श्लोक ३५)
४) ब्राह्मण को दान मे स्थल दे कर पुनः उससे छीनने का पाप (श्लोक ३६)
५) युवनावस्था कि लडकी का सम्भोग करना और बुढापे उसमे दोष देखकर उसका परित्याग करने का पाप (श्लोक ३७)
६) पित्रु-तर्पण के दिन स्वपत्नी का सम्भोग का पाप (श्लोक ३८)
७) उस व्यक्ति का अपमान करना जिसने भोजन प्रदान किया है वह पाप (श्लोक ३९)
८) अपनी बेटी का विवाह करने का वचन देना और तत्पश्चात् उस व्यक्ति से उसका विवाह न करना का पाप (श्लोक ४०)
९) षष्ठी, अष्टमी, अमावास्य, चतुर्दशि के दिन बिना स्नान किये भोजन ग्रहण करने का पाप (श्लोक ४१)
१०) दान करने का वादा कर दान नही करने का पाप (श्लोक ४२)
११) स्वयं के मित्र की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखना जिसका बहुत बडा एहसान स्वयं पर हो का पाप (श्लोक ४३)
१२) स्वाचार्य एवं राजा की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने का पाप (श्लोक ४४)
१३) दो स्त्रियों से विवाह करना और तदुपरान्त एक का पक्षपात करने का पाप (श्लोक ४५)
१४) एक पतिव्रता स्त्री का यौवनावस्था मे त्यागना (जो पूर्णतया निर्भर है) का पाप (श्लोक ४६)
१५) उस गोवृन्द को रोकना का पाप जो जल पीने के लिये जा रहे है (श्लोक ४७)
१६) ऐसे पूर्वपीढी कृत पञ्च महापापों (जैसे ब्राह्मण हत्या) का फल (श्लोक ४८)
१७) अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने का पाप (श्लोक ४९)
१८) अन्य देवी-देवताओं को श्रीमन्नारायण के तुल्य मानने का पाप (श्लोक ५०)

जब तब अठारहवाँ पाप के बारे मे नही बताया, तब तक ब्रह्मराक्षस पूर्वोक्त पापों को नही माना । जब आप श्री ने अठारहवाँ पाप के बारे मे बताया, ब्रह्मराक्षस को पूर्ण विश्वास हुआ क्योंकि यह ऐसा महामहापाप जिसे करने से हर एक जीव इस सम्सार चक्र मे नित्य बन्धित हो जाता है । ऐसे विश्वास से ब्रह्मराक्षस ने आप श्री को छोडकर आपके वापसी की प्रतीक्षा करने लगा ।

अनुवादक टिप्पणी : अठारहवाँ पाप – अन्य देवतान्तरों को भगवान् श्रीमन्नारायण के तुल्य मानना महद्पाप है । इस पूराण का महदुदेश्य यही है कि ज्ञानी जन इसको जानकर इसका पूर्ण परित्याग करे ।

अत: इस प्रकारेण वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् अपने प्रिय भगवान् के समक्ष जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन कर, भगवान् को प्रसन्न किये और स्वदेह त्याग की अन्तिम इच्छा से ब्रह्मराक्षस की ओर अति शीघ्रता से चले । पुनः स्वाहार को देखकर प्रसन्न ब्रह्मराक्षस ने आप श्री की महिमा को जान गया । ब्रह्म राक्षस ने वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् से उनके मधुर गान के फल को माँगा । श्रीमन्नम्पाडुवान् ने यह सुनकर उत्तर दिया – यह तो असम्भव है श्रीमन् ! मुझे पता नही आपको इसका फल भी दे पावूँगा कि नही क्योंकि वह स्वकैङ्कर्य के प्रति किछु भी नही चाहते थे । पुनः पुनः निवेदन करने पर उनके एक गान का फल देने के लिये राज़ी हो गये आप श्री । इस प्रकार कैशिक छन्द मे गान का फल प्राप्त कर यह ब्रह्म राक्षस मुक्त हो गया । इस स्थिति से मुक्त ब्रह्मराक्षस ने राक्षस देह त्यागकर, परलोक प्राप्त किया । तदनन्तर पुनः स्वकैङ्कर्य प्राप्त कर श्रीमन्नम्पाडुवान् भगवन्नाम-सङ्कीर्तन सेवा मे सम्लग्न हुए और अन्तत: भगवद्धाम प्राप्त किये ।

यह दिव्य चरित्र का वर्णन श्रीमन्नारायण (वराह भगवान्) ने स्वपत्नी श्रीभूदेवी को किया । अत: इस प्रकारेण यह सङ्क्षिप्त वर्णन सम्पूर्ण हुआ ।

इस पुराण का पाठ अनेक दिव्यदेशों मे इस दिन किया जाता है । तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्य देश मे नाटक रूप मे यह दिव्य चरित्र दर्शाया जाता है ।

इस पुराण का मङ्गल श्लोक :

नमस्तेस्तु वराहाय लीलोद्धराय महीम् ।
कुरमध्यतोऽयस्य मेरु:गणगणायथे ॥

अर्थात् : मै उन वराह भगवान् को भजता हूँ, जिनने इस भू (धरातल) को बिना विशेष प्रयास से उठा लिया और जिनकी तुलना मे मेरुपर्वत तिनके के समान है ।

यही भाव पेरिय तिरुमोऴि ४.४.३ – ” शिलम्बिनिडैच् चिरु परैपोल् पेरिय मेरु तिरुक्कुरुळम्बिल् कणकणप्पा ” मे है ।

प्रलयोदन्वदुत्तीर्णम् प्रपद्येऽहम् वसुन्धराम् ।
महावराह दम्श्ट्राग्र मल्लीकोसमधुव्रतां ॥

मै उन भूदेवी के शरणागत हूँ जिनको महावराह भगवान् ने कारणजल से उठाया, और उनके (भगवान् के) मल्लिका पुष्प तुल्य दन्तों मे कृष्णवर्ण भौंरे के समान है ।

श्रीपराशर भट्ट ने इस पुराण की व्याख्या लिखी है और इस महद्कार्य के लिये उनको भी प्रणाम करते है :

श्रीपराशर भट्टार्यः श्रीरङ्गेश पुरोहित: ।
श्रीवत्साङ्कसुत: श्रीमान् श्रेयसेऽमेस्तु भूयसे ॥

(वह) श्रीपराश्रभट्ट स्वामी मुझे सभी शुभ प्रदान करे, (जो) श्रीरङ्ग भगवान् के पुरोहित है, (जो) श्रीवत्साङ्क (कूरेश) के सत्पुत्र है और जो कैङ्कर्यश्री भाव से सर्वदा पुरित है ।

आऴ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं
जीयर् तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन् सेट्टलूर कार्तीक श्रीहर्ष रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/11/kaisika-mahathmyam.html

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