Monthly Archives: January 2016

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ६

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ५

३०) विषय विरोधीभगवत विषय में बाधाएं

अपर्यामृत – आरावमुद भगवान्

विषय का अर्थ सामान्यत: भगवत विषय (भगवान से संबन्धित विषय) है । कुछ भी इससे विपरित विरोधी है।

  • विषय जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आदि जो सांसारिक खुशी प्रदान करते है वह भगवत विषय में बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब कोई इंद्रियों के सुख में रहता है तो वह उसमें रजो और तमो गुण को बढाता है और स्वाभाविकता से उस व्यक्ति को भगवान से दूर कर देता है। आल्वार स्वयं कई पाशुर में यह कह चुके है कि यह सांसारिक खुशी बहुत शक्तिशाली है और वह निरन्तर उन्हें पीड़ा देती है।
  • भगवान का नाम सुनना जीवात्मा के लिये स्वाभाविकता से आनंददायक है। जब जीवात्मा भगवान का नाम सुनते या बोलते है तब भगवान स्वयं इसे जीवात्मा से किया हुआ सुकृत मानते है। भगवान का नाम नहीं सुनना या कुछ और सुनना बाधा है।
  • भगवान का अर्चा विग्रह बहुत आनन्द प्रदान करता है। सांसारिक वस्तु को देखना बाधा है।
  • भगवान का नाम छोड़ और दूसरे का नाम स्मरण करना बाधा है।
  • चरण जो हमें प्रदान किये गये है उन्हें भगवान के क्षेत्रों (दिव्य देश आदि) में जाने के लिये उपयोग करना चाहिये। उन्हें देवताओं के क्षेत्र में जाने के लिये उपयोग करना बाधा है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी भागवतों के स्तुति के बारें में श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “पयिलुम् चुडरोळि” और “नेडुमार्कडिमै” । इससे सभी को समझना चाहिये की भगवान से भी भागवतों कि स्तुति अधिक बडी है। इसलिये बिना भगवातों कि सेवा किये केवल भगवान के अर्चा विग्रह कि सेवा करना बाधा है।
  • भागवतों का नाम स्मरण छोड़ भगवान का नाम स्मरण करना अपचार है। उदाहरण के लिये, हमारे पूर्वाचार्य कहते थे “नारायण” से बढ़कर “रामानुज” का नाम है और रामानुज का नाम लेना अधिक आकांक्षादायी है। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी एक बार सुनते है कोई “नारायण” का नाम ले रहा है और कहते है “सब को ‘रामानुज’ का नाम लेना चाहिये केवल ‘नारायण’ का नाम लेना अयोग्य है” और उस स्थान से चले गये।
  • भागवतों के चरण कमल को स्पर्श करना स्वयं में अच्छा है। परन्तु सांसारी को छुना या उनसे छुआ जाना बडी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपरशर भट्टर स्वामीजी के जीवन में एक घटना इस संदर्भ में दर्शायी गयी है। श्रीरंगम के गलियों में चलते समय एक कोई अन्य देवता का भक्त जिसने रंगीन धोती धारण कि स्वामीजी के समीप आया और वह उन्हें छु लेगा इससे घबड़ा कर स्वामीजी अपनी माता आण्डाल अम्माजी के पास जाकर इसका उपचार पूंछते है। वह उन्हें किसी उपविधि (जिसने यज्ञोपवित नहीं लिया) भागवात का श्रीपादतीर्थ लेने को कहती है। भट्टर स्वामीजी एक भागवत को समझाकर जो भगवान का श्रीपाद कैंकर्य कि सेवा करते है उनका श्रीपाद लेकर संतुष्ट हो जाते है। अगर श्रीपरशर भट्टर स्वामीजी जो नंपेरुमाल / नाचियार के गोद लिये हुए पुत्र केवल एक संसारी के छुने के सोच से घबड़ा गये तो हमें यह सोचना चाहिये की हमें कितना सावधान रहना चाहिये ।
  • भगवान को तुलसी बहुत प्रिय है। परन्तु हमें केवल भगवान को अर्पित तुलसी कि सुगन्ध हीं लेनी चाहिये। भगवान के चरण कमल में जो अर्पित तुलसी न हो उसे सूंघना अपचार है। अनुवादक टिप्पणी: सभी जीव और निर्जीव भगवान कि संपत्ति है और केवल भगवान के आनन्द के लिये उत्पन्न होते है। उसे पहिले भगवान को अर्पण करना फिर उसे प्रसाद रुप में स्वीकार करना चाहिये – स्वतंत्र रुप से हम कुछ भी रस नहीं ग्रहण कर सकते है।

३१) विश्वास विरोधी – उपाय में हमारे विश्वास में बाधा

सबसे बुरे समय में भी माता सीता श्रीराम पर पूर्ण विश्वास प्रगट करती है

विश्वास यानि दृढ़ विश्वास। यहाँ हम मोक्ष के लिये उपाय में दृढ़ विश्वास को देख रहे है। हमारे पूर्वाचार्य शास्त्र के आधार पर यह समझाये हैं कि मुमुक्षु के लिये भगवान हीं योग्य उपाय है। अनुवादक टिप्पणी: यही तत्त्व श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कि मुमुक्षुपडि पर व्याख्या में समझाये है। यह समझाते समय “पेरु तप्पातेन्रु तुणिन्तिरुक्कैयुम्” – सभी को यह दृढ़ विश्वास रखना चाहिये कि हमारा लक्ष्य जो भगवद कैंकर्य वह प्राप्त होगा।

  • प्रपत्ति भगवान को प्रार्थना करने का कार्य है कि वह हमारे उपाय बने। वह केवल भगवान को उपाय रूप में अपनाने की मन कि अवस्था है। यह बहुत सरल कदम है। तदापि हमारे तरफ से यही प्राप्त होना है। किसिकों यह नहीं समझना चाहिये कि “ओ! यह बहुत सरल कदम है। यह सरल कदम कैसे भगवान को उपाय बनायेगा?”। ऐसे विचार रखना बाधा है।
  • उपेय उपाय खोज करने का परिणाम है। श्रीवैष्णवों के लिये परमपदधाम में कैंकर्य हीं अन्तिम लक्ष्य है। और परमपदधाम में यह कैंकर्य स्वयं के प्रयत्न से बहुत आश्चर्यजनक और अकाल्पनिक है। श्रीसहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “अम्मान् आळिप्पिरान् अवन् एव्विडत्तान् यानार्” – मेरे भगवान वह है जिन्होने अपने हाथो में सुदर्शन चक्र धारण किया है – वह कितने महान है और मैं कितना नीच हूँ। इसलिये किसी को अपनी बढाई के बारें में नहीं सोचना चाहिये और हमारे विनम्रता के कारण भगवान के प्रति हमें कैंकर्य भी प्राप्त नहीं होगा – यह बाधा है।
  • संसार में कई बाधाएं है। इन बाधाओं से डर कर रहना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडि में चरम श्लोक के प्रकरणम को समझाते समय श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बहुत सुन्दरता से भगवान के वचन “सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुच:” को बताते है जहां वह सभी बाधा को मिटाने का वचन देते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस तथ्य को अपनी व्याख्यान में समझाते है।
  • चरमोपाय में निष्ठा न होना भी बाधा है। प्रपत्ति और आचार्य अभिमान दोनों हीं चरमोपाय में समझाया गया है। प्रपत्ति को सरल कार्य नहीं समझना चाहिये और कैसे यह सरल कार्य हमारे लिये नित्य कैंकर्य में उपार्जन करता है? आचार्य अभिमान के लिये हमें आचार्य को हमारे जैसे साधारण मनुष्य नहीं समझना चाहिये, वह कैसे हमें मोक्ष प्राप्ति के लिये मदद करते है? दोनों से बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पडि में चरम श्लोक के प्रकरणम में समझाते है “सर्व धर्मान् परित्यज्य”, इस गीता के श्लोक को चरम श्लोक कहते है क्योंकि वह शरणागति समझाता है। श्रीनायनाराचान पिल्लै द्वारा रचित चरमोपाय निर्णयं में श्रीरामानुज स्वामीजी कि कीर्ति को समझाया है।

३२) प्रवृत्ति विरोधी – हमारे कैंकर्य के लिये बाधाएं

 श्रीलक्ष्मणजी – भगवान के सेवकों में सबसे पहिले जगमगाते हुए दास

  • हमे यह समझना चाहिये कि भगवान के प्रति कैंकर्य हमारे स्वभाव के लिये सबसे उत्तम कार्य है। कैंकर्य हीं कर्तव्य है – स्वाभाविकता से उसके पीछे जाना। केवल नियम पालन हेतु कैंकर्य करना बाधा है।
  • कैंकर्य को अति प्रेम से करना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “उगन्तु पणि चेय्तु” (प्रेम से सेवा करना)। ऐसे प्रेम के बिना कैंकर्य करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमने कैंकर्य का सही स्वभाव पिछले उल्लेख में देखा है – “भगवद अनुभव जनिता प्रिती कारिता कैंकर्य” – कोई भी भगवद गुण आदि का अनुभव करता है जो प्रेम लगाव कि ओर ले जाता है और जो कैंकर्य कि ओर ले चलता है। अगर वों लगाव के विरुद्ध करते तो वह जीवात्मा के स्वरूप के विरुद्ध होता है।
  • कैंकर्य के समय किसीके पारतंत्रिय को बताना विरोधी है। सभी को इसे “भगवान का कैंकर्य समझना चाहिये, उसे अच्छी तरह सम्पूर्ण करना चाहिये, हमें गलतियाँ नहीं करनी चाहिये, आदि” – ऐसे विचार व्याकुलता कि ओर ले जाता है। हमारे नित्य तिरुआराधन में अन्त में सभी गाते है “उपचारापदेशेन क्रुतान् – अपचारानिमाम् सर्वाम् क्षमस्व पुरुशोत्तम” मैंने आप के प्रति कैंकर्य से प्रारम्भ किया परन्तु राह में कई गलतियाँ करते हुए समाप्त किया, पुरुषों में आप सबसे उत्तम है कृपया मुझे क्षमा करें। बिना व्याकुलता के आराम से रहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब भगवान कृष्ण श्रीविदुरजी के महल में पधारे तो विदुरजी पूर्ण व्याकुलता से भगवान को केले के छिलके प्रसाद रूप में प्रदान किया। फिर भी भगवान कृष्ण विदुरजी के प्रेम सेवा को मान दिया। इसलिये महात्मा विदुर को “महामति” के नाम से बुलाया जाता है – जो बहुत बड़ा ज्ञानी हो – भागवन कि सेवा हेतु जिसे व्याकुलता है।
  • किसीके अनुष्ठान को साधन (उपाय) मानना विरोधी है। स्वनुष्ठान जैसे कर्म जो भगवान कि आज्ञा है वह जरूरी है। ऐसे कर्मों को नहीं करना पापों कि संख्या को बढ़ाता है। परन्तु ऐसे कर्मों को करने से उसे बढ़ाता नहीं है – वह जरूरी है। किसी को ऐसे अनुष्ठान को उपाय नहीं मानना चाहिये जो भगवान को हमें मोक्ष देने के लिए मजबूर करें। विहित कर्म जैसे संध्या वंधन दिन में तीन बार, तिरुमाली के अर्चा विग्रह के लिये तिरुआराधन, पितृ तर्पण, आदि।

 

३३) निवृत्ति विरोधी – अस्वीकारता में बाधाएं

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवर मुनि स्वामीजी (श्रीपेरुंबूतुर) – मुमुक्षुपड्डी में से त्याग के तत्त्व को स्पष्ट रूप से समझाया

  • निवृत्ति यानि अस्वीकारता। जिसने केवल भगवान को हीं उपाय माना है उसे अन्य सभी उपाय का त्याग करना है। भगवान गीता के चरम श्लोक में कहते है “सर्वधर्मान परित्यज्य” पहिले सभी उपायों का त्याग करो उसके पश्चात “मामेकं शरणं व्रज ” मेरी शरण में आवों। अत: इसके मुताबिक हमें दूसरे धर्मों के प्रति लगाव को त्यागना है (जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) और केवल भगवान को श्रेष्ठ धर्म माने। अनुवादक टिप्पणी: हमारे आचार्य ने यह स्थापित किया कि केवल भगवान श्रीमन्नारायण हीं श्रेष्ठ धर्म है जैसे महाभारत में दिखाया है “कृष्णम् दर्मम् सनातनम्” भगवान कृष्ण हीं अनन्त धर्म है और श्रीरामायण में “रामो विग्रहवान् दर्म:”  श्रीराम धर्म के मूर्ति रुप है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पडि के २१३ सूत्र में समझाते है “दर्म सम्स्थापनम् पण्णप् पिरन्तवन् ताने ‘सर्व दर्मन्गळैयुम् विट्टु एन्नैप्पऱ्ऱु’ एन्गैयाले साक्षात् दर्मम् ताने एन्गिऱतु” – धर्म को स्थापित करने हेतु भगवान कृष्ण रुप में अवतार लेते है – जब वह कहते है ‘सब धर्मों को छोड़ मुझे स्वीकार करों’ इसका अर्थ वह सत्य / नित्य धर्म है।
  • यह सब समझने के पश्चात अगर कोई यह विचार करता है कि “क्या यह सब उपायों को छोड़ने से मुझे पाप लगेगा?” तो यह बाधा है। यह केवल भगवान में निष्ठा का अभाव दर्शाता है। इस शंका के कारण लक्ष्य पूर्ण नहीं होगा।
  • भगवान पर शंका कर ऐसे कार्य करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: किसी को यह विचार नहीं करना चाहिये कि “क्या अगर मेरी प्रपत्ति टूट जायेगी? मुझे शायद थोड़ा कर्म, ज्ञान और भक्ति करना है ताकि मेरे पापों को कम कर सके”। यह समझाया जा चुका है कि भगवान ब्रम्हास्त्र के जैसे है। जब ब्रम्हास्त्र का उपयोग होता है तो वह अपने विरुद्ध को आसानी से बंधीश में कर लेगा। परन्तु अगर कोई ब्रम्हास्त्र के शक्ति पर संदेह करता है और विरोधीयों को अधीक शक्ति से बांधना चाहता है तो ब्रम्हास्त्र अपने आप पीछे हट जायेगा। यही हुआ जब श्रीहनुमानजी ब्रम्हास्त्र से बन्ध गये और जब राक्षस उन्हें साधारण रस्सी से बाँधे तो ब्रह्मास्त्र ने उन्हें अपने शक्ति से मुक्त कर दिया। श्रीहनुमानजी रावण के दरबार में जाते है, धमकी देते है और लंका में आग लगा देते है।
  • अन्य उपायों को केवल अपनी आसक्ति के कारण त्याग करना बाधा है। हमें यह विचार करना चाहिये कि अन्य उपाय हमारे स्वरूप के लिये योग्य नहीं है और अत: उसका त्याग कर देना।
  • अन्य उपायों का त्याग करना क्योंकि वह समर्थ है बाधा है। उन्हें सहीं स्वभाव को पूर्ण करने हेतु त्याग करना चाहिये – और कोई कारण नहीं होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के तौर पर कोई कर्म योग का त्याग करने में सुशक्त है और यह विचार कर “मैं नियंत्रण में हूँ इसलिये कर्म योग का त्याग कर रहा हूँ” – यह भी अच्छा नहीं है।
  • हमें इस बात का अभिमान नहीं होना चाहिये कि हमने उपायों के प्रति लगाव का त्याग कर दिया है – यह बाधा है। अगर कोई ऐसा कर सकता है तो वह जीवात्मा के लिये स्वाभाविक है और यह भगवान और आचार्य के निर्हेतुक कृपा से सम्भव है – हमें स्वयं कि बढाई नहीं करनी चाहिये कि मैंने यह कार्य किया है और यह विचार करना चाहिये कि “मैंने यह सब का त्याग कर दिया है?”।

हमें निरन्तर श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पडि के २७१ सूत्र को याद करना चाहिये – “कर्मम् कैन्कर्यत्तिले पुगुम्; ज्ञानम् – स्वरूप प्रकाशत्तिले पुगुम्; भक्ति प्राप्य रुचियिले पुगुम्; प्रपत्ति – स्वरूप यातात्म्य ज्ञानत्तिले पुगुम्”. श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी संप्रदाय पर दया दिखाते हुए इन सब कार्य कि करने कि आवश्यकता बहुत सुन्दर तरिके से समझाते है– फिर हमें उसे उपाय नहीं समझना चाहिये – वह कैंकर्य रुप में किया जाता है। जो भी कर्म किया जाता है (जैसे संध्या वन्दन, आदि ) – वह सभी भगवान के प्रति कैंकर्य का एक अंश है। जो भी ज्ञान योग द्वारा प्राप्त होगा वह आत्मा को उज्जीवन बनायेगा। जो भी भक्ति द्वारा किया जायेगा वह हमें भगवान के प्रति हमारा प्रेम को बढायेगा। और अन्त में प्रपत्ति केवल भगवान को उपाय रुप में स्वीकार करने हेतु जीवात्मा के अंतस्थ स्वभाव को जोड़ेगा ।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2013/12/virodhi-pariharangal-6.html

archived in https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

Advertisements

तुला मास अनुभव – मुदल आलवारों और श्रीरामानुज स्वामीजी का दिव्य संबंध

     श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। अब हम तिरुवरंगत्तु अमुदनार द्वारा रचित दिव्य रामानुस नूट्रन्तादि और उस पर श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के व्याख्यान के माध्यम से मुदल आलवारों और श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य संबंध का आनंद अनुभव करेंगे।

अमुदनार ने रामानुस नूट्रन्तादि की रचना कि जिसे हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा “प्रपन्न सावित्री” के रूप में संबोधित किया गया है। रामानुस नूट्रन्तादि के लिए अपने व्याख्यान की अवतारिका (परिचय खंड) में श्रीवरवरमुनी स्वामीजी कहते है कि जिस प्रकार त्रैवरणिकाओं के द्वारा गायत्री मंत्र का जप प्रतिदिन किया जाना चाहिए, उसी प्रकार प्रपन्नों द्वारा रामानुज नूट्रन्तादि का जप प्रतिदिन किया जाना चाहिए। श्रीरंगनाथ भगवान की दिव्य अनुकम्पा से, यह प्रबंध भी कण्णिनुण् शिरूताम्बु के समान 4000 दिव्य प्रबंध का एक अंश है। कण्णिनुण् शिरूताम्बु (मधुरकवि आलवार द्वारा श्रीशठकोप स्वामीजी के लिए गाया गया) और रामानुज नूट्रन्तादि (अमुदनार द्वारा श्रीरामानुज स्वामीजी के लिए गाया गया) दोनों ही चरम पर्व निष्ठा को स्थापित करते है (आचार्य के प्रति उत्कृष्ट श्रद्धा की अवस्था)।

इस दिव्य प्रबंध में, अमुदनार द्वारा रचित प्रथम 7 पासूरों को परिचय के समान माना जाता है और इस प्रबंध का सार 8वे पासूर से प्रारंभ होता है। प्रथमतय, अमुदनार, सभी आलवारों और आचार्यों के परिपेक्ष्य में श्रीरामानुज स्वामीजी की महिमा गान करते हुए प्रबंध का प्रारंभ करते है। तुला मास अनुभव के इस अंक में हम इस प्रबंध के 8वे, 9वे और 10वे पासूरों का आनंद अनुभव करेंगे जो मुदल आलवारों (सरोयोगी आलवार, भूतयोगी आलवार और महदयोगी आलवार) की महिमा को वर्णित करते है।

thirukovalur-perumal

पुष्पवल्ली ताय्यार- देहलिस पेरुमाल, तिरुक्कोवलुर

पासूर 8

वरुत्तुम पुरविरुल माट्र एम् पोय्गैप्पिरान 
मरैयिन कुरुत्तिन पोरुलैयुम् चेनतमिल तन्नैयुम् कूट्टी
ओंरथ तिरित्तन्रेरित्त तिरुविलक्कैत् तन् तिरुवुल्लत्ते इरुत्तुम 
परमं इरामानुसन एम् ईरैयवने

2. IMG_0919

सरोयोगी आलवारश्रीरामानुज स्वामीजी, भूतपुरी

अनुवाद (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के व्याख्यान के आधार पर):

मूर्ख मनुष्य समझते है कि उन्हें प्राकृतिक बलों (अग्नि, वायु, आदि) से संकट है, बिना यह जाने कि श्रीमन्नारायण ही सभी के स्वामी है और सभी देवता सिर्फ उनकी ही आज्ञा का पालन करते है। सरोयोगी आलवार ने जो प्रपन्नों के लिए महत्वपूर्ण आचार्य है, अत्यंत उदारता से वेदांत के गहन सिद्धांतों को बहुत सुंदरता से तमिल भाषा में दर्शाया है। भगवान श्रीमन्नारायण की उपस्थिति द्वारा तिरुक्कोवलुर के बरामदे में एक ही स्थान में तनाव उत्पन्न होने पर, उन्होंने मुदल तिरुवंतादी के प्रथम पासूर “वैयम तगलिया” के माध्यम से ज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया। श्रीरामानुज स्वामीजी, जिनकी महिमा अपरिमित है, जो सरोयोगी आलवार द्वारा प्रकट किये गए सिद्धांतों को प्रेम से अपने ह्रदय में धारण करते है, हमारे स्वामी है।

पासूर 9

इरैवनैक् काणुम इदयत्तिरूळके
ज्ञानमेन्नुम निरैविलक्केत्रिय भूतत तिरुवडी ताल्गल
नेन्जत्तुरैयवैत्ताळुम् इरामानुसन पुगल ओतुम नल्लोर मरैयिनैक कात्तु
इंत मण्णगत्ते मन्न वैप्पवरे

3. IMG_0972

भूतयोगी आलवारश्रीरामानुज स्वामीजी, भूतपुरी

अनुवाद (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के व्याख्यान के आधार पर):

हमारा ह्रदय ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम यह जान सकते है कि श्रीमन्नारायण भगवान ही हमारे सच्चे स्वामी है। परंतु हमारे हृदय पर अविवेक रूपी अंधकार का आवरण पड़ा हुआ है। हमारे स्वामी भूतयोगी आलवार ने इरण्डाम तिरुवंतादी के प्रथम पासूर के प्रारम्भ “अन्बे तगलिया” से “ज्ञानच्चुडर विलक्केट्रीनेन्” तक परज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया। श्रीरामानुज स्वामीजी निरंतर ऐसे श्री भूतयोगी स्वामीजी के चरण कमलों का ध्यान करते है और उसका आनंद अनुभव करते है। ऐसे श्रीरामानुज स्वामीजी के अनुयायी जो निरंतर उनके दिव्य गुणों के अनुभव में संलग्न रहते है, वे बाह्य (जो वेदों को स्वीकार नहीं करते) और कुदृष्टियों (जो वेदों को स्वीकार करते है परंतु उसके तत्वों का अनर्थ करते है) से वेदों का संरक्षण करेंगे। श्रीरामानुज स्वामीजी के ऐसे अनुयायी वेदों के सिद्धांतों को सटीकता से स्थापित करेंगे।

पासूर 10

मन्निय पेरिरुल माण्डपिन 
कोवलुल मामलराल तन्नोडु मायनैक कण्डमै काट्टुम्
तमिळ्त्तलैवन् पोन्नडि पोट्रूम इरामानुसरकंबु पुण्डवर ताल
चेन्नीयिर चूडुम् तिरुवुडैयार एन्रुम चिरीयरे

4. IMG_0990

महदयोगी आलवारश्रीरामानुज स्वामीजी, भूतपुरी

अनुवाद (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के व्याख्यान के आधार पर):

सरोयोगी आलवार और भूतयोगी आलवार द्वारा प्रज्वलित दीपक से अज्ञान के अँधेरे का नाश होने पर, मुदल तिरुवंतादी के 89वे पासूर में दर्शाया गया है “नियुम् तिरुमंगलुम्” ( आप और श्री महालक्ष्मीजी), अर्थात तिरुवल्लुर दिव्य देश में महदयोगी आलवार को भगवान और श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य दर्शन और कृष्णावतार (जहाँ भगवान पुर्णतः अपने भक्तों के बस में होकर रहते है) के दिव्य गुणों के दर्शन प्राप्त हुए। महदयोगी आलवार जो तमिल भाषा में श्रेष्ठ थे, अपने इन दिव्य दर्शनों के विषय में मून्ऱाम् तिरुवंतादी के प्रथम पासूर में बताते है “तिरुक्कण्देन्”। श्रीरामानुज स्वामीजी ऐसे महान वैभवशाली महदयोगी आलवार के चरण कमलों में प्रणाम करते है। जो मनुष्य, श्रीरामानुज स्वामीजी (जो महदयोगी आलवार के चरणकमलों के अनुरागी है) के प्रति अनुराग और प्रीति रखते है, ऐसे मनुष्यों के चरण कमलों को पुष्पों के समान शीष पर धारण करने वाले मनुष्यों का साथ ही महान संपदा है।

5. Thiruvarangathu-Amudhanar

तिरुवरंगत्तु अमुदनार – श्रीरंगम

6. mamuni-azhwarthirunagariश्रीवरवरमुनी स्वामीजीआलवार तिरुनगरी

इस प्रकार हमने मुदल आलवारों और श्रीरामानुज स्वामीजी के मध्य का दिव्य संबंध अमुदनार के दिव्य वचनों और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी द्वारा प्रदत्त इसके सुंदर व्याख्यान के माध्यम से देखा। आईये हम मुदल आलवारों, श्रीरामानुज स्वामीजी, अमुदनार और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के श्री चरणों में प्रणाम करे और उनकी कृपा प्राप्त करे।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-mudhalazhwargal-emperumanar.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – श्री वचनभूषण – 3

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना श्री वचन भूषण के विषय में चर्चा करेंगे। इस प्रबंध के संक्षिप्त परिचय और तनियन के विषय में https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/16/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-srivachana-bhushanam-thanians/ पर देखा जा सकता है। हम इस प्रबंध के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित अवतारिका के प्रथम भाग को https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/03/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-1/ और द्वितीय भाग को  https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/04/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-2/ पर देख सकते है।

आईये अब हम अवतारिका के तृतीय और अंतिम भाग की और अग्रसर होते है। परिचय के इस भाग में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बताते है कि श्रीवचन भूषण ग्रंथ, द्वय महामंत्र का उसी प्रकार विस्तार से विवरण करता है जिसप्रकार तिरुवाय्मौली में किया गया है।

1.Nammazhwar

श्रीशठकोप आलवार

तिरुवाय्मौली, जो दीर्घ शरणागति के नाम से प्रसिद्ध है,  उसी के समान ही यह प्रबंध भी द्वय का विस्तार है। तिरुवाय्मौली में, द्वय महामंत्र को विस्तार से समझाया गया है:

  • प्रथम 3 शतको में (1 – 3), द्वयं के द्वितीय खंड (उपेय) को विस्तार से समझाया गया है।
  • अगले 3 शतकों में (4 – 6), द्वयं के प्रथम खंड (उपाय) को विस्तार से बताया गया है।
  • उसके अगले 4 शतकों में, निम्न सिद्धांतों को विस्तार से समझाया गया है:
    1. भगवान के ऐसे दिव्य गुण जिसके द्वारा वे सभी पर एक समान कृपा करते है
    2. श्रीशठकोप आलवार की आत्मा (स्वयं) और आत्मा से सम्बंधित सभी तत्वों जैसे देह, इन्द्रियां आदि के प्रति सम्पूर्ण विरक्ति
    3. उनके (श्रीशठकोप आलवार) और भगवान का नित्य संबंध
    4. श्रीशठकोप आलवार द्वारा चरम लक्ष्य की प्राप्ति स्मरण

उसीप्रकार, श्रीवचन भूषण में भी, इन्हीं सिद्धांतो को समझाया गया है:

2. Untitled

 पिल्लै लोकाचार्यश्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपुरी

6 प्रकरण वाले वर्गीकरण के अनुसार:

  • द्वयं का प्रथम भाग, प्रथम 3 प्रकरणों में समझाया गया है:
  1. पहले श्रीमहालक्ष्मीजी के पुरुष्कार को समझाया गया है
  2. तद्पश्चाद भगवान ही एकमात्र उपाय है, इसे समझाया गया है
  3. भगवान को ही अपना एकमात्र उपाय स्वीकार करने वालों की निष्ठा के विषय में समझाया गया है
  • भगवत कैंकर्य की ही नित्य निरंतर चाहना करने वालों की दशा को समझाते हुए, द्वयं का द्वितीय भाग समझाया गया है।
  • शेष 3 प्रकरणों में,
  1. चतुर्थ प्रकरण में शिष्य का आचार्य के प्रति व्यवहार और कैंकर्य के विषय में बताया गया है। आचार्य ही द्वय महा मंत्र का ज्ञान प्रदान करते है।
  2. पंचम प्रकरण, भगवान की निर्हेतुक कृपा, जो शिष्य के महा विश्वास (सम्पूर्ण समर्पण) का कारण है, उसे समझाता है।
  3. षष्ठं प्रकरण में द्वय महा मंत्र के दो खंडो (उपाय और उपेय) में समझाए गए सिद्धांतो की चरम स्थिति अर्थात आचार्य चरण में सम्पूर्ण समर्पण के विषय में बताया गया है।

9 प्रकरण वाले वर्गीकरण के अनुसार:

द्वयं के प्रथम खंड के “प्रपद्ये” शब्द के द्वारा भगवान को ही उपाय स्वीकार करने का बोध होता है और इस शब्द में निहित अर्थ है कि कर्म, ज्ञान, भक्ति योग आदि अन्य उपायों को मूल से त्यागना अवश्यक है। प्रपन्न दिनचर्या (दैनिक कार्य, प्रपन्न का व्यवहार) उनके लिए है, जो प्रपत्ति करते है। और एक सच्चे आचार्य वह है जो द्वय महामंत्र का ज्ञान प्रदान करे। इसप्रकार, उपरोक्त सभी के अनुसार, यह समझा जा सकता है कि 9 प्रकरणों वाले वर्गीकरण में भी, तिरुवाय्मौली (द्वय महामंत्र का विवरण) और श्रीवचन भूषण एक समान सिद्धांतों को समझाते है।

द्वय महामंत्र को विस्तार से समझाने वाला इस प्रबंध में तिरुमंत्र और चरम श्लोक में समझाए गए सिद्धांत भी निहित है। अब हम उन्हें देखते है:

प्रथमतय तिरुमंत्र के विवरण को प्रदर्शित किया गया है।

  • (सूत्र 73) “अहमर्थतत्तुक्कू” से (सूत्र 77) “अडियानेन्रिरे” तक और (सूत्र 111) “स्वरुप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानं” में “प्रणवं” को समझाया गया है।
  • (सूत्र 71) “स्वयत्न निवृत्ति” से और (सूत्र 180) “तन्नैत ताने मुडिक्कैयावतु” तक और (सूत्र 243) “इप्पडि सर्व प्रकारत्तालुम” से पहले, “नमः” पद को समझाया गया है।
  • (सूत्र 72) “परप्रयोजन प्रवृत्ति”, (सूत्र 80) “उपेयत्तुक्कू इलैय पेरुमालैयुम” और (सूत्र 281) “कैंकर्यम् तान भक्ति मुलं अल्लात पोतु” में, “नारायण” पद को समझाया गया है।

तद्पश्चाद चरम श्लोक के व्याख्यान को समझाया गया है।

  • (सूत्र 43) “अज्ञानत्ताले” और (सूत्र 115) “प्रापकांतर परित्यागत्तुक्कुम” में, अन्य उपायों को त्यागने और उन्हें त्यागने के साधन के विषय में चर्चा की गयी है। यह चरम श्लोक के सर्व “धर्मान परित्यज्य” को समझाता है।
  • (सूत्र 55) “इतु तनक्कू स्वरूपं” और (सूत्र 66) “प्राप्तिक्कू उपायं निनैवु” में भगवान ही एकमात्र आश्रय और उपाय है, इसे समझाया गया है। यह “मामेकं शरणं” को समझाता है।
  • (सूत्र 134) “प्रपत्ति उपायत्तुक्कू” से शरणागति के विशेष गुण के विषय में बताया गया है। यह “व्रज” को समझाता है।
  • (सूत्र 143) “अवनिवनै” से (सूत्र 148) “स्वातन्त्रियत्ताले वरुम पारतन्त्रियम प्रबलं” तक, यह बताया गया है कि भगवान परम स्वतंत्र है और वे शरणागत जीवात्मा के सभी पापों को क्षमा करते है। यह “अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी” को समझाता है।
  • (सूत्र 402) “कृपा पलमुम अनुबवित्ते अरवेनुम” बताता है कि भगवान की कृपा प्राप्त करने पर चरम लक्ष्य की प्राप्ति निश्चित है और जीवात्मा को इस संबंध में कोई संशय अथवा चिंता करने की आवश्यकता नहीं। यह “मा सुच:” को समझाता है।

इसप्रकार हमने पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित महान परिचय में उस भाग को देखा जहाँ तिरुवाय्मौली और श्रीवचन भूषण के मध्य समानताएं बताई गयी है और श्रीवचन भूषण में प्रदर्शित रहस्य त्रय के सिद्धांतों को विस्तार से समझाया गया है।

इसप्रकार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के लिए रचित परिचय समाप्त होता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्न माला में अद्घोषित करते है कि श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के समान वैभवशाली अन्य और कोई ग्रंथ नहीं है।

उपरोक्त के द्वारा, हमें पिल्लै लोकाचार्य, श्रीवचन भूषण और विशेषतः श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव की झलक मिलती है, जिन्होंने इस अद्भुत ग्रंथ की व्याख्यान प्रदान कर हम पर कृपा की।

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के पाठ के पश्चाद निम्न पसूरो का गान किया जाता है।

कोदिल उलगासिरियन कुरकुलोत्तम तातर
तीदिल तिरुमलैयाल्वार चेलुन्गुरवै मणवालर
ओदरिय पुगल्त तिरुनावुडैय पिरान तातरुडन
पोत मणवाल मुनि पोन्नादीगल पोट्रूवने

3. Untitled

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की ईडु कालक्षेप गोष्ठी श्रीरंगनाथ भगवान के सामने

शब्दार्थ: मैं श्रेष्ठ विद्वान श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों के साथ दोषरहित श्री पिल्लै लोकाचार्य, कुर कुलोत्तम दासर, अवगुण रहित तिरुमलै आलवार/ तिरुवाय्मौली पिल्लै, कुरुवै वंश के अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दादाजी), और अत्यंत प्रसिद्ध तिरुनावीरूदैय पिरान तातरण्णर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पिताश्री) को प्रणाम करता हूँ।

वालि उलगासिरियन वालि अवन मन्नू कुलं
वालि मुडुम्बै एन्नुम मानगरम
वालि मनम चुलन्त पेरिन्बम मिगु नल्लार
इनम चुलन्तु इरुक्कुम इरुप्पू

4. pl-goshti

पिल्लै लोकाचार्य कालक्षेप गोष्ठी

शब्दार्थ: पिल्लै लोकाचार्य का मंगल हो! उनके यशस्वी कुल का मंगल हो! महान मुदुम्बै देश की जय हो (उनका पैतृक गाँव)! पिल्लै लोकाचार्य की आनंदमयी सभा का मंगल हो, जो सदा अत्यंत पवित्र और शुद्ध भक्तों से परिपूर्ण है।

ओतुम मुडुम्बै उलगासिरियन अरुल
एतुम मरवात एम्पेरुमान
निधि वलुवाच चिरुनल्लुर मामरैयोन पादम तोलुवार्क्कू वारा तुयर

5. kurakulothama-dhasar

कुर कुलोत्तम दासर – चित्रपट

शब्दार्थ: चिरुनल्लुर के कुर कुलोत्तम दासर, जो महान वेदों के ज्ञाता है, शास्त्रों के सिद्धांतों को गंभीरता से पालन करनेवाले है और जो निरंतर पिल्लै लोकाचार्य की कृपा का स्मरण करते है, उनके चरणकमलों की आराधना करने वाले मनुष्यों को कोई दुःख नहीं सताता।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-3.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – श्री वचनभूषण – 2

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना श्री वचन भूषण के विषय में चर्चा करेंगे। इस प्रबंध के संक्षिप्त परिचय और तनियन के विषय में https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/16/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-srivachana-bhushanam-thanians/ पर देखा जा सकता है। हम इस प्रबंध के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित अवतारिका के प्रथम भाग को https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/01/03/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-1/ पर देख सकते है।

आइये अब हम अवतारिका के द्वितीय भाग का वर्णन देखते है। अवतारिका के इस भाग में, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस प्रबंध के लिए 2 प्रकार के वर्गीकरण के विषय में बताते है (6 प्रकरण और 9 प्रकरण)।

6. IMG_0672

पिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपुरी

प्रथमतय हम छः प्रकरण वाले वर्गीकरण को देखते है:

इस प्रबंध में, सूत्र 1 “वेदार्थं अरुतियीडूवतु” से प्रारंभ करते हुए सूत्र 4 “अत्ताले अतु मुरपट्टतु” तक, प्रमाण (ज्ञान के स्त्रोत्र) की सत्यता को स्थापित किया है। इसीलिए यह खंड इस प्रबंध का परिचय भाग है।

(सूत्र 5) “इतिहास श्रेष्ठं” से लेकर (सूत्र 22) “प्रपत्ति उपदेशं पण्णीट्रुम् इवलुक्काग “ तक, पिराट्टी (श्रीलक्ष्मीजी) और भगवान के पुरुषकार वैभव और उपाय वैभव की चर्चा की गयी है। श्रीलक्ष्मीजी के स्वरुप को पुरुष्कार (अनुशंसा) के रूप में संबोधित किया गया है – त्रुटियों से पूर्ण जीवात्माओं को देखकर, वे सतत प्रयत्न करके भगवान को बताती है कि भगवान का स्वरुप कृपालु है और वे अपने शरणागतों का सदा कल्याण करते है। यह खंड इस विषय में भी चर्चा करता है कि भगवान ही उपाय है, जो अत्यंत दयालु है और उनकी यह कृपा पुरुष्कार से भी अधिक वैभवमयी है।

(सूत्र 23) “प्रपत्तिक्कू” से लेकर (सूत्र 79) “एकांती व्यपतेश्टव्य” तक, प्रपत्ति के स्वरुप को विस्तार से समझाया गया है। भगवान को उपाय रुप में स्वीकार करने की विधि ही प्रपत्ति है। इस विषय में निम्न तत्वों की चर्चा की गयी है:

  • भगवान को उपाय स्वीकार करने के इस कार्य में प्रपत्ति करने वाले और उसके परिणामों के लिए स्थान, समय, विधि, योग्यता के आधार पर कोई बंधन नहीं है
  • प्रपत्ति की विषयवस्तु (हम जिनके शरणागत होंगे) योग्य होना चाहिए
  • प्रपत्ति करनेवालों के तीन प्रकार के वर्गीकरण
  • प्रपत्ति को उपाय रुप में स्वीकार करने की बाधाएं (प्रपत्ति मात्र एक कृत्य है, जो जीवात्मा के स्वरुप अनुरूप है, वास्तविकता में एकमात्र भगवान ही उपाय है)
  • प्रपत्ति के स्वरूप और उसके सहायक तत्वों का विवरण

इसप्रकार, यह भाग स्थापित करता है कि भगवान और उनकी महिमा ही हमारे लिए उपाय है। इसमें, (सूत्र 70) “प्रपत्तिक्कू उगप्पानुम् अवने” पर्यंत सभी तत्वों का सार है। सूत्र 71 से 79 तक सभी सूत्र सहायक भूमिका में है।

(सूत्र 80) “उपायतुक्कू” से (सूत्र 307) “उपेय विरोधीगळायिरूक्कुम” तक, प्रपन्न के व्यवहार /स्वरुप के विषय में बताया गया है। यह भाग निम्न तत्वों की चर्चा करता है:

  • जीवात्मा के स्वाभाविक गुण है, भगवान को ही उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) स्वीकार करना
  • अन्य उपायों के प्रति अपने अनुराग को त्यागने की आवश्यकता और
  • ऐसे प्रपन्नों के लिए सामान्य करने योग्य और त्यागने योग्य कार्य

(सूत्र 308) “तान हितोपदेशम् पण्णुम्पोतु” से (सूत्र 365) “उगप्पुम उपकार स्मृतियुम् नटक्क वेणुम्” तक, शिष्य के लक्षणों (शिष्य का आचार्य के प्रति व्यवहार) को विस्तार से समझाया गया है। यह भाग निम्न तत्वों की चर्चा करता है:

  • सिद्धोपाय निष्ठार (जो पुर्णतः एकमात्र सिद्ध उपाय अर्थात भगवान पर निर्भर है) का स्वरुप
  • सच्चे आचार्य का स्वरुप
  • एक सच्चे शिष्य का स्वरुप और अपने आचार्य के प्रति पूर्ण समर्पण
  • आचार्य और शिष्य के मध्य संवाद
  • शिष्य की आचार्य के प्रति कृतज्ञता, जिन्होंने उसका कल्याण किया

(सूत्र 366) “स्वदोशानुसंधानम भय हेतु” से (सूत्र 406) “निवर्तक ज्ञानं अभय हेतु” तक, भगवान की निर्हेतुक कृपा को समझाया गया है। भगवान की इसी निर्हेतुक कृपा के परिणामस्वरूप, हम विभिन्न स्थितियों की और अग्रसर होते है- अर्थात अध्वेषम् (जो अनुकूल न हो) से नित्य कैंकर्य प्राप्त करने तक के चरम लक्ष्य को प्राप्त करते है। यह भी प्रमाणित है कि भगवान की निर्हेतुक कृपा, जो जीवात्मा के कल्याण का आश्वासन प्रदान करती है, के विषय में ज्ञान प्राप्त कर हम अपने दुखों से मुक्त हो सकते है।

(सूत्र 407) “स्वतंत्रनै उपायमागप् पट्रिन पोतिरे” से सूत्र 463 के अंत तक, आचार्य के प्रति हमारी श्रद्धा के अंतिम चरण को समझाया गया है, अर्थात आचार्य के प्रति पूर्ण समर्पण। इस सिद्धांत को मधुरकवि आलवार द्वारा कण्णिनुण् शिरूताम्बु 9 में बताये गए “मिक्क वेदियर वेदत्तिन उत्पोरुल” अर्थात यही वेदों का सच्चा सार है, के द्वारा स्थापित किया गया है।

क्यूंकि इसका प्रारंभ “वेदार्थं अरुतियीडुवतु” अर्थात शास्त्र का सार यह स्थापित करता है… और अंत “चरम पर्व निष्ठा” अर्थात आचार्य के प्रति सम्पूर्ण समर्पण से होता है, इसके द्वारा यह स्पष्टता से सिद्ध होता है कि आचार्य कृपा पर पूर्ण विश्वास करके रहना ही वेदों का सार है।

जिसप्रकार, चरम श्लोक (सर्व धर्मान परित्यज्य…) श्री गीताजी का सार है, उसीप्रकार अंतिम प्रकरण इस प्रबंध का सार है। वहां (श्री गीताजी में), भगवान पहले विभिन्न उपायों (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, आदि) को दर्शाते है और फिर यह देखकर कि अर्जुन स्वयं स्वतंत्रता से सही मार्ग चुनने में असमर्थ और भयभीत है, वे उसे सिद्धोपाय (अन्य सभी उपायों को त्यागकर मात्र उन्हें ही उपाय स्वरुप स्वीकार करना) दर्शाते है। यहाँ, सिद्धोपाय (भगवान ही उपाय है) की महिमा को विस्तार से समझाया गया है और यह जानकार कि भगवान के स्वातंत्रय में भी भय है (यह अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों को प्रदान करता है), श्रीआचार्य चरण में सम्पूर्ण समर्पण को अंतिम उपाय के रूप में दर्शाया गया है (जो सबसे सुगम साधन है।

इसप्रकार, इस प्रबंध के 6 प्रकरणों को समझाया गया है, जो 6 सिद्धांतों को दर्शाते है।

अब हम इस प्रबंध के 9 प्रकरण वाले विभाजन को देखते है:

परिचय खंड और सूत्र 1 से 22 में समझाए गए पुरुष्कार/ उपाय के वैभव, उसीप्रकार है जैसा पहले उल्लेख किया गया है।

उसके पश्चाद, (सूत्र 23) “प्रपत्तिक्कू” से प्रारंभ होकर और (सूत्र 114) “भगवत विषय प्रवृत्ति सेरुम्” पर अंत होने वाले भाग में – भगवान ही उपाय है, इस सिद्धांत को विस्तार से समझाता है।

(सूत्र 115) “प्रापकान्तर परित्यागत्तुक्कू” से (सूत्र 141) “आगैयाले सुकरुपमायिरुक्कुम” तक, सभी सूत्रों में प्रपत्ति के अलावा अन्य उपायों के दोषों को समझाया गया है। इस भाग में की गयी प्रपत्ति की महानता की चर्चा यहाँ सहायक रूप में है।

(सूत्र 142) “इवनैप्पेर निनैक्कुम पोतु” से (सूत्र 242) “इडैच्चियाय् पेत्ट्रुविडुत्ल् चेय्युमप्पडियायिरुक्कुम” तक, सिद्धोपाय निष्ठार (जो पुर्णतः एकमात्र भगवान को ही उपाय स्वीकार करते है) की महिमा बताई गयी है।

(सूत्र 243) “इप्पडि सर्वप्रकारत्तालुम” से (सूत्र 307) “उपेय विरोधीगळायिरूक्कुम” तक, प्रपन्न की दिनचर्या को समझाया गया है।

(सूत्र 308) “तान हितोपदेशम् पण्णुम्पोतु” से (सूत्र 320) “चेतननुडैय रूचियाले वरुगैयाले” तक, सदाचार्य (सच्चे आचार्य) के गुणों के विषय में बताया गया है।

(सूत्र 321) “शिष्यनेन्बतु” से (सूत्र 365) “उपकार स्मृतियुम् नदक्क वेणुम्” तक, सच्छिष्य अर्थात सच्चे शिष्य के गुणों के विषय में बताया गया है।

(सूत्र 366) “स्वदोषानुसंधानं” से (सूत्र 406) “निवर्तक ज्ञानं अभय हेतु” तक, यह बताया गया है कि भगवान निर्हेतुक करुणावश ही जीवात्माओं का कल्याण करते है।

(सूत्र 407) “स्वतंत्रनै उपायमाग” से सूत्र 463 के अंत तक यह समझाया गया है कि आचार्य चरण ही उपाय है और आचार्य चरण ही उपेय है।

इन 2 प्रकार के वर्गीकरण के आधार पर इस प्रबंध की महिमा में दो तनियां प्रस्तुत की गयी है “पेरू तरुविक्कुमवल तन पेरुमै ” – 6 भागों वाले वर्गीकरण को समझाते हुए) और “तिरुमामगल तन ” – 9 भागों वाले वर्गीकरण को समझाते हुए)। इसलिए इस प्रबंध को दोनों ही प्रकार से समझना स्वीकार्य है।

इस प्रकार हमने पिल्लै लोकाचार्य के श्री वचन भूषण शास्त्र के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित सुंदर परिचय खंड देखा, जिसमें प्रबंध के 2 प्रकार के वर्गीकरणों को विस्तार से समझाया गया है।

अगले अंकों में हम पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण ग्रंथ के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित इस सुंदर परिचय खंड को आगे भी जारी रखेंगे।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-2.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – श्री वचनभूषण – 1

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना श्री वचन भूषण के विषय में चर्चा करेंगे। इस प्रबंध के संक्षिप्त परिचय और तनियन के विषय में https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/11/16/thula-anubhavam-pillai-lokacharyar-srivachana-bhushanam-thanians/ पर देखा जा सकता है।

इस भूमिका के साथ, आइये अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचनभूषण के अद्भुत परिचय खंड के अनुवाद को देखते है।

श्रीवेंकटेश्वर भगवान

श्रीवेंकटेश्वर भगवान

तिरुमंत्र समस्त वेदों का सार है। तिरुमंत्र के तीन वर्ण तीन गहन सिद्धांतों को समझाते है (अनन्य शेषत्व – मात्र भगवान के दास होना, अनन्य शरणत्व – भगवान को ही अपना एकमात्र आश्रय स्वीकार करना, अनन्य भोगत्व –  भगवान को ही अपना परमआनंद तत्व जानना और इसे इस तरह भी समझाया गया है कि हम मात्र भगवान के ही आनंदानुभाव के लिए है)। ये तीनों सिद्धांत सभी जीवात्मा के लिए समान है। जैसा की “यत्र रशय: प्रथम जाये पुराणा:” में उल्लेखित है – यद्यपि सभी जीवात्माओं में परमपद (जो पुर्णतःसत्व है) का अधिकारी होने की आवश्यक योग्यता है, जहाँ सभी के ज्ञान पुर्णतः मुदित है, जहाँ नित्य आनंदानुभव है जो भगवान के दिव्य नामों, रूप, गुणों आदि के निरंतर मनन से उत्पन्न होते है, तथापि जैसा कि कहा गया है “अनादि मायया सुप्त:” (अनंत समय से अज्ञान रूपी अन्धकार में रहते हुए) और “तिल तैलवत धारु वहनिवत” (तिल में तेल और लकड़ी में आग के समान अचित वस्तुओं से अविभाज्य), जो बद्ध जीवात्माएं है, वे अनादी माया (जो भगवान द्वारा संचालित है) के आवरण में है, जो उनके ज्ञान को ढक देता है और अनादी अज्ञान के कारण वह अगणित कर्मों (पाप और पुण्यों) का संचय करता हुआ, अनंत जन्मों में सुर, नर, तिर्यक (पशु) और स्थावर (पौधे) के रूप में जन्म लेता है। इन अनेकों जन्म में, वह अनेक भूल करता है, जैसे देहाभिमान (देह को ही आत्मा समझना), स्वातंत्रियम (स्वयं को स्वतंत्र समझना), अन्य शेषत्वं (भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य के दासभूत स्वीकार करना) और इन स्वरुप विरोधी आचरण के अनुसार कार्य करता है और परिणाम भोगता है। ऐसी जीवात्मायें, सभी स्थिति में भगवान को त्यागकर, उनके प्रतिकूल हो जाती है, जो समस्त जगत के एकमात्र स्वामी है और उस जीवात्मा के लिए एकमात्र सर्वश्रेष्ठ उपाय और साधन भी है। इसके फलस्वरूप, उस जीवात्मा को सात चरणों- गर्भ (उदर में आना), जन्म, बाल्य (बालक जो स्वयं अपनी देखभाल नहीं कर सकता), यौवन (युवावस्था जो इन्द्रियों के सुख में लीन है), वृद्ध (बुढ़ापा), मरण (मृत्यु) और नरक आदि से गुजरना पड़ता है, जो नित्य अनंत दुखों को देने वाले है। उन पीड़ित जीवात्माओं में से कुछ, जिन्हें जन्म के समय भगवान अपना कृपा वात्सल्य प्रदान करते है, वह जीवात्मा भगवान को स्वीकार करती है, जिससे उसके रजो और तमो गुणों का नाश होता है और उनमें सत्व गुण का विकास होता है, जिसके परिणामस्वरूप उनमें मोक्ष की अभिलाषा उत्पन्न होती है।

  • जब किसी में मोक्ष की अभिलाषा उत्पन्न होती है, उन्हें अपने कल्याणार्थ, तत्व (जीवात्मा का स्वरुप भगवान के दास होकर रहना है), हित (उपाय) और पुरुषार्थ (उपेय) के विषय में ज्ञान प्राप्ति आवश्यक है।
  • इन तीन सिद्धांतों को शास्त्रों (जो ज्ञान प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत्र है) द्वारा जानने के लिए, वेदों का अनुसरण किया जाता है, जो शास्त्रों में मुख्य है। परंतु जैसा कि “अनंता वै वेदा” में उल्लेख किया गया है कि वेद अनंत है और वेदों द्वारा किसी सिद्धांत के विवेचन के लिए, हमें तय प्रक्रिया का अनुसरण करना अनिवार्य है, जैसे कि “सर्व शाका प्रत्यय न्यायम ” (अर्थात उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए वेदों के विभिन्न खण्डों के सही समन्वय के द्वारा उस सिद्धांत का निर्णय करना), आदि, इसलिए सिमित बुद्धि वाले सामान्य मनुष्यों के लिए यह अत्यंत कठिन है।
  • यह जानकर कि वेदों द्वारा ज्ञान प्राप्त करना अयंत दुष्कर है, अन्य प्रासंगिक मार्ग है- व्यास आदि महान ऋषियों के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करना, जिन्होंने अपने महान प्रयासों द्वारा वेदों में दक्षता प्राप्त की है और उसके आधार पर स्मृति, इतिहास और पुराणों की रचना की है। परंतु इनमें भी, सिर्फ योग्य मनुष्य ही सार और असंगत तत्वों के मध्य सही प्रकार से भेद कर सकते है।
  • भगवान ने अपनी निर्हेतुक कृपापूर्वक, आचार्य स्वरुप धारण किया और सभी जीवात्माओं के कल्याणार्थ रहस्यत्रय (तिरुमंत्र, द्वय, और चरम श्लोक) का ज्ञान प्रकट किया। परंतु रहस्यत्रय अत्यंत संक्षेप है और सभी के द्वारा उनमें निहित महान अर्थों को जान पाना कठिन है।
  • आलवार (परांकुश/ श्रीशठकोप स्वामीजी, परकाल स्वामीजी, आदि), जो स्वयं भगवान के द्वारा प्राप्त निर्हेतुक कृपा से ही अद्भुत ज्ञान के अधिकारी हुए, उन्होंने सम्पूर्ण वेदों के सारतत्व को जानकर उन्हें अत्यधिक संक्षेप और सटीक रूप में अपने दिव्य प्रबंधनों के माध्यम से समझाया है, जो द्राविड वेद, और उसके अंग, उप-अंगों के नाम से प्रचलित है। तथापि, सिमित बुद्धि के मनुष्यों द्वारा दिव्य प्रबंधनों के मानक उद्देश्यों को पुर्णतः समझ पाना संभव नहीं है।

2.Alwars-10

 आलवार

  • यह देखकर कि भागवत विषय में रूचि रखने वाले भी अपने सिमित ज्ञान के परिणामस्वरूप उनमें निहित सारतत्व को प्राप्त नहीं कर पा रहे, श्रीनाथमुनी स्वामीजी से प्रारंभ हमारी आचार्य परंपरा, जो आलवारों के निर्हेतुक कृपापात्र थे, जिन्होंने सत संप्रदाय को द्रढ़ता से स्थापित किया, जो सभी शास्त्रों में निपुण थे और अत्यंत दयालु थे, उन्होंने वेदादि के सार को समझकर अत्यंत सरल और सुगम रूप से प्रस्तुत किया, जिससे की अल्प बुद्धि वाला मनुष्य भी उसे भली प्रकार से समझ सके। उन्होंने सत संप्रदाय के सिद्धांतों को विभिन्न ग्रंथों द्वारा प्रकाशित किया।

3.azhwar-acharyas-ramanuja

 आचार्य परंपरा

  • उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, पिल्लै लोकाचार्य ने संसार में पीड़ित जीवात्मा के प्रति करुणापूर्वक, जो भगवान की नित्य निरंतर सेवा कैंकर्य के अद्भुत अवसर को बिसरा रही है, उनके कल्याणार्थ बहुत से प्रबंधों की रचना की है। इन सिद्धांतों का प्रचार आचार्य परंपरा के माध्यम से प्रारंभ हुआ। पूर्वाचार्यों ने इन सिद्धांतों के बहुमूल्य गुणों को देखते हुए अपने शिष्यों को इनकी शिक्षा अत्यंत गोपनीयता से प्रदान की थी। इन सिद्धांतों के अत्यंत वैभवशाली स्वरुप को देखते हुए, उन्होंने उन सिद्धांतों को कभी भी जन-साधारण में प्रकट नहीं किया। परंतु, भविष्य की पीढ़ियों के प्रारब्ध को देखते हुए, जो इन महत्वपूर्ण सिद्धांतों से वंचित रह सकते है, पिल्लै लोकाचार्य ने अपनी महान करुणा के फलस्वरूप और स्वपन में स्वयं भगवान द्वारा दिए गए आदेश के आधार पर, श्री वचन भूषण नामक ग्रंथ के माध्यम से महत्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रस्तुत किया।

पहले, पेररुलाल पेरुमाल (कांचीपुरम वरदराज पेरुमाल) ने अपनी निर्हेतुक कृपा के द्वारा मणरपाक्कम गाँव में नम्बि नाम के एक श्री वैष्णव पर विशेष करुणा की। उन्होंने मणरपाक्कतु नम्बि के स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें सत संप्रदाय के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उपदेश किया और फिर उन्हें निर्देश दिया “अब, आप जाएँ और दो नदियों के मध्य स्थित देश में जाकर निवास करे (श्रीरंगम, कावेरी और कोल्लिदम नदियों के मध्य स्थित है), मैं वहां इन सिद्धांतों को सम्पूर्ण विस्तार से समझाऊंगा”। नम्बि उन निर्देशों का अनुसरण करते हुए श्रीरंगम पहुँचते है। वे पेरिय पेरुमाल की आराधना करते हुए वहीँ निवास करते है और अपनी पहचान को प्रकट न करते हुए, पेररुलाल पेरुमाल द्वारा बताये गए सिद्धांतों का निरंतर ध्यान करते है।

4.pl-goshti

 पिल्लै लोकाचार्य– कालक्षेप गोष्ठी

एक समय जब श्रीरंगम के काट्टलगीय सिंगर मन्दिर् में वे भगवान की सेवा में लग्न थे, तभी भगवान की दिव्य अभिलाषा से पिल्लै लोकाचार्य अपने शिष्यों के साथ वहां पहुंचते है। क्यूंकि वह मंदिर सुदूर स्थान पर था, जहाँ अत्यधिक शांति थी, वे अपने शिष्यों को सत संप्रदाय के रहस्यत्रय का उपदेश प्रारंभ करते है। मणरपाक्कतु नम्बि इन उपदेशों को श्रवण करते है (उस स्थान से जहाँ से अन्य कोई उन्हें देख नहीं पाते) और यह जानकर अचंभित रह जाते है कि यह उपदेश तों पेररुलाल पेरुमाल द्वारा बताये गए सिद्धांतों के समरूप ही है। वे अंदर से बहार सभी के सामने आते है और पिल्लै लोकाचार्य के चरणकमलों में गिरकर कहते है “क्या आप वे ही है?” और पिल्लै लोकाचार्य प्रतिउत्तर में कहते है “हाँ, क्या किया जाना चाहिए?”। तब नम्बि उन्हें बताते है कि पेररुलाल पेरुमाल ने उन्हें यही सिद्धांत समझाए थे और कहा था कि इन सिद्धांतों को विस्तार से जानने के लिए श्रीरंगम की और प्रस्थान करे। पिल्लै लोकाचार्य उल्लासित होकर, नम्बि को शिष्य रूप में स्वीकार करते है और नम्बि उनकी सेवा करते हुए, उनके सानिध्य में सभी सिद्धांतों का विस्तार से अध्यनन करते है। एक समय भगवान, नम्बि के स्वप्न में प्रकट होकर उन्हें निर्देश देते है कि वे पिल्लै लोकाचार्य से विनती करे कि वे इन अद्भुत और अति-महत्वपूर्ण निर्णयों को एक प्रबंध में संकलित करे, जिससे समय के साथ वे विलुप्त न हो। नम्बि, पिल्लै लोकाचार्य के पास जाकर उन्हें भगवान की दिव्य अभिलाषा के विषय में बताते है और तब पिल्लै लोकाचार्य कहते है “यदि यही उनकी अभिलाषा है, तब मैं ऐसा ही करूँगा” और फिर उन्होंने श्रीवचन भूषण की रचना की – यह द्रष्टांत बहुत प्रचलित है।

जिस प्रकार एक माला जिसमें बहुत से रत्न जडित हो उसे रत्न भूषण कहा जाता है, उसी प्रकार क्यूंकि यह प्रबंध, हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा वर्णित वाक्यांशों से परिपूर्ण है और इसका ध्यान करने वाले सभी मनुष्यों के ज्ञान को निखार प्रदान करता है, इसका श्रीवचन भूषण, ऐसा नाम प्रख्यात हुआ।

5.IMG_0460

पिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपुरी

इस प्रकार श्रीवचनभूषण ग्रंथ के परिचय खंड का प्रथम भाग यहाँ पूर्ण हुआ। हमारे सतसम्प्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों को अत्यंत सुगमता से प्रस्तुत करने का श्रेय इसी ग्रंथ को है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की अत्यंत सुंदर और स्पष्ट व्याख्यान से पूर्ण यह ग्रंथ हमारे लिए अत्यंत अमूल्य निधि है। इस ग्रंथ को पूर्णरूप से समझाने के लिए इसका व्याख्यान सदाचार्य से श्रवण करना अत्यंत हितकारी है। आइये हम भी उन महान आचार्य चरणों में प्रणाम कर उनकी कृपा प्राप्त करे।

अगले अंकों में हम पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण ग्रंथ के लिए रचित श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के इस सुंदर परिचय को आगे भी जारी रखेंगे।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-sri-vachana-bhushanam-1.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org