विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीशठकोप स्वामीजी कि स्तुति “कृष्णा तृष्णा तत्वम” ऐसी कि गयी है – भगवान के प्रति भक्ति का मूर्त रूप

६१) स्नेह विरोधी – लगाव / मित्रता में बाधाएं

स्नेह का अर्थ मित्रता, स्नेह, लगाव, प्रेम आदि है। स्नेह कि परिपक्व स्थिति भक्ति है। छोटे जनों का श्रेष्ठ जनों के प्रति स्नेह भी भक्ति कहलाता है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिये हनुमानजी (तिरुवड़ी – जीवात्मा) का श्रीराम भगवान (पेरुमाल – परमात्मा) के प्रति प्रेम को भक्ति कहते है। और भगवान श्रीराम का हनुमानजी के प्रति प्रेम को स्नेह कहते हैं। इस भाग में हर बात के लिये दो पहलू पर चर्चा कि गयी है – पहला पक्ष है किससे बचना चाहिये और अगला पहलू किसका पालन करना चाहिए। यहाँ सारतत्व यह है कि हम प्रथम पक्ष को सामान्यत: होते देखते है परन्तु इस संसार में दूसरा पहलू बहुत कम देखने को मिलता है। यह जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही नहीं है। हमें पहिले में कम या लगाव होना ही नहीं चाहिये और दूसरे में अधीक लगाव होना चाहिये। यह समझना बहुत आसान है।

  • प्राकृत बन्धुओं (सांसारिक सम्बन्धी – वह सम्बन्धी जो हमारे शारीरिक जन्म से जुड़े है) से लगाव रखना और आत्म बंधुओं (वह जो भगवद, भागवत और आचार्य के जरिये हमसे जुड़े हैं) से लगाव नहीं रखना बाधा है।
  • सांसारिक पहलू से लगाव रखना और भगवद विषय से लगाव नहीं रखना बाधा हैं। हमें भगवद विषय में लगाव को आगे बढ़ना चाहिये और सांसारिक पक्षों में लगाव का त्याग करना चाहिये। श्रीमहद्योगी स्वामीजी मून्राम तिरुवन्दादि के १४वें पाशुर में समझाते है कि “मार्पाल मनम शुलिप्प मङगैयर तोल कैविट्टु” जब हम भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति लगाव को बढ़ाएंगे तो औरतों (और अन्य सांसारिक खुशियों) के प्रति हमारा लगाव अपने आप समाप्त हो जायेगा।
  • अपने शारीरिक सुख कि ओर लगाव रखना और आचार्य के शारीरिक सुख कि ओर लगाव न रखना। उपदेश रत्नमाला के ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयिरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” आचार्य का अर्थ वो जो शिष्य (आत्मा और आत्मा से जुड़े पक्षों जैसे ज्ञान, भक्ति आदि) का पालन पोषण करता है और शिष्य का अर्थ वो जो आचार्य के पवित्र शरीर का पोषण करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्व को उपदेश रत्नमाला के पाशुरों से बड़ी सरल और सुन्दर रूप से प्रस्तुत करते हैं। श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य और शिष्य अपने कार्य को बदल नहीं सकते है। अर्थात आचार्य को केवल शिष्य के आत्म यात्रा (आत्मिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये और शिष्य को केवल आचार्य के देह यात्रा (शारीरिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये। और अगर आचार्य शिष्य के देह कि जरूरतों के बारें में विचार करें और शिष्य आचार्य के आत्मिक जरूरतों के विषय में विचार करें तो गड़बड़ी हो जायेगी – क्योंकि यह उनके लिये करने में असामान्य हैं।
  • जो हमें सांसारिक सुख प्रदान करते हैं उन जनों से लगाव रखना और आचार्य जो हमें तिरुमन्त्र के तत्व को प्रदान करते हैं उनसे लगाव न रखना बाधा हैं। सांसारिक सुख अर्थात खाना, वस्त्र, घर आदि। तिरुमन्त्र अर्थात अष्टाक्षर मन्त्र और उसकी स्तुति पेरिया तिरुमन्त्र ऐसे की जाती है क्यूंकि उसमें सभी महत्वपूर्ण ज्ञान समाहित है।
  • जहाँ हम निवास करते हैं उस स्थान में लगाव रखना और जहाँ आचार्य निवास करते हैं उस स्थान में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। सभी को उस स्थान या शहर पर अधीक लगाव होना चाहिये जहाँ हमारे आचार्य निवास करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम स्मरण कर सकते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला के ६४वें पाशुर में कहते हैं “तन्नारियुनुक्कुत्तानडिमै शेयवदु अवन इन्नाडुतन्निलिरुक्कुम नाल, अन्नेररिन्दुमदिलाशैयिन्नि आचार्यनैप्पिरिन्दिरुप्पारार् ? मनमे पेशु” –जब तक हमारे आचार्य इस संसार में है तब तक हम उनकी सेवा कर सकते है (वह सेवा उनके लिये सच में लाभ दायक रहेगी)। यह जानने के पश्चात कौन अपने आचार्य से अलग रहना चाहेगा?
  • देह यात्रा में लगाव रखना और आत्म यात्रा में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। श्रीवैष्णवों को शारीरिक जरूरतों का पालन पोषण करना जरूरी नहीं है। उनको आत्मिक पक्ष पर केन्द्रीत होना चाहिये जैसे भगवद, भागवत और आचार्य कि सेवा करना।
  • पत्नी, बच्चे आदि जो भगवान और भागवतों से विरोधी/ शत्रुता कि भावना रखते हैं उनके साथ स्नेह रखना बाधा हैं। ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग उतना ही सम्बन्ध रखना चाहिये जितना शास्त्र अनुमती देता है (जैसे खाना, वस्त्र, घर आदि) और किसी को भी ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग प्रेम सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। उस पत्नी, बच्चों आदि से प्रेम सम्बन्ध रखने में कोई गलत नहीं हैं जो भगवद भागवत विषय कि ओर हितकारी हो क्योंकि वें भागवत होने के योग्य है।
  • अर्चावतार भगवान और मुख्य मन्दिर/दिव्यदेश जैसे कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति) आदि कि ओर लगाव न रखना बाधा हैं। अर्चावतार कि स्तुति तिरुनेडुन्दाण्डगम में श्रीपरकाल स्वामीजी ने “पिन्नानार वणन्गुम सोदि” ऐसे की है –जो कोई भी विभव अवतारों (जैसे राम, कृष्ण आदि) का दर्शन करने में असफल रहे है उनके लिए अर्चावतार ही दीप्तिमान चमकती रोशनी है। हमें यह पूरी तरह समझ लेना चाहिये कि अर्चावतार भगवान ही हमारे पूर्ण रक्षक हैं। हमारे आल्वार और आचार्यों को दिव्य देश और इन दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार भगवान से बहुत लगाव था। इन दिव्य देशों में भी हमें कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति), पेरुमाल कोइल (काञ्चीपुरम) और तिरुनारायणपुरम (मेलकोटे) क्षेत्रों में विशेष स्तुति होने के कारण अधीक लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीरंगम जैसे दिव्यदेश कि अधीक बढाई या स्तुति होती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि अन्य दिव्यदेश नीचे है। उदाहरण के लिये हमारे सम्प्रदाय के लिये श्रीरंगम मुख्य स्थान है और हमारे सभी आल्वार और आचार्य को इस दिव्यदेश के प्रति अधीक लगाव था। आल्वार और आचार्य के इस अधीक लगाव के कारण श्रीरंगम को अन्य दिव्यदेश से अधीक महत्ता (विशिष्टता) है।
  • मन्त्र रत्न को छोड़ अन्य मन्त्र कि ओर लगाव रखना बाधा हैं। मन्त्र रत्न अर्थात द्वय महा मन्त्र। हम इसे रहस्य त्रय से भी जोड़ सकते है। इन्हें अपने आचार्य से सिखा जा सकता है। यह रहस्य त्रय जीवात्मा के स्वभाव को समझाता है और जीवात्मा को मोक्ष के पथ पर ले जाता है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वदिनचर्या में श्रीएरुम्बी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या को लिखते है। ९वें श्लोक में वें इस तरह दर्शाते हैं: मन्त्र रत्न अनुसन्धान सन्तत स्फुरिताधरम तदर्थ तत्व निध्यान सन्नद्ध पुलकोग्दमम् – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महा मन्त्र (जिसे मन्त्र रत्न भी कहते है – सभी मंत्रों में रत्न) का जाप करते रहते है। द्वयम का निरन्तर अर्थानुसंधान करने के कारण उनका शरीर एक स्पष्ट दिव्य पवित्र प्रतिक्रिया देता है जो ओर कुछ नहीं श्रीसहस्रगीति है। नायनार ने यह बताया है कि श्रीसहस्रगीति दिव्य ग्रंथ द्वय महामन्त्र का ही पूर्ण स्पष्टीकरण करता है। यह आचार्य हृदय के चूर्णिका २१० में दर्शाया गया है। अत: हमें मन्त्र रत्न कि ओर ही पूर्ण लगाव होना चाहिये। आजकल हम यह देखते हैं कि श्रीवैष्णव जन अन्य सम्प्रदाय के जनों के प्रभाव में आकर अन्य मन्त्र का जाप करते है। इससे बचना चाहिये और हमारे ऐसे विषयों में पूर्वाचार्यों के आर्दशों का पालन करना चाहिये।
  • अन्य मन्त्र देनेवाले कि ओर लगाव रखना और जिन्होंने तिरुमन्त्र दिया हैं उनकी ओर लगाव न रखना बाधा है। जो पेरिया तिरुमन्त्र (अष्टाक्षर) सिखाते हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। यहाँ अन्य मन्त्र अर्थात वह मन्त्र जिनका प्रयोग उपासना में होता हैं। हमारे आचार्य कभी भी मन्त्र सांसारिक लाभ के लिये कहने को नहीं कहे हैं। इसीलिए जिन्होंने हमें पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया हैं उन आचार्य कि ओर हमें हमेशा पूर्ण लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी सबसे पहिले पाशुर में श्रीमन्नारायण भगवान का नाम बतलाते है “एन पेरुक्कन्नलत्तु ओण पोरुलीरिल वण पुगल नारणन थीण कलल सेरे” आपको भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों में आत्मसमर्पण करना हीं होगा – श्रीमन्नारायण भगवान सभी में अन्तरयामि रूप से विराजमान है, वह जिसके पास पवित्र गुण है और वह जो कभी भी अपने भक्तों कि रक्षा करने से नहीं चुकते है। ईडु महा व्याख्या अवतारिका (प्रस्तावना) में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी यह समझाते हैं कि यह पाशुर तिरुमन्त्र पर केन्द्रीत है जो भजन द्वारा भगवान कि ओर ले जाता है। वह यह भी समझाते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य इस मन्त्र के पवित्र अर्थों पर केन्द्रीत थे और अपने शिष्यों को भी यहीं सिखाते थे परन्तु अन्य लोग इस मन्त्र का प्रयोग जप, याग, होम आदि के लिये और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये करते थे। इससे यह स्थापित होता हैं कि हमें ऐसे जप, होम आदि अगर तिरुमन्त्र का उपयोग करके भी किया जा रहा हो तो भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखना है। और श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जिसने पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया है (जो रहस्यत्रय का एक अंग है) वों हीं हमारे आचार्य है।

६२) भक्ति विरोधी भक्ति में बाधाएं

भक्ति अर्थात अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति/ तत्व से स्नेह, प्रेम। एक आस्तिक की भगवान के प्रति पूजा को भक्ति कहते है। इसे काधल ऐसा समझाते है (तमिल में प्रेम)। शास्त्र में मोक्ष प्राप्ति के लिये भक्ति को उपाय समझाया गया है – इसे साधना भक्ति कहते है। भगवान के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात, निरन्तर उनका प्रेम से ध्यान करने को भक्ति योग कहते है जिसे मोक्ष साधन (मोक्ष प्राप्त करने का उपाय) ऐसा समझाते हैं। केवल योग्य जीव ही भक्ति योग को कर सकते है। (अनुवादक टिप्पणी: साधन भक्ति केवल तीन वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य) ही कर सकते है, क्योंकि कर्म योग और ज्ञान योग उसके अंग है जिसे केवल वें ही निभा सकते हैं)।

आल्वारों कि भक्ति (जो सबसे उच्च भक्त है) स्वयं भगवान की कृपा से है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के प्रारम्भ में ही कहते है “मयर्वर मदि नलम अरुलिनन” –भगवान मुझ पर दोषरहित ज्ञान/पूजा का आशिर्वाद प्रदान किये है – यह भगवान की निर्हेतुक कृपा का परिणाम है। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य मंगल श्लोक में भगवान से उनकी इसी तरह के भक्ति कि अपेक्षा से प्रार्थना करते है “भवतु मा परस्मिन शेमुषी भक्ति रूपा”। क्योंकि भगवान अपने भक्तों को ऐसी भक्ति का आशिर्वाद प्रदान करते है, तो वह भक्ति प्राप्य (अन्तिम लक्ष्य – कैंकर्य) का एक अंग हो जाता है। इसलिये इसे साध्य भक्ति (अधिकारी के पूजा के आधार पर भक्ति जो स्वयं भगवान प्रदान करते है) और यह साध्य भक्ति साधन भक्ति से भिन्न है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार बड़ी सुन्दरता से कई प्रकार की भक्ति और चूर्णिका ९५ से १०२ तक श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वारों) की भक्ति के स्वभाव को स्थापित करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने निपुण व्याख्यान से हम पर आशिर्वाद प्रदान करते है जिसके मदद से हम यह पवित्र तत्व को समझ सकते है। ३ प्रकार कि भक्ति पहचानी गयी है – साधन भक्ति, साध्य भक्ति और सहज भक्ति।

  • साधन भक्ति वह भक्ति है जो स्वयं के परिश्रम से बढ़ती है और भगवद प्राप्ति के लिये इसे उपाय माना गया है – यह भक्ति योग है जिसे शास्त्र में समझाया गया है।
  • साध्य भक्ति पवित्र योग है जो उच्च आचार्य जैसे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी आदि द्वारा प्रगट कि गयी है। यह आचार्य पहिले ही भगवान के शरण हो चुके है और केवल भगवान को ही उपाय स्वीकार किये है। ऐसे साध्य भक्ति भूख के समान है – केवल जब कोई भूखा हो तभी वो अपनी पूर्ण संतुष्टी तक भोजन खा सकता है उसी तरह जब पवित्र भक्ति होती है तब वह जो कैंकर्य करते है उससे उन्हें पूर्ण संतुष्टी मिलती है। इसलिये यह साध्य भक्ति कैंकर्य का एक अंग हो जाता है।
  • सहज भक्ति ऐसे अधिकारी का जन्म इस पवित्र भक्ति के साथ ही हुआ है। उदाहरण के तौर पर श्रीशठकोप स्वामीजी का जन्म भगवान कि तरफ पवित्र भक्ति के साथ हुआ और ऐसी भक्ति स्वयं भगवान ने ही प्रदान की है। सहज का अर्थ “वह जो स्वयं से जन्म लिया हो”। यह सहज भक्ति साधन भक्ति और साध्य भक्ति से भिन्न हैं। इसी कारण से आल्वारों को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है – भगवान की भक्ति करने के लिए भगवान की निर्हेतुक कृपा से वें भगवान के सीधे कृपा प्राप्त बने।

इस प्रस्तावना के साथ इस विषय के भिन्न पहलू पर हम चर्चा करेंगे।

  • भगवान को पाने के लिये भक्ति को साधन मानना बाधा है। जब हम भक्ति को मोक्ष का साधन मानते है तब उसमें स्व प्रयास हैं। परन्तु कुछ पाने के लिये स्व प्रयास करना सीधा उसके शेषत्व और पारतंत्र्य के विरुद्ध है। अत: भक्ति को साधन मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तो स्थापित हो ही गया है कि केवल “भगवान” ही उपाय है। हमारा चरम श्लोक भी इसी तत्व को समझाता है। चरम श्लोक में “मामेकं” (केवल में) भगवान हीं उपाय इस तत्व को स्वीकार करने पर ज़ोर देता हैं। इसलिये भक्ति को उपाय मानना दोषपूर्ण है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ११५वें सूत्र में बड़े विस्तृत रूप से सिखाते हैं। वह कहते हैं “प्रापकांतर परित्यागत्तुक्कु अज्ञान असक्तिकलन्रु, स्वरुप विरोधमे प्रधान हेतु” – अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का त्याग करने का मुख्य कारण है वें आत्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत हैं (जो पूर्णत: भगवान पर निर्भर है) और ज्ञान/योग्यता के कमी के कारण नहीं। कोई कहते है कि जिनमें क्षमता है वे भक्ति योग कर सकते हैं और जो सक्षम नहीं हैं वें भगवान के शरण हो सकते हैं। ऐसे तर्क शास्त्र को हमारे पूर्वाचार्यों ने पूरी तरह अस्वीकार किया हैं। चाहे समर्थ हो या असमर्थ यह जीवात्मा का स्वभाव हैं की अपनी रक्षा और ऊपर उठाने के लिये भगवान के शरण होना।
  • स्मरण, संकिर्तन आदि सभी साध्य (परिणाम- कैंकर्य) के अंग है, यह न जानना बाधा हैं। भक्ति के प्रारम्भ दशा में जब भगवान रक्षा के लिये आते है तब जीवात्मा कि ओर से एक अद्वेष होता है। जब भगवान “त्वममे” (तुम मेरे हो) कहते है तब हमें “अहममे” (में मेरा हूँ) यह नहीं कहना चाहिये। हमें यह मानना चाहिये कि भगवान को अस्वीकार न करने की सोच भी भगवान ही उत्पन्न करते हैं।
  • हमारी भक्ति में सांसारिक इच्छाओं का मिश्रण होना और पवित्र भक्ति में स्थित नहीं होना बाधा हैं। सांसारिक इच्छाओं को हृदय में घर करने से बचाना चाहिये। उसी तरह सभी को निरन्तर पवित्र भक्ति के लिये प्रयास करना चाहिये।
  • प्रपत्ति और साध्य भक्ति को समान मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति भगवान के शरण होने का कार्य और भगवान को उपाय रूप में स्वीकार करना हैं। जैसे पहिले देखा गया हैं साध्य भक्ति हमारी भक्ति पवित्र हो सके इसीलिए भगवान से प्रार्थना के लिए है – दोनों भिन्न है। प्रपत्ति स्वरूप से सम्बन्धीत हैं और साध्य भक्ति हम कैसे अपना कैंकर्य बड़े प्रेम से करें इससे सम्बन्धीत हैं।
  • प्रपन्न के लिये यह न जानना कि साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करने से प्रपत्ति प्रभावहीन हो सकती है, यह बाधा हैं। यह बात स्पष्ट नहीं हैं – मैंने (डॉ व्ही व्ही रामानुजम स्वामी) अपने बड़ों से यह सुना हैं कि जब साध्य भक्ति निभाई जाती हैं तो सामान्यत: उसका अन्त प्रपत्ति में ही होता हैं।
  • जब प्रपन्न जन साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करते हैं तो यह भक्ति उनके कैंकर्य का एक अंग है यह न जानना बाधा हैं। क्योंकि प्रपन्न ऐसी श्रद्धा और भक्ति के लिए उच्च उत्कंठा के साथ प्रार्थना करते हैं, यह उसी प्रकार है जैसे भोजन के लिये भूख हैं जो कैंकर्य करना और भी सुगम कर देता हैं।  अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१ सूत्र में समझाते है कि एक प्रपन्न के लिये उनके कर्म हीं उनके कैंकर्य का एक अंग होगा, ज्ञान उनके स्वयं के ज्ञानाभिवृद्दि का अंग होगा, भक्ति कैंकर्य के प्रति लगाव का अंग, स्वयं प्रपत्ति जीवात्मा के सच्चे स्वभाव का अंग होगा।
  • आल्वारों कि भक्ति जो स्वयं भगवान कि निर्हेतुक कृपा से प्राप्त हुई है वह आल्वारों का आधार है, यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे सामान्य जन भोजन, जल आदि से पोषण करते है वैसे हीं आल्वार जिन पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा है उनका पोषण भगवान के प्रति भक्ति से ही होता है। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा किये हैं कि “उण्णुम सोरु परुगु नीर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन् एम्पेरुमान” – प्रसाद, जल, ताम्बूल आदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हीं हैं।
  • यह मानना कि जब हम भगवान को सब जरूरत कि वस्तुएं देते हैं तो वह तृप्त और खुश होते है बिना यह जाने कि यह उनकी हीं कृपा हैं जो हमें सब कुछ प्राप्त हुआ हैं। यह बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ९.२६ में भगवान कहते हैं “पत्रं पुष्मं फलं तोयं यो मे भकत्या प्रयच्छति। तदहं भकत्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:” – एक पत्ता, फूल, फल और जल – जब भक्ति से मुझे अर्पण किया जाता है तो मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये यह समझना अति जरूरी है कि भक्ति एक मुख्य अंग है – न कि महँगे भोजन/वस्तु जो हम अर्पण करते हैं। भगवान के पास यह सब पहिले ही है –हम उन्हें कुछ नया नहीं दे सकते हैं। यह हमारी भक्ति हैं जिसे वें देखते हैं और यह हीं उन्हें सबसे अधिक संतुष्टी प्रदान करेगी।
  • भगवान के प्रति भक्ति हमारे हृदय में उत्पन्न होती हैं ऐसी भक्ति और परम भक्ति कि वृद्धि भगवान कि कृपा का ही फल हैं। यह न जानना बाधा हैं। ऐसी परम भक्ति की प्रार्थना श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगनाथ गद्य में कहते हैं “पारभक्ति परज्ञान परमभक्ति युक्तां माम कुरुश्व”। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार १०४ चूर्णिका में यह समझाते है कि भगवान को भक्ति उळवन (भक्ति किसान) कहते हैं – जैसे एक किसान अपने खेत में चावल बुआई करता है, खाद डालता है, घास निकालता हैं, अनाज काटता है और अन्त में चावल घर लाता है। भगवान निरन्तर जीवात्मा को जोतते है, भक्ति का बीज बोवते है, जीवात्मा को अध्यात्मिक कार्य में लगने के लिये कई अवकाश प्रदान करते है, बाधाओं से निकालने में सहायता करते है, एक बार जीवात्मा में भक्ति आ जाती है अन्त में जीवात्मा पर कृपा कर मोक्ष प्रदान कर जीवात्मा को नित्य कैंकर्य में लगाते हैं।
  • सभी अन्य उपायों का त्याग करने से किसी के सच्चे स्वभाव को कोई क्षती नहीं पहूंचेगी यह नही जानना बाधा हैं क्योंकि इसे भगवान पर पूर्ण विश्वास के आधार पर और उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करके किया जाता है। क्योंकि स्वयं भगवान भगवद्गीता में कहते हैं “सर्व धर्मान परित्यज्य” (सभी धर्मों का त्याग कर दो) कर्म, ज्ञान, भक्ति योग उपाय रूप में त्याग करने में कोई गलत नहीं है क्योंकि हम भगवान के शरण होने के लिये उन्हीं के हीं नियमों का पालन कर रहे हैं।
  • पवित्र श्रद्धा से भगवान का मंगलाशासन करना ही जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही है, यह नही जानना बाधा है। यद्यपि भगवान से यह कहना कि “आपका सब मंगल हो” सही नहीं दिखता है (वह पहले से ही सबसे श्रेष्ठ और पवित्र है)। परन्तु वह जो भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन है वह भगवान की सुन्दरता, कोमल स्वभाव आदि को देखेगा और यह विचार करेगा कि ऐसे कृपालु भगवान का कुछ अशुभ न हो जाये और इसलिये मंगलाशासन प्रगट करता है। उपदेश रत्नमाला में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं –“पोंगुम परिवले विल्लिपुत्तुर पट्टरपिरान पेट्रान पेरियाल्वार एन्नुम पेयर” – पट्टरपिरान की भगवान के प्रति अपरिहार्य भक्ति के कारण उन्हें पेरीय आल्वर (बड़े आल्वार) नाम प्राप्त हुआ। हालाकि उन्होंने स्वयं श्रीमन्नारायण कि प्रधानता मदुरै राजा के दरबार में स्थापित कि परंतु जब उन्होंने बाहर आकर भगवान को गरुड वाहन में उन्हें आशिर्वाद प्रदान करते देखा तो वे गाने लगे “पल्लांडु पल्लांडु .. उन सेवडी सेव्वी तिरुक्काप्पू” (जीते रहो जीते रहो … आपके सुन्दर चरण कमल सुरक्षीत रहे)। यह हमारे स्वभाव के विपरीत नहीं है – अपितु यह तो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के सर्वथा योग्य है। इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है। इसे एक आचार्य के मार्गदर्शक में पढ़ा जा सकता हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/06/virodhi-pariharangal-28.html

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