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श्री वैष्णव लक्षण – १३

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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निष्कर्ष

mamunigal-srirangam श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पिछले लेख में हमने देखा कि श्री वरवरमुनि स्वामीजी एक आदर्श आचार्य थे जिनमे वे सभी गुण भरपूर थे जो एक श्रेष्ठ श्रीवैष्णव में होना चाहिए । अब हम उनके गौरवशालि के बारे में और कुछ देखकर इस श्रृंख्ला को समाप्त करेंगे |   “मधुरेण समाप्येत: ” के अनुसार, पेरियजीयर, स्वामी मनवाल मामुनिगल के बारे में चर्चा करते हुए इस लेख को समाप्त करने से भी अधिक मधुर और क्या हो सकता है? यह तो परमात्मा श्रीमन नारायण की दिव्य योजना ही तो है कि यह श्रृंख्ला मामुनिगल की अनुभव के साथ समाप्त हो रहा है |

श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र के सूत्र २२१ में यह कहा गया है – ” वेदग पोन पोले इवर्गलोट्टै सम्बन्ध ” – इसके टीका में स्वामी यतीन्द्रप्रणवर समझाते हैं कि श्रीवैष्णवों के सम्बन्ध हमें शुद्ध बनाता है – बिलकुल रसायनशास्त्र के समान – जिस प्रकार एक रासायनिक संयोजन, लोहे को सोना बना देता है उसी प्रकार श्रीवैष्णव सम्बन्ध हमें शुद्ध बना देता है | पेरिय तिरुमोळि में कलियन स्वामी बताते हैं – ” तम्मैये नालुम वनंगि तोलुवारक्कु तम्मैयेयोक्क अरुल सेय्वार ” – जो भी निरन्तर एम्पेरुमान श्रीमन नारायण की प्रार्थना करता रहता है वो एम्पेरुमान के समान बन जाता है – अर्थात एम्पेरुमान के कृपा पात्र बनकर उनके तरह आठ गुण प्राप्त होता है ( अपहतापापमा आदि) | मगर श्रीवैष्णवों और एम्पेरुमान के बीच अंतर यह है कि एक शुद्ध श्रीवैष्णव बनने के लिए श्रीवैष्णव सम्बन्ध काफी है मगर एम्पेरुमान के समान बनने के लिए हमेशा २४ घंटे ३६५ दिन उनकी पूजा करते रहना चाहिए |

 इस विषय को हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन से देख सकते हैं – स्वामी एम्पेरुमानार सभी लोगों के जीवन को अच्छे मार्ग में परिवर्तित किया है | उनके शिष्य भी उनकी तरह अतुल्य ही थे – कूरत्ताळ्वान् , मुदलियान्डान् , एम्बार् , अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् आदि सभी स्वामी एम्पेरुमानार के तरह महान होने पर भी अपने आप को हमेशा एम्पेरुमानार के अधीन मानते थे|

उसी प्रकार स्वामी मामुनिगल के शिष्य थे – पोन्नडिक्काल् जीयर् , कोयिल् कन्दाडै अण्णन् , प्रतिवादि भयंकरम अण्णन् , पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् , अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर् , एऱुम्बि अप्पा , अप्पिळ्ळै , अप्पिळ्ळार् , कोयिल् कन्दाडै अप्पन् आदि जो सभी स्वामी मामुनिगल के तरह ही गौरवशाली थे परन्तु वे सभी अपने आप को मामुनिगल के अधीन मानते थे | इस विचार को हम उपदेश रत्न माला के ५५ पाशुर के व्याख्यान से समझ सकते हैं – पिळ्ळै लोकम् जीयर् – जो कि इस व्याख्यान के टीकाकार हैं – पहले यह कहते हैं कि ” पेरिय जीयर एक ही हैं जिनको ओरोरुवर माना जा सकता है ” और फिर आगे कहते हैं कि प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्  , पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर् आदि भी ओरोरुवर कहने के योग्य हैं |

इस लेख का सारांश फिरसे आपके लिए:

अतः अगर हम इन सरल सिद्धांतों को पालन करने कि कोशिश करें तो धीरे धीरे मगर व्यवस्थित रुप से हम उन सभी श्रीवैष्णव लक्षण को हासिल कर सकते हैं जिनके बारे में हमारे पूर्वाचार्यों ने विस्तार रूप से समझाया और अनुशासन भी किया था | वे सिध्दान्त कुछ इस प्रकार हैं :-
१) पूर्वाचार्यों के जीवन और अनुदेशों पर पूर्ण भरोसा |
२) एम्पेरुमान और आचार्यों के प्रति उपकारक स्मृति ( कृतज्ञता ) प्रकट करना |
३) भगवद – भागवद विषयों में तल्लीन रहना और सभी अन्य विषयों में निरपेक्ष रहना |
४) देवतांतर भजन को टालना |
५) नैच्यानुसंधानम का पालन करना – हमेशा खुद को दुसरे श्रीवैष्णवों से नीच मानना |
६) उचित आहार नियमम का पालन करना |

इसके साथ अडियेन इस श्रृंख्ला को समाप्त करना चाहता हूँ |

जबकि अडियेन पूर्वाचार्य ग्रंथों से बहुत सारे बहुमूल्य विषयों कि जानकारी की है , यह बहुत आवश्यक है कि हम एक उचित आचार्य के माध्यम से हमारे पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के बारे में सही रूप से सीखें | विद्वानों से सीखे बिना सिर्फ पुस्तकों को पढ़कर इन अनुकरणीय और गहरे अर्थों को समझना नामुमकिन है |

अडियेन श्रीय:पति, आलवारों ओर आचार्यों पर आभारी हूँ जिनके निर्हेतुक कृपा से अडियेन इस श्रृंख्ला को लिख सका | उन स्वामियों को अडियेन प्रणाम करता हूँ जिनसे अडियेन कालक्षेप के द्वारा कई मूल्य अर्थों को समझ सका | अगर इस श्रृंख्ला के द्वारा कोई भी भलाई हो तो वो सिर्फ उन आचार्यों, स्वामियों के चरण कमलों को और गुरु परंपरा को समर्पित है | अडियेन की इतनी सी प्रर्तना है कि इस श्रृंख्ला में जो भी गलती अडियेन के द्वारा हुआ हो उसे क्षमा करें और सिर्फ इन लेखों के तत्वों को मन में लें |

श्रीमते रम्यजामात्रु मुनींद्राय महात्मने |
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री: नित्य मंगलम ||

अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – १२

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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ऒरोरुवर (सबसे आदर्श आचार्य)

अपने पिछले लेख में हमने एक श्रीवैष्णव की दिनचर्या को देखा।

एऱुम्बि अप्पा (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्टदिग्गजों में से एक हैं) अपने शिष्यों को समझाते हैं कि कैसे एक श्रीवैष्णव को अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। यह वार्तालाप “विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” ग्रन्थ में संग्रह की गयी है। यह एक उत्तम ग्रन्थ है जो श्रीवचन भूषण और अन्य पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्ति के मूल तत्व पर रची गयी है। इसमें, एऱुम्बि अप्पा समझाते हैं कि हमारे सभी पूर्वाचार्य शिक्षित वैष्णव अधिकारी थे, जो उचित ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और आर्ति के साथ अपना जीवन काल बिता रहे थे। इस बात को नीचे दिए गए प्रमाणों से समझ सकते हैं :-

  • वे सब पूरी तरह भगवद् विषय पर केंद्रित थेकही भी हमें यह प्रमाण लिखित नहीं मिलेगा कि वे अपने जीवन में पैसे, शोहरत, आदि के पीछे भागे। अगर ऐसे भी कोई घटना मिले तो भी अंत में उन श्रीवैष्णव आचार्यों के महानता को स्पष्ट करने के लिए ही होगा। जैसे हीं उन्होंने यह अमूल्य ज्ञान अपने आचार्य से प्राप्त किया, उन्होंने अपने पास जो भी हो उन सब चीज़ों को त्याग कर आचार्य सेवा में लग गए।

  • हालाकि इनमे बहुत से विवाधित थे, वे केवल यह सब लोक क्षेम के लिये किया अपना वंश बढाने के लिये ताकि सम्प्रदाय की रक्षा और पालन पोषण हो सके।

  • उन्होंने यह सब अपने शारीरिक सुख के लिये नहीं बल्कि सिर्फ संप्रदाय की उन्नति के लिए अच्छी सन्तान पैदा करने के लिये किया।

हालाकि हमारे सभी पूर्वाचार्य ऐसे ही थे उनमे से खास हैं श्रीकूरेश स्वामीजी, श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी, श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् जीयर् (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के खास शिष्यों में एक), आदि जो विहित भोग से पूरी तरह अलगाव प्रकट किया था। इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे आचार्य विहित भोग से जुडे हुए थे। इसको इस तरह समझना चाहिए कि “ नही निन्दा न्यायं ”। इस विषय को एऱुम्बि अप्पा ने “विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” में पूरे विस्तार से समझाया है। उन सभी आचार्यों से श्रेष्ठ थे श्रीवरवरमुनि स्वामी, जो उन सभी गुणों के भंडार थे – वे सारे गुण जिनके बारे में श्रीवचनभूषण में विस्तार से दिया गया है। अब हम देखेंगे कि इस साहसिक कथन को हम कैसे कह सकते कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन सभी वैष्णव अधिकारत्व गुणों को प्रकट करते हैं। यह सब हम आगे दिए गए पाशुर के मतलब को समझकर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन चरित्र को पढकर जानेंगे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्न माला में स्वामी पिल्लै लोकाचार्य और उनके ग्रन्थ श्रीवचन भूषन की बहुत ही तारीफ़ की है। ५५वें पाशुर में, श्रीवचन भूषण की स्तुति की गयी है। आइये हम उस पाशुर का अर्थ अब देखेंगे।

आर वचनभूडनथ्थीन आल पोरुल एल्लाम अरिवार
आर अतु चोल नेरिल अनुट्टीप्पार
ओरोरुवर उंडागिल अत्थनै कान उल्लमे
एल्लारक्कुम अंडाददन्ड्रो अदु

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं, “कौन श्रीवचन भूषण के आंतरिक भाव को समझ सकता है? कौन उनके मुताबिक जीवन व्यतीत कर सकता है? ऎसा एक भी व्यक्ति ढूंढना मुश्किल है क्योंकि उनमें बहुत से कठिन नियम हैं, जो हर कोई पालन नहीं कर सकता”। हलाकि श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि ऐसा कोई मिलना कठिन है हम यह समझना चाहिए कि कुछ लोग हैं जो उन सभी आचारों सहित अपना जीवन गुज़ारते हो | ऐसे लोग श्री वैष्णवों के कुल जनसंख्या में कम प्रतिशत होते हैं 

इस पाशुर के व्याख्यान पर पिळ्ळै लोकम् जीयर् की टीका में वे यह स्पष्ट से कहते हैं कि, “केवल श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही, जो कि श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी के कृपा पात्र बने, श्रीवचनभूषण में कहे गए आचारों को समझ सकते हैं और उसका पालन भी कर सकते हैं”।

श्रीकांची प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी जो बहुत से ग्रन्थ, श्रीवैष्णव सम्प्रदाय पर आधारित लिखे हैं, इस पाशुर पर अपने टीका में कहते हैं कि हमें अपने जीवन को श्रीवचनभूषण के सिद्धान्तों के अनुसार चलना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि उसमें एसे सिद्धांत हैं जैसे:

  • सूत्र ४५५

वैवाहिक जीवन में विषय भोग लेना (जैसे शास्त्रों में इसके लिये कुछ नियम हैं कि कब और कैसे यह प्राप्त करें) शास्त्रों ने मना नहीं किया है और वह किसी को नरक ले जाने के लिये मार्गदायी नहीं है। परन्तु यह आत्म स्वरूप विरोधी है (कोई भी शारिरिक विषय भोग त्यागना) और क्योंकि हमारे पूर्वाचार्यों ने इसे केंन्द्रित नहीं किया और क्योंकि वह हमारे अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) के लिये विरोधी है, इसे त्यागना चाहिए।

  • सूत्रं ३६५

जब कोई हमारे खिलाफ अन्याय करे तो उनपर हमें यह सारी भावनाएँ होना चाहिए:

  • सहनशीलता उसी क्षण जैसे को तैसा नहीं करना।
  • कृपा भगवान की प्रतिक्रिया पर चिंता करना, क्योंकि भगवान भागवत अपचार के लिये योग्य शिक्षा देंगे, यानि, भगवान से, दोषी के लिये, क्षमा मांगते प्रार्थना करना।

  • हँसीक्योंकि वो हमारे सांसारिक लाभ में बाधा डाल सकता है मगर उन लाभों में हमारा केंद्र नहीं है ( आत्मा का हित ही हमारा सर्वत्र केंद्र है ) | इन सांसारिक लाभों से हमें कुछ लेना देना नहीं है | इसलिए उनके होशियारी पर हंसकर शत्रुता को समाप्त करना चाहिए।

  • आनन्ददोषी केवल हमारे शरीर को दुख पहुँचाता है, जिस शरीर को हम अपना दुश्मन समझते हैं, इसीलिये हमें यह सोचकर खुश होना चाहिए कि वह हमारे उपर कृपा ही कर रहा हैं।

  • कृतज्ञहमें हमारे दोष को याद दिलाने के लिए और यह याद दिलाने के लिए कि इस लीला विभूति से हम अलग होना निश्चय है कृतज्ञता प्रकट करना चाहिए।

उनके इस जीवन काल के आधार पर, हम यह देख सकते हैं कि कैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इन गुणों के सारसंग्रह थे। उनके जीवन के अनमोल चरित्र के कुछ उदाहरण अब हम देखेंगे :-

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो कि श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के अवतार थे, हमें यह बताये कि हमें अपने आप को कैसे श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के चरण कमलों पर समर्पित करना चाहिए| आलवार तिरुनगरी में भविष्यत् आचार्य सन्निधी में उनकी पूजा करते, यतिराज विंशति, आर्ति प्रबंध, आदि लिखकर हमें यह सिखाया कि निरन्तर श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के बारें में चिन्तन करते रहना चाहिए

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीशैलेश स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार किये और अपना पूरा जीवन उनके आचार्य के निर्देशानुसार ही रहे। वह श्रीभाष्य केवल एक बार उनसे पढ़े परन्तु अपना सारा जीवन अरुलिचेयल पड़ने और उसके मतलब समझने में ख़र्च किया। वह एक अद्वितीय संस्कृत और वेदों के विद्वान थे परन्तु उन्होंने वेदों को हमेशाअरुलिचेयल के जरिये ही समझाया।

  • उनकी दिनचर्या जो एऱुम्बि अप्पा ने बनायी, उसमे कहा है कि, “श्रीवरवरमुनि स्वामीजी हर समय द्वय मंत्र का अनुसंधान करते रहते थे और उनका हृदय हमेशा तिरुवायमोली के बारे में ही सोचता रहता था”।

  • एक बार आल्वार तिरूनगरी में जब कुछ दुरात्मा लोगों ने उनके मठ में आग लगाया था, तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने राजा को उन्हें माफ करने के लिये कहा और उन लोगों पर भी कृपा किये जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना दुश्मन समझते थे।

  • एक बार जब ऊत्तम नम्बी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अपराध किया तो, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वहाँ से चुपचाप निकल गयेवह ऊत्तम नम्बी को एक शब्द भी नहीं बोले।तब श्रीरंगनाथ भगवान ने ऊत्तम नम्बी को यह दिखाया कि, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और कोई नहीं बल्कि साक्षात आदिशेष हैं।

  • जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीरंगम में यह पता चला कि, उनके कुछ शिष्य दूसरे आचार्यों का सम्मान नहीं कर रहे हैं, तब उन्होंने कालक्षेप करना छोड दिया और उन्होंने अपने शिष्य से कहा, पहले अन्य आचार्यों का सम्मान करें फिर उनसे कालक्षेप सुनें।

  • एक बार कुछ किसान श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को कच्चा पदार्थ दे रहे थे, तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह जानकर कि वे किसान अवैष्णव हैं, तुरन्त हीं उस भोजन को लौटा दिया। वह अवैष्णवों के साथ सम्बन्ध नहीं रखते थें।

  • एक बार एक बूढ़ी औरत एक रात के लिये उनके मठ में ठहरने की अनुमति माँगी तो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने उसे साफ मना कर दिया, कि यह उनको स्वीकारनीय नहीं है। कुछ ऐसा था सांसारिक विषयों के प्रति उनका वैराग्य |

  • श्रीकांची प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी जो एक बहुत बडे विद्वान थे, एक बार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से मिलने आये | उस समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति पर व्याख्यान कर रहे थे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वेदों, अरुलिचेयल और पूर्वाचार्यों के व्याख्यान पर विशेष ज्ञान और अद्वितीय पकड को देखकर अण्णा चकित रह गये और उसी समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बन गये।

  • श्रीरंगम में बहुत से आचार्य पुरूष, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को ही अपना आचार्य मान लिये, हालकि वह पहले से ही आचार्य वंश में जन्म लिये हो।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपना सारा जीवन पूर्वाचार्यों के व्याख्यान ढूंढने में बिताया, उनका लेख तैयार किया, उनको अनुसंधान किया और अपने शिष्यों को सिखाया। अपने वृद्धावस्था में भी ताड के पत्तों पर, दूसरों की भलाई के लिये लिखते थे।

  • उनकी सच्चाई बेमिसाल थी, जिसके कारण उन्हें यह नाम मिलापोय इल्लाद मनवाल मामुनि

  • उनकी शास्त्र और भाषा पर पकड बेमिसाल थी, जिसके कारण उन्हें यह नाम मिलाविसद वाक् शिकामनी। रहस्य ग्रन्थों पर उनके टीका बहुत ही विशेष थी और उन टीकाओं के बिना उन रहस्य ग्रन्थों के मतलब को समझना नामुमकिन है।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के श्रीसहस्त्रगीति के प्रचार के बिना, श्रीसहस्त्रगीति के तत्त्व को जानना और समझना नामुमकिन है।

  • उन्होंने कभी भी पूर्वाचार्यों की निन्दा नहीं की, हालकि जब एक ग्रन्थ में दुसरे ग्रन्थ के विरुद्ध विचार होते फिर भी वे कभी भी एक पर प्रकाश डालकर दूसरे विचार को नीचे नहीं दिखाया | वे ज्यों का त्यों लिख देते हैं

  • उनमें इतना नैच्य अनुसन्धान था कि, उन्होंने श्रीरंगम और आलवार तिरूनगरी दोनों जगह में कभी भी अपने अर्चाविग्रह का उत्सव मनाने की आज्ञा नहीं दी, ताकि सभी भागवतों का ध्यान, भगवान श्रीमन्नारायण और श्रीशठकोप स्वामीजी पर ही केंद्रीत रहें। उन्होंने बहुत हीं छोटे अर्चा विग्रह बनाने की आज्ञा दी और यह निश्चय किया कि उनके अर्चाविग्रह का कोई शोभायात्रा न हो।

इसके साथ साथ, भगवान श्रीमन्नारायण जो अपने पिछले अवतार के आचार्यों से संतुष्ट नहीं थे (रामावतार में वशिष्ठ / विश्वामित्र , कृष्ण अवतार में संदीपानी, आदि) यह स्थापित किया कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही सबसे उत्तम और निपुण आचार्य हैं। नमपेरुमाल की यही श्रेष्ठ इच्छा/उपाय थी कि उनको भी उनके आचार्य का ही नाम मिले। इसीलिए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को यह आज्ञा दी कि, वह एक वर्ष तक तिरुवरंगम में उनके सन्निधी के सामने, श्रीशठकोप स्वामीजी से विरचित श्रीसहस्त्रगीति का प्रवचन करें। और तब तक उन्होंने अपने नित्य समस्त उत्सवों को रोक दिया और वह दिव्य पत्नियों (श्रीदेवी और भूदेवी) सहित एक वर्ष तक श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का प्रवचन सुनें।

आणि तिरुमूलम के दिन [ कालक्षेप के अंतिम दिन ], साटृमुरै के समय, भगवान एक छोटे बालक के रूप में प्रकट होकर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सामने आकर उनके लिये यह तनियन अर्पण किया (जैसे एक शिष्य अपने आचार्य के लिये करता है)

श्रीशैलेश दयापात्रं धीभकथ्यादि गुणार्णवम् ।

यतींद्र प्रवणं वन्दे रम्यजामातरं मुनिम् ॥

यहाँ, भगवान कहतें हैं कि, “मैं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की पूजा करता हूँ जो कि अ) श्रीशैलेश स्वामीजी के कृपा पात्र हैं, ) ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, आदि के सागर हैं और इ) जिन्हें श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के प्रति असीम प्रेम है”।

उन्होंने यह आज्ञा की कि अरुलिचेयाल अनुसंधान के शुरू और अंत में, इस तनियन को सभी दिव्यदेशों के मंदिरों में, अन्य दिव्य क्षेत्रों में, मठों में और तिरूमाली में अनुसंधान करना चाहिए। और यह आज भी देखा जा सकता है, जहाँ भी हम जाये अरुलिचेयाल अनुसंधान के समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की स्तुतियाँ सुन सकते हैं।

इस तरह श्रीरंगनाथ भगवान नें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शन कियाजो उनके अपने ही ओरोरुवर पसुरम के उचित उदाहरण माना जा सकता है, इसिलिये उन्होंने

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य चुना।

  • उन्होंने अपने आचार्य का नाम रखा क्योंकि हर एक शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य का नाम रखे।

  • उन्होंने सब कुछ छोडकर अपने आचार्य से भगवद् विषय सीखा।

  • उन्होंने सारे लोगों के सामने अपने आचार्य को एक तनियन प्रस्तुत किया और यह आज्ञा दिया कि यह तनियन सभी जगह गाया जाये (यह कहा गया है कि एक शिष्य अपने आचार्य की स्तुति सभी के सामने करें)

  • उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को शेष पर्यंकम आचार्य सम्भावना के रूप में प्रदान किये। (आज भी हम यह देख सकते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही एक ऎसे आचार्य हैं जिनके अर्चा विग्रह में शेष पर्यंकम  है )

  • नमपेरुमाल तिरुवरंगम में, (आज भी) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का तिरूवध्यायन महोत्सव करते हैं (क्योंकि यह एक शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने आचार्य का तीर्थ उत्सव करें)। इस दिन (माघ महीने कृष्ण पक्ष द्वादशी) श्रीरंगनाथ भगवान के अर्चक, परिचरक, आदि श्रीरंगनाथ भगवान के सामाग्रि (चमर, वट्टिल, कुदै, आदि) के साथ आते हैं और श्रीरंगम के श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सन्निधी में उत्सव मनाते हैं। भगवान खुद भी उस दिन अपने आचार्य के प्रति सम्मान के कारण भोग्य वस्तु जैसे सुपारी, पान आदि नहीं पाते

इस तरह हम अपने पूर्वाचार्यों के जीवन से यह समझ सकते हैं कि यह सिध्दान्त काल्पनिक नहीं है। हम यह भी देख सकते हैं कि उन्होंने कैसे अपना जीवन गौरव, प्रामाणिकता और सम्पूर्णता के साथ बिताया। उन्होंने यह सब कुछ हमारे भविष्य की पीढ़ी के लाभ के लिए और उनको समझकर उनका पालन करने के लिये दस्तावेज बना कर रखा है। यह भगवान की निर्हेतुक कृपा ही है कि हम मनुष्य योनि में जन्म लिये हैं और उसमें भी श्रीवैष्णव परिवार में, और वह भी थोडी सी बुद्धि के साथ इनकी मूल्यता समझ सके और इस ज्ञान रूपी धन, जो अपने पूर्वाचार्यों से प्राप्त किये, को सराह सके। हमें भगवान का सदैव ही कृतज्ञता प्रकट करना चाहिए कि उन्होंने हमें यह मौका प्रदान किया और इसी उत्साह के साथ हमें तुरन्त ही उनके इच्छाओं को अमल में लाना चाहिए और अपना समय उनके और उनके सेवकों की सेवा में व्यतीत करना चाहिए।

यह श्रृंख्ला अब समाप्त हो रहा है | अगले लेख में हम , अब तक किये गए चर्चाओं की सारांश देखेंगे और इस श्रृंख्ला को समाप्त करेंगे |

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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प्रमेय – http://koyil.org
प्रमाण  – http://granthams.koyil.org
प्रमाता – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा / बाल्य पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्री वैष्णव लक्षण – ११

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग)

4. pl-goshtiश्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी – कालक्षेप गोश्टि

पिछले लेख में हमने सामान्य निर्देश देखे कि कैसे एक श्रीवैष्णव इस संसार में रहकर अपना जीवन काल बिताये। अब हम श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के श्रीवचन भूषण, जो एक दिव्य शास्त्र है, में देखेंगे और समझेंगे कि एक श्रीवैष्णव कि दिनचर्या कैसी होनी चाहिए।

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी श्रीवचन भूषण में भागवतों की महानता और भागवत अपचार की क्रूरता के बारें में समझाते हैं। आगे वह यह समझाते हैं कि कैसे एक श्रीवैष्णव कि दिनचर्या होनी चाहिए। अब हम उन्ह सुत्रों को देखेंगे जो हमारे पूर्वाचार्यों के सारे तत्वों का सार है।  

  • इस शोकार्त संसार में रहते हुए हमें हमेशा इस बात पर क्याल रखना चाहिए कि :- 

  • हमारा शरीर ही हमारे आत्मा का सबसे बड़ा और खतरनाक दुश्मन है क्योंकि यह हमारे अहंकार का मुख्य कारण है (स्व स्वांतन्त्रियम) और हमारे इस सान्सारिक जीवन के प्रति प्रेम का प्रभाव है।

  • सांप के जैसे हम सांसारिक मनुष्यों से भी डरना चाहिए। क्योंकि यह हमारे सांसारिक मोह को जागृत करेंगे और जिसके कारण हम इस संसार कि मायाजाल में और दफ़न हो जायेंगे।

  • श्रीवैष्णव ही हमारे सच्चे आत्मबन्धु हैंक्योंकि वही हमें इस सांसारिक मोह से बाहर निकलने में मदद करेंगे और भगवद् विषयों में रुचि बढायेंगे।

  • भगवान ही हमारे परमपीता हैंक्योंकि वह हमेशा हमारे आत्मा के हित के बारें में सोचते और करते रहेंगे।

  • आचार्य हम जैसे ज्ञान-रिक्त भूखे इनसान के भोजन के बारें सोचते हैंक्योंकि हम लोग ज्ञान के भूखे हैं और सिर्फ आचार्य ही हमें यह ज्ञान प्रधान कर सकते हैं।

  • शिष्य वह हैं जिसे हम बहुत प्रेम करते हैंक्योंकि शिष्य के साथ हम भगवद् विषयं बांट सकते हैं और वह भगवद विषयों के रस का आनंद लेता है और हमें भी भगवद् विषयं में आनन्द दिलाता है।

  • यह सब दिमाग में रखकर, हमें यह सोचना है:

  • अहंकार हमें हमारे सच्चे शुभचिन्तकों (श्रीवैष्णवों) जो हमारे आत्मा के शुभचिन्तक हैं, उनसे दूर ले जाता है और अलग कर देता है।

  • यह सांसारिक धन हमें अवैष्णवों से जोड़ता है जिस समय हम धन के पीछे भागना शुरू करेंगे, हमें सभी के आगे झुकना पढेगा और उन अवैष्णवों का कृपा पात्र बनना पढेगा। इस परिस्थिती में, हम उन अवैष्णवों के कृतज्ञ हो जायेंगे (वो जो भी कर रहा हो उसमे निपुण ही क्यों न हो)- परन्तु एसी कृतज्ञता हमारे लिये हानिकारक है क्योंकि वह हमें भगवद् विषय से दूर ले जाता है और हमें भी उनकी तरह काम करने के लिये मज़बूर करता है।

  • काम-वासना हमें अपने विपरीत लिंग के तरफ आकार्षित करता है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, लगाव से हमारे मन में काम पैदा होता है, काम से हमारे मन में इच्छाएँ उत्पन्न होता हैं, इससे हम पागल हो जाते हैं और हमारी अक्ल भी धीरे धीरे कम होती जाती है, और तब तक हम इस संसार के खोखल में गिर जा चुके होंगे।

  • इसको ध्यान में रखते हुए, हमें यह पूर्ण विश्वास के साथ प्रकट करना चाहिए कि, आत्म गुण किसी एक के परिश्रम से नहीं बनता है परन्तु भगवान की  कृपा से आचार्य द्वारा ही मिलता है और हमें एसे ही मिलना चाहिए।

  • सांसारिक विषयों के प्रति प्रेम, प्रभाव छोडना।

  • भगवद् विषय के प्रति प्रेम भाव प्रकट करना।

  • यह समझना शुरु करना चाहिए कि सांसारिक वस्तुएँ सच में सुखदायी नहीं हैं।

  • प्रसाद उतना ही पाये जितना अपने शरीर के लिये जरुरत है। या हमें प्रसाद लेना चाहिए क्योंकि वह तिरुआराधन का अंतिम भाग है (एक बार हम भोजन बनाते हैं और भगवान को नैवेध्य करते हैं तो वह प्रसाद बन जाता है और हमें उसे थोडा पाना ही चाहिए)

  • हम पर जीवन में कोई दुख या विपत्ति आये तो, हमें उसे खुशी से ग्रहण करना चाहिए, यह सोचकर कि                      1.  वह हमारा कर्म-फल है क्योंकि हम ने आज तक इतने सारे पुण्यपाप किये हैं कि हमें उसका नतीजा                भोगना ही पडेगा, और इससे हमारा कर्म भोग कम हो रहा है।

       2.  वह भगवान की कृपा-फल है – क्योंकि हमने हमारा सारा जीवन भगवान को समर्पित कर दिया है, वह हमारे  सभी संचित कर्म को क्षमा कर देते हैं और हमें बस थोडा सा दुख दे रहे हैं ताकि हम इस संसार के मोह से छुटकारा पाए और हम परमपद की ओर प्रस्थान करने को तरसे अगर हमें इधर थोडी सी भी अच्छी जिन्दगी   मिल जाती तो हमारे मन में इस संसार के प्रति लगाव बड़ता जाएगा। इसलिए भगवान अपनी निर्हेतुक कृपा से  हमें हमारे कर्मानुसार थोडी तकलीफ देते हैं और हमें परमपद की ओर ले जाते हैं।

  • हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि, भगवान से मिलने के लिये हमारा अनुष्ठान ही उपाय है। हमें भगवान के निर्हेतुक कृपा को समझना चाहिए और सब उनके कैंकर्य समझकर करना चाहिए।

  • पूर्वाचार्यों और परम श्रीवैष्णवों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति प्रेम भाव बढाना चाहिए।

  • दिव्यदेशों के प्रति लगाव बढना चाहिए क्योंकि यहाँ भगवान अपने भक्तों के प्रति निर्हेतुक प्रेम के कारण वास करते हैं।

  • भगवान का मंगलाशासन करना चाहिए  यह प्रार्थना करना कि भगवान को इस भयानक सन्सार में कुछ खतरा न हो क्योंकि आजकल हम यह देखते हैं कि बहुत से मंदिरों में भगवान की मूर्तियाँ चोरी हो जाती हैंऔर हमें यहीं प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान हमेशा सुरक्षित रहें। यह भगवान के प्रति सबसे महत्वपूर्ण भक्ति भाव है जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, श्रीगोदम्बाजी, श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी, आदि ने दिखाया।

  • सांसारिक वस्तुओं से लगाव नहीं रखना चाहिए, उनसे दूर ही रहना चाहिए।

  • परमपद जाने कि मन में सच्ची मनोकामना रखेंहर रोज हम श्रीशठकोप स्वामीजी जैसे रोना चाहिए और श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी से यह पूछना चाहिए कि वह कब हमें मोक्ष देंगे ओर परमपद में भगवान का कैंकर्य करने का मौका देंगे।

  • हमें यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि हम भागवतों के प्रति मर्यादा और विनम्रता का भाव प्रकट करें और अवैष्णवों के प्रति कोई भी लगाव न रखें।

  • हमें आहार नियम (प्रसाद) का पालन करना चाहिए – नियमित भोजन की आदतें

  • वैष्णवों के साथ सम्बन्ध करने कि चाहत रहना चाहिए।

  • अवैष्णवों से सम्बन्ध करने से बचना चाहिए।

इस सूत्रं के अंत में कहा गया है कि, यह वे बातें हैं जिसे हर श्रीवैष्णवों को अपने जीवन में पालने कि आदत होनि चाहिएयह स्वैच्छिक नहीं हैं। अगर हम अपने रोज के जीवन में यह पालन करते तो, हमारे पूर्वाचार्यों ने आश्वस्त किया है कि हम एक पूर्ण श्रीवैष्णव हो सकते हैं। यह सब अपने रोज के जीवन में पालन करने के लिये (आज के परिस्थिति के अनुसार) हमें यह बहुत मुश्किल लगता है। हाँ, यह सब कुछ पालन करना मुश्किल है इसलिये हमें यह निरंतर सोचना चाहिए कि कैसे हमारे पूर्वाचार्यों ने यह पालन किया और हमारे लिए उच्च मानकों को स्थापित करके दिखाया है। परन्तु सभी को अपने जीवन में कहीं से तो शुरुआत करनी चाहिए। अगर हम लोग एक कदम बडाने की कोशिश करेंगे तो भगवान हमारी मदद जरूर करेंगे जैसे कि ऊपर कहा गया है। अगर भगवान हममे उनके प्रति थोड़ा सा भी लगाव देखते तो वे हममे उनके प्रति प्रेम की भावना को और भी विकसित कर देते हैं

यह हम सबको काल्पनिक दिखता होगा, परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों इसे पूरी तरह पालन करते थे। और हम यह सब अपने एक पूवाचार्य के जीवन में भी देख सकते हैं जो कि इन सब के लिये एक प्रतिबिम्ब थे और कैसे भगवान उनको प्रेम कर उनका सम्मान किया यह अपने अगले लेख में देखेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – १०

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णव दिनचर्या (भाग)

अब तक हमने एक श्रीवैष्णव के बाह्य स्वरूप और आंतरिक स्वरूप के बारें में देखा है। यह भी देखा है कि हमें कौन से अपचारों से बचना चाहिए। अंत में हमने यह भी देखा कि कैसे हमें दूसरे श्रीवैष्णवों को उनके जन्म को बिना ख्‍याल किए उनको सम्मान देना चाहिए।

एक बार अगर हम यह सब कुछ समझ जायेंगे, तब हमें यह देखना चाहिए कि कैसे एक श्रीवैष्णव इस संसार में रहकर अपना जीवन काल बिताये। श्रीरामानुजाचार्यजी, आल्वारों और आचार्यों ने अपने लेख और ग्रन्थों में यह बहुत ही अच्छी तरह समझाया है। इन में से कुछ बहुमुल्य बातें हम अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों से देखेंगे :-

श्रीकृष्ण भगवान श्रीभगवद् गीता के १०.९ श्लोक में कहते हैं :-

मद् – चित्त मद् गत प्राण बोधयन्त परस्परं
कथयनतस् च माम नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च

मेरे भक्त केवल मेरे बारें में हीं सोचते रहते हैं, मुझे अपना जीवन मानते हैं, मेरे बारें में चर्चा करने से वक्ता और श्रोता दोनो को हीं बहुत आनन्द आता है।

वेदान्तं में (बृहदारण्यक उपनिषद), यह कहा गया है कि:

आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यः मन्तव्यः निधिद्यासितव्यः

निरन्तर परमात्मा के बारें में सुनने से, जो भी सुना हो, उसके बारें में विचार करने से, परमात्मा पर ध्यान करने से, अंत में जीवात्मा परमात्मा से मिलेगा।

श्रीभागवत पुराण में श्रीप्रल्हादजी सभी को यह ९ कार्य में लगे रहने का निर्देश देते हैं:

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद -सेवनम
अर्चनं वन्दनं सख्यं दास्यं आत्म -निवेधनम

भगवान के बारें में सुनना, भगवान पर भजन करना, उनके बारें में ही सोचना/विचार करना, उनके चरण कमल की सेवा करते रहना, उनकी पूजा करना, उनकी प्रशंसा करना, उनके दोस्त बनकर रहना, उनके दास बनकर रहना और पूरी तरह उनके चरण कमल पर आत्मसमर्पण करना, यही एक भक्त के मुख्य कार्य हैं।

श्रीशठकोप स्वामीजी, जिनको आळवन्दार श्रीवैष्णव कुलपति कहते थे, पेरिय तिरुवन्दादि के ८६वें पाशुर में पूछते हैं कि:

हम इस संसार में, जो कि पूरी तरह दुखों से भरा है, बिना भगवान के बारें में सोचे, कैसे अपना समय बितायेंगे? जो कि सुन्दर सावंले वर्ण लिए हुए , एक हाथ में पांचजन्य लेते हुए , सबको अपने जठर में रखे सबकी रक्षा करते हुए , आदिशेष में लेटे हुए उस पुरुषोत्तम के बारे में बिना सोचे कैसे जीवन काल बिता सकते हैं ? ऎसी ही दशा आल्वारों की है, जो कि एक पल के लिए भी , भगवान के बारें में न सोचने का खयाल नहीं कर सकते हैं और दूसरी तरफ, हम सांसारिक लोग यह सोचते हैं कि, हम बहुत से काम कर सकते हैं, परन्तु कोई हर वक्त भगवान के बारें में ही कैसे सोच सकता हैं?

श्रीभक्तिसार स्वामीजी, नान्मुगन तिरुवन्दादि के ६३वें पाशुर में यह कहते हैं:

वह कहते हैं कि वह अपना समय भगवान के बारें सोचने और विचार करने में, उनके बारें में लिखने में, उनके बारें में पढ़ने में, दूसरों से उनके बारें में सुनने में , बिना घमण्ड के उनकी पूजा करने में और उनकी तिरुआराधन करने में लगाते हैं।

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण के २७४वें सुत्र में कहते हैं कि एक सच्चे शिष्य जो अपने आचार्य पर पूरी तरह निर्भर है, उसके लिए :-

  • रहने कि जगह वह है जहाँ उसके आचार्य रहते हैं (अगर वह सम्भव नहीं हैं तो जहाँ भगवान रहते हैं) ।

  • बोलने का विषय केवल अपने आचार्य की महिमा और अपना दोष।

  • अनुसन्धान करना – गुरू परम्परा और द्वय महामंत्र के वाक्य को गाना और अनुसन्धान करना।

  • अपने पूर्वाचार्यों के निर्देश और इतिहास को अपनाना।

  • अवैष्णवों के सहवास का परित्याग करना और ना ही किसी भी गतिविधि प्रदर्शन करें जिससे अवैष्णवों को यह विचार प्रकट हो जाए कि हम उनमे से एक हैं

  • कर्तव्यं आचार्य कैंकर्यं भगवद् कैकर्यं” – आचार्य, भगवान और उनके भक्तों की सेवा करना।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अपने आर्तिप्रबंध में (श्रीरामानुजाचार्यजी से रोते हुए तुरन्त उन्हें इस संसार के दुखों से मुक्त करने के लिये कहते हैं), विस्तार से अपने कर्तव्यों को २८वें पाशुर में बताते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी हालाकि श्रीरामानुजाचार्यजी के हीं पुनरवतार हैं, परन्तु वें हमेशा श्रीरामानुजाचार्यजी की प्रशंसा करते रहते थे ताकि हम भी उनसे सीख लें। जिस तरह त्रेता युग में श्रीरामजी ने श्रीरंगनाथ भगवान कि पूजा करके हमें तिरुवाराधन का क्रम सिखाया था उसी तरह सिर्फ श्रीरामानुजाचार्यजी पर निर्भर रहकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने हमें सिखाया कि कैसे कोई श्री रामानुजाचार्य के चरण कमलों में निःसन्देह भरोसा रख सकते हैं

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि, उन्होंने पूर्वाचार्यों के सभी ग्रन्थों को ढूढा जो मुसलमान शासन के दोरान घुम गयी या दुसरों में बांट दी गयी थी और एकत्रित किया। इन ग्रन्थों को हमारे पूर्वाचार्यों ने अपार करूणय से हमारे ही हित के लिये लिखा है। जो भी ग्रन्थ उन्हें मिल गयी, उसको उन्होनें ताड के पेड के पत्तों पर लिखा, अपने आचार्य तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) से वह सब सीखे और उनके ही निर्देशानुसार अपना जीवन बिताया और अपने शिष्यों को भी एसे हीं जीवन बिताने का आदेश दिया।

आगे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि, अपने आचार्य श्रीशैलेश स्वामीजी के द्वारा श्रीरामानुजाचार्यजी कि कृपा मिलने के पहले, उन्हें परमपद जाने कि कोई इच्छा नहीं थी, परन्तु एक बार जब उन पर कृपा हो गयी तब कभी भी एक क्षण भी परमपद जाने के सिवा और कोई इच्छा नहीं है।

इस तरह हम देख सकते हैं कि हमें अपना जीवन कैसे बिताना चाहिए। हालाकि यह सब साधारण तत्व हैं, आगे हम श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के श्रीवचन भूषण में से एक विशिष्ट सूत्र देखेंगे जिसमे श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी संक्षिप्त रूप से वर्णन देते हैं कि एक श्रीवैष्णव को किस ढंग से रहना चाहिए।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

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श्री वैष्णव लक्षण – ९

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

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श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग)

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पिछले लेख में हमने श्रीपिळ्ळैलोकाचार्यजी के काम (जो कि आचार्य और पूर्वाचार्य के काम पर आधारित है) से यह देखा कि, किसी के जन्म के आधार पर एक श्रीवैष्णव महान नहीं बनता है। परन्तु भगवान के प्रति उसके ज्ञान और भक्ति पर ही उसकी महानता निर्भर करता है| यही तात्पर्य अपने आचार्यों के द्वारा भी सम्मानित किया गया है।

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी के छोटे भाई श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी हमारे सम्प्रदाय के एक बहुत ही महान आचार्य थे। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी और श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् दोनो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) (श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी के खास शिष्य) के पुत्र हैं। दोनो भाई बचपन से ही श्रीरंगम के गलियों में घूमते थे जैसे श्रीरामजी और श्रीलक्षमणजी (इलयाल्वार) अयोध्या में और बलरामजी और श्रीकृष्ण गोकुल में घूमते थे। दोनों भाइयों ने नैष्टिक ब्रह्मचर्य का पालन करने की शपत ली थी ताकि वे पूरी तरह से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के लिए प्रतिबद्ध हो जाए| श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी के कृपा से जन्म लिये और और अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् नमपेरुमाल की कृपा से जन्म लिये। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने मुख्यता “अष्टादश रहस्य” (१८ रहस्य ग्रन्थों की रचना की) और श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने बहुत सुन्दर और विस्तार रूप से तिरूप्पावै, कन्नीणु चिरूताम्भु, अमल आदि पिराण, आदि ग्रन्थों पर टीका लिखी। उन्होंने “आचार्य हृदयं” (श्रीवचनभूषण को समझाती ग्रन्थ) और अरुळिचेयाल रहस्यं (बहुत हीं सुन्दर तरीखे से आल्वारों के पाशुरों से सही मतलब लेकर रहस्यत्रय पर टीका) लिखी।

आचार्य हृदयं (आचार्य= श्रीशठकोप स्वामीजी, हृदयं= तिरूवुल्लम) के आगमन के पहले का इतिहास हमें समझना चाहिए जैसे यतिन्द्र प्रवण प्रभावं (एक दस्तावेज जो ५०० साल पुराना हैजो श्रीकलिवेरिदास स्वामीजी से लेकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तक सबका जीवन चरित्र देता हैं में समझाया गया है। जब श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने श्रीवचनभूषण को पढाना शुरू किया जो हमें सहस्त्रगीति के मूल तत्त्व के बारे में समझाता है, कुछ लोग श्रीरंगम में श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी की सफलता सहन नहीं कर पाये, उन्होंने नम्पेरुमाल से शिकायत की, तब नम्पेरुमाल ने अपने प्रतिनिधि को भेझकर श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी को अपनी सन्निधी में बुलायालेकिन तब श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी स्नान कर रहे थे तो श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने उनके निमित्त मंदिर में गये। और जब नम्पेरुमाल ने श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी से पूछा कि क्या बात है, तब श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी उनके सामने आचार्य हृदय गाना शुरू कर दिया, (उसी तरह जैसे श्रीभक्तांगिरेणु स्वामीजी ने श्रीरंगनाथ भगवान के सामने तिरूमालै गाया) जो आगे श्रीवचनभूषण के अन्दर के मतलबो को और मज़बूती प्रदान किया। यह सुनकर भगवान इतने आनन्दित हुए कि उन्होंने आज्ञा दिया कि श्रीअळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी को उनके तिरुमालिगै (घर) तक ब्रम्ह रथ में ले जाए। यह सारी बातें सुनकर श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी भी बहुत खुश हुए कि भगवान ना ही ग्रन्थ को सुनकर आनन्दित हुए बलकि ग्रन्थ को पुष्टता के साथ अंगीकार किया। जब नम्पेरुमाल ने स्वीकार कर लिया तो और कौन उसे बदल सकता है?

इस सुन्दर ग्रन्थ आचार्य हृदय में, ८५वें चुर्णिका में, नायनार् समझाते हैं कि कौन अच्छी तरह श्रीवैष्णवों का महत्व समझ सकता है। यह चुर्णिका इस तरह रची गयी हैं कि बहुत सी घटनाये दिखायी गयी है और नायनार् स्वामीजी कहते हैं कि जो इन घटनाओं के तत्व को समझ सकता है वही अच्छी तरह श्रीवैष्णवों का महिमा समझ सकता है (कि उच्च जन्म और नीच जन्म क्या हैं)

इसी अर्थ को समझने के लिए आगे और कुछ उदहारण देखेंगे :-

  • भगवान कहते हैं कि उनके सच्चे भक्तों में आठ गुण होना चाहिए और अगर हम देखते हैं कि एक मलेच्छ जाती के आदमी (वह जो कि वर्णाश्रम धर्म में नहीं आता) में भी अगर वह आठ गुण हैं तो उसे हमें भगवान के समान समझना चाहिए (हमें उन्हें भगवान से भी ज्यादा सम्मान और उनकी सेवा करना चाहिए) यानि उनकी पूजा करनी चाहिए, उनका श्रीपादतीर्थ और उनका शेष प्रसाद लेना चाहिए। आठ गुण हैं:

  • भगवान के भक्तों में बेशर्त प्रेम।

  • भगवान की पूजा का आनन्द लेना।

  • भगवान की पूजा खुद करना।

  • अहंकार रहित रहना।

  • हमेशा भगवान के बारें में सुनने में लगाव रहना।

  • जब भी भगवान के बारें में सुनते, सोचते, बोलते हैं शारीरिक बदलाव लाना (गद्गद् होना)

  • हमेशा भगवान के बारें में हीं सोचना चाहिए ।

  • भगवान से पूजा और भक्ति के बदले में कुछ भी सांसारिक वस्तु नहीं मांगना।

जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • नमपाडुवान (जिन्होंने तिरूक्कुरुन्गुडी के मलैनम्बी के लिये कैसिका राग गाया और तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) और श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी से तुलना की क्योंकि दोनों ने भगवान के लिये तिरुपल्लीएलुच्ची गाया ) जिन्होंने एक उच्च कुल में जन्म नहीं लिया, एक ब्राम्हण को केवल अपने गानों से ब्रम्ह राक्षस (एक ब्राम्हण जिसने यज्ञ के दोरान अपने अव्यवहारिक तरिके से मंत्र का उच्चारण किया और वह राक्षस बन गया) के शाप से मुक्त किया। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • निषाध (गुहन) एक किरात के घर में जन्म लिया परन्तु वह भगवान श्रीराम से बहुत स्नेह करता था जब भगवान श्रीराम रात्री में शयन कर रहे थे तब भगवान श्रीराम के प्रति प्रेम भावना के कारण उसने श्रीलक्ष्मणजी पर शंका की। इसलिये उसने पूरी रात जागकर लक्ष्मणजी पर निग्रानी रखी। और जब श्रीभरतजी (उन्हें श्रीराम और श्रीलक्ष्मणजी के गुणों के बारें में पहले ही पता है ) गुहन से मिलते हैं, तब गुहन उन्हें लक्ष्मणजी की श्रेष्ठता समझाते हैं, जैसे कि श्रीभरतजी को कुछ मालुम ही नहीं है। और यह सुनकर श्रीभरतजी इतने खुश होते हैं कि वह भी उन्हें श्रीराम कि तरह अपना भाई मान लेते हैं। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • भगवान श्रीराम ने शबरी माता (जिसने एक किरात के घर में जन्म लिया) जो श्रीराम से बहुत लगाव रखती थी और एक आचार्य निष्ठावान थी, उनके दिये हुए जूठे फल खाते हैं; भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीविदुरजी के घर प्रसाद पाया ना कि भीष्म, द्रोण, आदि के घर; जब भगवान श्रीरामजी को पता चला कि श्रीहनुमानजी (जो एक पशु हैं) सीता माता से मिलकर आये हैं तब उन्होंने श्रीहनुमानजी को आलिंगन किया। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • धर्मपुत्र भगवान श्रीकृष्ण (जो एक ब्राह्मण कुल से नहीं थे) को सबसे पहले मर्यादा देते हैं, पेरुमबुलियूर अडिगल ने सबसे पहले श्रीभक्तिसार स्वामीजी को मर्यादा दिया, जो एक लकडी काटने वाले के यहाँ बडे हुए। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • धर्मपुत्र श्रीविदुरजी की चरण सेवा करते हैं; भगवान श्रीजटायुजी की चरण सेवा करते हैं; श्रीमहापूर्ण स्वामीजी श्रीमारनॆरि नम्बी स्वामीजी कि चरण सेवा करते हैं। जो भी यह सब कुछ समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा।

  • जो भी अच्छी तरह यह तीन चरित्रों को समझ सकेगा वह अच्छी तरह उच्च और नीच जन्म के बारें में समझ सकेगा:

  • श्रीवेंकटेश भगवान ने तिरुमाला के पुष्प मण्डप में कुरुंबरुथ्था नम्बि से मिट्टी के पुष्प स्वीकार किये जो चक्रवर्ती राजा थोन्डैमान से पूजे जाते थे।

  • कांचीपूरम के त्याग मण्डप में पॆरारुळळन तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से पंखी का कैंकर्य स्वीकार किये जो कि श्रीरामानुजाचार्य द्वारा पूजे जाते थे।

  • श्रीरंगं के भोग मण्डप में श्री स्वामी रंगनाथभगवान श्रीयोगीवाहन स्वामीजी से वीणा का कैंकर्य स्वीकार किये जो कि श्रीलोकसारंग मुनि द्वारा पूजे जाते थे।

उपर बताये गये उधाहरण से, नायनार् स्वामीजी ने यह स्थापित किया कि, अगर किसी व्यक्ति में ज्ञान, भक्ति और अनुष्ठान हो तो उस व्यक्ति को सम्मानीत करना चाहिए, यह नहीं देखना चाहिए कि वह किस कुल में जन्म लिया है।

अगर हम अपने पूर्वाचार्यों के इतिहास को देखे, १५०२०० साल पहले भी, तो हमें यह ज्ञात होता है कि उनके नियत भाव उच्च था। और यह केवल काल्पनिक नहीं बल्कि यह सब उन्होंने अपने जीवन में उतारा भी था और यह सब हम इतने बहुत से उधाहरण में देख भी सकते हैं और उनके ग्रन्थों में भी चर्चा किया गया है। अगर हम में भी यह इच्छा हो तो, हम भी अपने जीवन में थोडा तो पालन कर सकते हैं। और यह हमेशा दो रास्ते कि गलिया हैं। यह नहीं कि एक वर्ण के लोग दूसरे पर हावि हो गये हैं। हमारे पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में ऎसे बहुत से घटानाएँ देखी जा सकती है। सभी को अपनी जगह पता थी और सभी एक दूसरे को सम्मान भी किया करते थे। और अगर हम भी यह सदाचार हमारे जीवन में उतारेंगे या पालन करेंगे तो हमारा भविष्य भी उज्जवल हो जायेगा। हम यह सब होने के लिये भगवान, आल्वारों और आचार्यों के सामने रोकर या प्रार्थना करके कर सकते हैं।

अब जब कि हम यह सब कुछ देख चुके हैं और एक मुख्य विषय की ओर चलते हैंश्रीवैष्णव दिनचर्या। कैसे एक श्रीवैष्णव अपनी रोज कि जिन्दगी में आचरण करें? वह अगले लेख में चर्चा करेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

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श्री वैष्णव लक्षण – ८

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

<< पूर्व अनुच्छेद

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श्रीवैष्णवों की श्रेष्ठता को समझना – (भाग)

पिछले लेख में हमने कई विशय के अपचारों के बारें में चर्चा की थी| हर एक श्री वैष्णव को इन अपचारों से बचने में ध्यान देना चाहिए। उन सभी अपचरों में हमारे पूर्वाचार्यों, श्रीवैष्णवों को उनके जन्म के आधार पर भेद–भाव करना / अनादर करना, सबसे क्रूर अपचार मानते हैं|  हालाकि हमें जन्म के आधार पर भेद भाव नहीं करना चाहिए , परन्तु हमें वर्णाश्रम के धर्म को सम्मान देना चाहिए। यह एक पतली रस्सी पर चलने का समान है। एक उधाहरण इस बात को समझने में हमें मदद करेगा। एक बडे सन्स्थान में एक मालिक है और एक मजदूर है, दोनों इन्सान होने के कारण दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए, परन्तु अगर वह मजदूर उस मालिक की कुर्सी पर बैठे तो वह उस संस्थान में स्वीकार नहीं किया जायेगा हालाकि उस संस्थान में सभी को बराबर माना जाता है। इसी तरह की बात भागवत अपचार में समझायी गयी है कि एक श्रीवैष्णव को वर्णाश्रम का सम्मान करना चाहिए और वह उस में अच्छी तरह बंधा है।

हमारे पूर्वाचार्यों के शास्त्र के आधार पर इस विषय के तात्पर्य को, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने अपने ग्रन्थ श्रीवचन भूषण में और अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् ने अपने ग्रन्थ आचार्य हृदयं में समझाए हैं। उन्होंने सिर्फ आल्वारों और पूर्वाचार्यों के विचारों को दस्तावेज बनाया।

एक सामान्य गलत फहमी हैं कि, चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र) में ब्राम्हण ही सबसे उच्च वर्ण है और शूद्र ही सबसे नीच वर्ण है। परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों के कुछ अलग ही सोच विचार थे। इसे हम अब कुछ विस्तार से देखेंगे।

हमारे पूर्वाचार्यों ने यह अच्छी तरह स्थापित कर दिया कि वैदीह (वह जिसने वेद और प्रमाण को स्वीकार किया) वो होते हैं जो विष्णु परत्व को समझते और मानते हैं (सिध्दान्त अलग भी हो सकते हैंअदवैत, द्वैत और विशिष्टाद्वैत) । परन्तु अगर वो वैदीह बिना शास्त्र के मूल तत्त्व को समझे उसे पड़े या जपे तो, पढनेवाला उस शास्त्र का सही उपयोग नहीं कर रहा है। इस तरह के व्यक्ति जो शास्त्र पढकर भी विष्णु परत्व को स्वीकार नहीं करते हैं उन्हें १) केसर को ले जाने वाली गधे ( गधे केसर का मूल्य कभी नहीं जानती) । २) शव के उपर सजावट (क्योंकि उसमें आत्मा नहीं होती हैं इसलिये वह काम कि नहीं हैं)। ३) विधवा को सजाना – इनके समान समझा जाता हैं।

एक श्रीवैष्णव को, उसका शारीरिक जन्म मोक्ष का आशीर्वाद देने के लिये एक तुच्छ मात्र भी नहीं है। यह मोक्ष तो हमें सिर्फ श्रीरामानुजाचार्यजी के सम्बन्ध मात्र से ही मिल सकता है। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने दो बातों को स्थापित की है – “उत्कृष्ठमाग ब्रमित जन्मं(गलत फैहमी से उच्च जात माना जाता है) और “अपकृष्ठमाग ब्रमित जन्मं(गलत फैहमी से तुच्छ जात माना जाता है)। वह आगे समझाते हैं कि ब्राम्हण/ क्षत्रीय/ वैश्य (जिने उच्च कुल समझा जाता है) असल में असुरक्षित कुल हैं क्योंकि इस जाती में पैदा होने वालों को उपायान्तर जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग में भाग लेने की शिक्षा दिया जाता है। और दूसरी कमी यह है कि यह जन्म हममे अहंकार पैदा करता है और हमें नैच्यानुसन्धान का अभ्यास करने नहीं देता है। परन्तु यह दो दुष्परिणाम गलती से नीच जाती माने गए कुल में देखने नहीं मिलता है। इसलिये अंत में यह निर्णय किया जाता है किवह जन्म जिसमें यह दोनों (उपायान्तर और अहंकार ) कमियाँ दूर होती है वही सर्वोत्तम है।

और जो उच्च कुल (माने गए) में जन्म लेते हैं उनके भी यह दो (उपायान्तर संबंध और अहंकार) कमियाँ एक श्रेष्ठ श्रीवैष्णव अधिकारी के सत-संबंध से ही दूर होता है। श्रीरंगनाथ भगवान ने श्रीलोकसारंगमुनि से श्रीयोगीवाहान स्वामीजी को अपने कन्धों पर उठाने को कहे और इस विचार को स्थापित किया है।

नीचे दिए गए पासुरों से आलवारों ने उन श्रेष्ठ श्रीवैष्णवों के निर्मल गुणों की स्तुति की है –

  • पयिलुं चुडरोळि (तिरुवैमोलि २.)

  • नेडुमार्कु अड़ीमै (तिरुमोलि ८.१०)

  • नण्णाथ वलावरुणर (तिरुमोलि २.)

  • कन्सोरा वेंगुरुति (तिरुमोलि ७.)

  • तेट्टरुम तिरल तेन (पेरूमाल तिरुमोलि २)

  • तिरूमालै (पाशुरं ३९४३)

बहुत से पौराणिक प्रमाण श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने दिया, यह स्थापित करने के लिये कि किसी का जन्म महत्त्व नहीं है सिर्फ उनके भगवान के प्रति भक्ति ही महत्त्व है।

  • रावण विभीषण को कुल द्रोही समझता था परन्तु भगवान श्रीराम उन्हें इक्ष्वाकु वंश का अवयव समझते थे (क्योंकि वें उन्हें अपने भाई समझते थे)

  • भगवान श्रीराम ने श्रीजटायुजी (पेरिया उडयार) की चरण सेवा की।

  • धर्मपुत्र (श्रीयुधिष्टिर) ने श्रीविदुरजी की चरण सेवा की।

  • बहुत से ऋषि नियमित रुप से धर्मव्याथनजी (वह एक कसाई था) से शास्त्र की बहुत सी शंकायें दूर करने के लिये  भेंट या प्रतिक्षा किया करते थे क्योंकि धर्मव्याथनजी बहुत ज्ञानी थे।

  • श्रीकृष्ण भगवान श्रीविदुरजी (भक्ति की योग्यता) के घर गये नाकि भीष्म (उम्र और ज्ञान की योग्यता), द्रोण (जन्म और ज्ञान की योग्यता) या दुर्योंधन (अधिकार की योग्यता) के घर।

  • भगवान श्रीरामजी ने शबरीजी (वह एक किरात के घर में जन्म ली थी) के जुटे फल खाये। हमारे पूर्वाचार्यों ने उनको एक पूर्ण आचार्य निष्ठावली कहा है।

  • पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण  स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)  ने मारनेर नम्बी, जो कि श्रीयामुनाचर्यजी के शिष्य थे और बहुत बडे श्रीवैष्णव थे, की चरण सेवा की । जब श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी ने (जिन्होंने सत्य जानते हुए भी अपने आचार्य के मुख से उस बात को दुनिया वालों को समझाने के लिए) उन्हें प्रश्न किया तब पेरिय नम्बि ने बहुत से प्रमाण दिए और यह स्थापित किये कि उनका कार्य सही है और शास्त्र के अनुसार है।

और कई स्थितियों में आलवारों ने बहुत स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया की उनको उन जगहों में जन्म लेने की उत्साहता है जहाँ भगवान खुद लीलाएँ की थी, जैसे:

  • व्यास और शुक वृन्दावन में धूल बनना चाहते थे जिस पर भगवान कृष्ण और गोपियों के चरण स्पर्श हुआ था।
  • श्रीकुलशेखर आल्वार तिरुमाला में कोई भी वस्तु बनना चाहते थे (मछली, पक्षी, फूल, रास्ता, दरवाजा, आदि )
  • श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी और महारानी गोदम्बाजी ने वृन्दावन के ग्वालों के घर में जन्म लेने की इच्छा प्रकट की।
  • श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने कहा कि ब्रह्मा होने से बेहतर तो यह है की वे एक श्रीवैष्णव के घर में कीड़ा बने|

अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार् स्वामीजी आचार्य हृदयं में चूर्णिका के रुप में बहुत सुन्दर तरीके से इस तात्पर्य को समझाया है। हम अपने अगले लेख में इसी चूर्णिका के बारे में और विस्तार से चर्चा करेंगे|

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासी

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श्री वैष्णव लक्षण – ७

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्री वैष्णव लक्षण

<< पूर्व अनुच्छेद

अपचारों से बचना

अपने पिछले लेख में हमने यह देखा कि श्रीवैष्णवों को अपने आंतरिक स्वरूप को कैसे विस्तार करना चाहिए। हमने यह भी देखा कि हमें इन महत्वपूर्ण गुणों से भरपूर श्रीवैष्णवों के सत्संग पाने में हमेशा प्रयत्न करना चाहिए। इस लेख में हम यह समझेंगे कि एक श्रीवैष्णव को किस तरह के अपचारों से बचना चाहिए।

हम श्रीवैष्णव के लिए शास्त्र ही आधार है और उसी शास्त्र के आधारित सभी कार्य करते हैं| शास्त्र हमें यह ज्ञान (निर्देश) देता है कि किस विधि को पालन करना चाहिए और क्या हमारे लिये निषेध है। मुख्यतया शास्त्र हमें अपने नित्य कर्म करने की आज्ञा करता है और चोरी, दूसरे के संपत्ति के प्रति लगाव, हिंसा, आदि करने से रोकता है। हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्र के इन सारांश को हमारे लिए संग्रह किया है।

श्रीवचणभूषण में श्रीलोकाचार्य स्वामीजी ने सूत्र ३००३०७ तक हम श्रीवैष्णवों को नीचे दिए गए इन चार प्रकार के अपचारों से दूर रहने को कहा है :-

  • अकृत्य करणम् – शास्त्र में अस्वीकृत किये हुए कार्यों में लिप्त न होना।

  • भगवद अपचार – भगवान की तरफ किये गये अपचार।

  • भागवत अपचार – भागवतों के प्रति किये गये अपचार।

  • असह्य अपचार – बिना वजह भगवतभागवतों के प्रति किये गये अपचार।

इन अपचारों को हम एक एक करके देखेंगे:

अकृत्य कर्म:-

सामान्यतः शास्त्र हमसे यह उम्मीद करता है की हम इन नीचे दिए गए अपचारों से विरत रहे :-

  • पर-हिंसा किसी को कष्ट देना। किसी को बिना वजह तकलीफ देना, चाहे वह छोटे पौधा हो या चींटी, बिना कोई आवश्यकता उसे तकलीफ देना शास्त्र के विरुद्ध जाने का समान है

  • पर स्तोत्रंभगवान श्रीमन्नारायण ने हमें यह बोलने की शक्ति उनके और उनके भक्तों के गुणों की प्रशंसा करने के लिए ही दिया है। इसे हमें अवैष्णवों की प्रशंसा करने में उपयोग नहीं करना चाहिए ।

  • पर धारा परिग्रहंहमें कभी भी दूसरे स्त्रीयों (जो हमसे विवाह नहीं की हो) के बारें में किसी गलत इरादे से नहीं सोचना चाहिए ।

  • पर द्रव्य अपहारंहमें कभी भी दूसरों के सम्पत्ति को ( उनके इच्छा के खिलाफ ) छीनना नहीं चाहिए

  • असत्य कथनंसत्य तथा सच्चाई के विरूद्ध बोलना और जिससे किसी भी जीवित प्राणी को मदद न मिले।

  • अपक्षय पक्षणंवह भोजन खाना जिसमें जाति, आश्रय या निमित्त दोष हो – इसके बारे में और विस्तृत चर्चा के लिए आहार नियमम के इस लिंक को दबाएँ।

  • ऎसे कई प्रतिबंध रोक मनु स्मृति में कहा गया है।

यह श्रीवैष्णवों के लिये बहुत मुख्य बात है कि वह सामान्य शास्त्र का पालन करें और निषेध विषयों का त्याग करें।

भगवद् अपचार:-

श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी अगले निषेध विषय के बारे में समझाने शुरू करते हैं – भगवद अपचार और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके बारें में सुन्दर टीका करते हैं।

  • देवताओं को एम्बेरुमान श्रीमान नारायण के बराबर समझनाश्रीवैष्णवों को प्रधानतम यह बात समझना चाहिए कि भगवान श्रीमन्नारायण ही सर्वेश्वर हैं, यानि वे ही सभी के स्वामी हैं (ब्रम्ह, शिवजी, इन्द्र, वरूण, अग्नि, आदि) और वे ही सभी के अंतरयामी हैं (वह जो सभी के अंतरंग में होते हैं और हम सभी को वें ही नियंत्रण करते हैं)। उनके बराबर और उनके उपर कोई नहीं है। इसी सोच के साथ हमें कभी भी देवतांतर में नहीं पढना चाहिए और नाहीं उनको प्रसन्न करने की कोशिश करना चाहिए।

  • भगवान के अवतारों जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि को साधारण मनुष्य समझना। हम सब को यह ज्ञात रहना चाहिए कि भगवान जब इस संसार में अवतार लेते हैं तो अपनी सारी गुणों के साथ ही अवतरित होते हैं। वह जब इस लीला विभूति में जन्म लेते हैं तो अपनी लीला के भाग के कारण वें गर्भ में प्रवेश करते हैं, किसी एक विशेष दिन जन्म भी लेते हैं, कठिनाईयाँ से भी गुज़रते हैं, आदि पर वें किसी कर्म से नहीं बन्धे हैं। बजाय यह सब तो उनकी इच्छा से हीं हो रहा है ताकि संसार के कष्ट पीडा से जीवात्मा निकल सके। इसलिये जब भगवान अपने संकल्प से इतनी सारी कठिनाईयाँ ले लेते हैं, हमें यह कभी भी विचार नहीं करना चाहिए कि वे भी हमारे तरह इनसान हैं।

  • वर्णाश्रम के सीमा का उल्लंघन करना –  हर एक को वर्ण के और आश्रम (सम्प्रदाय) के नियमों को सम्पूर्णता से पालन करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, “श्रुति, स्मृति मम एवं अज्ञान…अज्ञान चेथि मम द्रोही, मद भक्तोपी न वैष्णवः”। श्रुति और स्मृति भगवान के नियम हैं और जो कोई इनका पालन नहीं करता, वे सभी उनके द्रोही हैं और वे भगवान के भक्त होने पर भी वैष्णव कहलाने योग्य नहीं हैं। इस विशेष स्थिति में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि, चौथे वर्ण के श्रीवैष्णव तिरुआराधन के समय वेद मंत्रों के उच्चारण करना, सन्यासी सुपारी खाना इत्यादि शास्त्र में मना किया गया है।

  • एक अर्चा विग्रह को उसे बनाने के लिए उपयोग किये गए पदार्थों के आधार पर उस विग्रह का मूल्य निणर्य करना – हमें यह अच्छी तरह समझना चाहिए कि भगवान अपने भक्तों के सच्चे प्रेम को देखकर, भक्त जिस रुप में भगवान को देखना चाहते हैं उस रुप में अवतार लेते हैं। अगर हम भगवान के विग्रह को देखकर मन में भी यह भाव प्रकट कर दिया कि यह तो बहुमूल्य सोने से बना हुआ विग्रह है इसलिए यह अधिक सुन्दर हैं या यह तो एक साधारण पत्थर से बना हुआ विग्रह है या केवल कागज के उपर एक चित्र है तो इसे भगवद अपचार कहते हैं| इसे उतना तुच्छ माना जाता है जैसे हम खुद अपनी माँ की पवित्रता पर शंका कर रहे हो|

  • जीवात्मा को स्वतंत्र समझनाहमारी स्वतंत्रीय बुद्धी ही हमारे सभी पापों का मुख्य कारण है और यह शास्त्र में सबसे बडी चोरी माना जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि जीवात्मा भगवान के आधीन है और हमें उनके कहे अनुसार ही चलना चाहिए।

  • भगवद द्रव्यों को चुराना (द्रव्य जो भगवान के हैं)- इस में सब शामिल हैं जैसे भगवान का भोग चुराना, तिरुवाबरन, वस्त्र, आदि। और स्थावर संपत्ति जैसे जमीन चुराना जो आजकल सामान्य हो गया है।

  • उन लोगों की मदद करना जो उपर बताये गये कार्यों में दुसरों की मदद करते हैं।

  • जो भगवान कि सम्पत्ति है, जो चोरी की गयी हो या दुसरों को चोरी के लिये मदद करके लायी गयी हो वह सम्पत्ति ग्रहण करना। यह भी खयाल मन में आ जाये कि, “मैंने तो खुद नहीं माँगा परन्तु अगर वो मुझे दे रहा है तो स्वीकार करने में क्या गलती है? ” – ऐसा सोचना भी भगवान को अस्वीकारनिय है।

  • ऎसे बहुत से आचरणों का निंदा शास्त्र में किया गया है।

भागवत अपचार:-

सबसे पहले हमें यह बात समझना चाहिए कि अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर समझना ही सबसे बडा अपचार है। हमें हमेशा खुद को उनसे नीचे समझना चाहिए , हमको नैच्चानुसंधान भाव रखना चाहिए। श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी बहुत ही स्पष्ट रूप से इस सिद्धान को समझाते हैं कि, “भागवत अपचार, वो बैर की भावना है जो हमारे मन में दूसरे श्रीवैष्णवों के प्रति , लालच और लालसा के कारण बढ़ता है”। भागवत अपचार के बारें में विस्तार से श्रीवचणभूषण के सूत्र १९०२०७ में समझाया गया है।

पहले हम भागवत अपचार के प्रसंग को देखते हैं:

  • जो भी श्रीवैष्णव वेश भूषा (वस्त्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, आदि) धारण करता है लेकिन भागवत अपचार में लगा रहता है वह उस वस्त्र के समान है जो बाहर से देखने में इस्त्री की गयी शुद्ध और निष्कलंक वस्त्र के समान दिखे मगर अंदर से जला हुआ है | ऐसे वस्त्र जब ज़ोर से आंधी या तूफ़ान आये तो चूर-चूर होकर उड़ जाएगा

  • हमें यह बात भी समझना चाहिए कि भगवान के अवतार जैसे वराह, नरसिंह, राम, कृष्ण आदि का का रहस्य, उनके अवतारों का मूल कारण और हिरण्यकशिपु , रावण जैसे राक्षसों को दण्ड देने का कारण भागवद अपचार ही था| भगवान कभी भी अपने भक्तों की पीड़ा और कष्ट सह नहीं पा सकेंगे| इसी कारण उन्हें इस सन्सार में अवतार लेना पडा। श्रीकृष्ण के अवतार रहस्य को हम श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से कहे गये श्रीभगवत गीता के चौथे अध्याय के – “यदा यदा…”, “परित्राणायाम साधुनाम…” , “…जन्म कर्मा च मे…” आदि श्लोकों से अच्छी तरह जान सकते हैं।एम्बेरुमानार और वेदांताचार्यार ने अपने गीता भाष्य और तात्पर्य चन्द्रिका में इन श्लोकों के बारे में विस्तार से चर्चा की है| 

बहुत प्रकार के भागवत अपचार हैं जैसेश्रीवैष्णवों को उनके जन्म, ज्ञान, कर्म, खानपान, रिश्तेदारी, रहने की जगह आदि के आधार पर भेदभाव करना / अनादर करना।

इनमें श्रीवैष्णवों कौ उनके जन्म के आधार पर भेदभाव करना / अनादर करना सबसे क्रूर अपचार है। यह अपचार, एक अर्चा विग्रह को उसे बनाने के लिए उपयोग किये गए पदार्थों के आधार पर उस विग्रह का मूल्य निणर्य करने के अपचार से भी बडा माना जाता है| अर्चा विग्रह का मूल्य निणर्य करना भगवद अपचार के नीचे आता है और हमने यह भी देखा है कि वो अपचार अपनी माँ की पवित्रता पर शंका करने की समान है | इससे भी तुच्छ है भागवतों ( श्रीवैष्णवों ) को उनके जन्म के आधार पर भेद-भाव करना / अनादर करना |

हमारे पूर्वाचार्यों ने अन्य श्रीवैष्णवों के प्रति व्यवहार करते समय बहुत कडक नियम का पालन किया है। वह हर समय सर्तक रहते थे। उधारण के तौर पर एक आचार्य भी अपने शिष्य के प्रति सम्मान जनक भाव रखते थे । परन्तु आज कल जो हम देख रहे हैं वो बिलकुल विपरीत है | शिष्य आचार्य का सम्मान नहीं करता है और कारण भी कहता है की ” वे भी धन के पीछे पड़े हैं और उनको अधिक ज्ञान नहीं है | अगर वे ऐसे हो तो मैं कैसे मर्यादा दे सकता ?” आदि।

भागवत अपचार के परिणामों को विस्तार से आगे समझाया गया है 

  • त्रित्सन्गुजी का उधारण यहाँ पर समझाया गया है वह अपने आचार्य (महर्षि वशिष्ट) से अड गये और बाद में महर्षि वशिष्ट के पुत्रों से यह विनती की कि इसी शरीर के साथ उन्हें स्वर्ग भेजे लेकिन जब वें मना किये तो त्रीसन्गुजी उन ऋषिपुत्रों को फिर से विवश करने की कोशिश की और महर्षि वशिष्ट के पुत्रों ने त्रिशंकु को चाण्डाल बनने का शाप दिया। ब्रम्ह ज्ञान के जरिये उन्होंने जो यज्ञोपवीत धारण किया था वही उनके लिये चाण्डाल का कमर पट्टा हो गया। उसी तरह शास्त्र के विरुद्ध अगर एक श्रीवैष्णव भागवद अपचार करे तो उसका दण्ड बहुत ही कठोर होगी इसलिए क्योंकि एक श्रीवैष्णव होने के नाते हम पर उम्मीद और उत्तरदायित्व अधिक होता है | एक श्रीवैष्णव को शास्त्र के अनुसार ही अपना जीवनकाल बिताना चाहिए हालाकि शास्त्र के विरुद्ध नहीं| जब एक देश का प्रधान मंत्री जब किसी भ्रष्टाचार में फस जाए तो उसे सभी इतने नीचे देखेंगे परन्तु अगर कोई सामान्य आदमी भ्रष्टाचार में फस जाए तो कोई उसकी इतनी परवाह नहीं करते कारण उस व्यक्ति की स्थिति |

  • तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) कहते हैं कि, “अगर कोई ब्राम्हण कुल में पैदा होकर, ब्रह्मोपदेश प्राप्त किया हो और वेद में पूर्ण निपुण हो परन्तु अगर वह श्रीवैष्णवों (जो केवल अपने और भगवान के सम्बन्ध के बारे में जानता हो और जिसको कोई ज्ञान और अनुष्टान नहीं हो) के प्रति अपचार करता है तो वह तक्षण चण्डाल बन जाता है”। हमें कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि जो कोई भी इतने श्रीवैष्णवों के प्रति अपचार करने के बावजुद भी उसमे कोई बदलाव नहीं देख सकते हैं, यह बदलाव बाह्य होना जरूरी नहीं है। गरूडजी एक बार एक चण्डाली (वह भगवान की अनन्य भक्त थी) के बारें में यह सोचा कि, यह दिव्यदेश छोडकर क्यों इतने एकांतिक जगह में रहती है, उनके पंख तुरन्त अलोप हो गये।

  • जब पिळ्ळै पिळ्ळै स्वामीजी निरन्तर भागवत अपचार करते थे, तब श्रीकूरेशस्वामीजी उनके अपचारों को कई तरीके से सही करते थे और ध्यान से उस अपचार से बचने की विशेषता समझाते थे।

अंत में यह बात समझना अत्यन्त आवश्यक है कि जैसे हमें यह पूर्ण विश्वास है कि, “जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति ज्ञान और अनुष्ठान के निरपेक्ष सिर्फ आचार्य संभंध पर निर्भर है उसी तरह पूरे ज्ञान और अनुष्ठान से भरपूर होने के नाते भी अगर हम भागवत अपचार करते रहे तो निरपेक्ष पाताल में गिर जाना सत्य है”।

असह्य अपचार:-

असह्य यानि बिना कोई कारण। यह वह अपचार है जो बिना कारण हम भगवद, आचार्य और भागवतों के प्रति करते हैं।

  • भगवद विषयं मेंहिरण्यकशिपु भगवान का नाम भी सुनना नहीं चाहता था। जबकि भगवान ने उसको विशेष रूप से कोई नुकसान नहीं पहुंचाई।

  • आचार्य विषयं मेंआचार्य कि आज्ञा का पालन नहीं करना, उनसे प्राप्त ज्ञान को अप्रतिबंध लोगों को, धन, सम्पत्ति, वैभव, आदि प्राप्त करने के लिए, समझाना।

  • भागवत विषयं मेंअन्य श्रीवैष्णवों के प्रति ईर्ष्या भाव रखना, आदि।

यह बात समझायी गयी है कि यह सभी अपचार (क्रम सेपहले अपचार से कठोर है। भगवद अपचार अकृत्य कर्म से ज्यादा क्रूर है, भागवत अपचार भगवद अपचार से ज्यादा क्रूर है और असह्य अपचार भागवत अपचार से ज्यादा क्रूर है।

हमारे पूर्वाचार्य शास्त्र के प्रति बहुत आदर भाव रखते थे और कोई भी अपचार करने से बहुत डरते थे। अपने गुरू परम्परा के आचार्य (इतिहास से हम सब देख सकते हैं), अपने इस सांसारिक जीवन के अंत समय में अपने सभी शिष्य और श्रीवैष्णवों को बुलाकर उनसे क्षमा माँगते थे, हालाकि उनसे कोई अपचार ही नहीं होता था। एसी थी उनकी नम्रता ।

हमारे लिये भी यह बातें अच्छी तरह समझना बहुत जरूरी है, और इसे अपने जीवन में लागू करना चाहिए। ज्ञान का अंत जब अनुष्ठान में होता है और जब अनुष्ठान प्रारंभ होता है तभी ज्ञान का प्रबुद्ध होता है | अगर इस प्रकार नहीं होता तो ज्ञान और अज्ञान में कोई अंतर नहीं है|

यह बात भी हमें अच्छी तरह समझना चाहिए कि, असह्य अपचारों में जब हमने यह देखा कि अप्रतिबंध लोगों को ज्ञान और शिक्षा देना अपचार माना जाता है , इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे पूर्वाचार्यों ने किसी को भी कुछ नहीं सिखाया था | अगर ऐसा हो तो इतने सारे ग्रन्थ हमारे पूर्वाचार्यों ने लिखा नहीं होगा और आज के समकालीन आचार्य पुरुष भी हमें सांप्रदायिक विषयों के ज्ञान प्रदान नहीं करते | जीवन में इन ग्रंथों को पढ़कर उच्च गुण प्राप्त करना और संतुष्ट रहना ही इन ग्रंथों का लक्ष्य है|

अगले लेख में उत्कृष्ट जन्म और निकृष्ट जन्म के बारें में चर्चा करेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासी

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