वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ११ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग १० – २

ब्रह्मा देवतओं के सर्वोच्च नेता को देखने के लिए तीव्र आग्रह के साथ तपस्या कर रहे थे! वशिष्ट, मारिची और समान रूप से महान विद्वानो के सात अपरिमित ज्ञानी यग्न में भागी थे I यज्ञ के वीक्षण के लिए बड़ी संख्या में जन एकत्र हुए थे।

ब्रह्मा ने यग्न में आने वाले निरंतर बाधाओं पर और कैसे भगवान् ने उन्हें तत्क्षण निष्फल किया उन पर विचार कर रहे थे। अनैच्छिक रूप से ब्रह्मा भगवान कि प्रशंसा कर रहे थे।

क्या उदारता के साथ भगवान, जो वेदांत के शोभायमान सार हैं, दीपक के प्रकाश के रूप में प्रकट हुए; बाद में नरसिम्ह के रूप में प्रकट हुए और असुरों का संहार किया! – ये शब्द हर किसी के मुंह में था।

ऐसा कहा जाता है कि महान कार्यों के लिए बहुत बाधाएं आएंगी; हाँ! हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि केवल अगर बाधाएं हैं, तो कार्य वास्तव में महान कार्य है।

एक साधारण, पवित्र कार्य में लौटने के दौरान हमें कितनी बाधाएं आती हैं? गलत, प्रयास किए जाने पर, खतरे के बिना संपन्न हो जाता है। तरीके कितने विचित्र हैं!

इन पर ध्यान देते हुए अयन का मन, इन विचारों में खो गया था। उन्होंने दृढ़ता से विश्वास किया कि वे और वेल्वी को इस समय भी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। परंतु वे चिंतित नहीं थे I

निकट में किसी ने अयन से प्रश्न किया “ब्रह्मा .. क्या अब भी समस्याएं जारी रहेंगी?”

ब्रह्मा ने उत्तर दिया “हां। निश्चित रूप से”।

ब्रह्मा से इस अनपेक्षित उत्तर ने प्रश्नकर्ता को स्तंभित और भयभीत कर दिया। उन्होंने ब्रह्मा को आंखें गाड़कर देखा, उसकी आंखों बाहर निकल जाएंगी ऐसा लगाI

एक काँपते हुए स्वर में, उन्होंने पूछताछ किया कि “अयन! क्या आप खतरे का सामना करने के लिए तैयार और सशस्त्र हैं? ”

“निश्चित रूप से नहीं!” अयन ने उत्तर दिया। “मुझे विश्वास नहीं है कि मेरे पास सरस्वती के क्रोध को पराजित करने की क्षमता है।”

इससे प्रश्नकर्ता और चकित हो गए I

अयन ने मुसकुराये और कहा “मैंने केवल इतना कहा कि मैं सुसज्जित नहीं हूं और व्यवस्था नहीं कर सकता परंतु यह नहीं कहाता कि यह भगवान की शक्ति और सुविधा से परे है। क्या हमें उन पर अविश्वास करना चाहिए, इतनी रक्षा करने के बाद भी? उन्होंने बार-बार प्रस्तुत किया हैI  उनके उत्तम मन में यह विचार है कि, कान्चि शहर में हर जगह अपनी उपस्थिति अनुभूत करना चाहते हैं, मुझे साधन के रूप में उपयोग करके I

मैंने यह अशरीरी की आवाज़ सुनने के उपरांत यग्न आरम्भ किया। आरंभ से बाधाएं आयी हैं परंतु वे उनके संरक्षण से ध्वस्त हो गये।

(हमें यह निरिक्षण आवश्यक है। अनेक बाधाएं आएंगी I यह अत्यावश्यक है कि हमें एक दृढ़ विश्वास रहे कि वोह हमारे साथ हैं और हमारी अनुरक्षण कर रहे हैं। वह हमें कभी नहीं त्यागेंगे)।

ब्रह्मा इन शब्दों को एक शांतचित्त होके बोले। “मेरी परिकल्पना इस विषय में है कि वोह आगे कैसे प्रकट होंगे और कैसे मैं उनके उद्भव के उपरांत अपना आभार व्यक्त करु I

दीपक के प्रकाश के रूप में और सिम्हेंद्र (सिंह के राजा) के रूप में आने के उपरांत अगला आलंकारिक अवतार क्या होगा – यही वह है जो मैं अब अनुमान लगा रहा हूं। ”

इस तरह से बात करते हुए सुनकर, वशिष्ट उतावले हो कर उनकी निष्ठा कि प्रशंसा करते हुए उनके पास पहुचे।

“आदरणीय ब्रह्मा! भगवान में आपके विश्वास और निष्ठा से निश्चित रूप से कल्याण होगा !! “आप के माध्यम से, हम भी उच्चता प्राप्त करेंगे।

वशिष्ट ने आगे बात जारी रखने का प्रयत्न किया, कि “सिवाय सरस्वती…..”। हाथों को जोड़ कर, ब्रह्मा ने वशिष्ट को रोक दिया I

जब कोई विचलित और क्रोधित हो तो बुद्धि पीछे हो जाती है। लेकिन इस स्तिथि में, बुद्धि (बुद्धी – सरस्वती) खुद क्रोधित हैं। वह निश्चित रूप से शांति से विश्राम नहीं करेंगी। परंतु भयभीत न होना I श्री हरि ध्यान रखेंगे “।

ब्रह्मा के इस संभाषण को सुनने पर, सभी भावनाओं से अभिभूत थे और परमन (सर्वोच्च व्यक्ति) की प्रशंसा में गाये थे।

उधर सरस्वती नदी तट पर , सरस्वती असुरों के साथ विचार-विमर्श में व्यस्त थी। चैंपरासुर और कई अन्य राक्षस ने प्रयत्न किया परंतु यग्न में बाधा डालने में विफल रहे। अचानक कलै अरसि (कला और ज्ञान की देवी) के मन में कुछ चमक उठा, और उन्होंने काली का नाम उच्चारित किया।

काली सरस्वती के सामने उपस्थित हुई। ज्ञान कि शोभायमान अध्यक्ष ने आदेश दिया “काली। आप तत्क्षण प्रस्थान करो। लोगों का समूह लेके उस स्थान पर जाएं जहां ब्रह्मा यग्न की व्यवस्था कर रहे है I

कई आसुरों के साथ, काली तत्क्षण प्रस्थान किया।

वह तपस्या स्थल पहुंची, एक भयंकर हंसी से, जिसमें रक्त से रंगें हुए दांत बाहर की ओर लटकते हुए, आंखें आग प्रज्वलित करते हुए, कई शास्त्रों के साथ क्रूर लग रही थीं। सभी निराश थे।

लेकिन एकमात्र ब्रह्मा हाथों को जोड़कर मुस्कुराते हुए काली के विपरीत दिशा में देख रहे थे।

इस अवसर पर, भगवान् विपत्तियों के आगमन के उपरांत नहीं उभरे, किन्तु काली स्वयं को दिखाने से एक पल पहले।

यह वही थे जिनकी ब्रह्मा ध्यान कर रहे थे।

आंखें प्रतिभाशाली चित्रकारों द्वारा खींचे गए कमल जैसे थी, सबकुछ – उसकी ऊपरी भुजाएँ, मुंह उत्तम और समुचित थी। सभी व्यापक रूप से विभाजित होंठ से चकित थे। वह कौन थे?

क्या हम जानने के लिए प्रतीक्षा करें…?

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-11-1/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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