वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १२ – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ११ – ३

भगवान वेल्वी से प्रसन्न थे। वह यज्ञ का आनंद लेते है क्योंकि यह उसके मन के बहुत निकट है। उनका नाम यज्ञ: भी है । इसका अर्थ है, वह यज्ञ का व्यक्ति रूप है।

श्री भागवत गीता में….

“अहम् क्रतुरहम यज्ञ स्वधाहम अहमौशदम I मंत्रोहम अहमेवाज्यम अहमाग्निरहम हुतं II

(गीता  ९ – १६)

वे प्रकट करते है की “मैं याग हूं। मैं महा याग हूं। मैं पिंड (तर्पण) पूर्वजों (पित्रों) को पोषण (स्वथा) के रूप में हूं। मैं शब्द हूं (वेद मन्त्र)। मैं हविस हूं, मन्त्र हूं, घी हूं, मैं अग्नि हूं और मैं होम हूं “।

सहस्रनामम उपाधि देति है याग से लेकर यज्ञगुह्य्म तक के लिए विस्तृत परिपूरक के रूप में दिखाई देते हैं।  एक उपयुक्त भोजन है यह विचार के लिए।

” सिगिन्रा किथियेल्लम याने” – नम्माळ्ळवार कहते है (सभी शास्रविधियां मेरे (भगवान्) लिए निभाये जाते है)

कलियन भी सहमत थे “वेल्वीयुम थानाए निनरा एम्पेरुमान” – (यज्ञ भी हमारे सर्वोच्च भगवान का एक अभिव्यक्ति है)।

वे अनुष्ठान है। वे तपस्या है। वे अर्पण है।

वे सभी में अदृश्य रूप में उपस्थित है। इस कारण, ब्रह्मा भयभीत नहीं हुए थे। जहां असली विश्वास है, वहां भय के लिए कोई जगह नहीं है। भय विश्वास का मित्र नहीं है।

यह निश्चित रूप से वही है जो प्रहलाद ने घोषित किया था। वह शिक्षालय के विद्यार्दियों के आयु वर्ग में सबसे छोटे थे। परंतु उन्हें साधुओं (प्रचण्ड भक्त) में प्रमुख माना जाता है। कारण साफ है। वह कभी भयभीत नहीं थे।

हिरन्य आश्चर्य चकित थे। उसने अपने पुत्र से पूछा कि “मेरे पुत्र! क्या आप को कभी भय नहीं होता”?

मुस्कुराते हुए, बालक उत्तर देता है – ” जिससे भय भी भयभीत होता है, वह मेरा निरंतर साथी है। मुझे कोई चिंता या कष्ट नहीं है। ” केवल, इस निरंतर विश्वास एकमात्र ही, अंत तक कवच के रूप में दृढ़ता से खड़ा रहेगा।

हमें भी इस विश्वास को प्राप्त करने की आवश्यकता है – भगवान में विश्वास। ईश्वर भी हम से कुछ भी नहीं आशा करते है – महा विश्वास (भगवान के प्रति दृढ़ विश्वास और निष्ठा)।

ब्रह्मा में यह पर्याप्त था। सरस्वती द्वारा किये गए किसी भी आक्रमण पर वे दुखी नहीं थे।

केवल सरस्वती ने गलत अनुमान लगाया था। इसके ऊपर, असुरों द्वारा दुष्ट मार्गदर्शन हुआ। असुरों का क्रोध का कई कारण था। प्रवृत्ति से, वे अच्छों के विपरीत थे। इसके अलावा उन्हें शिकायत थी कि ब्रह्मा के वेल्वी ने देवताओं को प्रमुखता दी थी और उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया था।

वे अपने लाभ के लिए सरस्वती का उपयोग करना चाहते थे, प्रतिशोध (अपमान) लेने के लिए और इसलिए यग्न का विनाश का कारण बनने का प्रयास किया था।

असुर सरस्वती को उपयोग में लेके अपने दुष्ट राक्षस कार्य को पूरा करने के इरादे से थे। सरस्वती भी सहमत थी। एक तेज धारा में बदलके उनकी तपस्या के स्थान से प्रारंभ होके, वे दक्षिण की तरफ बढ़ी और इस जगह पर पहुंची, क्रोद्ध में नदी, जलप्रलय बनकर ब्रह्मा के वेल्वी को धरती पर गिरा देने का प्रयत्न हुआ।

सरस्वती “वेगवती” में बदल गयी। उनका प्रकोप दर्शकों के लिए स्पष्ट था जब उन्होंने अचानक बहाव का उग्र रूप से रास्ते में आये सभी को नष्ट कर दिया। भाग लेनेवाले ने खुद को और उनके सामान को हिंसक नदी वेगवती के क्रोध से बचाना चाहते थे। इस कारण, वे सुरक्षित, ऊंचे स्तान दूंडे थे । ऊंचे तरंगे ऐसा लग रहे थे कि सामने समुद्र खड़ा हो, और भय का कारण बन गया।

वेगवती तेजी से यागशाला के पास आ रही थी। मन की गति या पवन की गति भी बढ़ती नदी वेगवती के सामने कम लग रहा था।

परन्तु यह वेगवती नदी पूरी तरह से हमारे द्वारा मिटा दिया गया लगता है; अब इसका कोई निशान नहीं है। यह हमारे लिए अविश्वसनीय लग सकता है अगर यह कहा जाता है कि एक समय में यह नदी को सात शाखाओं में बहने का गौरव था। वेगवती नदी के साथ उपनदीयों का बहार नष्ट करने का पूरा श्रेय (दोष), अतिक्रमण के माध्यम से, केवल हमे जाना चाहिए।

वेगवती कि प्रतिष्ठा, नदी स्नान के लाभ  (पुराण) में हस्थिगिरी महात्मम और देशिकन के हमससन्देशं में लिखा गया है।

हमने वेगवती नदी को मिटा के हमने अपने पापों को अधिक कर लिया है, हमें मुक्त करने के लिए प्रकट हुई नदी को हमने मुक्त कर दिया है ।

“आप एव हि सुमानस:” और “जल पवित्र है” – इस प्रकार हम पवित्र महिमा का उदाहरण देते हैं और आगे हम घोषणा करते हैं कि “पृथ्वी बिना पानी के जीवित नहीं रह सकती है”। परंतुब हम नदियों और जल राशियों को गायब होने के लिए जिम्मेदार हैं।

हम कई अनैतिक, दुष्ट कृत्यों में शामिल होते हैं। इन सभी के लिए मुक्ति हो सकता है।। लेकिन पापों में सबसे बड़ा, अर्थात् पानी के राशियों को नष्ट करने के लिए कोई मोक्ष प्रतीत नहीं होता है।

परेशान और क्रोधित सरस्वती (वेगवती के रूप में) उग्र रूप से बह रही थी। लेकिन भगवान भी उसे नष्ट करने का इच्छा नहीं रखते थे, बल्कि एक जलबंधक (बांध) की तरह उसकी गति को नियंत्रित करके उसे बचाया।

पर हम !

हमने पूरी तरह से वेगवती और उसके सात उपनदियों (शाखाओं) को समाप्त कर दिया है। क्या हम कम से कम इन नामों को जान लें?

अगले भाग में ..

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी में जल्द ही, हम तिरुपर्काडल, पल्लिकोंडान, और तिरुवेक्का – उनकी प्रतिष्ठा सुनेंगे।

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

आधार – https://srivaishnavagranthamwordpress.com/2018/05/21/story-of-varadhas-emergence-12-1/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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