लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ६

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

nampillai-thiruvallikeni-3

नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

५१) मुन्बु मुकम् तोट्ट्राते (तोत्ताते) निन्रानागिलुम् आबत्तु वन्दवारे मुकम् काट्टि रक्षिक्कुमवनायिट्ट्रु (रक्षिक्कुमवनायित्तु) | अवनिप्पडि इरुप्पानोरुवनागैयाले स्वाराधन् |

हालांकि बहुत लम्बे समय तक भगवान् प्रकट नही होते व दर्शन नही देते पर जब भी भक्त आपत्तिजनक स्थिति मे हो तो भगवान् भक्त रक्षणार्थ प्रकट होते हैं और दर्शन देते हैं | केवल इस गुणाधार पर पूर्वाचार्य भगवान् को सौलभ्य और पूजनीय भजनीय कहते हैं|

अनुवाद टिप्पणि : भगवान् अन्तरयामीब्रम्ह के रूप मे रहकर जीवात्मा को सदा मार्गदर्शन देते हैं और खयाल रखते हैं| जब कोई आपत्तिजनक स्थिति उद्भव होती है तो भक्त रक्षणार्थ अन्तरयामीब्रम्ह रूपी भगवान् तुरन्त प्रकट होते हैं| यहाँ दृष्टान्त गजेन्द्र का दिया गया है | गजेन्द्र ने मनोबल व शारीरिक बल से मगरमच्छ को जीतने का स्वप्रयास हज़ार वर्षों तक किया | पर जैसे ही उस आपत्तिजनक स्थिति मे गजेन्द्र ने स्वप्रयास को छोडकर भगवान् को आर्तभाव से पुकारा तो भगवान्  तुरन्त स्वधाम छोडकर उडते हुए आ पहुचें और मगरमच्छ को मारकर अपने भक्त गजेन्द्र की रक्षा बहुत प्रेम से किये |

५२) तान् रक्षिक्कुमिडत्तिल् इत्तिलैयिल् आनुकूल्यत्तुक्कु सूचकमान अप्रतिशेधमे वेण्डुवतु

जीवात्मा के प्रति भगवान् का किया हुआ रक्षण प्रयास मे भगवान् केवल यह चाहते हैं कि उनके द्वारा क्षेम, प्रेमपूर्वक किया गया यह कृत्य को जीव अस्वीकार (नकारे) न करे अर्थात् पूर्ण विश्वास से स्वीकारे | यही स्वीकारता भगवान् के प्रति अनुकूल कृत्य है और भगवान् स्वयं इसको अनुकूल मानते हैं|

अनुवादक टिप्पणि : ” भगवद्कृपा की स्वीकृति ” के विषय मे आण्डाळ् अम्मा जी तिरुप्पावै २८ वे पासुर मे इस प्रकार कहती है : जैसे भगवान् कृष्ण के विशेष प्रेम व अनुग्रह को जिस प्रकार वृन्दावन के गायों ने स्वीकारा था (गायों की रक्षा करना) ठीक उसी प्रकार इस दासी की रक्षा करने की कृपा करे जिसने आपके अनुग्रह को नकारा नही अर्थात् स्वीकृत ही किया है | पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी जी भी मुमुक्षु-पडि ग्रन्थ के २७३ वे सूत्र कहते हैं : ” पेट्ट्रुक्कु वेण्डुवतु विलक्कामैयुम् इरप्पुमिरे  ” अर्थात् जीवात्मा को परम ध्येय भगवद्-सेवा (कैङ्कर्य) प्राप्ति के लिये दो ही कार्य करणीय है : १) पहला भगवदहैतुकी कृपा को सदैव स्वीकारे (कभी भी तिरस्कार न करे) | २) दूसरा परम ध्येय – भगवद्-कैङ्कर्य के प्रति अटूट अप्रतिबन्धित चाहना या कामना | (जब तक पुरुष की चाहना उसके प्रति नही हो तो उसको पुरुषार्थ नही कह सकते हैं) |

५३) देवतान्तर स्पर्शम् उडैयारुडैय स्पर्शत्तिर्कु श्रीवैष्णवर्गळुडैय पादरेणुवैक् कोण्डु परिहारिक्कैप्पारुन्गोळ्

देवतान्तरि व्यक्ति (या देवतान्तर से सम्बन्ध रखने वाले) के स्पर्श के मात्र से उद्भवित देवतान्तरि वासना के परिहार हेतु प्रपन्न को तुरन्त श्रीवैष्णवों के चरणों की पाद धूलि का आश्रय लेना चाहिये |

अनुवादक टिप्पणि : देवतान्तर माने श्रीमन्नारायण को छोडकर अन्य सभी देवी-देवता | अन्य देवी-देवता जीवात्मों की भान्ति जीव ही है और स्वकर्मणा संसार के चक्र मे बन्धे हुए हैं| वे सभी अहंकार युक्त व रजसतमसोद्भव गुणों से प्रभावित हैं | अतैव हमारे पूर्वाचार्यों ने ऐसे देवी-देवता (देवतान्तर) संबन्ध को सदैव को त्यागा और उन सभी को भी त्यागा जो ऐसे देवतांतरी संबन्ध रखते हैं | इससे हम सभी को समझना चाहिये कि यह विषय कितना तीव्र और गम्भीर है |

इस दृष्टान्त मे, पूर्वाचार्य श्री पराशर भट्टर स्वामी जी का उल्लेख दिया गया है| एक दिन, गलती से किसी देवतान्तरि व्यक्ति के धोती का छोटा सा हिस्सा श्री पराशर भट्टर स्वामी पे लगा | हालांकि बहुत बडे विद्वान होते हुए भी, वह डगमगाहट गये | तुरन्त अपनी माता के पास पहुंचकर पूछे : हे माते ! क्या करूँ अब ? उनकी माताश्री ने कहा कि कोई अब्राह्मण श्रीवैष्णव को ढूँढो और उनका श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करो ! ऐसे महद्व्यक्तित्व को ढूंढकर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हैं| हालांकि पहले तो यह श्रीवैष्णव मना करते हैं पर बाद मे मान जाते हैं|

४४) भगवद् विषयत्तिल् पण्णिन अञ्जलिमात्रमुम् शरण्यम् नीमैयाले मिगै

भगवान् ही शरण्य है जो उनकी शरण मे आकर शरणगत होता है | जब कोई भी व्यक्ति भगवान् के प्रति प्रणाम या करबद्ध होकर प्रार्थना करता है तो इस कृत्य को भगवान् विशेष व महद् कार्य समझते हैं और ऐसे व्यक्ति की सम्पूर्ण रक्षा करते हैं |

अनुवादक टिप्पणि :  भगवान् के ज़खम से उद्भव रक्त वेग को कम करने के लिये,पाण्डव पत्नि, भगवच्छरणागत द्रौपदी ने अपने साड़ी का तुकडा निकालकर ज़खम के चारों ओर बाँधती है | इस कृत्य को देखकर भगवान् उसे बहुत बडा उपहार (अनुग्रह) मानते हैं | भगवान् ने इस भावना से उनके सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त पाण्डवों की सहायता व रक्षा की है | स्वधाम जाने से पूर्व भगवान् कहते हैं कि द्रौपदी द्वारा किया गया उपहार के बदले मे भगवान् अधिक नही पर पाये और उनको यह अफ़सोस सदैव रहेगा | देखिये भगवान् के विचार की विशालता और उदारशील भावना को | कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी श्री यामुनाचार्य के स्तोत्ररत्न के २८ वे श्लोक का अनुसरण करते हैं और यही उपदेश किया है| स्तोत्र रत्न का श्लोक निम्नलिखित है :

त्वदङ्घ्रिम् उद्दिष्य कथापि केनचित्
यथा तथा वापि सकृत् कृतोञ्जलि: !
तवैव मुष्नाति अशुभानि अशेषतः
शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते !! 

यहाँ श्रीयामुनाचार्य कहते हैं भगवान् के चरणों के प्रति किया गया अनुचित विधिवत अञ्जलि भी उचित ही है क्योंकि उनके चरण उस व्यक्ति के समस्त पापों का नाश कर, समस्त शुभ प्रदान करते हैं|

५५) इङ्गिरुक्कुम् नाळैक्कु पुरुषकारमाग मुमुक्षुक्कळुण्डु | अङ्गुत्तैक्कु नित्यसूरिगळुण्डु

यहाँ कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी कह रहे हैं कि इस धरातल (यहाँ) पर दीक्षोपरान्त समय से मुमुक्षु के लिये मुमुक्षु सत्सङ्ग है | पर वहाँ (भगवद्धाम मे) हमे नित्यसूरि और मुमुक्षुओं का सङ्ग मिलेगा |

अनुवादक टिप्पणि : इस भौतिक जगत् मे मुमुक्षु जन, अन्य श्रीवैष्णव जन सहित भगवद्-भागवत-आचार्य सेवा मे सम्लग्न हो सकते हैं या होना चाहिये | देह त्याग पर्यन्त परमपद मे नित्य पार्षद एवं अन्य मुक्तों के सङ्ग मे भगवद्-सेवा मे सम्लग्न होते हैं| आचार्य पुरुषकारेण हम सभी भगवान् व भागवतों की सेवा कर मार्गदर्शन प्राप्त करते है | ऐसे आचार्य ही सत्यज्ञान प्रदान करते हैं और इसका अनुशीलन करवाते हैं| ऐसे मार्गदर्शन से ही इस भौतिक जगत् मे समय का सदुपयोग कर सकते हैं |

५६) ओरुवन् वैष्णवनागैयावतु इतु – सर्वेश्वरन् रक्षकन् एन्रोरुवन् पक्कलिले ओरु वार्त्तै केट्टुविट्टु

एक व्यक्ति तभी वैष्णव बन सकता है जब वह दूसरे वैष्णव (के उपदेशों) का श्रवण करता है :- कि भगवान् श्रीमन्नारायण ही एक मात्र परम देवता है और अन्य देवता जैसे इन्द्र, ब्रह्मा, शिव इत्यादि उनके अधीन मे है और श्रीमन्नारायण ही एक मात्र शरण्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस सूत्र को समझने के लिये पूर्वाचार्यों ने क्षत्रबन्धु का उदाहरण दिया है | क्षत्रबन्धु क्षत्रिय कुल मे जन्मा था पर कुकर्मिक वासानाओं से बन्धित था | एक समय मे, क्षत्रबन्धु ने एक महात्मा साधु की सहायता कर उनसे भगवान् का ” केशव ” नाम उपदेश मे प्राप्त किया | सन्त महात्मा ने इस दिव्य नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा : कल्याण गुण सम्पन्न, श्रिय: पति, अखिलहेय प्रत्यनीक, ब्रह्मा और शिव के स्वामी, ही जगत् स्वामी और परम देवता है जिन्हे श्रीमन्नारायण कहते हैं | यह दृष्टान्त तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार अपने तिरुमालै दिव्य प्रबन्ध के चौथे (४) पासुर मे वर्णन करते है |

४७)  कऴिवतोर् कातलुट्ट्रार्क्कुम् उण्डो कण्गऴ् तुन्जुतल् एन्रिरेयिरुप्पतु स्वरूपमितु एन्रारिन्तल् स्वरूपनुरूपमान वृत्तियुम् इतुक्कुविरोधियानवट्ट्रैत् तळ्ळुतलुम् इल्लैयागिल् ज्ञानम् पिरन्ततिल्लैयामित्यनैयिरे इत्तिल्लैयागिल् आऴ्वारगळ् पोन वऴियिल् अन्वयैत्तिलनामित्तनैयिरे

श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं : जब किसी व्यक्ति को भगवान् और भगवद् विषय के प्रति रति और आसक्ति बढती है, ऐसा व्यक्ति एक क्षण के लिये भी कभी सो नही पायेगा (क्योंकि वह कुछ और सोच नही सकता) | इस प्रकार से ऐसे व्यक्ति जब तब उन्हे भगवान् प्राप्त न जाये तब तक चैन से नही रहते | वास्तविकता यही है | यह समझने के बावजूद भी आत्मा के अनुकूल कृत्य को अपनाकर, प्रतिकूल क्रियाओं को त्यागेगा नही तो प्राप्त ज्ञान की प्रगति नही होगी | अतः आळ्वार दर्शित मार्ग (वह मार्ग जिसमे लौकिक विषयों मे अनासक्ति और पूर्णासक्ति भगवान् के प्रति दर्शाया गया है) के लिये वह अयोग्य होगा |

५८)  नारायण शब्दत्तिर्कु उपायत्व उपयोगियान वात्सल्यादिगळुम् , उपेयत्व उपयोगियान शेषित्वादि गुणङ्गळुम् अर्थम्

भगवान् उपायोपेय हैं अर्थात् भगवान् ही उपाय और भगवान् ही उपेय हैं  (सियाराम ही उपाय – सियाराम ही उपेय) | भगवान् ही साधन-साध्य वस्तु हैं  | नारायण शब्द उपाय-उपेय (साधन-साध्य) (दोनो) को इङ्गित करता है | इस शब्द मे अनेक कल्याण गुण सन्निहित हैं | ऐसे कुछ गुण इस शब्द रूपी ब्रह्म के उपाय और उपेय को प्रकाशित करते हैं| जैसे वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य इत्यादि उपायत्व को दर्शाते हैं और शेषित्व (चितचित वस्तुवों का एक मात्र स्वामी होना) इत्यादि उपेयत्व को दर्शाते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुपडि के १३६ – १३८ सूत्र मे, भगवान् के अनेक कल्याण गुणों और इन गुणों की भूमिका का उल्लेख करते हैं जिससे भगवान् का उपायत्व सुगम हुआ है | अन्तत: यह कहते हैं ऐसे कल्याण गुणों का साक्षात् स्वरूप अर्चावतार भगवान् ही हैं|

५९) सृष्टियादिगळिल् सत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्, आश्रित विरोधिगळळविले असत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्

सृष्टि के प्रारंभ मे भगवान् अपना सत्यसङ्कल्प (जो प्रतिज्ञा ली उसकी परिपूर्णता) प्रदर्शित करते हैं| पर अपने भक्तों के विरोधियों के विषय मे हट के (उनको कठोर दण्ड देते हैं) अलग ढंग से व्यवहार करते हैं| कहने का तात्पर्य यह हुआ कि अगर कोई भक्तों का विरोध हो तो भगवान उनको दण्ड देते हैं हालांकि वे उनको चाहे तो सुधार ही सकते हैं |

६०) आश्रित विरोधिगळैत् तनुक्कु विरोधिगळागक् कोण्डु वळक्कु पेशुमवन्

भगवान् अपने भक्तो के विरोधियों को अपना विरोधि समझकर उनसे तर्क वितर्क करते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : जब पाण्डवों के प्रति दुर्योधन पूर्णतया प्रतिकूल हो गया और पाण्डवों को बाधा पहुचाने लगा तो भगवान् ने पाण्डव पक्ष मे दूत के रूप धारण कर दुर्योधन से संवाद किया |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-6.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s