वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ८

दीप प्रकाश…..

तिरुत्तणका,  कांची में यह दिव्य पवित्र स्थल आज के दिन भी उनका निवासस्थान है। यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि वहां कई बगीचे और नंदवन हैं जो इस जगह को ठंडा रखते हैं। यह श्री वेदान्त देसिकन का विशेषाधिकार प्राप्त जन्म स्थान है।

ब्रह्मा की प्रार्थना को ध्यान देते हुए भगवान्, एक उच्च तीव्र प्रकाश के रूप में प्रकट होकर चम्पासुर द्वारा प्रेरित अंधेरे को नष्ट किया जो यग्न को नाश करने की योजना बना रहा था I

इस प्रकार भगवान ने एकत्र सभी को संरक्षित किया। ब्रह्मा और अन्य गण ने भगवान की करुणा और कृपा की सराहना और प्रशंसा की जो एक प्रकाश के रूप में उभरा और कवच के रूप में उनका संरक्षण किया I

पुराण इस नाम के लिए एक स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं …

“प्रकाशिथम जगत सर्वम यथ दीपापेना विष्णुना|तस्मात् दीप प्रकाशाक्यम लबते पुरुषोत्तम I I”

अपनी अद्वितीय प्रकाश से, वह पुरे जगत को चमकाते हैं और इसलिए “दीप प्रकाश” नाम को प्राप्त किया है।

वह आग के एक गेंद के आकार का था। परंतु उसने उपस्थित अन्य किसी को कोई हानी या बाधा नहीं पहुंचाई जहां यग्न प्रारम्भ होना था। वह केवल प्रकाश प्रस्तुत कर रहा था।

पुराण कहता है…

” न तधाह तधा शालम तदद्भुतमिवाभवत ” –  प्रकाश से जुड़े किसी भी अन्य पदार्थ उनके प्रदीपन और दीप्ति के तुलना नहीं आते है I

सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, बिजली या अग्नि उनकी उपस्थिति में नीरस और मंद दिखाई देंगे।

उन्हें देव के नाम से भी संबोधित करते हैं क्योंकि उनके पास यह उत्कृष्ट सौंदर्य है I कृष्ण भी, गीता में, प्रमाणित करते हैं ” दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेथ युगापदुथिथा ! यति भासदृचि सा स्यात भासस्थास्य महात्मनः ” – ( यदि असंख्य सूर्य, सभी एक साथ प्रकाशित होंगे, तो उन सभी का चमक उनके तेज से अस्पष्ट रूप से मेल खाता है )

उपनिषद घोषित करते हैं कि वह “भारूप:” (प्रकाश का अवतार, प्रकाश का व्यक्तित्व)

आळ्वार भी इसी समरूप भावनाओं को मनाते हैं……

” कधिरायिरमिरवी कलंधेरित्तालोत्ता निल मुड़ियाँन” (उनके लंबे केशों की चमक एक हजार सूरज एक सात जलने के समतुल्य है), “सोथि वेल्लात्तिनुल्ले एलुवाथोरोरु”… (प्रकाश की प्रलय से उद्भव) I

देसिकन अपने “शरणागति दीपिका” में भगवान की प्रसिद्धि, कृपा और गुणों कि प्रशंसा करते है, जिसे प्रसिद्ध रूप से “विलाक्कोली” (दीपक का प्रकाश) और दीप प्रकाशन के नाम से जाना जाता है।

भगवान प्रचण्ड वैभवशाली थे, ब्रह्मा ने इस की प्रकाश प्रशंसा कई रीतियों में किया। ब्रह्मा द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न, भगवान ने ब्रह्मा को आशीर्वाद दिया। असुरों के योजना को ध्वस्त कर दिया गया।

कई बार पराजय का सामना करने के बावजूद असुर हार स्वीकार नहीं करेंगे, बार-बार प्रयत्न करते रहेंगे। उन्होंने याग को क्षति पहुंचाने के लिए एक और प्रयास किया।

वे एक जुट होके यागशाला पर आक्रमण करने के उधेश्य से फिर से इकट्ठे हुए I  उन्होंने एक पल में सबकुछ नष्ट करने का विचार किया।

दीपप्रकाश दुःख और पीड़ा को पूर्ण रूप से नाश करने के लिए पहुंचने के बाद,  ब्रह्मा शत्रुओं द्वारा फिर इस बाधा से निराश हुए I लेकिन वह भगवान में अपने विशाल विश्वास से सांत्वना लिया।

ब्रह्मा ने असुरों की विशाल सेना को आवागमन करते देखा। उन्होंने स्वयं से कहा की “यह भी गुज़र जाएगा – उनकी दिव्य कृपा से” I

तब गरजनेवाला गड़गड़ाहट के साथ यागशाला से कुछ उत्पन्न हुआ।

वो क्या था ?

अगले भाग में…..

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/18/story-of-varadhas-emergence-9/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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